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ये राज्य सरकार दे रही है पशुओं की खरीद पर भारी सब्सिडी, महिलाओं को 90% तक मिल सकता है अनुदान

ये राज्य सरकार दे रही है पशुओं की खरीद पर भारी सब्सिडी, महिलाओं को 90% तक मिल सकता है अनुदान

सरकार के आंकड़े बताते हैं कि पशुपालन का व्यवसाय ग्रामीण क्षेत्रों में काफी फल फूल रहा है क्योंकि भारत के ग्रामीण इलाकों में पशुपालन के व्यवसाय के लिए ज्यादातर सुविधाएं प्राकृतिक रूप से मौजूद होती है। इसलिए यह व्यवसाय ग्रामीणों की दशा और दिशा दोनों को बदल रहा है। गावों में अब लोग दूध के साथ विभिन्न चीजों की प्राप्ति के लिए पशुपालन करते हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों से देखा जा रहा है कि सरकार भी अब पशुपालकों और किसानों को पशुपालन में मदद करने लगी है ताकि लोग इस व्यवसाय की तरफ ज्यादा से ज्यादा आकर्षित हों। इसके लिए केंद्र सरकार ने कई तरह की योजनाएं चलाई हैं, यह व्यवसाय छोटे और मध्यम किसानों के लिए उनकी आमदनी बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुआ है। केंद्र सरकारों के साथ-साथ राज्य सरकारें भी अब इस दिशा में प्रयास कर रही हैं ताकि ग्रामीण किसानों और पशुपालकों को आर्थिक मजबूती प्रदान की जा सके। इसको देखते हुए झारखण्ड की सरकार ने मुख्यमंत्री पशुधन योजना (Mukhyamantri Pashudhan Yojana Jharkhand) शुरू की है, इस योजना के अंतर्गत पशुपालकों और किसानों को पशुओं की खरीद पर 75 से लेकर 90 प्रतिशत तक की सब्सिडी प्रदान की जा रही है। इस सब्सिडी से निश्चित तौर पर गावों के निचले तबके के लोगों को लाभ होने वाला है।


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गाय-भैंस की खरीद पर इस प्रकार से सब्सिडी देती है सरकार

झारखंड सरकार द्वारा चलाई जा रही मुख्यमंत्री पशुधन विकास योजना के अंतर्गत आपदा, आगजनी, सड़क दुर्घटना से प्रभावित परिवार की महिला, परित्यक्त और दिव्यांग महिलाओं को सरकार गाय-भैंस खरीदने में सब्सिडी प्रदान करेगी, जिससे वो कुछ कमाई कर पाएं और अपना जीवन यापन कर पाएं। इसके तहत इन लोगों को सरकार 2 गाय या 2 भैंस खरीदने के लिए 90% तक की सब्सिडी प्रदान करेगी। इसके पहले इन पात्र लोगों को मात्र 50 प्रतिशत की सब्सिडी दी जाती थी, लेकिन राज्य सरकार ने अब इसे बढ़ा दिया है।

गाय-भैंस के अतिरिक्त इन पशुओं की खरीद पर भी सब्सिडी देती है सरकार

झारखंड के पशुपालन निदेशालय के अनुसार, राज्य के लोगों को सरकार बकरी पालन, सूअर पालन, बैकयार्ड लेयर कुक्कुट पालन, ब्रायलर कुक्कुट पालन (ब्रायलर मुर्गी पालन) और बत्तख चूजा पालन के लिए 75% तक की सब्सिडी प्रदान कर रही है। पहले यह सब्सिडी 50% दी जाती थी, लेकिन अब इसमें 25% की वृद्धि कर दी गई है।

मिनी डेयरी के लिए भी मिलेगा अनुदान

राज्य में कोई भी किसान या पशुपालक यदि 5 दुधारू गाय/भैंस या 10 गाय/भैंस के साथ मिनी डेयरी खोलना चाहता है, तो उसे कामधेनु डेयरी फार्मिंग की उपयोजना के तहत अनुदान प्रदान किया जाएगा। मिनी डेयरी खोलने के लिए सरकार सामान्य और पिछड़ा वर्ग के लोगों को अब 50 प्रतिशत तक का अनुदान देगी। पहले यह राशि मात्र 25 प्रतिशत थी, जिसे अब बढ़ा दिया गया है। साथ ही यदि कोई अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का किसान या पशुपालक मिनी डेयरी खोलना चाहता है, तो उसे सरकार अब 75 प्रतिशत की राशि सब्सिडी के रूप में देगी। पहले यह राशि 33.33 प्रतिशत थी।


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चैफ कटर का वितरण पर भी मिलेगा किसानों को अनुदान

पशुओं के लिए किसान अच्छे से अच्छे चारे का प्रबंध कर पाएं, इसको देखते हुए सरकार ने चारा/घास काटने वाली मशीन यानि चाफ कटर (Chaff cutter) का वितरण पर भी सब्सिडी प्रदान करने का निश्चय किया है। इसके वितरण में सरकार अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसानों को 90 प्रतिशत तक की सब्सिडी प्रदान करेगी। वहीं अन्य वर्गों के किसानों के लिए सरकार हस्तचालित चैफ कटर का वितरण योजना के अंतर्गत 75% तक की सब्सिडी प्रदान करेगी।

डेयरी प्रोसेसिंग के लिए भी अनुदान देगी झारखंड सरकार

ऐसे किसान जो पशुपालन के साथ ही डेयरी प्रोसेसिंग यानि दुग्ध प्रसंस्करण के धंधे में उतरना चाहते हैं, उनके लिए भी झारखण्ड सरकार अनुदान प्रदान करने जा रही है। यह अनुदान मिल्किंग मशीन, पनीर खोवा मशीन, बोरिंग एवं काऊ मैट आदि की खरीद पर दिया जाएगा। डेयरी प्रोसेसिंग यूनिट लगाने के लिए राज्य सरकार अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसानों और दुग्ध उत्पादक समितियों के मालिकों को 90 प्रतिशत तक सब्सिडी की सुविधा देगी। जबकि सामान्य, पिछड़ा, महिला और अन्य सभी वर्ग के पशुपालकों और दुग्ध उत्पादक समितियों के मालिकों को सरकार 75 प्रतिशत तक की सब्सिडी उपलब्ध करवाएगी।
इस राज्य के कई गांवों में पशुओं को रविवार की छुट्टी देने की परंपरा चली आ रही है

