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धान की खेती की रोपाई के बाद करें देखभाल, हो जाएंगे मालामाल

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Mahindra Kisan Mahotsav

धान की खेती की रोपाई का आखिरी सीजन चल रहा है। जो किसान भाई अपने खेतों में धान के पौधों की रोपाई कर चुके हो वह यह न मान कर चलें कि खेती का काम समाप्त हो गया है। खेती के बारे में कहा जाता है कि खेती का काम कभी समाप्त ही नहीं होता है। एक फसल कटने के बाद दूसरे फसल की तैयारी शुरू हो जाती है।

जो किसान भाई धान की फसल से अच्छी पैदावार चाहते हैं। यदि समय पर धान के पौधों की रोपाई कर ली हो तो उसके बाद की देखभाल करनी चाहिये। फसल की जितनी अधिक देखभाल करेंगे। समय पर खाद, पानी और निराई गुड़ाई करायेंगे, उतनी ही अच्छी पैदावार पायेंगे। ऐसे किसानों की धान की खेती से अन्य किसानों की अपेक्षा अधिक आमदनी हो सकती है। आइये हम जानते हैं कि रोपाई के बाद धान के खेत में किन-किन खास बातों का ख्याल रखना पड़ता है।

रोपाई के बाद रखें खरपतवार का ख्याल

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सबसे पहले तो जुलाई के माह में हर हाल में धान की रोपाई हो जानी चाहिये। जिन किसान भाइयों ने धान के पौधे की रोपाई कर ली हो तो उनहें रोपाई के दो-तीन दिनों के भीतर खरपतवार को नियंत्रित करने वाली दवा डालनी चाहिये ताकि धान की फसल में अनचाही घास अपनी पकड़ न बना सके। इसके दो सप्ताह के बाद फिर खेत का अच्छी तरह से मुआयना करना चाहिये। उस समय भी खरपतवार को देखना होगा। यदि खरपतवार बढ़ रही हो तो उसका उपाय करना चाहिये। इसके अलावा खेत में यह भी देखना चाहिये कि जहां पर पौधे न उगे हों जगह खाली बच गयी हो अथवा पौधे खराब हो गये हों। उनकी जगह नये पौधे लगाने चाहिये। इस गैप को भरने से फसल भी बराबर हो जायेगी और पैदावार भी अच्छी होगी।

पानी के प्रबंधन पर दें ध्यान

वर्षाकाल में धान की पौध को रोपने के बाद वर्षा का इंतजार करें और यदि वर्षा न हो तो सिंचाई का प्रबंधन करें। किसान भाइयों को रोपाई के बाद इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि एक सप्ताह तक खेत में दो इंच पानी भरा रहना चाहिय् इसके अलावा प्रत्येक सप्ताह खेत की निगरानी करते रहना चाहिये। खेत सूखता दिखे तो सिंचाई करना चाहिये। धान में फूल आते समय तथा दाने में दूध पड़ने के समय खेत में पर्याप्त नमी रखने का प्रबंध करना चाहिये। ऐसा न करने से पौधे सूख सकते हैं और उत्पादन प्रभावित हो सकती है। लेकिन कटाई से 15 दिन पहले से सिंचाई बंद करना चाहिये।

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उर्वरकों का प्रबंधन भी जरूरी

धान की खेती में अच्छी पैदावार के लिए समय पर सिंचाई के बाद  उचित समय पर खाद एवं उर्वरक का भी प्रबंधन किया जाना जरूरी होता है। धान की बुआई के समय गोबर की खाद के अलावा नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश का इस्तेमाल करना चाहिये। लेकिन नाइट्रोजन का इस्तेमाल धान की रोपाई के बाद कई बार दिया जाता है। अलग-अलग किस्मों के लिए अलग-अलग तरह से उर्वरकों का इस्तेमाल किया जाता है।

1.जल्दी पकने वाली किस्मों में बुआई से पहले प्रति एकड़ 24 किलो नाइट्रोजन, 24 किलो फॉस्फोरस और 24 किलो पोटाश को डालना चाहिये। रोपाई के बाद जब कल्ले निकलते दिखें उस समय किसान भाइयों को 24 किलो नाइट्रोजन को डालना चाहिये। इससे अच्छी पैदावार हो सकती है।

2.देर से पकने वाली फसलों के लिए प्रति एकड़ 30 किलोग्राम नाइट्रोजन, 25 किलो फॉस्फोरस और 25 किलो पोटाश बुआई के समय दिया जाना चाहिये तथा रोपाई करने के बाद जब कल्ले निकलते नजर आयेंं तो 30 किलो नाइट्रोजन का छिड़काव खेतों में करना चाहिये। इससे दाने अच्छे बनते हैं। पैदावार भी अच्छी होती है।

3.सुगंधित चावल के धान की फसल देर से पकती है। इस तरह की फसल के लिए प्रति एकड़ 50 किलो नाइट्रोजन, 25 किलो फास्फोरस और 25 किलो पोटाश तो बुआई के समय डाली जानी चाहिये। इसके बाद जब कल्ले और बालियां निकलने वाले हों तो उस समय 50 किलो नाइट्रोजन, 12 किलो फॉस्फोरस और 12 किलो पोटाश डालनी चाहिये। इससे उत्तम क्वालिटी का धान पैदा होता है। साथ ही पैदावार बढ़ जाती है।

