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स्प्रिंकलर सिस्टम यानी कम पानी में खेती

स्प्रिंकलर सिस्टम यानी कम पानी में खेती

फव्वारे छोटे से बड़े क्षेत्रों को कुशलता से कवरेज प्रदान करते हैं तथा सभी प्रकार की संपत्तियों पर उपयोग के लिए उपयुक्त हैं। यह लगभग सभी सिंचाई वाली मिट्टियों के लिये अनुकूल हैं क्योंकि फव्वारे विस्तृत विसर्जन क्षमता में उपलब्ध हैं। 

कृषि के लिए सिंचाई बहुत आवश्यक होती है बिना सिंचाई के कृषि में एक दाना भी उपजाना संभव नहीं है। जिन क्षेत्रों में भूमिगत जल या नदियों-नहरों की अच्छी व्यवस्था है वहां तो सिंचाई आराम से की जा सकती है, लेकिन बहुत से क्षेत्रों में न तो भूमिगत जल की उपलब्धता है और न ही नदी या नहर की व्यवस्था है। 

ऐसे में सिंचाई अति कठिन कार्य हो जाता है। बहुत कम पानी के प्रयोग से ही सिंचाई करनी होती है। ऐसे क्षेत्रों के लिए छिड़काव सिंचाई प्रणाली यानी स्प्रिंकलर और ड्रिप सिंचाई प्रणाली बेहद कारगर साबित हो सकती हैं। सिंचाई की इन पद्धतियों से कम पानी में अच्छी उपज ली जा सकती है।

छिड़काव सिंचाई प्रणाली

स्प्रिंकलर सिस्टम 

 छिड़काव सिंचाई, पानी सिंचाई की एक विधि है, जो वर्षा के समान है। पानी पाइप के माध्यम से आमतौर पर पम्पिंग द्वारा सप्लाई किया जाता है। 

वह फिर स्प्रे हेड के माध्यम से हवा और पूरी मिट्टी की सतह पर छिड़का जाता है जिससे पानी भूमि पर गिरने वाले पानी की छोटी बूँदों में बंट जाता है। फव्वारे छोटे से बड़े क्षेत्रों को कुशलता से कवरेज प्रदान करते हैं तथा सभी प्रकार की संपत्तियों पर उपयोग के लिए उपयुक्त हैं। यह लगभग सभी सिंचाई वाली मिट्टियों के लिये अनुकूल हैं। 

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लगभग सभी फसलों के लिए उपयुक्त हैं। जैसे गेहूं, चना आदि के साथ सब्जियों, कपास, सोयाबीन, चाय, कॉफी व अन्य चारा फसलों के लिए। 

ड्रिप सिंचाई प्रणाली

स्प्रिंकलर सिस्टम 

 ड्रिप सिंचाई प्रणाली यानी टपक सिंचाई फसल को बूंदों के माध्यम से सींचती है। इसमें छोटी नलियों के माध्यम से पंप द्वारा पानी पाइपोें तक पहुंचता है। इनमें लगे नाजिल की मदद से पौधों और फसल को बूंद बूंद कर पानी पहुंचता है।

जितने पानी की जरूरत है उतनी मात्रा में और नियत लक्ष्त तक ही पानी पहुंचाने में यह विधि बेहद कारगर है। पानी सीधे पौधे की जड़ों में आपूर्ति करता है। 

पानी और पोषक तत्व उत्सर्जक से, पौधों की जड़ क्षेत्र में से चलते हुए गुरुत्वाकर्षण और केशिका के संयुक्त बलों के माध्यम से मिट्टी में जाते हैं। इस प्रकार, पौधों की नमी और पोषक तत्वों की कमी को तुरंत ही पुन: प्राप्त किया जा सकता है। यह सुनिश्चित करते हुए कि पौधे में पानी की कमी नहीं होगी। 

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ड्रिप सिंचाई आज की जरूरत है, क्योंकि प्रकृति की ओर से मानव जाति को उपहार के रूप में मिली जल असीमित एवं मुफ्त रूप से उपलब्ध नहीं है। विश्व जल संसाधनो में तेजी से ह्रास हो रहा है। 

ड्रिप सिंचाई प्रणाली के लाभ

स्प्रिंकलर सिस्टम

पैदावार में 150 प्रतिशत तक वृद्धि। बाढ़ सिंचाई की तुलना में 70 प्रतिशत तक पानी की बचत। अधिक भूमि को इस तरह बचाये गये पानी के साथ सिंचित किया जा सकता है। फसल लगातार,स्वस्थ रूप से बढ़ती है और जल्दी परिपक्व होती है।

शीघ्र परिपक्वता से उच्च और तेजी से निवेश की वापसी प्राप्त् होती है। उर्वरक उपयोग की क्षमता 30 प्रतिशत बढ़ जाती है। उर्वरक, अंतर संवर्धन और श्रम का मूल्य कम हो जाता है। उर्वरक लघु सिंचाई प्रणाली के माध्यम से और रसायन उपचार दिया जा सकता है। बंजर क्षेत्र, नमकीन, रेतीली एवं पहाड़ी भूमि को भी उपजाऊ खेती के अधीन लाया जा सकता है।

90 प्रतिशत तक मिलती है छूट

ड्रिप एवं स्प्रिंकलर ​सिस्टम लगाने पर राज्यों में अलग अलग छूट की व्यवस्था की है। उत्तर प्रदेश एवं राजस्थान सहित कई राज्यों में इस पर केन्द्र और राज्य सरकारों की ओर से 90 प्रतिशत तक अनुदान की व्यवस्था है। किसान हर जनपद स्थित उद्यान विभाग में पंजीकरण कराकर इस योजना का लाभ ले सकते हैं।

ड्रिप सिंचाई यानी टपक सिंचाई की संपूर्ण जानकारी

ड्रिप सिंचाई यानी टपक सिंचाई की संपूर्ण जानकारी

किसान भाइयों आपको यह जानकर अवश्य आश्चर्य होगा कि हमारे देश में पानी का सिंचाई 85 प्रतिशत हिस्सा खेती में इस्तेमाल किया जाता है। इसके बावजूद हमारी खेती 65 प्रतिशत भगवान भरोसे रहती है यानी बरसात पर निर्भर करती है। 

कहने का मतलब केवल 35 प्रतिशत खेती को सिंचाई के लिए पानी मिल पाता है। अब तेजी से बढ़ रहे औद्योगीकरण व शहरी करण से खेती के लिए पानी की किल्लत रोज-ब-रोज बढ़ने वाली है। इसलिये सरकार ने जल संरक्षण योजना चला रखी है। 

हमें पानी की ओर से सतर्क हो जाना चाहिये। इसके अलावा जिन किसान भाइयों को नकदी एवं व्यावसायिक फसलें लेनी होतीं हैं उन्हें पर्याप्त पानी की आवश्यकता होती है। 

परम्परागत सिंचाई के साधनों नहरों, नलकूपों, कुएं से सिंचाई करने से 30 से 35 प्रतिशत पानी बर्बाद हो जाता है। वैज्ञानिकों ने फल, सब्जियों व मसाला वाली उपजों की सिंचाई के लिए ड्रिप का विकल्प खोजा है, इसके अनेक लाभ हैं। आइये ड्रिप इरिगेशन के बारे में विस्तार से जानते हैं।

ड्रिप सिंचाई क्या है? drip irrigation meaning in hindi?

