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लौकी

लौकी की खेती कैसे की जाती है जानिए सम्पूर्ण जानकारी के बारे में

लौकी की खेती कैसे की जाती है जानिए सम्पूर्ण जानकारी के बारे में

लौकी भारत में सब्जी के रूप में बड़े पैमाने पर उगाई जाती है और इसके फल साल भर उपलब्ध रहते हैं। लौकी नाम फल के बोतल जैसे आकार और अतीत में कंटेनर के रूप में इसके उपयोग के कारण पड़ा। नरम अवस्था में फलों का उपयोग पकी हुई सब्जी के रूप में और मिठाइयाँ बनाने के लिए किया जाता है। परिपक्व फलों के कठोर छिलकों का उपयोग पानी के जग, घरेलू बर्तन, मछली पकड़ने के लिए जाल के रूप में किया जाता है। सब्जी के रूप में यह आसानी से पचने योग्य है। इसकी तासीर ठंडी होती है और कार्डियोटोनिक गुण के कारण मूत्रवर्धक होता है।  लोकि से कई रोग जैसे की कब्ज, रतौंधी और खांसी को नियंत्रित किया जा सकता है। पीलिया के इलाज के लिए पत्ते का काढ़ा बनाकर सेवन किया जाता है। इसके बीजों का उपयोग जलोदर रोग में किया जाता है।  

लौकी की फसल के लिए उपयुक्त जलवायु

लौकी एक सामान्य गर्म मौसम की सब्जी है। खरबूजा और तरबूज की तुलना में लोकि की फसल ठंडी जलवायु को बेहतर सहन करती है। लोकि की फसल पाले को बर्दाश्त नहीं कर सकती। अच्छी जल निकास वाली उपजाऊ गाद दोमट होती है।  यह भी पढ़ें:
लौकी की खेती से संबंधित विस्तृत जानकारी इसकी खेती के लिए गर्म और नम जलवायु अनुकूल होती है। रात का तापमान 18- 22°C और  दिन का तापमान 30-35  इसकी उचित वृद्धि और उच्च फल के लिए इष्टतम होता है। 

खेत की तैयारी     

फसल की बुवाई से पहले खेत को तैयार किया जाता है। खेत को प्लॉव से एक बार गहरी जुताई करके तैयार करें उसके बाद इसके बाद 2 बार हैरो की मदद से खेत को अच्छी तरह से जोते। आखरी जुताई के समय खेत में 4 टन प्रति एकड़ की दर से गोबर की खाद या कम्पोस्ट को अच्छी तरह मिट्टी में मिला दें।             

बीज की बुवाई

यदि आप चाहे तो सीधे बीजो को खेत में लगाकर भी इसकी खेती कर सकते है | इसके लिए आपको तैयार की गयी नालियों में बीजो को लगाना होता है| बीजो की रोपाई से पहले तैयार की गयी नालियों में पानी को लगा देना चाहिए उसके बाद उसमे बीज रोपाई करना चाहिए।  यह भी पढ़ें: जानिए लौकी की उन्नत खेती कैसे करें लौकी की जल्दी और अधिक पैदावार के लिए इसके पौधों को नर्सरी में तैयार कर ले फिर सीधे खेत में लगा दे। पौधों को बुवाई के लगभग 20 से 25 दिन पहले तैयार कर लेना चाहिए। इसके अतिरिक्त बीजो को रोग मुक्त करने के लिए बीज रोपाई से पहले उन्हें गोमूत्र या बाविस्टीन से उपचारित कर लेना चाहिए। इससे बीजो में लगने वाले रोगो का खतरा कम हो जाता है, तथा पैदावार भी अधिक होती है। 

रोपाई का समय और तरीका

बारिश के मौसम में इसकी खेती करने के लिए बीजो की जून के महीने में रोपाई कर देनी चाहिए। इसके अतिरिक्त पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी रोपाई को मार्च या अप्रैल के महीने में करना चाहिए।  समतल भूमि में की गयी लौकी की खेती को किसी सहारे की जरूरत नहीं होती है | ऐसी स्थिति में इसकी बेल जमीन में फैलती है, किन्तु जमीन से ऊपर इसकी खेती करने में इसे सहारे की जरूरत होती है। इसके लिए खेत में 10 फ़ीट की दूरी पर बासो को गाड़कर जल बनाकर तैयार कर लिया जाता है, जिसमे पौधों को चढ़ाया जाता है। इस विधि को अधिकतर बारिश के मौसम में अपनाया जाता है।  

फसल में खरपतवार नियंत्रण  

खरपतवार नियंत्रण करने के लिए फसल में समय समय पर निराई गुड़ाई करते रहे ताकि फसल को खरपतवार मुक्त रखा जा सकें।  यह भी पढ़ें: सही लागत-उत्पादन अनुपात को समझ सब्ज़ी उगाकर कैसे कमाएँ अच्छा मुनाफ़ा, जानें बचत करने की पूरी प्रक्रिया रासायनिक तरीके से खरपतवार पर नियंत्रण के लिए ब्यूटाक्लोर का छिड़काव जमीन में बीज रोपाई से पहले तथा बीज रोपाई के तुरंत बाद करनी चाहिए| खरपतवार के नियंत्रण से पौधे अच्छे से वृद्धि करते है, तथा पैदावार भी अच्छी होती है | 

फसल में उर्वरक और पोषक तत्व प्रबंधन

फसल से उचित उपज प्राप्त करने के लिए 40 किलोग्राम नाइट्रोजन, 15 - 20 किलोग्राम फॉस्फोरस और 20 किलोग्राम पोटाश प्रति एकड़ की दर से खेत में डालें।    

लौकी के प्रमुख रोग और उनका नियंत्रण

  • लौकी (घीया) एक प्रमुख फलीय सब्जी है जो भारतीय खाद्य पदार्थों में आमतौर पर प्रयोग होती है। यह कई प्रमुख रोगों के प्रभावित हो सकती है, जिनमें से कुछ मुख्य हैं:
  • लौकी मोजैक्यूलर वायरस रोग (Luffa Mosaic Virus Disease):
  • इस रोग में पत्तियों पर पीले या हरे रंग के पट्टे दिखाई देते हैं। यह रोग पौधों की वृद्धि और उत्पादन पर असर डालता है।
  • नियंत्रण के लिए, स्वस्थ बीजों का उपयोग करें और बीमार पौधों को नष्ट करें।
  • लौकी मॉसेक वायरस रोग (Luffa Mosaic Virus Disease):
  • इस रोग में पत्तियों पर सफेद या हरे रंग के दाग दिखाई देते हैं। यह पौधों की वृद्धि पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।
  • नियंत्रण के लिए, स्वस्थ बीजों का उपयोग करें और संक्रमित पौधों को नष्ट करें।
  • दाग रोग (Powdery Mildew): यह रोग पात्र प्रभावित करके पौधों पर धूल की तरह सफेद दाग उत्पन्न करता है। इसके नियंत्रण के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाएं:
  • दाग रोग से प्रभावित पौधों को हटाएं और उन्हें जला दें।
  • पौधों की पर्यावरण संगठना को सुधारें, उचित वेंटिलेशन प्रदान करें और पानी की आपूर्ति को नियमित रखें।
  • दाग रोग के लिए केमिकल फंगिसाइड का उपयोग करें, जैसे कि सल्फर युक्त फंगिसाइड।

लौकी के फल की तुड़ाई और पैदावार

फसल की बुवाई और रोपाई के लगभग 50 दिन बाद लौकी उड़ाई के लिए तैयार हो जाती है। जब लौकी सही आकर की दिखने लगे तब उसकी तुड़ाई कर ले। तुड़ाई करते समय किसी धारदार चाकू या दराती का इस्तेमाल करें। लौकी को तोड़ते समय फल के ऊपर थोड़ा सा डंठल छोड़ दें जिससे फल कुछ समय तक फल ताजा रहें। लौकी की तुड़ाई के तुरंत बाद पैक कर बाजार में बेचने के लिए भेज देना चाहिए | फलो की तुड़ाई शाम या सुबह दोनों ही समय की जा सकती है। एक एकड़ भूमि से लगभग 200 क्विंटल का उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। 
नरेंद्र शिवानी किस्म की लौकी की लंबाई जानकर आप दंग रह जाऐंगे

नरेंद्र शिवानी किस्म की लौकी की लंबाई जानकर आप दंग रह जाऐंगे

किसान भाई नरेंद्र शिवानी प्रजाति की लौकी की खेती कर बेहतरीन कमाई कर सकते हैं। लौकी सब्जी के अतिरिक्त मिठाई, रायता, आचार, कोफ्ता, खीर इत्यादि तैयार करने में उपयोग की जाती हैं। इससे विभिन्न प्रकार की औषधियां भी निर्मित होती हैं। लौकी खाने में फायदेमंद होने की वजह से चिकित्सक भी रोगियों को इसका सेवन करने की सलाह देते हैं। इन दिनों उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में स्थित मंगलायतन विश्वविद्यालय के कृषि संकाय की ओर से उगाई गई लौकी आकर्षण का केंद्र बनी है। कारण यह है, कि इसका रंग और स्वाद तो आम लौकी जैसा ही है। परंतु, देखने में यह बिल्कुल अलग है। नरेंद्र शिवानी प्रजाति की लौकी की लंबाई लगभग पांच फीट है। कृषि संकाय के प्राध्यापकों और विद्यार्थियों ने अभी लौकी की इस फसल को बीज प्राप्त करने के लिए तैयार किया है। इस किस्म की फसल की पैदावार से किसान बेहतरीन मुनाफा प्राप्त कर सकते हैं।

