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सावधान : बढ़ती गर्मी में इस तरह करें अपने पशुओं की देखभाल

सावधान : बढ़ती गर्मी में इस तरह करें अपने पशुओं की देखभाल

फिलहाल गर्मी के दिन शुरू हो गए हैं। आम जनता के साथ-साथ पशुओं को भी गर्मी प्रभावित करेगी। ऐसे में मवेशियों को भूख कम और प्यास ज्यादा लगती है। पशुपालक अपने मवेशियों को दिन में न्यूनतम तीन बार जल पिलाएं। 

जिससे कि उनके शरीर को गर्म तापमान को सहन करने में सहायता प्राप्त हो सके। इसके अतिरिक्त लू से संरक्षण हेतु पशुओं के जल में थोड़ी मात्रा में नमक और आटा मिला देना चाहिए। 

भारत के विभिन्न राज्यों में गर्मी परवान चढ़ रही है। इसमें महाराष्ट्र राज्य सहित बहुत से प्रदेशों में तापमान 40 डिग्री पर है। साथ ही, गर्म हवाओं की हालत देखने को मिल रही है। साथ ही, उत्तर भारत के अधिकांश प्रदेशों में तापमान 35 डिग्री तक हो गया है। 

इस मध्य मवेशियों को गर्म हवा लगने की आशंका रहती है। लू लगने की वजह से आम तौर पर पशुओं की त्वचा में सिकुड़न और उनकी दूध देने की क्षमता में गिरावट देखने को मिलती है। 

हालात यहां तक हो जाते हैं, कि इसके चलते पशुओं की मृत्यु तक हो जाने की बात सामने आती है। ऐसी भयावय स्थिति से पशुओं का संरक्षण करने के लिए उनकी बेहतर देखभाल करना अत्यंत आवश्यक है।

पशुओं को पानी पिलाते रहें

गर्मी के दिनों में मवेशियों को न्यूनतम 3 बार जल पिलाना काफी आवश्यक होता है। इसकी मुख्य वजह यह है, कि जल पिलाने से पशुओं के तापमान को एक पर्याप्त संतुलन में रखने में सहायता प्राप्त होती है। 

इसके अतिरिक्त मवेशियों को जल में थोड़ी मात्रा में नमक और आटा मिलाकर पिलाने से गर्म हवा लगने की आशंका काफी कम रहती है। 

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यदि आपके पशुओं को अधिक बुखार है और उनकी जीभ तक बाहर निकली दिख रही है। साथ ही, उनको सांस लेने में भी दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। उनके मुंह के समीप झाग निकलते दिखाई पड़ रहे हैं तब ऐसी हालत में पशु की शक्ति कम हो जाती है। 

विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसे हालात में अस्वस्थ पशुओं को सरसों का तेल पिलाना काफी लाभकारी साबित हो सकता है। सरसों के तेल में वसा की प्रचूर मात्रा पायी जाती है। जिसकी वजह से शारीरिक शक्ति बढ़ती है। विशेषज्ञों के अनुरूप गाय और भैंस के पैदा हुए बच्चों को सरसों का तेल पिलाया जा सकता है।

पशुओं को सरसों का तेल कितनी मात्रा में पिलाया जाना चाहिए

सीतापुर जनपद के पशुपालन वैज्ञानिक डॉ आनंद सिंह के अनुरूप, गर्मी एवं लू से पशुओं का संरक्षण करने के लिए काफी ऊर्जा की जरूरत होती है। ऐसी हालत में सरसों के तेल का सेवन कराना बेहद लाभकारी होता है। 

ऊर्जा मिलने से पशु तात्कालिक रूप से बेहतर महसूस करने लगते हैं। हालांकि, सरसों का तेल पशुओं को प्रतिदिन देना लाभकारी नहीं माना जाता है। 

डॉ आनंद सिंह के अनुसार, पशुओं को सरसों का तेल तभी पिलायें, जब वह बीमार हों अथवा ऊर्जा स्तर निम्न हो। इसके अतिरिक्त पशुओं को एक बार में 100 -200 ML से अधिक तेल नहीं पिलाना चाहिए। 

हालांकि, अगर आपकी भैंस या गायों के पेट में गैस बन गई है, तो उस परिस्थिति में आप अवश्य उन्हें 400 से 500 ML सरसों का तेल पिला सकते हैं। 

साथ ही, पशुओं के रहने का स्थान ऐसी जगह होना चाहिए जहां पर प्रदूषित हवा नहीं पहुँचती हो। पशुओं के निवास स्थान पर हवा के आवागमन के लिए रोशनदान अथवा खुला स्थान होना काफी जरुरी है।