इस राज्य के कई गांवों में पशुओं को रविवार की छुट्टी देने की परंपरा चली आ रही है

झारखंड राज्य के 20 गांवों में पशुओं की देखरेख और सेहत के लिहाज से स्वस्थ्य परंपरा जारी है। ग्रामीण इस अवसर पर अपने पशुओं से किसी भी प्रकार का कोई कार्य नहीं लेते हैं। यहां तक कि ग्रामीण अपनी गाय-भैंस का दूध भी नहीं निकालते हैं। झारखंड राज्य के 20 से ज्यादा गांवों में पशुओं को भी एक दिन का अवकाश प्रदान किया जाता है। इनका भी आम लोगों की तरह रविवार को आराम का दिन होता है। क्योंकि रविवार के दिन इन मवेशियों से किसी भी प्रकार का कोई काम नहीं लिया जाता है। लोतहार जनपद के 20 गांवों में पशुओं की यह छुटटी रविवार के दिन होती है। इस दिन गाय-भैंसों का दूध भी नहीं निकाला जाता है।

पशुपालक रोपाई और खुदाई भी अपने आप करते हैं

पशुपालक रविवार के दिन अपने समस्त पशुओं की खूब सेवा किया करते हैं। पशुओं को काफी बेहतरीन आहार प्रदान किया जाता है। पशुपालक रविवार के दिन स्वयं ही कुदाल लेकर के खेतोें में पहुँच जाते हैं। पशुपालक स्वयं ही जाकर के खेतों में कार्य करते हैं। किसी भी स्थिति में मवेशियों को रोपाई अथवा बाकी कामों हेतु खेत पर नहीं ले जाते हैैं। किसान भाई इस दिन अपने आप ही कार्य करना पसंद करते हैं।

इस परंपरा को चलते 100 वर्ष से भी अधिक समय हो गया

आपको बतादें कि स्थानीय लोगों के बताने के अनुसार, यह परंपरा उनको उनके बुजुर्गों से मिली है। जो कि 100 वर्ष से ज्यादा वक्त से चलती आ रही है। वर्तमान में नई पीढ़ियां इस परंपरा का पालन कर रही हैं। पशु चिकित्सकों ने बताया है, कि यह एक बेहतरीन सकारात्मक परंपरा है। जिस प्रकार मनुष्यों को सप्ताह में एक दिन विश्राम हेतु चाहिए। उसी तरह पशुओं को भी विश्राम अवश्य मिलना चाहिए।

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परंपरा को शुरू करने के पीछे क्या वजह थी

ग्रामीणों का कहना है, कि लगभग 100 वर्ष पूर्व खेत की जुताई करने के दौरान एक बैल की मृत्यु हो गई थी। इस घटना की वजह से गांववासी काफी गंभीर हो गए थे। इसके संबंध में गांव में एक बैठक की गई। बैठक के दौरान यह तय किया गया कि एक सप्ताह में पशुओं को एक दिन आराम करने के लिए दिया जाएगा। रविवार का दिन पशुओं को अवकाश देने के लिए तय किया गया था। तब से आज तक रविवार के दिन पशुओं से किसी भी तरह का कोई काम नहीं लिया जाता है। गांव के समस्त पशु रविवार में दिनभर केवल विश्राम किया करते हैं।
जरबेरा के फूलों की खेती से किसानों की बदल सकती है किस्मत, होगी जबरदस्त कमाई

जरबेरा के फूलों की खेती से किसानों की बदल सकती है किस्मत, होगी जबरदस्त कमाई

भारत में किसान परंपरागत खेती से इतर अब नई तरह ही खेती पर भी फोकस कर रहे हैं, ताकि वो भी समय के साथ अपने व्यवसाय से अच्छी खासी कमाई कर सकें। इसलिए इन दिनों किसान भाई अब बागवानी से लेकर फूलों की खेती करने लगे हैं। भारत में फूल हर मौसम में पाए जाते हैं जो किसानों के लिए पूरे साल भर आमदनी का स्रोत बने रहते हैं। ऐसी ही एक फूल की खेती के बारे में हम आपको जानकारी देने जा रहे हैं। जिसे जरबेरा के फूल के नाम से जाना जाता है। इसका उपयोग सजावट के साथ-साथ औषधीय कामों में भी होता है। यह हर मौसम में पाया जाने वाला फूल है। इसके फूल पीले, नारंगी, सफेद, गुलाबी, लाल रंगों के साथ कई अन्य रंगों में भी पाए जाते हैं। इससे यह फूल बेहद आकर्षक लगते हैं। इस फूल के लंबे डंडे होने के कारण इसका उपयोग शादी समारोह में सजावट के तौर पर किया जाता है। इसके अलावा देश की फार्मेसी कंपनियां भी इसके पौधे का उपयोग दवाइयां बनाने के लिए करती हैं। सुंदर फूल होने के कारण बाजार में इन फूलों का जबरदस्त मांग रहती है। लोग फूलों का उपयोग मंदिरों में सजावट के लिए भी करते हैं।

इस प्रकार की जलवायु में उत्पादित होता है जरबेरा

जरबेरा के लिए सामान्य तापमान वाले मौसम की जरूरत होती है। मतलब सर्दियों में जहां इसके पौधे को धूप की जरूरत होती है वहीं गर्मियों में इसके पौधे को छांव की जरूरत होती है। अगर ये परतिस्थियां नहीं मिलती तो जरबेरा का उत्पादन कम हो सकता है। इसलिए इसकी खेती को पॉलीहाउस में ही सफलतापूर्वक किया जा सकता है। ये भी पढ़े: पॉलीहाउस की मदद से हाईटेक कृषि की राह पर चलता भारतीय किसान

