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तोरई

तोरई की खेती से किसान कमा सकते है मुनाफा, जाने तोरई की उन्नत किस्में

तोरई की खेती से किसान कमा सकते है मुनाफा, जाने तोरई की उन्नत किस्में

तोरई वर्षा ऋतू में होने वाली सब्जी है। तोरई को तुराई और तोरी के नाम से जाना जाता है। यह फाइबर और विटामिन से भरपूर सब्जी है। तोरई के पत्ते मध्यम आकार के होते है, इन पत्तों का रंग हल्का हरा होता है। 

तोरई दिखने में लम्बी, पतली और कोमल होती है, साथ ही इसके अंदर का हिस्सा और बीज हल्के क्रीमी रंग के होते है। तुरई में स्वाभाविक रूप से कम कैलोरी पायी जाती है। 

तुरई का इंग्लिश नाम जुकीनी है, इसकी तासीर ठंडी होती है। साथ ही तुरई में आयरन , प्रोटीन और कैल्शियम जैसे कई पोषक तत्व पाए जाते है। साथ ही तुरई में बहुत से बायोएक्टिव कॉम्पोनेन्ट भी पाए जाते है। 

तुरई उभरी हुई त्वचा और लम्बी , बेलनाकार सब्जी है। तुरई की खेती मुख्य रूप से नगदी फसल के रूप में की जाती है। तुरई पर आने वाले फूल पीले रंग के होते है ,इन्ही पुष्पों पर तुरई लगती है जिसका उपयोग सब्जी बनाने के लिए किया जाता है। 

तुरई की खेती कब की जाती है ?

तुरई की खेती किसानों द्वारा जून से जुलाई के माह में की जाती है। इसकी फसल को पकने में 70 -80 दिन का समय लगता है। तुरई की खेती ज्यादातर वर्षा ऋतू में की जाती है। इसकी अच्छी उपज के लिए खेत में नमी होना जरूरी है। 

तुरई की उन्नत किस्में 

तुरई की कई किस्में ऐसी है , जिनका उत्पादन कर किसान ज्यादा मुनाफा कमा सकता है। तुरई की किस्मों का पकने का समय अलग अलग है। तुरई की उन्नत किस्में कुछ इस प्रकार है : को, -1 (co,-1 ), (पी के एम 1 ), घीया तोरई, पूसा नसदार, पूसा चिकनी, पंजाब सदाबहार और और सरपुतिया तुरई की उन्नत किस्में है। 

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तुरई की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु और भूमि 

तुरई की खेती सभी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन भूमि अच्छी जल निकास वाली होनी चाहिए। लेकिन इसकी अधिक पैदावार के लिए दोमट मिट्टी को उपयुक्त माना जाता है। 

नदियों के किनारे पायी जाने वाली अम्लीय मिट्टी में भी इसका उत्पादन किया जा सकता है। तोरई के विकास के लिए आद्र और शुष्क जलवायु की जरुरत रहती है। भारत में तुरई की खेती खरीफ और जायद के सीजन में की जाती है। 

इसके पौधे को शुरुआत में वर्षा की जरुरत रहती है, लेकिन अधिक वर्षा भी तुरई की फसल को खराब कर सकती है। तुरई के पौधो को अंकुरित होने के लिए सामान्य तापमान की जरुरत रहती है, गर्मियों में तुरई का पौधा अधिकतम 35 डिग्री तापमान को भी सहन करने की क्षमता रखता है। 

बुवाई के लिए बीज की मात्रा और बीज उपचार 

तुरई की बुवाई के लिए पहले खेत की जुताई करे उसके बाद जब मिट्टी का रंग भुरभुरा हो जाये तो उसमे बुवाई का काम प्रारंभ करें। प्रति हेक्टेयर में 3 से 5 किलोग्राम बीज की आवश्यकता पड़ती है। 

ग्रीष्म काल में तुरई की बुवाई के लिए जनवरी से मार्च का महीने बेहतर माना जाता है और यही खरीफ सीजन में बुवाई के लिए जून से जुलाई का महीना उपयुक्त माना जाता है। लेकिन बीज की बुवाई से पहले इसका उपचार कर लेना बेहतर है।

