लौकी की खेती से संबंधित विस्तृत जानकारी

Published on: 07-Jun-2023

लौकी की खेती मुख्यतः रबी, खरीफ व जायद तीनों सीजन में की जाने वाली बागवानी फसल है। लौकी को घिया और दूधी के नाम से भी जाना जाता है। लौकी की खेती भारत के तकरीबन समस्त राज्यों में की जाती है। लौकी की फसल समलत खेत, पेड़-पौधे, मचान निर्मित कर व घर की छतों पर बड़ी ही सहजता से की जा सकती है। आगे हम आपको लौकी की खेती के विषय में जानकारी देने वाले हैं।

लौकी की खेती

अगर हम हरी सब्जियों की बात करें तो लौकी का नाम सबसे पहले आता है। यह लोगों के शरीर के लिए काफी फायदेमंद होती है। लौकी के अंदर विटमिन बी, सी, आयरन, मैग्नीशियम, पोटैशियम एवं सोडियम आदि भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इसका उपयोग मधुमेह, वजन कम करने, पाचन क्रिया, कोलेस्ट्रॉल को काबू में करने एवं नेचुरल ग्लो के लिए लौकी काफी ज्यादा लाभदायक होती है।

लौकी की खेती की विस्तृत जानकारी

  • लौकी की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु
  • लौकी की खेती के लिए गर्म व आर्द्र जलवायु अच्छी मानी जाती है।
  • बीज अंकुरण के लिए लगभग 30 से 35 डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान होना चाहिए।
  • पौधों के विकास के लिए 32 से 38 डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान उपयुक्त होता है।


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लौकी की खेती के लिए भूमि कैसी होनी चाहिए

लौकी की खेती जीवांश युक्त जल धारण क्षमता वाली बलुई दोमट भूमि सबसे उपयुक्त मानी जाती है। लौकी की खेती कुछ अम्लीय भुमि के अंतर्गत भी की जा सकती है। लौकी की फसल के लिए 6.0 से 7.0 पीएच वाली मृदा सबसे अच्छी मानी जाती है। खेत से जल निकासी की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।

लौकी की खेती के लिए भूमि की तैयारी कैसे करें

  • लौकी की खेती के लिए भूमि की तैयारी करने के दौरान 8 से 10 टन गोबर की खाद एवं 2.5 किलोग्राम ट्रिकोडेर्मा प्रति एकड़ की दर से खेत में डालें।
  • खाद डालने के उपरांत खेत की बेहतर ढ़ंग से गहरी जुताई कर पलेवा कर दें।
  • पलेवा करने के 7 से 8 दिन उपरांत 1 बार गहरी जुताई करदें।
  • इसके उपरांत कल्टीवेटर से 2 बार आडी-तिरछी गहरी जुताई कर पाटा कर खेत को समतल कर लें।

लौकी की बिजाई हेतु समुचित समय

  • खरीफ (वर्षाकालीन) में बुआई का समय- 1 जून से 31 जुलाई के मध्य फसल अवधि- 45 से 120 दिन है
  • जायद (ग्रीष्मकालीन) में बुआई का समय- 10 जनवरी से 31 मार्च के मध्य फसल अवधि- 45 से 120 दिन है
  • रबी के लिए बुआई का समय- सितंम्बर-अक्टूबर

लौकी की प्रजातियां

काशी गंगा

  • काशी गंगा किस्म की लौकी की बढ़वार मध्यम होती है।
  • इसके तने में गाठें काफी हद तक पास-पास होती है।
  • इस किस्म की लौकी का वजन तकरीबन 800 से 900 ग्राम होता है।
  • इस प्रजाति को आप गर्मियों में 50 एवं बरसात में 55 दिनों के समयांतराल पर तोड़ सकते हैं।
  • इस किस्म से लगभग 44 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादन लिया जा सकता है।

काशी बहार

  • इस किस्म की लौकी 30 से 32 सेंटीमीटर लंबी एवं 7-8 सेंटीमीटर व्यास होती है।
  • काशी बहार लौकी का वजन लगभग 780 से 850 ग्राम के मध्य होती है।
  • इस किस्म से 52 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादन लिया जा सकता है।
  • इस किस्म को गर्मी एवं बरसात दोनों मौसम हेतु अनुकूल मानी जाती है।


