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जायद सीजन में इन फसलों की बुवाई कर किसान अच्छा लाभ उठा सकते हैं

जायद सीजन में इन फसलों की बुवाई कर किसान अच्छा लाभ उठा सकते हैं

रबी की फसलों की कटाई का समय लगभग आ ही गया है। अब इसके बाद किसान भाई अपनी जायद सीजन की फल एवं सब्जियों की बुवाई शुरू करेंगे। 

बतादें, कि गर्मियों में खाए जाने वाले प्रमुख फल और सब्जियां जायद सीजन में ही उगाए जाते हैं। इन फल-सब्जियों की खेती में पानी की खपत बहुत ही कम होती है। परंतु, गर्मियां आते ही बाजार में इनकी मांग काफी बढ़ जाती है। 

उदाहरण के लिए सूरजमुखी, तरबूज, खरबूज, खीरा, ककड़ी सहित कई फसलों की उपज लेने के लिए जायद सीजन में बुवाई करना लाभदायक माना जाता है। यह मध्य फरवरी से चालू होता है। 

उसके बाद मार्च के समापन तक फसलों की बुवाई कर दी जाती है। फिर गर्मियों में भरपूर उत्पादन हांसिल होता है। मई, जून, जुलाई, जब भारत गर्मी के प्रभाव से त्रस्त हो जाता है। उस समय शायद सीजन की यह फसलें ही पानी की उपलब्धता को सुनिश्चित करती हैं। 

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खीरा मानव शरीर को स्वस्थ भी रखता है। इस वजह से बाजार में इनकी मांग अचानक से बढ़ जाती है, जिससे किसानों को भी अच्छा-खासा मुनाफा प्राप्त होता है। शीघ्र ही जायद सीजन दस्तक देने वाला है। 

ऐसे में किसान खेतों की तैयारी करके प्रमुख चार फसलों की बिजाई कर सकते हैं। ताकि आने वाले समय में उनको बंपर उत्पादन प्राप्त हो सके।

सूरजमुखी 

सामान्य तौर पर सूरजमुखी की खेती रबी, खरीफ और जायद तीनों ही सीजन में आसानी से की जा सकती है। लेकिन जायद सीजन में बुवाई करने के बाद फसल में तेल की मात्रा कुछ ज्यादा बढ़ जाती है। किसान चाहें तो रबी की कटाई के पश्चात सूरजमुखी की बुवाई का कार्य कर सकते हैं।

वर्तमान में देश में खाद्य तेलों के उत्पादन को बढ़ाने की कवायद की जा रही है। ऐसे में सूरजमुखी की खेती करना अत्यंत फायदे का सौदा साबित हो सकता है। बाजार में इसकी काफी शानदार कीमत मिलने की संभावना रहती है।

तरबूज 

विभिन्न पोषक तत्वों से युक्त तरबूज तब ही लोगों की थाली तक पहुंचता है, जब फरवरी से मार्च के मध्य इसकी बुवाई की जाती है। यह मैदानी इलाकों का सर्वाधिक मांग में रहने वाला फल है। 

खास बात यह है, की पानी की कमी को पूरा करने वाला यह फल काफी कम सिंचाई एवं बेहद कम खाद-उर्वरक में ही तैयार हो जाता है। 

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तरबूज की मिठास और इसकी उत्पादकता को बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक तरीके से तरबूज की खेती करने की सलाह दी जाती है। यह एक बागवानी फसल है, जिसकी खेती करने के लिए सरकार अनुदान भी उपलब्ध कराती है। इस प्रकार कम खर्चे में भी तरबूज उगाकर शानदार धनराशि कमाई जा सकती है। 

खरबूज

तरबूज की तरह खरबूज भी एक कद्दूवर्गीय फल है। खरबूज आकार में तरबूज से थोड़ा छोटा होता है। परंतु, मिठास के संबंध में अधिकांश फल खरबूज के समक्ष फेल हैं। पानी की कमी एवं डिहाइड्रेशन को दूर करने वाले इस फल की मांग गर्मी आते ही बढ़ जाती है।

खरबूज की खेती से बेहतरीन उत्पादकता प्राप्त करने के लिए मृदा का उपयोग होना अत्यंत आवश्यक है। हल्की रेतीली बलुई मृदा खरबूज की खेती के लिए उपयुक्त मानी गई है। किसान भाई चाहें तो खरबूज की नर्सरी तैयार करके इसके पौधों की रोपाई खेत में कर सकते हैं।

खेतों में खरबूज के बीज लगाना बेहद ही आसान होता है। अच्छी बात यह है, कि इस फसल की खेती के लिए भी ज्यादा सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। असिंचित इलाकों में भी खरबूज की खेती से अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है। 

खीरा 

गर्मियों में खीरा का बाकी फलों से अधिक उपयोग होता है। खीरा की तासीर काफी ठंडी होने की वजह से सलाद से लेकर जूस के तौर पर इसका सेवन किया जाता है। शरीर में पानी की कमी को पूरा करने वाला यह फल भी अप्रैल-मई से ही मांग में रहता है। 

मचान विधि के द्वारा खीरा की खेती करके शानदार उत्पादकता प्राप्त की जा सकती है। इस प्रकार कीट-रोगों के प्रकोप का संकट बना ही रहता है। फसल भूमि को नहीं छूती, इस वजह से सड़न-गलन की संभावना कम रहती है। नतीजतन फसल भी बर्बाद नहीं होती है। 

खीरा की खेती के लिए नर्सरी तैयार करने की राय दी जाती है। किसान भाई खीरा को भी रेतीली दोमट मृदा में उगाकर शानदार उपज प्राप्त कर सकते हैं। 

खीरा की बीज रहित किस्मों का चलन काफी तेजी से बढ़ता जा रहा है। किसान भाई यदि चाहें तो खीरा की उन्नत किस्मों की खेती करके मोटा मुनाफा अर्जित कर सकते हैं।

ककड़ी 

खीरा की भांति ककड़ी की भी अत्यंत मांग रहती है। इसका भी सलाद के रूप में सेवन किया जाता है। उत्तर भारत में ककड़ी का बेहद चलन है। खीरा और ककड़ी की खेती तकरीबन एक ही ढ़ंग से की जाती है। किसान चाहें तो खेत के आधे भाग में खीरा और आधे भाग में ककड़ी उगाकर भी अतिरिक्त आमदनी उठा सकते हैं।

अगर मचान विधि से खेती कर रहे हैं, तो भूमि पर खरबूज और तरबूज उगा सकते हैं। शायद सीजन का मेन फोकस गर्मियों में फल-सब्जियों की मांग को पूर्ण करना है। 

साथ ही, इन चारों फल-सब्जियों की मांग बाजार में बनी रहती है। इसलिए इनकी खेती भी किसानों के लाभ का सौदा सिद्ध होगी। 

जानें वन करेला की सम्पूर्ण जानकारी

जानें वन करेला की सम्पूर्ण जानकारी

वन करेला की खेती हमारे देश के बहुत से राज्यों में की जाती है। इसे अलग अलग जगहों पर अलग अलग नामो से जाना जाता है, जैसे : मीठा करेला ,जंगली करेला , कंटीला परवल , करोल ,भाट करेला ,आदि। यह मानसून में मिलने वाली एक तरह की सब्जी है। इस सब्जी के बाहरी सतह पर कांटेदार रेशे उगे हुए होते है। वन करेला आकर में बहुत छोटा रहता है। इसका वैज्ञानिक नाम मोमोरेख डाइगोवा है। 

