Ad

बीजारोपण

टमाटर की खेती : अगस्त क्यों है टमाटर की खेती के लिए वरदान

टमाटर की खेती : अगस्त क्यों है टमाटर की खेती के लिए वरदान

बारिश में आम तौर पर खाने में सब्जियों के विकल्प कम हो जाते हैं। खास तौर पर टमाटर (Tomato) के भाव बारिश में अधिक रहने से किसानो के लिए बरसात में टमाटर की खेती (Barsaat Mein Tamatar Ki Kheti), मुनाफे का शत प्रतिशत सफल सौदा कही जा सकती है।

सड़ने गलने का खतरा

बारिश के दिनों में फसलों के सड़ने-गलने का खतरा रहता है। अल्प काल तक स्टोर किए जा सकने के कारण टोमैटो कल्टीवेशन (Tomato Cultivation) यानी टमाटर की खेती (tamaatar kee khetee) बारिश में और भी ज्यादा परेशानी का सौदा हो जाती है।



ये भी पढ़ें:
कोल्ड स्टोरेज योजना में सरकारी सहायता पच्चास प्रतिशत तक

ऐसे में सबसे अहम सवाल यह उठता है कि, बरसात में टमाटर की खेती कैसे करें (barsaat mein tamatar ki kheti kaise karen) या फिर बारिश के मौसम में टमाटर की खेती प्रारंभ करने का उचित समय क्या है, या फिर बरसाती टमाटर की खेती करते समय किन बातों का खास तौर पर ध्यान रखना चाहिए आदि, आदि। लेकिन याद रखें कि, अति बारिश की स्थिति में टमाटर की सुकुमार फसल के खराब होने का खतरा जरा ज्यादा बढ़ जाता है। हालांकि यह भी सत्य है कि, बरसात में टमाटर की खेती कठिन जरूर है, लेकिन असंभव कतई नहीं।

मेरीखेती पर करें टमाटर की खेती से सम्बंधित जिज्ञासा का समाधान

चिंता न करें मेरीखेती पर हम बताएंगे टमाटर की ऐसी किस्मों के बारे में, जिन्हें वैज्ञानिक तरीके से खास तौर पर बारिश में टमाटर की किसानी के लिए ईजाद किया गया है। साथ करेंगे आपकी सभी जिज्ञासाओं का समाधान भी।

बारिश में टमाटर की नर्सरी की तैयारी अहम

बारिश में टमाटर की खेती के लिए उसकी पौध तैयार करना किसान मित्रों के लिए सबसे अहम कारक है। टमाटर की पौध को प्रोट्रे या फिर सीधे खेत में तैयार किया जा सकता है। सीधे तौर पर खेत में टमाटर की पौध की तैयारी के वक्त, सबसे ज्यादा ध्यान रखने वाली बात यह है कि जहां टमाटर की नर्सरी बनाई जा रही है, वह भूमि बारिश के पानी में न डूबती हो। साथ ही इस स्थान पर कम से कम 4 घंटे तक धूप भी आती हो। टमाटर की पौध की तैयारी करने वाला स्थान, भूमि से यदि एक से दो फीट की ऊंचाई पर हो तो तेज या अति बारिश की स्थिति में भी टमाटर की पौध सुरक्षित रहती है।

टोमैटो नर्सरी की नापजोख का गणित

टोमैटो नर्सरी (Tomato Nursery) में क्यारियों का गणित सबसे अधिक अहम होता है। किसानों को क्यारी बनाते समय यह ध्यान रखना चाहिए, कि इनकी चौड़ाई 1 से 1.5 मीटर हो। इसकी लंबाई 3 मीटर तक हो सकती है। इस नापजोख की 4 से 6 क्यारियों की तैयारी के उपरांत बारी आती है टमाटर के बीजारोपण की।

टमाटर का बीजारोपण

टमाटर के बीजों के बीजारोपण के पहले कृषि वैज्ञानिक एवं अनुभवी किसान टमाटर बीजों को बाविस्टिन या थिरम से उपचारित करने की सलाह देते हैं।

