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तरबूज

तरबूज और खरबूज की अगेती खेती के फायदे

तरबूज और खरबूज की अगेती खेती के फायदे

साल 2020 जाने को है और हम 2021 का स्वागत करने को तैयार बैठे हैं. 2020 में हमने बहुत ही अलग तरह का डर, दुविधा और बंधन महसूस किया. लेकिन कहते हैं ना अंत भला तो सब भला...अभी कोरोना की वैक्सीन भी आ गई है कुछ समय में लगनी भी शुरू हो जाएगी. कोरोना में सारी इंडस्ट्री चौपट हो गई थी लेकिन हमारी कृषि को अर्थव्यवस्था की धुरी ऐसे ही नहीं कहा जाता है, कृषि ने हमारे अन्न के भण्डार भरे और इस दौर में भी अपनी चमक बिखेरी. आज हम बात करते है तरबूज और खरबूज जैसी फसलों की अगेती खेती की.आजकल किसानों की आमदनी बढ़ाने की बात सरकार कर रही है लेकिन कोई भी सरकार आपको घर बैठा कर आपकी आमदनी नहीं बढ़ा सकती है उसके लिए खुद किसान को आगे आना पड़ेगा तथा अपनी खेती को पुराने तरीकों की अपेक्षा नई तकनीक से खेती करनी होगी तभी आपकी आमदनी बढ़ सकती है. गर्मी के दिनों में तरबूज एक अत्यन्त लोकप्रिय फल एवं सब्जी मानी जाती है. इसके फल पकने पर काफी मीठे एवं स्वादिष्ट होते हैं. इसकी खेती पूरे भारत वर्ष में की जाती है. इसकी खेती मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, पंजाब, हरियाणा एवं राजस्थान में की जाती है| यदि कृषक तरबूज और खरबूज की स्थानीय किस्मों की जगह उन्नत प्रजाति और वैज्ञानिक तकनीक से खेती करें, तो इसकी फसल से अच्छी तथा गुणवतापूर्ण उपज प्राप्त की जा सकती है.इसके फलों के सेवन से “लू’ नहीं लगती है तथा गर्मी से राहत मिलती है

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अगेती तरबूज और खरबूज की तैयारी

जिन किसान भाइयों के खेत आलू और सरसों से खाली होने वाले हैं उनमे वो ककड़ी, तरबूज और खरबूज जैसी फसल लगा सकते हैं. इसके दो तरीके हैं या तो आप खेत के खाली होने का इंतज़ार करो या उससे पहले ही अपनी फसल की तैयारी कर दें.ये फसल बहुत कम समय में तैयार होकर आपको मुनाफा दे सकती है. तरबूज और खरबूज

अगेती फसल तैयार करने के तरीके

आपको जितने खेत में तरबूज और खरबूज की फसल लगानी है उसके लिए उतने बीज के हिसाब से आप अपने किसी कवर एरिया में लगा सकते है. आप गोबर की बनी हुई खाद और मिट्टी को मिला कर प्लास्टिक या थर्माकोल के गिलास में भर के उसमें बीज डाल कर किसी गर्म और कवर एरिया में लगा सकते हैं. इसमें ध्यान रखने वाली बात है की जब तक आपका खेत खाली हो तब तक आपके पौधे 20 से 30 दिन के हो जाने चाहिए. जैसे ही आपका खेत खाली हो आप खेत को तैयार करके उन पौधों को खेत में रोपित कर दें आपकी फसल सबसे पहले बाजार में आ जाएगी और इसका मूल्य भी अच्छा मिलेगा.

खेत की तैयारी

तरबूज और खरबूज अगर आपका खेत आलू से खाली हुआ है तो उसमे आपको बहुत विशेष तैयारी की जरुरत नहीं होती है आप सीधे खेत की पलेवा करके उसमे देसी हल या हेरों से जुताई करके उसमे पटेला/सुहागा लगा के समतल बना के उसमे पहले से तैयार पौधे रोपित कर दें और हल्का पानी लगा दें. और अगर आपका खेत सरसों से खाली हुआ है तो आपको उसकी अच्छे से जुताई करनी होती है तथा खेत की पलेवा करके वही तरीके से उसको तैयार करके पौधे रोपित करने हैं. इसके खेत को बहुत ज्यादा खाद और पानी की जरूरत नहीं होती है. लेकिन खेत में पानी निकासी की उपयुक्त व्यवस्था होनी चाहिए. जिससे की पौधे की ग्रोथ सही से हो. फिर भी खाद और पानी की जरूरत मिट्टी के हिसाब से तय की जाती है. तरबूज के लिए यमुना और गंगा जैसी नदियों के किनारे पर भी किया जाता है. इसके लिए रेतीली और दोमट मिट्टी दोनों ही मुफीद होती है. इसके खेत में गोबर की बनी हुई खाद डाल कर अच्छे से खेत में मिला देनी चाहिए इससे हमारी फसल जल्दी और अच्छी तैयार होती है. सरसों के खेत में हमें थोड़ा ज्यादा खाद पर ध्यान देना होता है जबकि आलू के खेत में पहले से ही प्रचुर मात्रा में खाद होता है.

खाद की व्यवस्था

अच्छी मात्रा में गोबर की बनी हुई खाद को जमीन में भली-भांति मिला देना चाहिए. यह खाद खेत में डालकर तैयारी के समय मिला देना चाहिए तथा ट्रेक्टर से 3 - 4 जोत लगा देनी चाहिए .70 से 80 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हैक्टर देना चाहिए तथा फास्फेट व पोटाश की मात्रा 40-50 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की हिसाब से देनी चाहिए. फास्फेट व पोटाश तथा नाइट्रोजन की आधी मात्रा को भूमि की तैयारी के समय मिलाना चाहिए तथा शेष नाइट्रोजन की मात्रा को बुवाई के 25-30 दिन के बाद देना चाहिए. जैसा की हम ऊपर बता चुके हैं, खाद उर्वरकों की मात्रा भूमि की उर्वरा शक्ति के ऊपर निर्भर करती है. उर्वरा शक्ति भूमि में अधिक हो तो उर्वरक व खाद की मात्रा कम की जा सकती है.

उपयुक्त जलवायु

इसकी खेती के लिए गर्म और औसत आर्द्रता वाले क्षेत्र सर्वोत्तम होते हैं. इसके  बीज के जमाव और पौधों के बढ़वार के समय लगभग 25 से 32 डिग्री सेल्सियस तापमान अच्छा रहता है. इसके फल को जितनी गर्मी मिलती है उतना ही ये मीठा और लाल होता है. तो इसके फल को अच्छी गर्मी में भी नुकसान नहीं होता है. इसको बारिश के मौसम से पहले खेत से फसल को तोड़ लेना चाहिए. बारिश शुरू होने पर ये खुद से ही ख़तम हो जाता है.

उन्नत किस्में

तरबूज और खरबूज इसकी फसल से अच्छी उपज लेने के लिए किसानों को तरबूज और खरबूज की स्थानीय किस्मों का चयन करना चाहिए. किसान अपने एरिया के हिसाब से ही किस्मों का चयन करें. कुछ उन्नत किस्में इस प्रकार हैं.
  • सुगर बेबी
  • दुर्गापुर केसर
  • अर्को मानिक
  • दुर्गापुर मीठा
  • काशी पीताम्बर
  • पूसा वेदना
  • न्यू हेम्पशायर मिडगट
  • बुबाई का समय
उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में तरबूज की बुवाई 10 से 20 फरवरी के बीच में की जाती है, जबकि नदियों के किनारे इसकी बुवाई नवम्बर से जनवरी के बीच में की जाती है. दक्षिणी-पश्चिमी राजस्थान में मतीरा जाति के तरबूज की बुवाई जुलाई महीने में की जाती है| जबकि दक्षिण भारत में इसकी बुवाई अगस्त से लेकर जनवरी तक करते हैं. आप कह सकते हैं की भारत में वर्ष भर कहीं न कहीं इसकी बुवाई के लिए समय उपयुक्त होता है.