वन करेले की खेती 

वन करेले ज्यादातर बारिश के मौसम में होते है। बारिश होने पर वन करेला की बेले अपने आप उगने लग जाती है। यह सब्जी अन्य सब्जियों की तुलना में काफी महंगी होती है। इसके बीज आसानी से न मिलने के कारण इसकी खेती नहीं की जा सकती है। बारिश का सीजन ख़त्म होने के बाद वन करेले के बीज जमीन पर गिर जाते है। पहली बारिश के होते ही वन करेले की बेले उगने लगती है। 

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वन करेले की किस्में

वन करेला की दो किस्में होती है ,जो खेती के रूप में उगाई जाती है। जैसे : छोटे आकर वाले वन करेले और इंदिरा आकर ( आर एम एफ 37 )। वन करेले का प्रबंधन कंद या बीजो के द्वारा किया जाता है। इसीलिए किसानों द्वारा अच्छी वैरायटी वाले बीजो का उपयोग करना चाहिए। बुवाई से पहले बीजो की अच्छे से जांच कर ले ,कही बीज रोगग्रस्त तो नहीं है। 

वन करेला के बीजो की बुवाई 

वन करेले की खेती के लिए मिट्टी का पीअच स्तर 6-7 माना जाता है। इसकी बुवाई का काम दोमट और बलुई मिट्टी में किया जा सकता है। लेकिन अच्छी पैदावार के लिए दोमट मिट्टी को ज्यादा उपयोगी माना जाता है। वन करेले के पौधे को अच्छे से पनपने के लिए  गर्म आद्र जलवायु की आवश्यकता रहती है। 

वन करेले की बुवाई के लिए किसी खास तकनीक की आवश्यकता नहीं रहती है। वन करेले के बीजो को रात में गर्म पानी में भिगोकर रख दे। इससे बीजो का अच्छा अंकुरण होता है। इसकी बुवाई 3-4 इंच की दूरी पर की जाती है। आवश्यकता अनुसार इसमें पानी देते रहना चाहिए। बुवाई के कुछ दिन बाद ही इसमें नन्हे नन्हे पौधे देखने को मिलते है। 

वन करेला का आहार करने से हो सकते है ,ये लाभ 

वन करेला में बहुत से विटामिन ,कैल्शियम ,जिंक ,कॉपर और मैग्नीशियम जैसे तत्व पाए जाते है। इसके उपयोग से बहुत सी बिमारियों में तो आराम मिलता है ,लेकिन ये स्वास्थ के लिए भी बेहद लाभकारी होती है ,जानिए कैसे :

कार्बोहायड्रेट से परिपूर्ण 

वन करेले में अधिक मात्रा में कार्बोहायड्रेट पाया जाता है। कार्बोहायड्रेट का सेवन करने से शरीर में फुर्ती और ताकत आती हैं ,जो की किसी भी काम को करने के लिए बेहद आवश्यक रहती है। दिन प्रतिदिन होने वाले कामो के लिए शरीर में ताकत रहना जरूरी है ,बिना ताकत के कोई भी काम नहीं हो पायेगा। 

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विटामिन से भरपूर 

वन करेले के अंदर बहुत से विटामिन पाए जाते है, इसमें विटामिन ए और विटामिन बी भरपूर मात्रा में पाया जाता है। वन करेले का सेवन करने से शरीर के अंदर विटामिन्स की जो कमी रहती है उसे कम करता है। महंगी महंगी दवाइयों के सेवन से भी कोई फायदा न मिलने पर भी आहार में वन करेले का उपयोग करके देख सकते है। इसके उपयोग से आपको शरीर में विटामिन की कमी महसूस नहीं होगी। 

प्रोटीन और फाइबर की उचित मात्रा 

वन करेले में प्रोटीन और फाइबर की उचित मात्रा पायी जाती है।  प्रोटीन जो शरीर के अंदर कोशिकाओं की मरम्मत करने में सहायक रहता है। और फाइबर जो शरीर की पाचन किर्यो को स्वस्थ रखने में मददगार रहता है। यह पाचन किर्याओ को सुचारु रूप से कार्य करने के लिए मदद करता है। 

वन करेले की खेती ज्यादातर पहाड़ी इलाकों में की जाती है। वन करेले की तासीर गर्म रहती है, साथ ही ये खाने में भी बहुत स्वादिष्ट लगती है। 

वन करेला बरसात के मौसम में होने वाली खुजली , पीलिया और बेहोशी में भी लाभदायक साबित हुआ है।  इसके अलावा वन करेला का आहार करने से आँखों की समस्या ,बुखार और इन्फेक्शन जैसे समस्याओं से भी राहत मिलती है। इसके खाने से ब्लड शुगर लेवल भी संतुलित रहता है।

खीरे की उन्नत खेती से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी

खीरे की उन्नत खेती से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी

कद्दूवर्गीय फसलों में खीरा का अपना एक विशेष स्थान है। क्योंकि भोजन के साथ सलाद के रूप में खीरा सबसे ज्यादा उपयोग होने वाली फसल है। इस वजह से खीरा का उत्पादन देश के सभी हिस्सों में किया जाता है। गर्मियों में खीरे की बाजार में प्रचंड मांग बनी रहती है। इसे मुख्यत: भोजन के साथ सलाद के तौर पर कच्चा खाया जाता है। ये शरीर को गर्मी से शीतलता प्रदान करता है और हमारे शरीर में पानी की कमी को भी पूरा करता है। इसलिए गर्मियों में इसका सेवन करना बेहद लाभकारी बताया गया है। खीरे की गर्मियों में बाजार मांग को मद्देनजर रखते हुए जायद सीजन में इसकी खेती करके शानदार मुनाफा अर्जित किया जा सकता है।

खीरे की फसल में पाएं जाने वाले पोषक तत्व

खीरे का वानस्पतिक नाम कुकुमिस स्टीव्स है। यह एक बेल की भाँति लटकने वाला पौधा है। खीरे के पौधे का आकार बड़ा, पत्ते बेलों वाले और त्रिकोणीय आकार के होते है और इसके फूल पीले रंग के होते हैं। खीरे में 96 फीसद पानी होता है, जो गर्मी के मौसम में लाभकारी होता है। खीरा एम बी (मोलिब्डेनम) और विटामिन का एक शानदार स्त्रोत है। खीरे का प्रयोग दिल, त्वचा और किडनी की दिक्कतों के इलाज और अल्कालाइजर के तौर पर किया जाता है।

खीरे की विभिन्न प्रकार की उन्नत किस्में

खीरे की कुछ उन्नत भारतीय किस्में- पंजाब सलेक्शन, पूसा संयोग, पूसा बरखा, खीरा 90, कल्यानपुर हरा खीरा, कल्यानपुर मध्यम, स्वर्ण अगेती, स्वर्ण पूर्णिमा, पूसा उदय, पूना खीरा और खीरा 75 आदि प्रमुख हैं।

खीरे की नवीनतम किस्में- पीसीयूएच- 1, पूसा उदय, स्वर्ण पूर्णा और स्वर्ण शीतल आदि प्रमुख है।

खीरे की संकर किस्में- पंत संकर खीरा- 1, प्रिया, हाइब्रिड- 1 और हाइब्रिड- 2 आदि प्रमुख है।

