भारत सरकार के सामने नई चुनौती, प्रमुख फसलों के उत्पादन में विगत वर्ष की अपेक्षा हो सकती है कमी

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फिलहाल भारत सरकार के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है, इस साल खरीफ और रबी की फसलों में भारी कमी होने की संभावना है, इसका कारण है कई जगहों पर वर्षा की असमानता। इस साल कई राज्यों के कई क्षेत्रों में या तो औसत से ज्यादा बरसात हुई है या औसत से बहुत कम वर्षा हुई है, जिसका असर सीधा फसलों के उत्पादन में पड़ रहा है। औसत से ज्यादा बरसात वाले क्षेत्रों में फसलें बुरी तरह से प्रभावित हुई हैं, कई जगह फसलें सड़ के पूरी तरह से चौपट हो गई हैं, तो कई जगह सूखे की वजह से फ़सलों की वैसी ग्रोथ नहीं हुई है जैसी उम्मीद की जा रही थी।

हरियाणा और पंजाब में कम बरसात की वजह से एक बहुत बड़े रकबे की धान की खेती अविकसित रह गई है। इसलिए नीति निर्माताओं का अनुमान है कि 2022-23 में प्रमुख फसलों के उत्पादन में भारी कमी आ सकती है, जिसका असर भारत के सामान्य लोगों पर पड़ेगा। अगर तय लक्ष्य के मुताबिक़ फसलों का उत्पादन नहीं हुआ तो बाजार में अनाज की कमी हो जाएगी, जिससे खाने पीने की चीजों के दाम में बढ़ोत्तरी हो सकती है, जो सरकार के लिए एक नया सिरदर्द है। सरकार को इससे निपटने के लिए जल्द से जल्द योजना बनाने की जरुरत है।

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यूपी, बिहार, गंगीय पश्चिम बंगाल और झारखंड में इस साल बेहद कम बरसात हुई है, जिसका असर खरीफ की खेती पर पड़ना तय है। यह क्षेत्र चावल के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन इस साल कम वर्षा के कारण यहां पर चावल के उत्पादन में भारी कमी हो सकती है, इस सीजन में इन राज्यों में कम से कम 11 मिलियन टन चावल के उत्पादन में कमी हो सकती है। पिछले साल इन राज्यों में चावल का कुल उत्पादन 111.8 मिलियन टन था, इस साल घटकर 100-102 मिलियन टन होने की संभावना है, इसको देखते ही सरकार पहले से ही अलर्ट हो गई है, इसलिए सरकार ने पहले गैर-बासमती चावल निर्यात  (chawal niryat) पर प्रतिबन्ध लगाया उसके बाद टुकड़ा चावल के निर्यात पर भी प्रतिबंध लगा दिया है।

चावल के अतिरिक्त कपास के उत्पादन में भी भारी कमी की संभावना है, क्योंकि इस खेती में भी असमान वर्षा और मौसम की मार पड़ी है, जिससे कपास की खेती भी प्रभावित हुई है। कपास के उत्पादन में कमी घरेलू कपड़ा उद्योग को प्रभावित करेगी। उत्पादन की कमी के कारण बाजार में कपास महंगा हो सकता है जिसका सीधा असर कपड़ा बनाने में आने वाली लागत पर पडेगा। आगामी वर्ष में कपड़ा उत्पादन की लागत बढ़ भी सकती है।

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कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, इस साल कपास का उत्पादन तय लक्ष्य से लगभग 35 लाख गांठ कम हो सकता है, जो एक चिंता का विषय है। भारत सरकार के लक्ष्य के अनुसार इस साल कपास का उत्पादन 370 लाख गांठ होना चाहिए था। लेकिन अब इसके 335-345 लाख गांठ होने की संभावना है, जो लक्ष्य से काफी कम है। बाजार में कपास की मांग में हुई अप्रत्याशित वृद्धि के हिसाब से कपास का उत्पादन नहीं हो रहा है जिसका नकारात्मक प्रभाव सीधे कपड़ा उद्योग पर दिखेगा। इस साल वस्त्रोद्योग के लिए कपास की उपलब्धता सीमित हो सकती है।

असमान्य वर्षा और मौसम की मार का असर दलहन की फसलों पर भी पड़ा है। भारत में ऐसा कई बार हो चुका है जब मौसम की मार के कारण दलहन की फसलें खराब हो चुकी हैं और जिसके कारण दालें सामान्य लोगों की थाली से गायब हो गईं थीं, क्योंकि इस दौरान दालों के दामों में अप्रत्याशित वृद्धि देखी गई। वैसी ही स्थित इस बार भी निर्मित हो सकती है, क्योंकि दलहन की फसल इस बार बुरी तरह से प्रभावित हुई है।

विशेषज्ञों के अनुसार इस बार दलहन की फसलों का उत्पादन अपने तय लक्ष्य 10.5 मिलियन टन से काफी कम हो सकता है, जिसकी वजह से भारत सरकार को बाजार में सुचारू रूप से सप्प्लाई जारी रखने के लिए चुनौती का सामना करना होगा। इसके लिए हो सकता है कि भारत को लगभग 30 लाख टन दालों का आयात करना पड़े। भारत सरकार के द्वारा दालों का आयत करना कोई नया मामला नहीं है। अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत पहले भी दालों का आयात करता रहा है।

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देश में निर्मित हो रही इन सभी परिस्तिथियों का असर तिलहन पर भी पड़ना तय है। अन्य फसलों की तरह तिलहन के उत्पादन में भी कमी का अनुमान है। जिसका असर भारतीय बाजार पर होगा। पिछले कुछ सालों से खाद्य तेलों की कीमतों में अप्रत्याशित रूप से उतार चढ़ाव देखने को मिल रहा है जो इस साल भी जारी रह सकता है।

सरकार के आंकड़ों के अनुसार इस साल तिलहन का उत्पादन 21.5-22.5 मिलियन टन होने का अनुमान है जो तय लक्ष्य से लगभग 5 मिलियन टन कम है। भारत सरकार ने इस साल देश में 26.9 मिलियन टन तिलहन के उत्पादन का लक्ष्य रखा था, जो पिछले साल हुए उत्पादन से 3 मिलियन टन ज्यादा था। पिछले साल देश में लगभग 23.9 मिलियन टन तिलहन का उत्पादन हुआ था।

यह पहली बार नहीं है जब भारत को तिलहन के उत्पादन में कमी का सामना करना पडेगा। पहले भी भारत में ऐसा हो चुका है, जिसकी भरपाई के लिए सरकार बड़ी मात्रा में खाद्य तेल का आयात करती है ताकि भारत के बाजार में खाद्य तेल की उपलब्धता को सुनिश्चित किया जा सके और खाद्य तेल की कीमतों को कंट्रोल में रखा जा सके।

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कुल मिलाकर देखा जाए तो असमान्य वर्षा और मौसम की मार की वजह से ज्यादातर फसलों के उत्पादन में कमी होने की सम्भावना है। जिसका सीधा असर बाजार में चीजों की उपलब्धता पर पडेगा, हो सकता है कि इसके कारण खाद्य चीजों के साथ वस्त्रों जैसी मूलभूत चीजों के दामों में भी उतार चढ़ाव देखने को मिले। हालांकि अभी से सितम्बर के बाद आने वाले मौसम की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। अगर मौसम करवट लेता है तो उसका असर आने वाली फसलों पर जरूर पडेगा, जिससे उत्पादन में कमी या वृद्धि होना संभव है।

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