बीज की मात्रा

एक हेक्टेयर क्षेत्रफल के लिए 3.5 से 4 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है. बाकि ये बीज की प्रजाति पर भी निर्भर करता है.

बुवाई की विधि

तरबूज की बुवाई मेड़ों पर 2.5 से 3.0 मीटर की दूरी पर 40 से 50 सेंटीमीटर चौड़ी नाली बनाकर करते हैं. इन नालियों के दोनों किनारों पर 60 सेंटीमीटर की दूरी पर 2 से 3 बीज बोते हैं. यह दूरी मृदा की उर्वरता एवं प्रजाति के अनुसार घट बढ़ सकती है. नदियों के किनारे 60 X 60 X 60 सेंटीमीटर क्षेत्रफल वाले गड्डे बनाकर उसमें 1:1:1 के अनुपात में मिट्टी, गोबर की खाद तथा बालू का मिश्रण भरकर थाल को भर दे तत्पश्चात् प्रत्येक थाल में दो बीज लगादें | अंकुरण के 10 से 15 दिन बाद एक जगह पर 1 से 2 स्वस्थ पौधों को छोड़कर बाकि को निकाल देना चाहिए.

खाद एवं उर्वरक

इसकी उत्तम खेती के लिए 65 किलोग्राम नाइट्रोजन, 56 किलोग्राम फास्फोरस तथा 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से अवश्य दी जानी चाहिए| नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा खेत में नालियाँ या थाले बनाते समय देते हैं| नत्रजन की आधी मात्रा दो बराबर भागों में बाँटकर खड़ी फसल में जड़ों के पास गुड़ाई के समय तथा पुनः 45 दिन बाद छिड़ककर देना चाहिए| सिंचाई प्रबंधन

सिंचाई प्रबंधन

यदि तरबूज की खेती नदियों के कछारों में की जाती है, तब सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि पौधों की जड़ें बालू के नीचे उपलब्ध पानी को शोषित करती रहती हैं| जब मैदानी भागों में इसकी खेती की जाती है, तो सिंचाई 7 से 10 दिन के अन्तराल पर करते हैं क्योकि गर्मी में इसको सिचांई की आवश्यकता होती है. जब तरबूज आकार में पूरी तरह से बढ़ जाते हैं, सिंचाई बन्द कर देते हैं, क्योंकि फल पकते समय खेत में पानी अधिक होने से फल में मिठास कम हो जाती है और फल फटने लगते हैं.

खरपतवार की रोकथाम

तरबूज के जमाव से लेकर प्रथम 25 दिनों तक खरपतवार फसल को ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं. इससे पौधे की वृद्धि पर प्रतिकूल असर पड़ता है और पौधे की बढ़वार रुक जाती है.अतः खेत से कम से कम दो बार खरपतवार निकालना चाहिए. अच्छा रहे की आप खरपतवार निकलने के लिए निराई गुड़ाई का सहारा लें और अगर ये संभव नहीं है तो आप रासायनिक खरपतवारनाशी के रूप में बूटाक्लोर रसायन 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बीज बुआई के तुरन्त बाद छिड़काव करते हैं. खरपतवार निकालने के बाद खेत की गुड़ाई करके जड़ों के पास मिट्टी चढ़ाते हैं जिससे पौधों का विकास तेजी से होता है.

प्रमुख रोग एवं रोकथाम

मृदुरोमिल आसिता- जब तापमान 20 से 22 डिग्री सेंटीग्रेट हो, तब यह रोग तेजी से फैलता है| उत्तरी भारत में इस रोग का प्रकोप अधिक है. इस रोग का मुख्य लक्षण पत्तियों पर कोणीय धब्बे जो शिराओं द्वारा होते हैं. अधिक आर्द्रता होने पर पत्ती के निचली सतह पर मृदुरोमिल कवक की वृद्धि दिखाई देती है. रोकथाम- इसकी रोकथाम के लिए मैंकोजेब 0.20 प्रतिशत (2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी) घोल से पहले सुरक्षा के रूप में छिड़काव बीमारी दिखने तुरन्त करना चाहिए| यदि पौधों पर बीमारी के लक्षण दिखाई दे रहे हो तो मेटल एक्सिल 8 प्रतिशत + मैन्कोजेब 64 प्रतिशत डब्लू वी पी, 25 प्रतिशत दवा का छिड़काव 7 दिन के अन्तराल पर 3 से 4 बार करना चाहिए. पूरी तरह रोगग्रस्त लताओं को निकाल कर जला देना चाहिए तथा बीज उत्पादन के लिए गर्मी की फसल से बीज उत्पादन करें. तरबूज बड नेक्रोसिस- यह रोग रस द्रव्य एवं थ्रिप्स कीट द्वारा फैलता है. रोग ग्रस्त पौधों में क्राउन से अत्यधिक कल्ले निकलते हैं और तना सामान्य से कड़ा और ऊपर उठा हुआ दिखाई देता है, पत्तियाँ विकृत हो जाती हैं. उसमें असामान्य वृद्धि होती है तथा फूल भी टेढ़े-मेढे एवं हरे हो जाते हैं. रोकथाम- इस रोग से बचाव हेतु रोग रोधी किस्म की बुवाई करें तथा रोगी पौधों को उखाड़कर नष्ट कर दे. बीज अथवा पौधों को इमिडाक्लोप्रिड 0.3 मिलीलीटर दवा 1 लीटर पानी में घोलकर रोपाई या बुआई से पहले 10 मिनट तक उपचारित करें| पौध जमाव के 10 से 15 दिन के बाद से नीम या पुंगगामिया के रस का छिड़काव 3 प्रतिशत की दर से 15 दिन के अन्तराल पर करना चाहिए.

फल तुड़ाई

तरबूज में तुड़ाई बहुत महत्वपूर्ण होती है. तरबूज के फल का आकार एवं डंठल के रंग को देखकर उसके पकने की स्थिति का पता लगाना बड़ा मुश्किल है.अच्छी प्रकार पके हुए फलों की पहचान निम्न प्रकार से की जाती है| जमीन से सटे हुए फल के भाग में रंग परिवर्तन देखकर किया जाता है. पके फले को थपथपाने से धबधब की आवाज आती है, तो फल पका होता है. इसके अलावा यदि फल से लगी हुई प्ररोह पूरी तरह सूख जाय तो फल पका होता है. पके हुए फल को दबाने पर कुरमुरा एवं फटने जैसा अनुभव हो तो भी फल पका माना जाता है. जो तरबूज की खेती करते हैं वो तरबूज को देख कर भी पता लगा लेते हैं की इसका तुड़ाई का समय हो गया है. फलों को तोड़कर ठण्डे स्थान पर एकत्र करना चाहिए. दूर के बाजारों में फल को भेजते समय कई सतहों में ट्रक में रखते हैं और प्रत्येक सतह के बाद धान की पुआल रखते हैं. इससे फल आपस में रगड़कर नष्ट नहीं होते हैं और तरबूजों की ताजगी बनी रहती है. गर्मी के दिनों में सामान्य तापमान पर फल को 10 दिनों तक आसानी से रखा जा सकता है. अगर आपको किसी खेती के बारे में विस्तृत जानकारी चाहिए तो आप हमें अपने प्रश्न भी भेज सकते है.
ताइवानी तरबूज व खरबूज के फलों से किसान कमा रहे लाखों में मुनाफा