ड्रिप सिंचाई एक ऐसा सिस्टम है जिससे खेतों में पौधों को करीब से उनकी जड़ों तक बूंद-बूंद करके पानी पहुंचाने का काम करता है। इसकी सबसे खास बात यह है कि कम पानी में अधिक से अधिक फसल को सिंचित करना है। 

ड्रिप इरिगेशन में कुएं से पानी निकालने वाले मोटर पम्प से  हेडर असेम्बली के माध्यम से मेनलाइनव सबमेन को पॉली ट्यूब से जोड़कर खेतों को आवश्यकतानुसार पानी पहुंचाया जाता है, जिसमें पौधों की दूरी के हिसाब से पानी को टपकाने के छिद्र बने होते हैं। उनसे पौधों की सिंचाई की जाती है। 

इसके अलावा खेत में खाद डालने के लिए भी इस सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है। हेडर असेम्बली में बने टैंक में पानी में खाद डाल दी जाती है। 

जो पाइपों के सहारे पौधों की जड़ों तक पहुंच जाती है। इससे खेती बहुत अच्छी होती है और किसान भाइयों को इससे अनेक लाभ मिलते हैं।  

ड्रिप सिंचाई के सिस्टम में कौन-कौन से उपकरण होते हैं? 

किसान भाइयों यह ऐसा सिस्टम है कि खेत में फसल के समय पौधों के किनारे-किनारे इसके पाइपों को फैला दिया जाता है और उससे पानी दिया जाता है। 

फसल खत्म होने या गर्मी अधिक होने पर इस सिस्टम को समेट कर छाया में साफ सफाई करके सुरक्षित रख दिया जाता है। आइये जानते हैं कि ड्रिप सिंचाई का चित्र कसे होता है और इसमें कौन-कौन से उपकरण होते हैं।

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ड्रिप सिंचाई का चित्र  


हेडर असेम्बली : हेडर असेम्बली से पानी की गति को नियंत्रित किया जाता है। इसमें बाईपास, नॉन रिटर्न वाल्व, एयर रिलीज शामिल होते हैं।

फिल्टर्स : जैसा नाम से ही पता चलता है कि यह पानी को फिल्टर करता है। इन फिल्टर्स में स्क्रीन फिल्टर, सैंड फिल्टर, सैंड सेपरेटर, सेटलिंग टैंक आदि छोटे-छोटे उपकरण होते हैं। 

पानी में रेत अथवा मिट्टी का फिल्टर करने के लिए हाइड्रोसाइक्लोन फिल्टर का उपयोग किया जाता है। पानी में काई, पौधों के सड़े हुए पत्ते, लकड़ी व महीन कचरे की सफाई के लिए सैंड फिल्टर का प्रयोग किया जाना चाहिये। 

यदि पानी साफ दिख रहा हो तब भी उसके तत्वों के शुद्धिकरण के लिए स्क्रीन फिल्टर का इस्तेमाल किया जाना चाहिये।

खाद व रसायन देने के उपकरण: ड्रिप इरिगेशन द्वारा उर्वरकों व खादों को इस सिस्टम में लगे वेंचूरी और फर्टिलाइजर टैंक से पौधों तक पहुंचाया जाता है। वेंचूरी दाब के अंतर पर चलने वाला उपकरण है। 

खाद व रसायन इसके द्वारा उचित ढंग से दिये जा सकते हैं। इस सिस्टम से खाद व रसायन को घोल कर पानी में इसकी स्पीड के अनुसार डाले जाते हैं। 

इस सिस्टम से एक घंटे में 60 से 70 लीटर की गति से खाद व रसायन दिये जा सकते हैं। फर्टिलाइजर टैंक में घुली हुई खाद को भर कर प्रेशर कंट्रोल करके सिस्टम में डाल दी जाती है, जो पाइपों के माध्यम से पौधों तक पहुंचती है।

मेन लाइन: मेन लाइन पम्प से सबमेन यानी खेत में लगे पाइपों तक पानी पहुंचाने का काम करती है।

सब मेन: सबमेन ही पौधों तक पहुंचाने का एक उपकरण है। मेनलाइन से पानी लेकर सबमेन लिटरल या पॉलीट्यूब तक पानी पहुंचाती है। ये पीवीसी या एचडीपीपीई पाइप की होती है। 

सबमेन को जमीन के अंदर कम से कम डेढ़ से दो फीट की गहराई पर रखते हैं। इसमें पानी की स्पीड और प्रेशर कंट्रोल करने के लिए शुरू में वॉल्व और आखिरी में फ्लश वॉल्व लगाया जाता है।

वाल्व: पानी की स्पीड यानी गति और प्रेशर यानी दबाव को कंट्रोल करने के लिए सबमेन के आगे वॉल्व लगाये जाते हैं। सबमेन के शुरू में एयर रिलीज और वैक्यूम रिलीज लगाये जाने जरूरी होते हैं। इनके न लगाने से पम्प बंद करने के बाद हवा से मिट्टी धूल आदि अंदर भर जाने से ड्रिपर्स के छिद्र बंद हो सकते हैं।

लेटरल अथवा पॉली ट्यूब

सबमेन का पानी पॉलीट्यूब द्वारा पूरे खेत में पहुंचाया जाता है। प्रत्येक पौधे के पास आवश्यकतानुसार पॉलीट्यूब के ऊपर ड्रिपर लगाया जाता है। लेटरल्स एलएलडीपीई से बनाये जाते हैं।

एमीटर्स या ड्रिपर: ड्रिप इरिगेशन का यह प्रमुख उपकरण है। ड्रिपर्स का ऑनलाइन या इनलाइन की प्रति घंटे की स्पीड और संख्या की अधिकतम जरूरत के अनुसार निश्चित किया जाता है। 

ऊबड़-खाबड़ वाली जमीन पर कॉम्पनसेटिंग ड्रिपर्स लगाये जाते हैं। मिनी स्प्रिंकलर या जेट्स ऐसा उपकरण है जिसे एक्सटेंशन ट्यूब की सहायता से पॉलीट्यूब पर लगाया जा सकता है।

ड्रिप इरिगेशन से मिलने वाले लाभ


पहला लाभ यह होता है कि इस सिंचाई से बंजर, ऊसर, ऊबड़-खाबड़ वाली जमीन, क्षारयुक्त, शुष्क खेती वाली, पानी के कम रिसाव वाली और अल्प वर्षा की खारी एवं समुद्र तटीय जमीन पर भी फसल उगाई जा सकती है।

ड्रिप सिंचाई से पेड़-पौधों को रोजाना पर्याप्त पानी मिलता है। फसलों की बढ़ोत्तरी और पैदावार दोनों में काफी बढ़ोत्तरी होती है।

ड्रिप सिंचाई से फल, सब्जी और अन्य फसलों की पैदावार में 20 से 50 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है।

इस तरह की सिंचाई में एक भी बूंद बरबाद न होने से 30 से 60 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है। इससे किसान भाइयों का पैसा बचता है और भूजल संरक्षण को बढ़ावा मिलता है।

फर्टिगेशन में ड्रिप सिंचाई अत्यधिक कारगर है। इस सिंचाई से उर्वरकों व रासायनिकों के पोषक तत्व सीधे पौधों के पास तक पहुंचते हैं। 

इससे खाद व रासायनिक की 40 से 50 प्रतिशत तक बचत होती है। महंगी खादों में यह बचत किसान भाइयों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

