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राजस्थान के सीताराम सेंगवा बागवानी से कमा रहे हैं लाखों का मुनाफा

राजस्थान के सीताराम सेंगवा बागवानी से कमा रहे हैं लाखों का मुनाफा

पूरा विश्व आज जल के अभाव से प्रभावित है, किसानों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव हो रहा है। राजस्थान के ज्यादातर क्षेत्रों में जल की कमी के बावजूद भी कई किसान फसलों से अच्छी खासी पैदावार प्राप्त कर रहे हैं। इन किसानों में जोधपुर के सीताराम सेंगवा भी सम्मिलित हैं। ४२ वर्षीय सीताराम सेंगवा ने २२ की आयु से खेती शुरू कर एक बड़ी उपलब्धी हासिल की है। कृषि एवं बागवानी में नाम व धन अर्जन के बाद वो संतुष्ट हैं कि उन्होंने सरकारी नौकरी की जगह कृषि को प्राथमिकता दी है। किसान सीताराम सेंगवा खेती के लिए ड्रिपस्प्रिंकलर सिंचाई के माध्यम से बूंद-बूंद जल का उपयोग कर उम्दा किस्म के पौधे तैयार कर रहे हैं। फिलहाल उनके द्वारा नर्सरी में तैयार उम्दा पौधे पुरे देश में लगाये जा रहे हैं। उनकी इस सफलता में भाकृअनुप - केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (ICAR – Central Arid Zone Research Institute) के वैज्ञानिकों का भी सहयोग रहा है। यही कारण है कि आज कृषि में मुनाफा एवं बागवानी का नुस्खा उपयोग कर सीताराम सेंगवा २० लाख वार्षिक आय अर्जित कर रहे हैं।


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सीताराम सेंगवा राजस्थान राज्य के जोधपुर जनपद की भोपालगढ़ तहसील के पालड़ी राणावतन गांव में कृषि कार्य कर रहे हैं। सीताराम सेंगवा ने २५ बीघा खेत के साथ बेहतरीन पौधों की नर्सरी स्थापित की है। वह अपनी पत्नी, बेटों एवं बेटियों के सहयोग से आज बेहतर आजीविका के लिए अच्छा मुनाफा कर पा रहे हैं। एक वक्त वह भी था जब विघालय से शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत उनके सारे मित्र सरकारी नौकरी की तैयारी में जुट गए थे। लेकिन सन २००१ में भी सीताराम ने खेती को ही प्राथमिकता दी थी। आज सीताराम सेंगवा २२ वर्ष की आयु से खेती के सफर में सफलता हासिल कर राज्य सरकार एवं वैज्ञानिकों से विभिन्न प्रकार के सम्मान भी प्राप्त कर चुके हैं।

तरह तरह की किस्म के पौधे हैं सीताराम सेंगवा की नर्सरी में

सीताराम सेंगवा २०१८ से पूर्व केवल पारंपरिक खेती ही करते थे, लेकिन वर्ष २०१८ में काजरी की वैज्ञानिक अर्चना वर्मा के द्वारा बागवानी सम्बंधित प्रशिक्षण लेने के उपरांत नर्सरी का कार्य भी आरम्भ कर दिया था। कृषि के साथ-साथ नर्सरी प्रबंधन में वैज्ञानिक तकनीकों की सहायता से सीताराम सेंगवा ने हजारों उम्दा किस्म के पौधे तैयार किए। आज उनकी नर्सरी में चंदन के २ हजार, शीशम के ३ हजार, बेर के १० हजार, ताइवान पपीते के ५ हजार, सहजन के १० हजार, आंवला के ३ हजार, अमरूद के २५००, अनार के ३ हजार, गोभी के २० हजार, टमाटर के २० हजार, बैंगन के २० हजार, खेजड़ी के ७ हजार, गूगल धूप के १५००, करोंदा के २ हजार, नीम के २ हजार, मालाबार नीम के ५ हजार एवं नींबू के ५ हजार उम्दा किस्म के पौधे बिक्री हेतु उपलब्ध हैं। उन्नत बीजों से उत्पादित ये पौधे ही सीताराम सेंगवा के सफल होने की वजह हैं। यही वजह है कि पिछले वर्ष उन्होंने ७० से ८० हजार पौधे विक्रय किये हैं। उत्तर प्रदेश से लेकर हरियाणा एवं राजस्थान के जालौर, सीकर,जोधपुर, बाड़मेर, बीकानेर, नागौर व बालोतरा के किसान भी बेहतरीन किस्म के पौधे खरीदने के लिए आते रहते हैं। सीताराम सेंगवा केवल उम्दा किस्म के पौधे उत्पादित करने के साथ साथ ही होम डिलीवरी की माध्यम से लेने वाले के पास भी पहुँचाते हैं।


