महंगी तार फैंसिंग नहीं, कम लागत पर जानवर से ऐसे बचाएं फसल, कमाई करें डबल

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नीलगाय, हिरन फटकेंगे नहीं पास
फसल सुरक्षा के साथ सेफ एक्स्ट्रा इनकम
जानिए मॉडर्न बिजूका संग कई फलदार तरीके

चीज अगर कीमती हो तो फिर उसकी सुरक्षा भी सर्वोपरि है। जीवन की सभी सुख सुविधाओं के उद्भव केंद्रबिंदु अनाज, फल, फसल जैसे बेशकीमती प्राकृतिक उपहार की रक्षा, उससे भी ज्यादा अहम होनी चाहिए। भारत में खेती किसानी की रक्षा के मामले में स्थिति जरा उलट है।

देश मे खेतों की नीलगाय, हिरन, जंगली शूकर, आवारा मवेशियों से सुरक्षा के लिए इन दिनों कंटीले तारों की फेंसिंग का चलन देखा जा रहा है। यह तरीका बाप-दादाओं के जमाने से चली आ रही खेत की सुरक्षा युक्ति के मुकाबले जरा महंगा है।

तार की बाउंड्री के अलावा और किस तरह फसल की जानवरों से रक्षा की जा सकती है, किस तरीके की सुरक्षा के क्या अल्प एवं दीर्घ कालिक लाभ हैं, कंटीले तार की फेंसिंग के क्या लाभ, हानि खतरे हैं, जानिये मेरीखेती के साथ।

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तार फेंसिंग लाभ, हानि, खतरे

शुरुआत करते हैं खेत के चारों ओर कटीले तारों को लगाने के मौजूदा प्रचलित तरीके से। इस तरीके से खेत की सुरक्षा में तारों की फेंसिंग के लिए सीमेंट के पिलर आदि से लेकर तारों की क्वालिटी के आधार पर सुरक्षा की लागत तय होती है। पिलर के लिए गड्ढे खोदने पर भी मजदूरी आदि पर व्यय करना पड़ता है।

तार चोरी का खतरा

तार फेंसिंग की एक टेंशन ये भी है कि, इस तरह की खेत की सुरक्षा में महंगी क्वालिटी के तारों के चोरी होने का डर रहता है। भारत में खेत से तारों के चोरी होने के कई मामले आए दिन प्रकाश में आते रहते हैं। कटीले तारों के मौसमी प्रभाव से खराब होने का भी खतरा रहता है। कटीले तारों से खेतों की सुरक्षा कई बार किसानों के लिए फायदे के बजाए नुकसान का सौदा साबित हुई है।

नीलगाय जैसे बलशाली एवं कुलाचें मारने में माहिर हिरणों के झुंड के सामने, तार फेंसिंग भी फेल हो जाती है। बलशाली नीलगाय के झुंड जहां तार फेंसिंग को धराशाई कर फसल चौपट कर देते हैं, वहीं हिरन झुंड छलांग मार खेत की फसल चट कर खेत से पलक झपकते ओझल हो जाते हैं।

तार की फेंसिंग में फंसने या फिर इसमें चूकवश प्रवाहित करंट की चपेट में आने से जन एवं पशुधन की हानि के कारण मामले थाना, कोर्ट, कचहरी से लेकर जेल की सैर तक जाते देखे गए हैं।

प्राकृतिक विकल्प श्रेष्ठ विचार

हालांकि प्राकृतिक तरीका एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है, लेकिन इसमें नुकसान के बजाए फायदे ही फायदे हैं। इस तरीके से खेत की बाड़, बागड़ या फेंसिंग के लिए तार जैसे कृत्रिम विकल्पों के बजाए प्रकृति प्रदत्त पौधों आधारित विकल्पों से खेत और फसल की सुरक्षा का प्रबंध किया जाता है।

कुछ पेड़, पौधे हैं जिन्हें खेत की सीमा पर लगाकर अतिरिक्त कृषि आमदनी से भरपूर बाड़ सुरक्षा तैयार की जा सकती है। इसमें किसी एक पेड़, पौधे, वृक्ष या फिर इनके मिश्रित प्रयोग से वर्ष भर के लिए मिश्रित कृषि जनित आय का भी कुशल प्रबंध किया जा सकता है।

