देश के प्रमुख कृषि बाजारों में चना के भाव में इन दिनों मजबूती देखने को मिल रही है। घरेलू मंडियों में मजबूत मांग, सीमित स्टॉक और आयात को लेकर बनी अनिश्चितता के कारण चना बाजार को लगातार समर्थन मिल रहा है। राजधानी दिल्ली में चना का भाव ₹6,325-6,350 प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है। बाजार में सामान्य कारोबार ₹6,300-6,325 प्रति क्विंटल के आसपास दर्ज किया जा रहा है, जबकि लॉरेंस रोड पर भाव ₹6,250-6,275 प्रति क्विंटल के स्तर पर बने हुए हैं।
वहीं, आजादपुर मंडी में भी ₹7-8 प्रति किलो की तेजी देखने को मिली है। इस तेजी के बाद व्यापारियों और बाजार से जुड़े लोगों के बीच अब चना के भाव के अगले लक्ष्य को लेकर चर्चा तेज हो गई है। कुछ कारोबारी परिस्थितियां अनुकूल रहने पर भाव के ₹7,000 प्रति क्विंटल के स्तर तक पहुंचने की संभावना जता रहे हैं। हालांकि, बाजार की यह तेजी कितनी लंबी चलेगी, यह आने वाले दिनों में घरेलू आवक, सरकारी स्टॉक और अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
दिल्ली के साथ-साथ देश की कई प्रमुख मंडियों में चने के भाव मजबूत बने हुए हैं। उपलब्ध बाजार जानकारी के अनुसार इंदौर मंडी में चना का भाव करीब ₹6,350 प्रति क्विंटल दर्ज किया गया है, जबकि विदिशा में भाव ₹6,325-6,350 प्रति क्विंटल के आसपास है। कानपुर में चना का भाव ₹6,500 प्रति क्विंटल और सीहोर में करीब ₹6,400 प्रति क्विंटल बताया जा रहा है। महाराष्ट्र की अकोला मंडी में चना ₹6,625 प्रति क्विंटल के स्तर पर कारोबार कर रहा है।
रायपुर में भाव करीब ₹6,500 प्रति क्विंटल और मुंबई में ₹6,350 प्रति क्विंटल के आसपास है। वहीं, हैदराबाद मंडी में चना का भाव ₹6,325 प्रति क्विंटल के करीब बताया जा रहा है। अलग-अलग मंडियों में भाव में अंतर स्थानीय आवक, मांग, क्वालिटी और उपलब्ध स्टॉक के कारण देखने को मिल रहा है। हालांकि, अधिकांश प्रमुख बाजारों में मजबूत भाव यह संकेत दे रहे हैं कि फिलहाल चना की मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बाजार के पक्ष में बना हुआ है।
चना बाजार की मौजूदा तेजी में महाराष्ट्र की मंडियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। राज्य की कई मंडियों में चना की आवक सामान्य स्तर की तुलना में कम बनी हुई है। किसानों की ओर से सीमित बिक्री और स्टॉकिस्टों द्वारा नियंत्रित बिकवाली के कारण बाजार में उपलब्ध चना की मात्रा पर दबाव बना हुआ है। जब बाजार में आवक कम रहती है और दूसरी तरफ मांग बनी रहती है, तो कीमतों को स्वाभाविक रूप से समर्थन मिलता है।
इसके अलावा सरकारी खरीद और निजी व्यापारियों की सक्रियता ने भी बाजार की धारणा को मजबूत किया है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि महाराष्ट्र और अन्य प्रमुख उत्पादक राज्यों में आवक जल्द नहीं बढ़ती है, तो चना के भाव में आगे भी मजबूती बनी रह सकती है। हालांकि, किसानों और स्टॉकिस्टों की बिकवाली बढ़ने पर मंडियों में आवक का दबाव बन सकता है, जिससे तेजी की रफ्तार कुछ धीमी हो सकती है।
चना बाजार में सरकारी एजेंसी नेफेड (NAFED) की गतिविधियों पर भी व्यापारियों की नजर बनी हुई है। व्यापारियों के अनुसार नेफेड की ओर से टेंडर जारी किए जाने के बाद बाजार की धारणा में सुधार देखने को मिला है। बाजार में फिलहाल बड़े सरकारी स्टॉक का दबाव स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दे रहा है, जिससे कीमतों को सहारा मिल रहा है। चना बाजार में सरकारी स्टॉक की उपलब्धता और उसकी बिक्री की गति कीमतों के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
यदि सरकारी एजेंसियां सीमित मात्रा में स्टॉक बाजार में उतारती हैं, तो खुले बाजार में उपलब्ध आपूर्ति पर दबाव कम रह सकता है और भाव मजबूत बने रह सकते हैं। इसके विपरीत, यदि सरकार कीमतों को नियंत्रित करने के लिए खुले बाजार में बड़ी मात्रा में चना जारी करती है, तो बाजार में आपूर्ति बढ़ सकती है और तेजी पर दबाव बन सकता है। इसलिए आने वाले समय में नेफेड की बिक्री नीति चना बाजार की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल रहेगी।