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सीताराम सेंगवा ने स्वयं आत्मनिर्भर बन अन्य किसानों के लिए भी रोजगार का अवसर प्रदान किया

सीताराम सेंगवा कृषि एवं बागवानी के माध्यम से आत्मनिर्भर बन पाए हैं, साथ ही गांव के कई किसानों व महिलों को भी रोजगार के अवसर प्रदान कर रहे हैं। कृषि क्षेत्र में उनका यह सफर बेहद संघर्षमय एवं चुनौतीपूर्ण रहा है। खेती में सीताराम सेंगवा के सराहनीय योगदान के लिए काजरी संस्थान ने उनकी सराहना करते हुए सम्मानित किया है। विभिन्न उपलब्धियां हासिल करने के उपरांत सीताराम को गर्व है कि वह एक सफल किसान हैं। सीताराम कहते हैं कि उनके अधिकतर मित्रगण सरकारी नौकरी में कार्यरत हैं, लेकिन वे मेरे कार्य की काफी सराहना करते हैं। सीताराम के मित्रों का कहना है कि सीताराम द्वारा खेती करने का निर्णय सही व उत्तम था। साथ ही, सीताराम का भी यही मत है कि नौकरी की अपेक्षा उनके द्वारा कृषि को प्राथमिकता देना बेहतरीन निर्णय था।
ICAR ने बताए सोयाबीन कीट एवं रोग नियंत्रण के उपाय

ICAR ने बताए सोयाबीन कीट एवं रोग नियंत्रण के उपाय

मानसून की लेटलतीफी के कारण भारत के राज्यों में सोयाबीन की खेती की तैयारी में भी इस साल देरी हुई। अवर्षा और अतिवर्षा की मार के बाद किसी तरह खेत में बोई गई सोयाबीन की फसल पर अब कीट पतिंगों का खतरा मंडरा रहा है।

इस खतरे के समाधान के लिए भारत के कृषि विज्ञानियों ने अनुभव एवं शोध के आधार पर उपयोगी तरीके सुझाए हैं।

सोयाबीन कृषकों के लिए ICAR की उपयोगी सलाह

भाकृ.अनु.प. के भारतीय सोयाबीन अनुसन्धान सस्थान (ICAR-Indian Institute of Soybean Research) इन्दौर, ने सोयाबीन फसल की रक्षा के लिए उपयोगी एडवायजरी (Advisory) जारी की है। 

आपको बता दें, इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (Indian Council of Agricultural Research/ICAR) यानी भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (भाकृअनुप) कृषि कल्याण हित में काम करने वाली संस्था है। 

भाकृअनुप (ICAR) भारत सरकार के कृषि मंत्रालय में कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के अधीन एक स्वायत्तशासी संस्था के तौर पर कृषि जगत के कल्याण संबंधी सेवाएं प्रदान करती है।

सोयाबीन पर मौजूदा खतरा

सोयाबीन की खेती आधारित भारत के प्रमुख राज्यों मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र एवं राजस्थान पर विविध रोगों का प्रभाव देखा जा रहा है। 

इन राज्यों के कई जिलों में सोयाबीन की फसल पर तना मक्खी, चक्र भृंग एवं पत्ती खाने वाली इल्ली तथा रायजोक्टोजनिया एरिअल ब्लाइट, पीला मोजेक वायरस रोग के संक्रमण की स्थिति देखी जा रही है। 

भाकृअनुप (ICAR) की इस संबंध में कृषकों को सलाह है कि, वे अपनी फसल की सतत निगरानी करें एवं किसी भी कीट या रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखते ही, नियंत्रण के उपाय अपनाएं।

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तम्बाखू की इल्ली

सोयाबीन की फसल में तम्बाखू की इल्ली एवं चने की इल्ली के प्रबंधन के लिए बाजार में उपलब्ध कीट-विशेष फिरोमोन ट्रैप्स का उपयोग करने की आईसीएआर (ICAR) ने सलाह दी है। 

इन फेरोमोन ट्रैप में 5-10 पतंगे दिखने का संकेत यह दर्शाता है कि इन कीड़ों का प्रादुर्भाव आप की फसल पर हो गया है। इसका संकेत यह भी है कि, यह प्रादुर्भाव अभी प्रारंभिक अवस्था में है। 

अतः शीघ्र अतिशीघ्र इनके नियंत्रण के लिए उपाय अपनाने चाहिए। खेत के विभिन्न स्थानों पर निगरानी करते हुए यदि आपको कोई ऐसा पौधा मिले जिस पर झुंड में अंडे या इल्लियां हों, तो ऐसे पौधों को खेत से उखाड़कर अलग कर दें।