ताइवानी तरबूज व खरबूज के फलों से किसान कमा रहे लाखों में मुनाफा

आजकल ताइवानी तरबूज व खरबूज का उत्पादन करके किसान लाखों रुपये की आमदनी कर रहे हैं। बिहार राज्य के कैमूर निवासी किसान इस फसल के माध्यम से प्रत्येक चार माह के अंदर 50 से 60 लाख रुपये की आमदनी अर्जित कर लेते हैं। इसलिए अन्य किसान भी उनसे खेती के तरीके और विधियों के बारे में प्रशिक्षण लेने हेतु आ रहे हैं। खेती किसानी द्वारा भारतीय लाखों रूपये का मुनाफा अर्जित करते हैं। आपको बतादें, कि धान, गेहूं, मक्का के साथ और भी फसलों का उत्पादन कर लाखों रुपये की आय करते हैं। साथ ही, प्राकृतिक आपदाएं जैसे बारिश, बाढ़ एवं सूखा इत्यादि किसानों की फसलों में बेहद हानि पहुँचाते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, किसानों को पारंपरिक खेती से हटकर के अन्य आधुनिक एवं मुनाफादायी फसलों की तरफ रुख करने की आवश्यकता है। क्योंकि वर्तमान दौर में किसान खेती किसानी के नवीन एवं आधुनिक विधि व तरीका अपनाएँ तो किसान लाखों में मुनाफा कमा सकते हैं। इसी प्रकार की फसल के अंतर्गत ताइवानी तरबूज एवं खरबूज भी आता है। जो किसानों को कम खर्च के जरिये मोटा लाभ दिलाने में सहायक साबित होता है।

बिहार राज्य के उत्पादक लाखों में कमा रहे हैं

बिहार राज्य में कैमूर जनपद के डारीडीह निवासी मुन्ना सिंह द्वारा ताइवानी तरबूज व खरबूज का उत्पादन किया जा रहा है। आपको बतादें, कि मुन्ना सिंह 20 एकड़ भूमि पर ताईवान तरबूज व खरबूज का उत्पादन करते हैं। मुन्ना सिंह ने मीडिया के जरिये कहा है, कि 3 से 4 माह के अंतर्गत फसल से 50 से 60 लाख रुपये तक का लाभ लिया जाता है। लेकिन किसानों को काफी समझदारी व जागरुकता के साथ कार्य करने की आवश्यकता है।
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इन फलों से कितना मुनाफा और कितना खर्च आता है

जैसा कि उपरोक्त में हमने आपको बताया कि मुन्ना सिंह जी ताइवानी तरबूज और खरबूज का उत्पादन करके लाखों रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं। अगर हम उत्पादन में किए जाने वाले खर्च के विषय में बात करें तो एक एकड़ में उत्पादन करने में लगभग एक लाख रूपये का खर्च होता है। यदि उत्पादन की बात करें तो एक एकड़ भूमि में उत्पादन से तकरीबन 3 से 4 लाख रुपये तक का मुनाफा हाँसिल हो जाता है। मुन्ना सिंह के मुताबिक, इन फलों बाजार में भाव 40 से लेकर 70 रुपये प्रतिकिलो तक रहता है।

मुन्ना सिंह काफी लोगों को रोजगार के अवसर प्रदान करते हैं

विशेष बात यह है, कि मुन्ना सिंह खेती के माध्यम से स्वयं के साथ-साथ अन्य लोगों को भी रोजगार के अवसर प्रदान कर रहे हैं। मुन्ना सिंह ने 40 लोगों को रोजगार दिया हुआ है। हालांकि इन 40 लोगों में 5 से 6 व्यक्तियों को ही निर्धारित सैलरी प्रदान की जाती है। इनके अतिरिक्त लोगों को 300 से 400 रुपये दिहाड़ी के आधार पर प्रदान किया जाता है। मुन्ना सिंह इन सबके अलावा बहुत सारे लोगों रोजगार के अवसर उपलब्ध करा रहे हैं।
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ताइवान तरबूज एवं खरबूज के फायदे

ताइवान तरबूज व खरबूज स्वास्थ्य हेतु भी अत्यंत लाभदायक माना जाता है। इन फलों का सेवन करने से रोग प्रतिरोधक क्षमता काफी बेहतर होती है। साथ ही, पाचनतंत्र भी अच्छा होता है। आजकल अधिकाँश लोगों में ब्लड प्रेशर की दिक्कत बनी रहती है, जिसको नियंत्रित करने में यह फल काफी सहायक साबित होते हैं। ताइवानी तरबूज एवं खरबूज त्वचा के लिए भी बेहद फायदेमंद होते हैं।
क्यों है मार्च का महीना, सब्जियों का खजाना : पूरा ब्यौरा ( Vegetables to Sow in the Month of March in Hindi)

क्यों है मार्च का महीना, सब्जियों का खजाना : पूरा ब्यौरा ( Vegetables to Sow in the Month of March in Hindi)

मार्च का महीना किसानों के लिए बहुत ही फायदेमंद होता है। किसान इस महीने विभिन्न प्रकार की सब्जियों की बुवाई करते है तथा धन की उच्च दर पर प्राप्ति करते हैं। इस महीने किसान तरह तरह की सब्जियों की बुवाई करते है जैसे: खीरा, ककड़ी, करेला, लौकी, तुरई, पेठा, खरबूजे, तरबूजे, भिंडी, ग्वारफल्ली आदि। मार्च के महीने में बोई जाने वाली सब्जियों की जानकारी:

खीरे की फसल कि पूर्ण जानकारी ( Cucumber crop complete information) in Hindi

खीरे की सब्जियों की टोकरी Cucumber crop खीरे की खेती के लिए खेतों में आपको क्यारियां बनानी होती है। इसकी बुवाई लाइन में ही करें।  लाइन की दूरी 1.5 मीटर रखें और पौधे की दूरी 1 मीटर। बुवाई के बाद 20 से 25 दिन बाद गुड़ाई करना चाहिए। खेत में सफाई रखें और तापमान बढ़ने पर हर सप्ताह हल्की सिंचाई करे, खेत से खरपतवार हटाते रहें।

ककड़ी की फ़सल की पूर्ण जानकारी ( Cucumber crop complete information) in Hindi

ककड़ी सब्जियां की बेल kakdi ki kheti ककड़ी की फसल आप किसी भी उपजाऊ जमीन पर उगा सकते हैं।ककड़ी की बुवाई के लिए मार्च का समय बहुत ही फायदेमंद होता है। या सिर्फ 1 एकड़ भूमि में 1 किलो ग्राम बीज के आधार पर उगना शुरू हो जाती है। खेत को आपको तीन से चार बार जोतना होता है ,उसके बाद आपको खेतों में गोबर की खाद डालनी होती है। ककड़ी की बीजों को किसान 2 मीटर चौड़ी क्यारियों में किनारे किनारे पर लगाते है। इनकी दूरी लगभग 60 सेंटीमीटर होती है।

करेले की फ़सल की पूर्ण जानकारी ( Bitter gourd crop complete information) in Hindi

karele ki kheti करेले की खेती दोमट मिट्टी में की जाती है। करेले को आप दो तरह से बो सकते हैं। पहले बीच से दूसरा पौधों द्वारा ,आपको करेले की खेती के लिए दो से तीन दिन की जरूरत पढ़ती है। इसकी बीच की दूरियों को 2.5 से लेकर 5 मीटर तक की दूरी पर रखना चाहिए।किसान करेले के बीज को बोने से पहले  लगभग 24 घंटा पानी में डूबा कर रखते हैं। ताकि उसके अंकुरण जल्दी से फूट सके। पहली जुताई किसान हल द्वारा करते हैं उसके बाद किसान तीन से चार बार हैरो या कल्टीवेटर द्वारा खेत की जुताई करते हैं।

लौकी की फ़सल की पूर्ण जानकारी ( Gourd crop complete information) in Hindi

lauki ki kheti लौकी की खेती आप हर तरह की मिट्टी में कर सकते हैं लेकिन दोमट मिट्टी इसके लिए बहुत ही उपयोगी है। लौकी की खेती करने से पहले आपको इसके बीज को 24 घंटे पानी में डूबा कर रखना है अंकुरण आने तक, एक हेक्टेयर में आपको 4.5 किलोग्राम बीज की आवश्यकता पड़ती है।