खरपतवार नियंत्रण में भी यह सिंचाई प्रणाली फायदेमंद रहती है। पौधों की जड़ों में सीधे पानी पहुंचने के कारण आसपास की जमीन सूखी रहती है जिससे खरपतवार के उगने की संभावना नही रहती है।

ड्रिप इरिगेशन प्रणाली से सिंचाई किये जाने से पौधे काफी मजबूत होते है। इनमें कीट व रोग आसानी से नहीं लगते हैं। इससे किसान भाइयों को कीटनाशक का खर्चा कम हो जाता है।

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किस तरह की खेती में अधिक लाभकारी है ड्रिप सिंचाई

ड्रिप इरिगेशन सब्जियों व फल तथा मसाले की खेती के लिए अधिक लाभकारी होती है। इस तरह की सिंचाई उन फसलों में की जाती है जो पौधे दूर-दूर लाइन में लगाये जाते हैं।गेहूं की फसल में यह सिंचाई कारगर नहीं है

कैसे किया जाता है ड्रिप सिंचाई सिस्टम का मेंटेनेंस

ड्रिप इरिगेशन सिस्टम का रखरखाव यानी मेंटेनेंस बहुत आवश्यक है। इससे यह सिस्टम 10 साल तक चलाया जा सकता है।

रोजाना पम्प को चालू करने के बाद प्रेशर के ठीक होने के पर सैंडफिल्टर, हायड्रोसाइक्लोन को चेक करते रहना चाहिये। समय-समय पर इन फिल्टर्स की साफ सफाई करते रहना चाहिये।

खेतों में पाइप लाइन की जांच पड़ताल करनी चाहिये। मुड़े पाइपों को सीधा करें। टूटे-फूटे पाइपों की मरम्मत करें या बदलें।

पाइपों में जाने वाले पानी का प्रेशर देखें, उसे नियंत्रित करें ताकि पूरे खेत में पानी पहुंच सके। ड्रिपर्स से गिरने वाले पानी को देखें कि पानी आ रहा है या नहीं।

लेटरल यानी इनलाइन के अंतिम छोर पर लगे फ्लश वॉल्व को खोलकर थोड़ी देर तक पानी को गिरायें।

खेत में पानी की सिंचाई हो जाने के बाद लेटरल या पॉली ट्यूब को समेट कर छाया में रख दें।

समय-समय पर हेडर असेम्बली की चेकिंग करके छोटी-मोटी कमियों को दूर करते रहना चाहिये। इससे सिस्टम की मरम्मत में बहुत कम खर्चा आयेगा।

सब्सिडी मिलती है

ड्रिप इरिगेशन सिस्टम थोड़ा महंगा है। छोटे किसानों की क्षमता से बाहर की बात है। देश में आज भी 75 प्रतिशत छोटे किसान हैं। इन्ही छोटे किसानों को अपनी आमदनी बढ़ाने की जरूरत है।

भारत सरकार द्वारा छोटे किसानों की मदद के लिए प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना चलाई गयी है। इसके तहत छोटे किसानों को ड्रिप सिंचाई सिस्टम को खरीदने के लिए सब्सिडी दी जाती है। 

जानकार लोगों का कहना है कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिला किसानों को 60 से 65 प्रतिशत तक की सब्सिडी दी जाती है जबकि सामान्य किसानों 50 प्रतिशत सब्सिडी दी जाती है।  

केन्द्र सरकार की यह योजना पूरे देश में लागू है लेकिन प्रत्येक राज्य अपने-अपने नियम कानून के अनुसार इसे लागू  करते हैं। 

इसलिये किसान भाई अपने-अपने राज्य के संबंधित विभाग के अधिकारियों से सम्पर्क कर पूरी जानकारी लेकर लाभ उठायें।

ड्रिप सिंचाई सिस्टम की लागत

अनुभवी किसानों या खरीदने वाले किसानों से मिली जानकारी के अनुसार यह सिस्टम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 1.25 से लेकर 1.50 लाख रुपये तक में आता है। 

इसमें पाइप की आईएसआई मार्का व क्वालिटी के कारण अंतर आता है। इसमें 50 प्रतिशत तक अनुदान मिल सकता है।

खुशखबरी: इस राज्य में मूंग की खेती को बढ़ावा देने लिए 50% प्रतिशत अनुदान

खुशखबरी: इस राज्य में मूंग की खेती को बढ़ावा देने लिए 50% प्रतिशत अनुदान

किसान भाई वर्तमान में अपनी रबी फसलों की कटाई और प्रबंधन में जुटे हुए है। अप्रैल महीने के अंत तक तकरीबन सभी फसलों की कटाई पूर्ण हो जाएगी। वहीं, जायद फसलों का सीजन भी अब शुरू हो चुका है। 

ऐसे में किसान कटाई संपन्न होने के बाद जायद फसलों में से मूंग की खेती कर सकते हैं। अगर आप भी मूंग की खेती करते हैं या इस बार करने की सोच रहे हैं तो ये खबर आप ही के लिए है। 

दरअसल, मूंग की खेती के लिए राज्य सरकार 50% प्रतिशत तक अनुदान दे रही है। आप भी इस अनुदान का फायदा उठाकर शानदार मुनाफा अर्जित कर सकते हैं। 

मूंग के बीजों पर कितना अनुदान मिलेगा

मूंग की खेती करने वाले किसानों के लिए अच्छी खबर यह है, कि योगी सरकार की तरफ से इसकी खेती को बढ़ावा देने के लिए सब्सिड़ी प्रदान की जा रही है। अब ऐसे में उत्तर प्रदेश के किसान इसका लाभ प्राप्त कर सकते हैं। 

यूपी सरकार मूंग के बीजों पर 50% प्रतिशत सब्सिडी प्रदान कर रही है। अब जैसे मान लीजिए मूंग के एक किलो बीज का मूल्य 80 रुपए है, तो किसान को 40 रुपए में मूंग का बीज उपलब्ध कराया जाएगा। 

इस प्रकार किसान मूंग के प्रमाणिक उन्नत बीज आधी कीमत पर भी हांसिल कर सकते हैं। उत्तर प्रदेश के किसानों को अनुदान पर मूंग के बीज पाने के लिए ऑनलाइन आवेदन करना होगा।

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यह अनुदान किसानों को दलहन योजना के अंतर्गत प्रदान किया जाएगा। साथ ही, अनुदान की धनराशि डीबीटी (DBT) के जरिए किसानों के खाते में हस्तांतरित की जाएगी। इसके लिए किसान को बीज खरीदने से पहले विभाग की वेबसाइट पर अपना पंजीकरण कराना होगा। 

किसान भाई योजना का लाभ उठाने के लिए इस प्रकार आवेदन करें 

अगर आप भी उत्तर प्रदेश के किसान हैं, तो आप मूंग की खेती के लिए 50% प्रतिशत अनुदान (Subsidy) पर मूंग के बीजों की खरीदकर लाभांवित हो सकते हैं। 

इसके लिए आपको सबसे पहले राजकीय कृषि विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पोर्टल agriculture.up.gov.in पर अपना पंजीकरण करना होगा। साथ ही, किसानों को यहां से ही बीज की खरीदारी करनी होगी, जो किसान पहले से पंजीकृत हैं उनको पुनः पंजीकरण कराने की आवश्यकता नहीं है।

