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केंद्र सरकार ने इस खरपतवार नाशी केमिकल के आयात पर लगाया बैन

केंद्र सरकार ने इस खरपतवार नाशी केमिकल के आयात पर लगाया बैन

भारत सरकार की तरफ से कम कीमत वाले 'ग्लूफोसिनेट टेक्निकल' के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है। भारत भर में यह निर्णय 25 जनवरी, 2024 से ही लागू कर दिया गया है। बतादें, कि 'ग्लूफोसिनेट टेक्निकल' का उपयोग खेतों में खरपतवार को हटाने के मकसद से किया जाता है। यहां जानें ग्लूफोसिनेट टेक्निकल पर रोक लगाने के पीछे की वजह के बारे में। 

भारत के कृषक अपने खेत की फसल से शानदार उत्पादन हांसिल करने के लिए विभिन्न प्रकार के केमिकल/रासायनिक खादों/ Chemical Fertilizers का उपयोग करते हैं, जिससे फसल की उपज तो काफी अच्छी होती है। परंतु, इसके उपयोग से खेत को बेहद ज्यादा हानि पहुंचती है। इसके साथ-साथ केमिकल से निर्मित की गई फसल के फल भी खाने में स्वादिष्ट नहीं लगते हैं। कृषकों के द्वारा पौधों का शानदार विकास और बेहतरीन उत्पादन के लिए 'ग्लूफोसिनेट टेक्निकल' का उपयोग किया जाता है। वर्तमान में भारत सरकार ने ग्लूफोसिनेट टेक्निकल नाम के इस रसायन पर प्रतिबंध लगा दिया है। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि सरकार ने हाल ही में सस्ते मूल्य पर मिलने वाले खरपतवारनाशक ग्लूफोसिनेट टेक्निकल के आयात पर रोक लगा दी है। आंकलन यह है, कि सरकार ने यह फैसला घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से किया है।

ग्लूफोसिनेट टेक्निकल का इस्तेमाल किस के लिए किया जाता है 

किसान ग्लूफोसिनेट टेक्निकल का उपयोग खेतों से हानिकारक खरपतवार को नष्ट करने या हटाने के लिए करते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ किसान इसका इस्तेमाल पौधों के शानदार विकास में भी करते हैं। ताकि फसल से ज्यादा से ज्यादा मात्रा में उत्पादन हांसिल कर वह इससे काफी शानदार कमाई कर सकें। 

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ग्लूफोसिनेट टेक्निकल केमिकल का आयात प्रतिबंधित 

ग्लूफोसिनेट टेक्निकल केमिकल पर प्रतिबंध का आदेश 25 जनवरी, 2024 से ही देश भर में लागू कर दिया गया है। ग्लूफोसिनेट टेक्निकल केमिकल पर प्रतिबंध को लेकर विदेश व्यापार महानिदेशालय का कहना है, कि ग्लूफोसिनेट टेक्निकल के आयात पर प्रतिबंध मुक्त से निषेध श्रेणी में किया गया है।

उन्होंने यह भी कहा है, कि यदि इस पर लागत, बीमा, माल ढुलाई मूल्य 1,289 रुपये प्रति किलोग्राम से ज्यादा होता है, तो ग्लूफोसिनेट टेक्निकल का आयात पूर्व की भांति ही रहेगा। परंतु, इसकी कीमत काफी कम होने की वजह से इसके आयात को भारत में प्रतिबंधित किया गया है। 

थनैला रोग को रोकने का एक मात्र उपाय टीटासूल लिक्विड स्प्रे किट (Teatasule Liquid (Spray Kit))

थनैला रोग को रोकने का एक मात्र उपाय टीटासूल लिक्विड स्प्रे किट (Teatasule Liquid (Spray Kit))

डेयरी कैटल अर्थात दुधारू पशु, डेयरी उद्योग या पशुपालन की रीढ़ होती है, लेकिन इन पशुओं में आए दिन कई तरह के रोग होने का खतरा बना रहता है. इसमे सबसे अधिक खतरा थनैला रोग (Thanaila Rog) से होता है, जिसको लेकर पशुपालक हमेशा परेशान रहते हैं. थनैला रोग केवल पशुओं को ही बीमार नहीं करता बल्कि, पशुपालकों को भी आर्थिक रूप से बीमार कर देता है. पशु के थन में सूजन, थान (अयन) का गरम होना एवं थान का रंग हल्का लाल होना आदि थनैला रोग की प्रमुख पहचान है. थनैला रोग का संक्रमण जब बढ़ जाता है तो दूध निकलने का रास्ता सिकुड़ कर पतला और बारीक हो जाता है, जिससे दूध निकलने में परेशानी होती है. साथ ही दूध का फट के आना, मवाद आना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं.

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क्यों होता है दुधारु पशुओं में थनैला रोग ?

दुधारू पशुओं को थनैला रोग थनों में चोट लगने, थन पर गोबर के लगने, मूत्र अथवा कीचड़ के संक्रमण होने से होता है. वहीं दूध दुहते समय साफ-सफाई पर ध्यान नहीं देने से और पशु बाड़े की नियमित रूप से साफ-सफाई न करने से भी यह संक्रमण होता है. ज्ञात हो कि जब मौसम में नमी अधिक होती है या वर्षाकाल का मौसम होता है, तब इस रोग का प्रकोप और भी बढ़ जाता है.

थनैला रोग की रोकथाम के उपाय

दुधारू पशुओं में थनैला रोग के लक्षण दिखाई देने पर तुरंत निकट के पशु चिकित्सालय या पशु चिकित्सक से परामर्श करनी चाहिए. थनैला रोग में होम्योपैथिक पशु दवाई भी बहुत कारगर है.

