चुकंदर की खेती से जुड़ी जानकारी (How To Cultivate Beetroot Farming)

Published on: 01-Jul-2023

चुकंदर की खेती शरद इलाकों में की जाती है। भारत में चुकंदर की खेती राजस्थान, पंजाब, उत्तराखण्ड, काश्मीर और हिमाचल प्रदेश के शरद इलाकों में रबी के सीजन में की जाती है। इस आर्टिकल के माध्यम से चुकंदर की खेती करने की सही व सटीक जानकारी देने वाले हैं। यदि आप चुकंदर की खेती करना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए काफी सहयोगी साबित होगा।

चुकंदर विभिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न नामों से मशहूर है

चुकंदर एक कंदवर्गीय श्रेणी में आने वाली फसल है। चुकंदर का उपयोग सब्जी, सलाद और फल के तौर पर किया जाता है। चुकंदर से जुड़ी एक मशहूर कहावत है ‘फल एक, गुण अनेक’ चुकंदर के अंदर प्रचूर मात्रा में आयरन मोजूद मात्रा रहता है। चुकंदर का सेवन करने से शरीर में खून की मात्रा काफी बढ़ती है एव इसके अंदर कैंसर रोधी क्षमता भी विघमान होती है। चुकंदर भारत के विभिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है। जैसे कि – बांग्ला में बीटा गांछा, हिंदी पट्टी में चुकंदर, गुजरात में सलादा, कन्नड़ भाषा में गजारुगद्दी, मलयालम में बीट, मराठी में बीटा, पंजाबी में बीट और तेलुगु में डंपामोक्का के नाम से मशहूर है।

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चुकंदर की खेती हेतु उपयुक्त मृदा

चुकंदर की खेती से बेहतरीन उत्पादन अर्जित करने के लिए बलुई दोमट मृदा को सबसे अनुकूल माना जाता है। इसकी खेती करने के लिए भूमि का P.H. मान 6 से 7 के मध्य होना बेहद जरुरी होता है। खेत में जल निकासी की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। क्योंकि जलभराव जैसी परिस्थिति में इसके पौधे सड़ने शुरू हो जाते हैं। आयरन, विटामिन-सी, विटामिन-B, मैग्नीशियम, कैल्शियम, आयोडीन और पोटेशियम से भरपूर चुकंदर की खेती के लिए 18-21 डिग्री सेल्सियस तापमान सबसे उपयुक्त माना जाता है।

चुकंदर की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु

भारत की जलवायु के मुताबिक, चुकंदर की खेती करने का सबसे उत्तम समय अक्टूबर के प्रथम सप्ताह से लगाकर जनवरी-फरवरी तक होता है। क्योंकि सर्दियों के मौसम में इसके पौधे बड़ी तीव्रता से प्रगति करते हैं। चुकंदर की खेती अधिकांश गर्मी के मौसम में भूल कर भी न करें। हालांकि, अत्यधिक ठंड एवं पाला इसके उत्पादन को प्रभावित भी कर सकता है।

चुकंदर की खेती हेतु उन्नत किस्में

बाजार में चुकंदर की विभिन्न उन्नत किस्में उपस्थित हैं। परंतु, उत्पादन की दृष्टि से तैयार की जाने वाली किस्मों में अर्ली वंडर, मिस्त्र की क्रॉस्बी, रूबी रानी, रोमनस्काया, एम.एस.एच.–102, डेट्रॉइट डार्क रेड और क्रिमसन ग्लोब शम्मिलित हैं।

चुकंदर की खेती के लिए भूमि की तैयारी

चुकंदर की खेती करने से पूर्व खेत को कल्टीवेटर एवं रोटावेटर के जरिए से एक बार खेत को गहरा जोत लें। इसके पश्चात खेती की 2-3 हल्की जुताई करने के उपरांत ही बीजों की बिजाई करें। यदि चुकंदर की फसल से बेहतरीन उत्पादन लेना चाहते हैं, तो खेत तैयार करने के दौरान प्रति एकड़ खेत में 4 टन गोबर की खाद डालकर मिलाएं।

चुकंदर की बुवाई किस प्रकार करें

चुकंदर की बुवाई दो विधि से की जाती है, इसमें पहली छिटकवा विधि और दूसरी मेड़ विधि है। छिटकवा विधि – इस विधि के अंतर्गत क्यारी बनाकर बीजों को फेंक कर बुवाई की जाती है। इसके लिए प्रति एकड़ 4 किलो बीज लगता हैं। मेड़ विधि – इस विधि के अंतर्गत 10 इंच के फासले पर मेड़ तैयार कर बीजों की बुवाई की जाती है। इसमें पौधे से पौधे का फासला 3 इंच रखा जाता है। साथ ही, आधे सेंटीमीटर की गहराई पर बीज की बुवाई की जाती है।

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चुकंदर की खेती में उवर्रक एवं सिंचाई प्रबंधन

चुकंदर की फसल के लिए सिंचाई की कोई खास अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इसकी फसल के लिए हल्की सिंचाई की जरूरत होती है। फसल बिजाई के 15 दिनों में पहली सिंचाई एवं उसके 5 दिन उपरांत दूसरी बार सिंचाई कर देनी चाहिए। अगर बारिश नहीं हो पा रही है, तो 8-10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें। चुकंदर की खेती के लिए 50 किलो यूरिया, 70 किलो डी.ए.पी मतलब डाई-एमोनियम फॉस्फेट और 40 किलो पोटाश प्रति एकड़ खेत में डालें। यदि आप खेत में जैविक खाद डालते हैं तो नतीजा अच्छा आता है। यदि आपके खेत में बोरॉन की कमी है, तो सर्वप्रथम आपको खेत की मृदा का परीक्षण करा लेना चाहिए। बोरॉन की कमी से पौधों की जड़ें कमजोर अथवा टूटने लगती हैं। इससे बचाव के लिए मृदा में बोरिक एसिड अथवा बोरेक्स मिलाएं।

चुकंदर की खेती में रोग और कीट नियंत्रण कैसे करें

चुकंदर की फसल में खरपतवार की रोकथाम करने के लिए 25 से 30 दिनों के उपरांत निराई-गुड़ाई जरूर कर देनी चाहिए। यदि चुकंदर की फसल में रोग लग जाए तो समुचित मात्रा में रसायन का छिड़काव कर फसल का संरक्षण किया जा सकता है। रेड स्पाइडर, एफिड्स, फ्ली बीटल और लीफ खाने वाले कीड़ों से सुरक्षा हेतु 2 मिली मैलाथियान 50 ईसी प्रति 1 लीटर पानी का छिड़काव करके नियंत्रित करें। रोग नियंत्रण हेतु कृषि वैज्ञानिकों की राय अवश्य लें। रोपण से पूर्व बीजों का सही चयन बेहतर परिणाम देता है। साथ ही, कीट प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ाता है।

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