बीज उपचार के लिए थीरम की 3 ग्राम मात्रा को तुरई के प्रति किलोग्राम बीज में अच्छे से उपचारित कर ले। ऐसा करने से तुरई की फसल में लगने वाले फफूँदी रोग से बचाया जा सकता है।

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तुरई की खेती के लिए खाद और उर्वरक 

तुरई की अच्छी पैदावार के लिए किसान गोबर की खाद का उपयोग कर सकते हैं, जुताई के 15 -20 दिन पहले खेत में 200 -250 क्विंटल खाद को डाल दे। आख़िरी जुताई करते वक्त ध्यान रहे खाद को अच्छे से खेत में मिला दे। 

साथ ही अधिक पैदावार के लिए किसान पोटाश (80  kg ),फास्फोरस (100 kg ) और नाइट्रोजन (120 kg ) का भी उपयोग कर सकते है। इसकी आधी मात्रा का उपयोग बुवाई के वक्त और आधी मात्रा का उपयोग बुवाई के एक महीने बाद कर सकते है। 

कैसे करें सिंचाई प्रबंधन ?

वर्षा ऋतू में तोरई की फसल को ज्यादा पानी की जरुरत नहीं रहती है , क्योंकि समय समय पर बारिश फसल में पानी की कमी को पूरा करती रहती है। लेकिन गर्मियों के मौसम में फसल को पानी की ज्यादा जरुरत रहती है, इसीलिए खेत में 7 से 8 दिन के बाद सिंचाई करनी चाहिए। ताकि गर्मी की वजह से खेत में सूखा न पड़े और उसका प्रभाव फसल पर न पड़े।

तुरई की फसल में खरपतवार जैसी समस्याएं भी देखने को मिलती है साथ ही बहुत से रोग और कीटों का भी प्रकोप फसल में देखने को मिलता है। इन सभी को नियंत्रित करने के लिए किसान फसल चक्र को भी अपना सकता है। 

साथ ही तुरई की खेती में खरपतवार को रोकने के लिए नराई और गुड़ाई का भी काम किया जा सकता है। इसके अलावा किसानों द्वारा कीटनाशक दवाइयों का भी उपयोग किया जा सकता है। 

तोरई की खेती में भरपूर पैसा

तोरई की खेती में भरपूर पैसा

तोरई को कद्दू वर्गीय खेती माना जाता है। तोरई की खेती कैसे करते हैं यह जानने के लिए इससे जुड़ी कुछ तकनीकों की जानकारी होना आवश्यक है। इ्सकी खेती से अच्छा पैसा प्राप्त करने के लिए लो-टनल तकनीक एक खास तकनीक है।

इस तकनीक में एक पॉलीथिन की झोंपड़ी बनाई जाती है और इसमें समय से पूर्व पौध तैयार की जाती है। इस पौध को फसल के लिए उपयुक्त तापमान मिलने पर खेत में रोप दिया जाता है। 

यह नगदी फसल है और बाजार में इसकी कीमतें बहुत ज्यादा न गिरने से किसानों को इसकी खेती से नुकसान नहीं होता। तोरई उचित जल निकासी वाली मिट्टी, मीठा पानी और गर्म जलवायु में अच्छा उत्पादन देती है। 

शुष्क और आद्र मौसम में इससे अच्छा उत्पादन मिलता है। अच्छे उत्पादन के लिए सब्जी वाली फसलों में कम्पोस्ट खाद का प्रयोग करना बेहद आवश्यक है।

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तोरई की खेती कब करें

इसकी अगेती खेती के लिए किसान लो टनल पॉलीहाउस में बीजारोपण करने की तैयारी कर रहे हैं ताकि यहां नियंत्रित तापमान में पौध तैयार की जा सके। समय से बिजाई का उपयुक्त समय  जनबरी के बाद आता है। कद्दू वर्गीय किसी फसल को लगाने के लिए फरबरी में ही उपयुक्त तापमान आता है। 

