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लीची

लीची में पुष्प प्रबंधन (Flower management )करके अधिक उपज एवं गुणवक्तायुक्त फल कैसे प्राप्त करें?

लीची में पुष्प प्रबंधन (Flower management )करके अधिक उपज एवं गुणवक्तायुक्त फल कैसे प्राप्त करें?

भारत में 92 हजार हेक्टेयर में लीची की खेती हो रही है जिससे कुल 686 हजार मैट्रिक टन उत्पादन प्राप्त होता है, जबकि बिहार में लीची की खेती 32 हजार हेक्टेयर में होती है जिससे 300 मैट्रिक टन लीची का फल प्राप्त होता है। बिहार में लीची की उत्पादकता 8 टन/हेक्टेयर है जबकि राष्ट्रीय उत्पादकता 7.4टन / हेक्टेयर है। 

लीची को फलों की रानी कहते है।इसे प्राइड ऑफ बिहार भी कहते है। कुल लीची उत्पादन में लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा बिहार का है। फरवरी माह का दूसरा हप्ता चल रहा है। इस समय हमारे लीची उत्पादक किसान यह जानने के लिए उत्सुक है की उन्हें फरवरी माह में क्या करना चाहिए क्या नही करना चाहिए । लीची के पेड़ फूल आने की अवधि के दौरान 68-86°F (20-30°C) के बीच गर्म तापमान पसंद करते हैं। उन्हें उच्च आर्द्रता स्तर 70-90% की आवश्यकता होती है।पर्याप्त धूप, अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी और न्यूनतम हवा भी सफल फूल आने के लिए महत्वपूर्ण कारक हैं।  इसके अतिरिक्त, लीची के पेड़ों को फूल आने के लिए उनके सुप्त चरण के दौरान ठंडे तापमान (68°F या 20°C से नीचे) की अवधि से लाभ होता है। इष्टतम फल उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए लीची की खेती में फूलों का प्रबंधन महत्वपूर्ण है।

 1. लीची के फूल को समझना

जलवायु और विविधता के आधार पर, लीची के पेड़ आमतौर पर देर से सर्दियों या शुरुआती वसंत के दौरान फूल आते हैं।पुष्पन तापमान, वर्षा, आर्द्रता और पोषण सहित विभिन्न कारकों से प्रभावित होता है।

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 2.कटाई छंटाई

कटाई छंटाई पेड़ के आकार को बनाए रखने, मृत लकड़ी को हटाने और वायु प्रवाह को बढ़ावा देने में मदद करती है, जिससे रोग एवं कीट का आक्रमण कम होता है। युवा पेड़ों की ट्रेनिंग एवं प्रूनिंग करने से मजबूत मचान विकास को बढ़ावा मिलता है, जो परिपक्व पेड़ों में फूल और फल उत्पादन को प्रोत्साहित करता है।फूलों वाली टहनियों को अत्यधिक हटाने से बचने के लिए छंटाई विवेकपूर्ण तरीके से की जानी चाहिए।

 3. पोषक तत्व प्रबंधन

फूलों की शुरुआत और विकास के लिए उचित पोषण आवश्यक है। मृदा परीक्षण पोषक तत्वों की कमी को समझने और उचित उर्वरक रणनीति तैयार करने में मदद करता है। नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम और सूक्ष्म पोषक तत्वों के साथ संतुलित उर्वरक स्वस्थ फूलों के विकास में सहायता करता है।लीची में (प्रजाति के अनुसार) मंजर आने के 30 दिन पहले पेड़ पर जिंक सल्फेट की 2 ग्राम मात्रा को प्रति लीटर की दर से घोल बना कर पहला छिड़काव करना चाहिए , इसके 15-20 दिन के बाद दूसरा छिड़काव करने से मंजर एवं फूल अच्छे आते है।फल लगने के 15 दिन बाद  बोरेक्स की 4 ग्राम मात्रा को प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर 15 दिनों के अंतराल पर दो या तीन छिड़काव करने से फलों का झड़ना कम हो जाता है, मिठास में वृद्धि होती है तथा फल के आकार एवं रंग में सुधार होने के साथ-साथ फल के फटने की समस्या में भी कमी आती है।

 4. सिंचाई

लीची के बगीचे में अच्छी फलन एवं उत्तम गुणवत्ता के लिये मंजर आने के सम्भावित समय से तीन माह पहले से लेकर फूल में पूरी तरह से फल लगने से ठीक पहले तक लीची के बाग में सिंचाई कत्तई न करें तथा 10 वर्ष से अधिक पुराने बाग में  कोई भी अंतर फसल को नही लेना चाहिए।बाग़ की बहुत हल्की गुड़ाई साफ सफाई के दृष्टिगत कर सकते है लेकिन फूल आने के पहले से लेकर पूरी तरह से फल लग जाने से पूर्व तक सिंचाई बिल्कुल न करें,अन्यथा नुकसान हो सकता है।फूल बनने और फल लगने के लिए मिट्टी की पर्याप्त नमी महत्वपूर्ण है। मौसम की स्थिति, मिट्टी की नमी के स्तर और पेड़ों की वृद्धि अवस्था के आधार पर सिंचाई शेड्यूल को समायोजित किया जाना चाहिए।

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 5. कीट एवं रोग प्रबंधन

यदि बाग में मंजर अभी तक नही आये हो या 2 प्रतिशत से कम फूल आए हो तो उस बाग में इमिडाक्लोप्राइड @1मीली लीटर प्रति लीटर एवम घुलनशील गंधक की 2 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें । एफिड्स, माइट्स और फल छेदक जैसे कीट फूलों को नुकसान पहुंचाते हैं और फलों का बनना कम करते हैं।नियमित निगरानी से कीटों का शीघ्र पता लगाने और कल्चरल, जैविक या रासायनिक नियंत्रण उपायों का उपयोग करके समय पर हस्तक्षेप करने में मदद मिलती है।एन्थ्रेक्नोज और पाउडरी फफूंदी जैसे रोग फूलों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं और फलों की उपज को कम करते हैं।  लीची के बाग में माइट से ग्रसित शाखाओं को काट कर एक जगह एकत्र करके जला देना चाहिए। 

 6. परागण

लीची के फूल मुख्यतः मधुमक्खियों द्वारा कीट-परागित होते हैं।फूल आते समय पेड़  पर किसी प्रकार के किसी भी कीटनाशी दवा का छिड़काव नही करना चाहिए।फूल आते समय लीची के  बगीचे में 15 से 20 मधुमक्खी के बक्शे प्रति हेक्टेयर की दर से रखना चाहिए ,जिससे परागण बहुत अच्छा होता है ,जिससे फल कम झड़ते है एवं फल की गुणवक्ता भी अच्छी होती है एवं बागवान को अतरिक्त आमदनी प्राप्त हो जाती है।आवास संरक्षण और मधुमक्खी पालन प्रबंधन के माध्यम से मधुमक्खियों की आबादी को बनाए रखने से परागण दक्षता में वृद्धि होती है। सीमित मधुमक्खी गतिविधि वाले बगीचों में, पर्याप्त फल सेट सुनिश्चित करने के लिए मैन्युअल परागण की आवश्यकता हो सकती है।

 7. पर्यावरण प्रबंधन

फूल आने के दौरान पाले से सुरक्षा महत्वपूर्ण है, क्योंकि लीची के फूलों को पाले से क्षति होने की आशंका रहती है।ओवरहेड स्प्रिंकलर से सिंचाई करने से बाग के तापक्रम को 5 डिग्री सेल्सियस कम करने में सहायक होता है । विंडब्रेक प्रदान करने से फूलों और युवा फलों के गुच्छों को हवा से होने वाली क्षति को कम किया जा सकता है।

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 8. हार्मोनल विनियमन

जिबरेलिन और साइटोकिनिन जैसे विकास नियामकों का अनुप्रयोग फूल आने और फल लगने को प्रभावित कर सकता है। पेड़ों के स्वास्थ्य और फलों की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव से बचने के लिए हार्मोनल उपचार के समय और एकाग्रता को सावधानीपूर्वक प्रबंधित करने की आवश्यकता है। फल लगने के एक सप्ताह बाद प्लैनोफिक्स की 1 मि.ली.  दवा को प्रति 3 लीटर की दर से पानी में घोलकर  एक छिड़काव करके फलों को झड़ने से बचाया जा सकता है। 

 9. निगरानी और मूल्यांकन

फूलों की प्रगति, फल लगने और पेड़ के स्वास्थ्य की नियमित निगरानी से प्रबंधन प्रथाओं में समय पर समायोजन संभव हो पाता है। विस्तृत रिकॉर्ड रखने से विभिन्न हस्तक्षेपों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करने और समय के साथ प्रबंधन रणनीतियों को परिष्कृत करने में मदद मिलती है।

सारांश 

लीची फल उत्पादन और गुणवत्ता को अधिकतम करने के लिए प्रभावी फूल प्रबंधन आवश्यक है।एक समग्र दृष्टिकोण जो कल्चरल, पोषण, कीट और रोग प्रबंधन उपायों को एकीकृत करता है जो सफलता की कुंजी है। लीची की खेती में फूल प्रबंधन रणनीतियों को अनुकूलित करने के लिए नियमित निगरानी, ​​समय पर हस्तक्षेप और निरंतर सीखना महत्वपूर्ण है। इन प्रथाओं को लागू करने से स्वस्थ लीची के पेड़, प्रचुर मात्रा में फूल और अंततः, उच्च गुणवत्ता वाले फलों की भरपूर फसल में योगदान मिलेगा।



