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पत्ता गोभी की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

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जो किसान भाई पत्ता गोभी यानी बंद गोभी की खेती करना चाहते हैं, वे खेती की अन्य सभी तैयारियों के साथ कीट व रोग प्रबंधन के लिये विशेष रूप से कमर कस लें। नकदी फसल की सब्जी की यह खेती बहुत लाभकारी  है लेकिन इसमें कीट व्याधियां इतनी अधिक लगतीं हैं कि उनके लिए प्रत्येक पल सतर्क रहना होता है। जरा सी चूक पर फसल के खराब होने में देरी नहीं लगती है। पहाड़ी व मैदानी क्षेत्रों में होने वाली पत्ता गोभी का सबसे बड़ा लाभ यह है कि बाजार में कीमत घटने के समय खेत में रोक भी सकते हैं, महंगी होने पर काट कर बेच भी सकते हैं। पत्ता गोभी का सबसे अधिक उपयोग सब्जी बनाने में होता है। इसके अलावा सलाद, कढ़ी, अचार, स्ट्रीट फूड, पाव भाजी, आदि चाट आइटम बनाने के भी काम में लाया जाता है। पत्ता गोभी में 1.8 प्रतिशत प्रोटीन,0.1 प्रतिशत वसा, 4.6 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, फास्फोरस, आयरन के साथ बिटामिन ए व विटामिन बी-1, विटामिन बी-2 तथा विटामिन सी पाया जाता है। पत्ता गोभी पेट के रोगों के साथ शुगर डाइबिटीज में लाभदायक होता है। आइए जानते हैं इसकी खेती के बारे में।

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मिट्टी व जलवायु

पत्ता गोभी की खेती वैसे तो सभी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है लेकिन जल निकास वाली दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है। पत्ता गोभी की खेती के लिये सामान्य जलवायु की जरूरत होती है। अधिक सर्दी और पाले से पत्तागोभी को नुकसान हो सकता है। गांठों के विकास के समय 20 डिग्री के आसपास तापमान होना चाहिये। वर्षा के समय तापमान घटने से पत्ता गोभी की गांठ अच्छी तरह से विकसित नहीं हो पाती है और स्वाद भी खराब हो जाता है।

पत्ता गोभी की खेती

खेत की तैयारी कैसे करें

किसान भाइयों को चाहिये कि जलनिकासी वाले खेत में सबसे पहले हैरों आदि से खेत की मिट्टी को पलटवा दें जिससे पूर्व की फसल के अवशेष और खरपतवार उसमें दब जायें और खेत को एक सप्ताह के लिए खुला छोड़ दें। इस बीच सिंचाई कर दें। जब दुबारा खरपतवार उगती दिखाई दे तो उसकी दो तीन बार गहरी जुताई कर देनी चाहिये तथा पाटा चला दें। इससे खेत की मिट्टी भुरभुरी हो जाती है।

खाद एवं उर्वरक का प्रबंधन

आखिरी जुताई के पहले खेत में प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 20 से 25 टन गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट खाद डालनी चाहिये। इसके बाद जब बुवाई होनी हो उससे पहले खेत में 150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलो फास्फोरस, 60 किलो पोटाश लाकर रख लें। बुवाई से पहले आखिरी जुताई के समय फास्फोरस और पोटाश तो पूरी मात्रा डाल दें और नाइट्रोजन की केवल एक तिहाई मात्रा ही डालें।  बची हुई नाइट्रोजन को आधा-आधा बांट लें। उसमें से एक हिस्सा 30 दिन के बाद और दूसरा हिस्सा 50 दिन के बाद खेत में खड़ी फसल पर छिड़क दें।

पत्ता गोभी की लाभकारी किस्में

लाभकारी अच्छी किस्में

पत्ता गोभी के रंग, रूप आकार व पैदावार के आधार पर इसकी किस्मों को कई भागों में बांटा गया है, जो इस प्रकार हैं:-

