मेरीखेती द्वारा उत्तरप्रदेश के हापुड़ जनपद में डा. रविन्द्र पड़ारिया संयुक्त निदेशक (प्रसार), आईसीएआर-आईएआरआई की अध्यक्षता में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के सौजन्य से आयोजित कार्यक्रम में हुई मेरीखेती किसान पंचायत में खेती किसानी से संबंधित कई सारी महत्वपूर्ण सीजनल फसलों की तैयारी और समस्याओं पर किसान एवं कृषि वैज्ञानिकों के बीच विचार विमर्श किया गया।
मेरीखेती किसान पंचायत के दौरान बहुत सारे वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक, कृषि विशेषज्ञ, कृषि क्षेत्र के उघोगपति एवं किसान उपस्थित रहे। चलिए जानते हैं, मेरीखेती की जुलाई 2026 में हुई मासिक किसान पंचायत में क्या कुछ खास रहा है। मेरीखेती किसान पंचायत के दौरान खरीफ फसलों के लिए उत्तम प्रबंधन पद्धतियों पर काफी व्यापक रूप से चर्चा हुई।
खेत की तैयारी
खरीफ फसलों जैसे धान, मक्का और सोयाबीन की सफल खेती के लिए खेत की उचित तैयारी सबसे महत्वपूर्ण चरण है। मानसून की पहली अच्छी वर्षा के बाद मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करनी चाहिए। इससे मिट्टी में हवा का संचार बढ़ता है, पुराने खरपतवार और पिछली फसल के अवशेष नष्ट हो जाते हैं तथा कीट एवं रोगों का प्रकोप कम होता है।
इसके बाद कल्टीवेटर या हैरो चलाकर मिट्टी को भुरभुरी बनाना चाहिए ताकि बीजों का अंकुरण समान रूप से हो सके। खेत का समतलीकरण भी आवश्यक है, क्योंकि असमतल खेत में कहीं अधिक पानी भर जाता है तो कहीं नमी की कमी हो जाती है। विशेष रूप से मक्का और सोयाबीन जैसी फसलों के लिए खेत में उचित जल निकासी की व्यवस्था करना अत्यंत आवश्यक है, ताकि जड़ों में सड़न न हो और पौधों का विकास स्वस्थ रूप से हो सके।
प्रमाणित बीजों का चयन और बीज उपचार
अच्छी गुणवत्ता वाले प्रमाणित बीज अधिक उत्पादन की आधारशिला होते हैं। किसान हमेशा कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र या अधिकृत संस्थानों से प्रमाणित बीज ही खरीदें। प्रमाणित बीजों में अंकुरण क्षमता अधिक होती है तथा रोगों और कीटों का प्रभाव अपेक्षाकृत कम होता है। बुवाई से पहले बीजों का उपचार करना भी अत्यंत आवश्यक है।
बीजों को ट्राइकोडर्मा, कार्बेन्डाजिम या अन्य अनुशंसित फफूंदनाशकों से उपचारित करने से बीज जनित रोगों से सुरक्षा मिलती है। दलहनी फसलों के लिए राइजोबियम कल्चर तथा फास्फेट घुलनशील जीवाणु (पीएसबी) का उपयोग करने से पौधों की वृद्धि बेहतर होती है और नाइट्रोजन स्थिरीकरण में सहायता मिलती है। बीज उपचार से अंकुरण अच्छा होता है, पौधे स्वस्थ रहते हैं और उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
संतुलित पोषक तत्व एवं उर्वरक प्रबंधन
खरीफ फसलों में अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है। सबसे पहले खेत की मिट्टी का परीक्षण कराना चाहिए, जिससे यह पता चल सके कि मिट्टी में कौन-कौन से पोषक तत्वों की कमी है। मृदा परीक्षण की रिपोर्ट के आधार पर ही नाइट्रोजन (N), फास्फोरस (P) और पोटाश (K) का संतुलित उपयोग करना चाहिए। सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे जिंक, सल्फर और बोरॉन की कमी वाले क्षेत्रों में इनका प्रयोग भी आवश्यक होता है।
रासायनिक उर्वरकों के साथ-साथ गोबर की सड़ी हुई खाद, वर्मीकम्पोस्ट तथा हरी खाद का उपयोग मिट्टी की संरचना और उर्वरता में सुधार करता है। जैविक खाद मिट्टी में लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ाती है, जिससे पौधों को लंबे समय तक पोषक तत्व उपलब्ध होते रहते हैं और भूमि की उत्पादकता बनी रहती है।
जल प्रबंधन और वर्षा जल संरक्षण
खरीफ फसलें मुख्य रूप से मानसूनी वर्षा पर निर्भर करती हैं, इसलिए जल प्रबंधन का विशेष महत्व है। वर्षा के पानी को खेत में अधिक समय तक बनाए रखने के लिए मजबूत मेड़बंदी करनी चाहिए। इससे मिट्टी की नमी लंबे समय तक बनी रहती है और सिंचाई की आवश्यकता कम होती है। वहीं, अत्यधिक वर्षा की स्थिति में अतिरिक्त पानी को खेत से बाहर निकालने के लिए नालियों की व्यवस्था करना आवश्यक है।
धान को छोड़कर अधिकांश खरीफ फसलें जैसे मक्का, सोयाबीन और कपास जलभराव को सहन नहीं कर पातीं। इसलिए जल निकासी की उचित व्यवस्था पौधों की जड़ों को सुरक्षित रखती है और फसल को नुकसान से बचाती है। वर्षा जल संचयन एवं वैज्ञानिक जल प्रबंधन अपनाकर किसान कम लागत में बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
खरपतवार नियंत्रण की वैज्ञानिक तकनीक