Dr AK Singh
डॉ एसके सिंह प्रोफेसर (प्लांट पैथोलॉजी) एवं विभागाध्यक्ष,
पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी,
प्रधान अन्वेषक, अखिल भारतीय फल अनुसंधान परियोजना,डॉ राजेंद्र प्रसाद सेंट्रल एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, पूसा-848 125, समस्तीपुर,बिहार
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लीची : लीची के पालन के लिए अभी से करे देखभाल

लीची : लीची के पालन के लिए अभी से करे देखभाल

सन;1780 मे पहली बार भारत देश मे दस्तक देने वाला फल लीची , जिसकी जरूरत आज भी शहरी और ग्रामीण बाजारों में काफी तेज़ी मे है। लीची एक मात्र ऐसा फल है जो हमारे शरीर को डी हाइड्रेशन यानी की पानी की कमी की पूर्ति करता है।इसी कारण भारत के पश्चिमी इलाको मे इसकी मांग बहुत है। इसी के साथ साथ इसमें विटामिन सी होता है, जो हमारे शरीर मे कैल्शियम की कमी की पूर्ति करता है। इसमें केरोटिन और नियोसीन भी होता है जो शरीर मे इम्यूनिटी को बढ़ाता हैं। ये भी पढ़े: सामान्य खेती के साथ फलों की खेती से भी कमाएं किसान: अमरूद की खेती के तरीके और फायदे भारत मे लीची का उत्पादन सबसे ज्यादा त्रिपुरा मे होता है। इसके अलावा अन्य राज्य झारखंड , पश्चिम बंगाल , बिहार , उतरप्रदेस और पंजाब मे। भारत मे किसानों के लिए लीची की फसल से अच्छा मुनाफा होता है ,लेकिन साथ ही साथ अच्छी देखभाल भी करनी पड़ती है।लीची की फसल को तैयार होने मे काफी समय लगता है , इसलिए किसानों को काफी परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है । ऐसे मे किसानों को संपूर्ण फसल को तैयार करने मे लागत खर्चा भी ज्यादा लगता है।

लीची के पालन के लिए सिंचाई और खाद उर्वरक का इस प्रकार करे इस्तेमाल :

insect pest in litchi लीची की फसल के लिए हमेशा आपको थाला विधि से ही सिंचाई करनी चाहिए। हमें केवल तब तक सिंचाई करनी है ,जब तक पौधों मे फूल आना न लग जाए। उसके बाद हमें नवंबर माह से फरवरी माह तक लीची की फसल की सिंचाई नहीं करनी चाहिए। लीची के पौधों को पानी देने का सबसे अच्छा समय शाम का होता है , क्योंकि इससे दिन की गर्मी की वजह से वाष्पीकरण भी नहीं होता है और पौधों को अच्छी तरह से जल की पूर्ति भी होती हैं।
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इसके अलावा अच्छी खाद और उर्वरक का इस्तेमाल करें और साथ ही साथ पौधे के आस पास बिल्कुल भी खरपतवार ना रहने दे। खरपतवार सभी प्रकार की फसलों के लिए सबसे खतरनाक होता है। इस से बचाव के लिए समय समय पर लीची के पौधों के आस पास ध्यान रखे और खरपतवार बिल्कुल भी न रहने दे। जब पौधे 6 से 7 माह के हो जाते है, तो उसके बाद आप पौधों मे फव्वारे के द्वारा पानी की छटाई अवस्य रूप से करे। अप्रैल महीने से लेकर नवंबर महीने तक लीची के पौधे की पूर्ण रूप से सिंचाई करे । इस समय तेज गर्मी के कारण पौधों को पानी की पूर्ति सही ढंग से नहीं करवाने पर संपूर्ण फसल पर बहुत असर पड़ता है।

लीची के पौधों की इस प्रकार करे कांट - छांट और रख - रखाव :

production of litchi crops लीची के पौधों की रख - रखाव करना सबसे महत्वपूर्ण काम होता है ,क्योंकि इसके बिना पूरी फसल भी खराब हो सकती है । इसके लिए आप गर्मी और सर्दी की ऋतू मे जब पोधा 4-5 साल का होता है, तो इस समय उसकी अवांछित टहनियों और साखाओ को हटा देना चाहिए । इससे जो भी कीट पतंग और मकड़िया बिना धूप पहुंचने के कारण शाखाओं में छिप जाती हैं वे नष्ट हो जाएंगी। ये भी पढ़े: केले की खेती की सम्पूर्ण जानकारी इससे पौधे का अच्छे से भरण-पोषण होगा और फसल की उपज भी अच्छी होगी। फलों की तुड़ाई करने के बाद आप पौधे की जितनी भी रोग ग्रसित ,अवांछित, खराब टहनियों और पत्तियों को हटा दे। संपूर्ण खेत के चारों तरफ से बाढ करना बहुत जरूरी है,इससे आसपास के पशु फसल को नुकसान नहीं पहुंचा पाएंगे। साथ ही साथ इससे फसल की उपज मे भी इजाफा होगा।

लीची की फसल मे आने वाली समस्याओं का इस प्रकार करे समाधान :

litchi farming लीची की फसल का सही से रखरखाव और अच्छी उपज के लिए किसानों को काफी समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है,जिनके बारे मे आज हम आपको बताएंगे की किस प्रकार आप इन समस्याओं से निदान पा सकते है। एक अच्छी फसल का उत्पादन कर सकते हैं तो चलिए जानते है इनके बारे मे
  1. लीची के फलों का फटना और छोटा होने से बचाव :- लीची के पौधों को गर्म और तेज हवाओं के कारण इनके फलों पर इसका सबसे ज्यादा असर दिखाई देता है क्योंकि इससे फल फटना तथा छोटा होना शुरू हो जाते है। ऐसे मे आप  बोरेक्स  ( 5ग्राम लिटर ) या बोरिक अम्ल (4 ग्रा./ली.) के घोल का 2-3 बार छिड़काव करें । इससे फसल की अच्छी पैदावार होगी।फलों के फटने की समस्या भी दूर हो जायेगी ।
  2. लीची मे मकड़ी का लग जाने से बचाव : लीची मे अगर एक बार मकड़ी लग जाती है, तो पूरी फसल को बर्बाद कर देती है। यह मकड़ी लीची के पौधों की टहनियां ,पत्ते और फलों को चुस्ती रहती है। जिसके कारण पूरा पौधा कमजोर पड़ जाता है और नष्ट हो जाता है। इससे बचाव के लिए आप सितंबर और अक्टूबर माह मे केलथेन या फ़ॉसफामिडान (1.25 मि.ली./लीटर) का घोल बनाकर 10- 15 दिन का अंतराल लेकर छिड़काव करें।
  3. लीची के फलों को झड़ने से रोकने के सुझाव :लीची के फलों का झड़ना संपूर्ण फसल के लिए काफी नुकसानदायक होता है। ऐसा पानी की कमी और किटों के कारण होता है।इससे बचाव के लिए आप पौधे मे फल लगने के मात्र सप्ताह भर के अंदर - अंदर क्रॉनिक्सएक्स 2 मिलीलीटर / 4. 8 लीटर या फिर आप ए एन ए 20 मिलीग्राम प्रति लीटर के घोल का बारी-बारी से छिड़काव करें। इससे फलों का झड़ना बंद हो जाएगा।

लीची के पौधे का पूर्ण विकास और प्रबंध इस प्रकार करें :

Litchi farmers लीची के पौधे का संपूर्ण तरह से विकास होने मे 15 से 20 साल तक का समय लगता है। ऐसे मे पौधे का पूर्ण विकास और सही रखरखाव होना बहुत ही जरूरी होता है।अच्छी उपजाऊ जमीन और अच्छी जलवाष्प का होना भी काफी आवश्यक होता है।
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लीची के पौधों को लगाते समय प्रति पौधे के बीच मे 5 मीटर की दूरी होनी चाहिए। किसान भाई प्रत्येक एक हेक्टर में 90 से 200 लीची के पौधे लगाएं। लीची के पौधों का अच्छे से विकास करने के लिए उनको क्रमबद्ध कतारों मे जरूर लगाए। नियमित रूप से सिंचाई और समय-समय पर पौधों की जरूरत के अनुसार खाद और उर्वरक का छिड़काव करना ना भूलें।

भारत मे लीची का बढ़ता हुआ आयात इस प्रकार :

litchi production in india भारतीय बाजार की तुलना मे अंतरराष्ट्रीय बाजार मे नवंबर माह से लेकर मार्च माह तक काफी ज्यादा लीची की मांग होती है। भारत मे लीची का फल जुलाई महीने तक संपूर्ण रूप से तैयार होकर बाजार मे उपलब्ध होता है। ऐसे समय पर अंतरराष्ट्रीय बाजार मे लीची की मांग बढ़ जाती है। भारत से निर्यात को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार द्वारा एपीडी कार्यक्रम की भी प्रमुख भूमिका है। भारत से सबसे ज्यादा लीची का निर्यात सऊदी अरेबिया संयुक्त अरब अमीरात, ओमान , कुवैत  ,बेल्जियम  ,बांग्लादेश और नार्वे जैसे देशों को होता है।
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भारतीय बाजार मे लीची की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार की तुलना में काफी कम है , लेकिन पिछले कुछ सालों मे इसकी कीमत मे इजाफा हुआ है। साथ ही साथ भारत सरकार द्वारा किसान भाइयों के लिए फसलों की रखरखाव और जानकारी के लिए कई सारे कार्यक्रम भी किए जाते हैं। इसके अलावा लॉकडाउन लगने के कारण किसानों को लीची की फसल को भारतीय बाजार मे बेचने के लिए काफी समस्याओं का सामना करना पड़ा लेकिन आने वाले सालों मे लीची का आयात बहुत ज्यादा बढ़ने वाला है। अतः हमारे द्वारा बताए गए इन सभी सुझाव समस्याओं एवं उनके निदान जो की लीची की फसल के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होते है। साथ ही साथ इसके अलावा किसान भाई समय-समय पर लीची के पौधों का उचित रखरखाव और खाद रूप का छिड़काव करते रहे।
New Emerging Disease: लीची के पेड़ के अचानक मुरझाने एवं सूखने (विल्ट) की समस्या को कैसे करें  प्रबंधित ?