तुरई फसल की पूर्ण जानकारी ( Full details of turai crop) in Hindi

turai ki fasal तोरई की फसल को हल्की दोमट मिट्टी में लगाना चाहिए। किसानों द्वारा प्राप्त जानकारियों से यह पता चला है।कि नदियों के किनारे वाली भूमि पर खेती करना बहुत ही अच्छा होता है। खेती करने से पहले जमीन को अच्छे से जोत लेना चाहिए। पहले हल द्वारा उसके बाद दो से तीन बार हैरो या कल्टीवेटर  से जुताई करना चाहिए। एक हेक्टेयर भूमि में कम से कम 4 से 5 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है।

पेठा फसल की पूर्ण जानकारी( Complete information about Petha crop)

पेठा सब्जियों की बेल Petha crop पेठा यानी कद्दू को दोमट मिट्टी में बोना बहुत ही  फायदेमंद होता है। पेठा की खेती के लिए दो से तीन बार कल्टीवेटर से जुताई करें। मिट्टियों को भुरभुरा बनाएं तथा खेतों की अच्छे ढंग से जुताई करें। एक हेक्टेयर में लगभग 7 से 8 किलोग्राम बीज की आवश्यकता पड़ती है। ये भी पढ़े: छत पर उगाएं सेहतमंद सब्जियां

खरबूजे की फसल (melon crop) in Hindi

melon crop मार्च के महीने में खरबूजा बहुत ही फायदेमंद तथा पसंदीदा फलों में से एक है। किसान इसकी खेती नदी तट पर करते हैं। खेती करने से पहले बालू में एक थाला बनाते हैं और बीज बोने से थोड़ी देर पहले खेत को अपने हल के जरिए जोतते हैं। खरबूजे की फसल बोने के बाद इसकी सिंचाई को कम से कम 2 या 3 दिन बाद से करना शुरू कर देना चाहिए।

तरबूजे की फसल ( watermelon crop) in Hindi

watermelon crop गर्मी में तरबूज को बहुत ही शौक से खाया जाता है।तरबूज में पानी की मात्रा बहुत ही ज्यादा होती है, इसको खाने से आप ताजगी का अनुभव करते हैं। इस फसल में लागत बहुत कम लगती है लेकिन मुनाफा उससे कई गुना होता है। तरबूज की फसल बहुत ही कम समय में उग जाती है, जिससे किसानों को काफी मुनाफा भी मिलता है। लेकिन इस बात का ध्यान रखें ,कि तरबूज में कीट और रोग का प्रकोप काफी बड़ा रहता है। किसानों को चाहिए कि वैज्ञानिकों के मुताबिक तरबूज की फसलों की देखरेख करें। तरबूज की फसलें 75 से 90 दिनों के अंदर पूर्ण रुप से तैयार हो जाती है।

भिंडी की फसल( okra harvest) in Hindi

भिंडी सब्जियां bhindi ki kheti किसान भिंडी की फसल फरवरी से मार्च के दरमियान जोतना शुरू कर देते हैं। भिंडी की खेती हर तरह की मिट्टी में की जाती है। खेती से पूर्व दो तीन बार खेतों की जुताई करें। जिससे मिट्टियों में भुरभुरा पन आ जाए, जमीन को समतल कर दे। खेतों में लगभग 15 से 20 दिन पहले इनकी निराई-गुड़ाई करें। खरपतवार नियंत्रण रहे इसके लिए कई प्रकार का रासायनिक प्रयोग भी किसान करते हैं।

ग्वार फली की फसल( guar pod crop) in Hindi

गुआर सब्जियों की फसल guar ki kheti ग्वार फली किसानों कि आय का बहुत महत्वपूर्ण साधन होता है। किसान ग्वार फली का इस्तेमाल हरी खाद ,हरा चारा ,हरी फली , दानों आदि के लिए करते है। ग्वार फली में प्रोटीन तथा फाइबर का बहुत ही अच्छा स्त्रोत होता है। इनके अच्छे स्त्रोत के कारण इनको पशुओं के चारे के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। जिससे पशुओं को विभिन्न प्रकार के प्रोटीन की प्राप्ति हो सके। किसान ग्वार फली की खेती दो मौसम में करते हैं पहला बहुत गर्मी के मौसम में तथा दूसरा  बारिश के मौसम में। ग्वार फली की बुवाई किसान मार्च के महीने में 15 से लेकर 25 तारीख के बीच खेती करना शुरू कर देते हैं। ग्वार फली की फसलें 60 से 90 दिन के अंदर पूर्ण रूप से तैयार हो जाती है तथा यहां कटाई के लायक़ हो जाती हैं। ग्वार फली में बहुत तरह के पौष्टिक तत्व भी मौजूद होते हैं इनका उपयोग विभिन्न प्रकार की सब्जियों को बनाने तथा सलातो के रूप में किया जाता है। हम उम्मीद करते हैं कि आपको हमारी इस पोस्ट द्वारा मार्च के महीने में उगाई जाने वाली सब्जियों की पूर्ण जानकारी पसंद आई होगी। आपने इन सब्जियों के विभिन्न प्रकार के लाभ को जान लिया होगा। यदि आप हमारी दी गई जानकारी से संतुष्ट हैं तो आप हमारी इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा सोशल मीडिया पर शेयर करें धन्यवाद।
भीषण गर्मी में लू से बचाने वाले तरबूज-खरबूज की बागवानी

भीषण गर्मी में लू से बचाने वाले तरबूज-खरबूज की बागवानी

भीषण गर्मी में लू की लपटों से बचाने के लिए मौसमी फल रामबाण का कार्य करते हैं। भीषण गर्मी से जनजीवन अस्‍त-व्‍यस्‍त हो जाता है। दोपहर में ही सूर्य की तल्ख किरणें शरीर को झुलसा देती हैं। गर्मियों में 46.8 डिग्री तापमान में दोपहर में थोड़ी दूरी चलने पर ही प्यास की वजह से गला सूखने लगता है। 

ऐसी स्थिति में खीरा, ककड़ी व तरबूज का सेवन करना बेहद फायदेमंद साबित होता है। गर्मियों के दिनों हर चौराहे-तिराहे पर आपको इसकी दुकानें भी दिखाई देनी लगेंगी। यहां एक बात और जान लें कि इन मौसमी फलों का सेवन शरीर के लिए अत्यंत लाभदायक है। यह गर्मियों के दिनों लू इत्यादि का भी खतरा काफी कम करते हैं।

काले रंग का तरबूज 

प्रयागराज में थोक फल मार्केट मुंडेरा मंडी में इन दिनों मौसमी फल दिखते हैं। मंडी के थोक कारोबारी श्याम सिंह का कहना है, कि छोटे तरबूज तीन प्रकार के होते हैं। काले रंग का तरबूज सबसे अच्छा और स्वाद में मीठा होता है। क्योंकि, यह देशी प्रजाति का है। 

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हरे रंग का तरबूज काफी कम मीठा होता है। यह हाइब्रिड किस्म का है। हरे और धानी रंग का तरबूज अभी नहीं आ रहा है। इसका सेवन करने से प्यास भी काफी कम लगती है। अब जून तक इसकी बाजार में   खूब मांग बढ़ेगी।

तरबूज की बुवाई का समय 

तरबूज की बुवाई का सीजन दिसंबर से जनवरी माह में चालू हो जाता है। मार्च में इसकी हार्वेस्टिंग होती है। लेकिन, कुछ क्षेत्रों में इसकी बुवाई का वक्त मध्य फरवरी वहीं पहाड़ी क्षेत्रों में यह मार्च-अप्रैल में बोया जाता है। तरबूज के रस की चाशनी गर्मियों में अत्यंत स्वादिष्ट एवं ठंडी होती है। 