तोरई की खेती करने का तरीका

कुछ लोग लो-टनल में पौध तैयार करके उन्हें जनवरी के अंत या फरवरी के प्रारंभ में खेत में रोपते हैं। दूसरा तरीका मल्चिंग का है। इस तकनीक में बीज जमीन में समय से पूर्व ही लगा दिए जाते हैं। 

इन्हें पॉलीथिन सीट से ढ़क दिया जाात है। बाद में अंकुरण होने और बढ़बार शुरू होने तक ढँक कर रखा जाता है। पॉलीथिन सीट तब हटाई जाती है जबकि मौसम सामान्य हो जाए। 

तोरई के लिए कैसी मिट्टी चाहिए

यह नगदी फसल है और बाजार में इसकी कीमतें बहुत ज्यादा न गिरने से किसानों को इसकी खेती से नुकसान नहीं होता । तोरई उचित जल निकासी वाली मिट्टी, मीठा पानी और गर्म जलवायु में अच्छा उत्पादन देती है। 

शुष्क और आद्र मौसम में इससे अच्छा उत्पादन मिलता है। अच्छे उत्पादन के लिए सब्जी वाली फसलों में कम्पोस्ट खाद का प्रयोग करना बेहद आवश्यक है। 

उन्न्त किस्मों का चयन

तोरई की अनेक उन्नत किस्में हैंं। सस्ते बीज सरकारी संस्थानों में मिलते हैं। प्राईवेट कंपनियों के अनेक हाइब्रिड बाजार में मौजूद हैं। घिया तोरई, पूसा नसदार किस्म जिसे कुछ इलाकों में खर्रा भी कहा जाता है दिल्ली जैसे महानगरों में पसंद की जाती है। 

इसे दूूसरे शहरों तक पहुंचाने में फल कम घिसते हैं। सरपुतिया, पंजाब सदाबहार, पी के एम 1, कोयम्बूर 2 आदि अनेक किस्में हैं। इनसे 70 से 80 दिन में फल मिलने शुरू हो जाते हैं। उपज 200 से 250 कुंतल प्रति हैक्टेयर मिलती है। 

बीजारोपण

खेत को अच्छे से तैयार करते हैं। सड़ी गोबर की खाद जोत में मिलाते हैं। इसके बीजों को खेत में उगाने से पहले थीरम या बाविस्टीन से उपचारित कर लेना चाहिए. ताकि पौधे को शुरुआत में होने वाले रोगों से बचाया जा सके। 

एक हेक्टेयर में इसकी रोपाई के लिए दो से तीन किलो बीज काफी होता है। खेत में तीन से चार मीटर की दूरी पर नाली बना लेते हैं। इनके किनारों पर बीज रोपकर पानी लगा देना चाहिए। 

पौधों की सिंचाई

तोरई के पौधों को सिंचाई की जरूरत बीजों के अंकुरित होने और पौधों पर फल बनने के दौरान अधिक होती है। इस दौरान पौधों की तीन या चार दिन के अंतराल में हल्की हल्की सिंचाई करते रहना चाहिए। 

खेत में 100 किलोग्राम एनपीके आखिरी जुताई मेेें मिलाने और गोबर की खाद डालने के बाद किसी खाद की जरूरत नहीं होती। फसल विकास के समय बेहद हल्का यूरिया डालना चाहिए। खरपतवार नियंत्रण के लिए निराई गुडाई करते रहें। 

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लालड़ी

कीट के प्रभाव से फसल को बचाने लिए अंकुरण के बाद ही पौधों पर नीम का तेल पानी के साथ मिलाकर छिडक देना चाहिए।

फल मक्खी

इसके नियंत्रण के ​लिए जैविक उपचार के तौर पर नीम तेल या क्लोरोपायरीफास जैसे हल्के कीटनाशक का प्रयोग करें।

चूर्णी फफूंदी

इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर कार्बेन्डाजिम या एन्थ्रेक्नोज की उचित मात्रा का छिडकाव पौधों पर करना चाहिए।

पत्ती धब्बा

इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर मन्कोजेब या जिनेब की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए।

जड़ सड़न

इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों की जड़ों में बाविस्टीन या मेन्कोजेब की उचित मात्रा को पानी में मिलाकर पौधों पर छिड़कना चाहिए।