New Emerging Disease: लीची के पेड़ के अचानक मुरझाने एवं सूखने (विल्ट) की समस्या को कैसे करें प्रबंधित ?

लीची (लीची चिनेंसिस) एक उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय फल का पेड़ है जो अपने रसीले और सुगंधित फलों के लिए जाना जाता है।लीची में रोग कम लगते है। लीची की सफल खेती के लिए आवश्यक है की इसमें लगनेवाले कीड़ों को प्रबंधित किया जाय। लेकिन विगत कुछ वर्षो से लीची में विल्ट रोग देखा जा रहा है जो फ्युसेरियम ऑक्सीस्पोरम/सोलानी कवक के कारण होने वाली एक संवहनी बीमारी के कारण से होता है। यह रोगज़नक़ मुख्य रूप से जड़ प्रणाली पर हमला करता है, पानी और पोषक तत्वों के परिवहन को बाधित करता है और पेड़ के सूखने, पीले होने और अंततः मृत्यु का कारण बनता है।

लीची में विल्ट रोग के लक्षण

हालांकि इस रोग से किसी भी उम्र के लीची के पेड़ प्रभावित हो सकते है लेकिन यह विल्ट रोग आमतौर पर पांच साल से कम उम्र के लीची के नए पेड़ों में कुछ ज्यादा ही देखा जा रहा है जिसमे पेड़ एक हफ्ते से भी कम समय में मुरझा जाते हैं। पहले लक्षण पत्तियों के पीले पड़ने, पत्तियों के गिरने के बाद धीरे-धीरे मुरझाने और सूखने के रूप में दिखाई देते हैं, जिससे 4-5 दिनों के भीतर पौधे की पूर्ण मृत्यु हो जाती है। यह फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम/सोलानी कवक के कारण होता है। इस पर और अधिक अनुसंधान की आवश्यकता है। अभी भी इस रोग पर बहुत कम साहित्य उपलब्ध है। लीची में विल्ट के लक्षण आम में विल्ट रोग के समान ही होते है। लीची का विल्ट रोग (मुरझाना) मृदाजनित कवक फुसैरियम ऑक्सीस्पोरम/सोलानी के कारण होता है, जो दुनिया भर में लीची के बागों के लिए एक भयानक खतरा है। लीची की खेती को बनाए रखने के लिए बीमारी, उसके जीवन चक्र को समझना और व्यापक प्रबंधन रणनीतियों को जानना बहुत महत्वपूर्ण है।

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फ्यूसेरियम ऑक्सीस्पोरम की पहचान और जीवन चक्र

लीची के मुरझाने का कारक एजेंट फुसैरियम ऑक्सीस्पोरम/सोलानी, मृदाजनित कवक के एक समूह से संबंधित है जो अपनी विस्तृत मेजबान सीमा और मिट्टी में दृढ़ता के लिए जाना जाता है। रोगज़नक़ लीची के पेड़ों को जड़ों के माध्यम से संक्रमित करता है, संवहनी प्रणाली पर कब्जा कर लेता है और जल-संवाहक वाहिकाओं में रुकावट पैदा करता है। इसके परिणामस्वरूप पौधे मुरझाने लगते हैं और अंततः पेड़ की मृत्यु हो जाती है। फ्यूसेरियम ऑक्सीस्पोरम/सोलानी के जीवन चक्र में मिट्टी में प्रतिरोधी क्लैमाइडोस्पोर के रूप में जीवित रहना शामिल है। ये बीजाणु वर्षों तक बने रह सकते हैं, किसी संवेदनशील मेजबान के संक्रमित होने की प्रतीक्षा में अतिसंवेदनशील जड़ प्रणाली का सामना करने पर, कवक अंकुरित होता है और जड़ों में प्रवेश करता है, और खुद को संवहनी ऊतकों में स्थापित करता है। फिर कवक अधिक बीजाणु पैदा करता है, चक्र पूरा करता है और बीमारी को कायम रखता है।

लीची के मुरझाने में योगदान देने वाले कारक

लीची के मुरझाने के विकास और प्रसार में कई कारक योगदान करते हैं जैसे.… मिट्टी की स्थिति: फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम गर्म और नम मिट्टी की स्थिति में पनपता है। खराब जल निकासी और जलभराव वाली मिट्टी लीची के पेड़ों को संक्रमित करने के लिए कवक के लिए एक आदर्श वातावरण बनाती है। विभिन्न प्रकार की संवेदनशीलता: कुछ लीची की किस्में फ्यूसेरियम ऑक्सीस्पोरम के प्रति प्रतिरोध प्रदर्शित करती हैं, अन्य अत्यधिक संवेदनशील होती हैं। किस्म का चुनाव लीची के मुरझाने के प्रति बगीचे की संवेदनशीलता को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करता है।

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तापमान और आर्द्रता: गर्म तापमान और उच्च आर्द्रता फ्यूसेरियम ऑक्सीस्पोरम के विकास और प्रसार में सहायक होते हैं। ये जलवायु परिस्थितियाँ रोगज़नक़ों को लीची के पेड़ों को संक्रमित करने के लिए अनुकूलतम स्थितियाँ प्रदान करती हैं।

लीची विल्ट रोग को कैसे करें प्रबंधित?

लीची के मुरझाने के प्रबंधन के लिए एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है जो निवारक उपायों, कल्चरल (कृषि)उपाय, रासायनिक उपचार, जैविक नियंत्रण, स्वच्छता और प्रतिरोधी किस्मों पर चल रहे शोध को जोड़ती है। आइए इनमें से प्रत्येक घटक पर गहराई से विचार करें:

1. निवारक उपाय

साइट का चयन: लीची के मुरझाने के जोखिम को कम करने के लिए अच्छी जल निकासी वाली जगहों का चयन करना महत्वपूर्ण है। जलजमाव वाले क्षेत्रों से बचने से फ्यूसेरियम ऑक्सीस्पोरम के लिए कम अनुकूल वातावरण बनाने में मदद मिलती है। प्रतिरोधी किस्मों का चयन: रोगज़नक़ के प्रति अंतर्निहित प्रतिरोध वाली लीची किस्मों का रोपण एक सक्रिय रणनीति है। चल रहे शोध का उद्देश्य प्रतिरोधी किस्मों की पहचान करना और विकसित करना है जो फ्यूसेरियम ऑक्सीस्पोरम का सामना कर सकें।

2. कल्चरल (कृषि) उपाय

सिंचाई प्रबंधन: उचित सिंचाई पद्धतियाँ आवश्यक हैं। फ्यूसेरियम ऑक्सीस्पोरम के लिए प्रतिकूल परिस्थितियाँ बनाने के लिए जलभराव और सूखे के तनाव के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है। ड्रिप सिंचाई प्रणाली सीधे जड़ क्षेत्र तक पानी पहुंचाने में मदद कर सकती है, जिससे रोगज़नक़ के साथ मिट्टी का संपर्क कम हो जाता है। कटाई छंटाई और पतलापन: संक्रमित शाखाओं की नियमित कटाई छंटाई और छतरी (कैनोपी)को पतला करने से वायु परिसंचरण को बढ़ावा मिलता है, जिससे पेड़ के चारों ओर नमी कम हो जाती है। यह, बदले में, फंगल बीजाणु के अंकुरण और संक्रमण की संभावना को कम करता है।

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पेड़ों के बीच दूरी: लीची के पेड़ों के बीच पर्याप्त दूरी होना बहुत जरूरी है। बढ़ी हुई दूरी बेहतर वायु परिसंचरण की सुविधा प्रदान करती है, आर्द्रता को कम करती है और फ्यूसेरियम ऑक्सीस्पोरम के प्रसार को सीमित करती है।

3. रासायनिक उपचार

कवकनाशी अनुप्रयोग: लीची के मुरझाने के प्रबंधन में कवकनाशी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। थियोफैनेट-मिथाइल और प्रोपिकोनाज़ोल जैसे सक्रिय तत्वों वाले कवकनाशी ने फ्यूसेरियम ऑक्सीस्पोरम/सोलानी के खिलाफ प्रभावकारिता का प्रदर्शन किया है। रोग के विकास के शुरुआती चरणों के दौरान निवारक उपचार लागू करने के साथ,प्रयोग का समय महत्वपूर्ण है। मिट्टी (सक्रिय रूट ज़ोन) को हेक्साकोनाज़ोल या प्रॉपिकोनाजोल @ 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के घोल से या कार्बेंडाजिम या रोको एम नामक फफूंद नाशक की 2 ग्राम मात्रा को प्रति लीटर पानी में घोलकर पेड़ के आसपास की मिट्टी को खूब अच्छी तरह से भिगाए। दस दिन के बाद इसी घोल से पेड़ के आस पास की मिट्टी को खूब अच्छी तरह दुबारा से भिगाए। एकीकृत रोग प्रबंधन (आईडीएम): अन्य रोग प्रबंधन प्रथाओं के साथ कवकनाशी को एकीकृत करने से प्रतिरोध विकसित होने का जोखिम कम हो जाता है। आईडीएम दृष्टिकोण पारिस्थितिक संदर्भ पर विचार करता है और स्थायी, दीर्घकालिक रोग नियंत्रण का लक्ष्य रखता है।

