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मेथी की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

मेथी की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

किसान भाइयों आप मेहनत करने के बाद भी वो चीजें नहीं हासिल कर पाते हो जिनके लिए आप पूरी तरह से हकदार हो। आपने वो कहावत तो सुनी होगी कि हिम्मते मर्दा मददे खुदा। जो अपनी मदद करता है, खुदा उसकी मदद करता है। यह बात सही है लेकिन खुदा या ईश्वर साक्षात प्रकट होकर आपकी मदद करने नहीं आयेंगे। इसके बावजूद यदि आप अपने जीवन की तरक्की की बातों को खोजना शुरू कर देंगे तो आपको वो सारे रास्ते मिल जायेंगे जिन्हें आप चाहेंगे। इस विश्वास के साथ आप अपनी मौजूदा माली हालत को देखिये और अपने परिवार की ओर देखिये। उनकी समस्यायें क्या हैं आप खेती करके कितनी जरूरतें पूरी कर पा रहे हैं और कितनी अधूरी रह जा रहीं हैं। इन सभी बातों पर विचार करेंगे तो आपको रास्ता अवश्य दिख जायेगा। चाहे आप फसल का चक्रानुक्रम बढ़ायें अथवा वो फसलें खेतों में पैदा करें जो अब पारंपरिक फसलों से अधिक आमदनी दे सकें। इस बारे में विचार करें। सरकारी और गैर सरकारी विशेषज्ञों से सम्पर्क करें और कम समय में और कम लागत में अधिक आमदनी देने वाली फसलों को पैदा करने की योजना बनायें तो कोई भी शक्ति आपको आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती। क्योंकि कहा गया है कि चरण चूम लेतीं हैं खुद चलके मंजिल। मुसाफिर अगर हिम्मत न हारे। इसलिये हिम्मत करके आप व्यापारिक फसलों पर अपना फोकस करें। मेथी ऐसी ही फसल है, जो कम लागत में और कम समय में दोहरा या इससे ज्यादा लाभ देने वाली है। जानिये मेथी की खेती के बारे में। ये भी पढ़े: पालक की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

मेथी के खास-खास गुण

मेथी को लिग्यूमनस फेमिली का पौधा कहा जाता है। इसका पौधा झाड़ीदार एवं छोटा ही होता है। मेथी के पौधे की पंत्तियां और बीज दोनों का ही इस्तेमाल किया जाता है। मेथी की पत्तियों का साग बनाया जाता है और उसके बीज को मसाले के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा पत्तियों को सुखा कर महंगे दामों पर बेचा जा सकता है। मेथी के बीज को औषधीय प्रयोग किया जाता है। इससे आयुर्वेदिक दवाएं बनतीं हैं। मेथी के लड्डू खाने से शुगर डायबिटीज, ब्लेड प्रेशर कंट्रोल होता है। शरीर के जोड़ों के दर्द व अपच की बीमारी में मेथी के बीज फायदेमंद होता है।

मिट्टी व जलवायु

किसान भाइयों वैसे तो मेथी की खेती प्रत्येक प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है। लेकिन इसके लिए बलुई व रेतीली बलुई मिट्टी सबसे ज्यादा अच्छी होती है। मिट्टी का पीएच मान 6 से 8 के बीच होना चाहिये। मेथी की खेती के लिए ठंडी जलवायु अधिक अच्छी होती है क्योंकि इस के पौधे में अन्य पौधों की अपेक्षा पाला सहने की शक्ति अधिक होती है। किसान भाइयों को इस बात का ध्यान रखना होगा कि मेथी की खेती उन स्थानों पर की जानी चाहिये जहां पर बारिश अधिक न होती है क्योंकि मेथी का पौधा अधिक वर्षा को सहन नहीं कर पाता है। इसलिये जल जमाव वाला खेत भी मेथी की खेती के लिए नुकसानदायक है।

खेत की तैयारी

मेथी की खेती करने वाले किसान भाइयों को चाहिये की खेत को तब जुतवायें जब तक मिट्टी भुरभुरी न हो जाये यानी कंकड़ या ढेला न रहे। इसके लिए पाटा का इस्तेमाल करना चाहिये। आखिरी जुताई करने से पहले गोबर की खाद का मिश्रण डालना चाहिये। जिससे खाद मिट्टी में अच्छी तरह से मिल जाये। उसके बाद खेत बिजाई के लिए तैयार हो जाता है। बिजाई के लिए 3 गुणा दो मीटर की समतल बैड तैयार करना चाहिये। मेथी खेत की तैयारी