इस तरह से करें खेत की तैयारी

वैसे तो जरबेरा की खेती हर मिट्टी में हो सकती है लेकिन रेतीली भुरभुरी मिट्टी इस खेती के लिए सबसे उपयुक्त मानी गई है। इस खेती के लिए मिट्टी का पीएच मान 5.0-7.2 के बीच होना चाहिए। खेत तैयार करने के पहले खेत की 2 से 3 बार अच्छे से जुताई कर लें। इसके बाद एक बेड तैयार कर लें जिसकी चौड़ाई 1 मीटर होनी चाहिए, साथ ही ऊंचाई 30 सेंटीमीटर होनी चाहिए। इसके साथ ही मिट्टी में जैविक खाद भी डालें।

इस समय करें पौधों की बुवाई

जरबेरा के पौधों की बुवाई फरवरी से लेकर मार्च तक की जा सकती है, इसके साथ ही दूसरे मौसम में इसकी बुवाई सितंबर से लेकर अक्टूबर तक की जा सकती है। बुवाई करते समय ध्यान रहे कि पौधे का ऊपरी भाग मिट्टी से 3 सेंटीमीटर ऊपर होना चाहिए। साथ ही एक पौधे से दूसरे पौधे की की दूरी 30 सेंटीमीटर होनी चाहिए और कतार से कतार की दूरी 40 सेंटीमीटर हिनी चाहिए। मिट्टी के एक बेड पर पौधों की 2 कतारें आसानी से लगाई जा सकती हैं।

ऐसे करें सिंचाई

जैसे ही जरबेरा के पौधों की बेड पर रोपाई करें उसके तत्काल बाद पानी देना चाहिए। इसके बाद एक माह तक लगातार सिंचाई करते रहना चाहिए। इससे पौधे की जड़ों की पकड़ मिट्टी में बन सकेगी। शुरुआत में जरबेरा के पौधों को प्रतिदिन सिंचाई की जरूरत होती है।

ऐसे करें जरबेरा के फूलों की तुड़ाई

खेती शुरू करने के करीब 12 सप्ताह बाद जरबेरा में फूल आने लगते हैं। लेकिन फूलों की तुड़ाई 14 सप्ताह के बाद करना चाहिए। सुबह या शाम के समय तुड़ाई करने पर फूलों की गुणवत्ता बनी रहती है। इसलिए फूलों की तुड़ाई के लिए इसी समय का चुनाव करें। जरबेरा के फूलों को डंठल के साथ तोड़ना चाहिए। इसके डंठल की लंबाई 50-55 सेंटीमीटर तक होती है। एक पौधा एक साल में करीब 45 फूल तक उत्पादित कर सकता है। तुड़ाई के ठीक बाद फूलों को पानी से भारी बाल्टी में रखना चाहिए ताकि फूल मुरझाने न पाएं।
गाय खरीदने पर 90 फीसदी सब्सिडी दे रही है सरकार, यहां करें आवेदन

गाय खरीदने पर 90 फीसदी सब्सिडी दे रही है सरकार, यहां करें आवेदन

केंद्र सरकार के साथ-साथ देश की राज्य सरकारें भी अपने प्रदेश के किसानों की आय बढ़ाने के लिए लगातार प्रयासरत हैं। जिसको देखते हुए सरकारें किसानों को कई तरह की सुविधाएं उपलब्ध करवाती हैं ताकि किसान भाई कम समय और कम मेहनत में अपनी आय को जल्द से जल्द दोगुना कर पाएं। इसी कड़ी में सरकार ने किसानों को पशुपालन के प्रति जागरुख करना शुरू कर दिया है, जिससे किसान खेती बाड़ी के साथ-साथ पशुपालन करके कुछ अतिरिक्त पैसे कमा सकें। अब झारखंड राज्य की सरकार अपने किसानों को दुधारू पशुओं की खरीद के लिए प्रोत्साहित कर रही है। इसके लिए सरकार ने किसानों को आर्थिक मदद देने का ऐलान किया है। झारखंड सरकार की तरफ से कहा गया है कि मुख्यमंत्री पशुधन विकास योजना के अंतर्गत राज्य के किसानों को दुधारू गाय की खरीद पर 90 फीसदी की सब्सिडी दी जाएगी। इसका मतलब है कि किसान को दुधारू गाय की खरीद पर मात्र 10 फीसदी रकम ही भुगतान करनी होगी। झारखंड सरकार के अधिकारियों ने बताया है कि प्रारम्भिक तौर पर यह सब्सिडी महिला किसानों को दी जाएगी। अन्य किसानों को दुधारू गाय की खरीद पर मात्र 75 फीसदी की सब्सिडी प्रदान की जाएगी।

सब्सिडी प्राप्त करने के लिए यहां करें आवेदन

जो भी किसान मुख्यमंत्री पशुधन विकास योजना के अंतर्गत लाभ लेकर दुधारू गाय खरीदना चाहते हैं, वो योजना की अधिकारिक वेबसाइट पर जाकर आवेदन कर सकते हैं। इसके साथ ही किसान गव्य विकास अधिकारी के कार्यालय पर भी जाकर आवेदन कर सकते हैं। यह योजना राज्य के सभी जिलों में लागू कर दी गई है, इसलिए राज्य के सभी किसान इस योजना के अंतर्गत लाभ लेने के लिए पात्र हैं। सरकार का मानना है कि इस योजना से किसान पशुपालन के लिए प्रोत्साहित होंगे, जिससे राज्य में दूध उत्पादन बढ़ेगा और दूध की मांग की पूर्ति की जा सकेगी। साथ ही पशुओं से गोबर भी प्राप्त होगा, जिससे राज्य में प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा मिलेगा।

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ये किसान कर सकतें है आवेदन

मुख्यमंत्री पशुधन विकास योजना के अंतर्गत लाभ लेने के लिए किसान को झारखंड का मूल निवासी होना अनिवार्य है। इसके साथ ही किसान के पास पशुपालन के लिए आधारभूत संरचनाएं होनी चाहिए। साथ ही पानी की व्ययस्थाऔर चारागाह होना चाहिए, जिससे पशु बिना किसी परेशानी के रह सकें। इसके साथ आवेदनकर्ता के पास आधार कार्ड, पेन कार्ड, जमीन के कागजात, बैंक खाता, मोबाईल नंबर और पासपोर्ट साइज़ की फोटो होना चाहिए। आवेदन करते वक्त किसान को ये सभी जानकारियां संलग्न करनी होंगी।