खीरे की विदेशी किस्में- जापानी लौंग ग्रीन, चयन, स्ट्रेट- 8 और पोइनसेट आदि प्रमुख है।

खीरे की उन्नत खेती के लिए जलवायु व मृदा

सामान्य तौर पर खीरे को रेतीली दोमट व भारी मृदा में उत्पादित किया जाता है। परंतु, इसकी खेती के लिए एक बेहतर जल निकास वाली बलुई एवं दोमट मृदा उपयुक्त रहती है। खीरे की खेती के लिए मृदा का पीएच मान 6-7 के मध्य होना चाहिए। क्योंकि, यह पाला सहन नहीं कर सकता है। इसकी खेती उच्च तापमान में काफी बेहतरीन होती है। इसलिए जायद सीजन में इसकी खेती करना अच्छा रहता है।

मटर की खेती से संबंधित अहम पहलुओं की विस्तृत जानकारी

मटर की खेती से संबंधित अहम पहलुओं की विस्तृत जानकारी

मटर की खेती सामान्य तौर पर सर्दी में होने वाली फसल है। मटर की खेती से एक अच्छा मुनाफा तो मिलता ही है। साथ ही, यह खेत की उर्वराशक्ति को भी बढ़ाता है। इसमें उपस्थित राइजोबियम जीवाणु भूमि को उपजाऊ बनाने में मदद करता है। अगर मटर की अगेती किस्मों की खेती की जाए तो ज्यादा उत्पादन के साथ भूरपूर मुनाफा भी प्राप्त किया जा सकता है। इसकी कच्ची फलियों का उपयोग सब्जी के रुप में उपयोग किया जाता है. यह स्वास्थ्य के लिए भी काफी फायदेमंद होती है. पकने के बाद इसकी सुखी फलियों से दाल बनाई जाती है.

मटर की खेती

मटर की खेती सब्जी फसल के लिए की जाती है। यह कम समयांतराल में ज्यादा पैदावार देने वाली फसल है, जिसे व्यापारिक दलहनी फसल भी कहा जाता है। मटर में राइजोबियम जीवाणु विघमान होता है, जो भूमि को उपजाऊ बनाने में मददगार होता है। इस वजह से
मटर की खेती भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए भी की जाती है। मटर के दानों को सुखाकर दीर्घकाल तक ताजा हरे के रूप में उपयोग किया जा सकता है। मटर में विभिन्न प्रकार के पोषक तत्व जैसे कि विटामिन और आयरन आदि की पर्याप्त मात्रा मौजूद होती है। इसलिए मटर का सेवन करना मानव शरीर के लिए काफी फायदेमंद होता है। मटर को मुख्यतः सब्जी बनाकर खाने के लिए उपयोग में लाया जाता है। यह एक द्विबीजपत्री पौधा होता है, जिसकी लंबाई लगभग एक मीटर तक होती है। इसके पौधों पर दाने फलियों में निकलते हैं। भारत में मटर की खेती कच्चे के रूप में फलियों को बेचने तथा दानो को पकाकर बेचने के लिए की जाती है, ताकि किसान भाई ज्यादा मुनाफा उठा सकें। अगर आप भी मटर की खेती से अच्छी आमदनी करना चाहते है, तो इस लेख में हम आपको मटर की खेती कैसे करें और इसकी उन्नत प्रजातियों के बारे में बताऐंगे।

मटर उत्पादन के लिए उपयुक्त मृदा, जलवायु एवं तापमान

मटर की खेती किसी भी प्रकार की उपजाऊ मृदा में की जा सकती है। परंतु, गहरी दोमट मृदा में मटर की खेती कर ज्यादा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त क्षारीय गुण वाली भूमि को मटर की खेती के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता है। इसकी खेती में भूमि का P.H. मान 6 से 7.5 बीच होना चाहिए। यह भी पढ़ें: मटर की खेती का उचित समय समशीतोष्ण और उष्णकटिबंधीय जलवायु मटर की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है। भारत में इसकी खेती रबी के मौसम में की जाती है। क्योंकि ठंडी जलवायु में इसके पौधे बेहतर ढ़ंग से वृद्धि करते हैं तथा सर्दियों में पड़ने वाले पाले को भी इसका पौधा सहजता से सह लेता है। मटर के पौधों को ज्यादा वर्षा की जरूरत नहीं पड़ती और ज्यादा गर्म जलवायु भी पौधों के लिए अनुकूल नहीं होती है। सामान्य तापमान में मटर के पौधे बेहतर ढ़ंग से अंकुरित होते हैं, किन्तु पौधों पर फलियों को बनने के लिए कम तापमान की जरूरत होती है। मटर का पौधा न्यूनतम 5 डिग्री और अधिकतम 25 डिग्री तापमान को सहन कर सकता है।

मटर की उन्नत प्रजातियां

आर्केल

आर्केल किस्म की मटर को तैयार होने में 55 से 60 दिन का वक्त लग जाता है। इसका पौधा अधिकतम डेढ़ फीट तक उगता है, जिसके बीज झुर्रीदार होते हैं। मटर की यह प्रजाति हरी फलियों और उत्पादन के लिए उगाई जाती है। इसकी एक फली में 6 से 8 दाने मिल जाते हैं।

लिंकन

लिंकन किस्म की मटर के पौधे कम लम्बाई वाले होते हैं, जो बीज रोपाई के 80 से 90 दिन उपरांत पैदावार देना शुरू कर देते हैं। मटर की इस किस्म में पौधों पर लगने वाली फलियाँ हरी और सिरे की ऊपरी सतह से मुड़ी हुई होती है। साथ ही, इसकी एक फली से 8 से 10 दाने प्राप्त हो जाते हैं। जो स्वाद में बेहद ही अधिक मीठे होते हैं। यह किस्म पहाड़ी क्षेत्रों में उगाने के लिए तैयार की गयी है। यह भी पढ़ें: सब्ज्यिों की रानी मटर की करें खेती

बोनविले

बोनविले मटर की यह किस्म बीज रोपाई के लगभग 60 से 70 दिन उपरांत पैदावार देना शुरू कर देती है। इसमें निकलने वाला पौधा आकार में सामान्य होता है, जिसमें हल्के हरे रंग की फलियों में गहरे हरे रंग के बीज निकलते हैं। यह बीज स्वाद में मीठे होते हैं। बोनविले प्रजाति के पौधे एक हेक्टेयर के खेत में तकरीबन 100 से 120 क्विंटल की उपज दे देते है, जिसके पके हुए दानो का उत्पादन लगभग 12 से 15 क्विंटल होता है।

मालवीय मटर – 2

मटर की यह प्रजाति पूर्वी मैदानों में ज्यादा पैदावार देने के लिए तैयार की गयी है। इस प्रजाति को तैयार होने में 120 से 130 दिन का वक्त लग जाता है। इसके पौधे सफेद फफूंद और रतुआ रोग रहित होते हैं, जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 25 से 30 क्विंटल के आसपास होता है।

पंजाब 89

पंजाब 89 प्रजाति में फलियां जोड़े के रूप में लगती हैं। मटर की यह किस्म 80 से 90 दिन बाद प्रथम तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है, जिसमें निकलने वाली फलियां गहरे रंग की होती हैं तथा इन फलियों में 55 फीसद दानों की मात्रा पाई जाती है। यह किस्म प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 60 क्विंटल का उत्पादन दे देती है।