चावल की बेहतरीन पैदावार के लिए इस प्रकार करें बुवाई

चावल की बेहतरीन पैदावार के लिए इस प्रकार करें बुवाई

धान की बेहतरीन पैदावार के लिए जुताई के दौरान प्रति हेक्टेयर एक से डेढ़ क्विंटल गोबर की खाद खेत में मिश्रित करनी है। आज कल देश के विभिन्न क्षेत्रों में धान की रोपाई की वजह खेत पानी से डूबे हुए नजर आ रहे हैं। किसान भाई यदि रोपाई के दौरान कुछ विशेष बातों का ध्यान रखें तो उन्हें धान की अधिक और अच्छी गुणवत्ता वाली पैदावार मिल सकती है। अमूमन धान की रोपाई जून के दूसरे-तीसरे सप्ताह से जुलाई के तीसरे-चौथे सप्ताह के मध्य की जाती है। रोपाई के लिए पंक्तियों के मध्य का फासला 20 सेंटीमीटर और पौध की दूरी 10 सेंटीमीटर होनी चाहिए। एक स्थान पर दो से तीन पौधे रोपने चाहिए। धान की फसल के लिए तापमान 20 डिग्री से 37 डिग्री के मध्य रहना चाहिए। इसके लिए दोमट मिट्टी काफी बेहतर मानी जाती है। धान की फसल के लिए पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और 2 से तीन जुताई कल्टीवेटर से करके खेत को तैयार करना चाहिए। साथ ही, खेत की सुद्रण मेड़बंदी करनी चाहिए, जिससे बारिश का पानी ज्यादा समय तक संचित रह सके।

धान शोधन कराकर खेत में बीज डालें

धान की बुवाई के लिए 40 से 50 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर के अनुसार बिजाई करनी चाहिए। साथ ही, एक हेक्टेयर रोपाई करने के लिए 30 से 40 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है। हालांकि, इससे पहले बीज का शोधन करना आवश्यक होता है। ये भी पढ़े: भूमि विकास, जुताई और बीज बोने की तैयारी के लिए उपकरण

खाद और उवर्रकों का इस्तेमाल किया जाता है

धान की बेहतरीन उपज के लिए जुताई के दौरान प्रति हेक्टेयर एक से डेढ़ क्विंटल गोबर की खाद खेत में मिलाते हैं। उर्वरक के रूप में नाइट्रोजन, पोटाश और फास्फोरस का इस्तेमाल करते हैं।

बेहतर सिंचाई प्रबंधन किस प्रकार की जाए

धान की फसल को सबसे ज्यादा पानी की आवश्यकता होती है। रोपाई के उपरांत 8 से 10 दिनों तक खेत में पानी का बना रहना आवश्यक है। कड़ी धूप होने पर खेत से पानी निकाल देना चाहिए। जिससे कि पौध में गलन न हो, सिंचाई दोपहर के समय करनी चाहिए, जिससे रातभर में खेत पानी सोख सके।

कीट नियंत्रण किस प्रकार किया जाता है

धान की फसल में कीट नियंत्रण के लिए जुताई, मेंड़ों की छंटाई और घास आदि की साफ सफाई करनी चाहिए। फसल को खरपतवारों से सुरक्षित रखना चाहिए। 10 दिन की समयावधि पर पौध पर कीटनाशक और फंफूदीनाशक का ध्यान से छिड़काव करना चाहिए।
एक घंटे में होगी एक एकड़ गेहूं की कटाई, मशीन पर सरकार की भारी सब्सिडी

एक घंटे में होगी एक एकड़ गेहूं की कटाई, मशीन पर सरकार की भारी सब्सिडी

इस सीजन में किसानों को कटाई के लिए मशीने भी कम कीमतों पर दी जाती हैं. जिनकी मदद से गेहूं कटाई में काफी समय लगता है. गेहूं के अच्छे उत्पादन के लिए किसान भी काफी मेहनत करते हैं. 

हालांकि गेहूं की फसल पककर तैयार हो चुकी है. जिसके बाद जल्द कटाई का काम भी शुरू हो जाएगा. इसमें समय, मेहनत और लागत कम करने के लिए कृषि मशीनों का उपयोग किये जाने की सलाह दी जाती है. 

लेकिन मशीनों से कटाई और गहाई के के बाद अक्सर पराली की समस्या हो जाती है. कटाई के बाद निकली फूंस को जानवरों के चारे के लिए इस्तेमाल किया जाता है. देश के अलग अलग राज्य की सरकारें मशीनों को खरीदने के लिए सब्सिडी देती है. 

 राजस्थान के कोटा में कुछ दिन पहले कृषि मोहत्सव का आयोजन हुआ था. जिसमें ऐसी ही एक मशीनरी आकर्षण का केंद्र बनी हुई थी. इस मशीन का नाम रीपर ग्राइंडर था. 

इस मशीन की सबसे बड़ी खासियत यही है कि, ये मात्र एक घंटे में एक एकड़ गेहूं की फसल की कटाई कर सकती है. अगर किसान इस मशीन को खरीदता है, तो राज्य सरकार की तरफ से इसमें 50 फीसद तक सब्सिडी मिलती है.

रीपर ग्राइंडर के बारे में

इस मशीन से गेहूं की फसल काटने के लिए 5 से 10 मजदूरों की जरूरत पड़ सकती है. 10 एचपी के इंजन वाली मशीन की मदद से सिर्फ एक घंटे में एक एकड़ फसल की कटाई हो सकती है. 

रीपर ग्राइंडर की मदद से गेहूं के अलावा जौ, बाजरा, सरसों, धान की फसलों की कटाई कर सकते हैं. रीपर ग्राइंडर ना सिर्फ फसलों की कटाई करती है बल्कि, उपज को साइड में फैला देती है. 5 फीट तक की लंबी फसल की कटाई इस मशीन से की जा सकती है. एक घंटे चलाने के लिए इस मशीन में एक लीटर तेल लग जाता है. 

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सरकार की तरफ से मिलता है अनुदान

अगर किसान इस मशीन को खरीदना चाहते हैं, तो वो इसका कोई भी साइज़ चुन सकते हैं. जिसकी कीमत 50 हजार से लेकर 5 लाख रुपये तक हो सकती है. जिसके लिए सरकार की ओर से 50 फीसद तक सब्सिडी दे रही है. 

रीपर ग्राइंडर को खरीदने के लिए किसान को मशीन के डीलर से कोटेशन लेना पड़ेगा. जो अपने जिले के कृषि विभाग के ऑफिस में जमा करना होगा. इस मशीन को खरीदने के लिये कुछ जरूरी कागजों की जरूरत पड़ती है.

जिसमें आधार कार्ड की कॉपी, जमीन के कागज, बैंक की पासबुक की कॉपी शामिल है. इसके अलावा ई-मित्र सेंटर की मदद से ऑनलाइन आवेदन भी कर सकते हैं.

