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चने की खेती कैसे करें एवं चने की खेती के लिए जानकारी

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यह कहावत आज भी ग्रामीण भारत में प्रचलित है। कच्चा चना घोडे को खिलाया जाता है, जो बेहद श्रमसाध्य काम करता है वहीं भुना हुआ चना बीमार मरीज को खिलाया जाता है जिनको कि लीबर में समस्या हो। यानी कि चना हर तरीके से और हर श्रेणी के मनुष्य और पशु दोनों के लिए उपयोगी है। चने की खेती यूंतो हर तरह की भारी मिट्टी में होती है लकिन जिन इलाकों में चने की खेती करना किसानों ने बंद कर दिया है वहां इसकी खेती एक दो किसानों के करने से तोता जैसे पक्षी ज्यादा नुकसान करते हैं।

चना बहुत गुणकारी होता है। यह सभी जानते हैं लेकिन इसकी खेती के लिए कई चीजों का ध्यान रखना पड़ता है। नए किसान भाईयों के लिए यह जानना जरूरी है कि चने की खेती कैसे की जाती है।

चने की खेती के लिए हल्की दोमट या दोमट मिट्टी अच्छी होती है। भूमि में जल निकास की उपयुक्त व्यवस्था होनी चाहिये। भूमि में अधिक क्षारीयता नहीं होनी चाहिये।  फसल को दीमक एवं कटवर्म के प्रकोप से बचाने के लिए अन्तिम जुताई के समय हैप्टाक्लोर (4 प्रतिशत) या क्यूंनालफॉस (1.5 प्रतिशत) या मिथाइल पैराथियोन (2 प्रतिशत) चूर्ण की 25 कि.ग्रा. मात्रा को प्रति हैक्टेयर की दर से मिट्टी में अच्छी प्रकार मिलाना चाहिये।

चने में अनेक प्रकार के कीट एवं बीमारियां हानि पहुँचाते हैं। इनके प्रकोप से फसल को बचाने के लिए बीज को उपचारित करके ही बुवाई करनी चाहिये। बीज को फफूंदनाशी कार्बन्डाजिम आदि, कीटनाशक कोई भी एक एवं राजोबियम कल्चर से उपचारित करें। बीज को उपचारित करके लिए एक लीटर पानी में 250 ग्राम गुड़ को गर्म करके ठंडा होने पर उसमें राइजोबियम कल्चर व फास्फोरस घुलनशील जीवाणु को अच्छी प्रकार मिलाकर उसमें बीज उपचारित करना चाहिये। तदोपरांत छांव में सुखाकर बीज की बिजाई करें।

चने की बुबाई का समय

असिचिंत क्षेत्रों में चने की बुवाई अक्टूबर के प्रथम पखवाड़े में कर देनी चाहिये। जिन क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधा हो वहाँ पर बुवाई 30 अक्टूबर तक अवश्य कर देनी चाहिये। बारानी खेती के लिए 80 कि.ग्रा. तथा सिंचित क्षेत्र के लिए 60 कि.ग्रा. बीज की मात्रा प्रति हैक्टेयर पर्याप्त होती है। बारानी फसल के लिए बीज की गहराई 7 से 10 से.मी. तथा सिंचित क्षेत्र के लिए बीज की बुवाई 5 से 7 से.मी. होनी चाहिये। फसल की बुवाई सीड ड्रिल से करनी चाहिए।

चने की खेती में खाद एवं उर्वरक कितना डालें

किसी भी दलहनी फलस को उर्वरकों की बेहद कम आवश्यकता होती है। नाइट्रोजन फिक्सेसन का काम दलहनी पौधों की जड़ों द्वारा खुद किया जाता है फिर भी उर्वकर प्रबंधन आवश्यक है। पौधों के प्रारंभिक विकास के लिए20 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 कि.ग्रा. फॉस्फोरस प्रति हैक्टेयर की दर से देना चाहिये। एक हैक्टेयर क्षेत्र के लिए 2.5 टन कस्पोस्ट खाद को भूमि की तैयारी के समय अच्छी प्रकार से मिट्टी में मिला देनी चाहिये।

