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कृषि कानून न बदल दें हरियाली की तस्वीर

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भारत कृषि प्रधान देश है। यहां के 60 प्रतिशत निवासी खेती पर निर्भर हैं। भारत की प्राकृतिक विशेषता जैव विविधता में निहित है। इससे देश में कृषि जलवायु के विभिन्न क्षेत्रों में अनुकूलता के चलते अनेक प्रजातियों के जीव-जन्तु व वनस्पति पनपते हैं। विश्व के संपूर्ण क्षेत्रफल का केवल 2.4 प्रतिशत भू-भाग ही भारत के पास है जबकि यहाँ की आबादी विश्व की 16 प्रतिशत है। इसलिए बढ़ती जनसंख्या का दबाव उपलब्ध भूमि एवं प्राकृतिक संपदा पर ही है। इसके अलावा बहुत बडे़ भू-भाग का बंजर होना एक समस्या है। आवास, सड़क, उद्योग आदि के लिए भी खेती के लिए उपयोगी जमीन देने से कृषि भूमि सिकुड़ रही है। यह बढ़ती आबादी के लिए संकट की दुंदुभी है। भारतीय क्षेत्र विश्व के 12 बडे़ जैव विविधता वाले केन्द्रों में से एक है लेकिन वैश्विक तापमान, ग्लोबल वार्मिंग खेती पर भारी पड़ रहा है। कई वनस्पतियां विलुप्त हो चुकी हैं। पौधों के पनपने और फलने के समय में बदलाव होने से उपज के उत्पादन और गुणवत्ता पर भी दुष्प्रभाव दिख रहे हैं। सरकार के कृषि कानूनों से इस जैव विविधता को खतरा होना तय है। कान्ट्रेक्ट फाॅर्मिंग मोड में कंपनियां उन्हीं फसलों को प्रमोट करेंगीं जिनसे किसान और कारोबारी दोनों को लाभ हो। इन सब हालातों पर काबू पाने को वैज्ञानिक अनुसंधान सतत प्रक्रिया के तहत चल रहे हैं।

कोयला, पेट्रोलियम पदार्थ और प्राकृतिक गैसों से दुनियां में रोजाना दो करोड़ टन कार्बनडाई आक्साइड गैस का उत्सर्जन हो रहा है। इससे धरती का तापमान बढ़ रहा है। सन 2100 में धरती का तापमान 1.8 से लेकर 4.0 डिग्री सेण्टीग्रेड से अधिक गर्म होने की भविष्यवाणी की जा रही है। इससे उत्पादन में गिरावट, गर्मी तथा बरसात के दिनों, समय व तरीकों में बदलाव से खेती-हरियाली की तस्वीर बदलना तय है। गर्मी से निर्जलीकरण होता है और प्रकाश संश्लेषण की क्रिया प्रभावित होती है।

राजस्थान में इसका असर साफ दिख रहा है। 3 लाख 42 हजार वर्ग किलोमीटर वाले राजस्थान में हर साल औसतन 504 मिलीमीटर बरसात होती है। राजस्थान का क्षेत्रफल देश के क्षेत्रफल का 10.41 प्रतिशत व जनसंख्या 5.67 प्रतिशत है। सतही जल 1.16 प्रतिशत व भूगर्भीय जल मात्र 1.70 प्रतिशत है। इस जल का 80 फीसदी भाग खेती में प्रयोग होता है। जिसके चलते प्रतिवर्ष भूगर्भीय जल स्तर दो मीटर की दर से नीचे गिर रहा है। 1984 में यहां के 237 खण्ड में से केवल 31 डार्क जोन की श्रेणी में थे। वहीं 2011 में 239 में से 191 खण्ड डार्क जोन की श्रेणी में पहुंच चुके थे।
पारिस्थितिकी में हो रहे आमूलचूल परिवर्तन के चलते खेती संकट में घिर रही है। गर्मियों में कई इलाकों में पारा 50 डिग्री सेल्सियस के पार चला जाता है तो ठंड के दिनों में मैदानी इलाकों में भी एक हफ्ते से पखवाडे़ तक पारा माइनस में रहने लगा है। गर्म हवाएं जब भट्टी के समान गर्मी देती हैं तो बडे़ बडे़ दरख्त भी सूख जाते हैं। ऐसे में फसलांे के नव अंकुरों को बचाना चुनौती बना हुआ है।

