Ad

basmati rice

बासमती उत्पादक किसानों को सरकार के इस कदम से झेलना पड़ रहा नुकसान

बासमती उत्पादक किसानों को सरकार के इस कदम से झेलना पड़ रहा नुकसान

भारत संपूर्ण दुनिया का सबसे बड़ा बासमती चावल का निर्यातक देश है। यह अपनी पैदावार का लगभग 80 प्रतिशत निर्यात कर देता है। साल 2022-23 में भारत ने तकरीबन 4.6 मिलियन टन बासमती चावल का निर्यात किया है। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि उत्तर प्रदेश, हरियाणा एवं पंजाब की मंडियों में बासमती धान की आवक चालू हो गई है। परंतु, इस बार कृषकों को विगत वर्ष की तुलना में बासमती धान का कम भाव मिल रहा है। किसानों का यह कहना है, कि उन्हें इस वर्ष बासमती धान की बिक्री में काफी हानि हो रही है। किसानों की मानें, तो उन्हें इस बार प्रति क्विंटल 400 से 500 रुपये कम प्राप्त हो रहे हैं। साथ ही, किसानों का यह आरोप है, कि केंद्र सरकार द्वारा बासमती चावल के मिनिमम एक्सपोर्ट प्राइस 1,200 डॉलर प्रति टन निर्धारित करने के चलते उन्हें काफी हानि उठानी पड़ रही है।

भारत दुनिया में सबसे बड़ा बासमती निर्यातक देश है

भारत दुनिया का सबसे बड़ा बासमती चावल का निर्यातक देश है। यह अपनी पैदावार का 80 प्रतिशत बासमती चावल निर्यात करता है। ऐसी स्थिति में इसका भाव निर्यात के कारण से चढ़ता-उतरता रहता है। यदि बासमती चावल का मिनिमम एक्सपोर्ट प्राइस 850 डॉलर प्रति टन से ज्यादा हो जाएगा, तो ऐसी स्थिति में व्यापारियों को काफी नुकसान होगा। इससे किसानों को भी काफी नुकसान उठाना पड़ेगा। क्योंकि व्यापारी किसानों से कम भाव पर बासमती चावल खरीदेंगे। इस मध्य खबर है, कि बासमती चावल की नवीन फसल 1509 किस्म की कीमतों में काफी गिरावट आई है। विगत सप्ताह इसके भाव में 400 रुपये प्रति क्विंटल की कमी दर्ज की गई।

ये भी पढ़ें:
अब गैर बासमती चावल के निर्यात पर लगेगा 20 फीसदी शुल्क

किसानों को वहन करना पड़ रहा घाटा

किसान कल्याण क्लब के अध्यक्ष विजय कपूर ने बताया है, कि मिलर्स और निर्यातक किसानों को सही भाव नहीं दे रहे हैं। वह किसानों से कम कीमत पर बासमती खरीदने के लिए काफी दबाव डाल रहे हैं। उनकी मानें तो यदि सरकार 15 अक्टूबर के पश्चात मिनिमम एक्सपोर्ट प्राइस वापस ले लेती है, तो किसानों को काफी अच्छा मुनाफा मिलेगा। उन्होंने कहा है, कि पंजाब के व्यापारी हरियाणा से कम भाव पर बासमती चावल की 1509 प्रजाति की खरीदारी कर रहे हैं। इससे किसानों को काफी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।

किसानों को 1,000 करोड़ रुपये की हानि होगी

हरियाणा में कुल 1.7 मिलियन हेक्टेयर रकबे में से बासमती चावल की खेती की जाती है। इसमें से लगभग 40 प्रतिशत हिस्सेदारी 1509 किस्म की है। ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष विजय सेतिया के अनुसार, यदि इसी प्रकार बासमती का भाव मिलता रहा, तो किसानों को कुल मिलाकर 1,000 करोड़ रुपये का नुकसान होगा।
विश्व में नंबर वन श्रेणी की चावल की किस्में, भारत की किस्म का नाम भी शामिल

विश्व में नंबर वन श्रेणी की चावल की किस्में, भारत की किस्म का नाम भी शामिल

जैसा कि हम सब जानते हैं, कि बासमती चावल को विश्व का नंबर वन चावल माना जाता है। वहीं, इसके पश्चात इटली, पुर्तगाल, यूएस सहित जापान में उगाए जाने वाले चावल आते हैं। लोग चावल का उपभोग दाल, कढ़ी तो कभी बिरयानी के रूप में करते हैं। चावल का उपभोग तकरीबन भारत के हर घर में होता है। साथ ही, इसका इस्तेमाल विश्व भर के घरों में किया जाता है।

खबरों के मुताबिक, बासमती चावल को दुनिया में सबसे अच्छा चावल माना जाता है। भारत और पाकिस्तान में यह लंबे दाने वाला चावल उगाया जाता है। बासमती चावल का स्वाद सबसे हटकर है। पकाने पर यह एक-दूसरे के साथ चिपकता नहीं है और अलग रहता है। बासमती चावल को पुलाव, बिरयानी और सलाद में इस्तेमाल किया जाता है।

इटली में उगाए जाने वाला अर्बोरिया चावल

अब इसके उपरांत इटली में उत्पादित किए जाने वाला अर्बोरिया चावल आता है। इटली में उत्पादित किए जाने वाला मध्यम लंबे दाने वाला चावल है। साथ ही, इसकी नरम, चिपचिपी बनावट से अर्बोरिया चावल जाना जाता है। अर्बोरिया चावल पकाने पर मोटा और मलाईदार चावल बनता है। रिसोट्टो को बनाने के लिए सामान्य तोर पर अर्बोरिया चावल का इस्तेमाल किया जाता है। पुर्तगाल में लंबे दाने वाला चावल कैरोलिनो कहा जाता है। कैरोलिनो चावल अपनी नरम एवं मलाईदार बनावट से जाना जाता है। यह पकाने पर मोटा और मलाईदार चावल बनता है।  पुर्तगाली खाने, जैसे पोर्क बिफन और फ्राईड राइस, अक्सर कैरोलिनो चावल का इस्तेमाल करते हैं।

ये भी पढ़ें: तैयार हुई चावल की नई किस्म, एक बार बोने के बाद 8 साल तक ले सकते हैं फसल

जापान का चावल भी इसमें शामिल होता है

अरिजोना रॉयल चावल एक लंबे दाने वाला चावल है जो कि यूएस में उगाया जाता है। एरिजोना रॉयल चावल अपने नरम, मलाईदार बनावट के लिए मशहूर है। इसको पकाने पर मोटा और मलाईदार चावल बनता है। जापान में उगाए जाने वाला गोल, छोटे दाने वाला चावल जापानी सुशी चावल होता है। इसकी नरम और चिपचिपे बनावट से जापानी सुशी चावल जाना जाता है। ये पकाने पर मोटा और मलाईदार बनता है। जापानी सुशी चावल सुशी बनाने में इस्तेमाल किया जाता है।

दून बासमती किस्म के चावल का स्वाद और उत्पादन कैसा होता है ?

