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भारत की मंडियों में तिलहन फसल सरसों की कीमतों में आई भारी गिरावट

भारत की मंडियों में तिलहन फसल सरसों की कीमतों में आई भारी गिरावट

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि वर्तमान में तिलहन फसलों में सर्वाधिक सरसों की कीमत प्रभावित हो रही है। विगत वर्ष के समापन में सरसों की कीमतों में काफी तीव्रता देखने को मिली थी। परंतु, अब सरसों की कीमतें एक दम नीचे गिरने लगी हैं। भारत भर की मंडियों में सरसों को क्या भाव मिल रहा है ? तिलहन फसलों का भाव निरंतर तीव्रता के पश्चात अब गिरावट की कवायद शुरू हो गई है। अधिकांश तिलहन फसलों की कीमतें अभी ज्यों की त्यों बनी हुई हैं।

कुछ एक फसलों में कमी दर्ज की जा रही है। तिलहन फसलोंकी बात करें तो सर्वाधिक सरसों के भाव प्रभावित हो रहे हैं। विगत वर्ष के अंत में सरसों की कीमतों में शानदार तीव्रता देखने को मिली थी। एक वक्त तो भाव 9000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया था। परंतु, अब भाव में एक दम से कमी आई है। आलम यह है, कि सरसों का भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी नीचे चला गया है, जिस कारण से कृषक भी काफी परेशान दिखाई दे रहे हैं। 

भारत भर की मंडियों में सरसों की कीमत क्या है

केंद्र सरकार ने सरसों पर 5650 रुपये का न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित किया गया है। परंतु, भारत की अधिकतर मंडियों में किसानों को MSP तक की कीमत नहीं मिल रही है। सरसों की फसल को औसतन 5500 रुपये/क्विंटल की कीमत मिल रही है। केंद्रीय कृष‍ि व क‍िसान कल्याण मंत्रालय के एगमार्कनेट पोर्टल के मुताबिक, शनिवार (6 जनवरी) को भारत की एक दो मंडी को छोड़ दें, तो तकरीबन समस्त मंडियों में मूल्य MSP से नीचे ही रहा है। शनिवार को सरसों को सबसे शानदार भाव कर्नाटक की शिमोगा मंडी में हांसिल हुआ। जहां, सरसों 8800 रुपये/क्विंटल के भाव पर बिकी है।


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इसी प्रकार, गुजरात की अमरेली मंडी में भाव 6075 रुपये/क्विंटल तक रहा है। इन दो मंडियों को छोड़ दें, तो बाकी समस्त मंडियो में सरसों 5500 रुपये/क्विंटल के नीचे ही बेची जा रही है, जो MSP से काफी कम है। वहीं, भारत की कुछ मंडियों में तो भाव 4500 रुपये/क्विंटल तक पहुंच गया। विशेषज्ञों का कहना है, की कम मांग के चलते कीमतों में काफी गिरावट आई है। यदि मांग नहीं बढ़ी, तो कीमतें और कम हो सकती हैं, जो कि कृषकों के लिए काफी चिंता का विषय है।


यहां पर आप बाकी फसलों की सूची भी देख सकते हैं 

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि किसी भी फसल का भाव उसकी गुणवत्ता पर भी निर्भर रहता है। ऐसी स्थिति में व्यापारी क्वालिटी के हिसाब से ही भाव निर्धारित करते हैं। फसल जितनी शानदार गुणवत्ता की होगी, उसकी उतनी ही अच्छी कीमत मिलेंगे। यदि आप भी अपने राज्य की मंडियों में भिन्न-भिन्न फसलों का भाव देखना चाहते हैं, तो आधिकारिक वेबसाइट https://agmarknet.gov.in/ पर जाकर पूरी सूची की जाँच कर सकते हैं।

भारतीय कृषि निर्यात में 10% प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई

भारतीय कृषि निर्यात में 10% प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई

APEDA द्वारा जारी कृषि निर्यात के आंकड़ों के अनुसार, भारत के कृषि निर्यात में 10% प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। इसमें सर्वाधिक प्रभाव गेहूं के ऊपर पड़ा है। इसकी मांग 90% प्रतिशत से अधिक कम हुई है। एग्रीकल्चरल प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी (APEDA) द्वारा कृषि निर्यात के आंकड़े जारी किए हैं। इनके मुताबिक कृषि उत्पादों के भारत के निर्यात में चालू वित्त वर्ष 2023-24 की अप्रैल-नवंबर अवधि के दौरान 10% प्रतिशत की कमी दर्ज हुई है। इसकी वजह अनाज शिपमेंट में कमी को बताया गया है। APEDA द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल-नवंबर 2023-24 की अवधि में कृषि निर्यात 15.729 बिलियन डॉलर रहा, जो विगत वर्ष की समान अवधि के 17.425 डॉलर के मुकाबले में 9.73% प्रतिशत कम है।

बासमती चावल के शिपमेंट में काफी बढ़ोतरी दर्ज की गई है 

सऊदी अरब और ईराक जैसे खरीदारों द्वारा अधिक खरीदारी की वजह से बासमती चावल के शिपमेंट में विगत वर्ष की समान अवधि के मुकाबले में 17.58 फीसद की वृद्धि के साथ 3.7 बिलियन डॉलर की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो कि 2.87 बिलियन डॉलर थी। मात्रा के रूप से बासमती चावल का निर्यात विगत वर्ष की समान अवधि के 27.32 लाख टन से 9.6% प्रतिशत बढ़कर 29.94 लाख टन से अधिक हो गया है। 