तना मक्खी

तना मक्खी के नियंत्रण के लिए पूर्व मिश्रित कीटनाशक थायोमिथोक्सम (Thiamethoxam) 12.60%+लैम्ब्डा साह्यलोथ्रिन (Lambda-cyhalothrin) 09.50% जेडसी (ZC) (125 ml/ha) का छिड़काव करने की सलाह भाकृअनुप (ICAR) के वैज्ञानिकों ने दी है। 

चक्र भृंग-(गर्डल बीटल) के नियंत्रण हेतु प्रारंभिक अवस्था में ही टेट्रानिलिप्रोल 18.18 एस.सी. (250- 300 मिली/हे) या थायक्लोप्रिड 21.7 एस.सी. (750मिली/हे) या प्रोफेनोफॉस 50 ई.सी.(1 ली/हे.) या इमामेक्टीन बेन्जोएट (425 मिली/हे.) का छिड़काव करने की कृषकों को सलाह दी गई है। 

इसके अलावा रोग के फैलाव की रोकथाम हेतु प्रारंभिक अवस्था में ही पौधे के ग्रसित भाग को तोड़कर नष्ट करने की भी सलाह दी गई है।

इल्लियों का नियंत्रण

चक्र भृंग तथा पत्ती खाने वाली इल्लियों के एक साथ नियंत्रण हेतु पूर्वमिश्रित कीटनाशक क्लोरएन्ट्रानिलिप्रोल 09.30 % + लैम्ब्डा साह्यलोथ्रिन 04.60 % ZC (200 मिली/हे) या बीटासायफ्लुथ्रिन + इमिडाक्लोप्रिड (350 जमली/है) या पूर्वमिश्रित थायमिथोक्सम़ + लैम्बडा साह्यलोथ्रिन (125 मिली/है) का जिड़काव करने की सलाह दी गई है। 

इनके छिड़काव से तना मक्खी का भी नियत्रंण किया जा सकता है। पत्ती खाने वाली इल्लियां (सेमीलूपर, तम्बाकू की इल्ली एवं चने की इल्ली) होने पर इनके नियंत्रण के लिए किनालफॉस 25 ई.सी. (1 ली/हे), या ब्रोफ्लानिलिड़े 300 एस.सी. (42-62 ग्राम/है) आदि में से किसी एक का प्रयोग करने की सलाह कृषकों को दी गई है।

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पौधों को उखाड़ दें

पीला मोजेक रोग के नियंत्रण हेतु सलाह है कि तत्काल रोगग्रस्त पौधों को खेत से उखाड़कर अलग कर दें। इन रोगों को फैलाने वाले वाहक सफेद मक्खी की रोकथाम हेतु पूर्वमिश्रित कीटनाशक थायोमिथोक्सम + लैम्ब्डा साह्यलोथ्रिन (125 मिली/है) रसायन का छिड़काव करने की सलाह दी गई है। 

इसके छिड़काव से तना मक्खी का भी नियंत्रण किया जा सकता है। सफेद मक्खी के नियंत्रण हेतु कृषकगण, अपने खेत में विभिन्न स्थानों पर पीला स्टिकी ट्रैप लगाकर सोयाबीन की फसल की रक्षा कर सकते हैं। 

कुछ क्षेेत्रों में रायजोक्टोनिया एरिअल ब्लाइट का प्रकोप होने की सूचना प्राप्त होने की आईसीएआर (ICAR) ने जानकारी दी है। 

इसके उपचार के लिए वैज्ञानिकों ने हेक्साकोनाझोल %5ईसी (1 मिली/ली पानी) का छिड़काव करने का सुझाव दिया गया है।

जैविक सोयाबीन उत्पादन

जैविक सोयाबीन उत्पादन में रुची रखने वाले कृषक, पत्ती खाने वाली इल्लियों (सेमीलूपर, तम्बाखू की इल्ली) की छोटी अवस्था में रोकथाम हतु बेसिलस थुरिन्जिएन्सिस आदि का निर्धारित मात्रा में प्रयोग कर सकते हैं। प्रकाश प्रपंच का उपयोग करने की भी सलाह दी गई है।

कीट एवं रोग प्रबंधन के अन्य उपाय

सोयाबीन पर लगने वाले कीट एवं रोग के प्रबंधन के रासायनिक छिड़काव के अलावा अन्य प्रकृति आधारित उपाय भी हैं।

बर्ड पर्चेस

सोयाबीन की फसल में पक्षियों के बैठने के लिए ”T“ आकार के बर्ड पर्चेस लगाने की भी वैज्ञानिकों ने कृषि मित्रों को सलाह दी है। इससे कीट-भक्षी पक्षियों द्वारा भी इल्लियों की संख्या कम करने में प्राकृतिक तरीके से सहायता मिलती है।

