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जानिए सूरजमुखी की खेती कैसे करें

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अभी सूरजमुखी की खेती करने का सही समय है. सूरजमुखी की खेती खाद्य तेल के लिए की जाती है. वैसे भी हमारे देश को खाद्य तेलों का आयात करना पड़ता है। आयात को कम करने के लिए सरकार का भी ध्यान सरसों और सूरजमुखी जैसी फसलों पर अधिक है। मार्च के महीने में इसकी बुवाई की जाती है। इसकी बुवाई करते समय याद रखें की खेत में गोबर की खाद, नाइट्रोजन की पर्याप्त मात्रा होनी चाहिए. इसको सूरजमुखी नाम देने के पीछे भी एक रोचक कारण है।एक तो इसका फूल सूरज की तरह दिखता है दूसरा इसका फूल सूरज के हिसाब से घूमता है। आप कह सकते है की इसके फूल का मुँह सूरज की तरफ ही रहता है।

सूरजमुखी की खेती किसानों के लिए बहुत अच्छी मानी जाती है क्योंकि जब खेतों से सरसों, आलू, गेंहूं आदि से खेत खाली होते हैं तो इसकी खेती की जा सकती है। इसमें से जो तेल निकलता है वो बहुत ही पौष्टिक और स्वादिष्ट होता है।

सूरजमुखी की खेती खरीफ, रबी एवं जायद तीनो ही मौसमों में की जा सकती है। लेकिन खरीफ में सूरजमुखी पर अनेक रोग कीटों का प्रकोप रहता है। फूल छोटे होते है, तथा उनमें दाना भी कम पड़ता है तथा इतना स्वस्थ भी नहीं होता है, जायद में सूरजमुखी की खेती से अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है। इस मौसम की सूरजमुखी में मोटा दाना और उसमें तेल की मात्रा भी ज्यादा होती है।

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खेत की तैयारी:

मार्च या अप्रैल के महीने में जब खेत दूसरी फसल से खाली होता है तो खेत में इतनी नमी नहीं होती की उसको दूसरी फसल के लिए तैयार कर दिया जाये। इसके लिए पहले खेत को सूखा ही 2 जोत हैंरों या कल्टीवेटर से लगा देनी चाहिए और अगर संभव हो सके तो उसमें प्लाऊ से 8 से 10 इंच गहरी जुताई लगा कर मिटटी को पलट देना चाहिए जिससे कि ऊपर की मिटटी नीचे और नीचे की मिटटी ऊपर आ जाये। उसके बाद उसमें पलेवा ( सूखे खेत में पानी देना) करके जुताई आने पर कल्टीवेटर से 2 से 3 जुताई लगाकर पाटा लगा देना चाहिए जिससे की खेत में नमी बनी रहे और समतल भी हो जाये।

उचित जलवायु और मिटटी:

सूरजमुखी के लिए शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है। इसको बोने का सही समय फ़रवरी से मार्च का दूसरा सप्ताह उचित होती हैं क्योंकि अगर इसके फूल को बीज पकते समय बारिश नहीं होनी चाहिए अगर पकते समय बारिश हो जाती है तो इसको बहुत नुकसान होता है तथा इसकी फसल की गुणबत्ता भी खराब हो जाती है।

इसको किसी भी तरह की मिटटी में उगाया जा सकता है इसकी फसल को दोमट और रेतीली भुरभुरी वाली मिटटी में उगाना उचित होगा। सर्वप्रथम हमें ध्यान रखना चाहिए की जिस खेत में हम इसे लगा रहे हैं उसमे पानी निकासी की उचित व्यवस्था है की नहीं क्योंकि अगर इसके खेत में पानी भर जाता है तो इसके पेड़ ख़राब होने की संभावना होती है।

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उर्वरक की जरूरत: 

हम जिस मिटटी में इसे लगा रहे हैं उसमें खाद की मात्रा कितनी है? उचित रहेगा की हम अपनी मिटटी का टेस्ट कराके उसमे जरूरत के हिसाब से ही नाइट्रोजन, फास्फोरस का प्रयोग करना चाहिए फिर भी हमें 80KG नाइट्रोजन और 60KG फास्फोरस का प्रति एकड़ के हिसाब से लेना चाहिए। नाइट्रोजन को खेत में बखेर देना चाहिए तथा जुताई लगा देनी चाहिए और फास्फोरस और पोटास को कुंडों में डालना चाहिए. अगर खेत में आलू की फसली की गई हो तो उसमे खाद की मात्रा 25 से 30 प्रतिशत तक काम की जा सकती है।