अच्छी पैदाबार के लिए चने की उन्नत किस्में

विविधताओं वाले देश में अनेक तरह की पर्यावरणीय परिस्थिति हैं। इनके अनुरूप ही वैज्ञानिकों ने चने की उन्नत किस्मों का विकास किया है। एनबीईजी 119 किस्म 95 दिन में पक कर 19 कुंतल उपज देती है। इसे कर्नाटक, एपी, तमिलनाडु में लगाया जा सकता है। फुले विक्रांत किस्म 110 दिन में तैयार होकर 21 कुंतल उपज देती है। महाराष्ट्र, वेस्ट एमपी एवं गुजरात में लगाने योग्य। अरवीजी 202 किस्म 100 दिन में 20 कुंतल एवं अरवीजी 203 किस्म 100 दिन में 19 कुंतल उपज देती है। उक्त क्षेत्रों में बिजाई योग्य।

एचसी 5 किस्म 140 दिन में 20 कुंतल उपज एवं पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, उत्तराखण्ड में बोने योग्य। जीबीएम 2 किस्म 110 दिन में 20 कुंतल उपज एवं कर्नाटक, एनबीईजी 47 किस्म 95 दिन में 25 कुंतल प्रति हैक्टेयर तक उपज देती है। आंध्र प्रदेश में लगाने योग्य। फुले जी 115 दिन में 23 कुंतल, बीजी 3062 किस्म 118 दिन में 23 कुंतल, जेजी 24 किस्म 110 दिन में 23 कुंतल तक उपज देती हैं। उक्त किस्मों को महाराष्ट्र, एमपी, गुजरात, यूपी, दक्षिणी राजस्थान आदि क्षेत्रों में लगाया जा सकता है।

चने की खेती के लिए सिंचाई

सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो तो नमी की कमी होने की स्थिति में एक या दो सिंचाई की जा सकती है। पहली सिंचाई 40 से 50 दिनों बाद तथा दूसरी सिंचाई फलियां आने पर की जानी चाहिये। सिचिंत क्षेत्रों में चने की खेती के लिए 3 से 4 सिंचाई पर्याप्त होती है। पहली सिंचाई फसल की निराई करने के बाद 35-40 दिन बाद,  70-80 दिन बाद दूसरी एवं 105-110 दिनों बाद अन्तिम सिंचाई करनी चाहिये।

चने में खरपतवार नियंत्रण

चने में बथुआ, खरतुआ, मोरवा, प्याजी, मोथा, दूब इत्यादि उगते हैं। ये खरपतवार फसल के पौधों के साथ पोषक तत्वों, नमी, स्थान एवं प्रकाश के लिए प्रतिस्पर्धा करके उपज को प्रभावित करते हैं। इसके अतिरिक्त खरपतवारों के द्वारा फसल में अनेक प्रकार की बीमारियों एवं कीटों का भी प्रकोप होता है जो बीज की गुणवत्ता को भी प्रभावित करते हैं।

बचाव के लिए चने की फसल में दो बार गुड़ाई करना पर्याप्त होता है। प्रथम गुड़ाई फसल बुवाई के 30-35 दिन पश्चात् व दूसरी 50-55 दिनों बाद करनी चाहिये। यदि मजदूरों की उपलब्धता न हो तो फसल बुवाई के तुरन्त पश्चात् पैन्ड़ीमैथालीन की 2.50 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर खेत में समान रूप से मशीन द्वारा छिड़काव करना चाहिये। फिर बुवाई के 30-35 दिनों बाद एक गुड़ाई कर देनी चाहिये।