सावधानियां

  • कीट एवं रोग नियंत्रण के लिए केवल उन्ही रसायनों का प्रयोग करें जो सोयाबीन की फसल में अनुशंसित हों।
  • कीटनाशक या फफूंद नाशक के छिड़काव के लिए सदैव पानी की अनुशंसित मात्रा का ही उपयोग करें।
  • किसी भी प्रकार का कृषि-आदान क्रय करते समय दुकानदार से हमेशा पक्का बिल लें जिस पर बैच नंबर एवं एक्सपायरी दिनांक आदि का स्पष्ट उल्लेख हो।

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सोयाबीन कीट एवं रोग नियंत्रण प्रबंधन पर आधारित यह लेख भारतीय कृषक अनुसंधान परिषद, भारतीय सोयाबीन अनुसन्धान संस्थान, इन्दौर द्वारा जारी कृषि आधारित सलाह पर आधारित है। 

लेख में वर्णित रसायन एवं उनकी मात्रा का उपयोग करने के पहले कृषि सलाहकारों, केवीके के वैज्ञानिकों, दवा विक्रेता से उचित परामर्श अवश्य प्राप्त करें। 

इस बारे में आईसीएआर (ICAR) की विस्तृत जानकारी के लिए लिंकhttps://www.icar.org.in/weather-based-crop-advisory पर क्लिक करें। 

यहां वेदर बेस्ड क्रॉप एडवाइज़री (Weather based Crop Advisory) विकल्प में आपको सोयाबीन की सलाह संबंधी पीडीएफ फाइल डाउनलोड करने मिल जाएगी।

जानिये कम लागत वाली मक्का की इन फसलों को, जो दूध के जितनी पोषक तत्वों से हैं भरपूर

जानिये कम लागत वाली मक्का की इन फसलों को, जो दूध के जितनी पोषक तत्वों से हैं भरपूर

जी हां बात बिलकुल सही है, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR) के भाकृअनुप-विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा (ICAR-Vivekananda Parvatiya Krishi Anusandhan Sansthan, Almora) ने यह उपलब्धि हासिल की है। संस्थान ने बायो-फोर्टिफाईड मक्का (Maize) की नई किस्में जारी की हैं, जो पोषक तत्वों से भरपूर हैं। अपने पोषक तत्वों के कारण मक्का की यह नई किस्में अन्य प्रचलित किस्मों से बहुत भिन्न हैं।

अंतर के कारण

मक्का की चलन में उगाई जाने वाली दूसरी किस्मों में अमीनो अम्ल (amino acid) मुख्य तौर पर प्रोटीन ( पोषक तत्व ) जैसे ट्रिप्टोफैन व लाइसीन की कमी होती है। विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने पारंपरिक एवं सहायक चयन विधि के माध्यम से इस कमी को पूरा किया है।

ग्लास फुल दूध जितना हेल्दी !

संस्थान ने गुणवत्ता युक्त प्रोटीन से लैस मक्का की इन खास किस्मों में विशिष्ट अमीनो अम्ल की मात्रा में सुधार किया है। इन विकसित किस्मों में इसकी मात्रा सामान्य मक्का से 30-40 फीसदी तक ज्यादा है। मतलब उन्नत प्रजाति के मक्के में पोषण की मात्रा लगभग स्वस्थ जीव के दूध के बराबर है!

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क्यूपीएम प्रजाति (QPM - Quality protein maize)

विवेकानन्द कृषि अनुसंधान संस्थान अल्मोड़ा ने मक्के के जिन खास किस्मों को विकसित किया है, उनको समितियों का भी अनुमोदन मिला है। संस्थान में विकसित की गई एक क्यूपीएम प्रजाति को केंद्रीय प्रजाति विमोचन समिति ने उत्तर पश्चिमी तथा उत्तर पूर्वी पर्वतीय क्षेत्रों, जबकि दो क्यूपीएम प्रजातियों को राज्य बीज विमोचन समिति ने जारी किया है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की जैविक दशाओं को ध्यान में रखकर अप्रैल '2022 में इन्हें जारी किया गया था।

मक्का कार्यशाला के परिणाम :

कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित प्रजातियों में शामिल, वीएल क्यूपीएम हाइब्रिड 45 मक्का प्रजाति (VL QPM Hybrid 45 Makka) की पहचान अप्रैल 2022 में हुई थी। दी गई जानकारी के अनुसार, 65वीं वार्षिक मक्का कार्यशाला में इन्हें तैयार किया गया।

इन प्रदेशों की जलवायु का ध्यान :

उत्तर पश्चिमी पर्वतीय अंचल (जम्मू व कश्मीर, हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड) एवं उत्तर पूर्वी पर्वतीय क्षेत्र खास तौर पर असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, सिक्किम व त्रिपुरा की जलवायु के हिसाब से इनको तैयार किया गया था।

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बीमारियों से लड़ने में कारगर :