गेंहू का 98% प्रतिशत निर्यात कम रहा है 

साथ ही, घरेलू उपलब्धता में सुधार और मूल्य वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए सरकार द्वारा विगत वर्ष जुलाई में लगाए गए निर्यात प्रतिबंधों की वजह से गैर-बासमती चावल शिपमेंट में एक चौथाई की कमी आई है। अप्रैल से नवंबर माह तक गैर-बासमती चावल का निर्यात 3.07 अरब डॉलर रहा, जो बीते साल के 4.10 अरब डॉलर से ज्यादा है। 

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मात्रा के संदर्भ में गैर-बासमती शिपमेंट विगत वर्ष की समान अवधि के 115.7 लाख टन की अपेक्षा में 33% प्रतिशत कम होकर 76.92 लाख टन रह गया है। गेहूं का निर्यात विगत वर्ष के 1.50 अरब डॉलर के मुकाबले 98% प्रतिशत कम होकर 29 मिलियन डॉलर रहा। अन्य अनाज निर्यात पिछले साल की समान अवधि के 699 मिलियन डॉलर की तुलना में 38 प्रतिशत कम होकर 429 मिलियन डॉलर पर रहा।

इधर भीषण गर्मी से झुलसे अन्नदाता, उधर गेहूं की पैदावार में हुई रिकॉर्ड गिरावट

इधर भीषण गर्मी से झुलसे अन्नदाता, उधर गेहूं की पैदावार में हुई रिकॉर्ड गिरावट

नई दिल्ली। इस साल भीषण गर्मी से आम जनमानस में अकुलाहट है। इधर भीषण गर्मी ने अन्नदाता को झुलसाया, तो उधर भीषण गर्मी के चलते गेहूं की पैदावार में भी भारी गिरावट हुई है। गेहूं की फसल कटाई के बाद आधिकारिक रूप से जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार गेहूं उत्पादन में पिछले दो दशक बाद सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। गेहूं की बाली में दाना पकने के दौरान ही तापमान काफी बढ़ गया था। इस साल मार्च महीने में ही तापमान 40° डिग्री तक पहुंच गया था। तेज धूप के कारण गेहूं के डंठल का रंग सुनहरे की जगह पीला पड़ गया था। जिससे फसल के खराब होने की आंशका बढ़ गई थी। साल 2020 व 2019 में भी फसलों को नुकसान हुआ था।लेकिन इतना नुकसान नहीं हुआ था। जो इस साल देखने को मिला है।

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गेहूं उत्पादन वाले इलाके हो सकते हैं प्रभावित

- कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि गेहूं जैसे मुख्य फसल पर मौसम की मार दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा पर जोखिम का संकेत है। जल्दी ही कोई उपाय नहीं किया गया और गर्मी व लू अत्यधिक बढ़ गई तो गेहूं उत्पादन वाले इलाके भौगोलिक रूप से प्रभावित हो सकते हैं।

गेहूं में नुकसान से किसानों पर बढ़ेगा कर्ज के बोझ

- किसानों के लिए गेहूं मुख्य फसल है। यदि गेहूं की फसल में भी नुकसान जाएगा। तो किसान पर और अधिक कर्ज बढ़ जाएगा। कर्ज के दलदल में फंसकर किसान के लिए अपने परिवार का पालन-पोषण करना कठिन हो जाएगा।

यूपी में 18, हरियाणा में 20 तो पंजाब में 30 प्रतिशत गिरावट

- साल 2022-23 में भीषण गर्मी के कारण गेहूं की फसल के उत्पादन में भारी गिरावट दर्ज हुई है। गेहूं उत्पादन में उत्तर प्रदेश में 18 प्रतिशत, हरियाणा में 22. 40 प्रतिशत व पंजाब में 30 प्रतिशत तक कि गिरावट हुई है।

 ------- लोकेन्द्र नरवार

भारत में आई गेहूं के दाम में गिरावट, सरकार के इस कदम से हुआ असर

भारत में आई गेहूं के दाम में गिरावट, सरकार के इस कदम से हुआ असर

हाल फिलहाल में देश और दुनिया में गेहूं के रेट बहुत तेज़ी से बढ़े थे, जिसको देखते हुए सरकार ने भारत से आटा निर्यात (Flour Export) को कुछ दिन के लिए बंद कर दिया था। अब आटा निर्यात प्रतिबन्ध का असर भी दिख रहा है और देश में गेहूं का दाम पहले के मुकाबले काफी गिर गया है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि बिल्कुल ही सस्ता हो गया है।

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आटा, मैदा और सूजी के निर्यात को अब देना होगा गुणवत्ता प्रमाण पत्र अभी भी गेहूं का दाम MSP से ज्यादा ही है। गौर करने वाली बात है कि हर साल तेज गर्मी पड़ने की वजह से देश में गेहूं का उत्पादन प्रभावित हुआ था, जिसके चलते देश में गेहूं संकट गहरा गया है। उसके परिणामस्वरूप गेहूं और आटे के दाम में बेतरतीब बढ़ोतरी देखने को मिली है। मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक 14 सालों में ये पहली बार है जब गेहूं का स्टॉक अगस्त माह आते-आते इतना कम हो गया है। मौजूदा समय में गेहूं का MSP 2015 चल रहा है। पिछले दिनों आटे के निर्यात में प्रतिबंध के साथ गेहूं के दाम 25 रुपये प्रति क्विंटल तक कम हुए हैं। वैसे बाजार में गेहूं के मौजूदा रेट की बात करें तो राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में इसका भाव 2500 रुपये प्रति क्विंटल है। ये भाव 25 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट के बाद के हैं। आटे के निर्यात पर सरकार ने अभी फैसला लिया है, लेकिन गेहूं के निर्यात पर सरकार ने बहुत पहले ही फैसला ले लिया था और 13 मई को ही इसके निर्यात पर रोक लगा दी थी। असल में सिर्फ हमारा देश ही गेहूं संकट का सामना नहीं कर रहा, बल्कि दुनियाभर में यह संकट अपना असर डाल रहा है। वैसे दुनियाभर में इस संकट की असल वजह यूक्रेन-रूस युद्ध (Ukraine-Russia War) है। गौर करने वाली बात है कि यूक्रेन दुनियाभर में अपना गेहूं निर्यात करता है। युद्ध की वजह से वह अपना गेहूं कहीं नहीं भेज रहा था। जिसकी वजह से भारत के गेहूं कि दुनियाभर में डिमांड बढ़ गई थी। चूंकि, भारत में गेहूं संकट होने के कारण 13 मई को ही सरकार ने इसके निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। वैसे 13 मई के पहले जो डील हो गई थीं, उन्हीं के शिप 13 मई के बाद भारत से गेहूं लेकर रवाना हुए थे।