दून बासमती किस्म के चावल का स्वाद और उत्पादन कैसा होता है ?

बतादें, कि तीव्रता से होते शहरीकरण की वजह से दून बासमती चावल विलुप्त हो रहा है। खबरों के मुताबिक, बीते सालों में इसकी खेती काफी घट गई है। दून बासमती, चावल की किस्म जो अपनी समृद्ध सुगंध और विशिष्ट स्वाद के लिए जानी जाती है। तेजी से लुप्त हो रही है।उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक दून बासमती चावल की खेती का रकबा बीते पांच सालों में 62% प्रतिशत तक घट गया है।

रिपोर्ट के अनुसार, दून बासमती चावल की पैदावार 2018 में जहां 410 हेक्टेयर क्षेत्रफल में किया जा रहा था। वहीं 2022 में यह आंकड़ा महज 157 हेक्टेयर तक सिमट गया है। यही नहीं इस खेती के सिकुड़ते क्षेत्रफल के कारण किसानों ने भी अपने हाथ पीछे खींचना शुरू कर दिया है। 2018 में 680 किसान दून बासमती चावल पैदा कर रहे थे। पांच सालों में 163 किसानों ने बासमती चावल की खेती बंद कर दी है।

दून बासमती चावल की सुगंध और स्वाद कैसा होता है ?

अपनी विशिष्ट कृषि-जलवायु परिस्थितियों की वजह से यह चावल दून घाटी के लिए स्थानिक महत्व रखता है। इसके अलावा, चावल की यह प्रजाति केवल बहते पानी में ही पैदा होती है। यह चावल की “बहुत ही नाजुक” किस्म है। यह पूरी तरह से जैविक रूप से उत्पादित अनाज है, रासायनिक उर्वरकों या कीटनाशकों का उपयोग करने पर इसकी सुगंध और स्वाद खो जाता है। 

ये भी पढ़ें: तैयार हुई चावल की नई किस्म, एक बार बोने के बाद 8 साल तक ले सकते हैं फसल

दून बासमती, चावल की एक दुर्लभ किस्म होने के अतिरिक्त देहरादून की समृद्ध विरासत का एक महत्वपूर्ण भाग है। दून बासमती को दून घाटी में चावल उत्पादकों द्वारा विकसित किया गया था। दून बासमती चावल एक वक्त में बड़े क्षेत्रफल पर उगाया जाता था, जो अब एक विशाल शहरी क्षेत्र के तौर पर विकसित हो चुका है। अब दून बासमती चावल की खेती उंगलियों पर गिने जा सकने वाले कुछ ही क्षेत्रों तक ही सीमित है।

यह किस्म बड़ी तीव्रता से विलुप्त हो रही है 

तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण घटती कृषि भूमि जैसे कई कारणों से चावल की विशिष्ट किस्म तीव्रता से विलुप्त हो रही है। विपणन सुविधाओं का अभाव और सब्सिडी न मिलने जैसी वजहों ने दून बासमती चावल को विलुप्त होने की कगार पर पहुंचा दिया हैं। बासमती चावल की विभिन्न अन्य प्रजातियां दून बासमती के नाम पर बेची जा रही हैं। दून बासमती के संरक्षण एवं प्रचार-प्रसार के लिए सरकार को महत्वपूर्ण कदम उठाने की आवश्यकता है।

धान की नई किस्म मचा रहीं धमाल

धान की नई किस्म मचा रहीं धमाल

हरित क्रांति की शुरुआत के दौर से अभी तक हुए अनुसंधानौं के बाद भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान पूसा दिल्ली ने धान की विश्व में धमाल मचाने वाली 1121, 1509,1637 ,1728 , 1718 के अलावा अनेक किस्में विकसित की हैं। समूचे विश्व में निर्यात होने वाली बासमती की अधिकांश किस्में पूसा संस्थान की देन हैं। 

किसान धान लगाने की तैयारी कर रहे हैं ऐसे में उन्हें यह जानना जरूरी है किस किस्म से उत्पादन अच्छा मिलेगा एवं बाजार में किस किस्म की अच्छी मांग होगी।

 

पूसा धान की 10 नई किस्में (Top10 New Varieties of Pusa Dhan)

पूसा बासमती 1509

वर्ष 2013 में यह मूर्छित इस किस्म को पंजाब एवं दिल्ली राज्य के बासमती उगाने वाले क्षेत्रों के लिए संस्तुत किया गया लेकिन यह किस्म पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर राजस्थान तक में अच्छा उत्पादन दे रही है। इसकी औसत उपज 50 से 60 कुंतल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है। इसके पौधे अर्ध बोने एवं गिरने के प्रति प्रतिरोधी है। पकने पर इसके दाने झड़ते नहीं हैं। यह पर्ण झुलसा रोग, भूरा धब्बा रोग के प्रति मध्यम प्रतिरोधी है । तीव्र सुगंध, लंबा दाना एवं पकने में गुणवत्ता युक्त होने के कारण इसकी समूचे विश्व में अच्छी मांग है। 

पूसा 1612

55 से 62 कुंतल प्रति हेक्टेयर उत्पादन देने वाली यह किस्म पंजाब ,हरियाणा ,दिल्ली एवं जम्मू कश्मीर राज्य में सिंचित अवस्था में रोपाई के लिए उपयुक्त है। यह किस्म पूसा सुगंध 5 का विकसित रूप है। यह ब्लास्ट बीमारी के प्रति प्रतिरोधी है।पकने में 120 दिन का समय लेती है। इस किस्म में लीफ ब्लास्ट बीमारी के प्रतिरोधक  जीन विद्यमान हैं। पैदावार की दृष्टि से पूसा बासमती 1,  तरावड़ी एवं पूसा बासमती 1121 से अच्छी है। 

पूसा बासमती 6- 1401

पंजाब, हरियाणा, पश्चिम बंगाल उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड में सिंचित अवस्था में यह किस्म 50 से 55 कुंतल प्रति हेक्टेयर तक उपज देती है । यह मध्यम बोनी किस्म है। यह पकने पर गिरती नहीं है । दानों की समानता और पकने की गुणवत्ता के हिसाब से यह किस्म पूसा बासमती 1121 से बहुत अच्छी है। पकने पर दाना एक समान रहता है। सुगंध अच्छी है । 150 से 155 दिन में पकती है। 

उन्नत पूसा बासमती 1 -1460

पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड में सिंचित अवस्था मैं यह किस्म 55 से 63 कुंतल तक उपज देती है। 135 से 40 दिन में पक्का तैयार होती है। 