गेंदे की खेती के लिए इस राज्य में मिल रहा 70 % प्रतिशत का अनुदान

गेंदे की खेती के लिए इस राज्य में मिल रहा 70 % प्रतिशत का अनुदान

गेंदे के फूल का सर्वाधिक इस्तेमाल पूजा-पाठ में किया जाता है। इसके साथ-साथ शादियों में भी घर और मंडप को सजाने में गेंदे का उपयोग होता है। यही कारण है, कि बाजार में इसकी निरंतर साल भर मांग बनी रहती है। 

ऐसे में किसान भाई यदि गेंदे की खेती करते हैं, तो वह कम खर्चा में बेहतरीन आमदनी कर सकते हैं। बिहार में किसान पारंपरिक फसलों की खेती करने के साथ-साथ बागवानी भी बड़े पैमाने पर कर रहे हैं। 

विशेष कर किसान वर्तमान में गुलाब एवं गेंदे की खेती में अधिक रूची एवं दिलचस्पी दिखा रहे हैं। इससे किसानों की आमदनी पहले की तुलना में अधिक बढ़ गई है। 

यहां के किसानों द्वारा उत्पादित फसलों की मांग केवल बिहार में ही नहीं, बल्कि राज्य के बाहर भी हो रही है। राज्य में बहुत सारे किसान ऐसे भी हैं, जिनकी जिन्दगी फूलों की खेती से पूर्णतय बदल गई है।

बिहार सरकार फूल उत्पादन रकबे को बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन दे रही है

परंतु, वर्तमान में बिहार सरकार चाहती है, कि राज्य में फूलों की खेती करने वाले कृषकों की संख्या और तीव्र गति से बढ़े। इसके लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार ने फूलों के उत्पादन क्षेत्रफल को राज्य में बढ़ाने के लिए मोटा अनुदान देने की योजना बनाई है। 

दरअसल, बिहार सरकार का कहना है, कि फूल एक नगदी फसल है। यदि राज्य के किसान फूलों की खेती करते हैं, तो उनकी आमदनी बढ़ जाएगी। ऐसे में वे खुशहाल जिन्दगी जी पाएंगे। 

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बिहार सरकार 70 % प्रतिशत अनुदान मुहैय्या करा रही है

यही वजह है, कि बिहार सरकार ने एकीकृत बागवानी विकास मिशन योजना के अंतर्गत फूलों की खेती करने वाले किसानों को अच्छा-खासा अनुदान देने का फैसला किया है। 

विशेष बात यह है, कि गेंदे की खेती पर नीतीश सरकार वर्तमान में 70 प्रतिशत अनुदान प्रदान कर रही है। यदि किसान भाई इस अनुदान का फायदा उठाना चाहते हैं, तो वे उद्यान विभाग के आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर आवेदन कर सकते हैं। 

किसान भाई अगर योजना के संबंध में ज्यादा जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, तो horticulture.bihar.gov.in पर विजिट कर सकते हैं।

बिहार सरकार द्वारा प्रति हेक्टेयर इकाई लागत तय की गई है

विशेष बात यह है, कि गेंदे की खेती के लिए बिहार सरकार ने प्रति हेक्टेयर इकाई खर्च 40 हजार निर्धारित किया है। बतादें, कि इसके ऊपर 70 प्रतिशत अनुदान भी मिलेगा। 

किसान भाई यदि एक हेक्टेयर में गेंदे की खेती करते हैं, तो उनको राज्य सरकार निःशुल्क 28 हजार रुपये प्रदान करेगी। इसलिए किसान भाई योजना का फायदा उठाने के लिए अतिशीघ्र आवेदन करें।

इस राज्य में कंदीय फूलों की खेती पर 50 प्रतिशत अनुदान मिलेगा, शीघ्र आवेदन करें

इस राज्य में कंदीय फूलों की खेती पर 50 प्रतिशत अनुदान मिलेगा, शीघ्र आवेदन करें

बिहार में राज्य सरकार की तरफ से कंदीय फूलों की खेती करने वाले किसानों को 50 प्रतिशत तक सबसिडी प्रदान की जा रही है। योजना का फायदा उठाने के लिए कृषक भाई आधिकारिक साइट पर जाकर आवेदन कर सकते हैं। 

बिहार सरकार की ओर से किसानों को फूलों का उत्पादन करने के लिए निरंतर प्रोत्साहन दिया जा रहा है। राज्य सरकार ने फिलहाल एकीकृत बागवानी विकास मिशन योजना के अंतर्गत कंदीय फूल की खेती करने के लिए किसानों को 50 प्रतिशत अनुदान देने का फैसला लिया है। 

योजना का फायदा उठाने के लिए किसान आधिकारिक साइट horticulture.bihar.gov.in पर जाकर आवेदन कर सकते हैं।

किसानों को 50 प्रतिशत अनुदान प्रदान किया जाऐगा

बतादें, कि बिहार सरकार ने प्रति हेक्टेयर कंदीय फूलों की खेती हेतु लागत 15 लाख रुपये रखी है। इस पर सरकार 50 प्रतिशत अनुदान प्रदान करेगी। इस हिसाब से किसानों को सात लाख 50 हजार रुपये मिलेंगे। 

सब्सिडी का फायदा उठाने के लिए किसान आज ही आधिकारिक वेबसाइट horticulture.bihar.gov.in पर जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त वह अपने निकटतम उद्यान कार्यालय में सम्पर्क कर सकते हैं। 

योजना के अंतर्गत फायदा लेने के लिए किसानों को अपना आधार कार्ड, बैंक पासबुक की प्रति, राशन कार्ड, वोटर कार्ड, पासपोर्ट साइज फोटो, फोन आदि अपने पास जरूर रखने होंगे। 

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बाजार में फूलों की प्रचंड मांग है

बतादें, कि कंदीय फूल को गमले व जमीन दोनों में उगाया जा सकता है। इन फूलों की सजावट के काम में जरूरत पड़ती है। साथ ही बुके में भी इन फूलों का उपयोग किया जाता है। 

बाजार में ये फूल अच्छी-खासी कीमत में बिकते हैं। किसान भाई कंदीय फूलों की खेती कर कम समय में ज्यादा मुनाफा अर्जित कर सकते हैं। जानिए किन फूलों को कंदीय फूल कहा जाता है। 

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि ऑक्जेलिक, हायसिन्थ, ट्यूलिप, लिली, नर्गिसफ्रिजिआ, डेफोडिल, आइरिस, इश्किया, आरनिथोगेलम को कंदीय फूल कहा जाता है।

जम्मू-कश्मीर सरकार राज्य में सेब की खेती पर अनुदान प्रदान कर रही है

जम्मू-कश्मीर सरकार राज्य में सेब की खेती पर अनुदान प्रदान कर रही है

जम्मू कश्मीर पूरी दुनिया में अपने सेब के लिए मशहूर है। जम्मू कश्मीर के लाखों लोग सेब की खेती के जरिए ही अपना जीवन यापन करते हैं। सेब की खेती करने वाले किसान भाइयों के लिए यह बड़े काम की खबर साबित होने वाली है। हमारे भारत में ही नहीं विदेशों में भी सेब को काफी अधिक पसंद किया जाता है। भारत में सेब की खेती कश्मीर राज्य में होती है। कश्मीर के मूल निवासी किसानों की आमदनी का सबसे बड़ा जरिया सेब की खेती है। कश्मीर का सेब दुनिया भर में मशहूर है। जम्मू कश्मीर में लगभग 25 लाख लोगों को सेब की खेती से रोजगार के अवसर मिल रहे हैं। हालांकि, इस वर्ष हुई प्रचंड बरसात की वजह से सेब की फसल को काफी क्षति पहुँची है। जिसको देखते हुए सरकार ने किसानों के फायदे हेतु एक कदम उठाया है। अब सरकार सेब की खेती करने के लिए अनुदान प्रदान करेगी। खबरों के अनुसार, जम्मू और कश्मीर भारत में कुल उत्पादित सेब के तकरीबन 80 प्रतिशत हिस्से में भागीदारी रखता है। सेब की खेती से प्रदेश को लगभग 1500 करोड़ रुपये की आमदनी अर्जित होती है। कश्मीर के कुपवाड़ा, गांदरबल, शोपियां, अनंतनाग, श्रीनगर, बडगाम और बारामुला जनपद में बड़े पैमाने पर सेब की खेती की जाती है।