टमाटर के पौधों की रोपाई में पानी की भूमिका

बीजारोपण के बाद नर्सरी एक महीने से लेकर 40 दिन में तैयार हो जाती है। नर्सरी में तैयार टमाटर की पौध को इच्छित भूमि में रोपने के 10 दिन पहले, नर्सरी में तैयार किए जा रहे टमाटर के पौधों को पानी देना बंद करने से टमाटर के पौधे तंदरुस्त एवं विकास के लिए पूरी तरह तैयार हो जाते हैं। इस विधि से टमाटर रोपने के कारण, रोपाई के बाद टमाटर के पौधों के सूखने का खतरा भी कम हो जाता है।

टमाटर की रोपाई के लिए अगस्त है खास

महीना अगस्त का चल रहा है, एवं यह समय किसानो के लिए टमाटर की खेती के लिए सबसे मुफीद माना जाता है। अगस्त में रोपाई करने के लिए किसान को जुलाई में टमाटर की नर्सरी तैयार करनी होती है। हालांकि, जुलाई में टमाटर की पौध तैयार करने से चूक जाने वाले किसान अगस्त में भी टमाटर की नर्सरी तैयार कर सकते हैं, क्योंकि भारत में बरसाती टमाटर की पैदावार के लिए सितंबर माह में भी टमाटर की पौध की रोपाई किसान करते हैं। हालांकि, ज्यादा मुनाफा हासिल करने के लिए कृषि वैज्ञानिक जुलाई में टमाटर की नर्सरी तैयार करने और अगस्त में रोपाई करने की सलाह देते हैं।



ये भी पढ़ें: बारिश में लगाएंगे यह सब्जियां तो होगा तगड़ा उत्पादन, मिलेगा दमदार मुनाफा

टमाटर की खेती साल भर खास-खास

भारतीय रसोई में टमाटर की मांग साल भर बनी रहती है। दाल से लेकर सब्जी, सूप सभी में टमाटर अपनी रंगत एवं स्वाद से जायके का लुत्फ बढ़ा देता है। भारत में आम तौर पर टमाटर की खेती साल भर की जाती है। शरद यानी सर्दी के मौसम के लिए टमाटर की फसल की तैयारी हेतु किसान के लिए जुलाई से सितम्बर का मौसम खास होता है। इस कालखंड की फसल में किसान को टमाटर की पौध की बारिश से रक्षा करना अनिवार्य होता है। बसंत अर्थात गर्मी में टमाटर की पैदावार के लिए साल में नवम्बर से दिसम्बर का समय खास होता है। पहाड़ी इलाकों में मार्च से अप्रैल के दौरान भी टमाटर के बीजों को लगाया जा सकता है। जुलाई-अगस्त माह में रोपण आधारित टमाटर की खेती पर किसान को फरवरी से मार्च तक ध्यान देना होता है। इसी तरह नवंबर-दिसंबर में टमाटर रोपण आधारित किसानी मेें किसान जून-जुलाई तक व्यस्त रहता है।

एक हेक्टेयर का गणित

जीवांशयुक्त दोमट मिट्टी टमाटर की पौध के लिए सहायक होती है। मिट्टी की ऐसी गुणवत्ता वाले एक हेक्टेयर खेत में किसान टमाटर के 15 हजार पौधे लगाकर अपना मुनाफा पक्का कर सकता है।

देसी के बजाए संकर की सलाह

जुलाई के माह में तैयार की जाने वाली बारिश के टमाटर की खेती के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने टमाटर की सहायक किस्में सुझाई हैं। जुलाई माह में टमाटर की बुवाई के इच्छुक किसानों को वैज्ञानिक, कुछ देसी को किस्मों से बचने की सलाह देते हैं। इन देसी किस्म के टमाटर के पौधों में बारिश के दौरान मौसमी प्रकोेप का असर देखा जाता है। कीट लगने या दागी फल ऊगने से किसान की कृषि आय भी प्रभावित हो सकती है।