पशुओं की खुराक पर जोर दें

गर्मी के मौसम में लू के चलते पशुओं में दूध देने की क्षमता कम हो जाती है। उनको इस बीच प्रचूर मात्रा में हरा एवं पौष्टिक चारा देना अत्यंत आवश्यक होता है। 

हरा चारा अधिक ऊर्जा प्रदान करता है। हरे चारे में 70-90 फीसद तक जल की मात्रा होती है। यह समयानुसार जल की आपूर्ति सुनिश्चित करती है। इससे पशुओं की दूध देने की क्षमता काफी बढ़ जाती है।

सर्दी में पाला, शीतलहर व ओलावृष्टि से ऐसे बचाएं गेहूं की फसल

सर्दी में पाला, शीतलहर व ओलावृष्टि से ऐसे बचाएं गेहूं की फसल

किसान भाइयों खेत में खड़ी फसल जब तक सुरक्षित घर न पहुंच जाये तब तक किसी प्रकार की आने वाले कुदरती आपदा से  दिल धड़कता रहता है। किसान भाइयों के लिए खेत में खड़ी फसल ही उनके प्राण के समान होते हैं। इन पर किसी तरह के संकट आने से किसान भाइयों की धड़कनें बढ़ जाती हैं। आजकल सर्दी भी बढ़ रही है। सर्दियों में शीतलहर और पाला भी कुदरती कहर ही है। कुदरती कहर के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है। ओलावृष्टि, सर्दी, शीतलहर, पाला व कम सर्दी आदि की मुसीबतों से किसान भाई किस तरह से बच सकते हैं। आईये जानते हैं कि वे कौन-कौन से उपाय करके किसान भाई अपनी फसल को बचा सकते हैं।

जनवरी में चलती है शीतलहर

उत्तरी राज्यों में जनवरी माह में शीतलहर चलती है, जिसके चलते फसलों में पाला लगने की संभावना बढ़ जाती है। शीतलहर और पाले से सभी तरह की फसलों को नुकसान होता है। इसके प्रभाव से पौधों की पत्तियां झुलस जातीं हैं, पौधे में आये फूल गिर जाते हैं। फलियों में दाने नहीं बन पाते हैं और जो नये दाने बने होते हैं, वे भी सिकुड़ जाते हैं। इससे किसान भाइयों को गेहूं की फसल का उत्पादन घट जाता है और उन्हें बहुत नुकसान होता है। यही वह उचित समय होता है जब किसान भाई फसल को बचा कर अपना उत्पादन बढ़ा सकते हैं क्योंकि जनवरी माह का महीना गेहूं की फसल में फूल और बालियां बनने का का समय होता है 

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कौन-कौन से नुकसान हो सकते हैं शीतलर व पाला से

किसान भाइयों गेहूं की फसल को शीतलहर व पाला से किस प्रकार के नुकसान हो सकते हैं, इस बारे में कृषि विशेषज्ञों ने जो जानकारी दी है, उनमें से होने वाले कुछ प्रमुख नुकसान इस प्रकार से हैं:-

  1. यदि खेत सूखा है और फसल कमजोर है तो सर्दियों में शीतलहर से सबसे अधिक नुकसान यह होता है कि पौधे बहुत जल्द ही सूख जाते हैं, पाला से इस प्रकार की फसल सबसे पहले झुलस जाती है।
  2. पाला पड़ने से पौधे ठुर्रिया जाते हैं यानी उनकी बढ़वार रुक जाती है। इस तरह से उनका उत्पादन काफी घट जाता है।
  3. शीतलहर या पाला से जिस क्षेत्र में तापमान पांच डिग्री सेल्सियश से नीचे जाता है तो वहां पर फसल का विकास रुक जाता है। वहां की फसल में दाने छोटे ही रह जाते हैं।
  4. शीतलहर से तापमान 2 डिग्री सेल्सियश से भी कम हो जाता है तो वहां के पौधे पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, पत्तियां टूट सकतीं है। ऐसी दशा में बड़ी बूंदे पड़ने या बहुत हल्की ओलावृष्टि से फसल पूरी तरह से चौपट हो सकती है।



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बचाव के लिए रासायनिक व अन्य उपाय करने चाहिये

फसलों को शीतलहर से बचाने के लिए किसान भाइयों को रासायनिक एवं अन्य उपाय करने चाहिये। यदि संभव हो तो शीतलहर रोकने के लिए टटिया बनाकर उस दिशा में लगाना चाहिये जिस ओर से शीतलहर आ रही हो। जब शीतलहर को रोकने में कामयाबी मिल जायेगी तो पाला अपने आप में कम हो जायेगा।

कौन-कौन सी सावधानियां बरतें किसान भाई

किसान भाइयों को शीतलहर व पाले से अपनी गेहूं की फसल को बचाव के इंतजाम करने चाहिये। इससे किसान का उत्पादन भी बढ़ेगा तो किसान भाइयों को काफी लाभ भी होगा।  किसान भाइयों को कौन-कौन सी सावधानियां बरतनी चाहिये, उनमें से कुछ खास इस प्रकार हैं:-