लौकी किसानों को जागरुक किया जा रहा है

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. पीके दशोरा का कहना है, कि विश्वविद्यालय में यह लौकी किसानों को जागरूक करने और शुद्ध बीज तैयार करने के लिए उगाई जा रही है। उनका कहना है, कि लौकी एक अनोखी सब्जी है जो औषधि, वाद्ययंत्र, सजावट इत्यादि के रूप में भी इस्तेमाल की जाती है। उन्होंने बताया है, कि विश्वविद्यालय किसानों को जागरूक करने के साथ-साथ उन्हें उन्नत किस्मों से काफी अच्छा लाभ कमाने के लिए प्रशिक्षित करेगा।

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विशेषज्ञों का इस पर क्या कहना है

बतादें, कि कृषि विभाग के अध्यक्ष प्रो. प्रमोद कुमार का कहना है, कि इस लौकी की फसल की बुवाई जुलाई माह में की गई थी। इस किस्म का औसत उत्पादन 700-800 कुंतल प्रति हेक्टेयर है। एक हजार कुंतल प्रति हेक्टेयर तक इसकी पैदावार अर्जित की जा सकती है। इस किस्म का स्वाद एवं पोषक तत्व बाकी प्रजातियों के समान ही होते हैं। इसमें प्रोटीन 0.2 प्रतिशत, वसा 0.1 प्रतिशत, फाइबर 0.8 प्रतिशत, शर्करा 2.5 प्रतिशत, ऊर्जा 12 किलो कैलोरी, नमी 96.1 प्रतिशत है। साथ ही, गोल फलों वाली किस्म नरेंद्र शिशिर भी पैदा की गई है। दिसंबर तक इसका बीज भी तैयार हो जाएगा।

लौकी की खेती कैसे करें

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि इस प्रजाति की लौकी की खेती करने के लिए अच्छे गुणवत्ता वाले लौकी के बीजों का चुनाव करें। लौकी के खेत का चयन करते समय अच्छे स्थान का चयन करें। इसके बीजों को बोने के लिए मार्च-अप्रैल के बीच अच्छे मौसम का चयन करें। लौकी की पौधों के बीच की दूरी 1.5-2.5 मीटर तक होनी चाहिए। पौधों की नियमित रूप से सिंचाई करें।
जानें घर पर लौकी उगाने का आसान तरीका

जानें घर पर लौकी उगाने का आसान तरीका

आज हम आपको इस लेख में जानकारी देंगे कि कैसे आप अपने घर में बेहतरीन और ताजा लौकी उगा सकते हैं। इसके लिए आपको यहां बताई गईं बातों का विशेष ध्यान रखा पड़ेगा। लौकी एक ऐसी हरी सब्जी है, जो खाने में बेहद स्वादिष्ट होती है। साथ कई गुणों से भी भरपूर होती है। जी हां हम लौकी की बात कर रहे हैं। लौकी की सब्जी औषधीय गुणों से भरपूर होती है और सेहत के लिए भी बेहद बढ़िया होती है। आइए जानते हैं आप इसे कैसे आसानी से अपने घर पर ही उगा सकते हैं। किसी भी सब्जी या फल को लगाने के लिए अच्छे बीज का चुनाव करना बहुत महत्वपूर्ण है। इसके लिए आप बीज किसी अन्य जगह से खरीदने की जगह लौकी का सही बीज बीज भंडार से खरीद सकते हैं। बीज भंडार में अच्छी किस्म के बीज आसानी से और कम मूल्य पर उपलब्ध हैं। बीज लगाने से पहले कुछ बातों पर ध्यान देना चाहिए।

बीज का उपचार कैसे करें

अगर बीज सीड की तरह है, तो एक दिन पहले उसे पानी में भिगोकर रख दें, जिस मिट्टी में बीज लगाना है, उसे अच्छे से फोड़कर धूप में रखें। कुछ देर धूप में रखने के बाद, एक मग से खाद मिलाकर अच्छे से मिलाएं। अब इसे गमला में डालें। अगले दिन, बीज को पानी से निकालकर मिट्टी के अंदर 1-2 इंच दबाकर ऊपर से पानी और मिट्टी डाल दें।

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जानिए लौकी की उन्नत खेती कैसे करें

लौकी उत्पादन के दौरान प्रमुख आवश्यक बातें

लौकी उत्पादन के लिए एक इंच की गहराई में लौकी के बीजों को ग्रो बैग या पॉट की मिट्टी में डालें। मिट्टी में बीज बोने के बाद स्प्रे पंप या वॉटर कैन से पानी डालें। बीजों के जर्मिनेट होने तक मिट्टी में पानी डालकर नमी को हमेशा बनाए रखें। लेकिन अधिक पानी नहीं डालें। लौकी के पौधे 18 से 35 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर अच्छी तरह से ग्रो करते हैं। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि 15 डिग्री से कम और 35 डिग्री से अधिक तापमान पर बीजों की अंकुरण दर कम होती है। इसके सीड्स जर्मिनेट होने में 6 से 14 दिन लग सकते हैं। लौकी के बीज को मिट्टी में डालने के बाद बीज को जर्मिनेट होने में 7 से 10 दिन लग सकते हैं। लौकी की उचित देखभाल करने पर 55 से 70 दिन में आपको ताजे फल मिलेंगे। रसोई में खाने के लिए ताजी लौकी को जरूरत के अनुसार तोड़ सकते हैं।
जानिए लौकी की उन्नत खेती कैसे करें

जानिए लौकी की उन्नत खेती कैसे करें

लौकी की खेती करके किसान अपनी दैनिक जरूरतों के लिए रोजाना के हिसाब से आमदनी कर सकता है.लौकी आम से लेकर खास सभी के लिए लाभप्रद है. ताजगी से भरपूर लौकी कद्दूवर्गीय में खास सब्जी है. इससे बहुत तरह के व्यंजन जैसे रायता, कोफ्ता, हलवा व खीर, जूस वगैरह बनाने के लिए भी इस्तेमाल करते हैं. आजकल मोटापा भी एक रोग बनकर उभर रहा है. इसके नियंत्रण के लिए भी लौकी का जूस पीने की सलाह दी जाती है बशर्ते यह पूरी तरह से आर्गेनिक उत्पादन हो. अगर किसी कीटनाशक या इंजेक्शन का प्रयोग करके इसे उगाया गया हो तो ये काफी नुकसान दायक हो जाती है. यह कब्ज को कम करने, पेट को साफ करने, खांसी या बलगम दूर करने में बहुत फायदेमंद है. इस के मुलायम फलों में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट व खनिजलवण के अलावा प्रचुर मात्रा में विटामिन पाए जाते हैं. लौकी की खेती पहाड़ी इलाकों से ले कर दक्षिण भारत के राज्यों तक की जाती है. निर्यात के लिहाज से सब्जियों में लौकी खास है.

लौकी उगाने का सही समय:

लौकी एक
कद्दूवर्गीय सब्जी है. इसकी खेती गांव में किसान कई तरह से करते हैं इसकी खेती अपने घर के प्रयोग के लिए माता और बहनें अपने बिटोड़े और बुर्जी पर लगा कर भी करती हैं. बाकी किसान इसको खेत में भी करते हैं. लौकी की फसल वर्ष में तीन बार उगाई जाती है. जायद, खरीफ और रबी में लौकी की फसल उगाई जाती है। इसकी बुवाई मध्य जनवरी, खरीफ मध्य जून से प्रथम जुलाई तक और रबी सितम्बर अन्त और प्रथम अक्टूबर में लौकी की खेती की जाती है। जायद की अगेती बुवाई के लिए मध्य जनवरी के लगभग लौकी की नर्सरी की जाती है. अगेती बुबाई से किसान भाइयों को अच्छा भाव मिल जाता है. लौकी उगाने का सही समय

मौसम और जलवायु:

इसके बीज को अंकुरित होने के लिए 20 डिग्री के आसपास तापमान की आवश्कयता होती है. बाकी इसके फल लगाने के लिए कोई भी सामान्य मौसम सही रहता है. अगर हम बात करें किसान के बुर्जी या बिटोड़े के फल की तो इसकी बुबाई पहली बारिश के बाद की जाती है जो की जून और जुलाई के महीने में होता है और इस पर फल सर्दियों में लगना शुरू होता है. बाकी इसको सभी सीजन में उगाया जा सकता है. बारिश के मौसम में अगर इसको कीड़ों से बचाना हो तो इसको जाल लगा कर जमीन से 5 फुट के ऊपर कर देना चाहिए. इससे मिटटी की वजह से फल खराब नहीं होते तथा इनका रंग भी चमकदार होता है. ये भी पढ़ें: तोरई की खेती में भरपूर पैसा

मिटटी की गुणवत्ता और खेत की तैयारी:

लौकी की फसल के लिए खेत में पुराणी फसल के जो अवशेष हैं उनको गहरी जुताई करके नीचे दबा देना चाहिए. इससे वो खरपतवार भी नहीं बनेंगें और खाद का भी काम करेंगें.इसको किसी भी तरह की मिटटी में उगाया जा सकता है लेकिन ध्यान रहे इसके खेत में पानी जमा नहीं होना चाहिए इससे इसकी फसल और फल दोनों ही ख़राब होते हैं. खेत से पानी निकासी की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए. और अगर संभव हो तो इसके खेत में गोबर की सड़ी हुई खाद कम से कम 50 से 60 कुंतल की हिसाब से मिला दें. इससे खेत को ज्यादा रासायनिक खाद पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा.इसकी तैयारी करते समय पलेवा के बाद इसकी जुताई ऐसे समय करें जबकि न तो खेत ज्यादा गीला हो और नहीं ज्यादा सूखा जिससे जुताई करते समय इसकी मिटटी भुरभुरी होकर फेल जाये. इसके बात इसमें हल्का पाटा लगा देना चाहिए जिससे की खेत समतल हो जाये और पानी रुकने की संभावना न हो. ये भी पढ़ें: अच्छे मुनाफे को तैयार करें बेलों की पौध

लौकी की कुछ उन्नत किस्में:

सामान्यतः हमारे देश में जिस फसल या सब्जी की किस्म बनाई जाती है वो किसी न किसी कृषि संस्थान द्वारा बनाई जाती है तथा वो संस्थान उस किस्म को अपने संस्थान के नाम से जोड़ देते हैं. जैसे नीचे दिए गए किस्मों के नाम इसी को दर्शाते हैं. नीचे दी गई पैदावार के आंकड़े स्थान, मौसम और जमीन की पैदावार आदि पर निर्भर करते हैं.