बिजाई का समय व अन्य जरूरी बातें

किसान भाइयों आपको बता दें कि मेथी की खेती के लिए बिजाई का समय मैदानी और पहाड़ी इलाकों के लिए अलग-अलग होता है। मैदानी इलाकों में  मेथी की बिजाई सितम्बर-अक्टूबर तक हो जानी चाहिये। पहाड़ी इलाकों में मेथी की बिजाई जुलाई व अगस्त के महीने में की जानी चाहिये। इसकी बिजाई हाथों से छींट करके की जाती है। बिजाई करते समय पौधों की दूरी का ध्यान रखना पड़ता है। लाइन से लाइन की दूरी लगभग एक फुट होनी चाहिये। पौधों से पौधों की दूरी किस्म के अनुसार तय की जाती है। बीज को एक इंच तक गहराई में बोना चाहिये। एक एकड़ में लगभग 12 किलोग्राम मेथी के बीजों की जरूरत होती है। बिजाई से पहले मेथी के बीजों को उपचारित करना जरूरी होता है। उपचारित करने के लिए बीजों को बुवाई करने से लगभग 10 घंटे पानी में भिगो देना चाहिये। फंगस व कीट आदि से बचाने के लिए कार्बेनडजिम, डब्ल्यूपी से बीजों को उपचारित करें। इसके साथ एजोसपीरीलियम ट्राइकोडरमा के मिक्स घोल से बीजों का उपचार करने से किसी भी प्रकार की शंका नहीं रहती है। यदि कोई किसान भाई मेथी की बुवाई ताजा साग बेचने के लिए करना चाहते हैं तो आपको प्रत्येक 8-10 दिन के अंतर से बुवाई करते रहना होगा। मैदानी इलाके में यह बुवाई सितम्बर से लेकर नवम्बर तक की जा सकती है। इसके बाद बीजों के लिए नवम्बर के अंत में बुवाई करके  छोड़ देंगे तो आपको अच्छी पैदावार मिल जायेगी।

खाद व रासायनिक उपचार का प्रबंधन

मेथी की खेती में खाद और बूस्टर रासायनिक का प्रबंधन बहुत ही लाभकारी होता है। किसान भाई जितना अच्छा इन का प्रबंधन कर लेंगे उतनी ही अच्छी पैदावार ले सकेंगे। इसके लिये समय-समय पर आवश्यक उर्वरकों को सही मात्रा में डालना होगा। साथ ही समय-समय पर बूस्टर रासायनिक डोज भी देनी होगी। इससे तेजी से फसल बढ़ती है। बुवाई करने के समय एक एकड़ में 12 किलो यूरिया, 8 किलो पोटेशियम, 50 किलो सुपर फास्फेड और 5 किलो नाइट्रोजन मिलाकर डालनी चाहिये। पौधों में तेजी से बढ़वार देने के लिए 10 दिनों के बाद ही ट्राइकोटानॉल हारमोन को पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिये। इसके दस दिन बाद एनपीके का समान मिश्रण करके छिड़काव करने से जल्द ही फसल तैयार हो जाती है। अच्छी फसल के लिए डेढ़ महीने के बाद ब्रासीनोलाइड को पानी मिलाकर घोल का छिड़काव करना चाहिये। इसके दस दिन बाद दुबारा इसी तरह के घोल का छिड़काव करने से फसल तेजी से बढ़ती है। पाला व कोहरे से बचाने के लिएथाइयूरिया का छिड़काव करें।

सिंचाई प्रबंधन

मेथी की खेती में सिंचाई का प्रबंध करना भी जरूरी होता है। समय-समय पर सिंचाई करने से साग का स्तर काफी अच्छा होता है वरना पौधे कड़े हो जाते हैं फिर उनकी भाजी बेचने योग्य नहीं रह जाती है। बिजाई से पहले ही सिंचाई करनी चाहिये। हल्की नमी के समय ही बिजाई करनी चाहिये ताकि उनका अंकुरन जल्दी हो सके। बिजाई के एक माह बाद सिंचाई करनी चाहिये। उसके बाद मिट्टी के पीएच मान के अनुसार दो महीने के आसपास सिंचाई करनी चाहिये। इसके बाद तीन महीने और चौथे महीने में सिंचाई करनी चाहिये। साग वाली मेथी की खेती में सिंचाई जल्दी-जल्दी करनी चाहिये। इसके अलावा जब पौधे मेंं फूल के बाद फली आने लगती है तब सिंचाई पर विशेष ध्यान देना होता है। क्योंकि पानी की कमी से पैदावार पर काफी असर पड़ सकता है।