इस फल में चूना, फास्फोरस और कुछ विटामिन ए, बी, सी जैसे खनिज विघमान होते हैं। इस वजह से बाजार में इनकी खूब मांग रहती हैं। ऐसी स्थिति में इस रबी सीजन में तरबूज की खेती कृषकों के लिए फायदे का सौदा सिद्ध हो सकती है।

मृदा एवं जलवायु 

तरबूज और खरबूज की फसल के लिए मध्यम काली जल निकासी वाली मृदा उपयुक्त होती है। तरबूज के लिए मृदा का स्तर 5.5 से 7 तक अच्छा होता है। तरबूज की फसल को गर्म और शुष्क मौसम एवं भरपूर धूप की जरूरत होती है। बतादें, कि 24 डिग्री सेल्सियस से 27 डिग्री सेल्सियस का तापमान बेल की बढ़ोतरी के लिए आदर्श है।

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उर्वरक और पानी 

तरबूज एवं खरबूज दोनों ही फसलों के लिए 50 किलो एन, 50 किलो पी और 50 किलो के रोपण से पहले और 1 किलो रोपण के उपरांत दूसरे हफ्ते में 50 किलो एन दिया जाना चाहिए। 

बेल के विकास के दौरान 5 से 7 दिनों के समयांतराल पर और फलने के बाद 8 से 10 दिनों के अंतराल पर फसल की सिंचाई करें। गर्मी के मौसम में तरबूज को सामान्य तौर पर 15-17 सिंचाई की जरूरत होती है।

रबी के सीजन में तरबूज की खेती कर किसान हो रहे हैं मालामाल जानें क्या है तकनीक

रबी के सीजन में तरबूज की खेती कर किसान हो रहे हैं मालामाल जानें क्या है तकनीक

आजकल रबी का सीजन चल रहा है और किसान बढ़-चढ़ कर अपने खेतों में फसल लगा रहे हैं। हालांकि अभी भी बहुत से किसान पारंपरिक तरीके से एक ही तरह की फसल लगा कर उत्पादन कर रहे हैं। लेकिन कई जगह किसानों ने अपने खेती करने के तरीके और फसल की किस्म दोनों को बदला है। महाराष्ट्र के किसान तरबूज की खेती कर लाखों रुपए का मुनाफा कमा रहे हैं। इस फसल का फायदा है कि ये कम जगह में भी उगाई जा सकती है।

3 लाख तक मुनाफा कमा रहे हैं किसान

महाराष्ट्र की बात की जाए तो यहां पर किसानों द्वारा लगभग 660 हेक्टेयर में तरबूज (water melon) की फसल का उत्पादन किया जा रहा है। किसानों का रुझान इस खेती की तरफ हाल ही के दिनों में काफी बढ़ा है। कम जगह में की जा रही तरबूज की खेती से किसान लाखों का मुनाफा कमा चुके हैं।

ये भी पढ़ें: तरबूज और खरबूज की अगेती खेती के फायदे

क्यों हो रही है तरबूज की खेती लोकप्रिय

खासकर उत्तर भारत में गर्मियों में तरबूज काफी ज्यादा पसंद किया जाता है। इसका कारण है, कि तरबूज में जल की मात्रा काफी ज्यादा होती है, जो इसे गर्मियों के लिए एकदम परफेक्ट फल बनाता है। इसके अलावा चूना, फास्फोरस और कुछ विटामिन ए, बी, सी जैसे खनिज होते हैं। हालांकि ऐसा कहा जाता है कि गर्म तरबूज खाने से पेट से जुड़ी समस्याएं हो सकती है इसलिए गर्म तरबूज नहीं खाना चाहिए।

तरबूज के बोए जाने का सही मौसम क्या है?

तरबूज को दिसंबर के महीने में उगाया जाता है और इसके बाद मार्च आने तक इसकी कटाई शुरू कर दी जाती है। इसके अलावा कुछ पहाड़ी इलाकों में इसकी खेती अप्रैल के महीने में भी की जाती है, क्योंकि इसके लिए हमें गर्म और शुष्क मौसम की आवश्यकता होती है। 25 से 27 डिग्री का तापमान इसके लिए उचित है। तरबूज की फसल उगाते समय किसानों को एक बात ध्यान में रखनी बेहद जरूरी है, कि इस में कीड़े आदि बहुत जल्दी लग जाते हैं, जिससे फसल के बर्बाद होने का खतरा बना रहता है। कीड़े पत्तों से शुरू हो कर फल तक पहुंच सकते हैं, इसलिए समय-समय पर हमें फसलों पर दवाइयों का छिड़काव करते रहना चाहिए।
लागत कम मुनाफा ज्यादा, ऐसे करें तरबूज की खेती

लागत कम मुनाफा ज्यादा, ऐसे करें तरबूज की खेती

भारत में इस वक्त रबी की फसलों की कटाई का काम तेजी से चल रहा है. जिसका काम मार्च तक पूरा कर लिया जाएगा. जिसके बाद खेत खाली हो जाएंगे. ऐसे में किसान चाहें तो तरबूज की खेती करके कम लागत में ज्यादा मुनाफा कमा सकते हैं. तरबूज की खेती की सबसे बड़ी खासियत यही है कि, इसके लिए कम पानी की जरूरत पड़ती है. वहीं भारत में गर्मियों के मौसम में ज्यादा डिमांड होने की वजह से इसके अच्छे खासे दाम मिल जाते हैं.

तरबूज की खेती

अगर आप भी तरबूज की खेती करने का मन बना रहे हैं तो, रबी और खरीफ के सीजन के बीच के सीजन यानि कि जायद के सीजन में उगा सकते हैं. यह सीजन फरवरी से मार्च के बीच का होता है. तरबूज की खेती के लिए उसकी उन्नत किस्मों की बुवाई फायदेमंद होती है. इसके लिए खेती करने का सही तरीका भी आना चाहिए. तो चलिए फिर जानते हैं, तरबूज की खेती से जुड़ी अहम बातें.

इन राज्यों में होती है सबसे ज्यादा खेती

देश में गर्मियों का मौसम शुरू होते ही, तरोताजा कर देने वाले तरबूज की डिमांड बढ़ जाती है. इसलिए इसकी खेती भी काफी ज्यादा बड़े पैमाने में की जाती है. इसकी खेती मुख्य रूप से यूपी, पंजाब, कर्नाटक, हरियाणा, राजस्थान में की जाती है. अगर आप किसी अन्य फलों की खेती करते हैं तो उनके मुकाबले
तरबूज की खेती करना आसान है. क्योंकि इसमें कम खाद, कम समय, और कम पानी की जरूरत पड़ती है. तरबूज की खेती के लिए गंगा, यमुना जैसी अन्य नदियों के किनारे खाली जगहों पर की जाती है.