पूसा प्रभात

मटर की यह एक उन्नत क़िस्म है, जो कम समय में उत्पादन देने के लिए तैयार की गई है | इस क़िस्म को विशेषकर भारत के उत्तर और पूर्वी राज्यों में उगाया जाता है। यह क़िस्म बीज रोपाई के 100 से 110 दिन पश्चात् कटाई के लिए तैयार हो जाती है, जो प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 40 से 50 क्विंटल की पैदावार दे देती है। यह भी पढ़ें: तितली मटर (अपराजिता) के फूलों में छुपे सेहत के राज, ब्लू टी बनाने में मददगार, कमाई के अवसर अपार

पंत 157

यह एक संकर किस्म है, जिसे तैयार होने में 125 से 130 दिन का वक्त लग जाता है। मटर की इस प्रजाति में पौधों पर चूर्णी फफूंदी और फली छेदक रोग नहीं लगता है। यह किस्म प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 70 क्विंटल तक की पैदावार दे देती है।

वी एल 7

यह एक अगेती किस्म है, जिसके पौधे कम ठंड में सहजता से विकास करते हैं। इस किस्म के पौधे 100 से 120 दिन के समयांतराल में कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं। इसके पौधों में निकलने वाली फलियां हल्के हरे और दानों का रंग भी हल्का हरा ही पाया जाता है। इसके साथ पौधों पर चूर्णिल आसिता का असर देखने को नहीं मिलता है। इस किस्म के पौधे प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 70 से 80 क्विंटल की उपज दे देते हैं।

मटर उत्पादन के लिए खेत की तैयारी किस प्रकार करें

मटर उत्पादन करने के लिए भुरभुरी मृदा को उपयुक्त माना जाता है। इस वजह से खेत की मिट्टी को भुरभुरा करने के लिए खेत की सबसे पहले गहरी जुताई कर दी जाती है। दरअसल, ऐसा करने से खेत में उपस्थित पुरानी फसल के अवशेष पूर्णतय नष्ट हो जाते हैं। खेत की जुताई के उपरांत उसे कुछ वक्त के लिए ऐसे ही खुला छोड़ दिया जाता है, इससे खेत की मृदा में सही ढ़ंग से धूप लग जाती है। पहली जुताई के उपरांत खेत में 12 से 15 गाड़ी पुरानी गोबर की खाद को प्रति हेक्टेयर के मुताबिक देना पड़ता है।

मटर के पौधों की सिंचाई कब और कितनी करें

मटर के बीजों को नमी युक्त भूमि की आवश्यकता होती है, इसके लिए बीज रोपाई के शीघ्र उपरांत उसके पौधे की रोपाई कर दी जाती है। इसके बीज नम भूमि में बेहतर ढ़ंग से अंकुरित होते हैं। मटर के पौधों की पहली सिंचाई के पश्चात दूसरी सिंचाई को 15 से 20 दिन के समयांतराल में करना होता है। तो वहीं उसके उपरांत की सिंचाई 20 दिन के उपरांत की जाती है।

मटर के पौधों पर खरपतवार नियंत्रण किस प्रकार करें

मटर के पौधों पर खरपतवार नियंत्रण के लिए रासायनिक विधि का उपयोग किया जाता है। इसके लिए बीज रोपाई के उपरांत लिन्यूरान की समुचित मात्रा का छिड़काव खेत में करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त अगर आप प्राकृतिक विधि का उपयोग करना चाहते हैं, तो उसके लिए आपको बीज रोपाई के लगभग 25 दिन बाद पौधों की गुड़ाई कर खरपतवार निकालनी होती है। इसके पौधों को सिर्फ दो से तीन गुड़ाई की ही आवश्यकता होती है। साथ ही, हर एक गुड़ाई 15 दिन के समयांतराल में करनी होती है।
कृषि वैज्ञानिकों ने मटर की 5 उन्नत किस्मों को विकसित किया है

कृषि वैज्ञानिकों ने मटर की 5 उन्नत किस्मों को विकसित किया है

कृषक भाइयों रबी सीजन आने वाला है। इस बार रबी सीजन में आप मटर की उन्नत किस्म से काफी अच्छी पैदावार प्राप्त कर सकते हैं। बेहतरीन किस्मों के लिए भारत के कृषि वैज्ञानिक नवीन-नवीन किस्मों को तैयार करते रहते हैं। इसी कड़ी में वाराणसी के काशी नंदिनी भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान द्वारा मटर की कुछ बेहतरीन किस्मों को विकसित किया है। भारत में ऐसी बहुत तरह की फसलें हैं, जो किसानों को कम खर्चे व कम वक्त में अच्छा उत्पादन देती हैं। इन समस्त फसलों को किसान भाई अपने खेत में अपनाकर महज कुछ ही माह में मोटा मुनाफा कमा सकते हैं।

सब्जियों की खेती से भी किसान अच्छा-खासा मुनाफा कमा सकते हैं

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि ऐसी फसलों में
सब्जियों की फसल भी शम्मिलित होती है, जो किसान को हजारों-लाखों का फायदा प्राप्त करवा सकती है। यदि देखा जाए तो किसान अपने खेत में खरीफ एवं रबी सीजन के मध्य में अकेले मटर की बुवाई से ही 50 से 60 दिनों में काफी मोटी पैदावार अर्जित कर सकते हैं। जैसा कि हम सब जानते हैं, कि देश-विदेश के बाजार में मटर की हमेशा मांग बनी ही रहती है। बतादें, कि मटर की इतनी ज्यादा मांग को देखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान के कृषि वैज्ञानिकों ने मटर की बहुत सारी शानदार किस्मों को इजात किया है। जो कि किसान को काफी शानदार उत्पादन के साथ-साथ बाजार में भी बेहतरीन मुनाफा दिलाएगी।

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काशी अगेती

इस किस्म की मटर का औसत वजन 9-10 ग्राम होता है। बतादें, कि इसके बीज सेवन में बेहद ही ज्यादा मीठे होते हैं। इसकी फलियों की कटाई बुवाई के 55-60 दिन उपरांत किसान कर सकते है। फिर किसानों को इससे औसत पैदावार 45-40 प्रति एकड़ तक आसानी से मिलता है।

काशी मुक्ति

मटर की यह शानदार व उन्नत किस्म चूर्ण आसिता रोग रोधी है। यह मटर बेहद ही ज्यादा मीठी होती है। यह किस्म अन्य समस्त किस्मों की तुलना में देर से पककर किसानों को काफी अच्छा-खासा उत्पादन देती है। यदि देखा जाए तो काशी मुक्ति किस्म की प्रत्येक फलियों में 8-9 दाने होते हैं। इससे कृषक भाइयों को 50 कुंतल तक बेहतरीन पैदावार मिलती है।

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अर्केल मटर

यह एक विदेशी प्रजाति है, जिसकी प्रत्येक फलियों से किसानों को 40-50 कुंतल प्रति एकड़ पैदावार प्राप्त होती है। इसकी प्रत्येक फली में बीजों की तादात 6-8 तक पाई जाती है।