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होम्योपैथिक पशु दवाई की प्रमुख कंपनी गोयल वेट फार्मा प्राइवेट लिमिटेड ने पशुओं में बढ़ते थनैला रोग के संक्रमण को रोकने के लिए टीटासूल लिक्विड स्प्रे किट का निर्माण किया है जो बेहद असरदार है. टीटासूल लिक्विड स्प्रे किट - (Teatasule Liquid (Spray Kit)) थनेला रोग के उपचार के लिए बेहतरीन व कारगर होम्योपैथिक पशु औषधि माना जाता है. यह मादा पशुओं के थनैला रोग के सभी अवस्था के लिए असरदार होम्योपैथिक दवाई है. यह दूध के गुलाबी, दूध में खून के थक्के, दूध में मवाद के कारण पीलापन, दूध फटना, पानी जैसा दूध होना तथा थान का पत्थर जैसा सख़्त होना जैसे स्थिति में बहुत प्रभावी है.

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टीटासूल लिक्विड स्प्रे कैसे किया जाता है इस्तेमाल

टीटासूल के एक पैक में टीटासूल नंबर -1 तथा टीटासूल नंबर-2 की 30 मिली स्प्रे बोतल होती है, जिसे रोगग्रस्त पशुओं को सुबह और शाम, दिए गए निर्देशों के अनुसार देना होता है या पशु चिकित्सक के सलाह के अनुसार देना चाहिए.

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• थन की सूजन व थनैला रोग में एंटीबायोटिक या इंजेक्शन या दवाओं से ज्यादा आराम टीटासूल होम्योपैथिक दवा देता है. • जब एंटीबायोटिक दवायें काम नहीं करती हैं तब भी टीटासूल आराम देता है • थनों की सूजन पुरानी पड़ने लगे और थनों के तनु कठोर हो जाये तो टीटासूल थनों के कड़ेपन को दूर करता है और दुग्ध ग्रंथियों को कार्यशील बनाता है. • थनों के कड़ेपन को व थनों में चिराव आदि को भी टीटासूल ठीक करता है. • दुग्ध ग्रंथियों में दुग्ध के बहाव को नियमित कर कार्यशील बनाने में टीटासूल सहायक होता है.
नैनो डीएपी के व्यवसायिक प्रयोग को मंजूरी, जल्द मिलेगा लाभ

नैनो डीएपी के व्यवसायिक प्रयोग को मंजूरी, जल्द मिलेगा लाभ

खेती में उर्वरकों का इस्तेमाल बेहद बढ़ चुका है. जिस कम करने के लिए नैनो फर्टिलाइजर्स बनाये जा रहे हैं. कुछ समय पहले ही सरकार की तरफ से नैनो यूरिया को मंजूरी दी गयी थी. लेकिन अब इफको के नैनो डीएपी फर्टिलाइजर को अब कमर्शियल रिलीज के लिए मंजूरी दे दी है. सरकार के इस फैसले से डीएपी फर्टिलाइजर किसानों को ना सिर्फ कम कीमत में मिलेगा बल्कि हम मात्रा में फसल की पैदावार भी ज्यादा होगी. अब तक डीएपी की 50 किलो उर्वरक की बोरी की कीमत करब 4 हजार रुपये थी, जो सरकारी सब्सिडी लगने के बाद 13 सौ 50 रुएये में दी जा रही थी.  लेकिन सरकार के फैसले के बाद 50 किलो की बोरी को एक 5 सौ एमएल की बोतल में नैनो डीएपी लिक्विड फर्टिलाइजर के रूप में दिया जाएगी. इसकी कीमत सिर्फ 6 सौ रुपये होगी. हालांकि इस पूरे मामले में अभी सरकार की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इसे व्यवसायिक इस्तेमाल को मंजूरी मिल चुकी है. जिस वजह से खेती और किसानी लागत को कम करने में काफी मदद मिलेगी. इसके अलावा जो सब्सिडी सरकार की ओर से भुगतान की जाएगी, उसमें भी काफी कमी आएगी.

सरकार को सब्सिडी बचाने में मिलेगी मदद

किसानों के लिए कीमतों में इस्तेमाल में काफी सुविधाजंक साबित हो सकता है. जिससे सरकार को अच्छी खासी मात्रा में सब्सिडी बचाने में मदद मिलेगी. इसके अलावा नैनो डीएपी को लिक्विड यूरिया भी कहा जाता है. जो आमतौर पर यूरिया से एकदम अलग और दानेदार होती है. इसे इफको और कोरोमंडल इंटरनेशन ने मिलकर बनाया है. ये भी देखें: जाने क्या है नैनो डीएपी फर्टिलाइजर और किन फसलों पर किया जा रहा है ट्रायल?

इन उर्वरकों पर भी ध्यान

नैनो डीएपी के बाद अब सरकार जल्फ़ इफको नैनो पोटाश, नैनो जिंक और नैनो कॉपर जैसे उर्वरकों पर भी ध्यान देगी. इतना ही नहीं वो जल्द ही इन उर्वरकों को लॉन्च भी कर सकती है. बता दें इफको ने साल 2021 जून के महीने में पारम्परिक यूरिया के ऑप्शन में नैनो यूरिया को लिक्विड रूप में लॉन्च किया था. इतना ही नहीं नैनो यूरिया का उत्पादन बढे, इसके लिए मैनुफेक्चरिंग प्लांट भी बनाए गये थे. रिपोर्ट्स के मुताबिक कई देशों में नैनो यूरिया के सैम्पल भेज दिए हैं, जहां ब्राजील ने इफको नैनो यूरिया लिक्विड फर्टिलाइज को पास करके मंजूरी दे दी है.