4. जैविक नियंत्रण

लाभकारी सूक्ष्मजीव: ट्राइकोडर्मा की विभिन्न प्रजातियां जैसे कुछ लाभकारी सूक्ष्मजीवों ने फ्यूसेरियम ऑक्सीस्पोरम/सोलानी को दबाने में आशाजनक प्रदर्शन किया है। इन बायोकंट्रोल एजेंटों को मिट्टी में प्रयोग किया जाता है या पर्ण स्प्रे के रूप में उपयोग किया जा सकता है, जो रोग प्रबंधन का प्राकृतिक और पर्यावरण के अनुकूल साधन प्रदान करता है। लीची में पेड़ की उम्र के अनुसार उर्वरक की अनुशंसित खुराक के साथ नीम की खली या अरंडी की खली @ 5-8 किग्रा/वृक्ष लगाएं या बर्मी कंपोस्ट खाद 20से 25 किग्रा प्रति पेड़ देना चाहिए। ट्राइकोडर्मा हर्जियानम,ट्राइकोडर्मा विरिडी , स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस आदि जैसे जैव नियंत्रण एजेंटों का प्रयोग रोग के प्रबंधन में प्रभावी साबित हुआ है। ट्राइकोडर्मा का कमर्शियल फॉर्मुलेशन का 100-200 ग्राम को खूब सड़ी गोबर या कंपोस्ट खाद की 20 किग्रा में मिला कर , सक्रिय रूट ज़ोन में प्रति वयस्क पेड़ मिलाकर मिट्टी की सतह पर लगभग 30-40 सेंटीमीटर चौड़ी एक गोलाकार पट्टी में एक ऐसे स्थान पर फैला दें जो पेड़ की छतरी की बाहरी सीमा से लगभग दो फीट अंदर हो। पानी का छिड़काव कर मिट्टी में पर्याप्त नमी सुनिश्चित करें या हल्की सिंचाई करें। माइक्रोबियल कंसोर्टिया: माइक्रोबियल कंसोर्टिया विकसित करने के लिए अनुसंधान जारी है जो कई लाभकारी सूक्ष्मजीवों के सहक्रियात्मक प्रभावों का उपयोग करता है। ये कंसोर्टिया पर्यावरणीय प्रभाव को कम करते हुए उन्नत रोग दमन की पेशकश करते हैं।

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5. स्वच्छता

मलबा हटाना: इनोकुलम के संभावित स्रोतों को खत्म करने के लिए संक्रमित पौधे के मलबे को तुरंत हटाना और नष्ट करना महत्वपूर्ण है। बगीचे में फ्यूसेरियम ऑक्सीस्पोरम के बने रहने को रोकने के लिए गिरी हुई पत्तियों, कटी हुई शाखाओं और अन्य पौधों की सामग्री का उचित तरीके से निपटान किया जाना चाहिए। उपकरण कीटाणुशोधन: छंटाई उपकरणों और उपकरणों की नियमित कीटाणुशोधन पेड़ों के बीच कवक के अनजाने प्रसार को रोकने में मदद करती है। बगीचे के रख-रखाव के दौरान रोग संचरण के जोखिम को कम करने के लिए स्वच्छता आवश्यक हैं।

6. प्रतिरोधी किस्मों पर शोध

प्रजनन कार्यक्रम: प्रजनन कार्यक्रमों में निरंतर प्रयासों का उद्देश्य फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम के लिए अंतर्निहित प्रतिरोध वाली लीची की किस्मों को विकसित करना है। प्रतिरोधी किस्मों की पहचान करना और उन्हें बढ़ावा देना लीची के मुरझाने का स्थायी दीर्घकालिक समाधान है। जेनेटिक इंजीनियरिंग: जेनेटिक इंजीनियरिंग में प्रगति से प्रतिरोधी किस्मों के विकास में तेजी आ सकती है। फुसैरियम ऑक्सीस्पोरम को प्रतिरोध प्रदान करने वाले जीन पेश करके, शोधकर्ताओं का लक्ष्य लीची की रोगज़नक़ को झेलने की क्षमता को बढ़ाना है।

7. परिशुद्ध कृषि प्रौद्योगिकी

रिमोट सेंसिंग: रिमोट सेंसिंग सहित सटीक कृषि प्रौद्योगिकियां, उत्पादकों को दूर से बगीचे के स्वास्थ्य की निगरानी करने में सक्षम बनाती हैं। सेंसर से लैस ड्रोन बीमारी के शुरुआती लक्षणों का पता लगा सकते हैं, जिससे लक्षित हस्तक्षेप और समय पर रोग प्रबंधन की अनुमति मिलती है।

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डेटा एनालिटिक्स: सटीक कृषि प्रौद्योगिकियों के माध्यम से एकत्र किए गए डेटा का विश्लेषण रोग की गतिशीलता में मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। यह जानकारी उत्पादकों को प्रबंधन प्रथाओं को अनुकूलित करने और समग्र बगीचे के स्वास्थ्य में सुधार करने में मार्गदर्शन करती है।

सारांश

लीची विल्ट (मुरझान) प्रबंधन के लिए बहुआयामी और एकीकृत दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। निवारक उपायों और कल्चरल उपाय से लेकर रासायनिक उपचार, जैविक नियंत्रण, स्वच्छता और प्रतिरोधी किस्मों पर चल रहे शोध तक, प्रत्येक घटक फ्यूसेरियम ऑक्सीस्पोरम के प्रभाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल और अनुसंधान और तकनीकी प्रगति के माध्यम से लगातार परिष्कृत एक समग्र रणनीति, लीची के बागानों को बनाए रखने और लीची मुरझाने की चुनौतियों का सामना करने वाले उत्पादकों की आजीविका सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।

लीची की वैरायटी (Litchi varieties information in Hindi)

लीची की वैरायटी (Litchi varieties information in Hindi)

दोस्तों आज हम बात करेंगे लीची के विषय में लीची की वैरायटी कितने प्रकार की होती है।लीची से हमें कितने प्रकार के लाभ हो सकते हैं और लीची के महत्वपूर्ण विषय के बारे में जिससे हमें लीची से संबंधित सभी प्रकार की जानकारियां प्राप्त हो जाए।लीची से जुड़ी आवश्यक जानकारियों को प्राप्त करने के लिए हमारी पोस्ट के अंत तक जरूर बने रहे।

लीची

लीची एक ऐसा फल है जो स्वाद में सबसे अलग है लीची की बढ़ती मांग दुनियाभर में प्रचलित है। लीची ना सिर्फ स्वादिष्ट बल्कि या विटामिन से भी भरी हुई होती है। यदि आपको अब तक इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि लीची को पैदावार करने वाला देश चीन है। लेकिन ऐसा नहीं है कि लीची सिर्फ चीन में ही पैदा होती है भारत भी इस की पैदावार की श्रेणी में आता है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार लीची करीबन एक लाख टन से भी ज्यादा उत्पादन भारत देश में होता है। इसकी अच्छी क्वालिटी की मांग स्थानीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी बड़े पैमाने में बढ़ चढ़कर इसकी मांगे होती है।फल के रूप में लीची का सेवन वैसे तो किया जाता है, लेकिन विभिन्न प्रकार के जूस या तरल पदार्थ में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। जैसे लीची का शरबत बनाना, जैम आदि का उपयोग करना, नेक्टर, कार्बोनेटेड और भी कई पिए जाने वाले पदार्थों में लीची का उपयोग किया जाता है।

भारत देश में लीची कहां पाई जाती है

भारत देश में विभिन्न ऐसे राज्य और क्षेत्र है, जहां पर लीची का उत्पादन काफी मात्रा में होता है। उनमें से एक बिहार क्षेत्र है जहां पर लीची का उत्पादन होता है। मुजफ्फरपुर तथा दरभंगा  जिलो में लीची की काफी भारी मात्रा में पैदावार होती है, तथा बिहार के क्षेत्र पश्चिमबंगाल ,असम और भारत के उत्तराखंड तथा पंजाब लीची की पैदावार करने वाले क्षेत्र है।

लीची की खेती के लिए कैसे जलवायु उपयुक्त हैं

लीची के लिए उपयुक्त जलवायु जनवरी और फरवरी के महीने में आसमान खुला - खुला साफ रहता है,तो इस बीच काफी शुष्क हवाएं चलती है। जिससे लीची में बेहतर मंजरी यानी( नया कल्ला) बनती है।लीची उत्पादन के लिए सबसे अच्छी जलवायु समशीतोष्ण की होती है। जलवायु के इस प्रभाव से लीची के फल काफी अच्छे आते हैं। लीची मार्च और अप्रैल के महीने में काफी अच्छी तरह से विकसित होती है, क्योंकि कम गर्मी पड़ने से इसकी गुणवत्ता अच्छी होती है तथा लीची के गूदे का अच्छा विकास होता है। लीची के फूल जनवरी-फरवरी में खिलते हैं तथा मई-जून में यह पूरी तरह से विकसित होकर तैयार हो जाती हैं। लीची के लिए उपयुक्त जलवायु (Litchi) विशिष्ट जलवायु लीची की खेती के लिए बहुत ही उपयोगी होती है। लीची की खेती करने वाले मुख्य देश है: जैसे देहरादून की घाटी, उत्तर प्रदेश का तराई क्षेत्र, उत्तरी बिहार, झारखंड प्रदेश,आदि इन क्षेत्रों में लीची की पैदावार काफी आसानी के साथ भारी मात्रा में लीची का उत्पादन होता है।