खरपतवार नियंत्रण कैसे करें

किसान भाइयों किसी भी फसल के लिए खरपतवार का नियंत्रण करना अति आवश्यक होता है। मेथी की खेती में खरपतवार के नियंत्रण के लिए दो बार गुड़ाई-निराई करनी होती है। पहली गुड़ाई-निराई एक महीने के बाद और दूसरे महीने के बाद दूसरी गुड़ाई निराई की जानी चाहिये। इसके साथ ही खरपतवार के कीट यानी नदीनों की रोकथाम के लिए फ्लूक्लोरालिन, पैंडीमैथालिन का छिड़काव बिजाई एक दो दिनों बाद ही करना चाहये। जब पौधा दस सेंटीमीटर का हो जाये तो उसको बिखरने से रोकने के लिए बांध दें। ताकि छोटी झाड़ी बन सके और अधिक पत्तियां दे सके।

मेथी की उन्नत व लाभकारी किस्में

मेथी की खेती के लिए वैज्ञानिकों ने जलवायु और मिट्टी के अनुसार अनेक उन्नत किस्में तैयार कीं हैं। किसान भाइयों को चाहिये कि वो अपने क्षेत्र की मृदा व जलवायु के हिसाब से किस्मों को छांट कर खेती करेंगे तो अधिक लाभ होगा। इन उन्नत किस्मों में कुछ इस प्रकार हैं:-
  • कसूरी मेथी: इस किस्म के पौधे की पत्तियां छोटी और हंसिये की तरह होतीं हैं। इस किस्म के पौधे से पत्तियों की 2 से 3 बार कटाई की जा सकती है। इस किस्म की फसल देर से पकती है। इसकी महक अन्य मेथी से अलग और अच्छी होती है। इसकी औसत फसल 60 से 70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।
  • पूसा अर्ली बंचिंग: मेथी की यह किस्म जल्दी तैयार होने वाली किस्म है। इसकी भी दो-तीन बार कटाई की जा सकती है। इसकी फलियां आठ सेंटीमीटर तक लम्बी होतीं हैं। इसकी फसल चार महीने में पक कर तैयार हो जाती है।
  • लाम सिलेक्शन: भारत के दक्षिणी राज्यों के मौसम के अनुकूल यह किस्म खोजी गयी है। इसका पौधा झाड़ीदार होता है। साग और बीज के अच्छे उत्पादन के लिये यह अच्छी किस्म है।
  • कश्मीरी मेथी: पहाड़ी क्षेत्रों के लिए खोजी गयी इस नस्ल की मेथी के पौधे की खास बात यह है कि यह सर्दी को अधिक बर्दाश्त कर लेता है। इसके फूल सफेद रंग के होते हैं। इसकी फसल पकने में थोड़ा अधिक समय लगता है।
  • हिसार सुवर्णा, हिसार माधवी और हिसार सोनाली: जैसे नाम से ही मालूम होता है कि मेथी की इन किस्मों की खोज हरियाणा के हिसार कृषि विश्वविद्यालय के द्वारा की गयी है। इस किस्मों की खास बात यह है कि इनमें धब्बे वाला रोग नहीं लगता है। बीज व साग के लिए बहुत ही अच्छी किस्में हैं। राजस्थान और हरियाणा में इसकी खेती होती है, जहां किसानों को अच्छी पैदावार मिलती है।
बिना लागात लगाये जड़ी बूटियों से किसान कमा रहा है लाखों का मुनाफा

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खेती में नवीन तकनीकों को प्रयोग में लाने के अतिरिक्त किशोर राजपूत ने देसी धान की 200 किस्मों को विलुप्त होने से बचाव किया है, जिनको देखने आज भारत के विभिन्न क्षेत्रों से किसान व कृषि विशेषज्ञों का आना जाना लगा रहता है।

भारत में सुगमता से प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। खेती में होने वाले व्यय को कम करके बेहतर उत्पादन प्राप्त करने हेतु आज अधिकाँश किसानों द्वारा ये तरीका आजमा रहे हैं। 