तो शुरुआत करते हैं बिसरा दिए गए उन ठेठ देसी तरीकों से, जिनमें आधुनिक तकनीक का तड़का लगाकर और भी ज्यादा श्रेष्ठ नतीजे हासिल किए जा सकते हैं।

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मॉडर्न बिजूका (Scarecrow)

घर की छत पर बुरी नजर से बचाने टंगी काली मटकी या लटके पुराने जूते की ही तरह खेती किसानी की सुरक्षा का पीढ़ी दर पीढ़ी आजमाया जाने वाला खास टोटका है, बिजूका।

भारत का शायद ही ऐसा कोई खेत हो जहां बिजूका के हिस्से जमीन न छोड़ी जाती हो। मवेशी से फसल सुरक्षा के लिए इस युक्ति में खेत के चारों ओर सुरक्षा दायरा बनाने के बजाए महज बांस और मिट्टी की मटकी और पुराने कपड़ों से इंसान की मौजूदगी के लिए बिजूका जैसे भ्रम का ताना-बाना बुना जाता है।

ऐसी प्रयोगजनित मान्यता है कि हवा में बिजूका की मटकी अपने आप हिलती-डुलती है और कपड़े लहराते हैं, तो जानवरों को खेत में इंसान के होने का आभास होता है और वे दूसरे खेत की राह पकड़ लेते हैं। घासपूस और कपड़ों का बनाया गया पुतला जिसे बिजूका कहा जाता है, दिन रात बगैर थके, मुस्कुराते हुए किसान के गाढ़े पसीेने की कमाई की रक्षा में रत रहता है।

हालांकि बिजूका को अब तकनीक की सुलभता के कारण आधुनिक स्वरूप भी दिया जा सकता है। अब बिजूका को बाजार में सस्ती कीमत पर मिलने वाले एफएम या मैमोरी की सहायता से चलने वाले लाउड स्पीकर के जरिए मॉडर्न बनाया जा सकता है। लाउड स्पीकर के जरिए ऐसे जानवरों की रिकॉर्डेड आवाज जिनसे फसल को नुकसान पहुंचाने वाले जानवर डरते हैं, पैदा कर भ्रम में इंसान की मौजूदगी का और गहरा एवं असरकारक प्रभाव निर्मित किया जा सकता है। आप भी आजमा के देखिये। बस इसके लिए आपको जानवरों की डरावनी आवाज वाली ऑडियो लाइब्रेरी का जुगाड़ करना होगा।

नीलगाय समस्या का हर्बल इलाज

प्रकृति प्रदत्त संसाधनों से, बगैर कृत्रिम रासायनिक पदार्थों की मदद लिए प्राकृतिक तरीके से तैयार हर्बल घोल नीलगाय को भगाने का कारगर उपाय बताया जाता है। कृषि वैज्ञानिकों ने खेत से नीलगायों के झुंड को दूर रखने घरेलू और परंपरागत हर्बल नुस्ख़ों पर प्रकाश डाला है।

काफी कम लागत में तैयार हर्बल घोल खेत में उपलब्ध संसाधनों से ही अल्प समय में रेडी हो जाता है। गोमूत्र, मट्ठा और लालमिर्च के अलावा नीलगाय के मल, गधे की लीद इत्यादि के मिश्रण से तैयार हर्बल घोल की गंध से नीलगाय और दूसरे जानवर दूर रहते हैं। इस हर्बल घोल का खेत की परिधि के आसपास छिड़काव करने से जानवरों से खेत की सुरक्षा संभव है। इस तरीके से कम से कम 20 दिन तक खेत की नीलगायों के झुंड से सुरक्षा होने के अपने-अपने दावे हैं। रामदाने की खुशबू से भी नीलगाय दूर रहती है।

कृषि विज्ञान केंंद्र या कृषि समस्या समाधान संबंधी कॉल सेंटर से भी हर्बल घोल बनाने की विधि के बारे में जानकारी हासिल की जा सकती है।

खेत की मेढ़ के किनारे या आसपास करौंदा, जेट्रोफा, तुलसी, खस आदि लगाकर भी नीलगाय से फसल सुरक्षा की जा सकती है।