सेब की विभिन्न किस्मों को मंगाकर भी उत्पादन किया जाएगा

जम्मू-कश्मीर प्रशासन और हॉर्टिकल्चर विभाग ने स्थितियों को ध्यान में रखते हुए राज्य उच्च घनत्व वृक्षारोपण पर बल दिया है। इस वजह से राज्य के कृषकों की आमदनी में इजाफा होने की संभावना है। राज्य सरकार के इस उपयोग के दौरान यूरोप के देशों से सेब की भिन्न-भिन्न प्रजातियों को मंगा कर लगाया जाएगा। सेब की नवीन किस्मों के वृक्षारोपण के लिए जम्मू-कश्मीर हॉर्टिकल्चर डिपार्टमेंट कृषकों को 50 प्रतिशत तक की सब्सिड़ी देगी। इसके अतिरिक्त हॉर्टिकल्चर विभाग राज्य के किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए खेती से जुड़ी तकनीकी जानकारियां भी प्रदान कर रहा है। यह भी पढ़ें: कृषि विज्ञान केंद्र पठानकोट द्वारा विकसित सेब की किस्म से पंजाब में होगी सेब की खेती

किसान भाइयों की आर्थिक स्थिति सशक्त बनेगी

अधिकारियों का कहना है, कि इस कदम से सेब के उत्पादन के साथ-साथ किसान भाइयों की आर्थिक हालत भी सशक्त होगी। हॉर्टिकल्चर डिपार्टमेंट के मुताबिक, बेहद जल्द ही नए किस्म के सेब को उपलब्ध करा दिया जाएगा।

हाई डेंसिटी एप्पल प्लांटेशन को लेकर अनुदान दिया जा रहा है

कश्मीर में हाई डेंसिटी एप्पल प्लांटेशन के चलते किसानों में दिलचस्पी बढ़ी है। साथ ही, कश्मीर में फिलहाल जगह-जगह पर रिवायती सेब के पेड़ों के स्थान पर इसी हाई डेंसिटी प्लांटेशन में दिलचस्पी दिखा रहे हैं, जिसमें जम्मू कश्मीर हॉर्टिकल्चर डिपार्टमेंट की ओर से 50% प्रतिशत का अनुदान भी किसानों को इस नई तकनीक के अंतर्गत सेब उगाने के लिए दिया जा रहा है। उसके साथ-साथ हॉर्टिकल्चर डिपार्मेंट किसानों को उत्साहित करने के लिए हर प्रकार की तकनीकी जानकारियां भी किसानों के खेतों तक पहुंचा रही है। यह भी पढ़ें: सेब की फसल इस कारण से हुई प्रभावित, राज्य के हजारों किसानों को नुकसान

युवा किसानों की भी दिलचस्पी बढ़ रही है

अब कश्मीर में पढ़े-लिखे युवा भी खेती की तरफ रुचि दिखाने लगे हैं। साथ ही, हाई डेंसिटी एप्पल प्लांटेशन उनके लिए रोजगार का साधन होने के साथ-साथ आमदनी का बेहतरीन माध्यम बनता जा रहा है। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि कश्मीरी सेब की मांग भारत के समेत संपूर्ण विश्व में है। इसी मिठास एवं रसीलेपन की वजह इसकी मांग संपूर्ण विश्व में है। अब ऐसी स्थिति में यह कश्मीरी लोगों के लिए आमदनी का एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकता है।
आलू प्याज भंडारण गृह खोलने के लिए इस राज्य में दी जा रही बंपर छूट

आलू प्याज भंडारण गृह खोलने के लिए इस राज्य में दी जा रही बंपर छूट

राजस्थान राज्य के 10,000 किसानों को प्याज की भंडारण इकाई हेतु 50% प्रतिशत अनुदान मतलब 87,500 रुपये के अनुदान का प्रावधान किया गया है। बतादें, कि राज्य में 2,500 प्याज भंडारण इकाई शुरू करने की योजना है। फसलों का समुचित ढंग से भंडारण उतना ही जरूरी है। जितना सही तरीके से उत्पादन करना। क्योंकि बहुत बार फसल कटाई के उपरांत खेतों में पड़ी-पड़ी ही सड़ जाती है। इससे कृषकों को काफी हानि वहन करनी होती है। इस वजह से किसान भाइयों को फसलों की कटाई के उपरांत समुचित प्रबंधन हेतु शीघ्र भंडार गृहों में रवाना कर दिया जाए। हालांकि, यह भंडार घर गांव के आसपास ही निर्मित किए जाते हैं। जहां किसान भाइयों को अपनी फसल का संरक्षण और देखभाल हेतु कुछ भुगतान करना पड़ता है। परंतु, किसान चाहें तो स्वयं के गांव में खुद की भंडारण इकाई भी चालू कर सकते हैं। भंडारण इकाई हेतु सरकार 50% प्रतिशत अनुदान भी प्रदान कर रही है। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि राजस्थान सरकार द्वारा प्याज भंडारण हेतु नई योजना को स्वीकृति दे दी गई है। जिसके अंतर्गत प्रदेश के 10,000 किसानों को 2,550 भंडारण इकाई चालू करने हेतु 87.50 करोड़ रुपए की सब्सिड़ी दी जाएगी।

भंडारण संरचनाओं को बनाने के लिए इतना अनुदान मिलेगा

मीडिया खबरों के मुताबिक, किसानों को विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत प्याज के भंडारण हेतु सहायतानुदान मुहैय्या कराया जाएगा। इसमें प्याज की भंडारण संरचनाओं को बनाने के लिए प्रति यूनिट 1.75 लाख का खर्चा निर्धारित किया गया है। इसी खर्चे पर लाभार्थी किसानों को 50% फीसद अनुदान प्रदान किया जाएगा। देश का कोई भी किसान अधिकतम 87,500 रुपये का फायदा हांसिल कर सकता है। ज्यादा जानकारी हेतु निजी जनपद में कृषि विभाग के कार्यालय अथवा राज किसान पोर्टल पर भी विजिट कर सकते हैं। ये भी पढ़े: Onion Price: प्याज के सरकारी आंकड़ों से किसान और व्यापारी के छलके आंसू, फायदे में क्रेता

किस योजना के अंतर्गत मिलेगा लाभ

राजस्थान सरकार द्वारा प्रदेश के कृषि बजट 2023-24 के अंतर्गत प्याज की भंडारण इकाइयों पर किसानों को सब्सिड़ी देने की घोषणा की है। इस कार्य हेतु राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत 1450 भंडारण इकाइयों हेतु 12.25 करोड रुपये मिलाके 34.12 करोड रुपये व्यय करने जा रही है। इसके अतिरिक्त 6100 भंडारण इकाईयों हेतु कृषक कल्याण कोष द्वारा 53.37 करोड़ रुपये के खर्च का प्रावधान है। ये भी पढ़े: भंडारण की परेशानी से मिलेगा छुटकारा, प्री कूलिंग यूनिट के लिए 18 लाख रुपये देगी सरकार