उषा सुगंध 5-25 11

दिल्ली पंजाब हरियाणा पश्चिमी उत्तर प्रदेश और जम्मू कश्मीर राज्य में यह किस्म में 55 से 62 कुंतल प्रति हेक्टेयर तक उपज देती है। यह  उच्च उपज देने वाली सुगंधित चावल की किस्म उत्तर  भारत में वहु फसली पद्धति के लिए उत्तम है ।सुगंधित और लंबी देने वाली यह किस्म पकाव में गुणवत्तापूर्ण है। झड़ने के प्रति सहिष्णु है। यह  भूरे धब्बे की प्रतिरोधी, पत्ती लपेटक एवं  ब्लास्ट के प्रति माध्यम प्रतिरोधी है। 125 दिन में तैयार हो जाती है। 

पूसा बासमती 1121

पंजाब हरियाणा पश्चिमी उत्तर प्रदेश उत्तराखंड एवं बासमती धान उगाने वाले सभी क्षेत्रों में सिंचित अवस्था में यह किस्म 40 से 45 कुंतल प्रति हेक्टेयर उपज देती है। पकने में 140 से 45 दिन लगते हैं । इसका दाना 8 मिलीमीटर लंबा होता है जो पकने के बाद 20 मिलीमीटर तक लंबा हो जाता है। 

पूसा आर एच-10 संकर धान

पंजाब ,हरियाणा, दिल्ली ,पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में यह किस्म 65 से 70 कुंतल तक उपज देती है। यह बासमती गुण वाली धान की विश्व में प्रथम संकर किस्म है। इसका दाना अत्यधिक सुगंधित ,लंबा और पतला है जो पकने पर लंबाई में 2 गुना बढ़ जाता है । यह  110 से 15 दिन का समय लेती है। 

पूसा बासमती 1718

यह किशन पूसा बासमती 1121 को संशोधित कर बनाई गई है। यह 1121 से 15 दिन पहले पक जाती है। लंबाई उतनी ही है लेकिन यह 11 21 किस्म के मुकाबले थोड़ा कम गिरती है। रोग कम आते हैं और उपज 1121 से ज्यादा होती है। 

पूसा बासमती 1728

यह धान की 14 01  किस्म से तैयार संशोधित प्रजाति है। बीएलबी रोग नहीं आता है। उपज भी 32 कुंतल प्रति एकड़ तक आ जाती है। 

पूसा बासमती 1637

इस किस्म से  30 कुंतल प्रति एकड़ तक उत्पादन मिल जाता है। यह भी पूसा की पूर्व में विकसित किस्मों की संशोधित प्रजाति है। मुख्य रूप से पूसा बासमती एक का यह संशोधित वर्जन है और गर्दन तोड़ जैसी बीमारियों के प्रति प्रतिरोधी है।

बासमती चावल ने अन्य चावलों को बाजार से बिल्कुल गायब कर दिया है

बासमती चावल ने अन्य चावलों को बाजार से बिल्कुल गायब कर दिया है

बतादें, कि आजकल लोग बासमती चावलों की सुगंध से मोहित हो जाते हैं। यदि उन्होंने एक बार भी गोविन्द भोग चावलों की सुगंध सूंघ ली तो दंग हो जाएंगे। यदि आज आप भारत में किसी से जानकारी लेंगे कि कौन सा चावल सबसे अच्छा होता है, तो सामने वाला व्यक्ति बिना वक्त लिए सोचकर बोल देगा बासमती। परंतु क्या ये सत्य है? क्या केवल बासमती ही एक ऐसा चावल है जो सबसे अच्छा है? शायद नहीं क्योंकि, भारत में एक वक्त में ऐसी कई सारी चावल की प्रजातियां थीं, जो अपने स्वाद एवं सुगंध के लिए संपूर्ण विश्व में मशहूर थीं।

गोविन्द भोग चावल की सुगंध अच्छी होती है

जो लोग आज बासमती चावलों की खुशबू से मोहित हो जाते हैं, अगर उन्होंने एक बार भी गोविन्द भोग चावलों की खुशबू सूंघ ली तो हैरान हो जाऐंगे। इस चावल की सुगंध ऐसी होती है, कि यदि ये किसी के घर में पक रहा हो तो सारे मोहल्ले को भनक पड़ जाती है, कि किसी के यहां गोविन्द भोग चावल पक रहा है। यह चावल पश्चिम बंगाल के पूर्वी जनपद में बहने वाली नदी दक्षिण बेसिन के किनारे वाले इलाकों में पैदा की जाती है। वर्तमान में भारत के अंदर यह चावल पश्चिम बंगाल के हुगली, बांकुरा, पुरुलिया और बीरभूम में पैदा किया जाता है। साथ ही, बिहार के कैमूर एवं छत्तीसगढ़ के सरगुजा में भी इस चावल की खेती की जाती है। ये भी पढ़े: धान की किस्म पूसा बासमती 1718, किसान कमा पाएंगे अब ज्यादा मुनाफा

सुगंध के मामले में काला नमक चावल को कोई टक्कर नहीं दे सकता

वर्तमान दौर में यदि किसी भारतीय से काला नमक कहा जाए तो वो नमक वाला काला नमक समझेगा। परंतु, एक वक्त पर काला नमक चावल की किस्म संपूर्ण भारत में लोकप्रिय थी। इस चावल को किसी विशेष अवसर पर ही पकाया जाता था। क्योंकि, ये बेहद महंगा होता है। ऐसा कहा जाता है, कि गोविन्द भोग चावल की सुगंध को किसी चावल की सुगंध मात दे सकती है तो वो काला नमक ही है। ये चावल विशेष रूप से नेपाल के कपिलवस्तु और उसके समीपवर्ती पूर्वी उत्तर प्रदेश के तराई वाले क्षेत्रों में पैदा किया जाता है। इस चावल की प्रसिद्धि एक वक्त पर इतनी थी, कि इसे संयुक्त राष्ट्र संघ के खाद्य और कृषि संगठन ने संसार के विशिष्ट मतलब कि खास चावलों की सूची में स्थान दिया है।

काले चावल का बुद्ध से क्या संबंध है

ऐसा कहा जाता है, कि यह चावल स्वयं महात्मा बुद्ध ने किसानों को दिया था। बतादें कि इसके पीछे एक कहानी है, कि एक बार जब महात्मा बुद्ध लुम्बिनी के जंगलों से गुजर रहे थे, तो उन्होंने वहां के ग्रामीणों को काला नमक चावल के बीज देते हुए कहा था, कि इन बीजों से पैदा होने वाले चावल की सुगंध तुम्हें मेरी स्मृति दिलाती रहेगी। आप विचार करिए कि अभी तो हमने आपको केवल दो चावल की किस्मों के विषय में बताया है। हालाँकि, इस प्रकार की विभिन्न प्रजातियां भारत में पैदा की जाती थीं। फिलहाल, यह आहिस्ते-आहिस्ते बासमती की वजह से विलुप्त होती जा रही हैं।
धान की लोकप्रिय किस्म पूसा-1509 : कम समय और कम पानी में अधिक पैदावार : किसान होंगे मालामाल

धान की लोकप्रिय किस्म पूसा-1509 : कम समय और कम पानी में अधिक पैदावार : किसान होंगे मालामाल