संस्थान की इस प्रजाति में टर्सिकम व मेडिस पर्ण झुलसा तरह की बीमारियों के लिए मध्यम प्रतिरोधकता भी है।

अगेती की प्रकृति वाली प्रजाति

वीएल क्यूपीएम हाइब्रिड 61 (VL QPM Hybrid 61) अगेती यानी जल्द मुनाफा देने वाली प्रजाति है, जो 85 से 90 दिन में तैयार हो जाती है।

परीक्षणों के परिणाम

जांच परीक्षणों की बात करें तो राज्य-स्तरीय समन्वित परीक्षणों में इसके बेहतर परिणाम मिले हैं। जांच में इसकी औसत उपज लगभग साढ़े चार हजार किलोग्राम है, जिसमेें ट्रिप्टोफैन, लाइसीन व प्रोटीन की मात्रा क्रमश: 0.76, 3.30 व 9.16 प्रतिशत है। तो किसान भाई, आप भी हो जाएं तैयार, दुग्ध जितने पोषण से लैस, कम लागत वाली मक्के की इन फसलों से हेल्दी मुनाफा कमाने के लिए !
पालड़ी राणावतन की मॉडल नर्सरी से मरु प्रदेश में बढ़ी किसानों की आय, रुका भूमि क्षरण

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ग्रामीण सहभागी नर्सरी बनी आदर्श, दो साल में दो गुनी हो गई इनकम

वर्तमान में पंजीकृत कृषि विकास नर्सरी की सुविधाओं को देश के हर इलाके में विस्तार देने के मकसद को नई दिशा मिली है।

पालड़ी राणावतन की मॉडल नर्सरी

भाकृअनुप - केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान, (ICAR - Central Arid Zone Research Institute) जोधपुर, राजस्थान ने इस दिशा में अनुकरणीय पहल की है। संस्थान की ओर से भोपालगढ़ तहसील के ग्राम पालड़ी में 0.02 हेक्टेयर क्षेत्र में एक मॉडल नर्सरी विकसित की गयी है, इससे न केवल रोजगार के साधन विकसित हुए हैं, बल्कि भूमि का क्षरण (भू-क्षरण) रोकने में भी मदद मिली है।

क्यों पड़ी जरूरत

भाकृअनुप-केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान, जोधपुर, राजस्थान स्रोत से ज्ञात जानकारी के अनुसार, निवर्तमान रजिस्टर्ड नर्सरी के मान से किसान मित्रों को गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री प्रदान करने संबंधी महज 1/3 मांग पूरी की जा रही है। असंगठित क्षेत्र के मुकाबले संगठित क्षेत्र में इस कमी की पूर्ति के लिए जरूरी, अधिक नर्सरी की स्थापना के लिए यह मॉडल नर्सरी विकसित की गई है।

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मॉडल नर्सरी का यह है मॉडल

भाकृअनुप-केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान, जोधपुर, राजस्थान ने इस मॉडल तंत्र में 10 कृषि महिला-पुरुषों को मिलाकर एक मॉडल ग्रुप का गठन किया। इस गठित समूह को संस्थान की ओर से कार्यक्रम के जरिये वाणिज्यिक नर्सरी प्रबंधन पर कौशल प्रशिक्षण देकर दक्षता में संवर्धन किया गया।

दी गई यह जानकारी

समूह के चयनित सदस्यों समेत अन्य किसानों को कार्यक्रम में रूटस्टॉक और स्कोन का विकास करने का प्रशिक्षण प्रदान किया गया। इसके अलावा नर्सरी में जरूरी कटिंग, बडिंग और ग्राफ्टिंग तकनीक, कीट और रोग प्रबंधन के बारे में भी गूढ़ जानकारियां कृषि वैज्ञानिकों ने प्रदान कीं।

ये भी पढ़ें: कैसे डालें धान की नर्सरी रिकॉर्ड कीपिंग के साथ ही आवश्यक बुनियादी ढांचे, जैसे, बाड़ लगाने, छाया घर, मदर प्लांट, पानी की सुविधा और अन्य इनपुट जैसे नर्सरी उपकरण, बीज, नर्सरी मीडिया, उर्वरक, पॉली बैग भी समूह को प्रदान किए गए।

नर्सरी के माध्यम से हुआ सुधार

प्राप्त आंकड़़ों के मान से राजस्थान में कुल परिचालन भूमि जोत का पैमाना 7.7 मिलियन है। गौरतलब है कि पिछले तीन दशकों के दौरान कृषि संबंधी जानकारियां किसानों तक पहुंचाने के कारण शुद्ध सिंचित क्षेत्र में 140 प्रतिशत की बढ़त हासिल हुई है। इसमें खास बात यह है कि, सिंचाई सुविधाओं में वृद्धि इसमें कारगर साबित हुई है। इससे नई कृषि वानिकी और बागवानी प्रणालियों को राज्य में विकसित करने में मदद मिली है।

