केमिस्ट्री करने वाला किसान इंटीग्रेटेड फार्मिंग से खेत में पैदा कर रहा मोती, कमाई में कई गुना वृद्धि!

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एकीकृत कृषि प्रणाली (इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम)

जिस तरह मौजूदा दौर के क्रिकेट मेें ऑलराउंड प्रदर्शन अनिवार्य हो गया है, ठीक उसी तरह खेती-किसानी-बागवानी में भी मौजूद विकल्पों के नियंत्रित एवं समुचित उपयोग एवं दोहन का भी चलन इन दिनों देखा जा रहा है। क्रिकेट के हरफनमौला प्रदर्शन की तरह, खेती किसानी में भी अब इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम (Integrated Farming System) का चलन जरूरी हो गया है।

क्या कारण है कि प्रत्येक किसान उतना नहीं कमा पाता, जितना आधुनिक तकनीक एवं जानकारियों के समन्वय से कृषि करने वाले किसान कमा रहे हैं।

सफल किसानों में से किसी ने जैविक कृषि को आधार बनाया है, तो किसी ने पारंपरिक एवं आधुनिक किसानी के सम्मिश्रण के साथ अन्य किसान मित्रों के समक्ष सफलता के आदर्श स्थापित किए हैं। ऐसी ही युक्ति है इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम (Integrated Farming System) यानी ‘एकीकृत कृषि प्रणाली’। यह कैसी प्रणाली है और कैसे काम करती है, जानिये।

कुछ हट कर काम किसानी करने वालों की फेहरिस्त में शामिल हैं, बिहार के बेगूसराय में रहने वाले 48 वर्षीय प्रगतिशील किसान जय शंकर कुमार भी।

पहले अपने खेत पर काम कर सामान्य कमाई करने वाले केमिस्ट्री में पोस्ट ग्रेजुएट जय शंकर की सालाना कमाई में अब इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम (Integrated Farming System) से किसानी करने के कारण आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हुई है।

साधारण किसानी करते थे पहले

सफलता की नई इबारत लिखने वाले जय शंकर सफल होने के पहले तक पारंपरिक तरीके से पारंपरिक फसलों की पैदावार करते थे। इन फसलों के तहत वे मक्का, गेहूं, चावल और मोटे अनाज आदि की फसलें ही अपने खेत पर उगाते थे। इन फसलों से हासिल कम मुनाफे ने उन्हें परिवार के भरण-पोषण के लिए बेहतर मुनाफे के विकल्प की तलाश के लिए प्रेरित किया।

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ऐसे मिली सफलता की राह

खेती से मुनाफा बढ़ाने की चाहत में जय शंकर ने कई प्रशिक्षण एवं जागरूकता कार्यक्रमों में सहभागिता की। इस दौरान उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके), बेगूसराय के वैज्ञानिकों से अपनी आजीविका में सुधार करने के लिए सतत संपर्क साधे रखा।

पता चली नई युक्ति

कृषि सलाह आधारित कई सेमिनार अटैंड करने के बाद जय शंकर को इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम (Integrated Farming System) के बारे में पता चला।

इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम क्या है ?

इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम (Integrated Farming System) यानी एकीकृत कृषि प्रणाली खेती की एक ऐसी पद्वति है, जिसके तहत किसान अपने खेत से सम्बंधित उपलब्ध सभी संसाधनों का इस्तेमाल करके कृषि से अधिक से अधिक लाभ प्राप्त करता है।

कृषि की इस विधि से छोटे व मझोले किसानों को अपनी घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ कृषि से अत्यधिक लाभ प्राप्त होता है। वहीं दूसरी ओर फसल उत्पादन और अवशेषों की रीसाइकलिंग (recycling) के द्वारा टिकाऊ फसल उत्पादन में मदद मिलती है।

इस विधि के तहत मुख्य फसलों के साथ दूसरे खेती आधारित छोटे उद्योग, पशुपालन, मछली पालन एवं बागवानी जैसे कार्यों को किया जाता है।

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पकड़ ली राह

जय शंकर को किसानी का यह फंडा इतना बढ़िया लगा कि, उन्होंने इसके बाद इस विधि से खेती करने की राह पकड़ ली।

एकीकृत प्रणाली के तहत उन्होंने मुख्य फसल उगाने के साथ, बागवानी, पशु, पक्षी एवं मत्स्य पालन, वर्मीकम्पोस्ट बनाने पर एक साथ काम शुरू कर दिया। उन्हें केवीके ने भी तकनीकी रूप से बहुत सहायता प्रदान की।

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मोती का उत्पादन (Pearl Farming)

खेत पर लगभग 0.5 हेक्टेयर क्षेत्र में मछली पालने के लिये बनाए गए तालाब के ताजे पानी में, वे मोती की भी खेती कर रहे हैं।

वर्मीकम्पोस्ट के लिए मदद

जय शंकर की वर्मीकम्पोस्ट उत्पादन में रुचि और समर्पण के कारण कृषि विभाग, बिहार सरकार ने उन्हें 25 लाख रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की है। वे अब हर साल 3000 मीट्रिक टन से ज्यादा वर्मीकम्पोस्ट उत्पादित कर रहे हैं।

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बागवानी में भी आजमाए हाथ

बागवानी विभाग ने भी जय शंकर की लगन को देखकर पॉली हाउस और बेमौसमी सब्जियों की खेती के अलावा बाजार में जल्द आपूर्ति हेतु पौधे लगाने के लिए जरूरी मदद प्रदान की।

केवीके, बेगूसराय से भी उनको तकनीकी रूप से जरूरी मदद मिली। केवीके वैज्ञानिकों ने एकीकृत कृषि प्रणाली मॉडल में उन्हें सुधार और अपडेशन के लिए समय-समय पर जरूरी सुझाव देकर सुधार करवाए।

कमाई में हुई वृद्धि

एक समय तक जय शंकर की पारिवारिक आय तकरीबन 27000 रुपये प्रति माह या 3.24 लाख रु प्रति वर्ष थी। अब एकीकृत कृषि प्रणाली से खेती करने के कारण यह अब कई गुना बढ़ गयी है।

मोती की खेती, मत्स्य पालन, वर्मीकम्पोस्ट, बागवानी और पक्षियों के पालन-विक्रय के समन्वय से अब उनकी यही आय प्रति माह 1 लाख रुपये या प्रति वर्ष 12 लाख से अधिक हो गई है।

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खेत में मोती की चमक बिखेरने वाले जय शंकर अब दूसरों की तरक्की की राह में भी उजाला कर रहे हैं। वे अब बेगूसराय जिले के केवीके से जुड़े ग्रामीण युवाओं की मेंटर ट्रेनर के रूप में मदद करते हैं। साधारण नजर आने वाला उनका खेत अब ‘रोल मॉडल’ के रूप में कृषि मित्रों की राह प्रशस्त कर रहा है। उनका मानना है, दूसरे किसान भी उनकी तरह अपनी कृषि कमाई में इजाफा कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए उनको, उनकी तरह समर्पण, लगन, सब्र एवं मेहनत भी करनी होगी।

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