कोयम्बटूर‐१:

तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय, कोयंबटूर द्वारा उत्पादित यह किस्म उसी के नाम से भी जानी जाती है .यह जून व दिसम्बर में बोने के लिए उपयुक्त किस्म है, इसकी उपज 280 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है जो लवणीय क्षारीय और सीमांत मृदाओं में उगाने के लिए उपयुक्त होती हैं

अर्का बहार:

यह किस्म खरीफ और जायद दोनों मौसम में उगाने के लिए उपयुक्त है. बीज बोने के 120 दिन बाद फल की तुडाई की जा सकती है. इसकी उपज 400 से 450 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त की जा सकती है.

पूसा समर प्रोलिफिक राउन्ड:

इसको पूसा कृषि संस्थान द्वारा विकसित किया गया है. यह अगेती किस्म है. इसकी बेलों का बढ़वार अधिक और फैलने वाली होती हैं. फल गोल मुलायम /कच्चा होने पर 15 से 18 सेमी. तक के घेरे वाले होतें हैं, जों हल्के हरें रंग के होतें है. बसंत और ग्रीष्म दोंनों ऋतुओं के लिए उपयुक्त हैं.

पंजाब गोल:

इस किस्म के पौधे घनी शाखाओं वाले होते है. और यह अधिक फल देने वाली किस्म है. फल गोल, कोमल, और चमकीलें होंते हैं. इसे बसंत कालीन मौसम में लगा सकतें हैं. इसकी उपज 175 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है.

पुसा समर प्रोलेफिक लाग:

यह किस्म गर्मी और वर्षा दोनों ही मौसम में उगाने के लिए उपयुक्त रहती हैं. इसकी बेल की बढ़वार अच्छी होती हैं, इसमें फल अधिक संख्या में लगतें हैं. इसकी फल 40 से 45 सेंमी. लम्बें तथा 15 से 22 सेमी. घेरे वालें होते हैं, जो हल्के हरें रंग के होतें हैं. उपज 150 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है.

नरेंद्र रश्मि:

यह फैजाबाद में विकसित प्रजाती हैं. प्रति पौधा से औसतन 10‐12 फल प्राप्त होते है. फल बोतलनुमा और सकरी होती हैं, डन्ठल की तरफ गूदा सफेद औैर करीब 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है.

पूसा संदेश:

इसके फलों का औसतन वजन 600 ग्राम होता है एवं दोनों ऋतुओं में बोई जाती हैं. 60‐65 दिनों में फल देना शुरू हो जाता हैं और 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है.

पूसा हाईब्रिड‐३:

फल हरे लंबे एवं सीधे होते है. फल आकर्षक हरे रंग एवं एक किलो वजन के होते है. दोंनों ऋतुओं में इसकी फसल ली जा सकती है. यह संकर किस्म 425 क्ंवटल प्रति हेक्टेयर की उपज देती है. फल 60‐65 दिनों में निकलनें लगतें है.

पूसा नवीन:

यह संकर किस्म है, फल सुडोल आकर्षक हरे रंग के होते है एवं औसतन उपज 400‐450 क्ंवटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है, यह उपयोगी व्यवसायिक किस्म है.

लौकी की फसल में लगने वाले कीड़े :

1 - लाल कीडा (रेड पम्पकिन बीटल):

उपाय: निंदाई गुडाई कर खेत को साफ रखना चाहिए. फसल कटाई के बाद खेतों की गहरी जुताई करना चाहिएए जिससे जमीन में छिपे हुए कीट तथा अण्डे ऊपर आकर सूर्य की गर्मी या चिडियों द्वारा नष्ट हो जायें.सुबह के समय जब ओस हो तब राख का छिड़काव करना चाहिए.

2 - फल मक्खी (फ्रूट फ्लाई):

क्षतिग्रस्त तथा नीचे गिरे हुए फलों को नष्ट कर देना चाहिए.सब्जियों के जो फल भूमी पर बढ़ रहें हो उन्हें समय समय पर पलटते रहना चाहिए.

लोकी में लगने वाले मुख्य रोग:

  • चुर्णी फफूंदी
  • उकठा (म्लानि)
क्यों है मार्च का महीना, सब्जियों का खजाना : पूरा ब्यौरा ( Vegetables to Sow in the Month of March in Hindi)

क्यों है मार्च का महीना, सब्जियों का खजाना : पूरा ब्यौरा ( Vegetables to Sow in the Month of March in Hindi)

मार्च का महीना किसानों के लिए बहुत ही फायदेमंद होता है। किसान इस महीने विभिन्न प्रकार की सब्जियों की बुवाई करते है तथा धन की उच्च दर पर प्राप्ति करते हैं। इस महीने किसान तरह तरह की सब्जियों की बुवाई करते है जैसे: खीरा, ककड़ी, करेला, लौकी, तुरई, पेठा, खरबूजे, तरबूजे, भिंडी, ग्वारफल्ली आदि। मार्च के महीने में बोई जाने वाली सब्जियों की जानकारी:

खीरे की फसल कि पूर्ण जानकारी ( Cucumber crop complete information) in Hindi

खीरे की सब्जियों की टोकरी Cucumber crop खीरे की खेती के लिए खेतों में आपको क्यारियां बनानी होती है। इसकी बुवाई लाइन में ही करें।  लाइन की दूरी 1.5 मीटर रखें और पौधे की दूरी 1 मीटर। बुवाई के बाद 20 से 25 दिन बाद गुड़ाई करना चाहिए। खेत में सफाई रखें और तापमान बढ़ने पर हर सप्ताह हल्की सिंचाई करे, खेत से खरपतवार हटाते रहें।

ककड़ी की फ़सल की पूर्ण जानकारी ( Cucumber crop complete information) in Hindi

ककड़ी सब्जियां की बेल kakdi ki kheti ककड़ी की फसल आप किसी भी उपजाऊ जमीन पर उगा सकते हैं।ककड़ी की बुवाई के लिए मार्च का समय बहुत ही फायदेमंद होता है। या सिर्फ 1 एकड़ भूमि में 1 किलो ग्राम बीज के आधार पर उगना शुरू हो जाती है। खेत को आपको तीन से चार बार जोतना होता है ,उसके बाद आपको खेतों में गोबर की खाद डालनी होती है। ककड़ी की बीजों को किसान 2 मीटर चौड़ी क्यारियों में किनारे किनारे पर लगाते है। इनकी दूरी लगभग 60 सेंटीमीटर होती है।

करेले की फ़सल की पूर्ण जानकारी ( Bitter gourd crop complete information) in Hindi

karele ki kheti करेले की खेती दोमट मिट्टी में की जाती है। करेले को आप दो तरह से बो सकते हैं। पहले बीच से दूसरा पौधों द्वारा ,आपको करेले की खेती के लिए दो से तीन दिन की जरूरत पढ़ती है। इसकी बीच की दूरियों को 2.5 से लेकर 5 मीटर तक की दूरी पर रखना चाहिए।किसान करेले के बीज को बोने से पहले  लगभग 24 घंटा पानी में डूबा कर रखते हैं। ताकि उसके अंकुरण जल्दी से फूट सके। पहली जुताई किसान हल द्वारा करते हैं उसके बाद किसान तीन से चार बार हैरो या कल्टीवेटर द्वारा खेत की जुताई करते हैं।

लौकी की फ़सल की पूर्ण जानकारी ( Gourd crop complete information) in Hindi

lauki ki kheti लौकी की खेती आप हर तरह की मिट्टी में कर सकते हैं लेकिन दोमट मिट्टी इसके लिए बहुत ही उपयोगी है। लौकी की खेती करने से पहले आपको इसके बीज को 24 घंटे पानी में डूबा कर रखना है अंकुरण आने तक, एक हेक्टेयर में आपको 4.5 किलोग्राम बीज की आवश्यकता पड़ती है।

तुरई फसल की पूर्ण जानकारी ( Full details of turai crop) in Hindi

turai ki fasal तोरई की फसल को हल्की दोमट मिट्टी में लगाना चाहिए। किसानों द्वारा प्राप्त जानकारियों से यह पता चला है।कि नदियों के किनारे वाली भूमि पर खेती करना बहुत ही अच्छा होता है। खेती करने से पहले जमीन को अच्छे से जोत लेना चाहिए। पहले हल द्वारा उसके बाद दो से तीन बार हैरो या कल्टीवेटर  से जुताई करना चाहिए। एक हेक्टेयर भूमि में कम से कम 4 से 5 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है।