तरबूज की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु और मिट्टी

ज्यादा तापमान वाली जलवायु तरबूज की खेती के लिए सबसे अच्छी होती है. ज्यादा तापमान से फल जल्दी बढ़ते हैं. एक्सपर्ट्स के मुताबिक फलों के बीजों को अंकुरित होने के लिए कम से 20 से 25 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान की जरूरत होती है. वहीं तरबूज की खेती के लिए रेतीली और दोमट जमीन अच्छी रहती है. इसके अलावा उसकी मिट्टी का पीएच मान 5 से 7 के बीच होना चाहिए. अगर जमीन उपजाऊ नहीं है और बंजर है, तो भी इसकी खेती आराम से की जा सकती है. ये भी देखें: तरबूज और खरबूज की अगेती खेती के फायदे

तरबूज की उन्नत किस्मों के बारे में

तरबूज की वैसे तो कई तरह की उन्नत किस्में हैं, जो काफी समय और कम लागत में तैयार हो जाती हैं. इसके अलावा वो उत्पादन भी बढ़िया देती हैं. जिनके बारे में आपका भी जान लेना जरूरी है.
  • अर्का मानिक

इस किस्म के तरबूज का विकास बैंगलौर में किया गया. यह किस्म जल्दी सड़ती नहीं है. तरबूज की यह किस्म प्रति हेक्टेयर 50 से 60 टन तक की उपज देती है.
  • अर्का ज्योति

इस तरह के किस्म के तरबूज का भार 7 से 8 किलो तक होता है. साथ ही इसे काफी दिनों तक रखा भी जा सकता है. प्रति हेल्तेय्र 350 क्विंटल तक इसका उत्पादन किया जा सकता है.
  • शुगर बेबी

शुगर बेबी किस्म के तरबूज के बीज काफी जल्दी तैयार हो जाते हैं. कम से कम सौ दिनों के बाद यह तोड़ने लायक हो जाते हैं. इसके फलों में बीज काफी कम होते हैं. 200 से 250 क्विंटल की उपज प्रति हेक्टेयर मिल सकती है.
  • डब्लू 19

NRCH द्वारा गर्म और शुष्क क्षेत्रों में खेती के लिए यह किस्म सबसे अच्छी होती है. तरबूज की यह किस्म ज्यादा तापमान भी सहन कर सकती है. इसका फल काफी अच्छा और मीठा होता है. इसे दो से ढ़ाई महीने में तैयार किया जा सकता है. 40 से 50 टन की उपज प्रति हेक्टेयर में पाई जा सकती है.
  • आशायी यामातो

जापान से लायी गयी इस किस्म के फलों का भार 6 से 9 किलो तक होता है. धारीदार और हल्के हरे रंग का छिलका इसकी पहचान है. 200 से 225 क्विंटल तक की उपज प्रति हेक्टर में मिल जाती है. ये भी देखें: ताइवानी तरबूज व खरबूज के फलों से किसान कमा रहे लाखों में मुनाफा

अगर चाहते हैं हाइब्रिड तरबूज की खेती

अगर आप हाइब्रिड तरबूज की खेती करना चाहते हैं तो खेती से पहले खेत की जुताई करनी जरूरी है. इस तरह की खेती के लिए खेत को तैयार करना सबसे ज्यादा जरूरी है. इसके लिए आप मिट्टी पलटने वाले हल का सहारा ले सकते हैं. आपको इस बात का भी ख्याल रखना होगा कि, कहत में पानी की मात्रा एकदम बराबर हो. यानि कि ना तो ज्यादा और ना ही कम. जिसके बाद आप नदियों की खाली जगह पर क्यारियां बना लें और जमीन में गोबर की खाद मिला दें. अगर रेत ज्यादा है तो ऊपर की स्थ को हटाकर मिट्टी में खाद मिला दें.

जानिए बुवाई का सही तरीका

तरबूज के बीजों की बुवाई अगर मैदानी क्षेत्रों में कर रहे हैं तो समतल भूमि का चयन करें, अगर बुवाई पर्वतीय क्षेत्रों में कर रहे हैं तो उपर की तरफ उठी हुई क्यारियों का चयन करें. इसके लिए दो से ढ़ाई मीटर चौड़ी क्यारी बनाई जाती है. जिसके किनारे डेढ़ सेंटीमीटर गहरे होते हैं. जिनमें बीजों को बोया जाता है. बुवाई की लाइन और आपसी दूरी कितनी हो यह तरबूज की किस्म पर निर्भर करता है.

सही खाद और उर्वरक का करें प्रयोग

तरबूज की खेती के लिए गोबर की खाद को रेतीली भूमि में मिलाया जाता है. यह काम आप जमीन तैयार करते वक्त भी कर सकते हैं. वहीं 70 से 80 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर के साथ फास्फेट और पोटाश की मात्रा 60-60 किलो प्रति हैक्टेयर होनी चाहिए. खाद उर्वरकों की मात्रा और उसकी शक्ति पर भी निर्भर करती है. उर्वरा शक्ति जमीन में ज्यादा हो तो उर्वरक और खाद की मात्रा को आप कम कर सकते हैं.

क्या हो सिंचाई के प्रबंध?

तरबूज की बुवाई के लगभग 15 से 20 दिनों के बाद सिचाई करना अच्छा होता है. नदियों के किनारे खेती करने की वजह से इसमें सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती. क्योंकि वहां पर पहले से ही मिट्टी में नमी होती है.

कैसे करें तरबूज की तुड़ाई?

तरबूज की बुवाई के बाद करीब तीन से चार महीने के बाद इसे तोड़ने का काम शुरू हो जाता है. अगर फल कहीं दूर भेजे जाने हैं तो इन्हें पहले ही तोड़ लें. हालांकि फलों को दबाकर भी देख लें. इससे फल का कच्चा और पका होने का अंदाजा लगाया जा सकता है. इसके अलावा फलों को उनकी डंठल से अलग करने के लिए चाक़ू या फिर धारदार चीज का इस्तेमाल किया जा सकता है.

क्या होगा आय का लाभ?

तरबूज की पैदावार की अलग-अलग किस्में होती हैं. जो मार्केट में 10 से 12 हजार रुपए प्रति क्विंटल बेचा जाता है. अगर आपने 35 से 40 क्विंटल भी तरबूज की उपज कर ली तो, इससे अच्छा खासा मुनाफा कमाया जा सकता है.

तरबूज के पौधों में रोग भी लगते हैं. जिनकी रोकथाम करना बेहद जरूरी है. यह काम कैसे करना करना है, चलिए जान लेते हैं.

  • तरबूज की खेती में कद्दू का लाल कीड़ा लग जाता है. जिससे बचाव के लिए कारब्रिल 50 डीएसटी का छिड़काव किया जा सकता है.
  • तरबूज में अक्सर फल मक्खी नाम का रोग भी लग जाता है, जिस वजह से फल में छेद हो जाता है. इससे बचाव के लिए मेलाथियान 50 ईसी का छिड़काव किया जा सकता है.
  • अगर तरबूज की पत्तियों में सफेत पाउडर जैसा नजर आए तो समझिये, इसमें बुकनी रोग लगा है. इसके निदान के लिए डायनोकेप 05% का छिड़काव किया जा सकता है.
  • पोधे कि निचली सतह पर गुलाबी रंग के पाउडर की तरह दिकाई देने वाला डाउनी मिल्ड्यू नाम का रोग होता है. इससे बचने के लिए मैंकोजेब का छिड़काव हफ्ते में तीन से चार बार किया जा सकता है.
  • फ्यूजेरियम विल्ट नाम के रोग से ग्रसित होकर पौधा पूरी तरह से खराब हो जाता है और गिर जाता है. अगर बीज लगाने से पहले खेतों में केप्टान का छिड़काव कर लें, तो इससे पौधे बच सकते हैं.
तरबूज की खेती से जुड़ी यह ऐसी जानकारी हैं, जो आपके बेहद काम आने वाली है. हमारे बताये हुए तरीकों से तरबूज की खेती करके आप इस सीजन खूब मालामाल हो सकते हैं.
विश्व के इन सबसे महंगे फलों की कीमत जानकर होश उड़ जाएंगे