कम लागत और कम समयावधि में तैयार होने वाली तोरई की किस्में

कम लागत और कम समयावधि में तैयार होने वाली तोरई की किस्में

आज हम इस लेख के अंदर आपको तोरई की कुछ उन्नत किस्मों के विषय में जानकारी देंगे। तोरई की उन्नत किस्मों के अंतर्गत घिया तोरई, पूसा नसदार, सरपुतिया, को.-1 (Co.-1), पी के एम 1 (PKM 1) आदि प्रमुख फसल हैं। इनकी खेती करने पर किसान भाइयों को काफी बेहतरीन पैदावार हांसिल होती है। जैसा कि हम सब जानते हैं, कि कोई भी फसल के उत्पादन से अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए उसकी अच्छी किस्मों की जानकारी होनी चाहिए। जिससे कि उत्पादन के साथ–साथ ज्यादा मुनाफा भी हांसिल हो सके। इसी कड़ी में आज हम आपको तोरई की कुछ उन्नत प्रजतियों की जानकारी देने जा रहे हैं। तोरई की उन्नत किस्मों में घिया तोरई, पूसा नसदार, सरपुतिया, को.-1 (Co.-1), पी के एम 1 (PKM 1) इत्यादि प्रमुख हैं। इनकी बुवाई कर किसानों को काफी अच्छी पैदावार हांसिल होती है। इसके साथ-साथ मुनाफा भी खूब होता है। किसान इन तोरई की किस्मों के माध्यम से अच्छा खासा मुनाफा कमा सकते हैं। इसकी वजह यह है, कि इनके उत्पादन के मुताबिक लागत अन्य बीजों की तुलना में कम होती है। इसके साथ ही यह कम समयावधि में तैयार हो जाती हैं।

कम लागत और समयावधि में तैयार होने वाली तोरई की किस्में

को.-1 (Co.-1)

बतादें, कि इस किस्म को तमिलनाडु के कृषि वैज्ञानिकों द्वारा तैयार किया गया है। इस किस्म के फल का आकार 60 – 75 से.मी. लम्बा होता है। इसके अतिरिक्त लम्बे, मोटे, हल्के, हरे रंग का होता है। इस किस्म की पैदावार क्षमता 140-150 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। पहली तुड़ाई बुवाई के 55 दिनों के उपरांत की जा सकती है।

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पी के एम 1 (PKM 1)

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि इस किस्म के फल देखने में गहरे हरे रंग के होते हैं। इसके साथ ही फल दिखने में पतला, लम्बा, धारीदार एवं हल्का सा मुड़ा हुआ होता है। इससे 280-300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन मिल सकता है।

घिया तोरई

तोरई की इस किस्म के फल का रंग हरा होता है। भारत में इस प्रजाति की खेती सामान्य तौर पर ज्यादा की जाती है। इस किस्म के अगर फलों की बात की जाए, तो इसके फल का छिलका काफी पतला होता है। तोरई की इस किस्म में विटामिन की मात्रा ज्यादा पायी जाती है।

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पूसा नसदार

तोरई की पूसा नासदार किस्म का फल हल्का हरा होता है। इसकी ऊपरी सतह पर उभरी नसों की आकृति होती है। इस किस्म का गूदा सफेद और हरा होता है। इसके साथ ही फल की लंबाई 12-20 सेमी. तक होती है। इस किस्म की विशेषता यह है, कि इसकी उत्पादन क्षमता 150-160 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है।

सरपुतिया

तोरई की सरपुतिया किस्म के फल पौधों पर गुच्छों में लगते हैं। वहीं अगर इनके आकार की बात करें तो यह छोटा दिखाई देता है। साथ ही, इस प्रजाति के फलों पर भी उभरी हुई धारियां बनी होती है। इसके फलों का बाहरी छिलका मोटा और मजबूत होता है। इस किस्म की तोरई मैदानी इलाकों में ज्यादा उगाई जाती हैं।
ग्रीष्मकालीन तोरई की खेती किसानों को कम समय में अच्छा लाभ दिला सकती है