पेठा फसल की पूर्ण जानकारी( Complete information about Petha crop)

पेठा सब्जियों की बेल Petha crop पेठा यानी कद्दू को दोमट मिट्टी में बोना बहुत ही  फायदेमंद होता है। पेठा की खेती के लिए दो से तीन बार कल्टीवेटर से जुताई करें। मिट्टियों को भुरभुरा बनाएं तथा खेतों की अच्छे ढंग से जुताई करें। एक हेक्टेयर में लगभग 7 से 8 किलोग्राम बीज की आवश्यकता पड़ती है। ये भी पढ़े: छत पर उगाएं सेहतमंद सब्जियां

खरबूजे की फसल (melon crop) in Hindi

melon crop मार्च के महीने में खरबूजा बहुत ही फायदेमंद तथा पसंदीदा फलों में से एक है। किसान इसकी खेती नदी तट पर करते हैं। खेती करने से पहले बालू में एक थाला बनाते हैं और बीज बोने से थोड़ी देर पहले खेत को अपने हल के जरिए जोतते हैं। खरबूजे की फसल बोने के बाद इसकी सिंचाई को कम से कम 2 या 3 दिन बाद से करना शुरू कर देना चाहिए।

तरबूजे की फसल ( watermelon crop) in Hindi

watermelon crop गर्मी में तरबूज को बहुत ही शौक से खाया जाता है।तरबूज में पानी की मात्रा बहुत ही ज्यादा होती है, इसको खाने से आप ताजगी का अनुभव करते हैं। इस फसल में लागत बहुत कम लगती है लेकिन मुनाफा उससे कई गुना होता है। तरबूज की फसल बहुत ही कम समय में उग जाती है, जिससे किसानों को काफी मुनाफा भी मिलता है। लेकिन इस बात का ध्यान रखें ,कि तरबूज में कीट और रोग का प्रकोप काफी बड़ा रहता है। किसानों को चाहिए कि वैज्ञानिकों के मुताबिक तरबूज की फसलों की देखरेख करें। तरबूज की फसलें 75 से 90 दिनों के अंदर पूर्ण रुप से तैयार हो जाती है।

भिंडी की फसल( okra harvest) in Hindi

भिंडी सब्जियां bhindi ki kheti किसान भिंडी की फसल फरवरी से मार्च के दरमियान जोतना शुरू कर देते हैं। भिंडी की खेती हर तरह की मिट्टी में की जाती है। खेती से पूर्व दो तीन बार खेतों की जुताई करें। जिससे मिट्टियों में भुरभुरा पन आ जाए, जमीन को समतल कर दे। खेतों में लगभग 15 से 20 दिन पहले इनकी निराई-गुड़ाई करें। खरपतवार नियंत्रण रहे इसके लिए कई प्रकार का रासायनिक प्रयोग भी किसान करते हैं।

ग्वार फली की फसल( guar pod crop) in Hindi

गुआर सब्जियों की फसल guar ki kheti ग्वार फली किसानों कि आय का बहुत महत्वपूर्ण साधन होता है। किसान ग्वार फली का इस्तेमाल हरी खाद ,हरा चारा ,हरी फली , दानों आदि के लिए करते है। ग्वार फली में प्रोटीन तथा फाइबर का बहुत ही अच्छा स्त्रोत होता है। इनके अच्छे स्त्रोत के कारण इनको पशुओं के चारे के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। जिससे पशुओं को विभिन्न प्रकार के प्रोटीन की प्राप्ति हो सके। किसान ग्वार फली की खेती दो मौसम में करते हैं पहला बहुत गर्मी के मौसम में तथा दूसरा  बारिश के मौसम में। ग्वार फली की बुवाई किसान मार्च के महीने में 15 से लेकर 25 तारीख के बीच खेती करना शुरू कर देते हैं। ग्वार फली की फसलें 60 से 90 दिन के अंदर पूर्ण रूप से तैयार हो जाती है तथा यहां कटाई के लायक़ हो जाती हैं। ग्वार फली में बहुत तरह के पौष्टिक तत्व भी मौजूद होते हैं इनका उपयोग विभिन्न प्रकार की सब्जियों को बनाने तथा सलातो के रूप में किया जाता है। हम उम्मीद करते हैं कि आपको हमारी इस पोस्ट द्वारा मार्च के महीने में उगाई जाने वाली सब्जियों की पूर्ण जानकारी पसंद आई होगी। आपने इन सब्जियों के विभिन्न प्रकार के लाभ को जान लिया होगा। यदि आप हमारी दी गई जानकारी से संतुष्ट हैं तो आप हमारी इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा सोशल मीडिया पर शेयर करें धन्यवाद।
गर्मियों के मौसम में हरी सब्जियों के पौधों की देखभाल कैसे करें (Plant Care in Summer)

गर्मियों के मौसम में हरी सब्जियों के पौधों की देखभाल कैसे करें (Plant Care in Summer)

आज हम बात करेंगे गर्मियों के मौसम में हरी सब्जियों की पैदावार कैसे करते हैं और उनकी देखभाल कैसे करनी चाहिए। ताकि गर्मी के प्रकोप से इन सब्जियों और पौधों को किसी भी प्रकार की हानि ना हो। यदि आप भी अपने पेड़ पौधों और हरी सब्जियों को इन गर्मी के मौसम से बचाना चाहते हैं तो हमारी इस पोस्ट के अंत तक जरूर बने रहे। जैसा कि हम सब जानते हैं गर्मियों का मौसम शुरू हो गया है। सब्जियों के देखभाल और उनको उगाने के लिए मार्च और फरवरी का महीना सबसे अच्छा होता है। बागवानी करने वाले इन महीनों में सब्जी उगाने का कार्य शुरू कर देते हैं। इस मौसम में जो सब्जियां उगती है। उनके बीजों को पौधों या किसी अन्य भूमि पर लगाना शुरू कर देते हैं। गर्मी के मौसम में आप हरी मिर्च, पेठा, लौकी, खीरा ,ककड़ी, भिंडी, तुरई, मक्का, टिंडा बैगन, शिमला मिर्च, फलिया, लोबिया, बरबटी, सेम आदि सब्जियां उगा सकते हैं। यदि आप मार्च, फरवरी में बीज लगा देते हैं तो आपको अप्रैल के आखिरी तक सब्जियों की अच्छी पैदावार प्राप्त हो सकती है। गर्मियों के मौसम में ज्यादातर हरी सब्जियां और बेल वाली सब्जी उगाई जाती हैं। सब्जियों के साथ ही साथ अन्य फलियां, पुदीना धनिया पालक जैसी सब्जियां और साथ ही साथ खरबूज तरबूज जैसे फल भी उगाए जाते हैं।

गर्मियों के मौसम में हरी सब्जियों के पौधों की देखभाल और उगाने की विधि:

गर्मियों के मौसम में हरी सब्जी के पौधों की देखभाल करना बहुत ही आवश्यक होता है। ऐसा करने से पौधे सुरक्षित रहेंगे,उन्हें किसी प्रकार का कोई नुकसान नहीं होगा। यदि आप गर्मियों के मौसम में हरी सब्जियों को उगाना चाहते है, तो आप हरी सब्जी उगाने के लिए इन प्रक्रिया का इस्तेमाल कर सकते हैं यह प्रक्रिया कुछ निम्न प्रकार है;

मक्का

मक्का जो आजकल स्वीट कॉर्न के रूप में लोगों के बीच बहुत ही प्रचलित है।आप इसको घर पर भी लगा सकते हैं। मक्का उगाने के लिए आपको कुछ मक्के के दाने लेने हैं उन्हें रात भर पानी में भिगोकर रखना है और फिर उन्हें किसी प्रकार के साफ कपड़े से बांधकर रख देना है। आप को कम से कम 2 दिन के बाद जब उनके छोटे-छोटे अंकुरित आ जाए , तब उन्हें किसी  क्यारी या मिट्टी की भूमि पर लगा देना है। मक्के का पौधा लगाने के लिए आपको अच्छी गहराई को नापना होगा। मिट्टी में आपको खाद ,नीम खली, रेत मिट्टी मिलानी होगी। खाद तैयार करने के बाद दूरी को बराबर रखते हुए, आपको बीज को मिट्टी में बोना होगा। मक्के के बीज केवल एक हफ्ते में ही अंकुरित होने लगते हैं।

मक्के के पौधे की देखभाल के लिए:

मक्के के पौधों की देखभाल के लिए पोलीनेशन  बहुत अच्छा होना चाहिए। कंकड़ वाली हवाओं से पौधों की सुरक्षा करनी होगी। 2 महीने पूर्ण हो जाने के बाद मक्का आना शुरू हो जाते हैं। इन मक्के के पौधों को आप 70 से 75 दिनों के अंतराल में तोड़ सकते हैं।

टिंडे के पौधे की देखभाल:

टिंडे की देखभाल के लिए आपको इनको धूप में रखना होगा। टिंडे लगाने के लिए काफी गहरी भूमि की खुदाई की आवश्यकता होती है।इनकी बीज को आप सीधा भी बो  सकते हैं।इनको कम से कम आप दो हफ्तों के भीतर गमले में भी लगा सकते हैं। टिंडे को आपको लगातार पानी देते रहना है। इनको प्रतिदिन धूप में रखना अनिवार्य है जब यह टिंडे अपना आकार 6 इंच लंबा कर ले , तो आपको इनमें खाद या पोषक तत्व को डालना होगा। कम से कम 70 दिनों के भीतर आप टिंडों  को तोड़ सकते हैं