धान की लोकप्रिय किस्म पूसा-1509 जो कम समय और कम पानी में अधिक पैदावार दे कर किसानों को कर रही है मालामाल

धान की कई किस्में हमारे लिए बहुत उपयोगी हैं इनमें से एक किस्म पूसा-1509 है जो किसानों को मालामाल कर रही है। एक एकड़ में ₹75000 तक की लागत देती है जिससे किसान की आर्थिक स्थिति में बहुत अच्छा असर पड़ता है। 

इस किस्म की धान लगाने से मुख्य फायदा यह है कि धान की कटाई होने के बाद हम उस खेत में सब्जियां भी लगा सकते हैं, ऐसे में किसान गेहूं लगाने के पहले सब्जियों से काफी रुपए कमा लेते हैं जिससे उनकी आय बढ़ जाती है। 

यह फसल न केवल कम दिनों में पकती है बल्कि इसकी खेती करने से किसानों को बहुत लाभ मिलता है इसलिए कई लोगों का कहना है कि धान की यह किस्म पूसा-1121 की जगह ले सकती है। 

ये भी देखें: तर वत्तर सीधी बिजाई धान : भूजल-पर्यावरण संरक्षण व खेती लागत बचत का वरदान (Direct paddy plantation) बासमती चावल 

ना केवल भारत में सप्लाई होता है बल्कि इसकी मांग विदेशों में भी है। यूरोप में भी इस चावल की सप्लाई काफी मात्रा में होती है। कई एक्सपार्टों का कहना है कि विश्व बाजार में इस चावल के अच्छे दाम मिलेंगे। 

इस किस्म का चावल बहुत सुंदर है। चावल में सुगंध भी अच्छी है। धान की यह किस्म रोपाई के तीन महीने बाद तक पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म की खेती करने में पानी और खाद काम मात्रा में लगता है, अधिक उत्पादन प्राप्त होता है। 

धान के इस किस्म के बीज की मांग बहुत है क्योंकि इससे किसानों को बहुत अच्छी पैदावार प्राप्त हो रही है। तरावडी की अनाज की मंडी बासमती की बड़ी मंडी है। 

और आजकल इस मंडी में पूसा-1509 किस्म की धान भी आना शुरू हो गई है। इस फसल का उत्पादन 20 से 22 क्विंटल प्रति एकड़ तक उत्पादन हो रहा है और इसे बेचने पर 3800 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से रुपए मिलते हैं। मतलब किसानों को इसमें 75000 रुपए प्रति एकड़ तक की पैदावार मिल रही है। 

ये भी पढ़े: धान की फसल काटने के उपकरण, छोटे औजार से लेकर बड़ी मशीन तक की जानकारी

पूसा-1509 किस्म का दबदबा क्यों :

धान की पूसा-1509 किस्म के आने के पहले किसान धान की पूसा-1121 नमक किस्म की खेती करते थे। इसकी खेती करने में किसानों को कुछ दिक्कत आती थी। जैसे इस प्रकार की किस्म के पौधों की ऊंचाई अधिक होती थी। 

शुरू से लेकर फसल के तैयार होने में लगभग 5 महीने का वक्त लगता था और अगर कटने पर एक रात खेत में रुक गई तो 15-20% तो खेत में ही झड़ जाती थी। जिसके कारण किसानों का काफी नुकसान हो जाता था। 

लेकिन पूसा-1509 किस्म में ये सब परेशानियां नहीं आतीं। यह किस्म पूसा-1121 का उन्नत रूप है इसलिए इस किस्म की मांग ज्यादा है। इसके अलावा इस किस्म की खेती करने में पानी की कम मात्रा का इस्तेमाल होता है जिससे पानी की बचत होती है। 

इस प्रकार के किस्म की खेती करने से किसान को काफी फायदा मिलता है। जानकारी के मुताबिक इस साल करीब 200 क्विंटल बीज किसानों को दिया गया है जिसकी रोपाई लगभग 50 हजार हेक्टेयर में की गई है। 

और अगले वर्ष इसकी मात्रा बढ़ाई जाएगी जिससे किसानों को अच्छा लाभ मिल सके और उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हो सके। आने वाले समय में पानी की और कमी होगी, पानी को बचाना है तो किसानों को इस तरह की किस्मों का चयन जरूर करना होगा।

ये भी पढ़ें: धान की खेती की रोपाई के बाद करें देखभाल, हो जाएंगे मालामाल

बुआई की जानकारी :

इस किस्म की धान की बुआई 17 मई से 21 जून तक कर सकते हैं एवं रोपाई का सही समय जून के दूसरे सप्ताह से जुलाई के पहले सप्ताह तक है। एक एकड़ धान की रोपाई के लिए 4-5 कि.ग्रा. धान की आवश्यकता होती है। 

पूसा-1509 की कतार से कतार से दूरी 20cm और पौधे से पौधे की दूरी 15cm होनी चाहिए। बुआई के पूर्व बीजों का बीजोपचार कर लेना चाहिए। और उचित उर्वरक का चयन करना चाहिए। 

उर्वरकों का उपयोग मृदा के परीक्षण के हिसाब से करना चाहिए। खरपतवार नियंत्रण के लिए प्रिटी लक्नोर + सेफनर का उपयोग बुआई के 3-4 दिन बाद करना चाहिए। इस प्रकार की किस्म में ज्यादा पानी की आवश्यकता नहीं होती इसलिए समय समय पर आवश्यकता के अनुसार सिंचाई करनी चाहिए। जब दाने परिपक्व हो जाएं तो इसकी कटाई कर लें। 

ये भी पढ़े: धान की कटाई के बाद भंडारण के वैज्ञानिक तरीका

धान की यह किस्म किसानों को नुकसान दे सकती है :

धान की इस केस में इतनी खूबियां होने के बावजूद भी कुछ खामियां भी हैं। देश के कुछ राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा आदि राज्यों में बासमती जो सबसे पॉपुलर धान की किस्म थी उसमें एक दिक्कत सामने आ गई है। 

अभी तक ठीक काम कर रहे धान की इस किस्म में कुछ खामियों के कारण सरकार द्वारा इसके बीज वापस लिए जा रहे हैं इसलिए जो भी किसान धान कि इस किस्म की फसल करते हैं वह अब सावधान हो जाएं। 

ऐसा ठीक उसी प्रकार हुआ है जिस प्रकार किसी कंपनी की गाड़ी में खराबी आ जाने के कारण वह कंपनी उस गाड़ी को वापस ले लेती है। सरकार द्वारा ऐसा अहम फैसला इसलिए लिया गया है ताकि किसानों को ज्यादा नुकसान का सामना ना करना पड़े। 

अगर आप भी धान की किस्म के बीज वापस करना चाहते हैं तो आप 21 मई के पहले वापस कर सकते हैं। इसके लिए आपको खरीदी की ओरिजिनल रसीद दिखानी पड़ेगी तभी आप इस किस्म के बीजों को वापस कर सकते हैं। बीज वापसी के बदले किसानों को उनका पैसा या फिर नए बीज दिए जाएंगे।