चने के कीट एवं रोग

यदि खड़ी फसल में दीमक का प्रकोप हो तो क्लोरोपाइरीफोस 20 ईसी या एन्डोसल्फान 35 ईसी की 2 से 3 लीटर मात्रा को प्रति हैक्टेयर की दर से सिंचाई के साथ देनी चाहिये। ध्यान रहे दीमक के नियन्त्रण हेतु कीटनाशी का जड़ों तक पहुँचना बहुत आवश्यक है। कटवर्म की लटें ढेलों के नीचे छिपी होती है तथा रात में पौधों को जड़ों के पास काटकर फसल को नुकसान पहुँचाती हैं। कटवर्म के नियंत्रण हेतु मिथाइल पैराथियोन 2 प्रतिशत या क्यूनालफास 1.50 प्रतिशत चूर्ण की 25 किलोग्राम मात्रा को प्रति हैक्टेयर की दर से भुरकाव शाम के समय करना चाहिये।

फली छेदक

यह कीट फली के अंदर घुस कर दानों को खा जाता है। इस कीट के नियंत्रण हेतु फसल में फूल आने से पहले तथा फली लगने के बाद क्यूनालफॉस 1.5 प्रतिशत या मिथाइल पैराथियोन 2 प्रतिशत चूर्ण की 20-25 कि.ग्रा. मात्रा को प्रति हैक्टेयर की दर से भुरकना चाहिये। पानी की उपलब्धता होने पर मोनोक्रोटोफॉस 35 ईसी या क्यूनॉलफोस 25 ईसी की 1.25 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टेयर की दर से फसल में फूल आने के समय छिड़काव करना चाहिये।

झुलसा रोग (ब्लाइट)

यह बीमारी एक फफूंद के कारण होती है। इस बीमारी के कारण पौधें की जड़ों को छोड़कर तने पत्तियों एवं फलियों पर छोटे गोल तथा भूरे रंग के धब्बे बन जाते है। पौधे की आरम्भिक अवस्था में जमीन के पास तने पर इसके लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई देते है। पहले प्रभावित पौधे पीले व फिर भूरे रंग के हो जाते है तथा अन्ततः पौधा सूखकर मर जाता है। इस रोग के लक्षण दिखाई देने पर मैन्कोजेब नामक फफूंदनाशी की एक कि.ग्रा. या घुलनशील गन्धक की एक कि.ग्रा. या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड की 1.30 कि.ग्रा.मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिये। 10 दिनों के अन्तर पर 3-4 छिड़काव करने पर्याप्त होते है।

उखटा रोग (विल्ट)

इस बीमारी के लक्षण जल्दी बुवाई की गयी फसल में बुवाई के 20-25 दिनों बाद स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगते हैं। देरी से बोई गयी फसल में रोग के लक्षण फरवरी व मार्च में दिखाई देते हैं। पहले प्रभावित पौधे पीले रंग के हो जाते हैं तथा नीचे से ऊपर की ओर पत्तियाँ सूखने लगती हैं अन्ततः पौधा सूखकर मर जाता है। इस रोग के नियन्त्रण हेतु भूमि में नमी की कमी नही होनी चाहिये। यदि सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो तो बीमारी के लक्षण दिखाई देते ही सिंचाई कर देनी चाहिये। रोग रोधी किस्मों जैसै आरएसजी 888ए सी 235 तथा बीजी 256 की बुवाई करनी चाहिये।

किट्ट (रस्ट)

इस बीमारी के लक्षण फरवरी व मार्च में दिखाई देते हैं। पत्तियों की ऊपरी सतह पर फलियों पर्णवृतों तथा टहनियों पर हल्के भूरे काले रंग के उभरे हुए चकत्ते बन जाते हैं। इस रोग के लक्षण दिखाई देने पर मेन्कोजेब नामक फफूंदनाशी की एक कि.ग्रा. या घुलनशील गन्धक की एक कि.ग्रा. या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड की 1.30 कि.ग्रा. मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिये।

पाले से फसल का बचाव

चने की फसल में पाले के प्रभाव के कारण काफी क्षति हो जाती है। पाले के पड़ने की संम्भावना दिसम्बर-जनवरी में अधिक होती है। पाले के प्रभाव से फसल को बचाने के लिए फसल में गन्धक के तेजाब की 0 .1 प्रतिशत मात्रा यानि एक लीटर गन्धक के तेजाब को 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिये। पाला पड़ने की सम्भावना होने पर खेत के चारों और धुआं करना भी लाभदायक रहता है।

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