भारत के शिक्षित युवा किसानों को खेती-किसानी की नौकरी करने ले जा रहा है जापान

Published on: 08-Apr-2023

आज हम आपको इस लेख में बताने जा रहे हैं, भारत से जापान खेतों में नौकरी करने जाने वाले किसानों के बारे में। बतादें, कि निर्मल सिंह रंसवाल इंटर पास करने के बाद जापान पहुँच गए। वह जापान में खेती कर रहे हैं। उत्तराखंड के चंपावत निवासी निर्मल खेती-बाड़ी हेतु जापान जाने वाले एकमात्र भारतीय नहीं हैं। दरअसल, जापान की 20 फीसद से अधिक जनसँख्या बुजुर्ग हो चुकी है। इसी वजह से जापान में खेती किसानी पर संकट मंडरा गया है। यही कारण है, कि जापान के किसान फिलहाल भारत के विभिन्न जगहों से शिक्षित लेबर ले कर जा रहे हैं। इसी संदर्भ में जापान द्वारा भारत सरकार के साथ एक समझौता भी किया गया है। बतादें, कि इस समझौते के अंतर्गत भारत सरकार एक कार्यक्रम चला रही है, जिसमें जापान की आवश्यकताओं के अनुरूप युवाओं को आवश्यक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। विगत वर्ष पहली बार जापान जाने वाले 18 लोगों में निर्मल सिंह भी शम्मिलित हैं। यह सिलसिला इस साल भी चल रहा है।

खेत में कृषि कार्य करते समय पहनते हैं यूनिफॉर्म (Uniform)

अरुणाचल प्रदेश के ईस्ट सियांग के 31 वर्षीय मोनित डोली एक रेस्तरां में नौकरी किया करते थे। मोनित पीजी डिप्लोमा की डिग्री प्राप्त कर चुके हैं। उन्होंने रेस्तरां की नौकरी के चलते साथ में ही परिवार की छोटे से भूमि के भाग पर खेती भी की थी। वर्तमान में वह जापान के नारा शहर में रहा करते हैं। वह प्रातः तीन बजे उठकर खेतों पर चले जाते हैं। मोनित वहां यूनिफॉर्म पहन कर रहते हैं। वह अपने पैरों में बूट एवं हाथों में ग्लव्स पहन कर कार्य करते हैं। कवि लूथरा युवाओं को रोजगार के अवसर प्रदान करने हेतु महाराष्ट्र सरकार के साथ कार्य करने वाली कंसल्टिंग फर्म के एमडी हैं। उनका यह कहना है, कि 'यह सच है कि जापान को पूरी दुनिया से युवाओं की आवश्यकता है। परंतु, आवश्यक कौशल रखने वाले लोगों को ही मौका मिलता है। जापानियों को किसानों के साथ-साथ मृदा परीक्षण करने वाले टेक्निशियन एवं घोड़ों से घोड़ियों को गर्भवती करवाने के कौशल से युक्त लोगों की भी आवश्यकता है।'