इतने पॉपुलर बीज को क्यों लिया वापस लेने का फैसला :

जानकारी के मुताबिक एक किसान ने इस बीज के लिए शिकायत की थी जिसके कारण पूसा ने इसका टेस्ट किया जिसमें पता चला कि इसकी उपज सिर्फ 40 फ़ीसदी है जो कि 80 से 90 फ़ीसदी होना चाहिए इसीलिए सरकार द्वारा यह बीज वापस लिया जा रहा है। 

खराबी सिर्फ एक लाट में थी, जिसकी वजह से २५ फरवरी से ४ अप्रैल २०२२ तक की अवधी वाले कर्नाल क्षेत्र से बिक्री हुए एक लाट को वापस लिया जा रहा है। उस बिक्री की रसीद दिखा के किसान भाई बदले में नया बीज या पैसे वापस ले सकते हैं। 

किसान भाई क्षेत्रीय केंद्र करनाल, फोनः 018 42267169 पर बात कर सकते हैं। आशा करते हैं की पूसा-1509 की खेती से सम्बंधित जानकारी किसान भाइयों को पसंद आयी हो, इससे सम्बंधित किसी भी प्रकार की जानकारी चाहतें हों या अपने सुझाव देना चाहें तो कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।

पूसा बासमती चावल की रोग प्रतिरोधी नई किस्म PB1886, जानिए इसकी खासियत

पूसा बासमती चावल की रोग प्रतिरोधी नई किस्म PB1886, जानिए इसकी खासियत

हमारे देश में धान की खेती बहुत बड़ी मात्रा में की जाती है। धान की कई प्रकार की किस्में होती हैं जिनमें से एक किस्म PB1886 है। भारतीय किसान धान की इस किस्म की रोपाई 15 जून के पहले कर सकते हैं। जो 20 अक्टूबर से 15 नवंबर के बीच पककर तैयार हो जाती है। हमारे देश में कृषि को अधिक उन्नत बनाने के लिए सरकार की तरफ से नए नए बीज विकसित किए जा रहे हैं। और फसलों को और अधिक लाभदायक बनाने के लिए कृषि शोध संस्थानों की तरफ से फसलों की नई नई किस्में विकसित की जा रही हैं। यह किस्म न केवल फसलों की पैदावार में वृद्धि करती है। बल्कि किसानों की आय में भी वृद्धि करती हैं।

पूसा बासमती की नई किस्म PB 1886

इसी कड़ी में पूसा ने बासमती चावल की एक नई किस्म विकसित की है, जिसका नाम PB1886 है। बासमती चावल की यह किस्म किसानों के लिए फायदेमंद हो सकती है। यह किस्म बासमती पूसा 6 की तरह विकसित की गई है। जिसका फायदा भारत के कुछ राज्यों के किसानों को मिल सकता है। 

ये भी देखें: तर वत्तर सीधी बिजाई धान : भूजल-पर्यावरण संरक्षण व खेती लागत बचत का वरदान (Direct paddy plantation)

रोग प्रतिरोधी है बासमती की यह नई किस्म :

बासमती की यह नई किस्म रोग प्रतिरोधी बताई जा रही है। बासमती चावल की खेती में कई बार किसानों को बहुत अधिक फायदा होता है तो कई बार उन्हें नुकसान का भी सामना करना पड़ता है।धान की फसल को झौंका और अंगमारी रोग बहुत अधिक प्रभावित करते हैं। अगर हम झौंका रोग की बात करें इस रोग के कारण धान की फसल के पत्तों में छोटे नीले धब्बे पड़ जाते हैं और यह धब्बे नाव के आकार के हो जाने के साथ पूरी फसल को बर्बाद कर देते हैं। इस वजह से किसान को भारी नुकसान का सामना करना पड़ता है। इसके साथ ही अंगमारी रोग के कारण धान की फसल की पत्ती ऊपर से मुड़ जाती है, धीरे-धीरे फसल सूखने लगती है और पूरी फसल बर्बाद हो जाती है।

ये भी पढ़े: पूसा बासमती 1692 : कम से कम समय में धान की फसल का उत्पादन 

 उपरोक्त इन दोनों कारणों को देखते हुए पूसा ने इस बार धान की एक नई प्रकार की किस्म विकसित की है कि यह दोनों रोगों से लड़ सके। इसके साथ ही पूसा द्वारा यह समझाइश दी गई है कि पूसा की इस किस्म को बोने के बाद कृषक किसी भी प्रकार की कीटनाशक दवाओं का छिड़काव न करें। 

ये भी पढ़े: धान की फसल काटने के उपकरण, छोटे औजार से लेकर बड़ी मशीन तक की जानकारी

इन क्षेत्रों के लिए है धान की यह किस्म लाभदायक :

धान की यह किस्म क्षेत्र की जलवायु के हिसाब से विकसित की गई है। इसलिए इसका प्रभाव केवल कुछ ही क्षेत्रों में हैं। जहां की जलवायु इस किस्म के हिसाब से अनुकूल नहीं हैं, उस जगह इस किस्म की धान नहीं होती है। उषा की तरफ से मिली जानकारी के अनुसार वैज्ञानिक डॉक्टर गोपालकृष्णन ने बासमती PB1886 की किस्म विकसित की है जो कि कुछ ही क्षेत्रों में प्रभावशाली है। पूसा के अनुसार यह किस्में हरियाणा और उत्तराखंड की जलवायु के अनुकूल है इसलिए वहां के किसानों के लिए यह किस्म फायदेमंद हो सकती है। 

ये भी पढ़े:  धान की लोकप्रिय किस्म पूसा-1509 : कम समय और कम पानी में अधिक पैदावार : किसान होंगे मालामाल 

 इस किस्म के पौधों को 21 दिन के लिए नर्सरी में रखने के बाद रोपा जा सकता है। इसके साथ ही किसान भाई इस फसल को 1 से 15 जून के बीच खेत में रोप सकते हैं। जो कि नवंबर महीने तक पक कर तैयार हो जाती है। इसलिए इस फसल की कटाई नवंबर में हीं की जानी चाहिए।