लेकिन छत्तीसगढ़ के एक युवा किसान के माध्यम से वर्षों पूर्व ही प्राकृतिक खेती आरंभ कर दी थी। साथ ही, गौ आधारित खेती करके जड़ी-बूटियां व औषधीय फसलों की खेती की भी शुरूआत की थी। 

किशोर राजपूत नामक इस युवा किसान की पूरे भारतवर्ष में सराहनीय चर्चा हो रही है। शून्य बजट वाली इस खेती का ये नुस्खा इतना प्रशिद्ध हो चूका है, कि इसकी जानकारी लेने के लिए दूरस्थित किसानों का भी छत्तीसगढ़ राज्य के बेमेतरा जनपद की नगर पंचायत नवागढ़ में ताँता लगा हुआ है। 

अब बात करते हैं कम लागत में अच्छा उत्पादन देने वाली फसलों के नुस्खे का पता करने वाले युवा किसान किशोर राजपूत के बारे में।

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किशोर राजपूत को खेती किसानी करना कैसे आया

आमतौर पर अधिकाँश किसान पुत्र अपने पिता से ही खेती-किसानी के गुड़ सीखते हैं। यही बात किशोर राजपूत ने कही है, किशोर पिता को खेतों में अथक परिश्रम करते देखता था, जो उसके लिए एक प्रेरणा का स्त्रोत साबित हुआ। 

युवा का विद्यालय जाते समय रास्ते में पेड़-पौधों, पशु-पक्षी, हरियाली बहुत आकर्षित करती थी। किशोर ने कम आयु से ही खेतों की पगडंडियों पर मौजूद जड़ी-बूटियों के बारे में रुचि लेना और जानना शुरू कर दिया। 

बढ़ती आयु के दौरान किशोर किसी कारण से 12वीं की पढ़ाई छोड़ पगडंडियों की औषधियों के आधार पर वर्ष २००६ से २०१७ एक आयुर्वेदित दवा खाना चलाया। 

आज किशोर राजपूत ने औषधीय फसलों की खेती कर भारत के साथ साथ विदेशों में भी परचम लहराया है, इतना ही नहीं किशोर समाज कल्याण हेतु लोगों को मुफ्त में औषधीय पौधे भी देते हैं।

किशोर ने कितने रूपये की लागत से खेती शुरू की

वर्ष २०११ में स्वयं आधार एकड़ भूमि पर किशोर नामक किसान ने प्राकृतिक विधि के जरिये औषधीय खेती आरंभ की। इस समय किशोर राजपूत ने अपने खेत की मेड़ों पर कौच बीज, सर्पगंधा व सतावर को रोपा, जिसकी वजह से रिक्त पड़े स्थानों से भी थोड़ा बहुत धन अर्जित हो सके। 

उसके उपरांत बरसाती दिनों में स्वतः ही उत्पादित होने वाली वनस्पतियों को भी प्राप्त किया, साथ ही, सरपुंख, नागर, मोथा, आंवला एवं भृंगराज की ओर भी रुख बढ़ाया। 

देखते ही देखते ये औषधीय खेती भी अंतरवर्तीय खेती में तब्दील हो गई व खस, चिया, किनोवा, गेहूं, मेंथा, अश्वगंधा के साथ सरसों, धान में बच व ब्राह्मी, गन्ने के साथ मंडूकपर्णी, तुलसी, लेमनग्रास, मोरिंगा, चना इत्यादि की खेती करने लगे। 

प्रारंभिक समय में खेती के लिए काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ा, आरंभ में बेहतर उत्पादन न हो पाना, लेकिन समय के साथ उत्पादन में काफी वृद्धि हुई है।