फ्रेंच बीन्स पौधे की देखभाल

फ्रेंच बीन्स पौधे की देखभाल के लिए अच्छी धूप तथा पर्याप्त मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। जिससे पौधों की अच्छी सिंचाई और उनकी उच्च कोटि से देखभाल हो सके।

फ्रेंच बींस के पौधे लगाने के लिए आपको इनकी  बीज को कम से कम रात भर पानी में भिगोकर रखना चाहिए। फ्रेंच बींस के पौधे एक हफ्ते में तैयार हो जाते। 2 हफ्ते के अंतराल के बाद आप इन पौधों को गमले या अन्य बगीचा या भूमि में लगा सकते हैं। मिट्टी  खाद ,रेत और नीम खली जैसे खादों का उपयोग इनकी उत्पादकता के लिए इस्तेमाल कर सकते है।फलियां लगभग ढाई महीनों के बाद तोड़ने लायक हो जाती है।

भिंडी के पौधों की देखभाल

भिंडी के पौधों की देखभाल के लिए पौधों में नमी की बहुत ही आवश्यकता होती है। ऐसी स्थिति में आप को पर्याप्त मात्रा में पानी और धूप दोनों का उचित ध्यान रखना होगा। भिंडी के पौधों के लिए सामान्य प्रकार की खाद की आवश्यकता होती है। भिंडी के बीज को बराबर दूरी पर बोया जाता है भिंडी के अंकुर 1 हफ्तों के बीज अंकुरित हो जाते हैं। पौधों के लिए पोषक तत्वों की भी काफी आवश्यकता होती है। पानी के साथ पोषक तत्व का भी पूर्ण ख्याल रखना होता है। भिंडी के पौधे 6 इंच होने के बाद हल्की-हल्की मिट्टियों के  पत्तो  को हटाकर इनकी जड़ों में उपयुक्त खाद  या गोबर की खाद को डालें। भिंडी के पौधों में आप तरल खाद का भी इस्तेमाल कर सकते हैं , ढाई महीने के बाद पौधों में भिंडी आना शुरू हो जाएंगे।

गर्मियों के मौसम में हरी मिर्च के पौधों की देखभाल

भारत में सबसे लोकप्रिय मसाला कहे जाने वाली मिर्च ,और सबसे तीखी मिर्च गर्मियों के मौसम में उगाई जाती है। बीमारियों के संपर्क से बचने के लिए तीखी हरी मिर्च बहुत ही अति संवेदनशील होती है। इन को बड़े ही आसानी से रोपण कर बोया या अन्य जगह पर उगाया जा सकता है। इन पौधों के बीच की दूरी लगभग 35 से 45 सेंटीमीटर होने चाहिए। और गहराई मिट्टी में कम से कम 1 से 2 इंच सेंटीमीटर की होनी चाहिए , इन दूरियों के आधार पर मिर्च के पौधों की बुवाई की जाती है। 6 से 8 दिन के भीतर  इन बीजों में अंकुरण आना शुरू हो जाते हैं। हरी मिर्ची के पौधे 2/3 हफ्तों में पूरी तरह से तैयार हो जाते हैं।

लौकी गर्मी की फसल है;

लौकी गर्मियों के मौसम में उगाई जाने वाली सब्जी है। लौकी एक बेल कहीं जाने वाले सब्जी है, लौकी में बहुत सारे पौष्टिक तत्व मौजूद होते हैं। लौकी को आप साल के 12 महीनों में खा सकते हैं।लौकी के बीज को आप मिट्टी में बिना किसी अन्य देखरेख के सीधा बो सकते हैं। गहराई प्राप्त कर लौकी के बीजों को आप 3 एक साथ बुवाई कर सकते हैं। यह बीज  6 से 8 दिन के भीतर अंकुरण हो जाते है। लौकी की फसल के लिए मिट्टियों का तापमान लगभग 20 और 25 सेल्सियस के उपरांत होना जरूरी है।

गोभी

गर्मियों के मौसम में गोभी बहुत ही फायदेमंद सब्जियों में से एक होती है।और इसकी देखरेख करना भी जरूरी होता हैं।गर्मियों के मौसम में गोभी की सब्जी आपके पाचन तंत्र में बेहद मददगार साबित होती है ,तथा इसमें मौजूद पोषक तत्व आप को कब्ज जैसी शिकायत से भी राहत पहुंचाते हैं। गोभी फाइबर वह पोषक तत्वों से पूर्ण रूप से भरपूर होते हैं।

पालक के पौधों की देखभाल

पालक की जड़ें बहुत छोटी होती है और इस वजह से यह बहुत ज्यादा जमीन के नीचे नहीं जा पाती हैं। इस कारण पालक की अच्छी पैदावार के लिए इसमें ज्यादा मात्रा की सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। पालक के पौधों की देखभाल करने के लिए किसानों को पालक के पौधों की मिट्टी को नम रखना चाहिए। ताकि पालक की उत्पादकता ज्यादा हो।

गर्मियों के मौसम में हरी सब्जियों के पौधों की देखभाल : करेले के पौधे की देखभाल

गर्मी के मौसम में करेले के पौधों को सिंचाई की बहुत ही आवश्यकता पड़ती है। इसीलिए इसकी सिंचाई का खास ख्याल रखना चाहिए। हालांकि सर्दी और बारिश के मौसम में इसे पानी या अन्य सिंचाई की ज्यादा आवश्यकता नहीं पड़ती है। गर्मी के मौसम में करेले के पौधों को 5 दिन के अंदर पानी देना शुरू कर देना चाहिए।

बीज रोपण करने के बाद करेले के पौधों को छायादार जगह पर रखना आवश्यक होगा, पानी का छिड़काव करते रहना है ,ताकि मिट्टी में नमी बनी रहे। 5 से 10 दिन के भीतर बीज उगना  शुरू हो जाती हैं ,आपको करेले के पौधों को हल्की धूप में रखना चाहिए।

शिमला मिर्च के पौधों की देखभाल

शिमला मिर्च के पौधे की देखभाल के लिए उनको समय-समय पर विभिन्न प्रकार के कीट, फंगल या अन्य संक्रमण से बचाव के लिए उचित दवाओं का छिड़काव करते रहना चाहिए। फसल बोने के बाद आप 40 से 50 दिनों के बाद शिमला मिर्ची की फसल की तोड़ाई कर सकते हैं। पौधों में समय-समय पर नियमित रूप से पानी डालते रहें। बीज के अंकुरित होने तक आप पौधों को ज्यादा धूप ना दिखाएं। शिमला मिर्च के पौधों की खेती भारत के विभिन्न विभिन्न हिस्सों में खूब की जाती है। क्योंकि यह बहुत ही फायदेमंद होता है साथ ही साथ लोग इसे बड़े चाव के साथ खाते हैं।

चौलाई के पौधों की देखभाल :

चौलाई की खेती गर्मियों के मौसम में की जाती है।शीतोष्ण और समशीतोष्ण दोनों तरह की जलवायु में चौलाई का उत्पादन होता है।

चौलाई की खेती ठंडी के मौसम में नहीं की जाती ,क्योंकि चौलाई अच्छी तरह से नहीं  उगती ठंडी के मौसम में। चौलाई लगभग 20 से 25 डिग्री के तापमान उगना शुरू हो जाती है और अंकुरित फूटना शुरू हो जाते हैं।

गर्मियों के मौसम में हरी सब्जियों के पौधों की देखभाल : सहजन का साग के पौधों की देखभाल

सहजन का साग बहुत ही फायदेमंद होता है इसके हर भाग का आप इस्तेमाल कर सकते हैं। और इसका इस्तेमाल करना उचित होता है।सहजन के पत्ते खाने के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं, तथा सहजन की जड़ों से विभिन्न विभिन्न प्रकार की औषधि बनती है। सहजन के पत्ते कटने के बाद भी इसमें  प्रोटीन मौजूद होता है। सभी प्रकार के आवश्यक तत्व जैसे एंटीऑक्सीडेंट्स, खनिज,अमीनो एसिड, विटामिंस उचित मात्रा में पाए जाते हैं।

टमाटर गर्मियों के मौसम में

सब्जियों की पैदावार के साथ-साथ गर्मी के मौसम में टमाटर भी शामिल है।टमाटर खुले आसमान के नीचे धूप में अच्छी तरह से उगता है। टमाटर के पौधों के लिए 6 से 8 घंटे की धूप काफी होती है इसकी उत्पादकता के लिए।

टमाटर की बीज को आप साल किसी भी महीने में बोया जा सकते हैं।डायरेक्ट मेथर्ड या फिर ट्रांसप्लांट मेथर्ड द्वारा भी टमाटर की फसल को उगाया जा सकता है। टमाटर की फसल को खासतौर की देखभाल की आवश्यकता होती है। टमाटर की बीजों को अंकुरित होने के लिए लगभग 18 से 27 सेल्सियस डिग्री की आवश्यकता होती है। 80 से 100 दिन के अंदर आपको अच्छी मात्रा में टमाटर की फसल की प्राप्ति होगी। टमाटर के पौधों की दूरी लगभग 45 से 60 सेंटीमीटर की होनी चाहिए। 