लीची की खेती के लिए मिट्टी का चुनाव

लीची की खेती के लिए किसान जिस मिट्टी का चुनाव किसान करते हैं ,जिससे लीची की फसल काफी अच्छी हो वह मिट्टी अम्लीय एवं लेटराइट होती है। गहरी बलुई दोमट मिट्टी जिसकी क्षमता जल धारण करने के लिए अधिक हो वह लीची की खेती के लिए बहुत ही उपयोगी साबित होती है। परंतु ध्यान रखने योग्य बातें जलभराव वाले क्षेत्र लीची उत्पादन के लिए बिल्कुल भी सही नहीं होते हैं। लीची की खेती जल निकास युक्त जमीन में करना बहुत लाभदायक होता है। ये भी देखें: लीची : लीची के पालन के लिए अभी से करे देखभाल

लीची की वैरायटी

यदि हम बात करें लीची की वैरायटी की, तो भारत में काफी कम मात्रा में लीची की ( वैरायटी /किस्म) पाई जाती हैं।इसका मुख्य कारण यह हो सकता है,कि किसान इस की खेती या बुआई करने में काफ़ी देरी कर देते हैं। इन्हीं कारणों की वजह से यह काफी कम मात्रा में पाई जाती है।कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार कुछ वर्षों में किसानों ने अपनी जी तोड़ मेहनत के बल पर कई अनेक प्रकार की लीची की किस्मों की खेती की है।किसानों ने लीची की पैदावार को बढ़ाने के लिए इनकी अनेक प्रकार की किस्मों की काफी सहायता भी ली है। लीची की प्रमुख किस्म (variety of litchi)

लीची की कुछ प्रमुख किस्म इस प्रकार है

किसानों द्वारा दी गई जानकारियों के अनुसार  इनकी कुछ किस्मों का हमें ज्ञात हुआ है जो निम्न प्रकार है;
  1. कलकतिया लीची

 दोस्तों जानते हैं कलकतिया लीची कि जो खाने में ही बहुत ही ज्यादा स्वादिष्ट होती है और इनकी जो बीज होती है वह आकार में काफी बड़ी होती है। या कलकतिया लीची की बहुत ही अच्छी किस्म है। कलकतिया लीची के फल जुलाई के महीने में आते हैं। कलकतिया लीची की किस्म पूरी तरह से पकने में काफी लंबा टाइम लेते हैं। कलकतिया लीची लगभग 23 ग्राम की होती है बात करें इन के छिलकों की तो यह दिखने में हल्की मोती रंग के नज़र आते हैं।

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लोग इस कलकतिया लीची की किस्म को बड़े ही चाव के साथ खाना पसंद करते हैं।
  1. लीची की देहरादून किस्म

 देहरादून के फल लोगों में बहुत ही ज्यादा लोकप्रिय होते हैं, देहरादून के फल लोग बहुत ही ज़्यादा पसंद करते हैं। लीची की या किस्म बहुत ही जल्दी समय में फल देती है। लीची कि यह किस्म जून के महीने में तोड़ने के लायक हो जाती है।इसके फल काफी तेजी से पकना शुरू कर देते हैं। लीची की यह किस्म की रंगत दिखने में लोगों को अपनी ओर बहुत ही आकर्षित करती हैं। इनमें दरारे जल्दी आ जाती है और छिलके फटने लगते है। लीची की देहरादून  किस्म बहुत पौष्टिक होती है।
  1. लीची की रोज सेंटेड किस्म

लीची की या किस्म खाने में मीठी होती है, दिखने में या एक गुलाब के तरह होती है।यह लीची की किस्म जून के महीने में पूरी तरह से पक जाती हैं।जब यह लीची पक जाती है तो दिखने में एकदम हृदय के आकार की प्रतीत होती है। बात करें, इसके भार की तो लगभग 18 ग्राम की होता है। इनके छिलके बैगनी रंग के साथ बहुत ही पतला भी होते है। लीची की रोज सेंटेड किस्म बहुत भी पौष्टिक होती हैं।
  1. लीची की अर्ली लार्ज रेड किस्म

 लीची की अर्ली लार्ज रेड किस्म का बीज  आकार बड़ा होता है। लीची की इस किस्म की खेती जून के महीने में होती है। इस लीची का भार 20 से 50 ग्राम का होता है। इस लीची के छिलके काफी हल्के होते हैं या दिखने में लाल रंग के होते हैं। इसमें मौजूद शर्करा 10 प्रतिशत पाया जाता है। तथा लीची की इस किस्म में लगभग 43% अम्लता मौजूद होता है।

लीची की किस्मों से जुड़ी कुछ आवश्यक बातें

लीची की किस्मों से जुड़ी कुछ आवश्यक बातें शाही लीची तथा बेदाना और चाइना लीची कि किस्म बहुत ही उपयोगी मानी जाती है।शाही लीची की खेती बेदाना की तुलना में काफी मात्रा में की जाती है।क्योंकि शाही लीची पूर्ण रुप से गुणवत्ता से भरी हुई होती है और इस में कई तरह के पौष्टिक तत्व भी मौजूद होते हैं। दोस्तों हम उम्मीद करते हैं कि आपको हमारा लीची की वैरायटी का आर्टिकल काफी पसंद आया होगा।हमने अपने इस आर्टिकल में लीची  की वैरायटी तथा लीची से जुड़ी सभी प्रकार की जानकारियों की पूरी डिटेल हमारे इस आर्टिकल में मौजूद है। यदि आप हमारी दी गई जानकारी से संतुष्ट है तो हमारे इस आर्टिकल को ज्यादा से ज्यादा अपने दोस्तों के साथ सोशल मीडिया पर शेयर करें। धन्यवाद।
इस माह नींबू, लीची, पपीता का ऐसे रखें ध्यान

इस माह नींबू, लीची, पपीता का ऐसे रखें ध्यान

नींबू (Lemon) की नीली फफूंद से सुरक्षा

लीची (Lychee) खाने वाली इल्ली से रक्षा

पपीता (Papaya) पौधे को गलने से बचाएं

फलदार पौधों की बागवानी तैयार करने के लिए अगस्त का महीना अनुकूल माना जाता है। नींबू, बेर, केला, जामुन, पपीता, आम, अमरूद, कटहल, लीची, आँवला का नया बाग-बगीचा तैयार करने का काम किसान को इस महीने पूरा कर लेना चाहिए। भाकृअनुप- 
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR -Indian Council of Agricultural Research), पूसा, नई दिल्ली के कृषि एवं बागवानी विशेषज्ञों ने इनकी खेती के लिए महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। इस लेख में हम नींबू (Lemon), लीची (Lychee), पपीता (Papaya) की बागवानी से जुड़े खास बिंदुओं पर अपना ध्यान केंद्रित करेंगे।

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नींबू (Lemon) की देखभाल

नींबू के पौधे खेत, बागान या घर की बगिया में रोपने के लिए अगस्त का महीना काफी अच्छा होता है। कृषक मित्र उपलब्ध मिट्टी की गुणवत्ता के हिसाब से नींबू की किस्मों का चयन कर सकते हैं। कृषि विज्ञान केंद्र, उद्यानिकी विभाग से संबद्ध नर्सरी के अलावा ऑन लाइन प्लेटफॉर्म से किसान, उपलब्ध लागत के हिसाब से पौधों की किस्मों का चयन कर सकते हैं। इन केंद्रों पर 20 रुपये से लेकर 100, 200 एवं 500 रुपया प्रति पौधा की दर से पौधे खरीदे जा सकते हैं। उल्लेखनीय है कि पौधे की कीमत उसकी किस्म के हिसाब से घटती-बढ़ती है।

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अगस्त का महीना नींबू और लीची के पेड़-पौधों में गूटी बांधने के लिहाज से काफी उपयुक्त माना जाता है।

ऐसे करें लेमन सिट्रस कैंकर का उपचार

नींबू के सिट्रस कैंकर (Citrus canker) रोग का समय रहते उपचार जरूरी है। यह उपाय ज्यादा कठिन भी नहीं है। नींबू में सिट्रस कैंकर रोग के लक्षण पहले पत्तियों में दिखने शुरू होते हैं। बाद में यह नींबू के पौधे-पेड़ की टहनियों, कांटों और फलों पर पर भी फैल जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए जमीन पर गिरी हुई पौधे की पत्तियों को इकट्ठा कर नष्ट कर देना चाहिए। इसके अलावा नींबू की रोगयुक्त टहनियों की काट-छांट भी जरूरी है। बोर्डाे (Bordo) मिश्रण (5:5:50), ब्लाइटाॅक्स (Blitox) 0.3 फीसदी (3 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में घोलकर) का छिड़काव भी सिट्रस कैंकर रोग से नींबू के पेड़ के बचाव में कारगर साबित होता है।