फूल


फूलों की खेती पर ग्लोबल वार्मिंग का खतरा साफ नजर आ रहा है। राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के कार्यवृत्त में प्रकाशित अध्ययन में बताया गया है कि यदि अनुमान के अनुसार वातावरण में कार्बनडाईआक्साइड गैसों की मात्रा दोगुनी हो जाती है तो जंगली पुष्प की प्रत्येक पांच किस्में अगली सदी तक लुप्त हो सकती हैं। पौधें कार्बनडाईआक्साइड लेते हैं लेकिन गैस के उच्च स्तर से जंगली फूलों की संख्या में 20 प्रतिशत एवं कुल पादप विविधता में 8 प्रतिशत की कमी हुई है। हिमालय क्षेत्र में खिलने वाले रोडोडेन्ड्राॅन आदि पुष्प सामान्यतः मार्च में खिलते हैं लेकिन 2009 में यह 45 दिन पहले खिल गए। जलवायु परिवर्तन पुष्पों को खत्म कर रहा है वहीं उनकी सुगंध कम हो रही है। दक्षिण-पश्चिमी अमेरिका और उत्तर पश्चिमी मैक्सिको से संकलित झाड़ी नमूनों और जैविक माॅडलों से यह सुझाव मिला है कि 1994 और 2004 के बीच बसंत में झाड़ियों के निकलने के समय में 20 से 41 दिन की अग्रता आई।

कैसे हो मुकाबला
भविष्य में खेती की तस्वीर आधुनिक अनुसंधानों के हिसाब से सजाई संवारी जाने लगी है। बदलती परिस्थितियों में नई किस्मों, विशेषताओं और फसलों को अपनाकर मुकाबला किया जा सकता है। जल संकट के समाधान के लिए जल के प्रबन्धन और संकलन पर जोर दिया जा रहा है। इसके लिए गांवों में तालाबों की खुदाई से लेकर टपक एवं फव्वारा सिंचाई जैसी विधियों का प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। खेती में जीनों की मदद से फसलों को ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से बचाने की तैयारी है।

कृषि में परमाणु तकनीकि का उपयोग
रेडियो एक्टिव परमाणुओं अथवा न्यूट्राॅन का फसल के बीज अथवा पौधों को किरणित करके उपचारित किया जाता है तो इसमें कई अच्छे बदलाव होते हैं। इस विधि से विभिन्न फसलों की 200 से अधिक किस्में तैयार की गई हैं। मूंगफली की 10 म्यूटेंट किस्मों से किसानों को 50 प्रतिशत तक अधिक उत्पादन मिला है। दलहन, चावल एवं जूट की 14 किस्में उगाने वाले किसानों को 10 से 80 प्रतिशत तक अधिक उत्पादन मिला है।

परमाणु तकनीकि में यदि कोबाल्ट 60 की 10 किलोग्राम मात्रा तक की गामा किरणों की बौछार फल-सब्जी आदि पर की जाए तो इन्हें लम्बे समय तक सुरक्षित किया जा सकता है। भारतीय हापुस आम इन्हीं किरणों से ट्रीट करके अमेरिकी बाजार में भेजा जा रहा है। उर्वरक एवं मृदा की उपज क्षमता बढ़ाने में भी इस तकनीकि का बेहद उपयोग हो रहा है।
टिश्यू कल्चर के केले, गन्ना, अनन्नास की किस्में माइक्रोप्रोगेशन विधि से तैयार कर उत्पादन बढ़ाने में सफलता हासिल की गई है। हर समय सब्जियों की विभिन्न किस्में उगाने के लिए ग्रीन हाउस तकनीकि कर्नाटक जैसे राज्यों में काफी सफल रही है। लेकिन तेज हवाओं में टिक सकने वाले ग्रीन हाउस के डिजायन अभी तक आम प्रचलन में नहीं हैं।