अन्य राज्यों में भी शुरू हो चुकी है ऐसी योजना

पशुपालन में सब्सिडी प्रदान करने की योजना अभी तक देश के कई राज्यों में शुरू हो चुकी है। हाल ही में इस प्रकार की योजना को मध्य प्रदेश की सरकार ने हरी झंडी दिखाई थी। इस तरह की योजना के अंतर्गत मध्य प्रदेश की सरकार राज्य के बैगा, भारिया और सहरिया समाज के लोगों को पशुपालन से जोड़ने की कोशिश कर रही है। इन सामाज के लोगों को मध्य प्रदेश की सरकार 2 दुधारू पशु मुफ़्त में दे रही है। जिनमें गाय या भैंस हो सकती है। इसके साथ ही मध्य प्रदेश की सरकार पशुओं पर होने वाले सभी प्रकार के खर्चों की 90 फीसदी राशि भी देती है। इस राशि में पशु चारे का खर्च भी शामिल किया गया है।
महिला किसान गेंदे की खेती से कर रही अच्छी-खासी आमदनी

महिला किसान गेंदे की खेती से कर रही अच्छी-खासी आमदनी

आजकल बदलते दौर में किसान अपना रुख परंपरागत खेती से हटकर अधिक मुनाफा देने वाली फसलों की खेती करने लगे हैं। इसी कड़ी में झारखंड राज्य के पलामू जनपद की रहने वाली एक महिला किसान गेंदे के फूल की खेती से अमीर हो गई है। फिलहाल, आसपास की महिलाएं और पुरूष भी उससे गेंदे की खेती करने के गुर सीख रहे हैं।

गेंदे के फूल का इस्तेमाल बहुत सारी जगहों पर किया जाता है

हालाँकि, भारत में सभी प्रकार के फूल उत्पादित किए जाते हैं। परंतु,
गेंदा की खेती सर्वाधिक की जाती है। क्योंकि इसका इस्तेमाल भी सर्वाधिक होता है। बतादें कि इसका उपयोग मंच और घर को सजाने से लेकर पूजा- पाठ में सबसे ज्यादा किया जाता है। सिर्फ इतना ही नहीं नेताओं के स्वागत में सबसे अधिक गेंदे की माला ही गले में ड़ाली जाती है। साथ ही, मंदिर और घर के तोरण द्वार भी गेंदे से ही निर्मित किए जाते हैं। ऐसे में किसान गेंदे की खेती कर बेहतर आय कर सकते हैं। आज हम आपको एक ऐसी ही महिला किसान की कहानी बताने जा रहे हैं, जिसकी किस्मत गेंदे के फूल की खेती से बिल्कुल बदल गई। न्यूज 18 हिन्दी की रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड के पलामू जनपद की रहने वाली एक महिला गेंदे के फूल की खेती कर के मालामाल हो गई है।

आसपास की महिलाऐं और पुरुष मुन्नी से गेंदे की खेती सीखने आते हैं

अब समीपवर्ती महिलाएं और पुरूष भी उससे गेंदे की खेती करने का तौर तरीका सीखने आ रहे हैं। विशेष बात यह है, कि उसने अपने मायके में गेंदे की खेती करने की तकनीक सीखी थी। शादी होने के बाद जब वह अपने ससुराल आई तो स्वयं ही उसने गेंदे के फूल की खेती करनी चालू कर दी। महिला का नाम मुन्नी देवी है। वह पांडू प्रखंड के तिसीबार गांव की रहने वाली है। हाल में वह लगभग 10 एकड़ की भूमि पर गेंदे की खेती कर रही है। ये भी पढ़े: इस फूल की खेती कर किसान हो सकते हैं करोड़पति, इस रोग से लड़ने में भी सहायक

गेंदे के फूल की एक माला की कितनी कीमत है

मुन्नी देवी का कहना है, कि ससुराल आने के उपरांत उन्होंने वर्ष 2019 में गेंदे की खेती आरंभ की थी। प्रथम वर्ष ही उनको काफी अच्छा फायदा हुआ था। इसके उपरांत वह खेती के रकबे में इजाफा करती गईं, जिससे उनका मुनाफा भी बढ़ता गया। मुख्य बात यह है, कि मुन्नी देवी खेती करने के लिए प्रतिवर्ष कलकत्ता से गेंदे के पौधों को मंगवाती हैं। उसके बाद पौधों को लगाकर उनमें वक्त पर उर्वरक और सिंचाई करती हैं। तीन माह में पौधों में गेंदे के फूल आने शुरू हो जाते हैं। इसके उपरांत वह माला बनाकर बेच देती हैं। केवल एक माला 15 रुपये में बेची जाती है, जिसके अंतर्गत गेंदे के 40 फूल गुथे रहते हैं।

मुन्नी वर्षभर में लाखों रुपये की आमदनी कर रही है

सालाना आमदनी को लेकर मुन्नी देवी ने कहा है, कि वर्ष में वह दो बार गेंदे की खेती करती हैं। जनवरी के माह में लगाए गए पौधों में तीन माह के अंतर्गत फूल आ जाते हैं। क्योंकि, अप्रैल से लेकर जून तक शादियों का सीजन चलता है। ऐसे में गेंदे की बिक्री बड़ी ही सुगमता से हो जाती है। उसके बाद अगस्त और सितंबर माह में गेंदे के पौधों का रोपण किया जाता है। सर्दियों के मौसम में यह फूलों से लद जाते हैं। इसके चलते पौधों में बड़े- बड़े आकार के सुगंधित गेंदे के फूल आते हैं। फिलहाल, मुन्नी देवी गेंदे की खेती से वर्षभर में लाखों रुपये की आमदनी कर रही हैं।
गाय पालन को प्रोत्साहन देने के लिए यह राज्य सरकार अच्छी-खासी धनराशि प्रदान कर रही है।

