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पपीते की खेती से कमाएं: स्वाद भी सेहत भी

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पपीता एक उष्णकटिबंधीय फसल है. केला के बाद पपीता ही एक व्यावसायिक फसल है. पपीता औषधीय गुणों से भरपूर फल है. इसको भारत में लाने का श्रेय डच यात्री लिंस्कातेन को जाता है. जिनके द्वारा पपीते के पौधे को 1575 में मलेशिया लाया गया फिर वहां से इसे भारत लाया गया. पपीते को कच्चा और पका कर दोनों तरह से खाया जाता है. इसके पके फल को डाक्टर भी खाने की सलाह देते हैं. इसमें विटामिन A की प्रचुर मात्रा पाई जाती है. यह अपच में भी लाभदायक होता है. पेट साफ रखने तथा भूख बढ़ने में भी इसका सेवन किया जाता है.

पपीता को सौन्दर्य प्रशाधन के रूप में भी प्रयोग में लाया जाता है. जिस तरह से एलोवीरा, हल्दी आदि को सौंदर्य प्रसाधन के रूप में प्रयोग में लाया जाता है उसी तरह से पपीता को भी प्रयोग में लाया जाता है. पके हुए पपीता के गूदे को चेहरे पर लगाने से त्वचा में चमक आती है तथा त्वचा में नमी भी बानी रहती है. इसको पूरी साल लगाया जा सकता है लेकिन यह फ़रवरी-मार्च से मई से अक्टूबर के मध्य विशेष रूप से पैदा होता है, क्योंकि इसकी सफल खेती के लिए 10 डिग्री से. से 40 डिग्री से. तापमान उपयुक्त है।

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जमीन की तैयारी:

जमीन की तैयारी करते वक्त खेत में पौधों के रोपण के लिए खेत को अच्छी तरह से तैयार करके 2 x2 मीटर की दूरी पर 50x50x50 सेंटीमीटर आकार के गड्‌ढे मई के महीने में खोद कर 15 दिनों के लिए खुले छोड़ देने चाहिएं. अधिक तापमान और धूप, मिट्टी में उपस्थित हानिकारक कीड़े-मकोड़े, रोगाणु इत्यादि नष्ट कर देती है।इसके बाद इसमें गोबर की बनी हुई खाद और मिटटी मिला कर भर देनी चाहिए.  पौधे लगाने के बाद गड्‌ढे को मिट्‌टी और गोबर की खाद 50 ग्राम एल्ड्रिन (कीटनाशक) मिलाकर इस प्रकार भरना चाहिए कि वह जमीन से 10-15 सेंटीमीटर ऊंचा रहे। उसी दिन हल्की सिंचाई करनी चाहिए तथा उसके बाद आवश्कतानुसार रोजाना शाम में ही पानी देना चाहिए। जिससे की पौधे को धूप से बचाया जा सके.

जमीन का चुनाव:

जब हम पपीता की खेती की बात करते हैं तो हमें ये भी ध्यान रखना चाहिए की जमीन की मिटटी कैसे है. वैसे अगर आप ठीक से गड्ढा बना कर और उसमें गोबर और दोमट मिटटी मिला कर दाल देते हो तो काफी हद तक मिटटी वाली समस्या का समाधान हो जाता है. लेकिन पपीता की खेती के लिए बलुई और दोमट मिटटी बहुत अच्छी होती है. इसके लिए ध्यान रखने योग्य बात है की जमीन में जल भराव नहीं होना चाहिए. नहीं तो पौधों के मरने की संभावना रहती है.

बाजार के हिसाब से करें चयन:

किसान भाइयों को पपीते की किस्मों का चुनाव  क्षेत्र के हिसाब से करें. पपीते की किस्मों का चुनाव खेती के उद्देश्य के अनुसार करना जैसे कि अगर औद्योगिक प्रयोग के लिए खेती करनी है तो वे किस्में जिनसे पपेन निकाला जाता है, उनका चुनाव करना चाहिए जो कि पपेन किस्में कहलाती हैं। इस वर्ग की महत्वपूर्ण किस्में ओ-2 एसी. ओ-5 एवं सी.ओ-7 है।