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पूसा नवीन

  • पूसा नवीन प्रजाति बेलनाकार की होती है।
  • इस किस्म की लौकी का वजन तकरीबन 550 ग्राम तक होता है।
  • इस किस्म से 35 से 40 टन प्रति हेक्टेयर की पैदावार अर्जित की जा सकती है।

अर्का बहार

  • इस किस्म की लौकी मध्यम आकार एवं सीधी होती है।
  • इस किस्म की लौकी का वजन लगभग एक किलोग्राम तक होता है।

पूसा संदेश

  • इस किस्म का फल बिल्कुल गोलाकार होता है।
  • इस प्रजाति की लौकी का वजन लगभग 600 ग्राम तक होता है।
  • पूसा संदेश गर्मी में 60 से 65 दिन तो वहीं बरसात में 55 से 60 दिन में तैयार हो जाती है।
  • इस किस्म से 32 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादन अर्जित किया जा सकता है।

पूसा कोमल

  • लौकी की यह किस्म 70 दिनों में पककर तैयार हो जाती है
  • पूसा कोमल किस्म लंबे आकार की होती है।
  • इस किस्म से 450 से 500 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन लिया जा सकता है।

नरेंद्र रश्मि

  • नरेंद्र रश्मि किस्म की लौकी का वजन लगभग 1 किलोग्राम होता है।
  • इसके फल छोटे एवं हल्के हरे रंग के होते हैं।
  • नरेंद्र रश्मि से 30 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादन लिया जा सकता है।

लौकी की खेती हेतु बीज की मात्रा

लौकी की 1 एकड़ फसल उगाने के लिए 1 से 1.5 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है।

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बीज उपचार

हाइब्रिड बीज कम्पनियों द्वारा उपचारित करके बाजार में भेजते हैं, तो इसको उपचारित करने की जरुरत नहीं पड़ती है। इसकी सीधे बिजाई की जाती है। यदि आपने लौकी का बीज घर पर बनाया है, तो उसको उपचारित करना जरूरी है। लौकी के बीज की बिजाई से पूर्व 2 ग्राम कार्बोनडाज़िम / किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर लें।

लौकी की बुआई का तरीका

  • लौकी की बिजाई के दौरान पौधे से पौधे की दूरी 60 सेमी।
  • पंक्ति से पंक्ति का फासला 150 से 180 सेमी रखें।
  • लौकी के बीज की 1 से 2 सेमी की गहराई पर बिजाई करें।

लौकी की खेती मे उर्वरक व खाद प्रबंधन

  • लौकी की फसल के लिए खेत तैयार करने के दौरान खेत में 8 से 10 टन गोबर की खाद और 2.5 किलोग्राम ट्रिकोडेर्मा प्रति एकड़ की दर से खेत में डालनी चाहिए।
  • लौकी की बिजाई के दौरान 50 किलोग्राम डी ऐ पी ( DAP ), 25 किलोग्राम यूरिया ( Urea ), 50 किलोग्राम पोटाश ( Potash ), 8 किलोग्राम जायम, 10 किलोग्राम कार्बोफुरान प्रति एकड़ के हिसाब से खेत में डालें।
  • लौकी की बिजाई के 20 से 25 दिनों उपरांत 10 ग्राम NPK 19 : 19:19 को 1 लीटर पानी मैं घोलकर प्रति एकड़ के हिसाब से फसल पर छिड़काव करें।
  • लौकी की बिजाई के 40 से 45 दिन बाद 50 किलोग्राम यूरिया को प्रति एकड़ के हिसाब से इस्तेमाल करें।
  • लौकी की बिजाई के 50 से 60 दिन पर 10 ग्राम NPK 0:52:34 एवं 2 मिली टाटा बहार को 1 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ के मुताबिक इस्तेमाल करें।

लौकी की खेती मे सिंचाई

  • जायद की फसल हेतु 8-10 दिनों के समयांतराल पर सिंचाई करें।
  • खरीफ फसल में सिंचाई बारिश के अनुरूप की जाती है, वर्षा न होने की हालत में सिंचाई।
  • खेत की नमी के मुताबिक रबी की फसल में 10 से 15 दिन की समयावधि पर सिंचाई करें।