गाय पालन को प्रोत्साहन देने के लिए यह राज्य सरकार अच्छी-खासी धनराशि प्रदान कर रही है।

पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों की तरफ से अहम कवायद की गई है। यदि आप भी इस योजना के अंतर्गत प्रतिमाह 900 रुपये पाना चाहते हैं, तो आपको मध्य प्रदेश की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर इस योजना के तहत खुद को रजिस्टर कराना होगा। भारत में गाय को माता का दर्जा प्राप्त है। हिंदू धर्म का अनुपालन करने वाले लोग सामान्यतौर पर प्रत्येक जीव से प्यार करते हैं। परंतु, गाय को लेकर उनको विशेष लगाव होता है। हिंदू धर्म में गाय को काफी ज्यादा पवित्र जीव घोषित किया गया है और इसे मां का दर्जा प्रदान किया गया है। यही कारण है, कि गाय के दूध के साथ-साथ उसके गोबर और मूत्र का भी उपयोग सनातन धर्म के धार्मिक कार्यों में होता है। परंतु, फिलहाल, धीरे-धीरे गाय को पालने वाली परंपरा और संस्कृति समाप्त होती जा रही है। इसी संस्कृति का संरक्षण करने के लिए मध्य प्रदेश की सरकार की तरफ से एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया है।

गाय पालन हेतु किसे धनराशि प्रदान की जाएगी

मध्य प्रदेश सरकार ने यह ऐलान किया है, कि वह प्रति माह उन लोगों को 900 रुपये प्रदान किए जाऐंगे। जो गाय का पालन और जैविक खेती करेंगे। इस योजना के अंतर्गत मध्य प्रदेश सरकार द्वारा 22000 किसानों को पहली किश्त जारी भी कर दी है। साथ ही, सरकार द्वारा राज्य में पशु चिकित्सा एंबुलेंस सर्विस का भी शुभारंभ किया है। ये भी पढ़े: इस नंबर पर कॉल करते ही गाय-भैंस का इलाज करने घर पर आएगी पशु चिकित्सकों की टीम

योजना का लाभ लेने के लिए क्या करें

यदि आप भी इस योजना के अंतर्गत प्रति माह 900 रुपये पाना चाहते हैं। तो आपको मध्य प्रदेश की सरकारी वेबसाइट पर जाकर इस योजना के चलते स्वयं को पंजीकृत कराना होगा। इसके साथ ही गाय का गोबर भी खरीदने की योजना तैयार की जा रही है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का कहना है, कि वह संपूर्ण राज्य में विभिन्न गोबर प्लांट लगा कर गाय के गोबर से सीएनजी तैयार करेंगे।

पशु एंबुलेंस बुलाने के लिए इस नंबर को डायल करें

यदि आप मध्य प्रदेश के रहने वाले हैं और अपने पशु के रोगग्रस्त होने पर एंबुलेंस मंगाना चाहते हैं। तब आपको कुछ नहीं करना है, सिर्फ 1962 नंबर डायल कर देना है। यह नंबर पूर्णतयः टोल फ्री है। इस नंबर को डायल करने पर आपके फोन से एक भी रुपया भी नहीं कटेगा। ऐसा करते ही कुछ ही समय में आपके घर के बाहर पशु एंबुलेंस उपस्थित हो जाएगी।
इस राज्य में कृषि वैज्ञानिकों ने परवल की 3 बेहतरीन किस्में विकसित की हैं

इस राज्य में कृषि वैज्ञानिकों ने परवल की 3 बेहतरीन किस्में विकसित की हैं

झारखंड राज्य के रांची में मौजूद भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र पूर्वी प्रक्षेत्र पलांडू के वैज्ञानिकों द्वारा परवल की 3 नई प्रजातियों को विकसित किया है। वैज्ञानिकों ने इन प्रजातियों का नाम स्वर्ण रेखा, स्वर्ण अलौकिक और स्वर्ण सुरुचि रखा है। बतादें, कि वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई परवल की इन तीन किस्मों से झारखंड के अंदर सब्जी का उत्पादन करने वाले किसानों के लिए एक खुशखबरी है। वैज्ञानिकों द्वारा परवल की ऐसी प्रजाति को विकसित किया गया है, जिसके उपरांत अब पहाड़ों पर भी इसकी खेती करना संभव हो गया है। विशेष बात यह है, कि परवल की यह प्रजाति कम वक्त में ही तैयार हो जाएगी और उत्पादन भी बेहतरीन मिलेगा। साथ ही, राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अंतर्गत वर्तमान में राज्य के बहुत से जनपदों में परवल की खेती भी चालू की जाएगी। इसके लिए किसान भाइयों को प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। किसान तक के अनुसार, रांची में मौजूद भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र पूर्वी प्रक्षेत्र पलांडू के वैज्ञानिकों द्वारा परवल की 3 नई प्रजातियों को विकसित किया गया है। वैज्ञानिकों ने इन प्रजातियों का नाम स्वर्ण रेखा, स्वर्ण अलौकिक एवं स्वर्ण सुरुचि रखा है। इसके अतिरिक्त वैज्ञानिकों ने परवल की एक और प्रजाति को विकसित किया है, जिसकी खेती भारत के अन्य दूसरे राज्यों में भी की जा सकती है।

राज्य के 11 जनपदों में पायलट प्रोजेक्ट के अनुरूप परवल की खेती का शुभारंभ किया जाएगा

परवल की नवीन प्रजातियों के विकसित होने के उपरांत झारखंड के कृषकों ने वैज्ञानिकों की सराहना और धन्यवाद किया है। किसानों का यह कहना है, कि वर्तमान में हमारे द्वारा उगाए गए परवल का स्वाद अन्य राज्य के लोग भी ले सकेंगे। इससे बिहार राज्य का नाम रौशन होगा और साथ में किसानों की आय में भी बढ़ोत्तरी होगी। ऐसा कहा जा रहा है, कि राज्य के 11 जनपदों में पायलट प्रोजेक्ट के अनुरूप परवल की खेती का शुभारंभ किया जाएगा। राष्ट्रीय बागवानी मिशन इसकी देखरेख करेगा। विशेष बात यह है, कि परवल की इन प्रजातियों की खेती ओडिशा और छत्तीसगढ़ में भी की जा सकती है।