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इस साल वक्त के पहले गर्मी शुरू होने से देश में तीन-चार महीने तापमान बहुत तेज रहा जिसकी वजह से मध्यप्रदेश और पंजाब में गेहूं की पैदावार पर जोरदार असर पड़ा है। कृषि विभाग के मुताबिक इस साल 3 प्रतिशत कम पैदावार हुई है। इसी की वजह से देश यह संकट झेल रहा है। यही नहीं अगस्त आते-आते देश का गेहूं स्टॉक अपने सबसे निचले स्तर पर है। गौर करने वाली बात है कि भारत गेहूं पैदा करने के मामले में चीन के बाद दूसरे स्थान पर है। लेकिन निर्यात करने में भारत टॉप-10 में भी नहीं है। इसमें पहले नंबर पर रूस और पांचवें नंबर पर यूक्रेन है। ये दोनों ही देश युद्ध में उलझे हुए हैं। ऐसे में दुनियाभर में गेहूं की कमी आना स्वभाविक है।
सेब उत्पादन में इस साल काफी गिरावट की आशंका है

सेब उत्पादन में इस साल काफी गिरावट की आशंका है

देश में शीतलहर और बर्फवारी का कहर चल रहा है। परंतु, विगत वर्ष की तुलना में इस बार कम बारिश और बर्फबारी की वजह से देश में सेब उत्पादन काफी घट सकता है। मौसम विभाग के अनुसार, आगामी दिनों में बारिश-बर्फबारी होने की संभावना है। परंतु, ये सेब के चिलिंग पीरियड पूरे करने के लिए अनुकूल नहीं है। सेब की खेती करने वाले कृषकों के लिए एक काफी बुरी खबर है। भारत में इस साल औसत से कम बारिश एवं बर्फबारी की वजह से सेब की पैदावार में गिरावट आने की आशंका है। ये सेब बागवानों के लिए काफी बड़ी चुनौती खड़ी कर सकती है। दरअसल, उत्तराखंड, जम्मू कश्मीर एवं हिमाचल प्रदेश जैसे सेब उत्पादक राज्यों में इस बार ना के समान बर्फबारी दर्ज हुई है। इसकी वजह से किसान बेहद चिंतित हैं। 

जनवरी के माह में एक सप्ताह से ज्यादा का वक्त बीत जाने के उपरांत भी इन राज्यों में वर्षा नहीं हुई है। बरसात ना होने के चलते बर्फबारी का भी कोई नामोनिशान नहीं है। इससे सेब की फसल को आवश्यकता के अनुसार, सर्दियों वाला मौसम नहीं मिल रहा है। इस परिस्थिति में विशेषज्ञों ने कहा है, कि कम बर्फबारी की वजह से सेब के आकार पर काफी प्रभाव पड़ेगा और उसकी मिठास भी घट जाऐगी।

सेब उत्पादन में भारी कमी की आशंका 

बागवानी विशेषज्ञों का कहना है, कि यदि कुछ दिनों में बारिश और बर्फबारी नहीं होती है, तोसेब की पैदावार में 20 से 25 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। सेब पैदावार में गिरावट आने की वजह से सेब की कीमत भी काफी बढ़ सकती है। ऐसा कहा जा रहा है, कि बारिश न होने की वजह से भूमि से नमी गायब हो गई है। इसके परिणामस्वरूप सेब के पौधों को पर्याप्त नमी नहीं मिल पा रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक, सेब के पौधों के विकास के लिए न्यूनतम 800 से 1000 घंटे के चिलिंग पीरियड की आवश्यकता होती है। परंतु, बारिश-बर्फबारी न होने के चलते चिलिंग पीरियड पूर्ण नहीं हो पाया है। ऐसी स्थिति में सेब की उपज काफी प्रभावित होने की संभावना हैं।

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किसान बारिश व बर्फबारी के लिए ईश्वर से भी प्रार्थना कर रहे हैं 

अगर हिमाचल प्रदेश पर एक नजर डालें, तो यहां के कृषक भी बारिश और बर्फबारी न होने से निराशा है। प्रदेश में बारिश और बर्फबारी की कमी के परिणामस्वरूप सेब के 5500 करोड़ रुपये के व्यवसाय पर काफी संकट के बादल छा रहे हैं। क्योंकि, बर्फबारी अब तक प्रारंभ नहीं हुई है, जिससे चिलिंग पीरियड की प्रक्रिया भी आरंभ नहीं हो सकी है। बतादें, कि इससे प्रदेश के हजारों बागबानों की चिंता काफी बढ़ गई है। ऐसे में बागवान बारिश एवं बर्फबारी के लिए देवी-देवताओं की प्रार्थना कर रहे हैं।

बरसात होने को लेकर IMD ने क्या संदेश दिया है ? 

