बिल्व या बेल की इन चमत्कारी स्वास्थ्य रक्षक व कृषि आय वर्धक खासियतों को जानें

Published on: 29-Jul-2022

बेल (Bael) : स्वास्थ्य रक्षक, बागवानी आय बढ़ाने वाला है बिल्व वृक्ष

स्वास्थ्य रक्षक, कृषि आय वर्धक चमत्कारी बिल्व की इन खासियतों को जान, बढ़ेगी श्रद्धा संग इनकम। इंटरनेशनल मार्केट में बेल (Bael) निर्मित खाद्य पदार्थों, जैसे बेल की गोंद, जैली, जैम की अच्छी डिमांड है। भारत में श्रावण समेत वर्ष भर पूजनीय बिल्व (Bael) वृक्ष एवं बिल्व पत्र की धार्मिक, सामाजिक, प्राकृतिक, चिकित्सीय उपयोगिताएं हैं। जड़ से लेकर वृक्ष के तने, छाल, फलों पत्तियों के अपने-अपने महत्व के कारण, भारत में पुरातन काल से पूजनीय बिल्व की इंडियन बेल (Indian bael), बेल या बेलपत्थर के तौर पर भी पहचान की जाती है। इस चमत्कारी वृक्ष (miracle tree) के जितने गुण आप जानते जाएंगे, आपकी इस मिरेकल ट्री के प्रति श्रद्धा उतनी प्रगाढ़ होती जाएगी। कृषि विज्ञान आधारित नाम एगले मार्मेलोस (Aegle marmelos) को ही आमतौर पर, बेल या बिली (bili) या फिर भेल भी कहा जाता है। इसकी बंगाल क्वीन, गोल्डन सेब, जापानी कड़वा नारंगी, पत्थर सेब या लकड़ी सेब प्रजातियां भी खासी प्रचलित हैं। यह चमत्कारी वृक्ष भारतीय उप महाद्वीप और दक्षिण पूर्व एशिया में पाया जाता है। भारत (India), बांग्लादेश (Bangladesh), श्रीलंका (Sri Lanka) और नेपाल (Nepal) में यह पेड़ प्राकृतिक प्रजाति के रूप में पाया जाता है। गुणों से भरपूर भगवान शिव को अति प्रिय इस चमत्कारिक वृक्ष को हिंदु (Hindu) धर्मावलंबी पवित्र पेड़ का दर्जा प्रदान करते हैं।

ये भी पढ़ें: श्रावण मास में उगाएंगे ये फलफूल, तो अच्छी आमदनी होगी फलीभूत

बेल के गुण इतने कि बस गिनते जाएं

बिल्व की खासियतों की यदि बात करें, तो इसकी महिमा का बखान करने वाला थक सकता है। भारत में इस पेड़ को बिल्व, बेल या बेलपत्थर, श्री फल या फिर सदाफल भी कहा जाता है। रोग निवारण में अति महत्वपूर्ण बेल के अपने ही औषधीय उपयोग हैं। इसकी औषधीय प्रकृति के कारण इसे शाण्डिल्रू (पीड़ा निवारक) भी कहा जाता है।

बेल फल की खासियत :

बिल्व, श्री फल या फिर सदाफल स्वाद में मीठा होता है। इसका कच्चा फल नहीं खाया जा सकता। फल का आवरण कैथे (कबीठ) के फल की तरह कठोर होता है। बिल्व के पेड़ में उगने वाला कच्चा फल जिसे बेल कहा जाता है, का रंग हरा होता है। पूरी तरह पक जाने पर बिल्व या बेल का फल गहरे पीले नारंगी रंग का हो जाता है। बेल के फल के पकने की यह पहचान है कि पके फल का आवरण कई बार चटक जाता है और इससे रिसकर गोंद सरीखा पदार्थ बाहर निकलने लगता है।

बेल फल के उपयोग :

इसके गूदा (मज्जा) को बल्वकर्कटी भी कहते हैं। फल के सूखे गूदे को बेलगिरी के नाम से पहचाना जाता है। पके फल को तोड़-फोड़ कर गूदा खाया जा सकता है। इसके गूदे का जूस बनाकर पीया जा सकता है, जबकि इसे संरक्षित कर कई जीवनोपयोगी खाद्य पदार्थ निर्मित किए जा सकते हैं।

ये भी पढ़ें: घर पर उगाने के लिए ग्रीष्मकालीन जड़ी बूटियां

रामबाण इलाज

इलाज में भी बेल के फल, छाल, जड़ों का प्रयोग होता है। पुराने कब्ज के उपचार में भी शिव प्रिय बेल का फल रामबाण इलाज है।

तीन पत्ती

भारत में धार्मिक महत्व से अति महत्वपूर्ण बिल्व की पत्तियों का भी अपना खास महत्व है। भगवान शिव को इस पेड़ की एक साथ जुड़ी तीन पत्तियां अर्पित की जाती हैं। इन बिल्व त्रिपत्र को त्रिदेव का स्वरूप माना गया है। पांच पत्तों के समूह वाले बिल्व पंच पत्रों को और ज्यादा शुभ माना गया है।

भगवान शिव का वास

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बिल्व वृक्ष की जड़ों में भगवान शिव का वास है। हिन्दू धर्मावलंबी इसे भगवान शिव का स्वरूप मानकर इस वृक्ष की पूजा करते हैं।