रसजीवी कीट से रक्षा

नींबू के पौधे का रस चूसने वाले कीट से भी समय रहते बचाव जरूरी है। नींबू के पौधे का रस चूसने वाले कीट से बचाव करने के लिए मेलाथियान (Malathion) का स्प्रे मददगार होता है। मेलाथियान को 2 मिलीलीटर पानी में घोलकर पौधे पर छिड़काव करने से नींबू की रक्षा करने में गार्डनर को मदद मिल सकती है।
लग सकता है नीला फफूंद रोग
अगस्त महीने के दौरान नींबू के पौधों पर नीला फफूंद रोग लगने की आशंका रहती है। लेमन ट्री या प्लांट की नीले फफूंद रोग से रक्षा के लिए आँवला वाला तरीका अपनाया जा सकता है। इसके लिए नींबू के फलों को बोरेक्स या नमक से उपचारित कर नीला फफूंद रोग से रक्षा की जा सकती है। नींबू के फलों को कार्बेन्डाजिम या थायोफनेट मिथाइल की महज 0.1 प्रतिशत मात्रा से उपचारित करके भी नीला फफूंद रोग को फैलने से रोका जा सकता है।

लीची (Lychee or Litchi) की रक्षा

रस से भरी, चटख लाल, कत्थई रंग की लीची देखकर किसके मुंह में पानी न आ जाए। बार्क इटिंग कैटरपिलर (Bark Eating Caterpillar) भी अपनी यही चाहत पूरी करने लीची पर हमला करती है।

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आपको बता दें बार्क इटिंग कैटरपिलर लीची का छिलका खाने की शौकीन होती है। लीची का छिलका खाने वाले पिल्लू (बार्क इटिंग कैटरपिलर) की रोकथाम भी संभव है। इसके लिए लीची के जीवित छिद्रों में पेट्रोल या नुवाॅन या फार्मलीन से भीगी रुई ठूंसकर छिद्र मुख को चिकनी मिट्टी से अच्छी तरह से बंद कर देना चाहिए। बगीचे को स्वच्छ एवं साफ-सुथरा रखकर भी इन कीटों से लीची का बचाव किया जा सकता है।

पपीता (Papaya) का रखरखाव

पपीता का पनामा विल्ट (Panama wilt) एवं कॉलर रॉट (Collar Rot) जैसे प्रकोप से बचाव किया जाना जरूरी है। पपीते के पेड़ में फूल आने के समय 2 मिली. सूक्ष्म तत्वों को एक लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने की सलाह वैज्ञानिकों ने दी है।

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पनामा विल्ट की रोकथाम

पनामा विल्ट के पपीता पर कुप्रभाव को रोकने के लिए बाविस्टीन(BAVISTIN) का उपयोग करने की सलाह दी गई है। बाविस्टीन के 1.5 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी मिश्रित घोल से पनामा विल्ट से रक्षा होती है। बताए गए घोल का पपीते के पौधों के चारों ओर मिट्टी पर 20 दिनों के अंतराल से दो बार छिड़काव करने की सलाह उद्यानिकी सलाहकारों ने दी है।

काॅलर राॅट की रोकथाम

काॅलर राॅट भी पपीता के पौधों के लिए एक खतरा है। पपाया प्लांट पर काॅलर राॅट के प्रकोप से पपीता के पौधे, जमीन की सतह से ठीक ऊपर गल कर गिर जाते हैं। इस समस्या के समाधान के लिए पौधों पर रिडोमिल (RIDOMIL)(2 ग्राम/लीटर) दवा का छिड़काव करना फायदेमंद होगा। नींबू, लीची और पपीता के खेत में जलभराव से फल पैदावार प्रभावित हो सकती है। इन खेतों पर जल भराव न हो इसलिए कृषकों को जल निकासी के पर्याप्त इंतजाम नींबू, लीची, पपीता के खेतों पर करने चाहिए।
असम के चावल की विदेशों में भारी मांग, 84 प्रतिशत बढ़ी डिमांड

असम के चावल की विदेशों में भारी मांग, 84 प्रतिशत बढ़ी डिमांड

भले ही भारत के पूर्वोत्तर राज्य विकास की मुख्यधारा में अन्य राज्यों की तरह न जुड़ पाए हों, लेकिन इन राज्यों ने अब वो कर दिखाया है जो खेती-किसानी के क्षेत्र में क्रांतिकारी कदम है। दरअसल, अब असम राज्य की मुख्य फसल विदेशों में नाम कमाने लगी है जो राज्य के निवासियों के लिए कमाल की खबर है। गौर करने वाली बात है कि उत्तर भारतीय राज्यों के इतर असम में किसान मुख्यतौर पर गेहूं की बजाय धान उगाते हैं।


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यहां के चावल की खूशबू और स्वाद कमाल का होता है जिसके चलते देशभर में, यहां से आए चावलों को लोग बड़े चाव से खाते हैं और खपत भी काफी है। चूंकि, लोगों के बीच असम से आने वाले चावल खासे पसंद किए जाते हैं, यही वजह है कि पिछले सालों के दौरान यहां कि कुछ किस्मों को जीआई टैग दिया गया था। अब हाल ही में असम के चावल की कुछ किस्में दुबई भेजी गईं। इन चावलों को APEDA के सहयोग से भेजा गया। दुबई भेजी जाने वाली किस्मों का नाम जोहा और एजुंग (Izong rice) हैं। गौर करने वाली बात है कि असम का जोहा चावल (Joha Rice) बासमती से कम नहीं है। इसकी विशेषता के कारण ही इसे जीआई टैग दिया गया है। वैसे इसकी सुगंध बासमती जैसी नहीं है बल्कि थोड़ी अलग है। लेकिन जोहा अपने स्वाद, खुशबू और खास तरह के आनाज को लेकर जाना जाता है। इसकी विदेशों में मांग बासमती से कम नहीं है। यह खबर असम के किसानों को उत्साहित करने वाली है।


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APEDA के अध्यक्ष एम अंगमुथु ने कहा है कि जिस तरह का मौसम असम का रहता है, उसे देखते हुए यहां सभी तरह की बागवानी फसलें उगाई जा सकती हैं। साथ ही यहां से निर्यात भी आसानी से किया जा सकता है क्योंकि बगल से भूटान, बांग्लादेश, म्यांमार और चीन जैसे देश हैं जो राज्य से अपनी सीमा साझा करते हैं। वैसे चावल ही असम की एकमात्र फसल नहीं है जिसकी विदेशों में मांग है। बल्कि यहां के नींबुओं की मांग मिडिल ईस्ट और ब्रिटेन में बहुत है। यही वजह है कि यहां से अब तक 50 मीट्रिक टन नींबू का एक्सपोर्ट पहले ही किया जा चुका है। यही नहीं, यहां के कद्दू और लीची भी बाहर भेजे जा रहे हैं और लोग इनके स्वाद को खासा पसंद भी कर रहे हैं। पूर्वोत्तर राज्यों ने पिछले छह सालों में खेती में अपना नया मुकाम स्थापित किया है, जो इन राज्यों की सफलता की कहानी कहता है। एक आंकड़े के मुताबिक, पिछले छह सालों में यहां उगने वाले कृषि उत्पादों के निर्यात में करीब 84 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखने को मिली है। जाहिर है कि आने वाले सालों में इन राज्यों का कृषि में योगदान और बढ़ेगा और जिसका असर देश की जीडीपी में होगा, जो सुखद बात है।
खुशखबरी: बिहार के मुजफ्फरपुर के अलावा 37 जिलों में भी हो पाएगा अब लीची का उत्पादन

खुशखबरी: बिहार के मुजफ्फरपुर के अलावा 37 जिलों में भी हो पाएगा अब लीची का उत्पादन

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि बिहार राज्य के अंदर सबसे ज्यादा मुजफ्फरपुर जनपद में लीची (Lychee; Litchi chinensis) का उत्पादन किया जाता है। मुजफ्फरपुर जनपद में 12 हजार हेक्टेयर भूमि में लीची का उत्पादन किया जा रहा है। बिहार के कृषकों के लिए एक अच्छी बात है, कि वर्तमान में बिहार के मुजफ्फरपुर के साथ बाकी जनपदों में भी कृषक लीची का उत्पादन कर सकते हैं। बिहार में करीब 5005441 हैक्टेयर जमीन लीची उत्पादन हेतु अनुकूल है। ऐसी स्थिति में यदि मुजफ्फरपुर के अतिरिक्त अन्य जनपद के कृषक भी लीची का उत्पादन करना चालू करते हैं। तब यह लीची का उत्पादन उनके लिए एक अच्छे आय के स्त्रोत की भूमिका अदा करेगा।

मुजफ्फरपुर के अलावा और भी जगह लीची का उत्पादन किया जाता है

आज तक की रिपोर्ट के अनुसार, मुजफ्फरपुर भारत भर में शाही लीची के उत्पादन के मामले में मशहूर है। साथ ही, लोगों का मानना है, कि केवल मुजफ्फरपुर की मृदा ही लीची की खेती के लिए बेहतर होती है। हालाँकि,अब ये सब बातें काफी पुरानी हो चुकी हैं। एक सर्वेक्षण के चलते यह सामने आया है, कि बिहार के 37 जनपदों के अंदर लीची का उत्पादन किया जा सकता है। इसका यह मतलब है, कि इन 37 जनपदों में लीची के उत्पादन हेतु जलवायु एवं मृदा दोनों ही अनुकूल हैं। सर्वे के अनुसार, इन 37 जनपदों के अंतर्गत 5005441 हेक्टेयर का रकबा लीची उत्पादन हेतु अनुकूल है। साथ ही, 2980047 हेक्टेयर भूमि बाकी फसलों हेतु लाभकारी है। ये भी पढ़े: अब सरकार बागवानी फसलों के लिए देगी 50% तक की सब्सिडी, जानिए संपूर्ण ब्यौरा