काशी नन्दनी

मटर की इस किस्म को वाराणसी के काशी नंदिनी भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान ने इजात किया है। इस मटर के पौधे आपको 45-50 सेमी तक लंबे नजर आऐंगे। साथ ही, इसमें पहले फलियों की उपज बुवाई के करीब 60-65 दिनों के उपरांत आपको फल मिलने लगेगा। बतादें, कि इसकी किस्म की हरी फलियों की औसत पैदावार 30-32 क्विंटल प्रति एकड़ तक अर्जित होती है। साथ ही, बीज उत्पादन से 5-6 क्विंटल प्रति एकड़ तक अर्जित होती है। ऐसे में यदि देखा जाए तो मटर की यह किस्म जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तरांचल, पंजाब, उत्तर प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के कृषकों के लिए बेहद शानदार है।

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काशी उदय

इस किस्म के पौधे संपूर्ण तरीके से हरे रंग के होते हैं। साथ ही, इसमें छोटी-छोटी गांठें और प्रति पौधे में 8-10 फलियां मौजूद होती हैं, जिसकी प्रत्येक फली में बीजों की तादात 8 से 9 होती है। इस किस्म से प्रति एकड़ कृषक 35-40 क्विंटल हरी फलियां अर्जित कर सकते हैं। किसान इस किस्म से एक नहीं बल्कि दो से तीन बार तक सुगमता से तुड़ाई कर सकते हैं।
किसान इस रबी सीजन में मटर की इन उन्नत किस्मों से बेहतरीन उत्पादन उठा सकते हैं

किसान इस रबी सीजन में मटर की इन उन्नत किस्मों से बेहतरीन उत्पादन उठा सकते हैं

किसानों के द्वारा रबी के सीजन में मटर की बिजाई अक्टूबर माह से की जाने लगती है। आज हम आपको इसकी कुछ प्रमुख उन्नत किस्मों के विषय में जानकारी देने जा रहे हैं। किसान कम समयावधि में तैयार होने वाली मटर की किस्मों की बुवाई सितंबर माह के अंतिम सप्ताह से लेकर अक्टूबर के बीच तक कर सकते हैं। इसकी खेती से किसान अपनी आमदनी को दोगुना तक कर सकते हैं। बतादें, कि इसमें काशी नंदिनी, काशी मुक्ति, काशी उदय और काशी अगेती प्रमुख फसलें हैं। इनकी विशेष बात है, कि यह 50 से 60 दिन के दौरान पककर तैयार हो जाती हैं। इससे खेत शीघ्रता से खाली हो जाता है। इसके पश्चात किसान सुगमता से दूसरी फसलों की बिजाई कर सकते हैं। किसान भाई कम समयावधि में तैयार होने वाली मटर की प्रजातियों की बुवाई सितंबर के अंतिम सप्ताह से लेकर अक्टूबर के बीच तक कर दी जाती है।

मटर की उन्नत किस्म

मटर की उन्नत किस्म काशी नंदिनी

इस किस्म को साल 2005 में विकसित किया गया था। इसकी खेती जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल और पंजाब में की जाती है। इससे प्रति हेक्टेयर औसतन 110 से 120 क्विंटल तक पैदावार हांसिल की जा सकती है।

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मटर की उन्नत किस्म काशी मुक्ति

यह किस्म मुख्य तौर पर झारखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब और बिहार के लिए अनुकूल मानी जाती है। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि इससे प्रति हेक्टेयर 115 क्विंटल तक उत्पादन हांसिल हो सकता है। इसकी फलियां और दाने काफी बड़े होते हैं। मुख्य बात यह है, कि इसकी विदेशों में भी काफी मांग रहती है।

मटर की उन्नत किस्म काशी अगेती

यह किस्म 50 दिन की समयावधि में पककर तैयार हो जाती है। बतादें, कि इसकी फलियां सीधी और गहरी होती हैं। इसके पौधों की लंबाई 58 से 61 सेंटीमीटर तक होती है। इसके 1 पौधे में 9 से 10 फलियां लग सकती हैं। इससे प्रति हेक्टेयर 95 से 100 क्विंटल तक का पैदावार प्राप्त हो सकता है।

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मटर की उन्नत किस्म काशी उदय

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि इस प्रजाति को साल 2005 में तैयार किया गया था। इसकी खासियत यह है, कि इसकी फली की लंबाई 9 से 10 सेंटीमीटर तक होती है। इसकी खेती प्रमुख रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में की जाती है। इससे प्रति हेक्टेयर 105 क्विंटल तक की पैदावार मिल सकती है। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि इसकी खेती से किसान अपनी आमदनी को दोगुना तक कर सकते हैं। इसमें काशी मुक्ति, काशी उदय, काशी अगेती और काशी नंदिनी प्रमुख हैं। इनकी विशेष बात है, कि यह 50 से 60 दिन के अंदर तैयार हो जाती हैं। इससे खेत जल्दी खाली हो जाता है। इसके उपरांत किसान आसानी से दूसरी फसलों की बुवाई कर सकते हैं।
मचान विधि - सब्जी की खेती करने का आसान तरीका

मचान विधि - सब्जी की खेती करने का आसान तरीका

जमीन पर खेती करना और मचान पर खेती करने में जमीन आसमान का अंतर है। मचान विधि खेती के लिए ज्यादा धन खर्चने की भी जरूरत नहीं है। इसके लिए जरूरी लकड़ी आदि का इंतजाम किसान ढेंचा आदि के माध्यम से खुद की जमीन के एक हिस्से या फिर मेंढ़ों के किनारे कर सकता है। मचान पर उगाई सब्जी और जमीन पर उगाई सब्जी की गुणवत्ता में काफी अंतर होता है।

  मचान विधि खेती 

 मचान विधि खेती यानी की खेत में जाल लगाकर उस पर बेलों का चढ़ाने को कहते हैं। इस तरीके से खेती करने में पानी से बेलें बची रहती हैं। फल जमीन से कई फीट हटकर लगते हैं। फलों की गुणवत्ता जमीन पर पड़े रहने, धूप और पानी के संपर्क में आने से खराब होती है। इसके अलावा मचान विधि से खेती करने का एक लाभ यह होता है कि फल लटकने के कारण लम्बा आकार भी लेते हैं। घीया तोरई जैसी फसलों की लम्बाई ज्यादा और मोटाई बेहद कम रहती है। पूरा फल एक ही रंगा का होता है। इसमें चमक भी ज्यादा रहती है।

  मचान विधि से सब्जी की खेती 

 मचान विधि खेती में सबसे जरूरी खेत में मचान बनाना होता है। बाकी तो जिस तरह से बेल वाली ​सब्जियों के लिए नाली बनाई जाती है उसी तरीके से बीज बुवान होता है। नालियों के मध्य बेल फेलने वाली जगह पर मचान बनाया जाता है। दोनों तरफ लकड़ी सीधी गाढकर तार या प्लास्टिक की मजबूत चीप से जाल बना दिया जाता है ताकि बेलें फैल सकें। इनकी तुडाई मचान के नीचे से बडी आसानी से हो जाती है।

कृषि वैज्ञानिकों की जायद सब्जियों की बुवाई को लेकर सलाह

कृषि वैज्ञानिकों की जायद सब्जियों की बुवाई को लेकर सलाह

कुछ ही दिनों में जायद (रबी और खरीफ के मध्य में बोई जाने वाली फसल) की सब्जियों की बुवाई का समय आने वाला है। इन फसलों की बुवाई फरवरी से मार्च तक की जाती हैं। इन फसलों में प्रमुख रूप से¨टिंडा, तरबूज, खरबूजा, खीरा, ककड़ी, लौकी, तुरई, भिंडी, अरबी शामिल हैं।

