इस घास से किसानों की फसल को होता है भारी नुकसान, इसको इस तरह से काबू में किया जा सकता है

Published on: 04-May-2023

भारत में खेती-किसानी से काफी मोटी आमदनी अर्जित करने के लिए मुनाफा प्रदान करने वाली फसलों समेत हानि पहुँचाने वाली फसलों का भी ख्याल रखना बहुत आवश्यक होता है। क्योंकि एक छोटी घास भी काफी बड़ी हानि पहुंचाती है। इसी मध्य आपको एक ऐसी ही घास के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसकी वजह से फसल को 40 प्रतिशत तक हानि पहुंच सकती है, जिससे बचना काफी जरूरी हो जाता है। बतादें, कि देश में कृषि के अंतर्गत फसलों में सर्वाधिक हानि खरपतवारों की वजह मानी जा रही है। यह हानिकारक घास पौधों का पोषण सोखकर उनको कमजोर कर देती है। साथ ही, कीट-रोगों को भी निमंत्रण दे देती है, जिसके वजह से फसलों की पैदावार 40 प्रतिशत कम हो जाती है।

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गाजर घास खेतों में तबाही मचाने वाली इन्हीं परेशानियों में सम्मिलित है, जिसके संपर्क में आते ही फसलें ही नहीं लोगों का स्वास्थ्य भी बुरी तरह प्रभावित होती है। इस प्रकार के खरपतवारों पर नियंत्रण करने के लिए कृषि विशेषज्ञों की ओर से निरंतर प्रबंधन एवं निगरानी करने की राय दी जाती है। जिससे कि किसान भाई अपनी फसल में वक्त से ही खरपतवारों पर नियंत्रण पाया जा सके। साथ ही, फसलों में हानि होने से रोकी जा सके।

गाजर घास से क्या-क्या हानि होती है

बेहद कम लोग इस बात से अवगत हैं, कि खेतों में गाजर घास उगने पर फसलों के साथ-साथ किसानों के स्वास्थ पर भी दुष्प्रभाव पड़ा है। इसके संपर्क में आते ही बुखार, दमा, एग्जिमा और एलर्जी जैसी बीमारियों की आशंका बढ़ जाती है। यह घास फसलों की पैदावार और उत्पादकता पर प्रभाव डालती है। विशेष रूप से अरण्डी, गन्ना, बाजरा, मूंगफली, मक्का, सोयाबीन, मटर और तिल के साथ साथ सब्जियों सहित बहुत सारी बागवानी फसलों पर इसका प्रभाव देखने को मिलता है। इसके चलते फसल के अंकुरण से लेकर पौधों का विकास तक संकट में रहता है। इसके प्रभाव की वजह से पशुओं में दूध पैदावार की क्षमता भी कम हो जाती है। इसकी वजह से पशु चारे का स्वाद भी कड़वा हो जाता है। साथ ही, पशुओं के स्वास्थ्य पर भी दुष्प्रभाव पड़ने लगता है। कहा जाता है, कि फसलों पर 40 प्रतिशत तक की हानि होती है।

नुकसानदायक गाजर घास भारत में कैसे आई थी

बतादें, कि यह घास भारत के प्रत्येक राज्य में पाई जाती है। यह लगभग 35 मिलियन हेक्टेयर में फैली हुई है। यह घास खेत खलिहानों में जम जाती है। आस-पास में उगे समस्त पौधों का टिकना कठिन कर देती है, जिसके चलते औषधीय फसलों के साथ-साथ चारा फसलों की पैदावार में भी कमी आती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह घास भारत की उपज नहीं है। यह वर्ष 1955 के समय अमेरिका से आयात होने वाले गेहूं के माध्यम से भारत आई। समस्त प्रदेशों में गेहूं की फसल के माध्यम से फैली है।

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गाजर घास को किस तरह से नियंत्रण में लाया जा सकता है

गाजर घास को नियंत्रित करने हेतु बहुत सारे कृषि संस्थान और कृषि वैज्ञानिक जागरुकता अभियान का संचालन करते हैं, जिससे जान-मान का खतरा नहीं हो सके। साथ ही, एग्रोनॉमी विज्ञान विभाग खरपतवार अनुसंधान निदेशालय, जबलपुर और चौधरी सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय और हिसार किसानों से जानकारियां साझा कर रहे हैं। वहीं, कुछ कृषि विशेषज्ञ रोकथाम करने हेतु खरपतवारनाशी दवायें जैसे- सोडियम क्लोराइड, सिमाजिन, एट्राजिन, एलाक्लोर और डाइयूरोन सल्फेट आदि के छिड़काव की सलाह दे रहे हैं। इसके अतिरिक्त इसके जैविक निराकरण के तौर पर एक एकड़ हेतु बीटल पालने की राय दी जाती है। प्रति एकड़ खेत में 3-4 लाख कीटों को पालकर गाजर घास का जड़ से खत्मा किया जा सकता है। चाहें तो जंगली चौलाई, केशिया टोरा, गेंदा, टेफ्रोशिया पर्पूरिया जैसे पौधों को पैदाकर के भी इसके प्रभाव से बचा जा सकता है।

गाजर घास के बहुत सारे फायदे भी हैं

वैसे तो गाजर घास खरपतवारों के तौर पर फसलों के लिए बड़ी परेशानी है। परंतु, इसमें विघमान औषधीय गुणों की वजह से यह संजीवनी भी बन सकती है। किसान इसका उपयोग वर्मीकंपोस्ट यूनिट में किया जा सकता हैं। जहां यह खाद के जीवांश एवं कार्बनिक गुणों में वृद्धि करती है। साथ ही, एक बेहतरीन खरपतवारनाशक, कीटनाशक और जीवाणुनाशक दवा के रूप में भी इसका उपयोग किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त मृदा के कटाव को रोकने के लिए भी गाजर घास की अहम भूमिका है। इस वजह से किसान सावधानी से गाजर घास का प्रबंधन कर सकते हैं।

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