अगर आप भी चावल में मिलावट कर उसे बेच रहे हैं तो सावधान हो जाइए

अगर आप भी चावल में मिलावट कर उसे बेच रहे हैं तो सावधान हो जाइए

भारत में उगाए जाने वाले बासमती चावल का पूरी दुनिया में डंका बजता है। अगर पिछले साल की बात की जाए तो साल 2022-23 में बासमती चावल का निर्यात 24.97 लाख टन दर्ज किया गया है। अमेरिका और यूरोप में तो भारत के बासमती चावल की डिमांड है ही इसके साथ-साथ अरब के देशों में भी भारत से बासमती चावल मंगवाए जाते हैं। यही कारण है, कि पिछले कुछ समय में ना सिर्फ भारत चावल का सबसे बड़ा उत्पादक देश रहा है। बल्कि हम पूरे विश्व में बहुत ही बड़े स्तर पर चावल का निर्यात भी करते हैं। भारत की तरफ से हमेशा कोशिश की जाती है, कि पूरी दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय बाजार मानकों के आधार पर खरा उतरने के बाद ही बासमती चावल का निर्यात किया जाए। लेकिन आजकल बहुत से व्यापारी और चावल वितरित करने वाली कंपनियां नकली बासमती चावल बेच रही हैं। इस तरह की गड़बड़ी करते हुए अपनी नोटों से जेबें भर रहे हैं। ऐसी गैर-कानूनी गतिविधियों पर अब भारतीय खाद्य संरक्षा और मानक प्राधिकरण यानी FSSAI ने लगाम कस दी है। अगर रिपोर्ट्स की मानें तो FSSAI ने बासमती चावल की क्वालिटी और स्टैंडर्ड के लिए खास नियम तय कर दिए हैं, जिनका पालन चावल कंपनियों को करना ही होगा। ये नियम 1 अगस्त 2023 से देशभर में लागू हो जाएंगे। नियमों का पालन न किए जाने पर व्यापारियों और कंपनियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही की जाएगी।

अब बाज़ार में बिकेगा केवल नेचुरल बासमती चावल

असली बासमती चावल में अपनी खुद की एक प्राकृतिक सुगंध होती है। लेकिन आजकल कई कंपनियां आर्टिफिशियल कलर और नकली पॉलिश करते हुए बासमती चावल में बाहर से एक अलग खुशबू डाल देती हैं। इस तरह के नकली चावल देशभर में बेचे जा रहे है। लेकिन अब सरकार ने इस कुकर्म पर लगाम लगाने की ठान ली है। ऐसी कंपनियों पर लगाम कसते हुए अब भारत सरकार के बजट में फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड (फूड प्रोडक्ट स्टैंडर्ड एंड फूड एडिटिव) फर्स्ट अमेंडमेंट रेगुलेशन 2023 नोटिफाई किया गया है।


ये भी पढ़ें:
धान की किस्म पूसा बासमती 1718, किसान कमा पाएंगे अब ज्यादा मुनाफा
इसमें बासमती चावल के लिए खास स्टैंडर्ड निर्धारित किए गए हैं, ताकि असली बासमती की पहचान, सुगंध, रंग और बनावट के बारे में जागरूकता बढ़ाई जा सके। नए नियमों में ब्राउन बासमती, मिल्ड बासमती, पारबॉइल्ड ब्राउन बासमती और मिल्ड पारबॉइल्ड बासमती चावल को प्रमुखता से जोड़ा गया है। इन खास तरह के स्टैंडर्ड का पालन न करने पर कंपनियों के खिलाफ सरकार की तरफ से लीगल एक्शन लिया जा सकता है।

किसे कहेंगे असली बासमती चावल

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण यानी FSSAI द्वारा निर्धारित रेगुलेटरी स्टैंडर्ड्स के अनुसार, असली बासमती चावल वही होगा, जिसमें प्राकृतिक सुगंध होगी। साथ ही, इन नियमों के तहत बासमती चावल को किसी भी तरह से आर्टिफिशियल पॉलिश नहीं किया जाएगा। जो भी कंपनियां बासमती चावल बेच रही हैं, उन्हें पकने से पहले और पकने के बाद के चावल का आकार निर्धारित करना होगा। इसके अलावा चावल कंपनियों को बासमती चावल में नमी की मात्रा, एमाइलॉज की मात्रा, यूरिक एसिड के साथ-साथ बासमती चावल में टुकड़ों की उपस्थिति और इनकी मात्रा की पूरी जानकारी देनी होगी।

1 अगस्त से लागू हो जाएंगे नियम

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण द्वारा बासमती चावल के लिए निर्धारित रेगुलेटरी स्टैंडर्ड्स 1 अगस्त 2023 से लागू हो जाएंगे। इन नियमों का सबसे बड़ा मकसद बासमती चावल में हो रही मिलावट को खत्म करना है। साथ ही, ग्राहकों के हितों की रक्षा देश नियम के तहत की जाएगी। यहां पर सरकार का मकसद है, कि आपके खाने की थाली में एकदम वैसे ही चावल पहुंच सके जैसा उन्हें उगाया गया है।
खरीफ सीजन में बासमती चावल की इन किस्मों की खेती से होगी अच्छी पैदावार और कमाई

खरीफ सीजन में बासमती चावल की इन किस्मों की खेती से होगी अच्छी पैदावार और कमाई

भारत भर में बासमती धान का उत्पादन किया जाता है। देश के विभिन्न राज्यों में विभिन्न किस्म का बासमती चावल उगाया जाता है। परंतु, कुछ ऐसी भी प्रजातियां हैं, जिनके उत्पादन हेतु हर प्रकार का मौसम और जलवायु उपयुक्त होता है। इस बार जून के पहले हफ्ते में मानसून की शुरुआत होगी। इसके उपरांत संपूर्ण भारत में किसान धान की बुवाई करने में लग जाएंगे। दरअसल, किसानों ने धान की नर्सरी को तैयार करना चालू कर दिया है। यदि किसान भाई बासमती धान का उत्पादन करने की योजना बना रहे हैं, तो उनके लिए यह अच्छी खबर है। क्योंकि, आगे इस लेख में हम आपको बासमती धान की सदाबहार प्रजतियों के विषय में जानकारी देने वाले हैं। इन किस्मों से खेती करने पर रोग लगने का खतरा भी बहुत कम रहता है। साथ ही, काफी बेहतरीन पैदावार भी मिलती है।

बासमती चावल का उत्पादन पूरे देश में किया जाता है

ऐसे तो बासमती चावल की खेती पूरे भारत में की जाती है। लेकिन, भिन्न-भिन्न राज्यों में वहां की मृदा-जलवायु हेतु अनुकूल भिन्न-भिन्न किस्म का बासमती चावल उगाया जा सकता है। हालाँकि, कुछ ऐसी भी प्रजातियां मौजूद हैं, जिनका उत्पादन हर प्रकार के मौसम एवं जलवायु में आसानी से किया जा सकता है। इन किस्मों के ऊपर झुलसा रोग का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। साथ ही, फसल की लंबाई कम होने की वजह से तेज हवा बहने पर भी यह वृक्ष नहीं गिरते हैं। अब ऐसी हालत में किसानों की कीटनाशकों पर आने वाली लागत में राहत मिलेगी एवं धान में पोष्टिकता भी बनी रहेगी। इसकी वजह से बाजार में समुचित भाव प्राप्त होगा। ये भी देखें: धान की किस्म पूसा बासमती 1718, किसान कमा पाएंगे अब ज्यादा मुनाफा

पूसा बासमती-6 (पूसा- 1401):