प्याज की भंडारण इकाई बनाने की क्या जरूरत है

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि इन दिनों जलवायु परिवर्तन से फसलों में बेहद हानि देखने को मिली है। तीव्र बारिश और आंधी के चलते से खेत में खड़ी और कटी हुई फसलें तकरीबन नष्ट हो गई। अब ऐसी स्थिति में सर्वाधिक भंडारण इकाईयों की कमी महसूस होती है। यह भंडारण इकाईयां किसानों की उत्पादन को हानि होने से सुरक्षा करती है। बहुत बार भंडारण इकाइयों की सहायता से किसानों को उत्पादन के अच्छे भाव भी प्राप्त हो जाते हैं। यहां किसान उत्पादन के सस्ता होने पर भंडारण कर सकते हैं। साथ ही, जब बाजार में प्याज के भावों में वृद्धि हो जाए, तब भंडार गृहों से निकाल बेचकर अच्छी आय कर सकते हैं।
कड़कनाथ मुर्गे का पालन कर जाने कैसे लॉक डाउन में हो गया यह किसान मालामाल

कड़कनाथ मुर्गे का पालन कर जाने कैसे लॉक डाउन में हो गया यह किसान मालामाल

नॉनवेज खाने वाले लोग यह अच्छी तरह से जानते हैं कि चिकन का स्वाद बेहद अच्छा लगता है. लेकिन अगर स्वाद के साथ-साथ यह गुणकारी भी हो तो क्या कहना.यहां पर हम कड़कनाथ मुर्गे की बात कर रहे हैं.आजकल बाजार में कड़कनाथ मुर्गी का मांस और अंडे दोनों ही काफी ज्यादा डिमांड में है जिसके कारण बहुत से युवा कड़कनाथ पालन की ओर रुख कर रहे हैं. आज हम आपको मध्य प्रदेश के एक किसान विपिन शिवहरे के बारे में बताने वाले हैं जिन्होंने लॉकडाउन के समय में कड़कनाथ पालन करना शुरू किया था. अब उनका यह व्यवसाय अच्छा खासा फल फूल गया है और वह से बढ़िया मुनाफा कमा रहे हैं. विपिन से हुई बातचीत में पता चला है कि उन्होंने यह व्यवसाय ₹2 लाख की लागत लगाकर शुरू किया था. आज उनके पास लगभग 12000 मुर्गियां हैं और वह इनको बहरीन जैसे बाहरी देशों में भी निर्यात कर रहे हैं. 

लॉकडाउन के समय शुरू किया व्यवसाय

विपिन शिवहरे के लिए यह सफर आसान नहीं रहा है. एक गरीब परिवार ताल्लुक रखने वाले ने केवल 12वीं तक पढ़ाई की है और उसके बाद वह मुंबई नौकरी की तलाश में निकल गई थी. मुंबई में उन्होंने 16 सो रुपए प्रति माह के वेतन से फूड पैकर के तौर पर नौकरी शुरू की. बाद में उन्होंने वेटर और मैनेजर के तौर पर पदोन्नति पाते हुए ₹16000  प्रतिमाह की आमदनी कम आना शुरू कर दिया था. विपिन बताते हैं कि इस दौरान उन्होंने अपनी बहन और भाई दोनों की शादी करवा दी थी और  गांव में एक छोटा सा घर बनाने में भी कामयाब रहे. 

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लेकिन लाखों की तरह उनके लिए भी कोविड-19 बहुत बड़ी समस्या सामने लेकर आए और उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़ा. नौकरी छूट जाने के बाद वह मुंबई में ही रुके रहे और उन्होंने सब्जियां आदि बेचने का काम करते हुए किसी तरह अपना गुजर बसर किया लेकिन अंततः उन्हें गांव में वापस लौट कर ही आना पड़ा. विपिन के एक दोस्त कड़कनाथ पालन पहले से करते आ रहे थे तो उन्हें उसका ख्याल आया और समय के अनुसार कड़कनाथ मांस की बढ़ती हुई डिमांड के कारण उन्होंने भी यह व्यवसाय अपनाने का फैसला किया. पैसों की तंगी के कारण उन्हें बैंक से ₹200000 उधार में लेने पड़े और विपिन ने बताया कि कड़कनाथ पालन की पूरी जानकारी दी उन्होंने इंटरनेट के माध्यम से ही प्राप्त की.मध्य प्रदेश राज्य के झाबुआ और धार जिलों में भील और भिलाला में आदिवासी समुदायों द्वारा कड़कनाथ मुर्गियों को पाला जाता है.

कड़कनाथ चिकन स्वाद में तो बेहतरीन होता ही है साथ ही साथ इस के मांस की क्वालिटी और सेहत के लिए उसका गुणकारी होना भी बहुत ज्यादा प्रसिद्ध है. सेहत के लिए अच्छा होने के कारण देश के बहुत से राज्यों में इसकी डिमांड आए दिन बढ़ रही है. विपिन ने अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए शुरू में झाबुआ से कड़कनाथ के पक्षी खरीदे जो उसे ₹900 प्रति पक्षी के हिसाब से दिए गए. उन्होंने बताया कि शुरू शुरू में पैसों की कमी के कारण चूजों की देखभाल करना भी काफी मुश्किल हो रहा था.बहुत बार ऐसी स्थिति भी सामने आई जब उन्हें केवल अपने पक्षियों को खाना खिलाने के लिए भी उधार पैसा  लेना पड़ा.  ऐसे में विपिन ने एक बार अपने व्यवसाय के बारे में यूट्यूब पर वीडियो अपलोड किया और कुछ ही दिनों में ओडिशा के एक बहुत बड़े व्यापारी ने उन्हें फोन किया.  इस व्यापारी ने विभिन्न से मुर्गे खरीदने को लेकर एक डील की और एडवांस में उसे ₹100000 भी दिए. 

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कितने समय में तैयार हो जाते हैं कड़कनाथ मुर्गे

कड़कनाथ मुर्गे चार से छह महीने के अंतराल में बिक्री के लिए तैयार हो जाते हैं. यह मुर्गे 5 महीने में लगभग डेढ़ किलो वजन तक पहुंच जाते हैं. ज्यादातर नर्क कड़कनाथ का वजन डेढ़ किलोग्राम के आसपास रहता है तो वहीं पर मुर्गियां 1 से 1.2 किलोग्राम वजन पर पहुंच जाती है.कड़कनाथ मुर्गी के चूजे को भी बेचा जा सकता है और विपिन भी ऐसा करते हैं. उन्होंने बताया कि वह कड़कनाथ चूजे से लगभग ₹500 में बेचते हैं. और महीने भर में वह लगभग 3,000 चूजे बेच देते हैं. पूरी तरह से व्यस्क मुर्गों को बेचकर वह लगभग महीने में ₹40000 कमा लेते हैं. इस तरह से विपिन द्वारा लिया गया एक सही कदम उनके लिए बहुत ही बेहतरीन साबित हुआ और वह आज आर्थिक रूप से बेहद सक्षम है और अच्छी तरह से अपना व्यवसाय आगे बढ़ा रही हैं.