सेब एक बेहद स्वादिष्ट फसल है। हिमाचल प्रदेश के अतिरिक्त उत्तराखंड में भी बड़े पैमाने पर सेब की खेती की जाती है। यहां लगभग 25 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सेब के बागान लगे हुए हैं, जिससे प्रति वर्ष तकरीबन 67 हजार टन सेब की पैदावार होती है। उत्तरकाशी, नैनीताल, चंपावत, चमोली, देहरादून, बागेश्वर और अल्मोड़ा जैसे जनपदों में किसान सेब उगाते हैं। साथ ही, इन क्षेत्रों में किसानों द्वारा पुलम, नाशपाती और खुबानी की खेती भी की जाती है। यही कारण है, कि यहां के कृषक बारिश और बर्फबारी न होने की वजह से बेहद परेशान हैं। किसानों का कहना है, कि यदि बारिश और बर्फबारी नहीं हुई तो इससे उनकी फसल बर्बाद हो जाऐगी। साथ ही, मौसम विभाग के अनुसार, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में आगामी कुछ दिनों में बारिश-बर्फबारी होने की संभावना हैं। 

आखिर किस वजह से प्याज की कीमतों में आई रिकॉर्ड तोड़ गिरावट

आखिर किस वजह से प्याज की कीमतों में आई रिकॉर्ड तोड़ गिरावट

प्याज का अत्यधिक उत्पादन होने की वजह से उसकी कीमतों पर काफी प्रभाव पड़ता दिख रहा है। देश की मंडियों में प्याज का भंडारण हो चुका है। दरअसल, प्याज की आवक जरूरत से ज्यादा होने की वजह से प्याज की उतनी खपत बाजार में नहीं हो पा रही है। एक तरफ जहां चीनी उत्पादन कम होने के चलते इसकी कीमतें बढ़ने की अटकलें लगाई जा रही है, तो उधर दालों की भी कीमतें बढ़ गई हैं। परंतु, एक सहूलियत आमजनता को प्याज की कीमतों को लेकर जरूर मिल रही है। देश में प्याज की कीमतों में काफी गिरावट दर्ज की जा रही है। प्याज की कीमतें कम होने से जहां व्यापारी परेशान हैं। वहीं, किसान भी परेशान हो गए हैं। अब हम जानने का प्रयास करते हैं, कि प्याज की कीमतों का बुरा हाल आखिर क्यों हुआ है। इससे किसानों को क्या नुकसान हो सकता है।

इन राज्यों में हुआ प्याज का बेहतरीन उत्पादन

जानकारी के लिए बतादें कि भारत में राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात में प्याज का रिकॉर्ड तोड़ उत्पादन हुआ है। इस उत्पादन की खपत करना ही किसानों के लिए मुश्किल होता जा रहा है। बेहतरीन उत्पादन होना ही कीमत कम होने की सबसे प्रमुख और बड़ी वजह मानी जा रही है। साथ ही, ओलावृष्टि और बेमौसम बारिश से मौसम में नमी अच्छी खासी हो गई है। इससे प्याज के खराब होने का खतरा काफी बढ़ गया है। किसान इसी वजह से औने-पौने कीमतों में अपनी प्याज बाजार में बेच रहे हैं।

मंडियों में जरुरत से ज्यादा प्याज का भंडारण

बेमौसम बरसात होने की वजह से प्याज की कीमतें काफी सस्ती होती जा रही है। प्याज बर्बाद न हो, इसी वजह से बड़ा भंडारण बाजार में भेजा जा रहा है। किसान प्याज खराब होने के भय से मंडियों में ले जा रहे हैं। मंडियों में अंधाधुंध प्याज का स्टॉक जमा होना शुरू हो चुका है। परंतु, बाजार में प्याज की खपत न होने की वजह से प्याज की कीमतों में बेहद गिरावट दर्ज की जा रही है।

प्याज 1 से 2 रुपए किलो तक बिकी है

विगत कुछ माह में प्याज की कीमतों की बुरी स्थिति हो रही है। मीडिया खबरों के मुताबिक, महाराष्ट्र के सोलापुर के रहने वाले किसान राजेन्द्र तुकाराम चौव्हाण ने फरवरी माह में 2 रुपये प्रति किलो में 512 किलो प्याज विक्रय कर दी थी। अनुमान लगाया जा सकता है, कि किसान 70 किलोमीटर वाहन से आने के उपरांत प्याज लादकर मंडी आए थे। मंडी में उनसे एक से दो रुपये प्रति किलो के हिसाब से प्याज खरीद लिया था। इससे तो उनका भाड़ा तक भी नहीं निकला पाया था।
इन नस्लों की गायों का पालन करके किसान अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं

इन नस्लों की गायों का पालन करके किसान अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं

हमारे देश का किसान हमेशा से ही खेती के साथ मुनाफा कमाने के लिए पशुपालन भी करता आ रहा है। लेकिन कई किसानों को पता नहीं होता कि कौन से नस्ल के पशु चुनने होते हैं, ताकि वह उन से अच्छा मुनाफा कमा सके। ज्यादातर हमारे देश के किसान विदेशी नस्ल की गाय पालते हैं, ये गाय दूध तो ज्यादा देती है पर इन के दूध का रेट किसान को कम मिलता है। क्योंकि इन के दूध में फैट कम होता है और बीटा-कैसिइन A1 पाया जाता है, जो हमारे शरीर में कई बीमारियाँ उत्पन करता है। इसलिए आजकल लोगों का रुझान देसी गाय की तरफ हो रहा है। क्योंकि देसी गाय का दूध बहुत अच्छा होता है, इस में बीटा-कैसिइन A2 पाया जाता है और ये हमारे शरीर में ऊर्जा पैदा करता है। जिससे हम कम बीमार होते हैं, तभी आज कल देसी गाय के दूध का मूल्य 120 रूपये प्रति किलो हो गया है। इसलिए अगर किसान देसी नस्ल की गाय पालन करे तो उन का अच्छा मुनाफा हो सकता है।

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देसी गायों की प्रमुख नस्ले इस प्रकार हैं -