खतरे में गेहूं-सरसों
बदलती पारिस्थितिकी का सबसे ज्यादा असर गेहूं की फसल पर पड़ रहा है। गेहूं कई राज्यों में लोगों के भोजन का मुख्य घटक बन गया है। अन्य देशों से भी इसकी मांग रहती है। हिसार कृषि विश्वविद्यालय के ऑयलसीड विभाग के  पूर्व राष्ट्रीय सरसों अनुसंधान निदेशालय के पूर्व निदेशक डा. धीरज कहते हैं कि हम गर्मी झेलने की क्षमता वाले जीनोटाइप का पता कर लिया हैं। इनके सहारे नई किस्में तैयार की जा रही हैं। वह कहते हैं गेहूं को बचाने के लिए कम समय में पकने वाली किस्मों पर काम चल रहा है ताकि वह अप्रैल की गर्मी से पहले ही पककर तैयार हो जाएं और फरवरी के हीट स्ट्रोक को झेल सकें। वह कहते हैं कि बीज के उगने और पकने के समय ही गर्मी के चलते फसल और दाने प्रभावित होते हैं। इन्हें बचाने में वैज्ञानिकोें ने काफी हद तक सफलता अर्जित कर ली है। सितंबर में अधिकतम तापमान 37 से 38 डिग्री सेल्सियस रहता है। इस समय मिट्टी की सतह के एक सेमी ऊपर का तापमान 40 के पार रहता है। इससे सरसों का नव अंकुरित पौधा प्रभावित होकर मर जाता है। इससे बचाव के लिए गर्मी झेलने में सक्षम जीनों का चयन कर उन्हें फसलों पर प्रयोग किया जा रहा है।

ऑर्गनिक मैटल ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को कम करता है। वह कहते हैं खेती में ऑर्गनिक मैटल इस तरह की समस्याओं से बचाता है। इसलिए जैविक चीजों का प्रयोग ज्यादा करना चाहिए।

चावल
दुनिया के करीब तीन अरब लोगों के मुख्य आहार – चावल में संपूर्ण पोषण नहीं है। फिलीपीन्स के अन्तर्राष्ट्रीय धान अनुसंधान के वैज्ञानिकों ने धान में दो जीन ऐसे डाले हैं जिनकी मदद से दानों में बीटा-कैरोटीन बनता है। इस चावल को सुनहरा चावल कहा जाता है। इसमें विटामिन ए को समावेशित किया गया है। इससे धान पोषणयुक्त हो जाता है। भारत, वियतनाम और बांग्लादेश में लोग हर दिन इतना चावल खाते हैं कि उनकी विटामिन ए की कमी को सुनहरा चावल ही पूरा कर देगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनियां में हर साल ढाई से पांच लाख बच्चे विटामिन ए की कमी के चलते अंधता का शिकार हो जाते हैं। 20वीं सदी में भारत में कई सैकड़ा किस्मों के धान की खेती होती थी जो अब आधुनिक समस्याओं के समाधान वाली करीब 50 किस्मों तक ही सिमट गई है।

सुगर-फ्री चावल और रोगियों के लिए कम जीआई (ग्लाइसीमिक इंडैक्स) वाला चावल भी तैयार किया जा रहा है। छतों पर हाइड्रोपाॅनिक्स खेती के माध्यम से पौध तैयार करने जैसे काम आगे बढ़ रहे हैं।

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पौधे
पौधों को बचाए रखने की भी गंभीर चुनौती है। फोरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट कानपुर के पूर्व निदेशक डा. आरपी भारती की मानें तो टिश्यू कल्चर में काम तेज हुआ है लेकिन खत्म हो रहे पौधों के क्लोन तैयार करने में हम बहुत पीछे हैं। ब्राजील 100 के करीब क्लोन तैयार कर चुका है। इमली का पौधा 30 साल बाद फल देता है। हमने टिश्यू कल्चर से ऐसा पौधा विकसित किया है जो तीन साल में फल देने लगेेगा। शीशम, पाॅपुलर, इमली, बैंगू, रुद्राक्ष आदि के क्लोन तैयार कर लिए गए हैं। अभी इस दिशा में काम तेज करने की आवश्यकता है। कई पौधों की किस्में खत्म हो चुकी हैं।

किसान की जुबानी

आवर्तनशील खेती के जनक बांदा जनपद स्थित बड़ोकरखुर्द निवासी प्रगतिशील किसान प्रेम भाई कहते हैं कि आने वाले कल में हरियाली की तस्वीर को धुंधली होने से बचाने के लिए नीतिगत स्तर पर यदि प्रकृति के अनुरूप नीतियां नहीं बनती हंै तो बुन्देलखण्ड जैसे हालात अन्य स्थानों पर भी पैदा हो सकते हैं। जिस दिशा में हम गतिमान हैं, वीडीसाइड, पेस्टीसाइड व उर्वरकों के अंधानुकरण से हरियाली नहीं बचेगी। सुंदर और सश्य श्यामला प्रकृति चाहते हैं तो हर गांव के 10 प्रतिशत हिस्से पर पौधे लगाए जाएंगे, तभी कल्याण होगा।

 

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