ये भी पढ़ें: टमाटर की फसल में एकीकृत कीट प्रबंधन

ऐसे में सलाहकार टमाटर की देसी किस्म के बजाए संकर प्रजाति के बीजों का इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं। टमाटर के संकर प्रजाति के बीजों की खासियत यह है, कि यह बीज किसी भी तरह की जमीन पर पनपने में सक्षम होते हैं। साथ ही देसी प्रजाति के बजाए संकर किस्म की टमाटर की खेती किसान के लिए अनुकूल परिस्थितियों में फायदे का शत प्रतिशत सौदा साबित होती है।

टमाटर की कुछ खास प्रजातियां

भारत के किसान, कृषि भूमि की गुणवत्ता के लिहाज से अपने अनुभव के आधार पर, स्थानीय तौर पर प्रचलित किस्मों के टमाटर की खेती करते हैं। हालांकि, टमाटर की ऐसी कुछ किस्में प्रमुख हैं जिनकी भारत में मुख्य तौर पर खेती की जाती है।

टमाटर की कुछ संकर प्रजातियां :

  • पूसा सदाबहार
  • स्वर्ण लालिमा
  • स्वर्ण नवीन
  • स्वर्ण वैभव (संकर)
  • स्वर्ण समृद्धि (संकर)
  • स्वर्ण सम्पदा (संकर)

टमाटर की कुछ खास उन्नत देसी किस्में :

  • पूसा शीतल
  • पूसा-120
  • पूसा रूबी
  • पूसा गौरव
  • अर्का विकास
  • अर्का सौरभ
  • सोनाली

हाइब्रिड टोमैटो (Hybrid Tomato) की खासे प्रचलित किस्में :

  • पूसा हाइब्रिड-1
  • पूसा हाइब्रिड-2
  • पूसा हाइब्रिड-4
  • रश्मि और अविनाश-2
  • अभिलाष
  • नामधारी इत्यादि

बरसाती टमाटर की प्रचलित किस्म

बरसाती टमाटर की उमदा किस्मों की बात करें तो बारिश में अभिलाष टमाटर के बीज बोने की सलाह कृषि विशेषज्ञ एवं सलाहकार देते हैं। इसकी वजह, इसकी कम लागत में होने वाली अधिक पैदावार बताई जाती है। बारिश के टमाटर की उम्मीद से अधिक पैदावार के लिए जुलाई से लेकर सितंबर तक अभिलाष टमाटर के बीज रोपकर नर्सरी तैयार करने की सलाह दी जाती है।

अभिलाष किस्म की खासियत

कम लागत में किसान की भरपूर कमाई की अभिलाषा पूरी करने वाला, अभिलाष किस्म का टमाटर कई खूबियों से भरपूर है। बरसाती टमाटर की खेती के लिए अभिलाष टमाटर का बीज उपयुक्त माना गया है। इस प्रजाति का टमाटर भारत के विभिन्न राज्यों में रबी, खरीफ दोनों सीजन में उगाया जाता है। इस संकर प्रजाति के बीज की खासियत यह भी है कि, इसके पौधे में पनपने वाले फल आकार में एक समान होते हैं। अपने जीवन के अंतिम वक्त तक समान आकार के टमाटर उगाने में सक्षम, अभिलाष प्रजाति के टमाटर के बीज से किसान को बारिश में भी टमाटर की अच्छी पैदावार प्राप्त होती है।



ये भी पढ़ें: उपभोक्ता मंत्रालय ने बताया प्याज-टमाटर के दामों में हुई कितनी गिरावट