लौकी की फसल को प्रभावित करने वाले कीड़े

लाल कीडा : पौधो पर दो पत्तियां निकलने के उपरांत इस कीट का प्रकोप चालू हो जाता है। यह कीट पत्तियों व फूलों को खा कर फसल को बर्बाद कर देता है। यह कीट लाल रंग व इल्ली हल्के पीले रंग की होती है। इस कीट का सिर भूरे रंग का होता है।

लाल कीड़ा की रोकथाम कैसे करें

  • खेत की नराई/गुड़ाई करके खेत को साफ सुथरा रखें।
  • फसल कटाई के उपरांत खेत की गहरी जुताई करनी चाहिए, जिससे मृदा में छिपे कीट और उनके अण्डे ऊपर पहुँच कर सूर्य की गर्मी अथवा चिडियों द्वारा खत्म कर दिए जायेंगे।
  • कार्बोफ्यूरान 3 प्रतिशत दानेदार 7 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से पौधे से 3 से 4 सेमी. फासले से डालकर खेत में पानी लगाए।
  • कीटों की संख्या अधिक होने पर डायेक्लोरवास 76 ई.सी. 300 मि.ली. प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करें।

फल मक्खी

प्रौढ़ फल मक्खी घरेलू मक्खी के आकार की लाल भूरे अथवा पीले भूरे रंग की होती है। इसके सिर पर काले अथवा सफेद धब्बे मौजूद होते हैं। इस कीट की मादा फलों को भेदकर भीतर अण्डे देती है। अण्डे से निकलने वाली इल्लियां फलों के गूदे को खा जाती हैं, जिसकी वजह से फल काफी सड़ने लग जाता है। बरसात में की जाने वाली फसल पर इस कीट का प्रकोप ज्यादा होता है।

फल मक्खी की रोकथाम किस प्रकार की जाती है

  • खराब और नीचे गिरे हुए फलों को अतिशीघ्र नष्ट कर देना चाहिए।
  • जो फल भूमि के संपर्क में आते हैं। उनको समयानुसार पलटते रहना चाहिए।
  • इसके प्रकोप से फसल का संरक्षण करने के लिए 50 मीली, मैलाथियान 50 ई.सी. एवं 500 ग्राम शीरा अथवा गुड को 50 लीटर पानी में मिश्रित कर छिड़काव करें। एक सप्ताह के उपरांत फिर से छिड़काव करें।

लौकी के मुख्य रोग

चुर्णी फफूंदी

यह रोग फफूंद के कारण फसल पर आता है। सफेद दाग एवं गोलाकार जाल सा पत्तियों एवं तने पर नजर आता है। जो कि बाद मे बढ़कर कत्थई रंग में तब्दील हो जाता है। इसके रोग के प्रकोप से पौधों की पत्तियां पीली पड़कर सूख जाती हैं। इसके प्रकोप से पौधों का विकास बाधित हो जाता है।

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चुर्णी फफूंद रोग की रोकथाम ऐसे करें

  • रोगी पौधे को उखाड़ कर मृदा में दबा दें अथवा उनको आग लगाकर जला दें।
  • फसल को इस प्रकोप से बचाने हेतु घुलनशील गंधक जैसे कैराथेन 2 प्रतिशत अथवा सल्फेक्स की 0.3 प्रतिशत रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखाई पड़ते ही कवकनाशी दवाइयों का इस्तेमाल 10‐15 दिन के अंतराल पर करना चाहिए।

उकठा (म्लानि)

इस रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियाँ मुरझाके नीचे की तरफ लटक जाती हैं एवं पत्तियाँ के किनारे बिल्कुल झुलस जातें हैं। इस रोग से बचाव के लिए फसल चक्र अपनाना अति आवश्यक होता है। बीज को वेनलेट अथवा बाविस्टिन 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार करना चाहिए।

लौकी की तुड़ाई एवं पैदावार

लौकी की तुड़ाई उनकी किस्मों पर आधारित होती हैं। लौकी के फलों को पूरी तरह से विकसित होने पर कोमल अवस्था में ही तोड़ लेना चाहिए। बुवाई के 45 से 60 दिनों के पश्चात लौकी की तुड़ाई चालू हो जाती है। प्रति हेक्टेयर जून‐जुलाई एवं जनवरी‐मार्च वाली फसलों में क्रमश 200 से 250 क्विंटल एवं 100 से 150 क्विंटल उत्पादन लिया जा सकता है।

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