  1. कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार सर्दी के मौसम मे पाले से गेहूं की फसल को बचाने के लिए अनेक सावधानियां बरतनी पड़तीं हैं क्योंकि ज्यादा ठंड और पाले से झुलसा रोग की चपेट में फसल आ जाती है। मुलायम पत्ती वाली फसल के लिए पाला खतरनाक होता है। पाले के असर से गेहूं की पत्तियां पीली पड़ने लगतीं हैं। गेहूं की फसल को पाला से बचाने के लिए दिन में हल्की सिंचाई करें। खेत में ज्यादा पानी भरने से नुकसान हो सकता है।
  2. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार वर्तमान समय में कोहरा और पाला पड़ रहा है। पाले से बचाने के लिए गेहूं की फसल में सिंचाई के साथ दवा का छिड़काव करना होगा। गेहूं की फसल में मैंकोजेब 75 प्रतिशत या कापर आक्सी क्लोराइड 50 प्रतिशत छिड़काव करें।
  3. पाले से बचाव के लिए गेहूं की फसल में गंधक यानी डब्ल्यूजीपी सल्फर का छिड़काव करें। डस्ट सल्फर या थायो यूरिया का स्प्रे करें। इससे जहां पाला से बचाव होगा वहीं फसल की पैदावार बढ़ाने में भी सहायक होगा। डस्ट सल्फर के छिड़काव से जमीन व फसल का तापमान घटने से रुक जाता है और साथ ही यह पानी जमने नहीं देता है । किसान भाई डस्ट सल्फर का छिड़काव करते समय इस बात का पूरा ध्यान रखें कि छिड़काव पूरे पौधे पर होना चाहिये। छिड़काव का असर दो सप्ताह तक बना रहता है। यदि इस अवधि के बाद भी शीतलहर व पाले की संभावना हो तो 15-15 दिन के अन्तराल से यह छिड़काव करते रहें।
  4. गेहूं की फसल में पाले से बचाव के लिए गंधक का छिड़काव करने से सिर्फ पाले से ही बचाव नहीं होता है बल्कि उससे पौधों में आयरन की जैविक एवं रासायनिक सक्रियता बढ़ जाती है, जो पौधों में रोगविरोधी क्षमता बढ़ जाती है और फसल को जल्दी भी पकाने में मदद करती है।
  5. पाला के समय किसान भाई शाम के समय खेत की मेड़ पर धुआं करें और पाला लग जाये तो तुरंत यानी अगले दिन सुबह ग्लूकोन डी 10ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें। फायदा होगा।
  6. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सर्दी के मौसम में पानी का जमाव हो जाता है जिससे कोशिकाएं फट जातीं हैं और पौधे की पत्तियां सूख जाती हैं और नतीजा यह होता है कि फसलों को भारी नुकसान हो जाता है। पालों से पौधों के प्रभाव से पौधों की कोशिकाओं में जल संचार प्रभावित हो जाता है और पौधे सूख जाते जाते हैं जिससे उनमें रोग व कीट का प्रकोप बढ़ जाता है। पाले के प्रभाव से फूल नष्ट हो जाते हैं।
  7. किसान भाई पाले से बचाव के लिए दीर्घकालीन उपाय के रूप में अपने खेत की पश्चिमी और उत्तरी मेड़ों पर शीतलहर को रोकने वाले वृक्षों को लगायें। इन पौधों में शहतूत, शीशम, बबूल, नीम आदि शामिल हैं। इससे शीत लहर रुकेगी तो पाला भी कम लगेगा और फसल को कोई नुकसान नहीं होगा।

ओलावृष्टि से पूर्व बचाव के उपाय करें किसान भाई

जैसा कि आजकल मौसम का मिजाज खराब चल रहा है। आने वाले समय में ओलावृष्टि की भी संभावना व्यक्त की जा रही है। ऐसे में गेहूं की फसल को ओलावृष्टि बचाव के उपाय किसान भाइयों को करने चाहिये। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं:-

  1. कृषि विशेषज्ञों ने अपनी राय देते हुए बताया है कि यदि ओलावृष्टि की संभावना व्यक्त की जा रही हो तो किसान भाइयों को अपने खेतों में हल्की सिंचाई अवश्य करनी चाहिये जिससे फसल का तापमान कम न हो सके।
  2. बड़े किसान ओला से फसल को बचाने के लिए हेल नेट का प्रयोग कर सकते हैं जबकि छोटे किसानों के पास सिंचाई ही एकमात्र सहारा है।
  3. छोटे किसानों को कृषि विशेषज्ञों ने यह सलाह दी है कि हल्की सिंचाई के बाद 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से नाइट्रोजन का छिड़काव करना चाहिये। इससे पौधे मजबूत हो जाते हैं और वो ओलावृष्टि के बावजूद खड़े रहते हैं। इसके अलावा शीत लहर में भी पौधे गिरते नहीं है।
भेड़-बकरियों में होने वाले पीपीआर रोग की रोकथाम व उपचार इस प्रकार करें