इसके साथ दूसरा मत्वपूर्ण वर्ग है टेबल वेराइटी. टेबल वैराइटी उन किस्मों को बोलै जाता है जिनको हम पका कर खाने कि लिए उगाते हैं या  जिन्हे हम अपने घरों में सब्जी या फल के रूप में या काटकर खाते हैं। इसके अंतर्गत परंपरागत पपीता की किस्में (जैसे बड़वानी लाल, पीला वाशिंगटन, मधुबिंदु, कुर्ग हानिड्यू, को-1 एंड 3) और नयी संकर किस्में जो उभयलिंगी होती हैं (उदाहरण के लिए पूसा नन्हा, पूसा डिलीशियस, CO-7, पूसा मैजेस्टी आदि) आती हैं।

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खाद पानी का ध्यान रखना:

जैसा की हम पहले बता चुके हैं, पपीते की खेती में पर पौधे कि हिसाब से खाद और पानी का हिसाब होता है. खेत में पौधे लगाने से पहले पूरे खेत में गोबर की बनी हुई खाद मिला लें, जब पौधे ज़माने लगें तो उनमें 200 ग्राम नाइट्रोजन, 200 से 250 ग्राम फास्फोरस, 400 से 500 ग्राम पोटाश पर पौधे के हिसाब से लगा दें. जिससे आप देखोगे की पौधे में बृद्धि और उसके फल की गुणवत्ता भी अच्छी होगी.

पानी के लिए अच्छा होगा की टपक विधि से पानी लगाया जाए.

पपीते की नर्सरी तैयार करने की विधि:

पपीते के 1 हेक्टेयर के लिए आवश्यक पौधों की संख्या तैयार करने के लिए परंपरागत किस्मों का 500 ग्राम बीज एवं उन्नत किस्मों का 300 ग्राम बीज की मात्रा की आवश्यकता होती है। पपीते की पौध क्यारियों एवं पालीथीन की थैलियों में तैयार की जा सकती है। क्यारियों में पौध तैयार करने हेतु क्यारी की लंबाई 3 मीटर, चैड़ाई 1 मीटर एवं ऊंचाई 20 सेमी रखें। प्लास्टिक की थैलियों में पौध तैयार करने के लिए 200 गेज मोटी 20 गुना 15 सेमी आकर की थैलियाँ (जिनमें चारों तरफ एवं नीचे छेद किए गए हो ) में वर्मीकंपोस्ट, रेत, गोबर खाद तथा मिट्टी के 1:1:1:1 अनुपात का मिश्रण भरकर प्रत्येक थैली में 1 या 2 बीज बोंए।

पपीते में  लगने वाले कीट तथा उनका इलाज:

1. एफिड – कीट का वैज्ञानिक नाम एफिस गोसीपाई, माइजस परसिकी है। इस कीट के शिशु तथा प्रौढ़ दोनों पत्तियों की निचली सतह से रस चूसते हैं। तथा पौधे में मौजेक रोग के वाहक का कार्य करते है।

प्रबंधन तकनीक – मिथाइल डेमेटान या डायमिथोएट की 2 मिली मात्रा/ ली. पानी में मिलाकर पौध रोपण पश्चात् आवश्यकतानुसार 15            दिन के अंतर से पत्तियों पर छिड़काव करें।

2. लाल मकड़ी – इसे वैज्ञानिक भाषा में ट्रेट्रानायचस सिनोवेरिनस कहते है। यह पपीते का प्रमुख कीट है जिसके आक्रमण से फल खुरदुरे और काले रंग के हो जाते है। तथा पत्तियाँ पर आक्रमण की स्थिति में फफूंद पीली पड़ जाती है।

प्रबंधन – पौधे पर आक्रमण दिखते ही प्रभावित पत्तियों को तोड़कर दूर गढढे में दबाऐं। वेटेबल सल्फर 2.5 ग्राम/ ली. या डाइकोफॉल 18.5        ईसी की 2.5 मिली या ओमाइट 1.5 मिली मात्रा/ ली. पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

पपीते की फसल में रोग प्रबंधन:

1. तना गलन (तने तथा जड़ के गलने की बीमारी ) – इस रोग का कारण पीथियम एफिनडरमेटम फाइटोफ्थरा पामीबोरा नामक फफूंद है जिसके कारण पौधे भूमि के पास तने का ऊपरी छिलका पीला होकर गलने लगता है धीर-धीरे गलन जड़ तक पहुँच जाती है। इस कारण फफूंद सूख जाती है और पौधा मर जाता है। प्रबंधन के लिए जलनिकास में सुधार करें तथा रोग ग्रसित पौधों को खेत से निकालकर हटा दें उसके पश्चात् पौधों पर 1 प्रतिशत बोर्डो मिश्रण या काॅपर आक्सीक्लोराइउ या ब्लाइटाकस दवा की 2 ग्रा / ली. पानी में मिलाकर छिड़काव करें तथा ड्रेंचिंग करें।

2. डम्पिंग ऑफ (आर्द गलन ) – यह रोग पपीते में नर्सरी अवस्था में आता है जिसका कारण पीथियम एफिनडरमेटस, पी. अल्टीमस फाइटोफ्थोरा पामीबोरा तथा राइजोक्टोनिया स्पी. के कारण होता है।

लक्षण – रोगे नीचे (जमीन की सतह के पास से )से गलकर मरने लगते है।

प्रबंधन – रोग से बचने के लिए पपीते के बीजों का उपचार बुवाई पूर्व सेरेसान या एग्रोसान जी एन से उपचारित करें तथा नर्सरी को फार्मेल्डिहाइड के 2.5 प्रतिशत घोल से ड्रेंचिंग करें या उपचारित करें।

3. रिंग स्पॉट वायरस  – इस रोग का कारण विषाणु है जो कि माहू द्वारा फैलता है | इस रोग के गंभीर आक्रमण की स्थिति में 50-60 प्रतिशत तक हानि हो जाती है | जिस कारण पत्तियों पर क्लोरोसिस दिखाई देता है पत्तियाँ कटी – कटी दिखाई देती है तथा पौधे की वृद्धि रूक जाती है।

लीफकर्ल – यह भी विषाणु जनित रोग है जो कि सफेद मक्खी के द्वारा फैलता है जिस कारण पत्तियाँ मुड़ जाती है इस रोग से 70-80 प्रतिषत तक नुकसान हो जाता है।

नियंत्रण – स्वस्थ पौधो का रोपण करें। रोगी पौधों को उखाड़कर खेत से दूर गढढे में दबाकर नष्ट करें। सफेद मक्खी के नियंत्रण हेतु अनुसंशित कीटनाशक का प्रयोग करें।

पपीते का उत्पादन बढ़ाने के उपाय:

पपीते की फसल में पेड़ से पेड़ की एक निश्चित दूरी होती है. उसमे हम और फसल भी ले सकते है.

  1. पपीते की व्यावसायिक खेती में उभयलिंगी किस्मों जैसे सूर्या ( भारतीय बागवानी अनु. सं. बैंगलोर ) सनराइज सोलो, रेडी लेडी -786 के साथ किचिन गार्डन के लिए पूसा नन्हा, कुर्ग हनीड्यू, पूसा ड्वार्फ, पंत पपीता 1, 2 एवं 3 के चयन को प्राथमिकता दें।
  2. रसचूसक कीटों के प्रभाव वाले क्षेत्रो में पपीते को अक्टूबर में रोपण करें। तथा पौधों की नर्सरी कीट अवरोधी नेट हाऊस के भीतर तैयार करें।
  3. खाद व उर्वरक की संतुलित मात्रा 250 ग्राम नत्रजन, 250 ग्राम स्फुर तथा 250 -500 ग्राम पोटाश प्रति पौधा/वर्ष प्रयोग करें।
  4. सिंचाई के लिए ड्रिप सिंचाई पद्धिति अपनाऐं।
  5. फसल में रसचूसक कीटों के नियंत्रण हेतु फेरामोन ट्रेप, प्रकाश प्रपंच का प्रयोग करें तथा नीम सत्व 4 प्रतिशत का छिड़काव करें।
  6. पपीते के पौधों को 30 सेमी उठी मेड़ पर 2 गुणा 2 मीटर की दूरी पर रोपाई करें। तथा अंतवर्तीय फसल के रूप में मिर्च , टमाटर बैंगन न लगाएं।

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