बाजार में मिलने वाले अभिलाष टमाटर बीज की दर 50 से 60 ग्राम प्रति एकड़ मानी जाती है। इससे हासिल टमाटर के फल का रंग आकर्षक लाल तथा आकार गोल होता है। दी गई जानकारी के अनुसार, नर्सरी की तैयारी से लेकर 65 से 70 दिनों के समय काल में अभिलाष प्रजाति के टमाटर की पहली तुड़ाई संभव हो जाती है। वजन की बात करें, तो इस प्रजाति के टमाटर के फलों का औसत वजन अनुकूल परिस्थितियों में 75 से 85 ग्राम अनुमानित है।

अभिलाष टमाटर की खेती का इन राज्यों में प्रचलन

अभिलाष प्रजाति के टमाटर की खेती मूल रूप से राजस्थान, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, पंजाब, बिहार, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र राज्य के किसान करते हैं।

Cow-based Farming: भारत में गौ आधारित खेती और उससे लाभ के ये हैं साक्षात प्रमाण

Cow-based Farming: भारत में गौ आधारित खेती और उससे लाभ के ये हैं साक्षात प्रमाण

दूध की नदियां बहाने वाला देश और सोने की चिड़िया उपनामों से विख्यात, भारत देश के अंग्रेजों के राज में इंडिया कंट्री बनने के बाद, देश में सनातन शिक्षा विधि, स्वास्थ्य रक्षा, कृषि तरीकों एवं सांस्कृतिक विरासत का व्यापक पतन हुआ है।

आलम यह है कि, कालगणना (कैलेंडर), ऋतु चक्र जैसे विज्ञान से दुनिया को परिचित कराने वाले देश में, आज गौ आधारित प्राकृतिक कृषि को अपनाने के लिए लोगों को प्रेरित करना पड़ रहा है।

घर-घर गौपालन करने वाले भारत में सरकार को सार्वजनिक गौशाला बनाना पड़ रही हैं। पुरातन इतिहास में एक नहीं बल्कि ऐसे कई प्रमाण हैं कि कृषि प्रधान भारत में गौ आधारित कृषि को विशिष्ट स्थान प्रदान किया गया था। जैविक तरीकों की आधुनिक खेती में अब गौवंश के महत्व को स्वीकारते हुए, गौमूत्र एवं गाय के गोबर का प्रचुरता से उपयोग किया जा रहा है।

ये भी पढ़ें: जैविक खेती पर इस संस्थान में मिलता है मुफ्त प्रशिक्षण, घर बैठे शुरू हो जाती है कमाई

सरकारें भी गौपालन के लिए नागरिक एवं कृषकों को प्रेरित कर रही हैं। छत्तीसगढ़ सरकार ने तो किसान एवं पंचायत समितियों से गौमूत्र एवं गाय का गोबर खरीदने तक की योजना को प्रदेश मे लागू कर दिया है।

क्यों पूजनीय है गौमाता

गौमाता के नाम से सम्मानित गाय को भारत में पूजनीय माना जाता है। हिंदू धर्म के अनुसार गाय में 33 करोड़ देवताओं का वास मानकर गौमाता की पूजा अर्चना की जाती है। प्रमुख त्यौहारों खासकर दीपावली के दिन एवं अन्नकूुट पर गाय का विशिष्ट श्रृंगार कर पूजन करने का भारत में विधान है।

ये भी पढ़ें: गाय के गोबर से किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए मोदी सरकार ने उठाया कदम

हिंदू पूजन विधियों में गौमय (गोबर) तथा गोमूत्र को भारतीय पवित्र और बहुगुणी मानते हैं। गाय के गोबर से बने कंडों का हवन में उपयोग किया जाता है। वातावरण शुद्धि में इसके कारगर होने के अनेक प्रमाण हैं। अब तक अपठित सिंधु-सरस्वती सभ्यता में गौवंश संबंधी लाभों के अनेक प्रमाण मिले हैं। सिंधु-सरस्वती घाटी एवं वैदिक सभ्यता में गौ आधारित किसानी से स्पष्ट है कि भारत में गौ आधारित कृषि कितनी महत्वपूर्ण रही है। सिंधु-सरस्वती सभ्यता से जुड़े अब तक प्राप्त प्रमाणों के अनुसार इस सभ्यता काल में मानव बस्तियों के साथ खेत, अनाज की प्रजातियों आदि के बारे में कृषकों ने काफी तरक्की कर ली थी। सिंधु-सरस्वती सभ्यता से जुड़ी अब तक प्राप्त हुई मुद्राओं में बैल के चित्र अंकित हैं। इससे इस कालखंड में गाय-बैल के महत्व को समझा जा सकता है।