साहीवाल

ये नस्ल भारत की सब से ज्यादा दूध देने वाली देसी नस्ल है। इस का रंग लाल भूरे रंग से लेकर अधिक लाल तक हो सकता है। ये एक दिन में 18 लीटर तक दूध दे सकती है। दूध दुहते समय साहीवाल बहुत शांत होती है, इस की गर्मी सहनशीलता और उच्च दूध उत्पादन के कारण उन्हें अन्य एशियाई देशों के साथ-साथ अफ्रीका और कैरिबियन में निर्यात किया जाता है।

गिर

ये नस्ल गुजरात की नस्ल है। इस नस्ल की गाय बहुत सहनशील होती है और अच्छा दूध उत्पादन करती है। गिर दिखने में विशिष्ट है, आमतौर पर एक गोल और गुंबददार माथे, लंबे पेंडुलस कान और सींग जो बाहर और पीछे मुड़े होते हैं। गिर आमतौर पर लाल से लेकर पीले से लेकर सफेद तक के रंग के साथ धब्बेदार होते हैं। इस नस्ल की गायें रोग प्रतिरोधी होती हैं। गायों का वजन औसतन 385 किलोग्राम और ऊंचाई 130 सेमी होती है। 140 सेमी की ऊंचाई के साथ बैल का वजन औसतन 545 किलोग्राम होता है। जन्म के समय बछड़ों का वजन लगभग 20 किलो होता है। इसके दूध में 4.5% फैट होता है और ये एक दिन में 15 से 16 लीटर तक दूध दे सकती है।

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देसी / हरियाणा

यह हरियाणा राज्य के रोहतक, करनाल, कुरुक्षेत्र, जींद, हिसार, भिवानी, चरखीदादरी और गुरुग्राम जिलों में ज्यादा मिलती है। मवेशी मध्यम से बड़े आकार के होते हैं और आम तौर पर सफेद से भूरे रंग के होते हैं। इसके दूध में फुर्ती बहुत होती है, ये गाय एक दिन में 10 - 15 लीटर तक दूध दे सकती है | इस नस्ल के बैल बहुत अच्छे बनते हैं, ये नस्ल गर्मी के मौसम में भी अच्छा दूध उत्पादन करती है। गाय का दूध विटामिन डी, पोटेशियम एवं कैल्शियम का अच्छा स्रोत है, जो कि हड्डियों की मजबूती के लिए जरूरी है। इसके साथ ही गाय के दूध में कैरोटीन भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यह कैरोटीन मनुष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता को 115 प्रतिशत तक बढ़ाता है। गाय का दूध, देशी घी को श्रेष्ठ स्रोत माना गया है, गौ, मूत्र, गैस, कब्ज, दमा, मोटापा, रक्तचाप, जोड़ों का दर्द, मधुमेह, कैंसर आदि अनेक बीमारियों की रोकथाम के लिए बहुत उपयोगी होता है। गाय के दूध में विटामिन ए पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है, जो आँखों में होने वाले रतोंधी रोग की रोकथाम के लिए आवश्यक है। इसके साथ विटामिन बी 12 व राइबोफ्लेविन भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जो हृदय को स्वस्थ रखने में सहायक होता है।

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थारपारकर

ये नस्ल राजस्थान, हरियाणा में ज्यादा पाली जाती है। इसका रंग सफेद होता है और लटकती हुई नाभि और गलकम्बल होता है। इस नस्ल की गाय दूध ज्यादा देती है। 15 लीटर तक दूध एक दिन में देती है, माना जाता है कि ये गाय राजस्थान में थार का रेगिस्तान पार कर के आयी थी। इसलिए इस का नाम थारपारकर पड़ गया।
वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमतों में भारी गिरावट, जानें क्या होगा भारत में इसका असर

वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमतों में भारी गिरावट, जानें क्या होगा भारत में इसका असर

वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमतों में भारी गिरावट - मांग बढ़ने से यूरिया की कीमतें 45 फीसदी तक घटीं

नई दिल्ली। उर्वरकों को लेकर रिकॉर्ड बनाती कीमतों के बीच सब्सिडी बजट मोर्चे पर सरकार को कुछ राहत मिलती दिख रही है। वैश्विक बाजार में
यूरिया की कीमतों में भारी गिरावट हुई है। बढ़ती मांग के चलते यूरिया की कीमतें 45 फीसदी तक घट गईं हैं। वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमत 1000 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई थी। जो गिरकर अब 550 डॉलर प्रति टन तक आ गईं हैं। भारत ने 980 डॉलर प्रति टन की कीमत तक यूरिया खरीदा था। देश में करीब 350 लाख टन यूरिया की खपत होती है। उम्मीद जताई जा रही है कि जुलाई के पहले सप्ताह में भारत यूरिया आयात का टेंडर जारी करेगा। संभावना है कि भारत को 540 डॉलर प्रति टन की कीमत में आयात सौदा मिल जाएगा। इससे किसानों को यूरिया की कीमतों में राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

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भारत में कितनी होंगी कीमतें

- मिली जानकारी के अनुसार 540 डॉलर प्रति टन की कीमत पर होने वाले सौदे पर पांच फीसदी का आयात शुल्क लगेगा। और 1500 रुपये प्रति टन का हैंडलिंग व बैगिंग खर्च जोड़ा जायेगा। इसके बाद यह करीब 42 हजार रुपये प्रति टन हो जाएगा। एक समय यूरिया की कीमत करीब 75 हजार रुपए प्रति टन तक पहुंच गई थी।

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कीमतों में आई गिरावट के चलते सरकार को सब्सिडी के मोर्चे पर उच्चतम स्तर पर कीमत के मुकाबले करीब 30 हजार रुपए प्रति टन की बचत होगी। ------ लोकेन्द्र नरवार
ठंडे पानी से पकने वाला बिहार का 'मैजिक चावल' होता है शुगर फ्री, होती है खूब कमाई