होगी सरकार की बचत

खेती और किसानी में उर्वरकों का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है. जिसका असर मिट्टी की उर्वरता पर पड़ रहा है. इस तरह की समस्या से नैनो उर्वरक निपटने में मदद करेंगे. इससे उर्वरकों के आयात पर निर्भरता भी कम हो जाएगी और सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी नहीं पड़ेगा. नैनो यूरिया के इस्तेमाल की बात की जाए तो इसके फायदों के बारे में खुद उर्वरक मंत्री ने भी बताया था. उनके अनुसार किसानों को वाजिब दामों में उर्वरकों की उपलब्धता करवाई जाएगी. वहीं इफको द्वारा बनाया गया प्रोडक्ट सरकारी सब्सिडी के बिना भी कई गुना सस्ता है. इससे किसानों को बड़ी बचत होने का अनुमान लगाया जा रहा है.
फायदे का सौदा है मूंग की खेती, जानिए बुवाई करने का सही तरीका

फायदे का सौदा है मूंग की खेती, जानिए बुवाई करने का सही तरीका

दलहनी फसलों में मूंग की खेती अपना एक अलग ही स्थान रखती है. मूंग की फसल को जायद सीजन में बोया जाता है. अगर किसान फायदे का सौदा चाहते हैं, तो इस सीजन में बूंग की फसल की बुवाई कर सकते हैं. मार्च से लेकर अप्रैल के महीने में खेत खुदाई और सरसों की कटाई के बाद खाली हो जाते हैं. जिसके बाद मूंग की बुवाई की जाती है. एमपी में मूंग जायद के अलावा रबी और खरीफ तीनों सीजन में उगाई जाति है. यह कम समय में पकने वाली ख़ास दलहनी फसलों में से एक है. मूंग प्रोटीन से भरपूर होती है. जो सेहत के लिए काफी फायदेमंद होती है. इतना ही नहीं यह फसल खेत और मिट्टी के लिए भी काफी फायदेमंद मानी जाती है. मूंग की खेती जिस मिट्टी में की जाती है, उस मिट्टी की उर्वराशक्ति बढ़ जाती है. मूंग की सबसे बड़ी खासियत यह है कि, इसकी फलियों की तुड़ाई के बाद खेत में हल से फसल को पलटकर मिट्टी में दबा दिया जाए, तो यह खाद का काम करने लगती है. अगर अच्छे ढंग से मूंग की खेती की जाए तो, किसान इससे काफी अच्छी कमाई कर सकते हैं.

पोषक तत्वों से भरपूर मूंग

जैसा की हम सबको पता है कि मूंग में प्रोटीन की भरपूर मात्रा होती है. लेकिन इसमें अन्य पोषक तत्व जैसे पोटैशियम, मैंग्निशियम, कॉपर, जिंक और कई तरह के विटामिन्स भी मिलते हैं. अगर इस दाल का सेवन किया जाए तो, इससे शरीर में पोषक तत्वों की कमी को पूरा किया जा सकता है. अगर किसी मरीज को इस दाल का पानी दिया जाए तो, इससे स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं से राहत दिलाई जा सकती है. इसके अलावा मूंग दाल डेंगू से भी बचाने में मदद करती है. ये भी देखें: विश्व दलहन दिवस, जानें दालों से जुड़ी खास बातें

इन जगहों पर होती है खेती

भारत के आलवा रूस, मध्य अमेरिका, फ़्रांस, इटली और बेल्जियम में मूंग की खेती की जाती है. भारत के राज्यों में इसके सबसे ज्यादा उत्पान की बात करें तो, यूपी, बिहार, कर्नाटक, केरल और पहाड़ी क्षेत्रों में किया जाता है.

क्या है मूंग की उन्नत किस्में

मूंग के दाने का इस्तेमाल दाल के रूप में किया जाता है. मूंग की लिए करीब 8 किलोग्राम नत्रजन 20 किलोग्राम स्फुट, 8 किलोग्राम पोटाश और 8 किलो गंधक प्रति एकड़ बुवाई के समय इस्तेमाल करना चाहिए. इसके अलावा मूंग की फसल के उन्नत किस्मों का चयन का चुनाव उनकी खासियत के आधार पर किया जाना चाहिए.
  • टाम्बे जवाहर नाम की किस्म का उत्पादन जायद और खरीफ सीजन के लिए अच्छा माना जाता है. इसकी फलियां गुच्छों में होती है. जिसमें 8 से 11 दानें होते हैं.
  • जवाहर मूंग 721 नाम की किस्म तीनों सीजन के लिए उपयुक्त होती है. इसके पौधे की ऊंचाई लगभग 53 से 65 सेंटीमीटर होती है. इसमें 3 से 5 फलियां गुच्छों में होती है. जिसमें 10 से 12 फली होती है.
  • के 851 नाम की किस्म की बुवाई के लिए जायद और खरीफ का सीजन उपयुक्त होता है. 60 से 65 सेंटीमीटर तक इसके पौधे की लंबाई होती है. एक पौधे में 50 से 60 फलियां होती हैं. एक फली में 10 से 12 दाने होते हैं. इस किस्म की मूंग दाल के दाने चमकीले हरे और बड़े होते हैं.
  • एमयूएम 1 नाम की किस्म गर्मी और खरीफ दोनों सीजन के लिए अच्छी होती है. इसके पौधों का आकार मीडियम होता है. एक पौधे में लगभग 40 से 55 फलियां होती हैं. जिसकी एक फली में 8 से 12 दाने होते हैं.
  • पीडीएम 11 नाम की किस्म जायद और खरीफ दोनों सीजन के लिए उपयुक्त होती है. इसके पौधे का आकार भी मध्यम होता है. इसके पौधे में तीन से चार डालियां होती हैं. इसकी पकी हुई फली का आकार छोटा होता है.
  • पूसा विशाल नाम की किस्म के पौधे मध्यम आकार के होते हैं. इसकी फलियों का साइज़ ज्यादा होता है. इसके दाने का रंग हल्का हरा और चमकीला होता है.
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कैसे करें जमीन तैयार?