केवल बिहार राज्य में देश का 65 प्रतिशत लीची उत्पादन होता है

जानकारी के लिए बतादें, कि बिहार में लीची का सर्वाधिक उत्पादन किया जाता है। बिहार में किसान भारत में समकुल लीची की पैदावार का 65 फीसद उत्पादन करते हैं। परंतु, बिहार राज्य में भी सर्वाधिक मुजफ्फरपुर में शाही लीची का उत्पादन होता है। जानकारी के लिए बतादें कि 12 हजार हेक्टेयर के रकबे में लीची का उत्पादन किया जा रहा है। परंतु, राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र, मुजफ्फरपुर की तरफ से किए गए सर्वेक्षण के उपरांत बिहार राज्य में लीची के क्षेत्रफल में बढ़ोत्तरी देखी जाएगी। राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, राज्य में 1,53,418 हेक्टेयर रकबा लीची के उत्पादन हेतु सर्वाधिक अनुकूल है।

ये मुजफ्फरपुर से भी अधिक लीची उत्पादक जनपद हैं

सर्वेक्षण के मुताबिक, पश्चिम चंपारण, मधुबनी, कटिहार, अररिया, बांका, औरंगाबाद, जमुई, पूर्णिया, पूर्वी चंपारण, मधेपुरा और सीतामढ़ी में मुजफ्फरपुर से भी ज्यादा लीची का उत्पादन हो सकता है। इन जनपदों की मृदा और जलवायु मुजफ्फरपुर से भी ज्यादा लीची उत्पादन हेतु अनुकूल है। अगर इन समस्त जनपदों में लीची का उत्पादन चालू किया जाए तो भारत में भी चीन से ज्यादा लीची की पैदावार होने लगेगी। साथ ही, राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. विकास दास के मुताबिक, तो किसान अधिकांश पारंंपरिक धान- गेहूं की भांति फसलों का उत्पादन करते हैं। इसकी वजह से प्रति हेक्टेयर में 50 हजार रुपये की आय होती है। हालांकि, लीची की खेती में परिश्रम के साथ- साथ लागत की भी ज्यादा जरूरत होती है। वहीं यदि किसान धान-गेहूं के स्थान पर लीची का उत्पादन करते हैं, तो उनको कम खर्चा में काफी अधिक लाभ मिलेगा। साथ ही, उत्पादकों को खर्चा भी काफी कम करना होगा।
लीची की इस किस्म से बंपर पैदावार और आमदनी हो सकती है

लीची की इस किस्म से बंपर पैदावार और आमदनी हो सकती है

बिहार राज्य में सर्वाधिक लीची का उत्पादन किया जाता है। यहां वर्ष 2021-22 में 308.1 मीट्रिक टन लीची की पैदावार हुई थी। बिहार राज्य के लीची उत्पादक किसान भाइयों के लिए एक बड़ी खबर है। राज्य सरकार लीची की नवीन किस्म का उत्पादन करने वाले किसानों को प्रोत्साहित कर रही है। विशेष बात यह है, कि सरकार द्वारा राज्य में लीची की पैदावार में वृद्धि करने हेतु यह कदम उठाया गया है। दरअसल, राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र द्वारा एक ऐसी किस्म तैयार की है, जिसका उत्पादन करने पर लीची का उत्पादन काफी बढ़ जाएगा। इससे प्रदेश में लीची की पैदावार को बढ़ावा मिलेगा। मीड़िया खबरों के मुताबिक, बिहार राज्य में अकेले 43 फीसदी लीची का उत्पादन किया जाता है। मुजफ्फरपुर की शाही लीची तो अपने स्वाद की वजह से पूरे विश्व में मशहूर है। यही कारण है, कि बिहार सरकार विशेषकर लीची की प्रजाति गंडकी योगिता, गंडकी लालिमा एवं गंडकी संपदा की खेती करने के लिए किसानों को बढ़ावा दिया जा रहा है। वहीं, बिहार के कृषि मंत्री कुमार सर्वजीत ने बताया है, कि राज्य सरकार और एनआरसीएल (मुजफ्फरपुर) लीची उत्पादन, गुणवत्ता एवं भंडारण में सुधार करने हेतु एकजुट होकर कार्य कर रही है। यह भी पढ़ें: खुशखबरी: बिहार के मुजफ्फरपुर के अलावा 37 जिलों में भी हो पाएगा अब लीची का उत्पादन मुजफ्फरपुर की प्रसिद्ध शाही लीची को जीआई टैग प्राप्त हो चुका है। यह अपनी अनोखी सुगंध की वजह से जानी जाती है। इसके अंदर ज्यादा रस एवं सामान्य से छोटी गुठली विघमान रहती है।

18 से 23 फीसद फसल क्षतिग्रस्त हो चुकी है

बतादें, कि लीची एक नॉन-क्लिमैक्ट्रिक फल है। नॉन-क्लिमैक्ट्रिक फलों की विशेषता यह है, कि यह सिर्फ पेड़ पर लगे रहने के दौरान ही पकते हैं। अगर पेड़ से उसको तोड़ लिया जाए, तो इसका पकना समाप्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में पके हुए लीची के फलों को ही पेड़ों से तोड़ा जाता है। साथ ही, ऐसे में इसके जल्दी खराब होने की संभावना रहती है। इसलिए इसको दीर्घ काल तक भंडारित नहीं किया जा सकता है। साथ ही, इसकी कटाई के उपरांत 18 से 23 फीसद तक फसलों को हानि पहुँचती है। यही कारण है, कि सरकार किसानों से लीची की नई किस्म का उत्पादन करने की अपील कर रही है।

2021-22 में लीची की पैदावार 308.1 मीट्रिक हुई थी

अधिकारियों के मुताबिक, गंडकी संपदा लीची काफी समय में पकती है। यह जून माह के बीच तक पक कर तैयार हो जाती है। गंडकी सम्पदा लीची का वजन 35-42 ग्राम तक होता है। इसका गूदा मलाईदार-सफेद, मुलायम एवं रसदार होता है। इसकी सुगंध भी काफी अच्छी होती है। इसके एक पेड़ से 140 किलो तक लीची अर्जित कर सकते हैं। इसी प्रकार ‘गंडकी योगिता’ भी धीमी गति से उगती है, जो गर्मी की लहरों को झेल सकती है। बिहार में साल 2021-22 में लीची उत्पादन 308.1 मीट्रिक हुआ था। वहीं, साल 2020-21 में 308 मीट्रिक टन पैदावार हुई थी। बतादें कि शाही लीची को 2018 में जीआई टैग हांसिल होने से इसकी संपूर्ण विश्व में मांग बढ़ गई है।
विदेशों में लीची का निर्यात अब खुद करेंगे किसान, सरकार ने दी हरी झंडी

विदेशों में लीची का निर्यात अब खुद करेंगे किसान, सरकार ने दी हरी झंडी

लीची बिहार की एक प्रमुख फसल है। पूरे राज्ये में इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। बिहार के मुजफ्फरपुर को लीची उत्पादन का गढ़ माना जाता है। यहां की लीची विश्व प्रसिद्ध है, इसलिए इस लीची की देश के साथ विदेशों में भी जबरदस्त मांग रहती है। लीची को लोग फल के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। साथ ही इससे जैम बनाया जाता है और महंगी शराब का निर्माण भी किया जाता है। जिससे दिन प्रतिदिन बिहार की लीची की मांग बढ़ती जा रही है। बढ़ती हुई मांग को देखते हुए सरकार ने प्लान बनाया है कि अब किसान खुद ही अपनी लीची की फसल का विदेशों में निर्यात कर सेकेंगे। अब किसानों को अपनी फसल औने पौने दामों पर व्यापारियों को नहीं बेंचनी पड़ेगी। अगर भारत में लीची के कुल उत्पादन की बात करें तो सबसे ज्यादा लीची का उत्पादन बिहार में ही किया जाता है। यहां पर उत्पादित शाही लीची की विदेशों में जमकर डिमांड रहती है। इसलिए सरकार ने कहा है कि किसान अब इस लीची को खुद निर्यात करके अच्छा खास मुनाफा कमा सकेंगे। इसके लिए सरकार ने मुजफ्फरपुर जिले के चार प्रखंडों में 6 कोल्ड स्टोरेज और 6 पैक हाउस का निर्माण करवाया है। इसके साथ ही 6 पैक हाउस को निर्देश दिए गए हैं कि वो किसानों की यथासंभव मदद करें। इन 6 पैक हाउस में प्रतिदिन 10 टन लीची की पैकिंग की जाएगी, जिसका सीधे विदेशों में निर्यात किया जाएगा।