ठंडे पानी से पकने वाला बिहार का 'मैजिक चावल' होता है शुगर फ्री, होती है खूब कमाई

पटना। आमतौर पर असम की ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर माजुला द्वीप में 'मैजिक धान' की खेती होती है। लेकिन इन दिनों बिहार में 'मैजिक चावल' ने धमाल मचा रखा है। मैजिक चावल की खेती से किसान अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। बिहार के बगहा के रहने वाले विजय गिरी ने मैजिक धान की खेती की शुरुआत की थी। विजय गिरी ने सबसे पहले एक एकड़ जमीन में इसकी रोपाई की। और पहली ही साल में इसने अपना मैजिक दिखाना शुरू कर दिया। अब अच्छी पैदावार हो रही है। इसमें रासायनिक खाद की जरूरत नहीं होती है। यह ठंडे पानी से पकाया जाता है।

विजय गिरी के बारे में जानें

- ठंडे पानी से पकने वाले मैजिक चावल की खेती करने वाले विजय गिरी का नाम आज देश के चर्चित किसानों में लिया जा रहा है। इनको खेती में विभिन्न प्रकार के प्रयोग करने का जूनून रहता है। कभी ब्लैक व्हिट तो कभी ब्लैक राइस की खेती करके विजय गिरी चर्चाओं में रहते हैं। विजय गिरी के साथ किसान अवधेश सिंह भी मैजिक चावल की खेती कर रहे हैं। magic dhaan ki kheti

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मैजिक चावल को पकाने के लिए नहीं चाहिए गैस चूल्हा

- मैजिक धान की खासियत है कि इसको पकाने के लिए किसी रसोई गैस अथवा चूल्हे की जरूरत नहीं होती है। यह चावल सामान्य पानी में ही रखने पर 45-60 मिनट के अंदर भात बनकर तैयार हो जाता है। इसका बाजार भाव 40 से 60 रुपये प्रतिकिलो होता है। इसको खेत में पककर तैयार होने में 150-160 दिन लगते हैं।

शुगर फ्री होता है मैजिक चावल

किसान विजय गिरी ने मैजिक चावल की शुरुआत करके तमाम किसानों का ध्यान इस ओर आकर्षित किया है। यह मैजिक धान पूरी तरह शुगर फ्री होता है। इसमें कार्बोहाइड्रेट व प्रोटीन की मात्रा सामान्य चावल के मुकाबले अधिक होती है। इस वर्ष मैजिक धान की खेती का रकवा बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है। ------ लोकेन्द्र नरवार
एक एकड़ में नीलगिरी की खेती से कमाई ७० लाख

एक एकड़ में नीलगिरी की खेती से कमाई ७० लाख

नीलगिरी (यूकेलिप्टस (Eucalyptus)) एक मध्यम आकार का बड़ी तेजी से बढ़ने वाला पेड़ है जो 25 मीटर से 50 मीटर लंबा और 2 मीटर व्यास तक बढ़ सकता है. यह पेड़ "माइरटेसी" परिवार का सदस्य है, जिसकी 325 से अधिक प्रजातियां हैं. नीलगिरी ऑस्ट्रेलिया, तस्मानिया और आसपास के द्वीपों में होते हैं. अंग्रेजों ने 1843 के आसपास तमिलनाडु के नीलगिरी हाइलैंड्स में ईंधन और लकड़ी के उपयोग के लिए नीलगिरी की खेती की शुरुआत की. इस पेड़ को "गोंद का पेड़", "लाल लोहे का पेड़" और "सफ़ेदा या नीलगिरी का पेड़" भी कहा जाता है. नीलगिरी के पत्ते और तेल अपने चिकित्सीय लाभों के लिए जाने जाते हैं और हर्बल सामानों में भी उपयोग किए जाते हैं. 

यूकेलिप्टस की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु

यूकेलिप्टस की खेती विभिन्न प्रकार की जलवायु में की जा सकती है. हालाँकि, यह उष्णकटिबंधीय जलवायु में सबसे अच्छा बढ़ता है. भारत में नीलगिरी के पेड़ों की खेती 0°C से 47°C तक के तापमान में की जा सकती है.

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नीलगिरी की खेती के लिए मिट्टी की तैयारी

जल निकासी क्षमता वाली मिट्टी का चयन करना निलगिरी के विकास के लिए आवश्यक है. यह अच्छी तरह से सूखा, जैविक समृद्ध दोमट मिट्टी में सबसे अच्छा बढ़ता है. नीलगिरी उगाने के लिए जलजमाव, क्षारीय या लवणीय मिट्टी उपयुक्त नहीं है. 

नीलगिरी की बुवाई का समय

यूकेलिप्टस की बुवाई का सबसे अच्छा समय जून से अक्टूबर तक है. 

यूकेलिप्टस का नर्सरी प्रबंधन और प्रत्यारोपण

यूकेलिप्टस को बीज और कलम दोनों तरीकों से उगाया जा सकता है. नर्सरी के लिए क्यारियों को छाया में तैयार करें और उनमें पौध डालें. 25 से 35 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर अंकुर तेजी से विकसित होते हैं. रोपण के छह सप्ताह बाद, या दूसरी पत्ती आने की अवस्था में, पॉलीथीन बैग में स्थानांतरित करने या रोपाई के लिए तैयार हो जाती है. ये बीज बोने के 3-5 महीने बाद खेत में रोपाई के लिए उपयुक्त होते हैं. गीले मौसम के दौरान कलम लगाना सही होता है.

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नीलगिरी के पौधों की सिंचाई

खेत में पौध लगाते ही सिंचाई शुरू कर देनी चाहिए. जगह में नमी बनाए रखने के लिए ड्रिप सिंचाई का उपयोग किया जा सकता है. हालाँकि, सिंचाई की मात्रा मिट्टी के प्रकार और मौसम की परिस्थितियों से निर्धारित होती है. पूरी विकास अवधि में लगभग 25 सिंचाई की जानी चाहिए. 