ग्रीष्मकालीन तोरई की खेती किसानों को कम समय में अच्छा लाभ दिला सकती है

किसान भाई तोरई की खेती कर अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। महाराष्ट्र में किसान इसकी बड़े स्तर पर खेती करते हैं। तोरई की बाजारों में सदैव मांग बनी रहती है। यह एक बेल वाली कद्दूवर्गीय सब्जी है, जिसको बड़े खेतों के अतिरिक्त छोटी गृह वाटिका में भी उगाया जा सकता है। 

तोरई की खेती को कद्दूवर्गीय फसलों में शुमार किया जाता है, जो कि अत्यंत फायदेमंद खेती मानी जाती है। तोरई की खेती को व्यावसायिक फसल भी कहा जाता है। 

किसान भाई यदि इसकी वैज्ञानिक तरीके से खेती करें तो इसकी फसल से उनको अच्छी उपज हांसिल हो सकती है। परिणामस्वरूप आमदनी भी शानदार प्राप्त की जा सकती हैं। तोरई की खेती भारतभर में की जाती है। वहीं, महाराष्ट्र में 1147 हेक्टेयर क्षेत्र में इसकी खेती की जाती हैं। 

इसकी खेती ग्रीष्म और वर्षा खरीफ दोनों ऋतुओं में की जाती हैं। इसकी खेती को नगदी के रूप में व्यावसायिक फसल के रूप में किया जाता है। 

तोरई की सब्जी की भारत में छोटे कस्बों से लेकर बड़े शहरों में खूब मांग है। क्योंकि यह अनेक प्रोटीनों के साथ खाने में भी स्वादिष्ट होती है। इस सब्जी की बाजारो में हमेशा मांग रहती है। 

तोरई की खेती के लिए मौसम और भूमि कैसी होनी चाहिए ?

किसान तोरई की खेती मानसून और गर्मी दोनों सीजन में खेती कर सकते हैं। तोरई को ठंड के समय में भी ज्यादा उगाया जाता है। तोरई की रोपण उचित जल निकासी वाली भारी मध्यम मृदा में किया जाना चाहिए। 

तोरई की शानदार फसल के लिए कार्बनिक पदार्थो से युक्त उपजाऊ मध्यम और भारी मृदा उपयुक्त मानी जाती है, जिसमें जल निकासी की भी बेहतर व्यवस्था होनी चाहिए। 

तोरई की 2 उन्नत किस्म

पूसा नस्दार : इस किस्म के फल एक जैसे लंबे एवं हरे रंग के होते हैं। यह किस्म 60 दिनों के पश्चात फूलती है। प्रत्येक बेल में 15 से 20 फल लगते हैं। 

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Co-1: यह एक हल्की किस्म है और फल 60 से 75 सेमी लंबे होते हैं। प्रत्येक बेल 4 से 5 किलो फल उत्पादक होती है।

तोरई के लिए खाद एवं उर्वरक प्रबंधन  

तोरई की खेती करने से पूर्व मृदा एवं जल का परीक्षण कृषकों को अवश्य कर लेना चाहिए। मृदा परीक्षण से खेत में पोषक तत्वों की कमी की जानकारी मिलती है। किसान परीक्षण रिपोर्ट के हिसाब से खाद और उर्वरक का इस्तेमाल कर बेहतर उपज हांसिल कर सकते हैं। 

रोपण के दौरान 20 किग्रा एन/हे 30 किग्रा पी एवं 30 किग्रा के प्रति हेक्टेयर डालें तथा 20 किग्रा एन की दूसरी खुराक फूल आने के समय डालें। साथ ही, 20 से 30 किलो एन प्रति हेक्टेयर, 25 किलो पी और 25 किलो के रोपण के समय डालें। 25 से 30 किग्रा एन की दूसरी किश्त 1 माह के बाद देनी होगी। 

तोरई की फसल को कीटों से बचाने का क्या उपाय है ? 