परवल की एक एकड़ में खेती करने पर कितना खर्चा आता है

इसी कड़ी में कृषि वैज्ञानिकों का कहना है, कि परवल की खेती से झारखंड के किसानों की आमदनी में काफी इजाफा होगा। क्योंकि, परवल एक ऐसी फसल है, जिसकी खेती चालू करने के उपरांत आप पांच वर्ष तक सब्जी तोड़कर प्राप्त सकते हैं। यदि किसान भाई एक एकड़ जमीन पर परवल का उत्पादन करते हैं, तो उनको लगभग 50 हजार रुपये तक का खर्चा करना पड़ेगा। लेकिन, इससे किसान अच्छा-खासा फायदा भी अर्जित कर पाऐंगे।

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परवल में विटामिन-ए, विटामिन बी और विटामिन-बी1 पाए जाते हैं

जानकारी के लिए बतादें, कि गंगा के मैदानी क्षेत्रों में परवल की सर्वाधिक खेती होती है। बिहार एवं उत्तर प्रदेश परवल के मुख्य उत्पादक राज्य है। यहां के परवल की बिक्री संपूर्ण भारत में होती है। परवल में विटामिन-बी1, विटामिन बी2, विटामिन-ए एवं विटामिन-सी और कैल्शियम विघमान होता है। परवल की सब्जी बेहद ज्यादा स्वादिष्ट बनती है। बहुत सारे लोग परवल का अचार बनाकर भी खाते हैं।
इस अनसुनी सब्जी से किसान सेहत और मुनाफा दोनों कमा सकते हैं

इस अनसुनी सब्जी से किसान सेहत और मुनाफा दोनों कमा सकते हैं

आज हम आपको इस लेख में ऐसी सब्जी के बारे में बताने वाले हैं, जिसका नाम आपने शायद ही सुना होगा। यदि आप बाजार में सहजता से उपलब्ध होने वाली त भिंडी, लौकी, बैगन और गोभी इत्यादि सब्जियों को खाकर ऊब चुके हैं, तो आज आपको हम बताएंगे उम्दा और पोषक तत्वों से युक्त जुकिनी सब्जी के बारे में। इस सब्जी को आप बड़े स्वाद से खा सकते हैं।

 

सब्जियों का सेवन शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरुरी

सामान्यतौर पर घरों में लौकी, भिंडी एवं तोरई आदि जैसी सब्जियां बनाई जाती हैं। लेकिन हम आपको आज बताएंगे एक ऐसी सब्जी के बारे में जिसका नाम भी बहुत कम लोग जानते हैं। हर कोई जानता है, कि अच्छी सब्जी खाने से सेहत और बुद्धि भी अच्छी रहती है। यहां तक कि चिकित्स्कों का भी यही कहना होता है, कि अच्छी सेहत के लिए अच्छी
सब्जियों का सेवन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इस बात में कोई शक भी नहीं है। क्योंकि, शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक विकास के लिए अच्छी सब्जियों का सेवन करना अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इसलिए आज हम इस लेख में आपको एक अनसुनी सब्जी के बारे में बताऐंगे। इस सब्जी का नाम जिकुनी है। अजीब से नाम की यह सब्जी एक प्रकार की तोरई है, जो की रंगीन होती है। 

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जुकिनी तोरी क्या और कैसी होती है

यह सब्जी बिल्कुल कद्दू की भांति दिखाई पड़ती है। परंतु, यह कद्दू नहीं होती है। इसका रंग, आकार एवं बाहरी छिलका बेसक कद्दू जैसा है। परंतु, खाने एवं बनाने में यह बिल्कुल तोरी जैसी होती है। बहुत सारे क्षेत्रों में यह भिन्न-भिन्न रंग की होती है, कुछ क्षेत्रों में यह पीले व हरे रंग की होती है। इसको भिन्न-भिन्न नाम जैसे कि नेनुआ, तोरी और तोरई आदि से भी जाना जाता है।

 

जिकुनी में विटामिन और खनिज भरपूर मात्रा में पाया जाता है

जिकुनी सब्जी के अंदर विभिन्न प्रकार के पोषण तत्व पाए जाते हैं। खबरों के मुताबिक, इसमें तकरीबन समस्त प्रकार के विटामिन व खनिजों का मिश्रण पाया जाता है। विटामिन ए, सी, के, पोटेशियम और फाइबर आदि की भरपूर मात्रा पाई जाती है। अब ऐसी स्थिति में यदि आप इस जुकिनी सब्जी का सेवन करते हैं, तो आप विभिन्न प्रकार की बीमारियों से निजात पा सकते हैं। 

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जिकुनी के एक पौधे से कितने किलो फल मिल सकेंगे

यदि आप इस जुकिनी सब्जी की खेती करते हैं, तो आप इससे काफी अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। क्योंकि, इसके एक पौधे से तकरीबन 12 किलो तक फल प्राप्त होते हैं। परंतु, ध्यान देने योग्य बात यह है, कि इसकी खेती सितंबर एवं नवंबर के महीने में की जाती है। देखा जाए तो इसकी खेती से 25 से 30 दिन के अंदर ही फल आने चालू हो जाते हैं। फिर उसके पश्चात 40 से 45 दिनों के भीतर ही इसके फलों की तुड़ाई आरंभ कर दी जाती है। बाजार में जुकिनी सब्जी की कीमत तकरीबन 25 से 30 रुपए प्रति किलो के भाव होती है।

बैंक की नौकरी छोड़ महज डेढ़ कट्ठा में मशरूम उत्पादन कर 60 हजार महीना कमा रहा किसान

बैंक की नौकरी छोड़ महज डेढ़ कट्ठा में मशरूम उत्पादन कर 60 हजार महीना कमा रहा किसान