खेत को समतल बनाने के लिए दो या तीन बार हल चलाना चाहिए. इससे खेत अच्छी तरह तैयार हो जाता है. मूंग की फसल में दीमग ना लगे, इसलिए इसे बचने के लिए क्लोरोपायरीफ़ॉस पाउडर 20 किलो प्रति हेक्टेयर के हिसाब से मिट्टी में मिला लेना चाहिए. इसके अलावा खेत में नमी लंबे समय तक बनी रहे इसके लिए आखिरी जुताई में लेवलर लगाना बेहद जरूरी है.

कितनी हो बीजों की मात्रा?

जायद के सीजन में मूंग की अच्छी फसल के लिए बीजों की मात्रा के बारे में जान लेना बेहद जरूरी है. इस सीजन में प्रति एकड़ बीज की मात्रा 20 से 25 किलोग्राम तक होनी चाहिए. इसके बीजोपचार की बात करें तो उसमें 3 ग्राम थायरम फफूंदनाशक दवा से प्रति किलो बीजों के हिसाब से मिलाने से बीज, भूमि और फसल तीनों ही बीमारियों से सुरक्षित रहती है.

फसल की बुवाई का क्या है सही समय?

मूंग की फसल की बुवाई खरीफ और जायद दोनों ही सीजन में अलग अलग समय पर की जाती है. बार खरीफ के सीजन में बुवाई की करें तो, जून के आखिरी हफ्ते से लेकर जुलाई के आखिरी हफ्ते तक इसकी बुवाई करनी चाहिए. वहीं जायद के सीजन में इस फसल की बुवाई मार्च के पहले गते से लेकर अप्रैल के दूसरे हफ्ते तक बुवाई करनी चाहिए.

क्या है बुवाई का सही तरीका?

मून की बुवाई कतारों में करनी चाहिए. जिसमें सीडड्रिल की मदद ली जा सकती है. कतारों के बीच की दूरी कम से कम 30 से 45 सेंटीमीटर तक और 3 से 5 सेंटीमीटर की गहराई में बीज की बुवाई होनी चाहिए. अगर एक पौधे की दूरी दूसरे पौधे की दूरी से 10 सेंटीमीटर पर है, तो यह अच्छा माना जाता है. ये भी देखें: गेंहू की बुवाई का यह तरीका बढ़ा सकता है, किसानों का उत्पादन और मुनाफा

कैसी हो खाद और उर्वरक?

मूंग की फसल के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले खाद और उर्वरकों का इस्तेमाल करने से पहले मिट्टी को चेक कर लेना जरूरी है. इसमें कम से कम 5 से 12 टन तक कम्पोस्ट खाद या गोबर की खाद का इस्तेमाल किया जाना चाहिए. इसके अलावा मून की फसल के लिए 20 किलो नाइट्रोज और 50 किलो स्फुर का इस्तेमाल बीजों की बुवाई के समय करें. वहीं जिस क्षेत्र में पोटाश और गंधक की कमी है वहां 20 किलो प्रति हेक्टेयर के हिसाब से पोटाश और गंधक देना फायदेमंद होता है.

कैसे करें खरपतवार नियंत्रण?

पहली निराई बुवाई के 25 से 30 दिनों के अंदर और दूसरी 35 से 40 दिनों में करनी चाहिए. मूंग की फसल की बुवाई के एक या फिर दो दिनों के बाद पेंडीमेथलीनकी की 3 लीटर मात्रा आधे लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करें. जब फसल एक महीने की हो जाए तो उसकी गुड़ाई कर दें.

कैसे करें रोग और कीट नियंत्रण?

  • फसल को दीमग से बचाने के लिए बुवाई से पहले खेत में जुताई के वक्त क्यूनालफोस या क्लोरोपैरिफ़ॉस पाउडर की 25 किलो तक की मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिला लें.
  • फसल की पत्तियों में अगर पीलापन नजर आए तो यह पीलिया रोग का संकेत होता है. इससे बचाव के लिए गंधक के तेज़ाब का छिड़काव करना अच्छा होता है.
  • कातरा नाम का कीट पौधों को शुरूआती अवस्था में काटकर बर्बाद कर देता है. इससे बचाव के लिए क्यूनालफोस 1.5 फीसद पाउडर की कम से 20 से 25 किलो मात्रा प्रति हेक्टेयर के हिसाब से भुरक देनी चाहिए.
  • फसलों को तना झुलसा रोग से बचाने के लिए दो ग्राम मैकोजेब से प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचार करके बुवाई की जानी चाहिए. बीजों की बुवाई के एक महीने बाद दो किलो मैकोजेब प्रति हेक्टेयर की दर से कम से कम 5 सौ लीटर पानी घोलकर स्प्रे करना चाहिए.
  • फसलों को फली छेदक से बचाने के लिए मोनोक्रोटोफास कम से कम आधा लीटर 20 से 25 किलो प्रति हेक्टेयर के हिसाब से स्प्रे करना चाहिए.

कब सिंचाई की जरूरत?

मूंग की फसल को सिंचाई की जरूरत नहीं होती लेकिन लेकिन जायद के सीजन में फसल को 10 से 12 दिनों के अंतराल में कम से कम 5 बार सिंचाई की जरूरत होती है. मूंग की फसलों की सिंचाई के लिए उन्नत तकनीकों की मदद ली जा सकती है.

कैसे करें कटाई?