तोरई की फसल विशेष तोर पर केवड़ा और भूरी रोगों से प्रभावित होती हैं। तोरई फसल को रोगों से बचाने और बेहतरीन उपज पाने के लिए लिए इसके बीजों को बुवाई से पहले थाइरम नामक फंफूदनाशक 2 ग्राम दवा प्रति किलोग्राम बीज दर से उपचारित करना चाहिए। 

1 लीटर पानी का छिड़काव करें और केवड़ा के नियंत्रण के लिए डायथीन जेड 78 हेक्टेयर में 10 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी का छिड़काव करें।

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इसे प्रकृति का मानसून ऑफर समझिये और अपने घर, बगिया, खेत में लगाएं मानसून की वो फसल साग-सब्जी, जिनसे न केवल घरेलू खर्च में हो कटौती, बल्कि खेत में लगाने से सुनिश्चित हो सके आय में बढ़ोतरी। लेकिन यह जान लीजिये, ऐसा सिर्फ सही समय पर सही निर्णय, चुनाव और कुशल मेहनत से संभव है। घर की रसोई, छत की बात करें, इससे पहले जान लेते हैं मानसून की फसल यानी खरीफ क्रॉप में मुख्य फसलों के बारे में। खरीफ की यदि कोई मुख्य फसल है तो वह है धान

धान के उन्नत परंपरागत बीज मुफ्त प्रदान करने वाले केंद्र के बारे में जानिये

(Paddy Farming: किसानों को इस फार्म से मुफ्त में मिलते हैं पांरपरिक धान के दुर्लभ बीज) जबलपुर निवासी, अनुभवी एवं प्रगतिशील युवा किसान ऋषिकेश मिश्रा बताते हैं कि, बारिश के सीजन में धान की रोपाई के लिए अनुकूल समय, बीज, रोपण के तरीके के साथ ही सिंचन के विकल्पों का होना जरूरी है।

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धान (dhaan) के लिए जरूरी टिप्स (Tips for Paddy)

खरीफ क्रॉप टिप्स (Kharif Crop Tips) की बात करें, तो वे बताते हैं कि शुरुआत में ही सारी जानकारी जुटा लें, जैसे खेत में ट्रैक्टर, नलकूप आदि के साथ ही कटाई आदि के लिए पूर्व से मजदूरों को जुटाना, लाभ हासिल करने का बेहतर तरीका है। समय पर डीएपी, यूरिया, सुपर फास्फेट, जिंक, पोटास आदि का प्रयोग लाभ कारी है। धान की प्रजाति की किस्म का चुनाव भी बहुत सावधानी से करना चाहिए।

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खरीफ कटाई का वक्त

जून-जुलाई में बोने के बाद, अक्टूबर के आसपास काटी जाने वाली फसलें खरीफ सीजन की फसलें कही जाती हैं। जिनको बोते समय अधिक तापमान और आर्द्रता के अलावा परिपक़्व होने, यानी पकते समय शुष्क वातावरण की जरूरत होती है।

घर और खेत के लिए सब्जियों के विकल्प

खरीफ की प्रमुख सब्जियों की बात करें तो भिंडी, टिंडा, तोरई/गिलकी, करेला, खीरा, लौकी, कद्दू, ग्वार फली, चौला फली के साथ ही घीया इसमें शामिल हैं। इन बेलदार सब्जियों के पौधे घर की रसोई, दीवार से लेकर छत पर लगाकर महंगी सब्जियां खरीदने के खर्च में कटौती करने के साथ ही सेहत का ख्याल रखा जा सकता है।

ये भी पढ़ें: बारिश में लगाएंगे यह सब्जियां तो होगा तगड़ा उत्पादन, मिलेगा दमदार मुनाफा वहीं किसान खेत के छोटे हिस्से में भिंडी, तोरई, कद्दू, करेला, खीरा, लौकी, के साथ ही फलीदार सब्जियों जैसे ग्वार फली लगाकर एक से सवा माह की इन सब्जियों से बेहतर रिटर्न हासिल कर सकते हैं।

साग-सब्जी टिप्स

घर में पानी की बोतल, छोटे मिट्टी, प्लास्टिक, धातु के बर्तनों में मिट्टी के जरिये जहां इन सब्जियों की बेलों को आकार दिया जा सकता है, वहीं खेत में मिश्रित खेती के तरीके से थोड़े, थोड़े अंतर पर रसोई के लिए अनिवार्य धनिया, अदरक जैसी जरूरी चीजें भी उगा सकते हैं। घरेलू उपयोग का धनिया तो इन दिनों घरों में भी लगाना एक तरह से नया ट्रेंड बनता जा रहा है।
अब एक ही पौधे पर लगेंगी दो तरह की सब्जियां, पढ़िए पूरी खबर