भेड़-बकरियों में होने वाले पीपीआर रोग की रोकथाम व उपचार इस प्रकार करें

भेड़-बकरियों को विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ होती हैं, जिसमें से एक पीपीआर रोग भी शम्मिलित है। यह गंभीर बीमारी भेड़-बकरियों को पूर्णतय कमजोर कर देती है। परंतु, अगर आप शुरू से ही पीपीआर रोग का टीकाकरण एवं दवा का प्रयोग करें, तो भेड़-बकरियों को संरक्षित किया जा सकता है। साथ ही, इसकी रोकथाम भी की जा सकती है। बहुत सारे किसानों और पशुपालकों की आधे से ज्यादा भेड़-बकरियां अक्सर बीमार ही रहती हैं। अधिकांश तौर पर यह पाया गया है, कि इनमें पीपीआर (PPR) बीमारी ज्यादातर होती है। PPR को 'बकरियों में महामारी' अथवा 'बकरी प्लेग' के रूप में भी जाना जाता है। इसी वजह से इसमें मृत्यु दर सामान्य तौर पर 50 से 80 प्रतिशत होती है, जो कि बेहद ही गंभीर मामलों में 100 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। आज इस लेख के माध्यम से हम आपको बताऐंगे भेड़-बकरियों में होने वाली बीमारियों और उनकी रोकथाम के बारे में।

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आपको ज्ञात हो कि पीपीआर एक वायरल बीमारी है, जो पैरामाइक्सोवायरस (Paramyxovirus) की वजह से उत्पन्न होती है। विभिन्न अन्य घरेलू जानवर एवं जंगली जानवर भी इस बीमारी से संक्रमित होते रहते हैं। परंतु, भेड़ और बकरी इस बीमारी से सर्वाधिक संक्रमित होने वाले पशुओं में से एक हैं।

भेड़-बकरियों में इस रोग के होने पर क्या संकेत होते हैं

इस रोग के चलते भेड़-बकरियों में बुखार, दस्त, मुंह के छाले तथा निमोनिया हो जाता है, जिससे इनकी मृत्यु तक हो जाती है। एक अध्ययन के अनुसार भारत में बकरी पालन क्षेत्र में पीपीआर रोग से साढ़े दस हजार करोड़ रुपये की हानि होती है। PPR रोग विशेष रूप से कुपोषण और परजीवियों से पीड़ित मेमनों, भेड़ों एवं बकरियों में बेहद गंभीर और घातक सिद्ध होता है। इससे इनके मुंह से ज्यादातर दुर्गंध आना एवं होठों में सूजन आनी चालू हो जाती है। आंखें और नाक चिपचिपे अथवा पुटीय स्राव से ढक जाते हैं। आंखें खोलने और सांस लेने में भी काफी कठिनाई होती है।

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 कुछ जानवरों को गंभीर दस्त तो कभी-कभी खूनी दस्त भी होते हैं। पीपीआर रोग गर्भवती भेड़ और बकरियों में गर्भपात का कारण भी बन सकता है। अधिकांश मामलों में, बीमार भेड़ व बकरी संक्रमण के एक सप्ताह के भीतर खत्म हो जाते हैं। 

पीपीआर रोग का उपचार एवं नियंत्रण इस प्रकार करें

पीपीआर की रोकथाम के लिए भेड़ व बकरियों का टीकाकरण ही एकमात्र प्रभावी तरीका है। वायरल रोग होने की वजह से पीपीआर का कोई विशिष्ट उपचार नहीं है। हालांकि, बैक्टीरिया एवं परजीवियों पर काबू करने वाली औषधियों का इस्तेमाल करके मृत्यु दर को काफी कम किया जा सकता है। टीकाकरण से पूर्व भेड़ तथा बकरियों को कृमिनाशक दवा देनी चाहिए। सबसे पहले स्वस्थ बकरियों को संक्रमित भेड़ तथा बकरियों से अलग बाड़े में रखा जाना चाहिए, जिससे कि रोग को फैलने से बचाया जा सके। इसके पश्चात बीमार बकरियों का उपचार शुरू करना चाहिए।