बुवाई का ठीक समय:

सूरजमुखी की फसल का सही समय फ़रवरी और मार्च के दूसरे सप्ताह तक होता है। इसकी फसल जून के दूसरे सप्ताह तक पक कर स्टोर हो जानी चाहिए या कहा जा सकता है कि जून के दूसरे सप्ताह तक फसल पक कर तैयार हो जानी चाहिए जिससे की बारिश शुरू होने से पहले घर आ जानी चाहिए। बारिश की वजह से इसमें बहुत नुकसान होता है।

बुवाई से पहले बीज की तैयारी:

बीज को बोने से 12 घंटे पहले भिगो देना चाहिए और बाद में निकाल कर इसे छाया में सुखा देना चाहिए। इसकी बुवाई दोपहर बाद करनी चाहिए जिससे कि इसके बीज को खेत में ठन्डे में उगने के लिए पर्याप्त माहौल मिल सके। गर्मी के मौसम में हमेशा याद रखें ज्यादातर बीजों  को भिगोकर बोने की सलाह दी जाती है क्योंकि गर्मी में तापमान दिन में बहुत ज्यादा होता है इस तापमान में बीज को अंकुरित होने के लिए पर्याप्त नमी नहीं मिल पाती है।

सूरजमुखी की निम्न उन्नत किस्में:

सूरजमुखी की निम्न उन्नत किस्में

मार्डन :- इस प्रजाति की उत्पादन क्षमता 6 से 8 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है। इसकी उपज समय अवधि 80 से 90 दिन है | इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 90 से 100 सेमी. तक होती है। इस प्रजाति की खेती बहुफसलीय क्षेत्र के लिए उपयुक्त है।  इस प्रजाति में तेल की मात्र 38 से 40 प्रतिशत होती है।

बी.एस.एच.–1 :- इस प्रजाति की उत्पादन 10 से 15 किवंटल प्रति हैक्टेयर है तथा इसकी उत्पादन समय 90 से 95 दिन है। इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 100 से 150 सेमी. तक होती है। इस प्रजाति में तेल की मात्र 41 प्रतिशत होती है।

एम.एस.एच. :- इस प्रजाति की उत्पादन 15 से 18 किवंटल प्रति हैक्टेयर है तथा इसकी उत्पादन समय 90 से 95 दिन है। इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 170 से 200  सेमी. तक होती है। इस प्रजाति में तेल की मात्र 42 से 44 प्रतिशत होती है।

सूर्या :– इस प्रजाति की उत्पादन 8 से 10 किवंटल प्रति हैक्टेयर है तथा इसकी उत्पादन समय 90 से 100 दिन है। इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 130 से 135 सेमी. तक होती है। इसप्रजाति की की खेती पिछेती बुवाई के लिए उपयुक्त है। इस प्रजाति में तेल की मात्र38 से 40  प्रतिशत होती है।

ई.सी. 68415 :- इस प्रजाति की उत्पादन 8 से 10 किवंटल प्रति हैक्टेयर है तथा इसकी उत्पादन समय 110 से 115 दिन है। इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 180 से 200  सेमी. तक होती है। इसप्रजाति की की खेती पिछेती बुवाई के लिए उपयुक्त है। इस प्रजाति में तेल की मात्र 38 से 40 प्रतिशत होती है।

कीड़े और  रोकथाम:

सूरजमुखी की खेती में कई प्रकार के कीट रोग लगते है, जैसे कि दीमक हरे फुदके (डसकी बग) आदि है। इनके नियंत्रण के लिए कई प्रकार के रसायनो का भी प्रयोग किया जा सकता है। मिथाइल ओडिमेंटान 1 लीटर 25 ईसी या फेन्बलारेट 750 मिली लीटर प्रति हैक्टर 900 से 1000 लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करना चाहिए।

कटाई:

सूरजमुखी की फसल एक साथ कटाई के लिए नहीं आती है इसके फूलों को तोड़ने से पहले देखें की वो हलके पीले रंग के हो गए है, तभी इनको तोड़ कर किसी छाया वाली जगह में सूखा लें। इसकी गहाई के दो तरीके हैं एक तो इसको फूल से फूल रगड़ कर भी बीज अलग किया जा सकता है या डंडे से पीट पीट कर निकला जा सकता है या फिर ज्यादा फसल है तो इसको निकालने के लिए थ्रेसर की मदद भी ली जा सकती है।

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