बिल्व वृक्ष खास-खास

भारत में पूजनीय इस बिल्व के वृक्ष मंदिरों, बागानों, पहाड़ों, जंगल में मिल जाते हैं। संपूर्ण भारत खास तौर पर हिमालय, सूखे पहाड़ी क्षेत्रों पर ये वृृक्ष मानव, जीव-जंतु की प्राण रक्षा कर रहे हैं। वानर सेना के लिए बिल्व के फलदार वृक्ष मौज की सैर होते हैं। तकरीबन 4 हजार फीट की ऊँचाई तक पाये जाने वाले बिल्व (Bael) के वृक्ष मध्य व दक्षिण भारत में बहुतायत में पाए जाते हैं। प्राकृतिक रूप से बिल्व वृक्ष भारत के अलावा एशिया के तमाम देशों में मिलते हैं। नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार, पाकिस्तान, बांग्लादेश, कंबोडिया एवं थाईलैंड तक इस पेड़ की स्थानीय प्रजातियां जीवनोपयोग में आती हैं।

बिल्व वृक्ष की कृषि/बागवानी में संभावनाएं

बिल्व के धार्मिक, सामाजिक, प्राकृतिक, रोगनाशक लाभों से तो आप परिचित हो ही चुके होंगे। अब बात करते हैं इसके बाजार महत्व की। अब जब बिल्व की जड़ से लेकर फल, पत्ती, छाल तक हैं बेमिसाल, तो बिल्व की नियोजित खेती से किसान भी हो सकता है मालामाल। किसान बिल्व पेड़ के कच्चे, पके फलों, पत्तों, छाल, जड़ के जरिये आमदनी का बेहतर जरिया तैयार कर सकता है। बिल्व के पेड़ों से कमाई के लिए किसान को चाइनीज कंपनियोें की तरह रणनीति तय करना होगी। जिस तरह वे अन्य देशों के तीज-त्यौहारों के पहले जरूरी साज-सजावट, फुलझड़ी, पिचकारी मार्केट में उपलब्ध करा देते हैं, उसी तरह भारतीय किसान को भी बिल्व से जुड़े बड़े बाजार के लिए पहले से तैयार होना पड़ेगा।

कांवड़ यात्रा व शिव रात्रि में अवसर

बिल्व पत्रों, उसके अंशों से कांवड़ यात्रियों के लिए पूजन सामग्री की किट तैयार की जा सकती है। मंदिरों के पास फूल विक्रेताओं के मध्य भी सावन में बिल्व पत्र की खासी डिमांड रहती है। अखंडित त्रिपत्र एवं पंचपत्र की शिवभक्तों को तलाश रहती है। अतः उन तक इन पत्रों की सप्लाई कर किसान अतिरिक्त कृषि आय सुनिश्चित कर सकता है।

मेगा फूड पार्क (Mega Food Park) में प्रबंध

मेगा फूड पार्क में एग्री प्रोडक्ट्स (कृषि उत्पाद), बतौर बिल्व के फलों के भंडारण और उसकी प्रोसेसिंग की विशिष्ट व्यवस्था कर सरकार प्राकृतिक खेती के संवर्धन की दिशा में अपनी जड़ें मजबूत कर सकती है।

ये भी पढ़ें: भारत में 2 बिलियन डॉलर इन्वेस्ट करेगा UAE, जानिये इंटीग्रेटेड फूड पार्क के बारे में
मेगा फूड पार्क में भंडारित बिल्व के फलों को पैक्ड जूस, जैम, जैली, मुरब्बा, मेडिसिन, चूर्ण के स्वरूप में अंतर राष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाया जा सकता है। इंटरनेशनल मार्केट में जैविक खाद्य उत्पाद के प्रति बढ़ते रुझान के बीच भारतीय औषधी एवं खाद्य पदार्थों पर उपभोक्ता खासा भरोसा भी करते हैं। भारत में आम तौर पर जंगली समझे जाने वाले इन चमत्कारिक गुणों से भरपूर अनमोल फलों को मेगा फूड पार्क में तराशकर, बिल्व उत्पाद का मूल्य संवर्धन किया जा सकता है। भारत में प्रस्तावित 42 मेगा फूड पार्क में से देश में कार्यरत 22 मेगा फूड पार्क में, भारत में व्यापक रूप से उपलब्ध बिल्व के फलों की सप्लाई कर किसान अपनी कृषि कमाई में इजाफा कर सकते हैं। इंटरनेशनल मार्केट में बेल (Bael) निर्मित खाद्य पदार्थों की खासी डिमांड है।

अवसर अपार

आम तौर पर भारत में बिल्व के पेड़ों की उपलब्धता जंगली स्वरूप में है। नर्सरी में इन चमत्कारी पेड़ों का विस्तार अभी प्राथमिक स्वरूप में कहा जा सकता है। इसकी खेती पूरे भारत के साथ श्रीलंका, उत्तरी मलय प्रायद्वीप, जावा एवं फिलीपींस तथा फीजी द्वीपसमूह में की जाती है। जैविक उत्पादों के प्रति आकर्षित हो रहे देशी-विदेशी खरीदारों के लिए बेल निर्मित गुणकारी उत्पाद बनाकर किसान कम लागत पर अपनी कई गुना अधिक आय सुनिश्चित कर सकते हैं।

श्रेणी