जिन किसानों ने खेतों में गाजर, फूल गोभी, पत्ता गोभी व आलू, ईख बोई हुई थी और अब इन फसलों के खेत खाली हो जाऐंगे। किसान इन खाली खेतों में जायद सब्जियों को बो सकते हैं। इन फसलों का लाभ किसान मार्च, अप्रैल, मई में मंडियों मे बेच कर उठा सकते हैं। इससे किसानों को काफी अच्छा आर्थिक लाभ मिलेगा।

कृषि वैज्ञानिकों की सब्जियों की बुवाई से संबंधित सलाह 

सब्जियों की बुवाई सदैव पंक्तियों में ही करें। बेल वाली किसी भी फसल लौकी, तुरई, टिंडा एक फसल के पौधे अलग-अलग जगह न लगाकर एक ही क्यारी में बिजाई करें। अगर लौकी की बेल लगा रहे हैं, तो इनके मध्य में और कोई बेल जैसे: करेला, तुरई इत्यादि न लगाएं। क्योंकि मधु मक्खियां नर व मादा फूलों के बीच परागकण का कार्य करती हैं तो किसी दूसरी फसल की बेल का परागकण लौकी के मादा फूल पर न छिड़क सकें और केवल लौकी की बेलों का ही परागकण परस्पर ज्यादा से ज्यादा छिड़क सकें। ताकि ज्यादा से ज्यादा फल लग सकें।

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कृषि वैज्ञानिकों की बेल वाली सब्जियों के लिए सलाह 

बेल वाली सब्जियां लौकी, तुरई, टिंडा आदि में बहुत बारी फल छोटी अवस्था में ही गल कर झड़ने लग जाते हैं। ऐसा इन फलों में संपूर्ण परागण और निषेचन नहीं हो पाने की वजह से होता है। मधु मक्खियों के भ्रमण को प्रोत्साहन देकर इस दिक्कत से बचा जा सकता है। बेल वाली सब्जियों की बिजाई के लिए 40-45 सेंटीमीटर चौड़ी और 30 सेंटीमीटर गहरी लंबी नाली निर्मित करें। पौधे से पौधे का फासला  60 सेंटीमीटर रखते हुए नाली के दोनों किनारों पर सब्जियों के बीच या पौध रोपण करें। बेल के फैलने के लिए नाली के किनारों से करीब 2 मीटर चौड़ी क्यारियां बनाएं। यदि स्थान की कमी हो तो नाली के सामानांतर लंबाई में ही लोहे के तारों की फैंसिग लगाकर बेल का फैलाव कर सकते हैं। रस्सी के सहारे बेल को छत या किसी बहुवर्षीय पेड़ पर भी फैलाव कर सकते है।

जायद सीजन में इन सब्जियों की खेती करना होगा लाभकारी

जायद सीजन में इन सब्जियों की खेती करना होगा लाभकारी

अब जायद यानी की रबी और खरीफ के मध्य में बोई जाने वाली सब्जियों की बुवाई का बिल्कुल सही समय चल रहा है। इन फसलों की बुवाई फरवरी से लेकर मार्च माह तक की जाती है। 

इन फसलों में विशेष रूप से खीरा, ककड़ी, लौकी, तुरई, भिंडी, अरबी, टिंडा, तरबूज और खरबूजा शामिल हैं। ऐसे किसान भाई जिन्होंने अपने खेतों में पत्ता गोभी, गाजर, फूल गोभी, आलू और ईख बोई हुई थी और अब इन फसलों के खेत खाली हो गए हैं। 

किसान इन खाली खेतों में जायद सब्जियों की बुवाई कर सकते हैं। किसान इन फसलों का फायदा मार्च, अप्रैल, मई में मंडियों मे बेच कर उठा सकते हैं। कृषकों को इससे काफी शानदार आर्थिक लाभ होगा।

सब्जियों की बुवाई की विधि 

सब्जियों की बुवाई सदैव पंक्तियों में करें। बेल वाली किसी भी फसल जैसे लौकी, तुरई, टिंडा एक फसल के पौधे अलग-अलग जगह न लगाकर एक ही क्यारी में बुवाई करें। 

लौकी की बेल लगा रहे हैं तो इनके बीच में अन्य कोई बेल जैसे: करेला, तुरई आदि न लगाऐं। क्योंकि मधु मक्खियां नर व मादा फूलों के बीच परागकण का कार्य करती हैं, तो किसी दूसरी फसल की बेल का परागकण लौकी के मादा फूल पर न छिड़क सकें।

वह केवल लौकी की बेलों का ही परागकण परस्पर अधिक से अधिक छिड़क सकें, जिससे ज्यादा से ज्यादा फल प्राप्त हो सकें।

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बेल वाली सब्जियों में किन बातों का ध्यान रखें 

बेल वाली सब्जियां जैसे कि लौकी, तुरई, टिंडा इत्यादि अधिकतर फल छोटी अवस्था में ही गल कर झड़ने लग जाते हैं। ऐसा इन फलों में पूर्ण परागण और निषेचन नहीं हो पाने के चलते होता है। मधु मक्खियों के भ्रमण को प्रोत्साहन देकर इस समस्या से बचा जा सकता है। 

बेल वाली सब्जियों की बिजाई के लिए 40-45 सेंटीमीटर चौड़ी और 30 सेंटीमीटर गहरी लंबी नाली का निर्माण करें। पौधे से पौधे की दूरी लगभग 60 सेंटीमीटर रखते हुए नाली के दोनों किनारों पर सब्जियों के बीज का रोपण करें। 

बेल के फैलने के लिए नाली के किनारों से करीब 2 मीटर चौड़ी क्यारियां बनाएं। यदि स्थान की कमी हो तो नाली के सामानांतर लंबाई में ही लोहे के तारों की फैंसिग लगाकर बेल का फैलाव कर सकते हैं। 

रस्सी के सहारे बेल का छत या किसी बहुवर्षीय पेड़ पर भी फैलाव कर सकते हैं।

निरंजन सरकुंडे का महज डेढ़ बीघे में बैंगन की खेती से बदला नसीब

निरंजन सरकुंडे का महज डेढ़ बीघे में बैंगन की खेती से बदला नसीब

किसान निरंजन सरकुंडे ने बताया है, कि उनके पास 5 एकड़ खेती करने लायक भूमि है। पहले सरकुंडे अपने खेत में पारंपरिक फसलों की खेती किया करते थे। जिससे उनको उतनी आमदनी नहीं हो पाती थी। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, झारखंड, बिहार और हरियाणा में ही किसान केवल बागवानी की ओर रुख नहीं कर रहे। इनके साथ-साथ दूसरे राज्यों में भी किसान पारंपरिक फसलों की जगह फल और सब्जियों की खेती में अधिक रुची ले रहे हैं। मुख्य बात यह है, कि सब्जियों की खेती करने से किसानों की आय में भी काफी इजाफा होगा। इससे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार देखने को मिलेगा। हालांकि, पहले पारंपरिक फसलों की खेती करने पर किसानों को खर्चे की तुलना में उतना ज्यादा मुनाफा नहीं होता था। साथ ही, परिश्रम भी काफी ज्यादा करना पड़ता था। बहुत बार तो अत्यधिक बारिश अथवा सूखा पड़ने से फसल भी बर्बाद हो जाती थी। परंतु, वर्तमान में बागवानी करने से किसानों को प्रतिदिन आमदनी हो रही है। 