4.सीधी बुवाई वाली फसल में 50 किलो नाइट्रोजन, 20 किलो फॉस्फोरस, 20 किलो पोटाश प्रति एकड़ के हिसाब से बुआई के समय डाला जाना चाहिये। इसके अलावा 50 किलो नाइट्रोजन खरीद लें तो जिसके चार हिस्से कर लेना चाहिये। एक हिस्सा तो रोपाई के समय डालना चाहिये। इसका दो गुना हिस्सा कल्ले निकलते समय डालना चाहिये। इसके बाद बचा हुआ एक हिस्सा बालियां निकलते समय डालना चाहिये।

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कीट पर नजर रखें और उपाय करें

धान के पौधों की लगातार निगरानी करते रहना चाहिये क्योंंंंकि कल्ले निकलने से लेकर दाने में दूध पड़ने तक अनेक तरह के कीट एवं रोगों का हमला होता है। किसान भाइयों को चाहिये कि खेतों की निगरानी करते समय जिस कीट अथवा रोग की जानकारी मिले, उसका तुरन्त इंतजाम करना चाहिये।

सैनिक कीट

रोपाई के बाद सबसे पहले सैनिक कीट की सूंडियों के हमले का डर रहता है। यह कीट पौधों को इस प्रकार खा जाती है जैसे लगता है कि पशुओं के झुंड ने खेत को चर डाला हो। जब भी इस कीट के हमले का संकेत मिले।  उसी समय मिथाइल पैराथियान या फेन्थोएट का 2 प्रतिशत चूर्ण पानी में मिलाकर घोल बनाकर छिड़काव करें।

गंधीबग कीट

रोपाई के बाद खेतों में हमला करने वाले कीटों में गंधी बग कीट प्रमुख है। इस कीट के खेत में आक्रमण होते ही बहुत दुर्गन्ध आने लगती है। ये कीट पौधों में दूधिया अवस्था में लगता है। यह कीट दूध चूस कर दानों को खोखला कर देता है। इससे धान पर काले धब्बे बन जाते हैं और उसमें चावल नही बनते। इस कीट के आक्रमण का संकेत मिलने पर मैलाथियान धूल 5 डी 20-25 किलोग्राम प्रति एकड़ छिड़काव करें। इसके अलावा किसान भाई क्विनालफॉस 25 ईसी दो मिली प्रतिलीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। इसके अलावा एसीफेट 75 एस पी डेढ़ ग्राम प्रतिलीटर पानी में मिलाकर छिड़काव कर सकते हैं।  कार्बारिल या मिथाइल पैराथियान धूल को 25-30 किलोग्राम से पानी में मिलाकर छिड़काव करने से लाभ मिलता है।

तनाच्छेदक कीट

रोपाई से लगभग एक माह बाद तनाच्छेदक कीट लगने की संभावना रहती है। यह कीट फूल व बालियों को नुकसान पहुंचाता है। इसका पता लगते ही ट्राइकोकार्ड (ततैया) एक से डेढ़ लाख प्रति हेक्टेयर प्रति सप्ताह की दर से 6 सप्ताह तक छोड़ें। इसके अलावा कार्बोफ्रयूरॉन 3 जी या कारटैप हाइड्रोक्लोराइज 4 जी या फिप्रोनिल 0.3 जी 25 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें। क्विनॉल, क्लोरोपायरीफास का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

हरा फुदका

हरे फुदका भी ऐसा कीट होता है जो पौधों के तने का रस चूस कर नुकसान पहुंचाते हैं। इस कीट की खास बात यह है कि यह पत्तों में नही लगता बल्कि तने में चिपका रहता है। काले, भूरे व सफेद रंग के ये फुदके फसल के लिए काफी खतरनाक होते हैं। इस कीट को नियंत्रित करने के लिए कार्बोरिल 50 डब्ल्यूपी 2 ग्राम प्रति लीटर या बुप्रोफेजिन 25 एस एस 1 मिली प्रति लीटर का प्रति प्रयोग करना चाहिये। इससे लाभ होगा। इसके अतिरिक्त  इमिडाक्लोरोप्रिंड 17.8 एसएस, थायोमेथोक्जम 25 डब्ल्यूपी, बीबीएमसी 50 ईसी का भी प्रयोग किसान भाई कर सकते हैं।

यदि आपका खेत बस्ती के आसपास है तो आपको चूहों से भी सतर्क रहना होगा। चूहों के नियंत्रण के लिए आसपास के खेत वालों के साथ मिलकर उपाय करने होंगे पहले विषरहित खाद्य चूहों को देना चाहिये। एक सप्ताह बाद जिक फॉस्फाइड मिला खाद्यान्न देना चाहिये। इससे चूहे समाप्त हो सकते हैं।

इसक अलावा कटाई, मड़ाई समय पर करनी चाहिये। मड़ाई के बाद अच्छी तरह सुखाने आदि का प्रबंधन भी किसान भाइयों को करना चाहिये।

 

 

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