मेंथा यानी मिंट की खेती से होता है तिगुना फायदा, लागत कम और मुनाफा ज्यादा

मेंथा यानी मिंट की खेती से होता है तिगुना फायदा, लागत कम और मुनाफा ज्यादा

मेंथा का उत्पादन भारत भर में की जाती है। परंतु, उत्तर प्रदेश में अधिकाँश किसान मेथा का उत्पादन करते हैं। सोनभद्र, फैजाबाद, बदायूं, बाराबंकी, रामपुर, पीलीभीत समेत बहुत से जनपदों में फिलहाल किसान बड़े स्तर पर मेंथा का उत्पादन कर रहे हैं। भारत समेत पूरे विश्व में हर्बल उत्पादों की मांग बढ़ गई है। फिलहाल छोटे से बड़े किसान तक हर्बल के उत्पादन की तरफ रुख किया जाता है। विशेष बात यह है, कि हर्बल उत्पादों का इस्तेमाल लोगों की जिंदगी में बढ़ने से बाजार में हर्बल उत्पादों की मांग में काफी वृध्दि देखने को मिली है। ऐसी स्थिति में अधिक माँग एवं अधिक भाव की वजह से किसान हर्बल खेती की दिशा में बढ़ रहे हैं। अंततः किसान हर्बल का उत्पादन क्यों ना करें, जब इस पर कम खर्च करके अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। वास्तविकता में हर्बल उत्पादों के अंदर औषधीय गुण विघमान होते हैं। बतादें कि इसका इस्तेमाल आयुर्वेदिक औषधियों एवं सौंदर्य उत्पादों को निर्मित करने के लिए किया जाता है। विशेष रूप से मेथा के तेल से सुगंधित इत्र और काफी महँगी औषधियां निर्मित की जाती हैं। अब ऐसी उपयोगिता वाली फसल का उत्पादन करके किसान कम लागत और कम समय में खूब पैसा कमा सकते हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार यह बताया गया है कि मेथा को कम लागत से ही उत्पादित किया जा सकता है। वहीं आय भी तीन गुना अधिक हो जाती है। इतना ही नहीं इसके उत्पादन से मृदा की उर्वरक क्षमता भी काफी बढ़ जाती है। इसकी वजह यह है कि इसमें बहुत सारे औषधीय तत्व शामिल होते हैं।

मेंथा यानी मिंट से एक एकड़ में उत्पादन करके कितनी आय की जा सकती है

अगर मेंथा की खेती से आमदनी की बात की जाए तो किसान भाईयों की 1 एकड़ भूमि पर उत्पादन करने पर 25 हजार रुपए का खर्च होता है। तो वहीं बाजार में मेंथा के तेल का भाव फिलहाल 1000 से 1500 रुपए किलो है। अगर एक हैक्टेयर में आप मेंथा की खेती करते हैं, तो आप लगभग डेढ़ लाख रुपए तक की आय अर्जित कर सकते हैं।

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भारत में मेंथा के तेल की पैदावार काफी मात्रा में होती है

वैसे तो मेंथा का उत्पादन पूरे भारत में किया जाता है। परंतु, उत्तर प्रदेश में मेंथा का उत्पादन करने वाले काफी किसान हैं। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र, फैजाबाद, पीलीभीत, बदायूं, बाराबंकी और रामपुर जनपद समेत विभिन्न जनपदों के किसान वर्तमान में बड़े रकबे में मेंथा का उत्पादन करते हैं। मुख्य बात यह है, कि लोग मेंथा को मिंट के नाम से भी जाना जाता है। मेंथा का इस्तेमाल आयुर्वेदिक औषधियों को बनाने के साथ साथ इसके तेल के माध्यम से सौंदर्य उत्पाद कैंडी व टूथपेस्ट भी निर्मित किया जाता है। भारत में सर्वाधिक मेंथा का उत्पादन किया जाता है।

मेंथा से 1 हैक्टेयर भूमि में 100 लीटर के करीब तेल की पैदावार ली जा सकती है

मेंथा का उत्पादन करने से पूर्व अच्छी तरह खेत की जुताई करके तैयार कर लिया जाना चाहिए। साथ ही, खेत में बेहतर सिंचाई की व्यवस्था करनी काफी आवश्यक है। इसकी वजह यह है, कि मेंथा की खेती के लिए काफी जल की आवश्यकता होती है। अगर हम इसकी तैयार होने की समयावधि के बारे में बात करें तो यदि समय से इसकी बुवाई की जाए तब किसान तीन माह में इससे पैदावार ले सकते हैं। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, मेंथा की बुवाई करने हेतु फरवरी से मध्य अप्रैल का माह सबसे उपयुक्त माना जाता है। साथ ही, जून के माह में इसकी फसल की कटाई की जा सकती है। मेंथा की फसल को धूप में सूखाने के उपरांत प्रोसेसिंग के माध्यम से इसका तेल निकाला जाता है। अगर इसके तेल के उत्पादन की बात की जाए तो 1 हैक्टेयर भूमि में इसकी खेती से 100 लीटर के करीब तेल प्राप्त किया जा सकता है।
इस हर्बल फसल की खेती करके कमाएं भारी मुनाफा, महज तीन महीने में रकम होगी 3 गुना