नीलगिरी की फसल और उपज

यूकेलिप्टस के पौधों को तैयार होने और पेड़ बनने में तकरीबन दस से बारह साल का समय लगता है, साथ ही साथ इसकी खेती में लागत भी कम आती है. यूकेलिप्टस के पेड़ का वजन लगभग चार सौ किलोग्राम होता है. एक हेक्टेयर क्षेत्र में लगभग एक से डेढ़ हजार पेड़ लगाए जा सकते हैं. पेड़ के पकने के बाद इन लकड़ियों को बेचकर किसान आसानी से सत्तर लाख से एक करोड़ तक कमा सकते हैं.

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नीलगिरी की खेती में अंतरफसल

नीलगिरी की खेती करने वाले किसान नीलगिरी के पेड़ की पंक्तियों के बीच हल्दी, अदरक, अलसी और लहसुन जैसी कम अवधि की लाभदायक फसलें लगा सकते हैं. ये फसलें यूकेलिप्टस की खेती की लागत को कम करने में मदद करती हैं. 

नीलगिरी लगायें, पर ध्यान दें

नीलगिरी का पेड़ मिट्टी के पोषक तत्वों और नमी के भंडार को कम कर देता है और ऐलोपैथिक गुणों के कारण अंडरग्रोथ को रोकता है. यह भी पाया गया है कि मृत पौधे की पत्तियां और छाल बहुत देर से मिट्टी में मिलती हैं, जिसके कारण पोषक तत्वों का चक्र धीमा हो जाता है. इसलिए, उन क्षेत्रों के लिए नीलगिरी की खेती की सिफारिश नहीं की जाती है जहां जल स्तर कम हो रहा है. इसकी खेती अधिक पानी वाले मिट्टी में करना चाहिए.

Eucalyptus यानी सफेदा का पौधा लगाकर महज दस साल में करें करोड़ों की सफेद कमाई!

Eucalyptus यानी सफेदा का पौधा लगाकर महज दस साल में करें करोड़ों की सफेद कमाई!

महंगी होती किसानी के बीच, किसान अपने खेत में यूकेलिप्टस (Eucalyptus) जिसे आम बोलचाल की भाषा में सफेदा या नीलगिरी (Nilgiri) के नाम से भी जाना जाता है, का पौधा लगाकर कम लागत में करोड़ों रुपये कमा सकते हैं! यूकेलिप्टस की कीमत क्या है? इसका पौधा कितने दिन में परिपक़्व पेड़ बन जाता है? क्या यूकेलिप्टस धरती से पानी सोख लेता है? और क्या करोड़ों रुपये की हैसियत रखने वाले इस पेड़ को लगाने के नुकसान भी हैं? सारे सवालों के जवाब जानें साथ-साथ।

नीलगिरी (यूकेलिप्टस (Eucalyptus))

पहली बात यह कि, महज एक एकड़ के खेत में लगाए गए नीलगिरी (यूकेलिप्टस (Eucalyptus)) के पेड़ दस साल बाद, सैकड़ों नहीं, हजारों नहीं बल्कि करोड़ों रुपयों का मुनाफा देने में कारगर हैं। वो ऐसे कि सफेदा यानी नीलगिरी या फिर कहें कि यूकेलिप्टस (Eucalyptus) का पेड़ पूर्णतः विकसित होने में लगभग दशक भर का समय लेता है।

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दीर्घ और अल्पकालिक कमाई :

ऐसे में कृषि वैज्ञानिकों द्वारा बताए गए आदर्श तरीकों से, इन पेड़ों के बीच की जमीन पर अल्प अवधि में लाभदायक फसल, साग सब्जियां आदि लगाकर मुनाफा कमाया जा सकता है। ऐसे में, दीर्घकाल में लाभकारी सफेदा का पेड़ जब तक पूरी तरह से परिपक़्व नहीं हो जाता, तब तक खेत में लगाई गई अन्य फसलों से नियमित लाभ हासिल किया जा सकता है। मतलब, दशक भर में कटाई के लिए तैयार होने वाले सफेदा के पेड़ों के बीच हल्दी, अदरक, साग-भाजी लगाकर कमाई की जा सकती है। तो हुई न, हींग लगे न फिटकरी, रंग आए चोखा वाली बात! 


सफेदा (Safeda)/नीलगिरी (Nilgiri)/यूकेलिप्टस (Eucalyptus) का उपयोग :

आम तौर पर भारत में पंजाब, मध्यप्रदेश, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, बिहार, दक्षिण भारत, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों में सफेदा के पेड़ों की व्यापक तौैर पर फार्मिंग हो रही है। मजबूती, लचीलेपन के कारण पसंद की जाने वाली यूकेलिप्टस की लकड़ियों का मुख्य तौर पर उपयोग फर्नीचर बनाने से लेकर भवन निर्माण आदि में किया जाता है। खेल आदि की वस्तुओं में भी इनका उपयोग होता है।

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मट्ठर प्रकृति का पेड़ :

जैसा कि प्रचलित है, सफेदा (Safeda)/नीलगिरी (Nilgiri)/यूकेलिप्टस (Eucalyptus) का पौधा किसी भी तरह की जलवायु में खुद को विकसित करने में कारगर है। पथरीली, काली किसी भी तरह की मिट्टी में नीलगिरी के पौधे विकसित किए जा सकते हैं। कृषि विज्ञान परीक्षणों के मुताबिक 6.5 से 7.5 के P.H.मध्यमान वाली जमीन यूकेलिप्टस (Eucalyptus) के पौधे के विकास में खासी मददगार होती है। 

यूकेलिप्टस (Eucalyptus) से जुड़ी आशंकाएं भी :