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि किसान देवाशीष कुमार MBA पास हैं। वह पहले एचडीएफसी बैंक में नौकरी किया करते थे। परंतु, उनका मन खेती में नहीं लगता था। अब ऐसी स्थिति में उन्होंने बैंक की नौकरी छोड़कर उन्होंने मशरूम की खेती चालू कर दी। खेती की शुरुआत उन्होंने महज एक हजार रुपये से की थी। मशरूम की सब्जी बेहद ही ज्यादा स्वादिष्ट होती है। इसका सेवन करना अधिकांश लोग पसंद करते हैं। मशरूम में विटामिन B1, विटामिन B2, विटामिन B12, विटामिन C, विटामिन E, प्रोटीन, खनिज, डाइटरी फाइबर भरपूर मात्रा में पाया जाता है। इसका नियमित तौर पर सेवन करने से लोगों के शरीर में पोषक तत्वों की कमी नहीं होती है। यही कारण है, कि बाजार में मशरूम की मांग काफी बढ़ती जा रही है। ऐसी स्थिति में इसकी खेती करने वाले किसानों की तादात भी बढ़ रही है। बिहार एवं झारखंड में किसान आज कल पारंपरिक फसलों के साथ-साथ मशरूम का भी उत्पादन कर रहे हैं। इससे उनको काफी मोटी आमदनी हो रही है।

किसान देवाशीष की मशरूम की खेती ने बदली किस्मत

इस लेख में हम झारखंड के एक ऐसे किसान के विषय में चर्चा करेंगे, जिनकी तकदीर
मशरूम की खेती से बदल चुकी है। वह अब मशरूम उत्पादन से महीने में हजारों रुपये की आमदनी कर रहे हैं। मशरूम की खेती करने वाले इस किसान का नाम देवाशीष कुमार है। वह पूर्वी सिंहभूम जनपद मौजूद जमशेदपुर के मूल निवासी हैं। उन्होंने डेढ़ कट्ठे भूमि पर मशरूम की खेती कर रखी है, जिससे उनको प्रति महीने 50 से 60 हजार रुपये की आमदनी हो रही है। मुख्य बात यह है, कि देवाशीष कुमार ने अपने इस व्यवसाय की शुरुआत केवल 1 हजार रुपये की धनराशि से की थी।

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देवाशीष कुमार पहले कहां नौकरी किया करते थे

जैसा कि उपरोक्त में बताया गया है, कि देवाशीष कुमार एबीए पास हैं। बतादें, कि साल 2015 से पूर्व वह एचडीएफसी बैंक में नौकरी किया करते थे। इसी दौरान उनका बिहार राज्य के समस्तीपुर मौजूद राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय में जाना हुआ। जहां पर उनको मशरूम की खेती के विषय में जानकारी मिली है। इसके पश्चात उन्होंने मशरूम की खेती करने का प्रशिक्षण लिया। उसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी एवं घर आकर एक हजार रुपए की पूंजी लगाकर मशरुम की खेती चालू कर दी है। हालांकि, आरंभ में घर वालों ने उनके इस निर्णय का कड़ा विरोध किया, परंतु वह अपने काम में बिना रुके लगे रहे।

किसान देवाशीष मशरुम उत्पादन का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं

देवाशीष कुमार का गांव में काफी बड़ा घर है। वह घर के ही चार कमरों में मशरुम की खेती कर रहे हैं। उनको पहली बार में ही सफलता हाथ लग गई। मशरूम की पैदावार भी अच्छी हुई बाजार में भाव भी अच्छा मिल गया, जिससे उन्हें काफी मोटी आमदनी भी हुई। इसके उपरांत देवाशीष कुमार ने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज उन्होंने अपनी खेती में 2 महिलाओं को स्थाई तौर पर रोजगार भी दे रखा है। खास बात यह है, कि देवाशीष मशरूम उत्पादन के साथ-साथ नए लोगों को मशरुम उत्पादन का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं।

देवाशीष इन किस्मों के मशरूम की खेती कर रहे हैं

देवाशीष ने बताया है, कि चारों कमरों का क्षेत्रफल तकरीबन डेढ़ कट्ठे जमीन के समतुल्य होता है। साथ ही, गर्मी के मौसम में कमरे का तापमान कम करने के लिए भूमि पर तीन इंच बालू को बिछा देते हैं। बाद में उसके ऊपर समय-समय पर पानी का छिड़काव करते रहते हैं। इससे कमरे का तापमान एक संतुलित मात्रा में रहता है। देवाशीष प्रमुख रुप से मिल्की मशरूम, ऑएस्टर, पैडी स्ट्रॉ एवं क्लाऊड मशरुम की खेती करते हैं। साथ ही, मशरुम पाउडर भी निर्मित करते हैं। वेंडर्स आकर उनसे सारा मशरुम खरीद लेते हैं। सर्दियों के दौरान चार के स्थान पर छह कमरों में मशरुम की खेती करते हैं।
भारत के किसान खेती में इजराइली तकनीकों का उपयोग कर बेहतरीन उत्पादन कर रहे हैं

भारत के किसान खेती में इजराइली तकनीकों का उपयोग कर बेहतरीन उत्पादन कर रहे हैं

कृषि क्षेत्र में इजराइल की तकनीक का उपयोग कर भारतीय किसान भी काफी अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। इजराइली तकनीक के माध्यम से खेती करने के चलते जमीन की उत्पादकता में भी काफी वृद्धि हो रही है।​ इजराइल अपनी तकनीक को लेकर सदैव चर्चा में बना रहता है। अब चाहे फिर वो डिफेंस सिस्टम आयरन डोम हो अथवा फिर खेती में इस्तेमाल होने वाली विभिन्न नवीन-नवीन प्रणालियां। यही वजह है, कि भारत के किसानों को भी इजराइल की तकनीक का उपयोग करने के लिए कहा जाता है। भारत के अधिकांश किसान इजराइली तकनीक का इस्तेमाल भी कर रहे हैं। साथ ही, शानदार मुनाफा भी हांसिल कर रहे हैं। आइए आगे हम आपको इस लेख में उन तकनीकों के विषय में बताऐंगे जिनका उपयोग कर भारतीय किसान काफी शानदार आमदनी कर रहे हैं।

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इजराइल में बागवानी हेतु विभिन्न प्रोजेक्ट जारी किए जा रहे हैं