खरपतवार खरीफ फसलों के साथ पोषक तत्व, पानी और प्रकाश के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, जिससे उत्पादन में भारी कमी आती है। इसलिए समय पर खरपतवार नियंत्रण करना आवश्यक है। बुवाई के लगभग 15 से 20 दिन बाद पहली निराई-गुड़ाई करनी चाहिए, जिससे खरपतवार नष्ट हो जाते हैं और मिट्टी भुरभुरी बनती है।
आवश्यकता पड़ने पर दूसरी निराई भी करनी चाहिए। मल्चिंग का उपयोग करने से खरपतवारों की वृद्धि कम होती है और मिट्टी की नमी भी सुरक्षित रहती है। यदि खरपतवारों का प्रकोप अधिक हो तो कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार उपयुक्त शाकनाशियों का प्रयोग करना चाहिए। वैज्ञानिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण करने से पौधों को पर्याप्त पोषण मिलता है और फसल का विकास तेजी से होता है।
कीट एवं रोग प्रबंधन की समेकित पद्धति
खरीफ मौसम में अधिक नमी और तापमान के कारण कीट एवं रोगों का प्रकोप बढ़ जाता है। इसलिए समेकित कीट एवं रोग प्रबंधन (आईपीएम) अपनाना सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है। खेत में पक्षियों के बैठने के लिए 'टी' या 'वाई' आकार की खूंटियां लगाने से हानिकारक कीटों की संख्या कम होती है। फेरोमोन ट्रैप और पीले स्टिकी ट्रैप का उपयोग भी कीटों की निगरानी और नियंत्रण में प्रभावी है।
खेत का नियमित निरीक्षण करते रहना चाहिए ताकि रोगों और कीटों की पहचान शुरुआती अवस्था में ही हो सके। यदि कीटों का प्रकोप आर्थिक क्षति स्तर से अधिक हो जाए, तभी अनुशंसित कीटनाशकों जैसे इमिडाक्लोप्रिड आदि का निर्धारित मात्रा में छिड़काव करना चाहिए। संतुलित एवं वैज्ञानिक कीट प्रबंधन से लागत कम होती है और पर्यावरण भी सुरक्षित रहता है।
अंतरा फसलीकरण और फसल चक्र का महत्व
भूमि की उर्वरा शक्ति बनाए रखने और जोखिम कम करने के लिए अंतरा फसलीकरण तथा फसल चक्र अपनाना अत्यंत लाभदायक है। अंतरा फसलीकरण में एक मुख्य फसल के साथ दूसरी फसल निश्चित कतारों में लगाई जाती है, जैसे सोयाबीन के साथ अरहर या मक्का के साथ उड़द। इससे भूमि का बेहतर उपयोग होता है, खरपतवारों का दबाव कम होता है और किसानों को अतिरिक्त आय प्राप्त होती है।
साथ ही, विभिन्न फसलों के कारण कीट एवं रोगों का प्रकोप भी कम होता है। लगातार एक ही फसल उगाने से मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है, इसलिए फसल चक्र अपनाना आवश्यक है। फसल परिवर्तन से मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनी रहती है, जैव विविधता बढ़ती है और दीर्घकालीन उत्पादन क्षमता में सुधार होता है।
वैज्ञानिक देखभाल से बंपर उत्पादन
खरीफ फसलों में अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए केवल बुवाई करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि पूरी फसल अवधि में वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाना आवश्यक है। खेत की समय-समय पर निगरानी, संतुलित उर्वरक प्रबंधन, उचित जल निकासी, समय पर खरपतवार नियंत्रण और कीट-रोगों की रोकथाम से फसल स्वस्थ रहती है। किसानों को कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार आधुनिक कृषि तकनीकों, उन्नत बीजों और जैविक उपायों का अधिक से अधिक उपयोग करना चाहिए।
साथ ही, मौसम की जानकारी के आधार पर कृषि कार्य करने से जोखिम कम होता है और उत्पादन में वृद्धि होती है। यदि किसान इन सभी वैज्ञानिक प्रबंधन पद्धतियों को समग्र रूप से अपनाते हैं, तो धान, मक्का, सोयाबीन तथा अन्य खरीफ फसलों से अधिक उपज प्राप्त कर सकते हैं, उत्पादन लागत कम कर सकते हैं और अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि सुनिश्चित कर सकते हैं।
मेरीखेती किसान पंचायत में कौन-कौन उपस्थित रहा
मेरीखेती किसान पंचायत में शामिल हुए वैज्ञानिकों में पूसा के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ रविंद्र पडारिया, डॉ कुमार कांत सिंह, डॉ नफीस अहमद, डॉ श्रवण सिंह, डॉ इंदू चोपड़ा, डॉ बिष्णु एम बाशयाल, डॉ रेणु सिंह, डॉ रजना एस, डॉ अरविंद कुमार, डॉ हरित कुमार, डॉ गौरव प्रकाश, डॉ योगेंद्र कुमार आदि शामिल रहे। साथ ही, असरा, हापुड़ के ग्राम प्रधान श्री सोहनवीर सिंह सहित अन्य ग्राम पंचयतों के ग्राम प्रधान रोहित प्रधान, शिवलाल प्रधान, जय भगवान प्रधान शामिल रहे। वहीं, अश्वनी, नीरज, तेज सिंह, भूपेंद्र, रविंद्र, गिरधारी लाल जी, अरुण कुमार, जॉनी और कपिल आदि प्रगतिशील किसान भी मौजूद रहे।
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