  1. अगेती किस्में: अगेती फसल के लिए उपयुक्त किस्में गोल्डन एकर, प्राइड आफ इंडिया, पूसा मुक्ता एवं मित्रा, मीनाक्षी आदि प्रमुख हैं।
  2. मध्यम किस्में: मध्यम समय में खेती करने के लिए उपयुक्त किस्में अर्ली ड्रमहेड, पूसा मुक्त, आदि प्रमुख हैं।
  3. पछेती किस्में: लेट ड्रम हेड, डेनिस वाल हेड, मुक्ता, पूसा ड्रम हेड, रेड कैबेज, पूसा हिट, टायड, कोपेन हेगन,गणेश गोल, हरी रानी कोल आदि प्रमुख हैं।
  4. इनके अलावा माही क्रांति, गुड्डी वाल 65, इंदु, एसएन 183, बीसी 90 भी प्रमुख किस्में हैं।

बीज की मात्रा व अन्य जानकारियां

किसान भाइयों अगेती किस्म की फसलों को लेने के लिए प्रति हेक्टेयर 500 ग्राम की बीज की आवश्यकता होती है जबकि पछेती खेती के लिए 400 ग्राम के आसपास ही जरूरत होती है। इसका कारण यह है कि अगेती किस्म की पौध लगाने में मरने वाले पौधों की संख्या अधिक होती है। इसलिये बीज अधिक लगाया जाता है।

कब-कब की जाती है बिजाई

पत्ता गोभी की फसल साल में दो बार ली जा सकती है। इसकी फसल बरसात व गर्मी के लिए अलग-अलग समय पर ली जाती है।

  1. गर्मी के लिए पत्ता गोभी की बिजाई नवम्बर, दिसम्बर व जनवरी में की जाती है।
  2. बरसात के समय पत्ता गोभी तैयार करने के लिए बिजाई मई, जून व जुलाई में की जाती है।
  3. अगेती खेती यानी गर्मी की फसल के लिए अगस्त-सितम्बर के मध्य तक नर्सरी में बीज की बुवाई कर देनी चाहिये। पछेती फसल के लिए सितम्बर व अक्टूबर कर देनी चाहिये। इसी तरह बरसात की फसल के लिए अगेती फसल के लिए मार्च अप्रैल में नर्सरी की तैयारी कर लेनी चाहिये और पछेती किस्मों की फसल के लिए मई-जून में नर्सरी तैयार करनी चाहिये।

नर्सरी की तैयारी व पौधारोपण

एक मीटर लम्बी और ढाई मीटर चौड़ी क्यारी बनायें। इसमें गोबर की खाद और वर्मी कम्पोस्ट का इस्तेमाल करते हुए बीज की बुवाई करनी चाहिये। पौधशाला ऊंचाई पर बनानी चाहिये। लगभग एक माह में पौध तैयार हो जाती है। इसके बाद खेत में क्यारी बनाकर  पौधों का रोपण करना चाहिये। रोपते समय पौधों की लाइन की दूरी एक  फुट होनी चाहिये और पौधों से पौधों की दूरी भी एक फुट ही होनी चाहिये।

सिंचाई का प्रबंधन किस प्रकार करें

बुवाई के एक सप्ताह बाद पहली सिंचाई करनी चाहिये। पत्ता गोभी की अच्छी पैदावार के लिए खेत में नमी हमेशा रहनी चाहिये। बरसात के समय किसान भाई आप खेत की स्थिति के अनुसार सिंचाई करें। सीजन में वर्षा समय पर न होने पर प्रत्येक पखवाड़े में एक बार सिंचाई अवश्य करायें। गर्मी के मौसम मे प्रत्येक सप्ताह में खेतों की सिंचाई करायें।

खरपतवार का नियंत्रण कैसे करें

खरपतवार को नियंत्रण करने के लिए किसान भाइयों को खेत की कम से कम चार बार निराई गुड़ाई करनी चाहिये। निराई गुड़ाई करते समय यह ध्यान रखना चाहिये कि खरपतवार निकालने जो मिट्टी जड़ों से हट जाती है उसे फिर से चढ़ा देना  चाहिये। इसके अलावा खरपतवार नियंत्रण के लिए पेंडीमेथालिन की 3 लीटर मात्रा को  एक हजार लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें।