इस मामले में सफलता

कृषि वानिकी एवं बागवानी प्रणालियों के विस्तार में सब्जियों के साथ पेड़ों की खेती का विस्तार हुआ है। जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों के बीच क्वालिटी प्लांटिंग मटेरियल (क्यूपीएम/QPM) यानी गुणवत्ता रोपण सामग्री को प्रदान कर उन्हें इस्तेमाल में लाया गया। आपको बता दें, क्यूपीएम यानी गुणवत्ता रोपण सामग्री, कृषि और वानिकी में राजस्व में वृद्धि, प्रतिकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों संबंधी अनुकूलन क्षमता में सुधार के साथ ही बाजार में गुणवत्ता पूर्ण कच्चा माल संबंधी जरूरतों की पूर्ति के लिए एक प्राथमिक एवं अनिवार्य इकाई है। किचन गार्डन में कई सब्जियों जबकि बाग के कुछ पेड़ों संबंधी सिद्ध तरीकों के लिए गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री की मांग देखी गई है। यह भी देखा गया है कि, स्थानीय स्तर पर किसानों या पर्यावरण प्रेमियों को वास्तविक और रोग मुक्त रोपण सामग्री न मिलने के कारण इसे हासिल करने के लिए लंबी दूरी पाटनी पड़ती थी।

नर्सरी में हुआ यह कार्य

नर्सरी में मांग आधारित फल, सब्जी और कृषि-वानिकी प्रजाति आधारित बीजों को विकसित करना शुरू किया।

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दो साल में दोगुनी से अधिक हुई आय

विकसित बीजों एवं उनके विकास के बारे में व्यापक जानकारी प्रदान करने का परिणाम यह हुआ कि मात्र 2 साल के अंदर ही समूह सदस्यों की कमाई डबल से भी ज्यादा हो गई। दी गई जानकारी के अनुसार समूह सदस्यों के पास कुल मिलाकर, 870 मानव दिवस का रोजगार था। इसका आधार यह था कि, इसके लिए उन्होंने 77 हजार से अधिक संवर्धित बीज पैदा किए और 2.98 के बी:सी (B:C) अनुपात के साथ कई रोपों को बेचकर 6, 83,750 रुपये अर्जित किए। बताया गया कि समूह में शामिल होने के पहले तक एक महिला सदस्य की वार्षिक आय 20 हजार रुपये तक थी। नर्सरी में शामिल होने के बाद हर साल 120 दिन काम करने से उसे 40 हजार रुपये कमाने में मदद मिली है। इस समय व्यक्तिगत समूह के सदस्य 30 से 40 हजार रुपये कमा रहे हैं। जिनके पास हर साल 100 से 150 दिनों का रोजगार है।

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दुर्बल खेती

नर्सरी की गतिविधियाँ जनवरी से जून तक दुर्बल खेती के मौसम से मेल खाती हैं। इससे रोजगार सृजन का एक अतिरिक्त लाभ भी सदस्यों को मिला है। अब इससे प्रेरित होकर अन्य साथी किसान, पर्यावरण मित्र एवं घरेलू बागवानी के शौकीन लोग भी इससे जुड़ रहे हैं। इसका कारण यह है कि इसके सदस्यों को आस-पास के ग्रामीण अंचलों के साथ ही शहरों के साथ ही पड़ोसी जिलों तक अपना अंकुर पहुंचाने के लिए प्रशिक्षित करने से भी लाभ हुआ है।

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इस माह नींबू, लीची, पपीता का ऐसे रखें ध्यान

इस माह नींबू, लीची, पपीता का ऐसे रखें ध्यान

नींबू (Lemon) की नीली फफूंद से सुरक्षा

लीची (Lychee) खाने वाली इल्ली से रक्षा

पपीता (Papaya) पौधे को गलने से बचाएं

फलदार पौधों की बागवानी तैयार करने के लिए अगस्त का महीना अनुकूल माना जाता है। नींबू, बेर, केला, जामुन, पपीता, आम, अमरूद, कटहल, लीची, आँवला का नया बाग-बगीचा तैयार करने का काम किसान को इस महीने पूरा कर लेना चाहिए। भाकृअनुप- 
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR -Indian Council of Agricultural Research), पूसा, नई दिल्ली के कृषि एवं बागवानी विशेषज्ञों ने इनकी खेती के लिए महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। इस लेख में हम नींबू (Lemon), लीची (Lychee), पपीता (Papaya) की बागवानी से जुड़े खास बिंदुओं पर अपना ध्यान केंद्रित करेंगे।