भारतीयों को जापान में मिल रहे रोजगार के अवसर

भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2022 तक भारत से 598 युवा खेती करने जापान पहुँच गए थे। इन समस्त युवाओं ने राष्ट्रीय कौशल विकास निगम (NSDC) की ओर से चल रहे टेक्निकल इंटर्न प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत भिन्न-भिन्न तरह के गुर सीखे हुए हैं। इसी संबंध में महाराष्ट्र के कौशल विकास मंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा का कहना है, कि इन 598 फीसद लोगों में 34 को महाराष्ट्र से नौकरी मिल चुकी है। उन्होंने बताया है, कि भारतीय युवाओं के पास खेती-किसानी में रोजगार के अनगिनत अवसर हैं। जापान की खेती-किसानी वाली कंपनियों में कार्य के घंटे, वेतन आदि सब कुछ निर्धारित है। वहां 1.2 लाख येन (करीब 75 हजार रुपये) के तकरीबन मासिक वेतन होता है। इसके अतिरिक्त ओवरटाइम करने का अवसर भी प्राप्त होता है। लूथरा बताते हैं, 'जापान की कंपनियां 10वीं या 12वीं पास किसानों की भर्तियां करती हैं। जिनके पास खेतों में काम करने का अनुभव हो या फिर उन्होंने खेती या बागवानी में कोई डिग्री ले रखी हो।' इतना ही नहीं जापान में ऐसे लोगों को वेतन के अतिरिक्त इंश्योरेंस एवं वाईफाई से युक्त रहने का स्थान भी मुहैय्या कराया जाता है। यही कारण है, कि भारत में मजदूरी करने वाले परिवार अपने बच्चों को जापान भेजना चाह रहे हैं। ये भी पढ़े: इन 8 योजनाओं से बढ़ेगी किसानों की स्किल, सरकार दे रही है मौका

भारतीय युवाओं को खेती करने जापान क्यों लेकर जा रहा है

जापान की काफी जनसँख्या के बुजुर्ग होने का प्रभाव जीडीपी एवं औद्योगिक पैदावार से लेकर वहां के शहरों के क्षेत्रफल एवं पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर तक दिखाई दे रहा है। जापान में फिलहाल 20 प्रतिशत जनसँख्या की आयु 65 साल से भी अधिक है। जो कि विश्व में किसी भी देश के तुलनात्मक बुजुर्गों की औसत आबादी से अधिक है। अनुमान यह है, कि 2030 तक यह ट्रेंड और तेजी पकड़ेगा। तब जापान में प्रत्येक तीसरे आदमी की आयु 65 साल से अधिक होगी। वहीं प्रत्येक पांचवे व्यक्ति की आयु 75 वर्ष से ऊपर की होगी। ऐसी स्थिति में श्रमिकों की नेपाल में मांग काफी हद तक बढ़ने वाली है। अभी के जापानी कंपनियों द्वारा कोयामाकी नाम की एक फसल की कटाई कराने भारत की रिक्रूटमेंट एजेंसियों से संपर्क साधा है। कोयामाकी की यह फसल पहाड़ों के बीच होती है। इस वजह से जापानी कंपनियों को चुस्त-दुरुस्त युवाओं की आवश्यकता पड़ती है, जो युवा पहाड़ों पर चढ़-उतर सकें। हालांकि, जापान में 50 साल की आयु के व्यक्ति भी कोयामाकी को पहाड़ों से उतार लाते हैं।

हरियाणा से सतीश श्रीवास्तव ने बताया जापान में कृषि कार्य का अनुभव

हरियाणा में पलवल के शिव कुमार एवं बैनीगंज के सतीश कुमार श्रीवास्तव उन लोगों में शम्मिलित हैं, जो विगत वर्ष जापान गए। वहां उनका प्रथम सप्ताह थोड़ी कठिनाइयों में गुजरा था। उसके उपरांत तो जीवन के आनंद प्राप्त होने लगे। श्रीवास्तव का कहना है, 'हमारी कंपनी के मालिक भी हमारे साथ काम करते हैं। कोई किसी से ऊंची आवाज में बात नहीं करता है। छोटी-छोटी बात की योजना बनती हैं और मिट्टी को उपजाऊ बनाए रखने के तरीके अपनाए जाते हैं।' एक बार शिव कुमार को लंच ब्रेक के उपरांत कार्य पर वापिस लौटने में एक मिनट की देरी पर ही कॉल आ गई। वो कहते हैं, 'तब से मैं कभी भी लेट नहीं होता हूं। मुझे चिंता हो रही है, कि इतना अनुशासित हो जाने के बाद भारत लौटूंगा तो वहां कैसे सेटल हो पाऊंगा।' शिव कुमार का जापानी कंपनी के साथ कॉन्ट्रैक्ट केवल तीन वर्ष का ही है।

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