मूंग की फलियों का रंग जब हरे से भूरा होने लगे तब फलियों की कटाई करनी चाहिए. बाकी की बची हुई फसल को मिट्टी में जुताई करने से हरी खाद की जरूरत पूरी हो जाती है. अगर फलियां ज्यादा पक जाएंगी तो उनकी तुड़ाई करने पर उनके चटकने का डर रहता है. जिसकी वजह से फसल का उत्पादन कम होता है. मूंग की फसल के बीज का भंडारण करने के लिए उन्हें अच्छे से सुखा लेना चाहिए. बीज में 10 फीसद से ज्यादा नमी नहीं होनी चाहिए. अगर आप भी इन बातों का ख्याल रखते हुए मूंग की फसल की बुवाई करेंगे तो, यह आपके लिए फायदे का सौदा हो सकता है.
नैनो DAP किसान भाइयों के लिए अब 600 रुपए में उपलब्ध, जानें यह कैसे तैयार होता है

नैनो DAP किसान भाइयों के लिए अब 600 रुपए में उपलब्ध, जानें यह कैसे तैयार होता है

कृषकों के लिए एक खुशखबरी है। दरअसल, अब से भारत के समस्त किसानों को इफको की Nano DAP कम भाव पर मिलेगी। किसानों को अपनी फसलों से बेहतरीन पैदावार पाने के लिए विभिन्न प्रकार के कार्यों को करना होता है। उन्हीं में से एक खाद व उर्वरक देने का भी कार्य शम्मिलित है। फसलों के लिए डीएपी (DAP) खाद काफी ज्यादा लाभकारी माना जाता है। भारतीय बाजार में किसानों के बजट के अनुरूप ही DAP खाद मौजूद होती है। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि दुनिया का पहला नैनो डीएपी तरल उर्वरक गृह एवं सहकारिता मंत्री द्वारा राष्ट्र को समर्पित किया गया। केंद्रीय आवास और सहकारिता मंत्री ने नई दिल्ली में इफको (IFFCO) के मुख्यालय में इफको के नैनो डीएपी तरल (Nano Liquid DAP) उर्वरकों को राष्ट्र की सेवा के लिए समर्पित किया। एफसीओ के अंतर्गत इंगित इफको नैनो डीएपी तरल शीघ्र ही किसानों के लिए मौजूद होगा। अगर एक नजरिए से देखें तो यह पौधे के विकास के लिए एक प्रभावी समाधान है। खबरों के अनुसार, यह 'आत्मनिर्भर कृषि' के पारंपरिक डीएपी से सस्ता है। डीएपी का एक बैग 7350 है, जबकि नैनो डीएपी तरल की एक बोतल केवल 600 रुपये में उपलब्ध है।

जानें DAP का उपयोग और इसका उद्देश्य क्या है

यह इस्तेमाल करने के लिए जैविक तौर पर सुरक्षित है और इसका उद्देश्य मिट्टी, जल एवं वायु प्रदूषण को कम करना है। इससे डीएपी आयात पर कमी आएगी। साथ ही, रसद और गोदामों से घर की लागत में काफी गिरावट देखने को मिलेगी। बतादें, कि तरल उर्वरक दुनिया के पहले नैनो डीएपी (Nano DAP), इफको द्वारा जारी किया गया था। नैनो डीएपी उर्वरक का उत्पादन गुजरात के कलोल, कांडा एवं ओडिशा के पारादीप में पहले ही चालू हो चुका है। इस साल नैनो डीएपी तरल की 5 करोड़ बोतलों का उत्पादन करने का लक्ष्य है, जो सामान्य डीएपी के 25 लाख टन के बराबर है। वित्त वर्ष 2025-26 तक यह उत्पादन 18 करोड़ होने की आशा है। ये भी पढ़े: दिन दूना रात चौगुना उत्पादन, किसानों को नैनो तकनीक से मिल रहा फायदा

नैनो DAP तरल नाइट्रोजन का एक बेहतरीन स्रोत माना जाता है

नैनो डीएपी तरल नाइट्रोजन का एक बेहतरीन स्रोत माना जाता है। साथ ही, यह फास्फोरस व पौधों में नाइट्रोजन व फास्फोरस की कमी को दूर करने में सहायता करता है। नैनो डी-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) तरल भारतीय किसानों द्वारा विकसित एक उर्वरक है। उर्वरक नियंत्रण आदेश के मुताबिक, भारत की सर्वोच्च उर्वरक सहकारी समिति (इफको) को 2 मार्च, 2023 को अधिसूचित किया गया था। साथ ही, भारत में नैनो डीएपी तरल का उत्पादन करने के लिए इफको को एक राजपत्र अधिसूचना जारी की गई थी। यह जैविक तौर पर सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल है। अपशिष्ट मुक्त साग की खेती के लिए उपयुक्त है। इससे भारत उर्वरकों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता पर तीव्रता से निर्भर रहेगा। नैनो डीएपी उत्पादन की गुणवत्ता और मात्रा व जीवन दोनों को भी बढ़ाएगा। किसान की आमदनी और भूमि के संरक्षण में बहुत बड़ा योगदान होगा। ये भी पढ़े: ‘एक देश में एक फर्टिलाइजर’ लागू करने जा रही केंद्र सरकार

नैनो DAP कैसे निर्मित हुई है

नैनो DAP के मामले में इफको के अध्यक्ष दिलीप संघानी ने बताया है, कि "नैनो डीएपी को तरल पदार्थों के साथ निर्मित किया गया है। किसान समृद्धि और आत्मनिर्भर भारत के लिए पीएम मोदी का विजन किसानों की आमदनी बढ़ाने एवं उन्हें बेहतर करने के उद्देश्य से लगातार कार्य कर रहा है। इफको के प्रबंध निदेशक डॉ. यू एस अवस्थी ने बताया है, कि नैनो डीएपी तरल पदार्थ फसलों के पोषण गुणों एवं उत्पादकता को बढ़ाने में काफी प्रभावी पाए गए हैं। इसका पर्यावरण पर काफी सकारात्मक असर पड़ता है।
येलो मोजेक वायरस की वजह से महाराष्ट्र में पपीते की खेती को भारी नुकसान