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बिहार लीची एसोसिएशन के अध्यक्ष बच्चा प्रसाद सिंह ने बताया है कि निर्यात का काम बिहार लीची एसोसिएशन देखेगी, तथा इस काम में किसानों की यथासंभव मदद की जाएगी। उन्होंने बताया कि पहले मुजफ्फरपुर में मात्र एक प्रोसेसिंग यूनिट की व्यवस्था थी, लेकिन अब मांग बढ़ने के कारण सरकार ने जिले में 6 प्रोसेसिंग यूनिट लगवा दी हैं। अगर भविष्य में कोल्ड स्टोरेज और पैक हाउस की मांग बढ़ती है तो उसकी व्यवस्था भी की जाएगी। जिससे किसान बेहद आसानी से अपने उत्पादों को विदेशों में निर्यात कर पाएंगे। बिहार के कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया है कि इस प्रोजेक्ट को बागवानी मिशन के तहत लॉन्च किया गया है। जिससे किसानों को अपने उत्पादों को मनचाहे बाजार में एक्सपोर्ट करने में मदद मिले। लीची की प्रोसेसिंग यूनिट लगाने पर 4 लाख रुपये का खर्च आता है, जिसमें 50 फीसदी सब्सिडी सरकार देती है। ऐसे में अगर किसान चाहें तो खुद ही लीची की प्रोसेसिंग यूनिट लगा सकते हैं और खुद के साथ अन्य किसानों की भी मदद कर सकते हैं। उत्पादन को देखते हुए आने वाले दिनों में जिलें में लीची की प्रोसेसिंग यूनिट्स में बढ़ोत्तरी होगी।

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कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया है कि वर्तमान में मुजफ्फरपुर के मानिका, सरहचियां, बड़गांव, गंज बाजार और आनंदपुर में कोल्ड स्टोरेज और पैक हाउस खोले गए हैं। जहां लीची को सुरक्षित रखा जा सकेगा। इनका उद्घाटन आगामी 19 मई को किया जाएगा। किसानों को मदद करने के लिए बिहार लीची एसोसिएशन, भारतीय निर्यात बैंक और बिहार बागवानी मिशन तैयार हैं। ये किसानों को यथासंभव मदद उपलब्ध करवाएंगे, ताकि मुजफ्फरपुर की लीची का विदेशों में बड़ी मात्रा में निर्यात हो सके।
बेमौसम बारिश का असर आम लोगों को 'मैंगो पार्टी' से दूर कर सकता है

बेमौसम बारिश का असर आम लोगों को 'मैंगो पार्टी' से दूर कर सकता है

मई का महीना चालू हो गया है। लेकिन गर्मी का कोई ज्यादा प्रभाव देखने को नहीं मिल रहा है। इसके पीछे की वजह रुक-रुक कर होती बारिश है। अब ऐसी स्थिति में लीची, तरबूज, खरबूज एवं आम जैसे गर्मियों के फलों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा। इनका इतना भाव बढ़ जाऐगा जो इन्हें आम आदमी के बजट से बाहर कर देगा। गर्मियों का असली आनंद तो तब ही आता है, जब पीले-पीले आम व लाल-लाल तरबूज आपकी थाली में मौजूद हों। साथ ही, परिवार के सभी जन एक साथ बैठकर ‘मैंगो पार्टी’ कर खूब आनंद करें। वहीं, यदि आप कभी जामा मस्जिद की तरफ चले गए तो ‘मोहब्बत का शरबत’ का लुफ्त उठाकर आऐं। परंतु, इस वर्ष क्या यह सब कुछ आम आदमी की पहुंच से परेह हो जाएगा। आजकल मई माह में हो रही बेमौसम वर्षा से तो इसी का भय सता रहा है। मई का माह शुरू होने से भी पूर्व देशभर में रुक-रुक बरसात हो रही है। भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, आगामी दिनों में भी बारिश होने की आशंका है। ऐसी स्थिति में इसका प्रभाव फल और सब्जी की फसलों पर दिखना आम बात है, जो कि आगामी दिनों में इनकी कीमतों को बढ़ा सकती है। यह भी पढ़ें : मिर्जा गालिब से लेकर बॉलीवुड के कई अभिनेता इस 200 साल पुराने दशहरी आम के पेड़ को देखने पहुँचे हैं

इन फलों पर पड़ेगा बेमौसम बारिश का प्रभाव

खरबूज, लीची, आम और तरबूज गर्मियों के ऐसे फल हैं, जिनकी जितनी सिंचाई की आवश्यकता होती है, उतनी ही गर्मी की भी। उत्तर भारत के विभिन्न इलाके विशेषकर के गंगा एवं यमुना के तटीय क्षेत्र इन फलों की खेती के लिए सर्वाधिक अच्छे माने जाते हैं। यहां पर वर्षा होने की वजह से तापमान में नरमी आती है। इसके चलते इनकी मिठास में भी कुछ कमी रह सकती है। केवल यही नहीं मई माह तक बाजार में इन फलों का आना चालू जाता है। उत्तर प्रदेश के मेरठ का रटौल, महिलाबाद का दशहरी आम तो वहीं बिहार के मुज्जफरपुर की लीचियाँ बाजार पहुँचने लगती हैं। वर्तमान में यह बाजार में थोड़ी कम मात्रा में पहुँच पा रही है। इतना ही नहीं इनका स्वाद तक लुप्त हो चुका है। तो उधर इनके भावों में आसमानी उछाल देखने को मिल रहा है। फल विक्रेताओं के बताने के अनुसार, यदि अगर इसी प्रकार से गर्मी का प्रभाव कम रहा तो अच्छी गुणवत्ता में इन फलों को बाजार तक पहुँचाने में अधिक विलंभ होगा, जो इनकी कीमतों को भी बढ़ा सकती है।

फलों के साथ सब्जियों को भी काफी हानि

बारिश का प्रभाव फलों पर होने के साथ-साथ आम लोगों की थाली में रहने वाली लौकी, भिंडी और प्याज जैसी सब्जियों पर भी देखने को मिल रहा है। महाराष्ट्र एवं कर्नाटक की भाँति प्याज के बड़े उत्पादक प्रदेशों में इस बारिश के चलते खेतों में जलभराव हो गया है। इसकी वजह से प्याज की फसल चौपट हो चुकी है। केवल इतना ही नहीं भिंडी, लौकी और टमाटर पर भी इसका अच्छा खासा प्रभाव देखने को मिला है। किसानों ने भी सरकार से सहायता करने की माँग भी की है।
गुलाबी फलों का उत्पादन कर किसान सेहत के साथ साथ कमाऐं मुनाफा

गुलाबी फलों का उत्पादन कर किसान सेहत के साथ साथ कमाऐं मुनाफा

गुलाबी रंग के फल हमारे शरीर के लिए काफी लाभकारी होते हैं। आज हम आपको कुछ ऐसे ही फलों के विषय में बताने जा रहे हैं। गुलाबी खाद्य पदार्थ, एंथोसायनिन और बीटालेंस जैसे पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। यह हमारे शरीर में एंटीऑक्सिडेंट का कार्य करते हैं, जो प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करते हैं। हम अपनी थाली में कई तरह के फलों और सब्जियों का उपयोग करते हैं। परंतु, गुलाबी रंग के खाद्य पदार्थ हमारे शरीर के लिए बेहद ही लाभकारी होता है। ऐसे में आज हम आपको गुलाबी रंग के कुछ फलों के विषय में जानकारी देने जा रहे हैं, जो हमारे शरीर की उत्तम सेहत के लिए आवश्यक होता है। प्राकृतिक रूप से गुलाबी खाद्य पदार्थों में एंथोसायनिन और बीटालेन, फ्लेवोनोइड और एंटीऑक्सिडेंट युक्त यौगिक शम्मिलित होते हैं, जो शरीर को कई प्रकार की बीमारियों से सुरक्षा करता है।

गुलाबी फलों का उत्पादन

चुकंदर

चुकंदर हमारे शरीर का रक्त परिसंचरण को बढ़ाने, रक्तचाप को सुदृढ़ रखने में सहायता करता है। कच्चे चुकंदर के रस का सेवन, सलाद एवं सब्जी के रूप में उपयोग करना चाहिए। यह हमारे शरीर के लिए जरूरी विटामिन, खनिज एवं फोलेट की मात्रा की पूर्ति करता है। इसके अलावा चुकंदर में एंटीऑक्सिडेंट पाए जाते हैं जो कैंसर-रोधी गुणों के लिए जाने जाते हैं।

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अनार

अनार का सेवन हमारी रक्त शर्करा और रक्तचाप को नियंत्रित करता है। यह हमारी पाचन संबंधी समस्याओं के लिए भी लाभदायक होता है। इसके अलावा इन फलों में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण विघमान होते हैं, जो हमें रोगों से बचाता है। अनार का जूस मूत्र संक्रमण के लिए एक निवारक का कार्य करता है।

ड्रैगन फ्रूट

यह अनोखा आकर्षक उष्णकटिबंधीय फल है, इसका सेवन हमारी मधुमेह और कैंसर जैसी बीमारियों से रक्षा करता है। आहार में ड्रैगन फ्रूट को शम्मिलित करने से यह हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को अच्छा बनाता है। साथ ही, हृदय से जुड़ी बीमारियों के लिए भी अच्छा माना जाता है।

बैंगनी पत्तागोभी

यह रंगीन पत्तेदार हरी पत्तागोभी एंटीऑक्सीडेंट का एक शक्तिशाली भंडार होती है, जो हमारे शरीर की सेलुलर क्षति के विरुद्ध एक प्रभावी सुरक्षा प्रदान करती है। इसमें विघमान विटामिन सी एवं कैरोटीन की भरपूर मात्रा के साथ-साथ पर्याप्त फाइबर भी मौजूद होता है, जो हमारे शरीर की प्रतिरक्षा करता है।

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लीची

लीची तांबा, लोहा, मैग्नीशियम और फॉस्फोरस जैसे खनिज तत्वों से भरपूर होती है। यह हमारे शरीर की हड्डियों को शक्ति प्रदान करता है। यह मोतियाबिंद, मधुमेह, तनाव एवं हृदय रोगों से भी शरीर को सुरक्षा प्रदान करते हैं।