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फेफड़ों के द्वितीयक जीवाणु संक्रमण को नियंत्रित करने हेतु पशु चिकित्सक द्वारा निर्धारित एंटीबायोटिक्स औषधियों (Antibiotics) का इस्तेमाल किया जाता है। आंख, नाक और मुंह के समीप के घावों को दिन में दो बार रुई से अच्छी तरह साफ करना चाहिए। इसके अतिरिक्त मुंह के छालों को 5% प्रतिशत बोरोग्लिसरीन से धोने से भेड़ और बकरियों को काफी लाभ मिलता है। बीमार भेड़ एवं बकरियों को पौष्टिक, स्वच्छ, मुलायम, नम एवं स्वादिष्ट चारा ही डालना चाहिए। PPR के माध्यम से महामारी फैलने की स्थिति में तत्काल समीपवर्ती शासकीय पशु चिकित्सालय को सूचना प्रदान करें। मरी हुई भेड़ और बकरियों को जलाकर पूर्णतय समाप्त कर देना चाहिए। इसके साथ-साथ बकरियों के बाड़ों और बर्तन को साफ व शुद्ध रखना अत्यंत आवश्यक है।

तुलसी के पौधों का मानव जीवन में है विशेष महत्व

तुलसी के पौधों का मानव जीवन में है विशेष महत्व

नई दिल्ली। तुलसी का पौधा स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत ही लाभदायक होता है। आयुर्वेद में तुलसी को औषधीय पौधा माना गया है। हिन्दू धर्म मे तुलसी का अत्यधिक महत्व माना जाता है। यह धार्मिक पौधा होने कारण घर-घर पूजा जाता है। कोई तुलसी को धर्म और आस्था से जोड़ कर देखता है, तो कोई सेहत के लाभ उठाने के लिए तुलसी का प्रयोग करता है। यही वजह है कि तुलसी का पौधा लगभग हर हिन्दू के घर में पाया जाता है। 

तुलसी के पौधे को हरा-भरा रखने के उपाय

धर्म और आस्था के साथ-साथ सेहत के लिए लाभकारी तुलसी के पौधों का प्रसाद में भी काफी महत्व है। देशी नुस्खे में सर्दी-जुकाम दूर करने के लिए तुलसी के पत्तों को चाय में डालकर पीने से आराम मिलता है। घर पर तुलसी के पौधा उगाने के लिए बस आपको अपनी उंगलियों से मिट्टी में इनको छिड़क देना होता है क्योंकि तुलसी के बीज बहुत ही छोटे होते हैं।

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लेकिन लोगों का मानना है कि इतने उपयोगी पौधे को हरा-भरा रखना उतना ही कठिन है। तमाम लोगों का कहना है कि तुलसी का पौधा लू-गर्मी लगने के कारण सूख जाता है। तो कुछ लोगों ने बताया कि अधिक सर्दी में ओस का शिकार होने से तुलसी का पौधा सूख जाता है। 

तुलसी के पौधे को हरा-भरा रखने के ये मुख्य उपाय हैं

1 - तुलसी के पौधे को 20 सेंटीमीटर गहराई की मिट्टी लगाएं। जिससे मॉइश्चर मिट्टी मिले। 2 - बारिश के मौसम में तुलसी के पौधे में ज्यादा पानी भरा रहना नुकसानदायक है। इसलिए पौधे के नीचे सीमित पानी ही रहना चाहिए। 3 - हर महीने 2 चम्मच नीम की पत्तियों को सुखाकर उसका पाउडर तुलसी के पौधे में डालना चाहिए। इससे पौधा सूखेगा नहीं। 4 - पौधे की मिट्टी को समय-समय पर खुरपी से खोदकर इधर-उधर करते रहें। 5 - तुलसी के पौधे के लिए ऑक्सीजन की कमी नहीं रहनी चाहिए। 

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तुलसी के पौधे के साथ जुड़ी है धर्म और आस्था

  • तुलसी के पौधे से लोगों की आस्था जुड़ी हुई है, इसलिए अगर आप पौधे की पूजा करते हैं तो जरूर करें, मगर कोशिश करें कि रोज तुलसी के पौधे से पत्तियों को ना तोड़ें।
  • यदि आप दिया या अगरबती जलाते हैं तो पौधे से इन चीजों को दूर रखने की कोशिश करें। दरअसल धुएं और तेल से भी तुलसी को नुकसान पहुंचता है।
अगर आप ऊपर बताई हुई टिप्स को फॉलो करते हैं। तो महीने भर में ही आपको अपने सूखे हुए तुलसी के पौधे में नई पत्तियां आती दिखेंगी।

 ----- लोकेन्द्र नरवार

थनैला रोग को रोकने का एक मात्र उपाय टीटासूल लिक्विड स्प्रे किट (Teatasule Liquid (Spray Kit))

थनैला रोग को रोकने का एक मात्र उपाय टीटासूल लिक्विड स्प्रे किट (Teatasule Liquid (Spray Kit))