ये भी पढ़ें: खाद-बीज के साथ-साथ अब सहकारी समिति बेचेंगी आरओ पानी व पशु आहार

खेत, जानवर, गाड़ी/ गाड़ी चालक, यव (बार्ली), चलनी, बीज आदि संबंधी चित्र भी इस दौर की कृषि पद्धति की कहानी बयान करते हैं। सिंधु-सरस्वती सभ्यता के अब तक प्राप्त प्रमाणों में अनाज का संग्रह करने के लिये कोठार (भंडार) की भी पुष्टि हुई है। संस्कृत लिपि में प्रयोग में लाए जाने वाले लाङ्गल, सीर, फाल, सीता, परशु, सूर्प, कृषक, कृषीवल, वृषभ, गौ शब्द अपना इतिहास स्वयं बयान करने के लिए पर्याप्त हैं।

 वैदिक संस्कृत और आधुनिक फारसी में भी बहुत से साम्य हैं। फारसी में उच्चारित गो शब्द का मूल अर्थ गाय से ही है। मतलब गाय भारत में पनपी कई संस्कृतियों का अविभाज्य अंग रही है। गाय के गोबर का खेत में खाद, मकान की लिपाई-पुताई में उपयोग भारत में विधि नहीं बल्कि परंपरा का हिस्सा है। रसोई में चूल्हे को सुलगाने से लेकर पूजन हवन तक गाय के गोबर के कंडों की अपनी उपयोगिता है। गाय की उपयोगिता इस बात से भी प्रमाणित होती है कि पुरातन कृषि मेें गौपालक को दूध, दही, छाछ, मक्खन, घी का पौष्टिक आहार प्राप्त होता था वहीं खेती कार्य के लिए तगड़े बैल भी गाय से प्राप्त होते थे।

ये भी पढ़ें: मुख्यमंत्री लघु सिंचाई योजना में लाभांवित होंगे हजारों किसान

खेत में हल जोतने, अनाज ढोने, गाड़ी खींचने के लिये बैलों का उपयोग पुराने समय से भारत में होता रहा है। खेत की सिंचाई के लिए रहट चलाने में भी बैलों की तैनाती रहती थी।

कभी चलता था 24 बैलों वाला हल गौवंश से मिली इंसान, शहर को पहचान कामधेनु करे इतनी कामनाओं की पूर्ति

24 बैलों वाला हल

कई हॉर्स पॉवर वाले आज के प्रचलित आधुनिक ट्रैक्टर का काम पुराने समय में बैल करते थे। पुरातन ग्रंथों में दो, छह, आठ, बारह, यहां तक कि, 24 बैलों वाले भारी भरकम हलों का भी उल्लेख है।

गाय के नाम अनेक

आपको अचरज होगा कि अनेक शब्दों, नामों का आधार गाय से संबंधित है। गोपाल, गोवर्धन, गौशाला, गोत्र, गोष्ठ, गौव्रज, गोवर्धन, गौधूलि वेला, गौमुख, गौग्रास, गौरस, गोचर, गोरखनाथ (शब्द अभी और शेष हैं) जैसे प्रतिष्ठित शब्दों की अपनी विशिष्ट पहचान है। उपरोक्त वर्णित शब्दों से उसकी प्रकृति की पहचान सुनिश्चित की जा सकती है। जैसे गौधूली बेला से सूर्यास्त के समय का भान होता है, इसी तरह गाय के बछड़े को वसु कहा जाता है। इससे ही भगवान श्रीकृष्ण के पिता का नाम वसुदेव रखा गया। हिंदुओं के प्रमुख त्यौहार दीपावली के कुछ दिन पहले वसुबारस मनाकर गौवंश का पूजन कर पशुधन के प्रति कृतज्ञता जताई जाती है।