दोस्तों हमने अपनी  इस पोस्ट में गर्मियों के मौसम में हरी सब्जियों और उनकी देखभाल किस प्रकार करते हैं। सभी प्रकार की पूर्ण जानकारी अपनी इस पोस्ट में दी है और उम्मीद करते हैं ,कि आपको हमारी या पोस्ट पसंद  आएगी।यदि आप हमारी इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा अपने दोस्तों और सोशल मीडिया पर शेयर करे। हम और अन्य टॉपिक पर आपको अच्छी अच्छी जानकारी देने की पूरी कोशिश करेंगे।

Kharif Tips: बारिश में घर-बागान-खेत में उगाएं ये फसल-साग-सब्जी, यूं करें बचत व आय में बढ़ोतरी

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इसे प्रकृति का मानसून ऑफर समझिये और अपने घर, बगिया, खेत में लगाएं मानसून की वो फसल साग-सब्जी, जिनसे न केवल घरेलू खर्च में हो कटौती, बल्कि खेत में लगाने से सुनिश्चित हो सके आय में बढ़ोतरी। लेकिन यह जान लीजिये, ऐसा सिर्फ सही समय पर सही निर्णय, चुनाव और कुशल मेहनत से संभव है। घर की रसोई, छत की बात करें, इससे पहले जान लेते हैं मानसून की फसल यानी खरीफ क्रॉप में मुख्य फसलों के बारे में। खरीफ की यदि कोई मुख्य फसल है तो वह है धान

धान के उन्नत परंपरागत बीज मुफ्त प्रदान करने वाले केंद्र के बारे में जानिये

(Paddy Farming: किसानों को इस फार्म से मुफ्त में मिलते हैं पांरपरिक धान के दुर्लभ बीज) जबलपुर निवासी, अनुभवी एवं प्रगतिशील युवा किसान ऋषिकेश मिश्रा बताते हैं कि, बारिश के सीजन में धान की रोपाई के लिए अनुकूल समय, बीज, रोपण के तरीके के साथ ही सिंचन के विकल्पों का होना जरूरी है।

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धान (dhaan) के लिए जरूरी टिप्स (Tips for Paddy)

खरीफ क्रॉप टिप्स (Kharif Crop Tips) की बात करें, तो वे बताते हैं कि शुरुआत में ही सारी जानकारी जुटा लें, जैसे खेत में ट्रैक्टर, नलकूप आदि के साथ ही कटाई आदि के लिए पूर्व से मजदूरों को जुटाना, लाभ हासिल करने का बेहतर तरीका है। समय पर डीएपी, यूरिया, सुपर फास्फेट, जिंक, पोटास आदि का प्रयोग लाभ कारी है। धान की प्रजाति की किस्म का चुनाव भी बहुत सावधानी से करना चाहिए।

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खरीफ कटाई का वक्त

जून-जुलाई में बोने के बाद, अक्टूबर के आसपास काटी जाने वाली फसलें खरीफ सीजन की फसलें कही जाती हैं। जिनको बोते समय अधिक तापमान और आर्द्रता के अलावा परिपक़्व होने, यानी पकते समय शुष्क वातावरण की जरूरत होती है।

घर और खेत के लिए सब्जियों के विकल्प

खरीफ की प्रमुख सब्जियों की बात करें तो भिंडी, टिंडा, तोरई/गिलकी, करेला, खीरा, लौकी, कद्दू, ग्वार फली, चौला फली के साथ ही घीया इसमें शामिल हैं। इन बेलदार सब्जियों के पौधे घर की रसोई, दीवार से लेकर छत पर लगाकर महंगी सब्जियां खरीदने के खर्च में कटौती करने के साथ ही सेहत का ख्याल रखा जा सकता है।

ये भी पढ़ें: बारिश में लगाएंगे यह सब्जियां तो होगा तगड़ा उत्पादन, मिलेगा दमदार मुनाफा वहीं किसान खेत के छोटे हिस्से में भिंडी, तोरई, कद्दू, करेला, खीरा, लौकी, के साथ ही फलीदार सब्जियों जैसे ग्वार फली लगाकर एक से सवा माह की इन सब्जियों से बेहतर रिटर्न हासिल कर सकते हैं।

साग-सब्जी टिप्स

घर में पानी की बोतल, छोटे मिट्टी, प्लास्टिक, धातु के बर्तनों में मिट्टी के जरिये जहां इन सब्जियों की बेलों को आकार दिया जा सकता है, वहीं खेत में मिश्रित खेती के तरीके से थोड़े, थोड़े अंतर पर रसोई के लिए अनिवार्य धनिया, अदरक जैसी जरूरी चीजें भी उगा सकते हैं। घरेलू उपयोग का धनिया तो इन दिनों घरों में भी लगाना एक तरह से नया ट्रेंड बनता जा रहा है।
बढ़ती गर्मी ने सब्जी की कीमतों में लगाई आग, लोगों की रसोई का बजट खराब

बढ़ती गर्मी ने सब्जी की कीमतों में लगाई आग, लोगों की रसोई का बजट खराब

आजकल बढ़ते तापमान और गर्मी का प्रभाव बाजार में मंडियों में देखने को मिल रहा है। बतादें, कि सब्जियां 30 प्रतिशत तक महंगी हो चुकी हैं। जनता पूर्व में जहां कम खर्चे में अपने सब्जी के झोले को पूरा भर लाती थी। फिलहाल, कीमतों को देखते हुए आधा-पाव किलो ही सब्जी खरीदने पर सिमट गई है। भारत में तापमान में उछाल आने की वजह से गर्मी भी काफी बढ़ती जा रही है। अगर हम गर्मी की बात करें तो पारा 40 डिग्री सेल्सियस के समीप पहुंच चुका है। आगामी दिनों में गर्मी के और ज्यादा बढ़ने की संभावना है। दरअसल, इस गर्मी का प्रकोप सब्जियों की कीमतों पर भी देखने को मिल रहा है। इसी कड़ी में उत्तर की मंडी परिषद से जुड़े पदाधिकारियों ने बताया है, कि प्रति वर्ष गर्मी का प्रभाव सब्जियों की कीमतों पर पड़ता दिखाई दे रहा है। इस बार भी कुछ ऐसी स्थितियां होती जा रही हैं। गर्मी ज्यादा पड़ने पर आगामी दिनों में सब्जी काफी अधिक महंगी हो सकती है।

आखिर कितने प्रतिशत सब्जी की कीमत बढ़ी है

आजकल गर्मी ने अपना प्रभाव दिखाना चालू कर दिया है। जनता गर्मी से राहत पाने के लिए एसी, पंखा और कूलर आदि का सहारा ली रही है। साथ ही, बाजार में भी गर्मी का प्रभाव देखने को मिल रहा है। मीडिया खबरों के अनुसार, कोलकाता और उसके समीपवर्ती जनपदों में गर्मी की वजह से सब्जियां महंगी हो रही हैं। इसके चलते उत्तर प्रदेश में बुलंदशहर फल व सब्जी आढ़ती संघ के अध्यक्ष खुशी राम लोधी ने कहा है, कि कीमतों में 20 से 30 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है। अगर गर्मी और ज्यादा बढ़ती है तो निश्चित रूप से कीमत और ज्यादा बढ़ जाएंगी। कीमतों को नियंत्रण में लाने के लिए वर्षा होनी काफी आवश्यक है।

सब्जी के उत्पादन में कमी से कीमतों में इजाफा

सब्जी की कीमतों में वृद्धि की प्रमुख वजह सब्जियों की कम होना बताया जा रहा है। कृषि बाजार के विशेषज्ञों ने बताया है, कि गर्मी की वजह से सब्जी उत्पादकता में गिरावट आई है। जिस वजह से बाजार की मंडियों में काफी कम सब्जी पहुंच रही है। मीडिया खबरों के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में परगना जनपद में बनगांव के समीप गोपालनगर में बाजार विगत वर्ष इस अवधि में प्रति दिन औसतन 100-125 ट्रक परवल आ रही थी। परंतु, फिलहाल केवल 45 ट्रक आ रहे हैं। छोटे बाजारों की भी स्थिति बिगड़ गई है।

करेला, लौकी, तोरई, कद्दू की भी कीमतों में इजाफा

बाजार में समस्त सब्जियों की कीमत में काफी वृद्धि देखने को मिल रही है। रिटेल बाजार में वही सब्जी जो 20 से 50 रुपये प्रति किलो बिका करती थी। फिलहाल, वह 50 से 100 रुपये प्रति किलो तक पहुँच गई है। करेला 80 से 90 रुपये प्रति किलो, बैंग 60 से 70 रुपये प्रति किलो, कच्चा 50 से 60 रुपये प्रति किलो, कददू 40 से 50 रुपये किलो, लोकी 40 से 50 रुपये प्रति किलो, तोरई 60 से 70 रुपये प्रति किलो, परवल 80 से 90 रुपये प्रति किलोग्राम तक विक्रय किया जा रहा है।
लौकी की खेती से संबंधित विस्तृत जानकारी

लौकी की खेती से संबंधित विस्तृत जानकारी

लौकी की खेती मुख्यतः रबी, खरीफ व जायद तीनों सीजन में की जाने वाली बागवानी फसल है। लौकी को घिया और दूधी के नाम से भी जाना जाता है। लौकी की खेती भारत के तकरीबन समस्त राज्यों में की जाती है। लौकी की फसल समलत खेत, पेड़-पौधे, मचान निर्मित कर व घर की छतों पर बड़ी ही सहजता से की जा सकती है। आगे हम आपको लौकी की खेती के विषय में जानकारी देने वाले हैं।