डेयरी कैटल अर्थात दुधारू पशु, डेयरी उद्योग या पशुपालन की रीढ़ होती है, लेकिन इन पशुओं में आए दिन कई तरह के रोग होने का खतरा बना रहता है. इसमे सबसे अधिक खतरा थनैला रोग (Thanaila Rog) से होता है, जिसको लेकर पशुपालक हमेशा परेशान रहते हैं. थनैला रोग केवल पशुओं को ही बीमार नहीं करता बल्कि, पशुपालकों को भी आर्थिक रूप से बीमार कर देता है. पशु के थन में सूजन, थान (अयन) का गरम होना एवं थान का रंग हल्का लाल होना आदि थनैला रोग की प्रमुख पहचान है. थनैला रोग का संक्रमण जब बढ़ जाता है तो दूध निकलने का रास्ता सिकुड़ कर पतला और बारीक हो जाता है, जिससे दूध निकलने में परेशानी होती है. साथ ही दूध का फट के आना, मवाद आना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं.

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क्यों होता है दुधारु पशुओं में थनैला रोग ?

दुधारू पशुओं को थनैला रोग थनों में चोट लगने, थन पर गोबर के लगने, मूत्र अथवा कीचड़ के संक्रमण होने से होता है. वहीं दूध दुहते समय साफ-सफाई पर ध्यान नहीं देने से और पशु बाड़े की नियमित रूप से साफ-सफाई न करने से भी यह संक्रमण होता है. ज्ञात हो कि जब मौसम में नमी अधिक होती है या वर्षाकाल का मौसम होता है, तब इस रोग का प्रकोप और भी बढ़ जाता है.

थनैला रोग की रोकथाम के उपाय

दुधारू पशुओं में थनैला रोग के लक्षण दिखाई देने पर तुरंत निकट के पशु चिकित्सालय या पशु चिकित्सक से परामर्श करनी चाहिए. थनैला रोग में होम्योपैथिक पशु दवाई भी बहुत कारगर है.

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होम्योपैथिक पशु दवाई की प्रमुख कंपनी गोयल वेट फार्मा प्राइवेट लिमिटेड ने पशुओं में बढ़ते थनैला रोग के संक्रमण को रोकने के लिए टीटासूल लिक्विड स्प्रे किट का निर्माण किया है जो बेहद असरदार है. टीटासूल लिक्विड स्प्रे किट - (Teatasule Liquid (Spray Kit)) थनेला रोग के उपचार के लिए बेहतरीन व कारगर होम्योपैथिक पशु औषधि माना जाता है. यह मादा पशुओं के थनैला रोग के सभी अवस्था के लिए असरदार होम्योपैथिक दवाई है. यह दूध के गुलाबी, दूध में खून के थक्के, दूध में मवाद के कारण पीलापन, दूध फटना, पानी जैसा दूध होना तथा थान का पत्थर जैसा सख़्त होना जैसे स्थिति में बहुत प्रभावी है.

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टीटासूल लिक्विड स्प्रे कैसे किया जाता है इस्तेमाल

टीटासूल के एक पैक में टीटासूल नंबर -1 तथा टीटासूल नंबर-2 की 30 मिली स्प्रे बोतल होती है, जिसे रोगग्रस्त पशुओं को सुबह और शाम, दिए गए निर्देशों के अनुसार देना होता है या पशु चिकित्सक के सलाह के अनुसार देना चाहिए.

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• थन की सूजन व थनैला रोग में एंटीबायोटिक या इंजेक्शन या दवाओं से ज्यादा आराम टीटासूल होम्योपैथिक दवा देता है. • जब एंटीबायोटिक दवायें काम नहीं करती हैं तब भी टीटासूल आराम देता है • थनों की सूजन पुरानी पड़ने लगे और थनों के तनु कठोर हो जाये तो टीटासूल थनों के कड़ेपन को दूर करता है और दुग्ध ग्रंथियों को कार्यशील बनाता है. • थनों के कड़ेपन को व थनों में चिराव आदि को भी टीटासूल ठीक करता है. • दुग्ध ग्रंथियों में दुग्ध के बहाव को नियमित कर कार्यशील बनाने में टीटासूल सहायक होता है.
किन्नू और संतरे की फसल के रोग और उनकी रोकथाम

किन्नू और संतरे की फसल के रोग और उनकी रोकथाम

किन्नू और संतरे की फसल कई रोगों से ग्रषित होती है। इन रोगों की जानकारी और रोकथाम निम्नलिखित हैं :

1. गमोसिस (Gummosis)

इसके लक्षण पत्तियों के पीलेपन के रूप में प्रकट होते हैं, इसके बाद छाल का चटकना और अधिक मात्रा में सतह पर गोंद लगना। संक्रमण का मुख्य स्रोत संक्रमित रोपण सामग्री है। गम्भीर संक्रमण के कारण छाल पूरी तरह से सड़ जाती है और करधनी के कारण पेड़ सूख जाता है।