महाराष्ट्र के नांदेड़ निवासी किसान का चमका नसीब

वर्तमान में हम महाराष्ट्र के नांदेड़ के निवासी एक ऐसे ही किसान के संबंध में बात करेंगे, जिनकी
सब्जी की खेती से किस्मत बदल गई। इस किसान का नाम निरंजन सरकुंडे है। वह नांदेड जिला स्थित जांभाला गांव के मूल निवासी हैं। निरंजन सरकुंडे एक छोटे किसान हैं। उनके समीप काफी कम भूमि है। उन्होंने डेढ़ बीघे भूमि पर बैंगन की खेती की है। विशेष बात यह है, कि विगत तीन वर्षों से वह इस खेत में बैंगन की पैदावार कर रहे हैं, जिससे उन्हें अभी तक चार लाख रुपये की आमदनी हुई है।

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बैंगन विक्रय कर कमा चुके 3 लाख रुपये का मुनाफा

निरंजन सरकुंडे का कहना है, कि उनके समीप 5 एकड़ खेती करने लायक भूमि है। निरंजन सरकुंडे इससे पहले अपने खेत में पारंपरिक फसलों की खेती किया करते थे। परंतु, उससे उनको उतनी ज्यादा कमाई नहीं हो पाती थी। अब ऐसी स्थिति में उन्होंने सब्जी का उत्पादन करने का निर्णय लिया। उन्होंने डेढ़ बीघे भूमि में बैंगन की बिजाई कर डाली, जिससे कि उनकी अच्छी-खासी आमदनी हो रही है। वर्तमान में वह बैंगन बेचकर 3 लाख रुपये का मुनाफा कमा चुके हैं। हालांकि, वह बैंगन के साथ-साथ पांरपरिक फसलों का भी उत्पादन कर रहे हैं। 

निरंजन सरकुंडे के बैगन की बिक्री स्थानीय बाजार में ही हो जाती है

वर्तमान में निरंजन सरकुंडे पूरे गांव के लिए मिसाल बन गए हैं। वर्तमान में पड़ोसी गांव ठाकरवाड़ी के किसानों ने भी उनको देखकर सब्जी की खेती चालू कर दी है। निरंजन सरकुंडे ने बताया है, कि इस डेढ़ बीघे भूमि में बैंगन की खेती से वह तकरीबन 3 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा अर्जित कर चुके हैं। हालांकि, डेढ़ बीघे भूमि में बैंगन की खेती करने पर उनको 30 हजार रुपये का खर्चा करना पड़ता है। छोटी जोत के किसान निरंजन द्वारा पैदा किए गए बैंगन की स्थानीय बाजार में अच्छी-खासी बिक्री है। सरकुंडे ने बताया है, कि ह वह अपने खेत की सब्जियों को बाहर सप्लाई नहीं करते हैं। उनके बैगन की स्थानीय बाजार में ही काफी अच्छी बिक्री हो जाती है।

ऑफ सीजन में गाजर बोयें, अधिक मुनाफा पाएं (sow carrots in off season to reap more profit in hindi)

ऑफ सीजन में गाजर बोयें, अधिक मुनाफा पाएं (sow carrots in off season to reap more profit in hindi)

गाजर जो दिखने में बेहद ही खूबसूरत होती है और इसका स्वाद भी काफी अच्छा होता है स्वाद के साथ ही साथ विभिन्न प्रकार से हमारे शरीर को लाभ पहुंचाती है। गाजर से जुड़ी पूरी जानकारी प्राप्त करने के लिए हमारे इस पोस्ट के अंत तक जरूर बने रहें । जानें कैसे ऑफ सीजन में गाजर बोयें और अधिक मुनाफा पाएं। 

ऑफ सीजन में गाजर की खेती दें अधिक मुनाफा

सलाद के लिए गाजर का उपयोग काफी भारी मात्रा में होता है शादियों में फेस्टिवल्स विभिन्न विभिन्न कार्यक्रमों में गाजर के सलाद का इस्तेमाल किया जाता है। इसीलिए लोगों में इसकी मांग काफी बढ़ जाती है, बढ़ती मांग को देखते हुए इनको ऑफ सीजन भी उगाया जाता है विभिन्न रासायनिक तरीकों से और बीज रोपड़ कर। 

गाजर की खेती

गाजर जिसको इंग्लिश में Carrot के नाम से भी जाना जाता है। खाने में मीठे होते हैं तथा दिखने में खूबसूरत लाल और काले रंग के होते हैं। लोग गाजर की विभिन्न  विभिन्न प्रकार की डिशेस बनाते हैं जैसे; गाजर का हलवा सर्दियों में काफी शौक और चाव से खाया जाता है। ग्रहणी गाजर की मिठाइयां आदि भी बनाती है। स्वाद के साथ गाजन में विभिन्न प्रकार के विटामिन पाए जाते हैं जैसे विटामिनए (Vitamin A) तथा कैरोटीन (Carotene) की मात्रा गाजर में भरपूर होती है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए कच्ची गाजर लोग ज्यादातर खाते हैं इसीलिए गाजर की खेती किसानों के हित के लिए काफी महत्वपूर्ण होती है। 

गाजर की खेती करने के लिए जलवायु

जैसा कि हम सब जानते हैं कि गाजर के लिए सबसे अच्छी जलवायु ठंडी होती है क्योंकि गाजर एक ठंडी फसल है जो सर्दियों के मौसम में काफी अच्छी तरह से उगती है। गाजर की फसल की खेती के लिए लगभग 8 से 28 डिग्री सेल्सियस का तापमान बहुत ही उपयोगी होता है। गर्मी वाले इलाके में गाजर की फसल उगाना उपयोगी नहीं होता। 

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ऑफ सीजन में गाजर की खेती के लिए मिट्टी का उपयोग

किसान गाजर की अच्छी फसल की गुणवत्ता प्राप्त करने के लिए तथा अच्छी उत्पादन के लिए दोमट मिट्टी का ही चयन करते हैं क्योंकि यह सबसे बेहतर तथा श्रेष्ठ मानी जाती है। फसल के लिए मिट्टी को भली प्रकार से भुरभुरा कर लेना आवश्यक होता है। बीज रोपण करने से पहले जल निकास की व्यवस्था को बना लेना चाहिए, ताकि किसी भी प्रकार की जलभराव की स्थिति ना उत्पन्न हो। क्योंकि जलभराव के कारण फसलें सड़ सकती हैं , खराब हो सकती है, जड़ों में गलन की समस्या भी उत्पन्न हो सकती है तथा फसल खराब होने का खतरा बना रहता है। 

गाजर की खेती का सही टाइम

किसानों और विशेषज्ञों के अनुसार गाजर की बुवाई का सबसे अच्छा और बेहतर महीना अगस्त से लेकर अक्टूबर तक के बीच का होता है। गाजर की कुछ अन्य किस्में  ऐसी भी हैं जिनको बोने का महीना अक्टूबर से लेकर नवंबर तक का चुना जाता है और यह महीना सबसे श्रेष्ठ महीना माना जाता है। गाजर की बुवाई यदि आप रबी के मौसम में करेंगे , तो ज्यादा उपयोगी होगा गाजर उत्पादन के लिए तथा आप अच्छी फसल को प्राप्त कर सकते हैं।