येलो मोजेक वायरस की वजह से महाराष्ट्र में पपीते की खेती को भारी नुकसान

आपकी जानकारी के लिए बतादें कि नंदुरबार जिला महाराष्ट्र का सबसे बड़ा पपीता उत्पादक जिला माना जाता है। यहां लगभग 3000 हेक्टेयर से ज्यादा रकबे में पपीते के बाग इस वायरस की चपेट में हैं। इसकी वजह से किसानों का परिश्रम और लाखों रुपये की लागत बर्बाद हो गई है। किसानों ने सरकार से मांगा मुआवजा। सोयाबीन की खेती को बर्बाद करने के पश्चात फिलहाल येलो मोजेक वायरस का प्रकोप पपीते की खेती पर देखने को मिल रहा है। इसकी वजह से पपीता की खेती करने वाले किसान काफी संकट में हैं। इस वायरस ने एकमात्र नंदुरबार जनपद में 3 हजार हेक्टेयर से ज्यादा रकबे में पपीते के बागों को प्रभावित किया है, इससे किसानों की मेहनत और लाखों रुपये की लागत बर्बाद हो चुकी है। महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों में देखा जा रहा है, कि मोजेक वायरस ने सोयाबीन के बाद पपीते की फसल को बर्बाद किया है, जिनमें नंदुरबार जिला भी शामिल है। जिले में पपीते के काफी बगीचे मोजेक वायरस की वजह से नष्ट होने के कगार पर हैं।

सरकार ने मोजेक वायरस से क्षतिग्रस्त सोयाबीन किसानों की मदद की थी

बतादें, कि जिस प्रकार राज्य सरकार ने मोजेक वायरस की वजह से सोयाबीन किसानों को हुए नुकसान के लिए सहायता देने का वादा किया था। वर्तमान में उसी प्रकार पपीता किसानों को भी सरकार से सहयोग की आशा है। महाराष्ट्र एक प्रमुख फल उत्पादक राज्य है। परंतु, उसकी खेती करने वालों की समस्याएं कम होने का नाम ही नहीं ले रही हैं। इस वर्ष किसानों को अंगूर का कोई खास भाव नहीं मिला है। बांग्लादेश की नीतियों की वजह से एक्सपोर्ट प्रभावित होने से संतरे की कीमत गिर गई है। अब पपीते पर प्रकृति की मार पड़ रही है।

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पपीते की खेती में कौन-सी समस्या सामने आई है

पपीते पर लगने वाले विषाणुजनित रोगों की वजह से उसके पेड़ों की पत्तियां शीघ्र गिर जाती हैं। शीर्ष पर पत्तियां सिकुड़ जाती हैं, इस वजह से फल धूप से क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। व्यापारी ऐसे फलों को नहीं खरीदने से इंकार कर देते हैं, जिले में 3000 हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्रफल में पपीता इस मोज़ेक वायरस से अत्यधिक प्रभावित पाया गया है। हालांकि, किसानों द्वारा इस पर नियंत्रण पाने के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के उपाय किए जा रहे हैं। परंतु, पपीते पर संकट दूर होता नहीं दिख रहा है। इसलिए किसानों की मांग है, कि जिले को सूखा घोषित कर सभी किसानों को तत्काल मदद देने की घोषणा की जाए।

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किसान कर लें ये काम, वरना पपीते की खेती हो जाएगी बर्बाद

पपीता पर रिसर्च सेंटर स्थापना की आवश्यकता

नंदुरबार जिला महाराष्ट्र का सबसे बड़ा पपीता उत्पादक जिला माना जाता है। प्रत्येक वर्ष पपीते की फसल विभिन्न बीमारियों से प्रभावित होती है। परंतु, पपीते पर शोध करने के लिए राज्य में कोई पपीता अनुसंधान केंद्र नहीं है। इस वजह से केंद्र और राज्य सरकारों के लिए यह जरूरी है, कि वे नंदुरबार में पपीता अनुसंधान केंद्र शुरू करें और पपीते को प्रभावित करने वाली विभिन्न बीमारियों पर शोध करके उस पर नियंत्रण करें, जिससे किसानों की मेहनत बेकार न जाए।

येलो मोजेक रोग के क्या-क्या लक्षण हैं

येलो मोजेक रोग मुख्य तौर पर सोयाबीन में लगता है। इसकी वजह से पत्तियों की मुख्य शिराओं के पास पीले धब्बे पड़ जाते हैं। ये पीले धब्बे बिखरे हुए अवस्था में दिखाई देते हैं। जैसे-जैसे पत्तियां बढ़ती हैं, उन पर भूरे रंग के धब्बे दिखाई देने लगते हैं। कभी-कभी भारी संक्रमण की वजह पत्तियां सिकुड़ और मुरझा जाती हैं। इसकी वजह से उत्पादन प्रभावित हो जाता है।

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येलो मोजेक रोग की रोकथाम का उपाय

कृषि विभाग ने येलो मोजेक रोग को पूरी तरह खत्म करने के लिए रोगग्रस्त पेड़ों को उखाड़कर जमीन में गाड़ने या नीला व पीला जाल लगाने का उपाय बताया है। इस रोग की वजह से उत्पादकता 30 से 90 प्रतिशत तक कम हो जाती है। इसके चलते कृषि विभाग ने किसानों से समय रहते सावधानी बरतने की अपील की है।
भारत में कृषि को नई दिशा देने में उपयोगी ये पांच कृषि यंत्र जो कम खर्चे में बढ़ाऐंगे लाभ

भारत में कृषि को नई दिशा देने में उपयोगी ये पांच कृषि यंत्र जो कम खर्चे में बढ़ाऐंगे लाभ