घरेलू बाजार के अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चना की आपूर्ति और उत्पादन की स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है। खासतौर पर ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के कृषि क्षेत्रों में मौसम की परिस्थितियां बाजार के लिए महत्वपूर्ण बन गई हैं। ऑस्ट्रेलिया भारत के लिए चना आयात का एक प्रमुख स्रोत है, इसलिए वहां उत्पादन और फसल की स्थिति में किसी भी तरह का बदलाव भारतीय बाजार पर असर डाल सकता है।
ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया क्षेत्र के कुछ हिस्सों में सूखे को लेकर चिंता की खबरें बाजार की धारणा को प्रभावित कर रही हैं। इसी तरह, अमेरिकी कृषि क्षेत्रों में भी मौसम संबंधी जोखिमों पर नजर बनी हुई है। यदि प्रमुख उत्पादक देशों में मौसम प्रतिकूल रहता है और चना उत्पादन प्रभावित होता है, तो वैश्विक बाजार में आपूर्ति कम हो सकती है। ऐसी स्थिति में भारत के लिए आयात महंगा होने की संभावना बढ़ सकती है, जिससे घरेलू चना बाजार को अतिरिक्त समर्थन मिल सकता है।
भारत में चना के आयात की लागत भी घरेलू बाजार की तेजी को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण कारक है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार 10 प्रतिशत आयात शुल्क को शामिल करने के बाद भारत में चना आयात की लागत करीब ₹6,720 प्रति क्विंटल तक पहुंच रही है। दूसरी ओर, बंदरगाहों पर ऑस्ट्रेलियाई चना लगभग ₹6,225 प्रति क्विंटल और अफ्रीकी चना करीब ₹4,995 प्रति क्विंटल के स्तर पर बताया जा रहा है।
आयात की लागत और घरेलू बाजार के भाव के बीच अंतर कम होने से आयातकों के लिए व्यापार की संभावनाएं भी प्रभावित हो सकती हैं। यदि विदेशी चना भारतीय बाजार में प्रतिस्पर्धी कीमत पर उपलब्ध नहीं होता है, तो घरेलू चना की मांग मजबूत बनी रह सकती है। वहीं, वैश्विक स्तर पर आपूर्ति घटने या मौसम संबंधी जोखिम बढ़ने की स्थिति में आयात लागत और बढ़ सकती है। इसका सीधा असर भारतीय बाजार में चना की कीमतों पर पड़ सकता है और घरेलू भाव को तेजी का अतिरिक्त आधार मिल सकता है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऑस्ट्रेलिया के मौसम को लेकर भी चिंता बनी हुई है। जुलाई से सितंबर के बीच ऑस्ट्रेलिया के कुछ कृषि क्षेत्रों में पाला पड़ने की आशंका रहती है। यदि इस अवधि के दौरान मौसम अधिक प्रतिकूल रहता है और फसल को नुकसान पहुंचता है, तो चना उत्पादन और वैश्विक आपूर्ति पर असर पड़ सकता है। ऑस्ट्रेलिया में फसल उत्पादन में किसी भी तरह की कमी भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।
इसका कारण यह है कि भारत की घरेलू मांग को पूरा करने में आयात की भूमिका बनी रहती है। यदि वैश्विक आपूर्ति कम होती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में चना के भाव बढ़ सकते हैं और भारत के लिए आयात महंगा हो सकता है। हालांकि, मौसम संबंधी जोखिमों का वास्तविक असर फसल की स्थिति स्पष्ट होने के बाद ही सामने आएगा। इसलिए फिलहाल बाजार की नजर ऑस्ट्रेलिया के मौसम, फसल विकास और उत्पादन अनुमान पर बनी हुई है।
चना बाजार के भविष्य को लेकर फिलहाल तेजी की उम्मीद जरूर बनी हुई है, लेकिन इसके साथ कुछ जोखिम भी जुड़े हुए हैं। व्यापारियों का मानना है कि यदि महाराष्ट्र में चना की आवक सीमित रहती है, किसानों और स्टॉकिस्टों की बिकवाली नियंत्रित रहती है, नेफेड की ओर से बाजार में बड़ी मात्रा में स्टॉक जारी नहीं किया जाता है और घरेलू मांग मजबूत बनी रहती है, तो चना के भाव में आगे और तेजी देखने को मिल सकती है। ऐसी स्थिति में ₹6,700-6,800 प्रति क्विंटल के स्तर को पार करने के बाद बाजार में ₹7,000 प्रति क्विंटल का लक्ष्य भी चर्चा में आ सकता है।
हालांकि, यह स्तर हासिल करने के लिए घरेलू और वैश्विक दोनों बाजारों का समर्थन जरूरी होगा। यदि सरकार खुले बाजार में अधिक सरकारी स्टॉक जारी करती है, आयात में तेजी आती है या मंडियों में नई फसल की आवक बढ़ती है, तो कीमतों पर दबाव बन सकता है। इसलिए आने वाले दिनों में चना बाजार की दिशा मुख्य रूप से घरेलू मांग, मंडियों की आवक, नेफेड की बिक्री नीति, आयात लागत और ऑस्ट्रेलिया-अमेरिका की फसल स्थिति पर निर्भर करेगी। फिलहाल मजबूत मांग और सीमित आपूर्ति के कारण बाजार में तेजी का माहौल है, लेकिन ₹7,000 का स्तर पार करने की राह में कई महत्वपूर्ण बाजार कारक निर्णायक भूमिका निभाएंगे।
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