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इन दिनों दुनिया में हर्बल प्रोडक्ट्स की मांग तेजी से बढ़ती जा रही है। जिसको देखते हुए दुनिया भर के किसान हर्बल खेती की तरफ आकर्षित हो रहे हैं, क्योंकि मांग बढ़ने से हर्बल प्रोडक्ट्स ऊंचे दाम में बेंचे जा रहे हैं जिसका फायदा किसानों को भी हो रहा है। इसके अलावा हर्बल खेती में अन्य खेती के मुकाबले लागत भी बेहद कम लगती है साथ ही इस खेती में किसानों को मेहनत भी कम करनी होती है। इन कारणों से किसान भाई लगातार हर्बल खेती की तरफ प्रेरित हो रहे हैं। अगर हम हर्बल उत्पादों की बात करें तो ये उत्पाद अपने औषधीय गुणों के लिए जाने जाते हैं। इन उत्पादों का उपयोग ज्यादातर दवाइयां बनाने में किया जाता है। इसके साथ ही ब्यूटी प्रोडक्ट्स बनाने में भी इन उत्पादों का बड़े स्तर पर उपयोग किया जाता है। खास कर मेंथा का तेल इस मामले में बहुत प्रसिद्ध है, जिससे न केवल सुगंधित इत्र बल्कि इससे कई तरह की दवाइयां भी बनाई जाती हैं। यह बेहद कम लागत वाली खेती होती है, जिससे किसान भाई बहुत ही जल्दी अच्छी खासी कमाई कर सकते हैं। मेंथा की खेती में लागत से 3 गुना ज्यादा तक मुनाफा होता है। चूंकि यह एक औषधीय खेती है इसलिए इसकी खेती करने से खेत की उर्वरा शक्ति भी तेजी से बढ़ती है।

दुनिया में मेंथा के तेल का सबसे बड़ा उत्पादक देश है भारत

मेंथा का तेल का उत्पादन दुनिया में सबसे ज्यादा भारत में किया जाता है। मेंथा को भारत में मिंट के नाम से भी जानते हैं। इसका उत्पादन ज्यादातर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में किया जाता है। उत्तर प्रदेश में पीलीभीत, सोनभद्र, बदायूं, रामपुर, बाराबंकी और फैजाबाद जिले इसके उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं। जबकि मध्य प्रदेश में इसका उत्पादन छतरपुर, टीकमगढ़ और सागर जिले में किया जाता है। मेंथा का तेल की बिक्री हाथोंहाथ हो जाती है, क्योंकि दवाइयां निर्माता कंपनियां इस तेल को किसानों से सीधे खरीद ले जाती हैं।

एक एकड़ में होता है जबरदस्त उत्पादन

किसानों को मेंथा की खेती के पहले कई बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। जैसे खेत में सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए। क्योंकि इस खेती में पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। इसके साथ ही किसान भाई जिस खेत में मेंथा की खेती करना चाहते हैं उसे पहले अच्छे से जुताई करके तैयार कर लें। इसके बाद फरवरी से अप्रैल माह के बीच मेंथा कि बुवाई कर दें। यदि सही समय पर मेंथा की बुवाई की गई है तो फसल तीन माह में तैयार हो जाएगी। जून माह में इस फसल की कटाई कर लें और कुछ दिनों तक सूखने के लिए इसे खेत पर ही छोड़ दें। धूप में अच्छी तरह से सूखने के बाद फसल को प्लांट पर भेजा जाता है जहां इसका तेल निकाला जाता है। मेंथा की खेती से किसान भाई एक एकड़ जमीन में लगभग 100 लीटर तेल प्राप्त कर सकते हैं। ये भी पढ़े: इस राज्य के किसान अब करेंगे औषधीय और सुगंधित पौधों की खेती अगर बाजार में मेंथा के तेल के भाव की बात करें तो यह 1,000 से 1,500  रुपये प्रति लीटर तक बिकता है। जबकि इस फसल को एक एकड़ में लगाने पर मात्र 25 हजार रुपये का खर्चा आता है। इस हिसाब से किसान भाई मात्र एक एकड़ में मेंथा की फसल लगाकर सवा लाख रुपये तक की कमाई बेहद आसानी से कर सकते हैं