बीजीय मसाले की खेती में मुनाफा ही मुनाफा

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कहते हैं, मसालों की खोज सबसे पहले भारत में ही हुई, भारत से ही मसाले दुनिया भर में फैले। ये ऐसे मसाले हैं, जिनकी खुशबू से ही लोगों के चेहरे खिल उठते हैं। आपने पढ़ा ही होगा कि मसाले बेच कर एक तांगावाला इस देश में मसाला किंग के नाम से फेमस हो गया।

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मसाले हर किसी को भाते हैं, किसी को ज्यादा, किसी को कम। मसालों की खेती विदेशी पूंजी को भारत में लाने का एक बड़ा जरिया है। हमारे यहां जो मसाले तैयार होते हैं, उनकी विदेशों में जबरदस्त डिमांड है। दुनिया का शायद ही कोई देश ऐसा हो, जहां मसालों की खपत हो और वे भारतीय मसाला नहीं खाते हों। भारतीय मसालों का डंका हर तरफ बज रहा है, ये आज से नहीं सैकड़ों सालों से है।

रायपुर में शोध

रायपुर स्थित कृषि विश्वविद्यालय में इन दिनों बीजीय मसालों (seed spices) पर शोध चल रहा है। दर्जनों शोधार्थी बीजीय मसालों पर शोध कर रहे हैं, वो एक नए मसाले की तलाश में हैं। वो हींग, मेथी, जीरा, जायफल, धनिया, सरसों के इतर कुछ ऐसे बीजीय मसालों की तलाश में हैं, जो सबसे अलग हो। मजे की बात यह है कि इन बीजीय मसालों को ही कॉकटेल कर वे कोई नया मसाला तैयार करने की नहीं सोच रहे हैं। वो सच में कुछ नया करना चाह रहे हैं, यही कारण है कि पिछले 9-10 महीनों से वो शोध कर रहे हैं। लेकिन अभी तक किसी परिणाम पर नहीं पहुंचे हैं, शोध जारी है।

भारत है नंबर 1

आपको पता ही होगा कि भारत मसाला उत्पादन में विश्व में प्रथम स्थान पर है। भारत को तो मसालों की भूमि के नाम से भी जाना जाता है, इन मसालों के औषयधी गुणों के कारण देश-दुनिया में इनकी डिमांड निरंतर बढ़ती जा रही है। दुनिया भर के व्यापारी हमारे देश में आते हैं, भारत के नक्शे को देखें तो जम्मू-कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक विभिन्न प्रकार के मसालों का उत्पादन होता है। इन सभी मसालों का अपना अलग मिजाज है, कोई बीमारी में काम आता है तो कोई रोगों से लड़ने की ताकत देता है। तो कोई स्वाद को बहुत ज्यादा बढ़ा देता है, तो कोई मसाला ऐसा भी होता है जो आपकी पाचन क्रिया को दुरुस्त कर देता है। इन मसालों के रहते अब नए मसालों की खोज इसलिए की जा रही है ताकि चार मसालों के स्थान पर एक ही मसाला भोजन में डाला जाए और उसका कोई साइड इफेक्ट न हो।

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परंपरागत मसाले

अगर बात करें मुख्य बीजीय मसाले की तो वो परंपरागत हैं। जैसे जीरा, धनिया, मेथी, सौंफ, अजवायन, सोवा, कलौंजी, एनाइस, सेलेरी, सरसों तथा स्याहजीरा। इन सभी की खेती देश के उन इलाकों में की जाती है, जहां इनके लायक मौसम बढ़िया होता है। दरअसल, बीजीय मसाले अर्धशुष्क और शुष्क इलाकों में ही उगाए जा सकते हैं। जहां बहुत ज्यादा गर्मी होगी या बहुत ज्यादा ठंड पड़ती हो, वहां मसाले नहीं उगाए जा सकते। फसल ही चौपट हो जाएगी, दरअसल शुष्क व अर्धशुष्क क्षेत्रों में जल की कमी होती है और जो उपलब्ध भूजल होता है, वह सामान्यतः लवणीय होता है। आपको पता ही होगा कि बीजीय मसाला फसलों को धान या गेहूं अथवा मक्के की तरह पानी की जरूरत नहीं होती। इनका काम कम जल में भी चल जाता है।

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अनुदान की योजना

सरकार उन इलाकों में, जहां भूजल कम है, बीजीय मसाले की खेती करने वाले किसानों को अनुदान भी देने की योजना बना रही है। हालांकि, ये हार्ड कोर कैश क्राप्स हैं, ये तैयार होते ही बिक जाते हैं और देश-विदेश से इनके ग्राहक भी आते हैं। आपको बता दें कि भारत में जिन मसालों का उत्पादन होता है, वे सबसे ज्यादा मात्रा में अमेरिका, जापान, कनाडा, आस्ट्रेलिया और यूरोपीय देशों में निर्यात होता है। यहां से ठीक-ठाक विदेशी मुद्रा भी आ जाती है। अगर आप भी बीजीय मसालों की खेती करना चाहते हैं, तो पूरे पैटर्न को समझ लें। इस खेती में पैसे तो हैं पर रिस्क भी कम नहीं है, उस रिस्क को अगर आप सहन कर सकते हैं, तो बीजीय मसालों की खेती में बहुत पैसा है और आप उससे मुनाफा कमा सकते हैं।

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