पूसा बासमती-6 धान की एक सिंचित किस्म है। मतलब कि यह प्रजाति बारिश से ही अपने लिए जल की आवश्यकता को पूरा कर लेती है। यह बासमती की एक बौनी प्रजाति है। इसकी फसल की लंबाई परंपरागत बासमती की तुलना में बेहद कम होती है। ऐसी हालत में तीव्र हवा चलने पर भी इसकी फसल खेत में नहीं गिरती है। इसकी उत्पादन क्षमता 55 से 60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक है। यदि किसान भाई इसकी खेती करेंगे को उनको काफी ज्यादा उत्पादन प्राप्त हो सकेगा।

उन्नत पूसा बासमती-1 (पूसा-1460):

उन्नत पूसा बासमती-1 भी पूसा बासमती-6 की ही भाँती एक सिंचित बासमती धान की प्रजाति है। इसकी फसल 135 दिन के समयांतराल में ही पककर तैयार हो जाती है। इसका अर्थ यह है, कि 135 दिन के उपरांत किसान भाई इसकी कटाई कर सकते हैं। इसमें रोग प्रतिरोध क्षमता काफी ज्यादा पाई जाती है। अब ऐसी हालत में इसके ऊपर झुलसा रोग का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। यदि पैदावार की बात करें तो, आप एक हेक्टेयर से 50 से 55 क्विंटल धान की पैदावार कर सकते हैं। ये भी देखें: पूसा बासमती चावल की रोग प्रतिरोधी नई किस्म PB1886, जानिए इसकी खासियत

पूसा बासमती-1121:

पूसा बासमती- 1121 का उत्पादन आप किसी भी धान की खेती वाले भाग में कर सकते हैं। यह बासमती की एक सुगंधित प्रजाति है। जो कि 145 दिन के समयांतराल में पककर तैयार हो जाती है। इसके चावल का दाना पतला एवं लंबा होता है। खाने में यह बेहद स्वादिष्ट लगती है। इसकी उत्पादन क्षमता 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इसके अलावा यदि किसान भाई चाहें, तो पूसा सुगंध-2, पूसा सुगंध-3 और पूसा सुगंध-5 की भी खेती कर सकते हैं। इन किस्मों की खेती करने हेतु पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर का मौसम उपयुक्त है। यह किस्में तकरीबन 120 से 125 दिन के समयांतराल में पककर तैयार हो जाती हैं। साथ ही, एक हेक्टेयर जमीन से 40 से 60 क्विंटल उत्पादन मिल सकता है।
केंद्र सरकार ये कदम उठाकर चावल की कीमतों को कम करने की योजना बना रही है

केंद्र सरकार ये कदम उठाकर चावल की कीमतों को कम करने की योजना बना रही है

दुनिया के कुल एक्सपोर्ट का 40 फीसदी हिस्सा भारत के पास है। साथ ही, दुनिया का सबसे सस्ता चावल भी भारत की एक्सपोर्ट करता है। भारत, संपूर्ण विश्व को झटका देते हुए चावल की ज्यादातर किस्मों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहा है। भारत सरकार के इस कदम से ग्लोबल मार्केट में चावल की कीमतों में और अधिक बढ़ोत्तरी देखने को मिल सकती है। साथ ही, भारत के अंदर चावल की कीमतों में कटौती देखने को मिल सकती है। दरअसल, अलनीनो की वजह से चावल के उत्पादन पर पहले से ही काफी प्रभाव देखने को मिला है। साथ ही, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में चावल की कीमतें पहले ही 11 साल के हाई स्तर पर पहुंच गई हैं। भारत की तरफ से यह कदम लोकल स्तर पर चावल की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए उठाया जा रहा है। भारत के विभिन्न इलाकों में चावल की कीमतों में 20 प्रतिशत से अधिक तक की बढ़ोत्तरी हो चुकी है।

भारत सरकार गैर बासमती चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाएगी

मीडिया एजेंसियों की रिपोर्ट के मुताबिक मामले से परिचित लोगों के अनुसार, सरकार समस्त नॉन-बासमती चावल के निर्यात पर रोकथाम लगाने की योजना पर विचार विमर्श कर रही है। मीडिया को मिले सूत्रों के अनुसार, सरकार विधानसभा चुनाव और उसके उपरांत आम चुनावों से पूर्व भारत में महंगाई के जोखिम से बचना चाहती है। सरकार इस कारण से चावल की नॉन बासमती वैरायटी पर प्रतिबंध लगाने के विषय में सोच रही है। ये भी पढ़े: गेहूं निर्यात पर पाबंदी से घबराए व्यापारी, चावल निर्यात के लिए कर रहे बड़ी डील

भारत सरकार ने चावल की एमएसपी में 7% प्रतिशत की वृद्धि की थी

विशेष बात तो यह है, कि विश्व के कुल निर्यात का 40 प्रतिशत भाग भारत के पास है। साथ ही, भारत विश्व के अंदर सबसे सस्ता चावल भी निर्यात करता है। ऐसे में भारत यदि सस्ते चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाता है, तो दुनिया में चावलों के दाम में और भी इजाफा देखने को मिल सकता है। वहीं, दूसरी तरफ भारतीय चावल के निर्यात की कीमत में 9 प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिल चुकी है। विगत महीने ही सरकार ने चावल के एमएसपी में 7 % प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की थी।

भारत में इस बार धान की बुवाई 26 प्रतिशत कम हुई है

गर्मियों में मानसून के आरंभ में बारिश कम होने की वजह से संपूर्ण भारत में बुवाई कम देखने को मिली है। विगत हफ्ते के आंकड़ों पर प्रकाश डालें तो समर में बोये जाने वाला चावल विगत वर्ष की तुलना में 26 प्रतिशत कम है। इसकी वजह अलनीनो को ठहराया जा रहा है, जिसका प्रभाव सिर्फ भारत पर ही देखने को नहीं मिल रहा बल्कि थाईलैंड में भी देखने को मिल रहा है। जहां पर सामान्य से 26 प्रतिशत कम बरसात होने की वजह एक ही फसल उगाने को कहा गया है।
भारत सरकार ने गैर बासमती चावल पर लगाया प्रतिबंध, इन देशों की करेगा प्रभावित

भारत सरकार ने गैर बासमती चावल पर लगाया प्रतिबंध, इन देशों की करेगा प्रभावित

केंद्र सरकार के इस निर्णय से बहुत सारे देशों में चावल की किल्लत हो जाएगी। दरअसल, भारत विश्व का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है। भारत से बहुत सारे देशों में चावल की आपूर्ति होती है। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि केंद्र सरकार द्वारा बासमती चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया गया है। केंद्र सरकार के इस निर्णय से बहुत सारे देशों में चावल की किल्लत हो जाएगी। विशेष रूप से उन देशों में जो चावल के लिए प्रत्यक्ष तौर पर भारत पर आश्रित हैं। सामान्य तौर पर भारत विश्व का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है। बतादें, कि से अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका समेत एशिया महादेश के भी बहुत सारे देशों में चावल का निर्यात किया जाता है।