मेरी खेती से डबल शाफ्ट रोटावेटर खरीदने पर आपको मिलेगी भारी छूट, जानिए ऑफर के बारे में

मेरी खेती से डबल शाफ्ट रोटावेटर खरीदने पर आपको मिलेगी भारी छूट, जानिए ऑफर के बारे में

किसान भाइयों रोटावेटर आज के दिन हर किसान की जरूरत बन गया है। रोटावेटर के इस्तेमाल से आसानी से खेत की जुताई की जा सकती है। ये खेत को एक बार में ही अच्छी तरह से भुरभुरा कर देता है, जिससे कि किसान का समय और पूँजी दोनों बचते हैं। 

इसके इस्तेमाल के बाद आपको खेत में कल्टीवेटर अथवा हैरो से जुताई करने की आवश्यकता नहीं होती है। डबल शाफ्ट रोटावेटर से जुताई करने के बाद मिट्टी एकदम भुरभुरी हो जाती है और बिल्कुल समतल भी हो जाती है। इसके इस्तेमाल से खेत की मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता भी बढ़ती है। 

आज के इस लेख में हम आपको इस डबल शाफ्ट रोटावेटर के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे जेसे कि ये कैसे काम करता है। हमारे इस लेख में आप ये भी जानेंगे कि मेरी खेती से अगर आप ये रोटावेटर खरीदते हैं, तो आपको कितनी छूट मिलेगी।

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डबल शाफ्ट रोटावेटर की विशेषताएँ

डबल शाफ्ट रोटावेटर एक ही बार में मिट्टी को भुरभुरा कर देता है। इस रोटावेटर को (न्यूनतम 35 - 40 एचपी) के ट्रैक्टर से आसानी से चलाया जा सकता है। डबल शाफ्ट रोटावेटर में दोनों धुरी एक ही दिशा में, एक ही गति से घूमती हैं, जिसके परिणामस्वरूप एक ही बार में मिट्टी बेहतर भुरभुरी हो जाती है। 

यह 7 फीट से 12 फीट तक के आकार में मौजूद है और मिट्टी को भुरभुरा करने के लिए एल, जे और सी प्रकार जैसे विभिन्न आकार के ब्लेड को रोटर से जोड़ा जा सकता है। 

कार्य की चौड़ाई: 203 -205 मिमी, संचालन की गति (किमी प्रति घंटा): 3.63-3.91, क्षेत्र क्षमता: 0.629-0.734 हेक्टेयर/घंटा; क्षेत्र दक्षता: 82.9-94.1%, कट की गहराई: 6.0-6.3 मिमी, ईंधन खपत: 5.90-6.29 मील प्रति घंटे। ये रोटावेटर आज कल किसानों की पहले पसंद बन गए हैं। 

किसान भाइयों आप इसको खरीद कर आसानी से एक ही बार में जुताई कर सकते हैं। डबल शाफ्ट रोटावेटर के इस्तेमाल के बाद आपको हैरो या कल्टीवेटर से जुताई करने की आवश्यकता नहीं होती है ,डबल शाफ्ट रोटावेटर से एक बार जुताई के बाद खेत में सीधा फसल के बीजों की बुवाई कर सकते है।

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मेरी खेती से ख़रीदे डबल शाफ्ट रोटावेटर कम दामों पर

किसान भाइयों जैसा की आप जानते है डबल शाफ्ट रोटावेटर के बहुत फायदे है। अगर आप डबल शाफ्ट रोटावेटर खरीदने के इच्छुक हैं, तो मेरी खेती के माध्यम से आप इसकी खरीद कर सकते हैं। 

मेरी खेती पर आपके लिए एक ऑफर है, जिसमें आपको ये डबल शाफ्ट रोटावेटर कम कीमत पर मिल सकता है। अगर आप खरीदने के इच्छुक है तो यहां क्लिक करें

इस राज्य में सुपर सीडर पर 40 प्रतिशत तक का अनुदान दिया जा रहा है

इस राज्य में सुपर सीडर पर 40 प्रतिशत तक का अनुदान दिया जा रहा है

वर्तमान में संभागीय कृषि अभियांत्रिकी विभाग सतना में किसान भाइयों के लिए सुपर सीडर उपलब्ध है। विशेष बात यह है, कि यदि किसान भाई सीडर खरीदते हैं, तो इस पर उन्हें 40 प्रतिशत तक अनुदान दिया जाएगा। मध्य प्रदेश की राज्य सरकार किसान भाइयों की आमदनी में इजाफा करने के लिए विभिन्न प्रकार की योजनाएं जारी कर रही है। इन योजनाओं के अंतर्गत किसान भाइयों की खेती करने की तकनीक वैज्ञानिक रूप धारण कर गई है। इसके अतिरिक्त मध्य प्रदेश में कृषकों को कृषि यंत्रों पर अच्छा-खासा अनुदान भी दिया जा रहा है। परंतु, फिलहाल रीवा और सतना जनपद के किसानों के लिए काफी अच्छी खुशखबरी है। यहां के कृषकों को सुपर सीडर मशीन खरीदने के लिए अच्छा-खासा अनुदान प्रदान किया जा रहा है। 

सुपर सीडर किसानों के लिए काफी उपयोगी साबित होता है

मीडिया खबरों के अनुसार, सुपर सीडर एक ऐसा यंत्र है, जिसको ट्रैक्टर के साथ जोड़कर खेती-बाड़ी करने के कार्य में लिया जाता है। इस यंत्र का सर्वाधिक इस्तेमाल फसलों की बुवाई करने हेतु किया जाता है। इसके इस्तेमाल से नरवाई की दिक्कत परेशानी दूर हो चुकी है। अब ऐसी स्थिति में गेहूं एवं चने की खेती करने वाले कृषकों के लिए सुपर सीडर यंत्र बेहद उपयोगी साबित होता है। 

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सुपर सीडर के उपयोग से नरवाई जलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि किसी फसल के डंठल को नरवाई कहा जाता है। सुपर सीडर धान एवं गेहूं की डंठल को छोटे- छोटे भागों में विभाजित कर मृदा में मिला देता है। अब ऐसी स्थिति में सुपर सीडर मशीन से फसलों की बिजाई करने वाले कृषकों को नरवाई को आग के जरिए जलाना नहीं पड़ता है। इससे प्रदूषण पर भी रोक लगती है। 

सुपर सीडर पर 40 प्रतिशत तक का अनुदान दिया जाएगा

फिलहाल, संभागीय कृषि अभियांत्रिकी विभाग सतना में किसान भाइयों के लिए सुपर सीडर उपलब्ध हैं। विशेष बात यह है, कि यदि किसान भाई सीडर खरीदेंगे तो 40 प्रतिशत तक अनुदान मिलेगा। मुख्य बात यह भी है, कि यह यंत्र एक घंटे में एक एकड़ भूमि में फैले नरवाई को चौपट कर देती है। इसके पश्चात फसलों की बिजाई करती है। धान के उपरांत गेहूं एवं गेंहू के बाग मूंग की खेती करने वाले कृषकों के लिए सुपर सीडर किसी वरदान से कम नहीं है। किसान भाई सुपर सीडर के माध्यम से वर्षभर में अच्छी-खासी आमदनी की जा सकती है। वैसे तो सुपर सीडर की कीमत लगभग 3 लाख रुपये है। परंतु, कृषि विभाग की तरफ से 40 प्रतिशत प्रतिशत अनुदान मिलने के पश्चात इसकी कीमत काफी हद तक कम हो जाती है।