ये भी पढ़ें: गाय के गोबर/पंचगव्य उत्पादों के व्यापक उपयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से “कामधेनु दीपावली अभियान” मनाने के लिए देशव्यापी अभियान शुरू किया

ऋग्वेद काल में भी रथों में बैल जोतने का जिक्र है। मतलब गाय कृषक, कृषि के साथ ही ग्राम वासियों का प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष तरीके से सहयोगी रही है। गाय और बैल पुरातन काल से भारतीय जनजीवन का आधार रहे हैं। गाय की इन बहुआयामी उपयोगिताओं के कारण ही गौमाता को ‘कामधेनु’ भी कहा जाता है। मानव की इतनी सारी कामनाएं पूरी करने वाली बहुउपयोगी ‘कामधेनु’ (इच्छा पूर्ति करने वाली गाय) वर्तमान मशीनी युग (कलयुग) में और अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है।

गबरबंद

प्राचीन भारत में पानी रोकने के लिए मिट्टी पत्थर से बनाए जाने वाले गबरबन्द को बनाने में गोबर, मिट्टी, घासफूस का उपयोग किया जाता था। महाभारत में गायों की गिनती से संबंधित घोषयात्रा, गोग्रहण का भी उल्लेख है।

गौ अधारित खेती एवं फसल चक्र

भगवान श्रीकृष्ण के पिता का नाम जहां गौवंश पर आधारित वसुदेव है, वहीं उनके भाई बलराम को ‘हलधर’ भी कहा जाता है। हल बलराम का अस्त्र नहीं, बल्कि कृषि कार्य में उपयोगी था। इससे उस कालखंड की खेती-किसानी के तरीकों का भी बोध होता है।

चक्र का महत्व समझिये

प्राचीन भारत में बैल गाड़ियों में प्रयुक्त होने पहिये, कुएं से पानी खींचने के लिये रहट में लगने वाला चक्र, कोल्हू के बैल की चक्राकार परिक्रमा के अपने-अपने महत्व हैं। मतलब कृषि की सुरक्षा में भी चक्र महत्वपूर्ण है। खेती के महत्वपूर्ण चक्र को काल या ऋतु चक्र कहा जाता है। 

 भारत के पूर्वज किसानों ने साल में मौसम के बदलाव के आधार पर फसल चक्र का तक निर्धारण कर लिया था। ऋतुचक्र के मुताबिक ही किसान रवि और खरीफ की फसल का निर्धारण करते आए हैं। बीज बोने, क्यारी बनाने आदि में गौवंश का उल्लेखनीय उपयोग होता आया है। गौ एवं पशु पालन के लिए भी ऋतु चक्र में पूर्वजों ने बहुमूल्य व्यवस्थाएं की थीं। फसल चक्र का खेती, कृषि पैदावार के साथ ही गौ एवं अन्य पशु पालन से पुराना बेजोड़ नाता रहा है।

गौ अधारित खेती

भगवान श्रीकृष्ण के जीवन में गौपालन, गोकुल और बृंदाबन से जुड़ी बातें गौपालन के महत्व को रेखांकित करती हैं। पुरातन व्यवस्था में पालतू गायों का दूध, दही, मक्खन जहां अर्थव्यवस्था की धुरी था वहीं खेती में भी गाय की भूमिका अतुलनीय रही है। मानव उदर पोषण हेतु अनाज की पूर्ति के लिए गौ एवं पशु-पालन के साथ खेती किसानी के मिश्रित प्रबंधन का भारत में इतिहास बहुत पुराना है। गाय-बैलों के पालन का प्रबंध, खाद बनाने में गौमूत्र एवं गोबर का उपयोग, बीजारोपण, सिंचाई, खरपतवार नियंत्रण आदि के लिए भारतवासी पुरातनकाल से गौवंश का बखूबी उपयोग करते आए हैं।