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नींबू (Lemon) की देखभाल

नींबू के पौधे खेत, बागान या घर की बगिया में रोपने के लिए अगस्त का महीना काफी अच्छा होता है। कृषक मित्र उपलब्ध मिट्टी की गुणवत्ता के हिसाब से नींबू की किस्मों का चयन कर सकते हैं। कृषि विज्ञान केंद्र, उद्यानिकी विभाग से संबद्ध नर्सरी के अलावा ऑन लाइन प्लेटफॉर्म से किसान, उपलब्ध लागत के हिसाब से पौधों की किस्मों का चयन कर सकते हैं। इन केंद्रों पर 20 रुपये से लेकर 100, 200 एवं 500 रुपया प्रति पौधा की दर से पौधे खरीदे जा सकते हैं। उल्लेखनीय है कि पौधे की कीमत उसकी किस्म के हिसाब से घटती-बढ़ती है।

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अगस्त का महीना नींबू और लीची के पेड़-पौधों में गूटी बांधने के लिहाज से काफी उपयुक्त माना जाता है।

ऐसे करें लेमन सिट्रस कैंकर का उपचार

नींबू के सिट्रस कैंकर (Citrus canker) रोग का समय रहते उपचार जरूरी है। यह उपाय ज्यादा कठिन भी नहीं है। नींबू में सिट्रस कैंकर रोग के लक्षण पहले पत्तियों में दिखने शुरू होते हैं। बाद में यह नींबू के पौधे-पेड़ की टहनियों, कांटों और फलों पर पर भी फैल जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए जमीन पर गिरी हुई पौधे की पत्तियों को इकट्ठा कर नष्ट कर देना चाहिए। इसके अलावा नींबू की रोगयुक्त टहनियों की काट-छांट भी जरूरी है। बोर्डाे (Bordo) मिश्रण (5:5:50), ब्लाइटाॅक्स (Blitox) 0.3 फीसदी (3 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में घोलकर) का छिड़काव भी सिट्रस कैंकर रोग से नींबू के पेड़ के बचाव में कारगर साबित होता है।

रसजीवी कीट से रक्षा

नींबू के पौधे का रस चूसने वाले कीट से भी समय रहते बचाव जरूरी है। नींबू के पौधे का रस चूसने वाले कीट से बचाव करने के लिए मेलाथियान (Malathion) का स्प्रे मददगार होता है। मेलाथियान को 2 मिलीलीटर पानी में घोलकर पौधे पर छिड़काव करने से नींबू की रक्षा करने में गार्डनर को मदद मिल सकती है।
लग सकता है नीला फफूंद रोग
अगस्त महीने के दौरान नींबू के पौधों पर नीला फफूंद रोग लगने की आशंका रहती है। लेमन ट्री या प्लांट की नीले फफूंद रोग से रक्षा के लिए आँवला वाला तरीका अपनाया जा सकता है। इसके लिए नींबू के फलों को बोरेक्स या नमक से उपचारित कर नीला फफूंद रोग से रक्षा की जा सकती है। नींबू के फलों को कार्बेन्डाजिम या थायोफनेट मिथाइल की महज 0.1 प्रतिशत मात्रा से उपचारित करके भी नीला फफूंद रोग को फैलने से रोका जा सकता है।

लीची (Lychee or Litchi) की रक्षा

रस से भरी, चटख लाल, कत्थई रंग की लीची देखकर किसके मुंह में पानी न आ जाए। बार्क इटिंग कैटरपिलर (Bark Eating Caterpillar) भी अपनी यही चाहत पूरी करने लीची पर हमला करती है।

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आपको बता दें बार्क इटिंग कैटरपिलर लीची का छिलका खाने की शौकीन होती है। लीची का छिलका खाने वाले पिल्लू (बार्क इटिंग कैटरपिलर) की रोकथाम भी संभव है। इसके लिए लीची के जीवित छिद्रों में पेट्रोल या नुवाॅन या फार्मलीन से भीगी रुई ठूंसकर छिद्र मुख को चिकनी मिट्टी से अच्छी तरह से बंद कर देना चाहिए। बगीचे को स्वच्छ एवं साफ-सुथरा रखकर भी इन कीटों से लीची का बचाव किया जा सकता है।

पपीता (Papaya) का रखरखाव

पपीता का पनामा विल्ट (Panama wilt) एवं कॉलर रॉट (Collar Rot) जैसे प्रकोप से बचाव किया जाना जरूरी है। पपीते के पेड़ में फूल आने के समय 2 मिली. सूक्ष्म तत्वों को एक लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने की सलाह वैज्ञानिकों ने दी है।

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पनामा विल्ट की रोकथाम

पनामा विल्ट के पपीता पर कुप्रभाव को रोकने के लिए बाविस्टीन(BAVISTIN) का उपयोग करने की सलाह दी गई है। बाविस्टीन के 1.5 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी मिश्रित घोल से पनामा विल्ट से रक्षा होती है। बताए गए घोल का पपीते के पौधों के चारों ओर मिट्टी पर 20 दिनों के अंतराल से दो बार छिड़काव करने की सलाह उद्यानिकी सलाहकारों ने दी है।