अब एक ही पौधे पर लगेंगी दो तरह की सब्जियां, पढ़िए पूरी खबर

वाराणसी। जी हां, अब एक ही पौधे पर दो तरह की सब्जियां लगेंगी, वैज्ञानिकों ने इस तकनीकी को खोज निकाला है। यूपी के वाराणसी स्थित भारतीय सब्जी अनुसंधान (आईआईवीआर) के वैज्ञानिकों ने सब्जियों के लिए एक नई तकनीकी से ऐसी पौध का अविष्कार किया है, जो एक ही पौधे पर दो तरह की सब्जी उगाएगा।

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घर की रसोई का शौक बढ़ाने वाला वैज्ञानिकों का यह प्रयोग लोगों को काफी उत्साहित करने वाला है। दावा है कि इस पौधे को घर की बालकनी, घर की छतों पर , बगीचों आदि स्थानों पर लगाया जा सकता है। वैज्ञानिकों ने अपनी इस नई तकनीकी से ऐसे पौधे विकसित किए हैं, जिसमें टमाटर, बैंगन, आलू, मिर्च, खीरा, लोकी, तोरई व करेला उगाए जा सकेंगे। एक पौधे पर दो तरह की अलग-अलग सब्जियां उगाई जा सकती हैं।

पांच साल से चल रहा थी खोज

एक ही पौधे पर कई प्रकार की सब्जियां उगाने के लिए वाराणसी स्थित भारतीय सब्जी अनुसंधान केन्द्र में पिछले पांच वर्षों से शौध चल रहा था। फिलहाल वैज्ञानिकों ने एक ही पौधे पर ग्राफ्टिंग के जरिए दो तरह की सब्जियां उगाने वाली पौध का अविष्कार कर लिया है। अभी भी खोज जारी है।

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ग्राफ्टिंग तकनीकी से तैयार पौधों को मिला है ब्रिमेटो और पोमैटो नाम

भारतीय सब्जी अनुसंधान केन्द्र वाराणसी में ग्राफ्टिंग तकनीकी से तैयार किए गए पौधों को अलग नाम से जाना जाएगा। वैज्ञानिकों के अनुसार इस नई पौध को ब्रिमेटो (Brimato) और पोमैटो (Pomato) नाम से जाना जाएगा, जो काफी चर्चा बटोर रहे हैं।

किचन गार्डन या गमले में तैयार करें पौध

भारतीय सब्जी अनुसंधान केन्द्र वाराणसी के वैज्ञानिक डॉ. अंनत कुमार के अनुसार ग्राफ्टिंग तकनीकी से तैयार हुई इस पौध को किचन गार्डन या गमले में सही तरह तैयार करें। हर एक पोमैटो से 2 किग्रा टमाटर और 600 ग्राम आलू तैयार किया जा सकता है। एक ही पौधे पर मिट्टी के ऊपर टमाटर तो वहीं मिट्टी के निचले हिस्से में आलू तैयार होगा।

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कैसे तैयार करें पौधा

आलू के पौधे के मिट्टी के ऊपर कम से कम 6-7 इंच लंबा होने पर उसके ऊपर टमाटर के पौधे की ग्राफ्टिंग की जाएगी। ध्यान रहे दोनों ही पौधों के तने की मोटाई बराबर होनी चाहिए। करीब 20 दिन बाद दोनों के तने जुड़ जाएं तो उसे खेत में छोड़ दें। रोपाई के दो महीने बाद ही टमाटर की तोड़ाई शुरू हो जाएगी और बाद में आलू की खुदाई करें। [embed]https://www.youtube.com/watch?v=HUWu_jG-z_Q[/embed]
बढ़ती गर्मी ने सब्जी की कीमतों में लगाई आग, लोगों की रसोई का बजट खराब