भारत में कृषि को अत्याधुनिक करने के लिए कुछ उपकरणों का उपयोग किया जा रहा है, जिससे किसान खेत में होने वाले कार्यों के लिए कड़ी मेहनत करने से बच जाते हैं। खेती में आने वाली लागत को भी कम करने में मदद करते हैं। अगर आप भी खेती को सहज और फायदेमंद बनाने के लिए कृषि यंत्रों की खरीद करना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए सहायक साबित हो सकता है।  भारत में ज्यादातर कृषकों के साथ आमदनी की दिक्कत देखने को नजर आती है। आमदनी कम होने की वजह से किसान बेहद मन लगा कर कृषि नहीं कर पाते हैं। साथ ही, कभी - कभी इससे उनको काफी हानि भी हो जाती है। यदि किसान अपनी आमदनी को ज्यादा बढ़ाना चाहते हैं, तो उन्हें पहले खेती में आने वाली लागत को कम करना चाहिए। खेती में निहित खर्चे को कम करने के लिए बेहद जरूरी है, कि फसल की पैदावार में लगने वाली लागत को कम किया जाए। इसको कम करने के लिए कृषकों को परंपरागत कृषि यंत्रों को छोड़कर आधुनिक कृषि यंत्रों की मदद लेनी चाहिए। आधुनिक कृषि यंत्रों की सहायता से किसान कम वक्त और कम श्रम में खेती के कार्य निपटा सकते हैं। भारत में खेती के कार्य को सहज बनाने के लिए वैसे तो बहुत सारे यंत्र हैं। 

कृषि कार्य हेतु रोटावेटर की भूमिका 

कृषि को सहज एवं सुगम बनाने के लिए जुताई के कार्य में आने वाले यंत्रों में रोटावेटर का सर्वाधिक इस्तेमाल किया जाता है। किसानों का इसे ज्यादा उपयोग में लेने का प्रमुख कारण यह है, कि इससे 1 अथवा 2 बार की जुताई में ही खेत पूर्ण रूप से फसल उगाने के लिए तैयार हो जाता है। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि रोटावेटर को ट्रैक्टर से जोड़कर चलाया जाता है। इस यंत्र से गेहू, गन्ना और मक्का इत्यादि फसलों के अवशेष को हटाने में सहयोगी होने के साथ ही इसको मिश्रण के लिए काफी उपयुक्त माना जाता है। इसका इस्तेमाल करके आप खेती के खर्च, समय एवं लेबर इत्यादि की बचत सुगमता से कर सकते हैं। इस यंत्र को किसी भी तरह की मृदा की जुताई के लिए इस्तेमाल में लिया जा सकता है। इसके साथ ही बाकी यंत्रों की तुलना में यह तकरीबन 15 से 35 फीसद तक ईंधन की बचत करता है।

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सीड ड्रिल कम फर्टिलाइजर मशीन का उपयोग 

किसान खेती में कम वक्त और कम परिश्रम के लिए सीड ड्रिल कम फर्टिलाइजर मशीन का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इस कृषि यंत्र की सहायता से किसान एक साथ विभिन्न कतारों में बीजों की बिजाई काफी कम समय में कर सकते हैं। यह मशीन खेत की मृदा में बीज को अंदर गहराई तक पहुंचाकर बो सकती है। इस मशीन की सहायता से खेतों में बीज एवं उर्वरक की एक साथ निश्चित अनुपात में बिजाई की जा सकती है। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि सीड ड्रिल कम फर्टिलाइजर मशीन को 35 HP से ज्यादा ट्रैक्टर के साथ शानदार ढ़ंग से चलाया जा सकता है।

स्प्रेयर पंप का खेती में उपयोग 

फसलों में कीट, बीमारियों एवं खरपतवार की रोकधाम के लिए विभिन्न प्रकार के कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाता है। स्प्रेयर पंप एक ऐसा शानदार कृषि यंत्र है, जिसकी सहायता से किसान लिक्विड खाद एवं कीटनाशक का छिड़काव खेतों में बेहद सहजता से कर सकते हैं। यह यंत्र खेती में लेबर के साथ-साथ समय की बचत करते हैं। क्योंकि, इस स्प्रेयर पंप से कृषक स्वयं ही छिड़काव कर सकते हैं। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि विभिन्न प्रकार के स्प्रेयर पंप भिन्न-भिन्न उपयोग के लिए बाजार में उपलब्ध हैं। साथ ही, कुछ ऐसे भी है, जिन्हें ट्रैक्टर के साथ जोड़कर सुगमता से चलाया जा सकता है।

क्रॉप कटर मशीन से आप क्या समझते हैं 

किसानों के लिए खेती को सहज एवं सुगम बनाने के लिए क्रॉप कटर मशीन भी शानदार उपकरण सिद्ध हो रहा है। बतादें, कि जब फसलों की कटाई की जाती है, तो बहुत सारे मानव संसाधन की जरूरत होती है। अगर अकेला किसान इसे करें तो इसमें उसे काफी अधिक समय लग जाता है। इस मशीन की सहायता से सोयाबीन, मक्का, ज्वार, हरा चारा, घास, गेहूं, चावल और गन्ना काटने जैसे अनेकों कार्यों को काफी सुगमता से किया जा सकता है। यह आधुनिक उपकरण मृदा की सतह से महज 2 से 3 सेंटीमीटर ऊपर फसलों को काफी सहजता से काट सकती हैं। इसके अतिरिक्त इसमें लगे वीडर अटैचमेंट्स, खरपतवार को हटाने का कार्य करते हैं। इस यंत्र को डीजल के माध्यम से चलाया जाता है। साथ ही, यह मशीन घास ट्रिमिंग, लॉन ट्रिमिंग, खेत की निराई-गुड़ाई भी कर सकती है। बतादें, कि इस यंत्र का इस्तेमाल स्वयं  से छोटे और बड़े किसान फसल की कटाई करने में कर सकते हैं।
स्प्रे में असावधानी, जान को खतरा