प्रभाव

पौधा आमतौर पर भारी रूप से
फूलों से खिलता है और फल बनने से पहले ही मर जाता है। ऐसे मामलों में, रोग को फुट रूट या कॉलर-रूट कहा जाता है। ये रोग उन स्थानों पर ज्यादा आता है, जहाँ पर खेत में अधिक पानी खड़ा रहता है।

उपाय

उपाय जैसे पर्याप्त जल निकासी का प्रबंधन करना, साथ ही उचित स्थल का चयन, रिंग विधि का उपयोग अपनाकर और पेड़ के तने को पानी के संपर्क से बचाना है। वैकल्पिक रूप से रोग के हिस्सों को एक तेज चाकू से खुरच कर निकाल देना चाहिए इसके बाद कटी हुई सतह को मर्क्यूरिक क्लोराइड (0.1%) या पोटेशियम परमैंगनेट के घोल से कीटाणुरहित कर देना चाहिए। जमीनी स्तर से 1 मीटर ऊपर तने की पेंटिंग रोग को नियंत्रित करने में मदद करता है। साथ ही, रिडोमिल एमजेड 72 @ 2.75 ग्राम/ली का छिड़काव और ड्रेंचिंग करें या एलियट (2.5 ग्राम/लीटर) रोग को नियंत्रित करने में प्रभावी है।

2. स्कैब या वेरिकोसिस

प्रारंभिक अवस्था में घाव पत्तियों की निचली सतह पर छोटे अर्ध-पारभासी छिद्र के रूप में दिखाई देते हैं। अंत में पत्तियां झुर्रीदार, टूटी हुई और जल जाती हैं। फलों पर, घाव गहरे बने होते हैं, जो आखिर में मिल कर पूरे फलों को खराब कर देते हैं।

उपाय

रोगग्रस्त पत्तियों, टहनियों और फलों को एकत्र कर नष्ट कर देना चाहिए। कार्बेन्डाजिम 0.1% का छिड़काव करना काफी प्रभावी है।

3. कंकेर

ये रोग पत्ती, टहनी और फलों को प्रभावित करता है। पत्ते पर घाव आमतौर पर पीले रंग के साथ गोलाकार होते हैं और ये खोखले होते हैं व पत्तीयों के दोनों किनारों पर दिखाई देते हैं। ज्यादा बीमारी फैलाने पर फलों पर भी धब्बे बन जाते हैं। फलों पर धब्बे बनने के कारण बाजार मूल्य को कम करते हैं। ये रोग लीफ मायनर के द्वारा फैलता है, तो हमें सब से पहले इस किट को नियंत्रण करना होगा।

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उपाय

इस बीमारी के उपचार के लिए स्ट्रेप्टोमाइसिन सल्फेट 500-1000 पीपीएम या फाइटोमाइसिन 2500 पीपीएम या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 0.2% को पानी के साथ घोल बनाकर 15 के अंतराल पर छिड़काव करें। नया फल आने से पहले लीफ माइनर को नियंत्रित करने के लिए किसी भी कीटनाशी का प्रयोग करें। मानसून की शुरुआत से पहले संक्रमित टहनियाँ की कटाई - छँटाई जरूर करें।

4. हरितमा रोग

इस रोग के लक्षण पत्तियों का झड़ना, पौधे पर बहुत कम पत्तियां रह जाना और पत्तियां छोटी हो जाती हैं। टहनियाँ आगे से पीछे की ओर सूखने लग जाती हैं। पौधे पर बिना मौसम के फूल आ जाते हैं, जो फल बनते हैं वो छोटे होते हैं या पकने के बाद भी हरे ही रह जाते हैं। ये एक विषाणू जनक रोग है और ये रोग सिट्रस सिल्ला नामक कीट के द्वारा फलता है। इस के लिए सब से पहले इस कीट को नियंत्रित करें। इस को नियंत्रित करने के लिए फॉस्फॅमिडों 25 ML या पैराथीओन 25ML या इमिडाक्लोप्रिड कीटनाशक का प्रयोग 10 लीटर पानी की दर से मिला कर पौधे के ऊपर स्प्रे करें। टेट्रासाइक्लिन 500 पीपीएम का स्प्रे भी रोग के रोकथाम में बहुत उपयोगी है।
भीषण शीतलहर में फसल को पाले से बचाने के लिए करें ये उपाय