बढ़ती गर्मी ने सब्जी की कीमतों में लगाई आग, लोगों की रसोई का बजट खराब

आजकल बढ़ते तापमान और गर्मी का प्रभाव बाजार में मंडियों में देखने को मिल रहा है। बतादें, कि सब्जियां 30 प्रतिशत तक महंगी हो चुकी हैं। जनता पूर्व में जहां कम खर्चे में अपने सब्जी के झोले को पूरा भर लाती थी। फिलहाल, कीमतों को देखते हुए आधा-पाव किलो ही सब्जी खरीदने पर सिमट गई है। भारत में तापमान में उछाल आने की वजह से गर्मी भी काफी बढ़ती जा रही है। अगर हम गर्मी की बात करें तो पारा 40 डिग्री सेल्सियस के समीप पहुंच चुका है। आगामी दिनों में गर्मी के और ज्यादा बढ़ने की संभावना है। दरअसल, इस गर्मी का प्रकोप सब्जियों की कीमतों पर भी देखने को मिल रहा है। इसी कड़ी में उत्तर की मंडी परिषद से जुड़े पदाधिकारियों ने बताया है, कि प्रति वर्ष गर्मी का प्रभाव सब्जियों की कीमतों पर पड़ता दिखाई दे रहा है। इस बार भी कुछ ऐसी स्थितियां होती जा रही हैं। गर्मी ज्यादा पड़ने पर आगामी दिनों में सब्जी काफी अधिक महंगी हो सकती है।

आखिर कितने प्रतिशत सब्जी की कीमत बढ़ी है

आजकल गर्मी ने अपना प्रभाव दिखाना चालू कर दिया है। जनता गर्मी से राहत पाने के लिए एसी, पंखा और कूलर आदि का सहारा ली रही है। साथ ही, बाजार में भी गर्मी का प्रभाव देखने को मिल रहा है। मीडिया खबरों के अनुसार, कोलकाता और उसके समीपवर्ती जनपदों में गर्मी की वजह से सब्जियां महंगी हो रही हैं। इसके चलते उत्तर प्रदेश में बुलंदशहर फल व सब्जी आढ़ती संघ के अध्यक्ष खुशी राम लोधी ने कहा है, कि कीमतों में 20 से 30 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है। अगर गर्मी और ज्यादा बढ़ती है तो निश्चित रूप से कीमत और ज्यादा बढ़ जाएंगी। कीमतों को नियंत्रण में लाने के लिए वर्षा होनी काफी आवश्यक है।

सब्जी के उत्पादन में कमी से कीमतों में इजाफा

सब्जी की कीमतों में वृद्धि की प्रमुख वजह सब्जियों की कम होना बताया जा रहा है। कृषि बाजार के विशेषज्ञों ने बताया है, कि गर्मी की वजह से सब्जी उत्पादकता में गिरावट आई है। जिस वजह से बाजार की मंडियों में काफी कम सब्जी पहुंच रही है। मीडिया खबरों के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में परगना जनपद में बनगांव के समीप गोपालनगर में बाजार विगत वर्ष इस अवधि में प्रति दिन औसतन 100-125 ट्रक परवल आ रही थी। परंतु, फिलहाल केवल 45 ट्रक आ रहे हैं। छोटे बाजारों की भी स्थिति बिगड़ गई है।

करेला, लौकी, तोरई, कद्दू की भी कीमतों में इजाफा

बाजार में समस्त सब्जियों की कीमत में काफी वृद्धि देखने को मिल रही है। रिटेल बाजार में वही सब्जी जो 20 से 50 रुपये प्रति किलो बिका करती थी। फिलहाल, वह 50 से 100 रुपये प्रति किलो तक पहुँच गई है। करेला 80 से 90 रुपये प्रति किलो, बैंग 60 से 70 रुपये प्रति किलो, कच्चा 50 से 60 रुपये प्रति किलो, कददू 40 से 50 रुपये किलो, लोकी 40 से 50 रुपये प्रति किलो, तोरई 60 से 70 रुपये प्रति किलो, परवल 80 से 90 रुपये प्रति किलोग्राम तक विक्रय किया जा रहा है।