विश्व के इन सबसे महंगे फलों की कीमत जानकर होश उड़ जाएंगे

आज हम दुनिया के सबसे महंगे फलों के बारे में चर्चा करने जा रहे हैं। इनमें शामिल युबारी मेलन के संबंध में कहा जाता है, कि यह दुनिया का सर्वाधिक महंगा फल है। बतादें कि युबारी मेलन यह खरबूजे की एक प्रजाति है। दरअसल, साल 2014 में एक जोड़े युबारी मेलन की नीलामी 26000 डॉलर मतलब कि 16,64, 533 रुपये में नीलामी हुई थी। वैसे तो केला अमरूद और आम जैसे फलों की खेती प्रत्येक देश में की जाती है। यदि इनकी कीमतों को देखा जाए तो यह लगभग समस्त देशों में तकरीबन एक जैसी ही रहती हैं। परंतु, कुछ फल ऐसे भी हैं, जिनकी खेती समस्त देशों में नहीं की जाती है। किसी विशेष प्रकार की मृदा औऱ जलवायु में ही उन फलों की खेती की जा सकती है। विशेष बात यह है, कि यह फल लाखों रुपये में बेचे जाते हैं। ऐसे में किसान भाई इनका उत्पादन करके बेहतरीन आमदनी अर्जित कर सकते हैं। साथ ही, जल्दी अमीर भी हो सकते हैं। अब आज हम आपको दुनिया के कुछ इसी प्रकार के अजूबे फलों के विषय में जानकारी देंगे। जिनके विषय में जानकर आप हैरान हो जाएंगे।

लॉस्ट गार्डेन ऑफ हेलिगन पाइनएप्पल्स

लॉस्ट गार्डेन ऑफ हेलिगन पाइनएप्पल्स अनानास की एक प्रजाति है। कहा जाता है, कि यह विश्व का सबसे महंगा अनानास है। एक लॉस्ट गार्डेन ऑफ हेलिगन पाइनएप्पल्स की कीमत एक लाख रुपये के आसपास होती है। इसकी खेती काफी बेहतरीन तरीके से की जाती है। जानकारी के लिए बतादें कि उर्वरक के तौर पर पुआल और घोड़े के लीद का इस्तेमाल किया जाता है।

युबारी मेलन

कहा जाता है, कि यह विश्व का सबसे महंगा फल है। यह खरबूजे की एक प्रजाति है। साल 2014 में एक जोड़े युबारी मेलन को 26000 डॉलर यानि 16,64, 533 रुपये में बेका गया था। विशेष बात यह है, कि इस खरबूजे का उत्पादन साप्पोरो के पास होक्काइडो द्वीप में किया जाता है। यह एक हाइब्रिड खरबूज है। जापान में लोग युबारी मेलन को उपहार स्वरुप भी देते हैं। यह भी पढ़ें: कम पैसे में मोटी कमाई, जानें खरबूजे की खेती करने का सही तरीका

रूबी रोमन ग्रेप्स

रूबी रोमन ग्रेप्स की खेती की शुरुआत 2008 में हुई थी। जापान के इशिकावा प्रीफेक्चर में किसानों ने इसकी खेती चालू की थी। परंतु, फिलहाल जापान के दूसरे भागों में भी किसान रूबी रोमन ग्रेप्स अंगूर की खेती कर रहे हैं। कहा जाता है, कि यह विश्व का सबसे महंगा अंगूर है। केवल एक गुच्छे की कीमत 50 हजार रुपये से भी ज्यादा होती है। साल 2016 में 9 लाख रूपए में इसके एक गुच्छे की नीलामी हुई थी।

टाइयो नो टमैगो

टाइयो नो टमैगो आम की एक प्रजाति है। जापान के मियाजाकी शहर में किसानों ने सर्वप्रथम इसकी खेती करनी चालू की थी। परंतु, फिलहाल भारत, फिलीपींस, बांग्लादेश और थाईलैंड में भी इसकी खेती की जा रही है। इसके एक फल का वजन 350 ग्राम तक होता है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में एक किलो टाइयो नो टमैगो की कीमत 2 लाख 70 हजार रुपये है। इस प्रजाति के आम में 15 प्रतिशत तक चीनी होती है।
फायदेमंद हाइब्रिड तरबूज की खेती से किसानों को अच्छा खासा मुनाफा हो सकता है।

फायदेमंद हाइब्रिड तरबूज की खेती से किसानों को अच्छा खासा मुनाफा हो सकता है।

आजकल अनाज हो अथवा सब्जी, फल सभी किस्मों के खाद्य फसलों की विभिन्न किस्में बाजार में मौजूद हैं। आए दिन कृषि वैज्ञानिक नई-नई और फायदेमंद फसलों को विकसित करने का कार्य करते रहे हैं। आज भी वैज्ञानिक कई सारी किस्मों को विकसित करने में निरंतर रूप से लगे हुए हैं। इसी कड़ी में आज हम बात करेंगे उन किस्मों की जिनसे किसानों को काफी मुनाफा होने की संभावना रहती है। हम बात क्र रहे हैं हाईब्रिड तरबूज की जिसकी खेती किसी भी मिट्टी में आसानी से की जा सकती है। बाजार में इसकी मांग भी काफी अधिक रहती है। तरबूज गर्मी के मौसम में उत्पादित की जाने वाली फसल है। इस वैज्ञानिक युग में बदलते समय के साथ-साथ तरबूज की नई किस्में भी बाजार में आने लगी हैं। अब ऐसी स्थिति में हम आपको हाईब्रिड तरबूज की खेती के विषय में जानकारी देने जा रहे हैं। तरबूज का उपयोग जूस, फल, फ्रूट डिश, शरबत जैसी चीजों को निर्मित करने में किया जाता है।

हाइब्रिड तरबूज की खेती के लिए कैसी मृदा होनी चाहिए

हाइब्रिड तरबूज की खेती करने के लिए मध्यम काली, रेतीली मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है। मृदा में भरपूर मात्रा में कार्बनिक पदार्थ होना आवश्यक होता है। इसका पीएच मान 6.5 से 7 के मध्य सबसे ठीक माना जाता है। आज कल गांवों में नदी के किनारे तरबूज का उत्पादन काफी बड़े पैमाने पर किया जाता है। तरबूज की फसलें पानी से बहुत ही संवेदनशील होती हैं। इसे शुरुआत में कम पानी की जरुरत होती है। ये भी पढ़े: तरबूज और खरबूज की अगेती खेती के फायदे

कैसा खाद इस फसल में ड़ालना चाहिए

अगर हम इस हाईब्रिड बीज की बात करें तो इसकी बुआई से पूर्व मृदा परिक्षण कर उसमें खाद और उर्वरक का छिड़काव करना चाहिए। खेतों में आप विघटित गोबर अथवा कम्पोस्ट खाद को खेत में मिश्रित कर मृदा को और भी अधिक उपजाऊ बनाया जा सकता है। खाद व उर्वरक किसी भी फसल की अच्छी उपज में एक अहम भूमिका अदा करते हैं।

इस हाईब्रिड तरबूज की खेती से कितना उत्पादन हो सकता है

इस तरह से तरबूज की फसल को तैयार होने में 90 से 110 दिन का वक्त लग जाता है। अगर हम लागत की बात करें तो इसमें तकरीबन 60 से 70 हजार तक का खर्चा आ जाता है। प्रति एकड़ के खेत में इसका उत्पादन 150 से 200 कुंतल तक हो जाता है, जिसे बाजार में बेचकर आप बेहद ही मोटा फायदा अर्जित कर सकते हैं।

इस किस्म के तरबूज के क्या फायदे हैं

जानकरी के लिए बतादें कि तरबूज का सेवन करने से शरीर में हीमोग्लोबिन बढ़ाता है। इसके अतिरिक्त यदि शरीर में थकावट हो तो आपको इसका सेवन अवश्य करना चाहिए। इसके अंदर रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने जैसे भी गुण होते हैं। तरबूज में विघमान अमीनो एसिड हमारे शरीरिक रक्त चाप को नियंत्रित करने में काफी सहायता करता है। यह गर्मियों के समय भी हमारे शरीर को हाईड्रेड भी रखता है और ठंडक भी प्रदान करता है।
बेमौसम बारिश का असर आम लोगों को 'मैंगो पार्टी' से दूर कर सकता है