सफेदा यानी यूकेलिप्टस (Eucalyptus) की खेती को लेकर कुछ मतांतर भी हैं। ऐसी भी राय है कि इसके पेड़ लगाने से भूजलस्तर में गिरावट हो सकती है। हालांकि सरकारी स्तर पर इस बारे में कोई अधिसूचना आदि प्रदान नहीं की गई है। साथ ही यह भी एक और राय है कि, सरकारी प्रोत्साहन के अभाव में किसानों ने इस पौधे से लाभ कमाने में कम ही रुचि दिखाई है।

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एक एकड़, दस साल और लाभ एक करोड़ :

बहुत कम लागत में तैयार होने वाले सफेदा या फिर यूकेलिप्टस पेड़ की लकड़ी का बाजार भाव छह रुपये प्रति किलो के आसपास है। कम देेखभाल वाले सफेदा के पेड़ में मतलब, हर तरह से बचत ही बचत है। एक परिपक़्व पेड़ का वजन चार सौ किलो के लगभग होता है। जबकि एक हेक्टेयर खेत में लगभग एक से डेढ़ हज़ार पौधों को पेड़ों का रूप दिया जा सकता है। यूकेलिप्टस के पेड़ों से कमाई कर रहे किसानों की मानें, तो इस की खेती से दस सालों बाद तकरीबन एक करोड़ रूपए तक का मुनाफा कमाया जा सकता है।

खेत में पानी भरने से हुआ है नुकसान, तो सरकार देगी मुआवजा, ऐसे करें आवेदन

खेत में पानी भरने से हुआ है नुकसान, तो सरकार देगी मुआवजा, ऐसे करें आवेदन

बारिश के मौसम में अक्सर सुनने को मिलता है कि किसानों की फसल, खेत में जलभराव की वजह से खराब हो गई। अब किसानों को इस विषय में राहत देने के लिए हरियाणा सरकार ने गिरदावरी (Girdawari) का काम शुरू किया है, जिसके अंतर्गत जलभराव के कारण जो भी आपकी फसल का नुकसान हुआ है उसको लेकर सरकार को बता सकते हैं और आपकी फसल का जितना नुकसान हुआ है, उसके हिसाब से आपको मुआवजा मिल जाएगा। गिरदावरी का काम 5 सितंबर तक चलेगा, इसलिए अगर आपने अभी तक इसके अंतर्गत रजिस्टर नहीं कराया है, तो आज ही करा लें। गिरदावरी को आसान भाषा में कहें, तो अगर आपकी फसल की क्षति का ब्योरा राज्य सरकार के पास अभी नहीं है, तो आप भेज सकते हैं। चूंकि, अभी केवल एक हफ्ता ही बचा है, तो आपको इस बारे में विचार करने की जरूरत है। इसके लिए आपको उस खेत की फोटो खींचनी होगी जिसमें जलभराव की वजह से आपकी फसल की क्षति हुई है और उस फोटो को ब्योरे के साथ ई-फसल क्षतिपूर्ति पोर्टल पर अपलोड करना होगा। ई-फसल क्षतिपूर्ति सूचना देने के लिए 'मेरी फसल मेरा ब्योरा' पर फसल का पंजीकरण अनिवार्य है। इस तरह से आप अपनी मुआवजा प्राप्त करने की दिशा में कदम बढ़ा देंगे।

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गौर करने वाली बात है कि बारिश के सीज़न में कई खेतों में पानी भर जाने से राज्य सरकार ने गिरदावरी का काम 5 अगस्त से शुरू कर दिया था। इसके अंतर्गत जो भी फसलें बर्बाद हुई होंगी, उनका मुआवजा सरकार देगी। हाल ही में इस बारे में प्रदेश के उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला ने एक जनसभा को संबोधित करते हुए बताया। उन्होंने इस दौरान कहा कि जिन किसानों के खेतों में जलभराव देखने को मिला है, उसको लेकर सरकार गंभीर है और उचित कदम उठा रही है। उन्होंने इस दौरान कहा कि हर चीज़ को लेकर पारदर्शिता बरती जा रही है। लेकिन अगर किसान को फिर भी लग रहा है कि उसकी गिरदावरी सही नहीं हुई है, तो वे अपनी फसल का ब्योरा, पोर्टल पर फोटो सहित अपलोड कर सकते हैं। इस तरह से पटवारी एक बार फिर से, फसल में हुए नुकसान का आंकलन करेगा और रिपोर्ट पेश करेगा। इसके अलावा उप मुख्यमंत्री ने एक और बात कही। उन्होंने कहा कि बारिश के सीज़न में गरीबों के मकानों को काफी नुकसान पहुंचता है। ऐसे में सरकार इसको लेकर जल्दी ही बड़ा फैसला लेने वाली है। उन्होंने कहा कि बारिश के मौसम में गरीबों के मकानों को नुकसान पहुंचने पर उन्हें 80 हजार रुपये की सहायता दी जाएगी। इसके लिए कानून में संशोधन करना होगा, इसके बाद ही प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

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मुआवजे की प्रक्रिया हमारे देश में कितनी जटिल है, ये सभी जानते हैं। इसी बात पर जोर देते हुए उप मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए संबंधित उपायुक्त को शक्ति दी जाएगी, ताकि मुआवजे की राशि को जल्दी से जल्दी प्रभावित लोगों के बैंक खाते में ट्रांसफर किया जा सके। उन्होंने इस दौरान कहा कि इसके पहले मुआवजे का प्रावधान बाढ़ के समय पर मकानों को नुकसान होने पर ही मिलता था, लेकिन गरीबों के मकान तो बरसात में भी गिर जाते हैं। इसमें खेत में ट्यूबवेल पर बने कमरे के नुकसान को लेकर भी गरीबों की मदद की जाएगी।