काॅलर राॅट की रोकथाम

काॅलर राॅट भी पपीता के पौधों के लिए एक खतरा है। पपाया प्लांट पर काॅलर राॅट के प्रकोप से पपीता के पौधे, जमीन की सतह से ठीक ऊपर गल कर गिर जाते हैं। इस समस्या के समाधान के लिए पौधों पर रिडोमिल (RIDOMIL)(2 ग्राम/लीटर) दवा का छिड़काव करना फायदेमंद होगा। नींबू, लीची और पपीता के खेत में जलभराव से फल पैदावार प्रभावित हो सकती है। इन खेतों पर जल भराव न हो इसलिए कृषकों को जल निकासी के पर्याप्त इंतजाम नींबू, लीची, पपीता के खेतों पर करने चाहिए।
अब एक ही पौधे पर लगेंगी दो तरह की सब्जियां, पढ़िए पूरी खबर

अब एक ही पौधे पर लगेंगी दो तरह की सब्जियां, पढ़िए पूरी खबर

वाराणसी। जी हां, अब एक ही पौधे पर दो तरह की सब्जियां लगेंगी, वैज्ञानिकों ने इस तकनीकी को खोज निकाला है। यूपी के वाराणसी स्थित भारतीय सब्जी अनुसंधान (आईआईवीआर) के वैज्ञानिकों ने सब्जियों के लिए एक नई तकनीकी से ऐसी पौध का अविष्कार किया है, जो एक ही पौधे पर दो तरह की सब्जी उगाएगा।

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घर की रसोई का शौक बढ़ाने वाला वैज्ञानिकों का यह प्रयोग लोगों को काफी उत्साहित करने वाला है। दावा है कि इस पौधे को घर की बालकनी, घर की छतों पर , बगीचों आदि स्थानों पर लगाया जा सकता है। वैज्ञानिकों ने अपनी इस नई तकनीकी से ऐसे पौधे विकसित किए हैं, जिसमें टमाटर, बैंगन, आलू, मिर्च, खीरा, लोकी, तोरई व करेला उगाए जा सकेंगे। एक पौधे पर दो तरह की अलग-अलग सब्जियां उगाई जा सकती हैं।

पांच साल से चल रहा थी खोज

एक ही पौधे पर कई प्रकार की सब्जियां उगाने के लिए वाराणसी स्थित भारतीय सब्जी अनुसंधान केन्द्र में पिछले पांच वर्षों से शौध चल रहा था। फिलहाल वैज्ञानिकों ने एक ही पौधे पर ग्राफ्टिंग के जरिए दो तरह की सब्जियां उगाने वाली पौध का अविष्कार कर लिया है। अभी भी खोज जारी है।

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ग्राफ्टिंग तकनीकी से तैयार पौधों को मिला है ब्रिमेटो और पोमैटो नाम

भारतीय सब्जी अनुसंधान केन्द्र वाराणसी में ग्राफ्टिंग तकनीकी से तैयार किए गए पौधों को अलग नाम से जाना जाएगा। वैज्ञानिकों के अनुसार इस नई पौध को ब्रिमेटो (Brimato) और पोमैटो (Pomato) नाम से जाना जाएगा, जो काफी चर्चा बटोर रहे हैं।

किचन गार्डन या गमले में तैयार करें पौध

भारतीय सब्जी अनुसंधान केन्द्र वाराणसी के वैज्ञानिक डॉ. अंनत कुमार के अनुसार ग्राफ्टिंग तकनीकी से तैयार हुई इस पौध को किचन गार्डन या गमले में सही तरह तैयार करें। हर एक पोमैटो से 2 किग्रा टमाटर और 600 ग्राम आलू तैयार किया जा सकता है। एक ही पौधे पर मिट्टी के ऊपर टमाटर तो वहीं मिट्टी के निचले हिस्से में आलू तैयार होगा।

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कैसे तैयार करें पौधा

आलू के पौधे के मिट्टी के ऊपर कम से कम 6-7 इंच लंबा होने पर उसके ऊपर टमाटर के पौधे की ग्राफ्टिंग की जाएगी। ध्यान रहे दोनों ही पौधों के तने की मोटाई बराबर होनी चाहिए। करीब 20 दिन बाद दोनों के तने जुड़ जाएं तो उसे खेत में छोड़ दें। रोपाई के दो महीने बाद ही टमाटर की तोड़ाई शुरू हो जाएगी और बाद में आलू की खुदाई करें। [embed]https://www.youtube.com/watch?v=HUWu_jG-z_Q[/embed]