लौकी की खेती

अगर हम हरी सब्जियों की बात करें तो लौकी का नाम सबसे पहले आता है। यह लोगों के शरीर के लिए काफी फायदेमंद होती है। लौकी के अंदर विटमिन बी, सी, आयरन, मैग्नीशियम, पोटैशियम एवं सोडियम आदि भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इसका उपयोग मधुमेह, वजन कम करने, पाचन क्रिया, कोलेस्ट्रॉल को काबू में करने एवं नेचुरल ग्लो के लिए लौकी काफी ज्यादा लाभदायक होती है।

लौकी की खेती की विस्तृत जानकारी

  • लौकी की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु
  • लौकी की खेती के लिए गर्म व आर्द्र जलवायु अच्छी मानी जाती है।
  • बीज अंकुरण के लिए लगभग 30 से 35 डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान होना चाहिए।
  • पौधों के विकास के लिए 32 से 38 डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान उपयुक्त होता है।


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लौकी की खेती के लिए भूमि कैसी होनी चाहिए

लौकी की खेती जीवांश युक्त जल धारण क्षमता वाली बलुई दोमट भूमि सबसे उपयुक्त मानी जाती है। लौकी की खेती कुछ अम्लीय भुमि के अंतर्गत भी की जा सकती है। लौकी की फसल के लिए 6.0 से 7.0 पीएच वाली मृदा सबसे अच्छी मानी जाती है। खेत से जल निकासी की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।

लौकी की खेती के लिए भूमि की तैयारी कैसे करें

  • लौकी की खेती के लिए भूमि की तैयारी करने के दौरान 8 से 10 टन गोबर की खाद एवं 2.5 किलोग्राम ट्रिकोडेर्मा प्रति एकड़ की दर से खेत में डालें।
  • खाद डालने के उपरांत खेत की बेहतर ढ़ंग से गहरी जुताई कर पलेवा कर दें।
  • पलेवा करने के 7 से 8 दिन उपरांत 1 बार गहरी जुताई करदें।
  • इसके उपरांत कल्टीवेटर से 2 बार आडी-तिरछी गहरी जुताई कर पाटा कर खेत को समतल कर लें।

लौकी की बिजाई हेतु समुचित समय

  • खरीफ (वर्षाकालीन) में बुआई का समय- 1 जून से 31 जुलाई के मध्य फसल अवधि- 45 से 120 दिन है
  • जायद (ग्रीष्मकालीन) में बुआई का समय- 10 जनवरी से 31 मार्च के मध्य फसल अवधि- 45 से 120 दिन है
  • रबी के लिए बुआई का समय- सितंम्बर-अक्टूबर

लौकी की प्रजातियां

काशी गंगा

  • काशी गंगा किस्म की लौकी की बढ़वार मध्यम होती है।
  • इसके तने में गाठें काफी हद तक पास-पास होती है।
  • इस किस्म की लौकी का वजन तकरीबन 800 से 900 ग्राम होता है।
  • इस प्रजाति को आप गर्मियों में 50 एवं बरसात में 55 दिनों के समयांतराल पर तोड़ सकते हैं।
  • इस किस्म से लगभग 44 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादन लिया जा सकता है।

काशी बहार

  • इस किस्म की लौकी 30 से 32 सेंटीमीटर लंबी एवं 7-8 सेंटीमीटर व्यास होती है।
  • काशी बहार लौकी का वजन लगभग 780 से 850 ग्राम के मध्य होती है।
  • इस किस्म से 52 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादन लिया जा सकता है।
  • इस किस्म को गर्मी एवं बरसात दोनों मौसम हेतु अनुकूल मानी जाती है।


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पूसा नवीन

  • पूसा नवीन प्रजाति बेलनाकार की होती है।
  • इस किस्म की लौकी का वजन तकरीबन 550 ग्राम तक होता है।
  • इस किस्म से 35 से 40 टन प्रति हेक्टेयर की पैदावार अर्जित की जा सकती है।

अर्का बहार

  • इस किस्म की लौकी मध्यम आकार एवं सीधी होती है।
  • इस किस्म की लौकी का वजन लगभग एक किलोग्राम तक होता है।

पूसा संदेश

  • इस किस्म का फल बिल्कुल गोलाकार होता है।
  • इस प्रजाति की लौकी का वजन लगभग 600 ग्राम तक होता है।
  • पूसा संदेश गर्मी में 60 से 65 दिन तो वहीं बरसात में 55 से 60 दिन में तैयार हो जाती है।
  • इस किस्म से 32 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादन अर्जित किया जा सकता है।

पूसा कोमल

  • लौकी की यह किस्म 70 दिनों में पककर तैयार हो जाती है
  • पूसा कोमल किस्म लंबे आकार की होती है।
  • इस किस्म से 450 से 500 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन लिया जा सकता है।

नरेंद्र रश्मि

  • नरेंद्र रश्मि किस्म की लौकी का वजन लगभग 1 किलोग्राम होता है।
  • इसके फल छोटे एवं हल्के हरे रंग के होते हैं।
  • नरेंद्र रश्मि से 30 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादन लिया जा सकता है।

लौकी की खेती हेतु बीज की मात्रा

लौकी की 1 एकड़ फसल उगाने के लिए 1 से 1.5 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है।

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बीज उपचार

हाइब्रिड बीज कम्पनियों द्वारा उपचारित करके बाजार में भेजते हैं, तो इसको उपचारित करने की जरुरत नहीं पड़ती है। इसकी सीधे बिजाई की जाती है। यदि आपने लौकी का बीज घर पर बनाया है, तो उसको उपचारित करना जरूरी है। लौकी के बीज की बिजाई से पूर्व 2 ग्राम कार्बोनडाज़िम / किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर लें।

लौकी की बुआई का तरीका

  • लौकी की बिजाई के दौरान पौधे से पौधे की दूरी 60 सेमी।
  • पंक्ति से पंक्ति का फासला 150 से 180 सेमी रखें।
  • लौकी के बीज की 1 से 2 सेमी की गहराई पर बिजाई करें।

लौकी की खेती मे उर्वरक व खाद प्रबंधन

  • लौकी की फसल के लिए खेत तैयार करने के दौरान खेत में 8 से 10 टन गोबर की खाद और 2.5 किलोग्राम ट्रिकोडेर्मा प्रति एकड़ की दर से खेत में डालनी चाहिए।
  • लौकी की बिजाई के दौरान 50 किलोग्राम डी ऐ पी ( DAP ), 25 किलोग्राम यूरिया ( Urea ), 50 किलोग्राम पोटाश ( Potash ), 8 किलोग्राम जायम, 10 किलोग्राम कार्बोफुरान प्रति एकड़ के हिसाब से खेत में डालें।
  • लौकी की बिजाई के 20 से 25 दिनों उपरांत 10 ग्राम NPK 19 : 19:19 को 1 लीटर पानी मैं घोलकर प्रति एकड़ के हिसाब से फसल पर छिड़काव करें।
  • लौकी की बिजाई के 40 से 45 दिन बाद 50 किलोग्राम यूरिया को प्रति एकड़ के हिसाब से इस्तेमाल करें।
  • लौकी की बिजाई के 50 से 60 दिन पर 10 ग्राम NPK 0:52:34 एवं 2 मिली टाटा बहार को 1 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ के मुताबिक इस्तेमाल करें।

लौकी की खेती मे सिंचाई

  • जायद की फसल हेतु 8-10 दिनों के समयांतराल पर सिंचाई करें।
  • खरीफ फसल में सिंचाई बारिश के अनुरूप की जाती है, वर्षा न होने की हालत में सिंचाई।
  • खेत की नमी के मुताबिक रबी की फसल में 10 से 15 दिन की समयावधि पर सिंचाई करें।

लौकी की फसल को प्रभावित करने वाले कीड़े

लाल कीडा : पौधो पर दो पत्तियां निकलने के उपरांत इस कीट का प्रकोप चालू हो जाता है। यह कीट पत्तियों व फूलों को खा कर फसल को बर्बाद कर देता है। यह कीट लाल रंग व इल्ली हल्के पीले रंग की होती है। इस कीट का सिर भूरे रंग का होता है।

लाल कीड़ा की रोकथाम कैसे करें

  • खेत की नराई/गुड़ाई करके खेत को साफ सुथरा रखें।
  • फसल कटाई के उपरांत खेत की गहरी जुताई करनी चाहिए, जिससे मृदा में छिपे कीट और उनके अण्डे ऊपर पहुँच कर सूर्य की गर्मी अथवा चिडियों द्वारा खत्म कर दिए जायेंगे।
  • कार्बोफ्यूरान 3 प्रतिशत दानेदार 7 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से पौधे से 3 से 4 सेमी. फासले से डालकर खेत में पानी लगाए।
  • कीटों की संख्या अधिक होने पर डायेक्लोरवास 76 ई.सी. 300 मि.ली. प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करें।

फल मक्खी

प्रौढ़ फल मक्खी घरेलू मक्खी के आकार की लाल भूरे अथवा पीले भूरे रंग की होती है। इसके सिर पर काले अथवा सफेद धब्बे मौजूद होते हैं। इस कीट की मादा फलों को भेदकर भीतर अण्डे देती है। अण्डे से निकलने वाली इल्लियां फलों के गूदे को खा जाती हैं, जिसकी वजह से फल काफी सड़ने लग जाता है। बरसात में की जाने वाली फसल पर इस कीट का प्रकोप ज्यादा होता है।