इजराइल में फल, फूल और सब्जियों की आधुनिक खेती के लिए बहुत सारे प्रोजेक्ट चलाए जा रहे हैं। कृषि के क्षेत्र में मदद करने के लिए भारत एवं इजराइल के बीच बहुत सारे समझौते भी हुए हैं। इन समझौतों में संरक्षित खेती पर विशेष तौर पर ध्यान दिया गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इजराइल से भारत के किसानों ने जो संरक्षित खेती के तौर तरीके सीखे हैं, उनकी वजह से क‍िसी भी सीजन में कोई भी फल खाने को म‍िल जाता है। इस टेक्निक की सहायता से वातावरण को नियंत्रित किया जाता है। साथ ही, एक बेहतरीन खेती भी की जाती है।

वातावरण फसल के अनुरूप निर्मित किया जाता है

इसके अंतर्गत कीट अवरोधी नेट हाउस, ग्रीन हाउस, प्लास्टिक लो-हाई टनल एवं ड्रिप इरीगेशन आता है। बाहर का मौसम भले ही कैसा भी हो, परंतु इस तकनीक के माध्यम से फल, फूल और सब्जियों के मुताबिक वातावरण निर्मित कर दिया जाता है। इसके चलते किसान भाई बहुत सी फसलों का उत्पादन कर रहे हैं। साथ ही, उन्हें बेहतरीन कीमतों में बेच रहे हैं। किसानों को बहुत सारी फसलों के दाम तो दोगुने भी मिल जाते हैं। जानकारों के मुताबिक, तो इस खेती को विश्व की सभी प्रकार की जलवायु जैसे शीतोष्ण, सम शीतोष्ण कटिबंधीय, उष्णकटिबंधीय इत्यादि में अपनाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त संरक्षित खेती के चलते जमीन की उत्पादकता में भी काफी बढ़ोतरी होती है।
इस राज्य में फसल पर ड्रोन से छिड़काव व निगरानी बिल्कुल मुफ्त में की जाएगी

इस राज्य में फसल पर ड्रोन से छिड़काव व निगरानी बिल्कुल मुफ्त में की जाएगी

झारखंड में फसलों की निगरानी के लिए ड्रोन तकनीक का उपयोग किया जाएगा। इससे फसलों की सुरक्षा के साथ-साथ किसानों के समय की बचत होगी। इसके लिए कृषि विभाग की ओर से प्रस्ताव तैयार किया गया है और कमेटी को प्रस्ताव भेजा गया है। बता दें कि राज्य के 167 सेंटर से किसानों को ड्रोन की मुफ्त सेवा मिलेगी। झारखंड राज्य में ड्रोन के माध्यम से फसल एवं पौधों का संरक्षण किया जाएगा। ड्रोन से फसलों एवं पौधों का बचाव करने के लिए दवा का स्प्रे एवं सर्वेक्षण का काम किया जाएगा। इसके लिए कृषि विभाग की तरफ से प्रस्ताव तैयार किया गया है। इसमें कीटनाशक दवा एवं संबंधित कार्य के लिए उपकरण खरीदा जाएगा। इसके लिए संबंधित समिति को प्रस्ताव भेजा गया है।

इस तरह की योजना पहले से ही चल रही थी  

बतादें, कि छत्तीसगढ़ में इस प्रकार की योजना पहले से चल रही थी। विगत कुछ वर्षों से इस योजना पर विभाग की तरफ से ध्यान नहीं दिया जा रहा था। जब राज्य में निरंतर दो वर्षों से कम वर्षा होने की वजह से बहुत से प्रखंडों में सुखाड़ की स्थिति पैदा हो गई। विलंभ से बारिश होने पर किसानों ने धान की विलंभ से ही रोपाई की है। विभाग द्वारा फसल क्षति को लेकर जमीन आंकलन कराया गया और इसमें फसल हानि के कारणों का पता किया गया, तब समय पर कीटनाशक दवा का छिड़काव नहीं होने तथा बाकी रोगों से फसल के खराब होने की भी जानकारी मिली। इसके पश्चात फसलों का संरक्षण करने के लिए ड्रोन से दवा छिड़काव करने एवं सर्वेक्षण का कार्य करने के लिए जाने का प्रस्ताव तैयार किया गया है।

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छत्तीसगढ़ में लगभग 167 पौध संरक्षण केंद्र हैं 

राज्य में समकुल 167 प्लांट प्रोटेक्शन सेंटर पहले से स्थापित हैं। प्रत्येक केंद्र में तीन पद सृजित हैं, जिसमें कनीय प्लांट प्रोटेक्शन अफसर समेत अन्य के पद शम्मिलित है। परंतु, केंद्र पर कर्मियों की कमी है। इसके लिए अब आउटसोर्स के माध्यम से कर्मियों को बहाल किए जाने की योजना निर्मित की जा रही है। ड्रोन समेत अन्य उपकरण की खरीदारी सरकार की तरफ से की जा रही है। हालांकि, कितने ड्रोन खरीदे जाएं, इस पर वर्तमान में विचार-विमर्श चल रहा है। इसके पश्चात आउटसोर्स कर्मियों को ड्रोन चलाने का प्रशिक्षण भी दिया जाएगा।

किसानों को यह सुविधा पूर्णतय मुफ्त में प्रदान की जाऐगी 

बतादें, कि इस योजना में कुल 32 करोड़ रुपये खर्च होने वाले हैं। हालांकि, यह खर्चा बढ़ भी सकता है। ड्रोन की खरीदारी एवं प्रशिक्षण के पश्चात प्लांट प्रोटेक्शन केंद्र पर कोई भी किसान अपने खेतों में स्प्रे के लिए आवेदन देगा। इसके बाद सेंटर से ड्रोन ले जाकर किसान के खेतों में छिड़काव का कार्य किया जाएगा। यह सेवा पूर्ण रूप से नि:शुल्क मुहैय्या कराई जाएगी। विभाग की तरफ से फसल एवं पौधे के पोषण के लिए दवा कीटनाशक दवा के साथ-साथ बाकी की खरीदारी भी विभाग की तरफ से की जा रही है।