बांस का जंजाल

बांस के पौधे, खेत की मेढ़ किनारे नियोजित तरीके से कतार में रोपकर, खेत की जानवरों से सुरक्षा का अच्छा खाका तैयार किया जा सकता है। किसी भी तरह की मिट्टी पर विकसित होने मेें सक्षम बांस, हर हाल में भविष्य के लिए मुनाफे भरा निर्णय है।

बांस के पौधे सामान्यतः तीन से चार साल में परिपक़्व हो जाते हैं। इससे किसान मित्र कृषि आय का अतिरिक्त जरिया भुना सकते हैं। खेत की मेढ़ पर बैंबू कल्टीवेशन (Bamboo Cultivation), यानी बांस की पैदावार कर किसान को 40 सालों तक कमाई सुनिश्चित है। किसानों की आय में वृद्धि करने भारत सरकार ने बांस की खेती के लिए  राष्ट्रीय बांस मिशन (National Bamboo Mission) की शुरुआत की है। इसमें किसानों के लिए आर्थिक सहायता का प्रावधान किया गया है।

बांस के फायदों और सुनिश्चित लाभ के बारे में विस्तार से जानने के लिए शीर्षक को क्लिक करें: जानिये खेत में कैसे और कहां लगाएं बांस ताकि हो भरपूर कमाई

बेर से फेंसिंग

हरी, पीली, लाल, नारंगी, रंग-बिरंगी, खट्टी-मीठी बेर के पौधों को खेत की सीमा पर चारों ओर नियोजित कतार में लगाकर खेत की प्राकृतिक रूप से सुरक्षा की जा सकती है। आम तौर पर जंगली समझा जाने वाला यह फलदार पौधा, ज्यादा देखभाल के अभाव में भी अपना विस्तार करने में सक्षम है।

बारिश में यह खास तौर पर तेजी से बढ़ता है। नर्सरी में तैयार उच्च किस्म के बेर के पौधे कम समय में कृषि आय प्रदान करने में सक्षम होते हैं।
नर्सरी में तैयार पौधों पर अपने आप पनपने वाले पेड़ों की तुलना में अधिक मात्रा में बेर के फलों की पैदावार होती है। इनके कंटीले तनों के कारण खेत की भरपूर सुरक्षा होती है, क्योंकि जानवरों को इसमें प्रवेश करने में दिक्कत होती है।

मार्च अप्रेल में कच्चे फल बेचकर किसान जहां मौसमी कमाई कर सकता है, वहीं सूखे बेर के लिए चूरन, बोरकुट, गटागट जैसे उत्पादों के लिए निर्माताओं के बीच तगड़ी डिमांड रहती है।

करौंदा के पेड़

करौंदा भी बेर की ही तरह कंटीले पौधों की एक फलदार प्रजाति है। मौसमी फल का यह पौधा भी कृ़षि आय में वृद्धि के साथ ही खेत की सुरक्षा में कारगर प्रबंध हो सकता है। खेत की मेढ़ के पास नियोजित तरीके से करौंदा की बागड़ से जहां खेत की सुरक्षा हो सकती है, वहीं मौसम में फल से एक्स्ट्रा फार्म इनकम भी सुनिश्चित हो जाती है।

कांटा युक्त करौंदा का पौधा, झाडिय़ों के स्वरूप में अपना विस्तार करता है। गर्म जलवायु तथा सूखा माहौल सहने में सक्षम करौंदा विषम परिस्थितियों में भी जीवित रहता है। खास तौर पर किसी भी तरह की मिट्टी में करौंदा ग्रोथ करने लगता है।

विदेशी प्रजातियों की बात करें तो लागत और संसाधन की उपलब्धता के आधार पर जैपनीज़ होली, जहरीली बेल के अलावा गैर जहरीली इंगलिश आइवी बेल, अमेरिकन होली, फर्न्स, क्‍लीमेंटिस, सीडर्स ट्री लगाकर भी खेत की सुरक्षा का प्रबंध किया जा सकता है। हालांकि इन पौधों से अतिरिक्त कमाई के अवसर कम हैं, लेकिन पर्यावरण सुरक्षा की सौ फीसदी गारंटी जरूर है।

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