स्प्रे में असावधानी, जान को खतरा

किसान भाई खेतों में कीटनाशकों का छिड़काव एवं ​बुरकाव बगैर सावधानी के करते हैं। यह बात अलग है कि कंपनियां भी सुरक्षा के लिए ग्ल्प्सि आदि की इंतजाम अपने पैकेट में करती हैं लेकिन थोड़ी सी असुविधा से बचने के चक्कर में कई किसान अपनी जान तक गंवा बैठते हैं। 


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 भारत वर्ष में कीटनाशियों की खपत विकसित देशों  जैसे जापान, कोरिया, यूरोप और अमेरिका की तुलना में बहुत कम है परन्तु रसायनिक नियंत्रण पर एक रूपया खर्च करने से 10 से 20 रूपया की बचत कर भारी नुकसान से बचा जा सकता है । साधारणतया सभी कीटनाशी एवं फफूँदनाशी जहरीले होते हैं और इनका उपयोग करने वाले किसानों के स्वास्थ्य को सदैव खतरा बना रहता है । साथ ही कीट एवं रोग पर उचित नियंत्रण हो इसके लिए कुछ प्रमुख बातों का ध्यान रखना जरूरी है।

खरीदते समयः-

कीटनाशक स्प्रे
  1. कृषि वैज्ञानिक / कृषि विभाग के अधिकारी / कर्मचारी को कीट-रोग प्रभावित पौधों का निरीक्षण करवाकर उसकी सिफारिश के अनुसार ही कीटनाशक खरीदें ।
  2. कीटनाशक विक्रेता से बिल भी आवश्यक रूप से प्राप्त कर लें ।
  3. कीटनाशक अवधिपार तिथि के न हों एवं बोतल या डिब्बा में रिसाव आदि न हो ।

भण्डारण के समय:-

  1. उपयुक्त मात्रा में ही कीटनाशक खरीदें ।
  2. भण्डारण उसके मूल डिब्बे में ही करें ।
  3. शुष्क तथा ठण्डे स्थान पर भण्डारण करें तथा धूप आदि से बचावें ।
  4. एक बार ढक्कन खोलने पर दुबारा उसे कस कर बन्द करें ।
  5. भण्डारण वर्गीकृत ढंग से करें जैसे - कीटनाशक, फफूंदनाशक, शाकनाशक आदि।
  6. रसायनों को बच्चों एवं जानवरों की पहुंच से दूर हमेशा ताले के अन्दर ही भण्डारित करें ।

उपयोग से पहलें:-

    1. इस्तेमाल से पूर्व बोतल/डिब्बे/पैकेट आदि पर अवधिपार तिथि अवश्य देखें । अवधिपार तिथि के पश्चात् रसायनों का प्रयोग न करें।
    2. इस्तेमाल से पहले स्प्रेयर/डस्टर आदि मशीनों को पानी भरकर खाली चलाकर नोजल आदि को भलीभांति देख लें । रसायनों की मात्रा की गणना करके ही प्रयोग करें ।
    3. रसायन की निश्चित मात्रा लेवल के अनुसार माप कर ही उपयोग में लेें तथा खाली डिब्बा / बोतल को तोडकर जमीन मे दबा दें ।
    4. घोल बनाते समय सामान्य तौर पर एक से अधिक रसायनों को मिलाकर घोल नहीं बनायें ।
    5. स्प्रेयर या डस्टर आदि का ढक्कन कस कर बन्द करें और पूरी दवा खत्म होने तक मशीन को चलावें ।

उपयोग के समय:-

  1. रसायनों के छिडकाव/भुरकाव तथा बीजोपचार के समय हाथों में दस्ताने पहनें, नाक पर मास्क या कपडे का प्रयोग करें, आंखों पर चश्मा लगायें, सिर पर कपडा बांधे और शरीर पूरा ढका हो ताकि शरीर पर कीटनाशक न गिरे ।
  2. शरीर पर खुले घाव हों तो इन पर मोटी पट्टी बांधें ।
  3. छिडकाव सायंकाल हवा नहीं चलने के समय करना चाहिए ।
  4. छिडकाव/भुरकाव हवा की दिशा में ही करें ।
  5. छिडकाव/भुरकाव इस प्रकार करें कि पौधें की पत्तियों के ऊपर व नीचे दोनों ओर दवा चिपक जाए क्योंकि अधिकतर कीट-रोग पत्तों की निचली सतह पर ही प्रकोप अधिक होता है ।
  6. कीटनाशी दवा के छिडकाव/भुरकाव के समय बीडी, सिगरेट, तम्बाकू गुटखा आदि न खायें ।
  7. छिडकाव/भुरकाव के समय तथा तुरन्त बाद बच्चों, पशु, पक्षियों आदि को खेतों में नहीं आने देवें ।
  8. अगर विश का असर महसूस हो, जैसे कि चक्कर आना, भारीपन, पेटदर्द, सिरदर्द, उलटी आदि हो तो प्राथमिक चिकित्सा अवश्य लें ।
  9. प्राथमिक चिकित्सा में पीडित को उल्टी करवायें । उपलब्ध हो तो एट्रोपिन का 1 एम. एल. इंजेक्षन लगवायें तथा तुरन्त इलाज के लिए डाक्टर से सम्पर्क करें ।

उपयोग के बाद:-

  1. स्प्रेयर/डस्टर आदि काम में आये उपकरण व बर्तन को साबुन या कपडे घोने के पाउडर से धोकर साफ करें ।
  2. छिडकाव/भुरकाव करने वाले व्यक्ति को साबुन से नहाना चाहिये व कपडे भी साबुन से धोवें।