किसानों की बढ़ेगी आय सितंबर माह में वितरित की जाएगी मशरूम की नवीन विकसित किस्म

किसानों की बढ़ेगी आय सितंबर माह में वितरित की जाएगी मशरूम की नवीन विकसित किस्म

जम्मू कश्मीर में मशरूम की नई प्रजाति तैयार की गई है। इस प्रजाति को स्थानीय कृषि विभाग सितंबर माह में बाजार में लाएगा। इससे मशरूम की पैदावार काफी ज्यादा हो जाएगी। उन्नत खेती के लिए बीजों की अच्छी किस्म होनी अत्यंत आवश्यक है। किसानों को बेहतरीन किस्म के बहुत सारी फसलों के बीज प्राप्त हुए। इसको लेकर केंद्र एवं राज्य सरकार पहल करती रहती हैं। वैज्ञानिक एवं कृषि विशेषज्ञ नवीनतम विभिन्न फसलों की नवीन किस्म तैयार करते रहते हैं। इसी कड़ी में किसान भाइयों के लिए जम्मू कश्मीर से सुकून भरी खबर सामने आई है। किसानों के लिए मशरूम की ऐसी ही बेहतरीन प्रजाति तैयार की है। इससे कृषकों की आमदनी में इजाफा होगा।

मशरूम की इस नई प्रजाति को विकसित किया गया है

मीडिया खबरों के मुताबिक, जम्मू कश्मीर के कृषि विभाग द्वारा किसानों के फायदे के लिए कदम उठाया गया है। कृषि विभाग के स्तर से मशरूम एनपीएस-5 की प्रजाति तैयार की गई है। बतादें, कि बीज का सफल परीक्षण भी कर लिया गया है। किस्म की खासियत यह है, कि यह उच्च प्रतिरोधी है एवं अतिशीघ्रता से बेकार भी नहीं होगी।

ये भी पढ़ें:
राज्य में शुरू हुई ब्लू मशरूम की खेती, आदिवासियों को हो रहा है बम्पर मुनाफा

बाजारों में इस नवीन किस्म का वितरण सितंबर माह में किया जाएगा

मशरूम की यह नवीन प्रजाति सितंबर में बाजार में आ पाएगी। जम्मू-कश्मीर का कृषि विभाग किसान भाइयों को व्यवसायिक खेती के लिए प्रोत्साहित करेगा। इसको लेकर इसका बीज बाजार में उतारा जाएगा। कृषि विभाग के सीनियर अधिकारी का कहना है, कि विकसित की गई मशरूम की दूसरी प्रजाति एनपीएस-5 है। इसका मास्टर कल्चर भी बनाया जा रहा है। यह प्रयास है, कि इस साल के आने वाले सितंबर माह तक किसानों को इसके बीज वितरण की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। अभी तक बीज को लेकर जो परीक्षण किया गया है। वह सफल रहा है।

ये सब एनपीएस-5 की खासियत हैं

मशरूम की नवीन प्रजाति एनपीएस-5 कम जल अथव ज्यादा जल होने पर भी उपज पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इस प्रजाति को कार्बन-डाइऑक्साइड ज्यादा प्रभावित नहीं करती है। इसी वजह से यह अतिशीघ्र खराब होने वाली फसलों में नहीं आती है। विशेषज्ञों के कहने के अनुसार, अब तक बाजार में उपस्थित ज्यादातर मशरूम अगर एक या दो दिन नहीं बिकते हैं, तो खराब होने लगते हैं। लेकिन, अब नई किस्म के अंदर यह बात नहीं है। अच्छी गुणवत्ता होने की वजह से मशरूम के बीज भी अच्छी कीमतों पर बिकेंगे। इससे किसान भाइयों की आमदनी भी बढ़ जाएगी।