फल मक्खी की रोकथाम किस प्रकार की जाती है

  • खराब और नीचे गिरे हुए फलों को अतिशीघ्र नष्ट कर देना चाहिए।
  • जो फल भूमि के संपर्क में आते हैं। उनको समयानुसार पलटते रहना चाहिए।
  • इसके प्रकोप से फसल का संरक्षण करने के लिए 50 मीली, मैलाथियान 50 ई.सी. एवं 500 ग्राम शीरा अथवा गुड को 50 लीटर पानी में मिश्रित कर छिड़काव करें। एक सप्ताह के उपरांत फिर से छिड़काव करें।

लौकी के मुख्य रोग

चुर्णी फफूंदी

यह रोग फफूंद के कारण फसल पर आता है। सफेद दाग एवं गोलाकार जाल सा पत्तियों एवं तने पर नजर आता है। जो कि बाद मे बढ़कर कत्थई रंग में तब्दील हो जाता है। इसके रोग के प्रकोप से पौधों की पत्तियां पीली पड़कर सूख जाती हैं। इसके प्रकोप से पौधों का विकास बाधित हो जाता है।

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चुर्णी फफूंद रोग की रोकथाम ऐसे करें

  • रोगी पौधे को उखाड़ कर मृदा में दबा दें अथवा उनको आग लगाकर जला दें।
  • फसल को इस प्रकोप से बचाने हेतु घुलनशील गंधक जैसे कैराथेन 2 प्रतिशत अथवा सल्फेक्स की 0.3 प्रतिशत रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखाई पड़ते ही कवकनाशी दवाइयों का इस्तेमाल 10‐15 दिन के अंतराल पर करना चाहिए।

उकठा (म्लानि)

इस रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियाँ मुरझाके नीचे की तरफ लटक जाती हैं एवं पत्तियाँ के किनारे बिल्कुल झुलस जातें हैं। इस रोग से बचाव के लिए फसल चक्र अपनाना अति आवश्यक होता है। बीज को वेनलेट अथवा बाविस्टिन 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार करना चाहिए।

लौकी की तुड़ाई एवं पैदावार

लौकी की तुड़ाई उनकी किस्मों पर आधारित होती हैं। लौकी के फलों को पूरी तरह से विकसित होने पर कोमल अवस्था में ही तोड़ लेना चाहिए। बुवाई के 45 से 60 दिनों के पश्चात लौकी की तुड़ाई चालू हो जाती है। प्रति हेक्टेयर जून‐जुलाई एवं जनवरी‐मार्च वाली फसलों में क्रमश 200 से 250 क्विंटल एवं 100 से 150 क्विंटल उत्पादन लिया जा सकता है।
कंटोला एक औषधीय गुणों से भरपूर सब्जी है, इसके सेवन से कई सारे रोग दूर भाग जाते हैं

कंटोला एक औषधीय गुणों से भरपूर सब्जी है, इसके सेवन से कई सारे रोग दूर भाग जाते हैं

आज हम इस लेख में कंटोला नामक बागवानी फसल के विषय में बात करेंगे। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि कंटोला के अंदर भरपूर मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है। इसमें मौजूद फाइटोकेमिकल्स और एंटीऑक्सीडेंट हमारे शरीर को स्वस्थ व सेहतमंद रखते हैं। हमारे शरीर के बेहतरीन स्वास्थ्य के लिए अच्छे पोषक तत्वों की काफी जरूरत होती है। इसके लिए हमें कई तरह की सब्जियों का सेवन करना चाहिए, जो हमारे शरीर में पोषक तत्वों की कमी को पूरा करें। साथ ही, हमें बाकी बीमारियों से भी दूर रखें। ऐसी स्थिति में आज हम आपको एक बेहद ही फायदेमंद सब्जी कंटोला के संबंध में बताने जा रहे हैं, जो आयुर्वेद में एक ताकतवर औषधि के तौर पर मशहूर है। इस सब्जी के अंदर मांस से 40 गुना अधिक प्रोटीन विघमान होता है। इस सब्जी में उपस्थित फाइटोकेमिकल्स हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को काफी बढ़ाता है। इसकी खेती विशेष रूप से भारत के पहाड़ी हिस्सों में की जाती है। भारत में इसे अन्य लोकल नाम कंकोड़ा, कटोला, परोपा एवं खेख्सा के नाम से जाना जाता है।

कंटोला की फसल हेतु खेत की तैयारी

कंटोला की खेती के लिए बलुई दोमट मृदा काफी अच्छी होती है। आप खेत की जुताई के बाद इसपर कम से कम 2 से 3 बार पाटा जरुर चला दें. इसकी बेहतर पैदावार के लिए खेत में समय-समय पर गोबर की खाद मिला कर जैविक तरीके से खाद देते रहें। किसी भी फसल की बेहतरीन उपज के लिए खेत की तैयारी काफी अहम भूमिका अदा करती है।

कंटोला की बुआई कब की जाती है

कंटोला एक खरीफ के समय में उत्पादित की जाने वाली फसल है। गर्मी के समय में मैदानी इलाकों में जनवरी और फरवरी महीने के अंतर्गत उगाई जाती है। साथ ही, खरीफ की फसल की जुलाई-अगस्त में बुवाई की जाती है। इसके बीजों को, कंद अथवा कटिंग के जरिए से लगाया जाता है।

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कंटोला की कटाई कब की जाती है

कंटोला के फल का बड़े आकार में होने पर ही इसकी कटाई की जाती है। इन फलों की मुलायम अवस्था में दो से तीन दिनों की समयावधि पर नियमित तुड़ाई करना फायदेमंद होता है। कंटोला की खेती करना किसानों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकता है।

कंटोला में कौन कौन से औषधीय गुण विघमान हैं

कंटोला अपने औषधीय गुणों की वजह से जाना जाता है। यह हमारे शरीर की पाचन शक्ति को बढ़ाता है। इसमें उपस्थित रासायनिक यौगिक मानव शरीर के लिए फायदेमंद होते हैं। यह शरीर के ब्लड शुगर लेवल, त्वचा में दरार एवं आंखों के बेहतरीन स्वास्थ्य के लिए सहायक साबित होता है। यह किडनी में होने वाली पथरी को भी दूर करता है। साथ ही, बवासीर के मरीजों के लिए भी लाभदायक होता है।
लौकी की इस किस्म ने बदली किसान की तकदीर

लौकी की इस किस्म ने बदली किसान की तकदीर

लौकी की नरेंद्र शिवानी किस्म को आचार्य नरेंद्र कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कुमारगंज अयोध्या के निर्वतमान प्रोफेसर डॉक्टर शिवपूजन सिंह द्वारा विकसित किया गया है। लौकी की इस किस्म की लंबाई डेढ़ से दो मीटर और वजन दो किलो तक होता है। किसान अपने खेत में विभिन्न प्रकार की शानदार उन्नत किस्मों की सब्जियों की खेती करते हैं। ताकि वह उसको बाजार में बेचकर बेहतरीन कमाई कर सकें। यदि आप अपने खेत में सब्जियों की खेती करने के बारे में विचार कर रहे हैं, तो आपके लिए लौकी की सब्जी काफी अच्छा विकल्प साबित हो सकती है। इसी कड़ी में आज हम आपके लिए लौकी की एक ऐसी शानदार उन्नत किस्म की जानकारी लेकर आए हैं, जो लौकी की समस्त किस्मों से अलग है। जिस प्रजाति के बारे में हम बात कर रहे हैं, उस किस्म का नाम नरेंद्र शिवानी लौकी है। लौकी की यह प्रजाति डेढ़ से दो मीटर लंबाई वाली वहीं इसका वजन एक से दो किलो तक होता है। लौकी की इस किस्म ने भारत के कई किसानों की तकदीर को बदला है। ऐसे ही एक किसान जिया हक जो अपने खेत में लौकी की उन्नत किस्म नरेंद्र शिवानी की खेती करते हैं।

लौकी की नरेंद्र शिवानी किस्म के बारे में जानकारी

लौकी की इस शानदार किस्म को आचार्य नरेंद्र कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कुमारगंज अयोध्या के निर्वतमान प्रोफेसर डॉक्टर शिवपूजन सिंह द्वारा तैयार किया गया है। इस प्रजाति की लौकी की लंबाई डेढ़ से दो मीटर तक होती है। साथ ही, इसके फल का कुल वजन एक से दो किलो तक होता है। बतादें, कि इस किस्म की बुवाई करने के लिए जुलाई का महीना सबसे उपयुक्त होता है। यदि किसान इसका मचान विधि से उत्पादन करते हैं, तो वह इससे काफी अधिक पैदावार हांसिल कर सकते हैं।

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लौकी की नरेंद्र शिवानी किस्म ने किसान को किया मालामाल

उत्तर प्रदेश के जनपद बहराइच, ब्लाक चितौरा के निवासी प्रगतिशील किसान जिया हक ने अपने खेत में लौकी की नरेंद्र शिवानी किस्म की खेती की एवं वर्तमान में वह इससे बेहतरीन उत्पादन पा रहे हैं। इसके साथ ही बाजार में भी उन्हें इस किस्म की लौकी का शानदार भाव मिल रहा है। किसान जिया हक का कहना है, कि वह अपने खेत में केवल लौकी की नरेंद्र शिवानी किस्म की खेती के साथ वह नरेंद्र हल्दी-2 का भी पैदावार कर रहे हैं। उनका कहना है, कि इन दोनों ही फसलों से किसान को काफी शानदार लाभ मिलेगा। क्योंकि, यह उत्पादन एवं शुद्धता के मामले में बाकी फसलों से अधिक लाभ देती हैं।