भीषण शीतलहर में फसल को पाले से बचाने के लिए करें ये उपाय

इन दिनों उत्तर भारत में शीतलहर शुरू हो चुकी है, धीरे-धीरे यह देश के अन्य भागों में भी फैलेगी। यह शीतलहर किसानों के लिए तब एक समस्या बन जाती है जब इसकी वजह से फसलें प्रभावित होने लगती हैं। सर्दियों के मौसम में शीतलहर की वजह से फसलों में पाला लगना एक आम बात है। पाले की वजह से भारत में हर साल फसल की उत्पादकता घटती है। भीषण पाले के प्रभाव से फसलों तथा सब्जियों के फूल मुरझा जाते हैं और झड़ने लगते हैं। फूल झड़ने के कारण उनमें दाने नहीं पड़ पाते। फसल काली पड़ जाती है तथा पत्तियों का रंग मिट्टी के रंग जैसा दिखने लगता है। पाले की वजह से पौधे सड़ने से फसल में बैक्टीरिया जनित बीमारियों एवं अन्य कीटों का प्रकोप अधिक बढ़ जाता है, जो फसलों के लिए हानिकारक होता है। अगर पाले के प्रकोप की बात करें, तो फलदार पौधों में इसका प्रकोप ज्यादा देखा जा सकता है। पाले से बचने के लिए किसान को अनुमान लगाना होता है कि किस दिन पाला पड़ सकता है। अगर किसान ठीक अनुमान लगा लेता है, तो वह अपनी फसल की पाले से सुरक्षा कर सकता है।

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पाले से फसलों की सुरक्षा के उपाय

फसलों की सिंचाई करें

यदि किसान यह अनुमान लगा लेता है कि पाला पड़ने वाला है या मौसम विभाग ने पाला पड़ने की चेतावनी जारी की है। ऐसे में फसल की हल्की सिंचाई बेहद लाभकारी सिद्ध हो सकती है। सिंचाई से खेत का तापमान 0.5 से 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। ये उपाय करके पाले से फसल को होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है।

पाला पड़ने से पहले पौधों को ढकें

अगर पाले की बात करें, तो पाला सबसे ज्यादा नर्सरी के पौधों को प्रभावित करता है। ऐसे में नर्सरी के पौधों को पाले से बचाने के लिए प्लास्टिक की शीट, पुआल आदि से ढंक दें। ऐसा करने से प्लास्टिक के अन्दर का तापमान 2-3 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है। जिसे पौधों के आस पास का तापमान जमाव बिन्दु से ऊपर बना रहता है और पौधों के ऊपर पाले का प्रकोप नहीं होता है। किसान भाई को पौधों को ढकते समय ये सावधानी रखनी चाहिए, कि जिस तरफ से सुबह की धूप आती हो उस तरफ से प्लास्टिक शीट को खुला रखें। जिससे सुबह की सीधी धूप पौधों के ऊपर पड़ेगी और तापमान में वृद्धि होगी।

खेत के आस पास धुआं करें

खेत के आसपास धुआं करने से भी फसल को पाला लगने से बचाया जा सकता है। धुआं करने से फसल के आस पास का तापमान बढ़ जाता है, जिससे पाले से होने वाली हानि से बचा जा सकता है।

रस्सी का उपयोग करें

रस्सी के उपयोग से भी पाले से बचा जा सकता है, इसके लिए 2 व्यक्ति भोर के समय रस्सी को उसके दोनों सिरों में पकडक़र खेत के एक कोने से दूसरे कोने तक फसल को हिलाते हैं। ऐसा करने से फसल में जमा ओस जमीन में गिर जाती है और फसल पाले के प्रकोप से सुरक्षित हो जाती है। यह कारगर उपाय है जिसे भारत में किसान अक्सर करते हैं ।

प्रात: काल गुनगुने पानी का छिड़काव करें

पाले के प्रकोप से अपने नर्सरी के पौधों को बचाने के लिए हल्के गुनगुने पानी से छिड़काव भी किया आ सकता है। इस तकनीक का उपयोग करने से तापमान में वृद्धि होती है जिससे पाला लगने की संभावना बहुत हद तक कम हो जाती है।

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फसलों के आसपास वायुरोधी टाटिया लगाएं

नर्सरी के पौधों को पाले से बचाने के लिए पौधों के आसपास वायुरोधी टाटिया भी लगा सकते हैं। ऐसे में पौधों के आस पास ठंडी हवा का प्रवाह रुक जाएगा और फसल पाले से सुरक्षित रहेगी। इस टाटीयों को लगाते समय ध्यान रखें कि इन्हें हवा आने वाली दिशा की तरफ लगाएं तथा सुबह होते ही हटा दें, ताकि सूरज की धूप पौधों को मिल सके। ऊपर बताए गए उपाय किसानों की फसलों को बचाने के लिए बेहद कारगर साबित हो सकते हैं। अगर किसान इन उपायों को अपनाते हैं, तो वो निश्चित ही अपनी फसल को पाले से सुरक्षित रख पाएंगे।