बेमौसम बारिश का असर आम लोगों को 'मैंगो पार्टी' से दूर कर सकता है

मई का महीना चालू हो गया है। लेकिन गर्मी का कोई ज्यादा प्रभाव देखने को नहीं मिल रहा है। इसके पीछे की वजह रुक-रुक कर होती बारिश है। अब ऐसी स्थिति में लीची, तरबूज, खरबूज एवं आम जैसे गर्मियों के फलों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा। इनका इतना भाव बढ़ जाऐगा जो इन्हें आम आदमी के बजट से बाहर कर देगा। गर्मियों का असली आनंद तो तब ही आता है, जब पीले-पीले आम व लाल-लाल तरबूज आपकी थाली में मौजूद हों। साथ ही, परिवार के सभी जन एक साथ बैठकर ‘मैंगो पार्टी’ कर खूब आनंद करें। वहीं, यदि आप कभी जामा मस्जिद की तरफ चले गए तो ‘मोहब्बत का शरबत’ का लुफ्त उठाकर आऐं। परंतु, इस वर्ष क्या यह सब कुछ आम आदमी की पहुंच से परेह हो जाएगा। आजकल मई माह में हो रही बेमौसम वर्षा से तो इसी का भय सता रहा है। मई का माह शुरू होने से भी पूर्व देशभर में रुक-रुक बरसात हो रही है। भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, आगामी दिनों में भी बारिश होने की आशंका है। ऐसी स्थिति में इसका प्रभाव फल और सब्जी की फसलों पर दिखना आम बात है, जो कि आगामी दिनों में इनकी कीमतों को बढ़ा सकती है। यह भी पढ़ें : मिर्जा गालिब से लेकर बॉलीवुड के कई अभिनेता इस 200 साल पुराने दशहरी आम के पेड़ को देखने पहुँचे हैं

इन फलों पर पड़ेगा बेमौसम बारिश का प्रभाव

खरबूज, लीची, आम और तरबूज गर्मियों के ऐसे फल हैं, जिनकी जितनी सिंचाई की आवश्यकता होती है, उतनी ही गर्मी की भी। उत्तर भारत के विभिन्न इलाके विशेषकर के गंगा एवं यमुना के तटीय क्षेत्र इन फलों की खेती के लिए सर्वाधिक अच्छे माने जाते हैं। यहां पर वर्षा होने की वजह से तापमान में नरमी आती है। इसके चलते इनकी मिठास में भी कुछ कमी रह सकती है। केवल यही नहीं मई माह तक बाजार में इन फलों का आना चालू जाता है। उत्तर प्रदेश के मेरठ का रटौल, महिलाबाद का दशहरी आम तो वहीं बिहार के मुज्जफरपुर की लीचियाँ बाजार पहुँचने लगती हैं। वर्तमान में यह बाजार में थोड़ी कम मात्रा में पहुँच पा रही है। इतना ही नहीं इनका स्वाद तक लुप्त हो चुका है। तो उधर इनके भावों में आसमानी उछाल देखने को मिल रहा है। फल विक्रेताओं के बताने के अनुसार, यदि अगर इसी प्रकार से गर्मी का प्रभाव कम रहा तो अच्छी गुणवत्ता में इन फलों को बाजार तक पहुँचाने में अधिक विलंभ होगा, जो इनकी कीमतों को भी बढ़ा सकती है।

फलों के साथ सब्जियों को भी काफी हानि

बारिश का प्रभाव फलों पर होने के साथ-साथ आम लोगों की थाली में रहने वाली लौकी, भिंडी और प्याज जैसी सब्जियों पर भी देखने को मिल रहा है। महाराष्ट्र एवं कर्नाटक की भाँति प्याज के बड़े उत्पादक प्रदेशों में इस बारिश के चलते खेतों में जलभराव हो गया है। इसकी वजह से प्याज की फसल चौपट हो चुकी है। केवल इतना ही नहीं भिंडी, लौकी और टमाटर पर भी इसका अच्छा खासा प्रभाव देखने को मिला है। किसानों ने भी सरकार से सहायता करने की माँग भी की है।
पीले तरबूज का स्वाद लोगों को लाल तरबूज से ज्यादा पसंद आ रहा है, मुनाफा भी मिल रहा है।

पीले तरबूज का स्वाद लोगों को लाल तरबूज से ज्यादा पसंद आ रहा है, मुनाफा भी मिल रहा है।

आजकल नई नई तकनीक और फसलों की विभिन्न नई किस्में विकसित हो रही हैं। पीला तरबूज इस भूमि पर सिर्फ आज से नहीं बल्कि 5 हजार वर्ष पूर्व से है। पहले यह केवल अफ्रीका के अंदर ही की जाती था। परंतु, अब इसको पूरे विश्व में उत्पादित किया जाता है। गर्मियों का मौसम आते ही तरबूजों की मांग बाजार में काफी बढ़ जाती है। यदि आप भी तरबूजों को पसंद करते हैं, तो गर्मी में लाल-लाल तरबूज खाने से स्वयं को रोक नहीं सकते हैं। लेकिन हम आज लाल तरबूज के नहीं पीले तरबूज के विषय में चर्चा कर रहे हैं। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि लाल तरबूज से कहीं अधिक अच्छा होता है पीला तरबूज। बाजार में भी फिलहाल लाल तरबूज की भांति पीले तरबूज की भी मांग बढ़ी है। अधिकांश लोग फिलहाल इस तरबूज को बेहद अच्छा मानते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि इसके अंदर विघमान गुण इसे औषधीय रूप से लाल तरबूज से बेहतर बताते हैं। इसके साथ ही आपकी जानकारी के लिए बतादें पीले तरबूज का स्वाद भी लाल तरबूज से अच्छा होता है।

पीला तरबूज किस जगह से आया है

पीला तरबूज इस धरती पर सिर्फ अभी ने नहीं बल्कि 5 हजार वर्ष पहले से मौजूद है। पूर्व में यह केवल अफ्रीका में पैदा किया जाता था। अब इसको संपूर्ण विश्व में उत्पादित किया जाता है। अमेरिका, चीन और बाकी बहुत सारे देशों में इस तरबूज की मांग में वृद्धि हुई है। भारतीय बाजारों में भी गिने-चुने कुछ स्थानों पर यह मौजूद है। दरअसल, आजतक यह लोकल बाजारों में आवक नहीं हुई है। परंतु, धीरे-धीरे यह तीव्रता से लोकल बाजारों में भी पहुंच जाएगा। ये भी पढ़े: रबी के सीजन में तरबूज की खेती कर किसान हो रहे हैं मालामाल जानें क्या है तकनीक

किस वजह से तरबूज का रंग पीला होता है

विज्ञान के मुताबिक, तरबूजों का रंग किस प्रकार का होगा यह निर्धारित करता है, लायकोपीन नाम का एक रसायन। जिस तरबूज में यह रसायन अधिक होता है, उस तरबूज का रंग उतना ही ज्यादा लाल होता है। पीले तरबूज में यह रसायन मौजूद नहीं होता है। यही वजह है, कि इस तरबूज का रंग पीला होता है। हालांकि, पीला तरबूज लाल तरबूज की तुलना में अधिक मीठा होता है। इसे खाने वाले लोग कहते हैं, कि इसका स्वाद बिल्कुल शहद की भांति होता है। इस तरबूज में विटामिन ए की मात्रा प्रचूर मात्रा में पायी जाती है।

यह तरबूज मुख्यत कहा उगाया जा सकता है

यह तरबूज हर एक जगह पर उत्पादित नहीं किया जा सकता। इनको डेजर्ट किंग भी कहा जाता है, मतलब कि रेगिस्तान का राजा। यह केवल रेगिस्तानी क्षेत्र में ही पाए जाते हैं। यदि आप पीले तरबूजों की खेती करना चाहते हैं, तो भारत में यह केवल गुजरात और राजस्थान के कुछ हिस्सों में ही संभव है।