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कीट एवं व्याधियों की रोकथाम

किसान भाइयो पत्ता गोभी की खेती में कीट एवं इल्लियों  की रोकथाम सबसे जरूरी है। पत्ता गोभी में शुरू से ही कीटों का लगना शुरू हो जाता है। यदि समय पर इनका नियंत्रण न किया जा सकता तो फसल पूरी तरह से चौपट हो सकती है। फसलों के लिए सबसे हानिकारक इल्लियों, लूपर्स और कीट अनेक प्रकार हैं,इनमें से प्रमुख कुछ इस प्रकार हैं:-

  1. आरा मक्खी
  2. फली बीटल
  3. पत्ती भक्षक लटें
  4. हीरक तितली
  5. गोभी की तितली
  6. तम्बाकू की इल्ली

उपचार  या रोकथाम: इन सभी इल्लियों व कीटों को नियंत्रण करने के लिए नीम की निबौली का अर्क 4 प्रतिशत या बीटी -1 एक ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिडकाव करना चाहिये। जो किसान भाई इन्सेक्टीसाइड से नियंत्रण करना चाहें Ñवो स्पिनोसैड 43 एससी 1 मिलीलीटरप्रति 4 लीटर पानी में या एमामेक्टिन बेंजोएट 5 एससी 1 ग्राम प्रति 2 लीटर पानी में या क्लोरऐन्ट,निलिमोल 18.5 एसासी एक मिली लीटर प्रति 10 लीटर पानी  में या फेनवेलहेट 20 ईसी 1.5 मिलीलीटर प्रति 2 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

पत्ता गोभी के पत्तों को चूस कर पौधे को कमजोर बनाने वाला एक कीट मोयला भी है, जिसकी रोकथाम करने के लिए डाइमेथेएट 30 ईसी 2. 0 मिलीटर प्रति लीटर पानी या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल 1 मिलीलीटर प्रति 3 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

आईगलन रोग: इस रोग को डम्पिंग आफ भी कहते हैं। यह रोग अगेती किस्मों की नर्सरी में लगना शुरू होता है। इससे पौधे मरने लगते हैं। इसकी रोक थाम के लिए थाइम या कैप्टान 3 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिये। रोग के संकेत मिलने पर बोर्डो मिश्रण 2:2:50 या कॉपर आक्सीक्लोराइड को 3 ग्राम प्रतिलीटर पानी में मिलाकर स्पे्र करें।

काला सड़न भी बीजों की क्यारी में या नई पौध में लगता है। इससे फूलों व डंठलों में सड़न पैदा होती है। इसकी रोकथाम पत्ता गोभी की बीजों की बुवाई से पहले स्ट्रेओसाक्लिन 250 ग्राम या बाविस्टिन एक ग्राम प्रतिलीटर पानी में घोल कर 2 घंटे तक भिगोकर रखें। उसे छाया में सुखाने के बाद ही बुआई करें।  बाद में रोग के संकेत मिलने पर इन्हीं दोनों दवाओं का छिड़काव करें।

फसल की कटाई

किसान भाइयों जब फसल तैयार हो जाये तब आपको फसल की कटाई यानी पत्ता गोभी की तुड़ाई बाजार भाव देख कर करें। अधिकांश किस्मों की फसलें 75 से 90 दिनों के भीतर तैयार हो जातीं हैं। जबकि कुछ ऐसी किस्में भी हैं जिनकी फसल 55 दिन में ही कटाई के लिए तैयार हो जाती है। पत्ता गोभी के पूरा बड़ा होने पर ही उसकी कटाई करनी चाहिये। पत्ता गोभी अच्छी तरह कड़ा होने पर ही काटा जाना चाहिये। किसान भाइयों पत्ता गोभी की कटाई का समय ठंडा मौसम ही सबसे उपयुक्त होता है। इसको कटाई के बाद छाया या नमी वाली जगह में रखना चाहिये। जिससे काफी समय तक ताजा बना रहे। जब पत्ता गोभी कड़ा हो जाये और उसके पत्ते अलग अलग होने लगे तो तुरन्त काट लेना चाहिये। किसान भाइयों पत्ता गोभी की पैदावार प्रति हेक्टेयर कम से कम 50 टन तो होती ही है। अच्छी किस्म और उचित प्रबंधन वाली खेती से पत्ता गोभी को प्रति हेक्टेयर 70 से 80 टन की भी पैदावार प्राप्त की जा सकती है।

 

 

 

 

 

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