केंद्र सरकार ने चावल के निर्यात पर लगाया प्रतिबंध

जानकारों ने बताया है, कि भारत में खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों पर रोकथाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने नॉन बासमती चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया है। क्योंकि चावल भारत में अधिकांश लोगों का भोजन है। सबसे विशेष बात यह है, कि भारतीय लोग नॉन बासमती चावल का ही सबसे ज्यादा सेवन करते हैं। यदि नॉन बासमती चावल का निर्यात सुचारू रहता तो, इसकी कीमतों में भी बढ़ोतरी हो सकती थी। ऐसे में आम जनता का पेट भरना मुश्किल हो जाता। यही वजह है, कि केंद्र सरकार ने कुछ दिनों के लिए नॉन बासमती चावल पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है। ये भी पढ़े: पूसा बासमती चावल की रोग प्रतिरोधी नई किस्म PB1886, जानिए इसकी खासियत

नेपाल में इस वजह से बढ़ने वाले चावल के दाम

भारत से सर्वाधिक नॉन बासमती चावल का निर्यात चीन, नेपाल, कैमरून एवं फिलीपींस समेत विभिन्न देशों में होता है। अगर यह प्रतिबंध ज्यादा वक्त तक रहता है, तो इन देशों में चावल की किल्लत हो सकती है। विशेष कर नेपाल सबसे ज्यादा असर होगा। क्योंकि, नेपाल भारत का पड़ोसी देश है। उत्तर प्रदेश एवं बिहार से इसकी सीमाएं लगती हैं। फासला कम होने के कारण नेपाल को यातायात पर कम लागत लगानी पड़ती है। अगर वह दूसरे देश से चावल खरीदता है, तो निश्चित तौर पर निर्यात पर अत्यधिक खर्चा करना पड़ेगा। इससे नेपाल पहुंचते-पहुंचते चावल की कीमतें बढ़ जाऐंगी, जिससे महंगाई में भी इजाफा हो सकता है।

भारत ने बीते वर्ष टूटे चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था

बतादें, कि ऐसा बताया जा रहा है, कि गैर- बासमती चावल पर प्रतिबंध लगाए जाने से भारत से निर्यात होने वाले करीब 80 फीसदी चावल पर प्रभाव पड़ेगा। हालांकि, केंद्र सरकार के इस कदम से रिटेल बाजार में चावल की कीमतों में गिरावट आ सकती है। साथ ही, दूसरे देशों में कीमतें बढ़ जाऐंगी। एक आंकड़े के अनुसार, विश्व की तकरीबन आधी आबादी का भोजन चावल ही है। मतलब कि वे किसी न किसी रूप में चावल खाकर ही अपना पेट भरते हैं। अब ऐसी स्थिति में इन लोगों के लिए चिंता का विषय है। बतादें, कि विगत वर्ष भारत ने टूटे हुए चावल के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया था।
किसान भाई परमल किस्म की धान की ई-खरीद ना होने से निराश

किसान भाई परमल किस्म की धान की ई-खरीद ना होने से निराश

अनाज मंडियों में अन्य दूसरे प्रदेशों से परमल धान की किस्मों के आने की संभावना के कारण प्रशासन ने ई-खरीद पोर्टल के जरिए से परमल किस्मों की खरीद रोक दी है। इस वजह से जिन कृषकों का परमल धान अब भी खेतों में पड़ा हुआ है, वे काफी परेशान हैं। हरियाणा में करनाल जनपद की अनाज मंडियों में अन्य राज्यों से परमल धान की किस्मों के आने के अंदेशे की वजह से प्रशासन ने ई-खरीद पोर्टल के जरिए से परमल किस्मों की खरीद को रोक दिया है। इस कारण से जिन किसानों का परमल धान आज भी खेतों में पड़ा हुआ है, वे काफी कठिनाई में फंस गए हैं। मीडिया खबरों के मुताबिक, किसानों ने आरोप लगाया है, कि प्रशासन का यह कदम उनको निजी खरीदारों को औने-पौने भावों पर अपनी फसल विक्रय के लिए विवश कर सकता है। साथ ही, अधिकारियों ने यह दावा किया है, कि जनपद में कटाई का कार्य पूर्ण हो चुका है। साथ ही, उनको यह आशंका है, कि जनपद की अनाज मंडियों में कुछ व्यापारी अन्य राज्यों से धान ला सकते हैं तथा एमएसपी पर विक्रय कर सकते हैं।साथ ही, किसानों की मांग है, कि धान की फसल खेतों में पड़ी है अथवा नहीं, इसकी जांच कर अधिकारी धान की खरीद शुरू करें। रिपोर्ट के मुताबिक, परमल धान (एमएसपी 2,203 रुपये प्रति क्विंटल) का पंजीकरण फिलहाल ई-खरीद की जगह ई-एनएएम पोर्टल पर किया जा रहा है। सरकारी एजेंसियों की जगह, उनका उत्पादन फिलहाल निजी खरीदारों द्वारा खरीदा जा रहा है।


 

परमल धान की 97 लाख क्विंटल आवक हुई है

करनाल जनपद में अब तक लगभग 97 लाख क्विंटल परमल धान की आवक हो चुकी है। वहीं, विगत वर्ष आवक लगभग 107 लाख क्विंटल थी। जरीफाबाद के पुनीत गोयल ने बताया कि, “बाढ़ के बाद, मैंने नौ एकड़ में परमल किस्म के धान की खेती की थी। वर्तमान में फसल कटाई के दौरान मुझे पता चला कि खरीद बंद कर दी गयी है। सरकार को धरातल पर आकर देखना चाहिए और जो धान अभी भी खेतों में है, उसे खरीदना चाहिए।” एक अन्य किसान निरवेर सिंह ने कहा कि आठ एकड़ में परमल किस्म के धान की कटाई अभी बाकी है। उन्होंने आरोप लगाया कि निजी खरीदार एमएसपी से नीचे उत्पादन को खरीदेंगे।

ये भी पढ़ें:
फसलों की होगी अच्छी कटाई, बस ध्यान रखनी होंगी ये बातें


धान खरीद कम एमएसपी में होगी

खबर के अनुसार, एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि व्यापारियों को राज्य के बाहर से धान लाने से रोकने के लिए यह कदम उठाया गया है। " हम यह सुनिश्चित करेंगे कि कोई भी धान एमएसपी से नीचे न खरीदा जाए। इस संबंध में अधिकारियों को निर्देश दे दिये गये हैं.” उन्होंने कहा, ''जिले भर के खेतों में शायद ही परमल की कोई फसल खड़ी है।" गौरतलब है, कि परमल धान की बिक्री करने के लिए वर्तमान में किसानों को पंजीकरण फिलहाल ई-खरीद पोर्टल की जगह ई-नाम पोर्टल पर करना पड़ रहा है। साथ ही, सरकारी एजेंसियों के बजाय, उपज अब निजी खरीदारों द्वारा खरीदी जा रही है।