ऑफ सीजन में गाजर की फसल के लिए खेत को तैयार करे

किसान खेत को भुरभुरी मिट्टी द्वारा तैयार कर लेते हैं खेत तैयार करने के बाद करीब दो से तीन बार हल से जुताई करते हैं। करीब तीन से 5 दिन के भीतर अपने पारंपरिक हल से जुताई करना शुरू कर देते हैं और सबसे आखरी जुताई के लिए पाटा फेरने की क्रिया को अपनाते हैं।  खेत को इस प्रकार से फसल के लिए तैयार करना उपयुक्त माना जाता है।

गाजर की उन्नत किस्में

गाजर की बढ़ती मांग को देखते हुए किसान इनकी विभिन्न विभिन्न प्रकार की  किस्मों का उत्पादन करते हैं। जो ऑफ सीजन भी उगाए जाते हैं। गाजर की निम्न प्रकार की किस्में होती है जैसे:

  • पूसा मेघाली

पूसा मेघाली की बुआई लगभग अगस्त से सितंबर के महीने में होती है। गाजर की इस किस्म मे भरपूर मात्रा में कैरोटीन होता है जो स्वास्थ्य के लिए बहुत ही लाभदायक है। यह फसल उगने में 100 से लेकर 110 दिनों का समय लेते हैं और पूरी तरह से तैयार हो जाती हैं।

  • पूसा केसर

गाजर कि या किस्म भी बहुत ही अच्छी होती है या 110  दिनों में तैयार हो जाती हैं। पूसा केसर की बुआई का समय अगस्त से लेकर सितंबर का महीना उपयुक्त होता है।

  • हिसार रसीली

हिसार रसीली सबसे अच्छी किस्म होती है क्योंकि इसमें विटामिन ए पाया जाता है तथा इसमें कैरोटीन भी होता है। इसलिए बाकी किस्मों से यह सबसे बेहतर किसमें होती है। यह फसल तैयार होने में लगभग 90 से 100 दिनों का टाइम लेती है।

  • गाजर 29

गाजर की या किस्म स्वाद में बहुत मीठी होती है इस फसल को तैयार होने में लगभग 85 से 90 दिनों का टाइम लगता है।

  • चैंटनी

चैंटनी किस्म की गाजर दिखने में मोटी होती है और इसका रंग लाल तथा नारंगी होता है इस फसल को तैयार होने में लगभग 80 से 90 दिन का टाइम लगता है।

  • नैनटिस

नैनटिस इसका स्वाद खाने में बहुत स्वादिष्ट तथा मीठे होते हैं या फसल उगने में 100 से 120 दिनों का टाइम लेती है। 

 दोस्तों हम उम्मीद करते हैं आपको हमारा यह आर्टिकल Gajar (agar sinchai ki vyavastha ho to), Taki off-season mein salad ke liye demand puri ho aur munafa badhe काफी पसंद आया होगा और हमारा यह आर्टिकल आपके लिए बहुत ही लाभदायक साबित होगा। हमारे इस आर्टिकल से यदि आप संतुष्ट है तो ज्यादा से ज्यादा इसे शेयर करें।

ग्वार की खेती कैसे की जाती है, जानिए सम्पूर्ण जानकारी के बारे में 

ग्वार की खेती कैसे की जाती है, जानिए सम्पूर्ण जानकारी के बारे में 

ग्वार अब भोजन, फार्मास्यूटिकल्स और तेल जैसे विभिन्न उद्योगों में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। भारत में राजस्थान ग्वार का प्रमुख उत्पादक है जिसके बाद हरियाणा, गुजरात और पंजाब का स्थान आता है। ग्वार उत्पादन अब अन्य राज्यों जैसे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु तक भी बढ़ गया है। ग्वार का प्रमुख उत्पाद ग्वार गम है जो खाद्य उत्पादों में इस्तेमाल होने वाला एक प्राकृतिक गाढ़ा एजेंट है। भारत से प्रमुख निर्यात में से एक ग्वार गम है, प्रक्रिया में कुछ और अनुसंधान और विकास और बेहतर तकनीक के साथ, यह किसानों के लिए अत्यधिक लाभदायक होगा।

ग्वार की फसल का महत्व 

ग्वार एक दलहनी फसल है, 'और दलहनी फसलों के मुकाबले ग्वार को अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती है। ग्वार फली आमतौर पर चारे, बीज और सब्जी के उद्देश्य से उगाई जाती है। फसल से गोंद का उत्पादन होता है जिसे ग्वार गम कहा जाता है और विदेशों में निर्यात किया जाता है। इसके बीजों में 18% प्रोटीन और 32% रेशा होता है और भ्रूणपोष में लगभग 30-33% गोंद होता है।  यह भी पढ़ें:
ग्वार की वैज्ञानिक खेती की जानकारी

ग्वार की फसल के लिए उपयुक्त जलवायु और तापमान 

ग्वार धुप में पनपने वाला पौधा है। उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की शुष्क भूमि की फसलें उच्च तापमान को सहन कर सकती हैं। उचित वृद्धि के लिए इसे 25° से 30°C के बीच मिट्टी के तापमान की आवश्यकता होती है। यह पाले के प्रति संवेदनशील है। यह निश्चित रूप से उत्तर भारत में खरीफ मौसम की फसल है, लेकिन कुछ किस्में मार्च से जून के दौरान बसंत-ग्रीष्म फसल के रूप में और अन्य किस्में जुलाई से नवंबर के दौरान दक्षिण भारतीय जलवायु परिस्थितियों में वर्षा ऋतु की फसल के रूप में उगाई जाती हैं।  यह गर्म जलवायु को तरजीह देने वाली फसल है और गर्मियों के दौरान बारानी क्षेत्रों में अच्छी तरह से बढ़ती है। फसल 30 -40 सेमी वर्षा वाले शुष्क क्षेत्रों में अच्छी तरह से बढ़ती है। भारी बारिश, जलभराव की स्थिति, नाइट्रोजन फिक्सिंग बैक्टीरिया गतिविधि को कम करती है। 

ग्वार की फसल किस प्रकार की मिट्टी में अच्छी उपज देती है  

ग्वार फली सभी प्रकार की मिट्टी में उगाई जा सकती है लेकिन मध्यम बनावट वाली बलुई दोमट मिट्टी इसके विकास के लिए बेहतर होती है। भरपूर धूप के साथ मध्यम बारिश फसल की बेहतर वृद्धि में मदद करती है। पौधा छाया को सहन नहीं कर सकता है और वनस्पति विकास के लिए लंबे दिन की स्थिति और फूल आने के लिए कम तापमान वाले दिनों की आवश्यकता होती है। ग्वार की फसल एक अच्छी जल निकासी वाली बलुई दोमट मिट्टी में अच्छी उपज देती है। यह 7.5 -  8.0के बीच पीएच के साथ खारी और मध्यम क्षारीय मिट्टी को सहन कर सकता है। 

फसल की बुवाई के लिए भूमि की तैयार

रबी की फसल की कटाई के बाद मोल्ड बोर्ड हल से एक गहरी जुताई के बाद, डिस्क हैरो से 1 - 2 जुताई या कल्टीवेटर चलाकर पाटा लगाया जाता है। अच्छी जल निकासी सुविधा के लिए उचित रूप से समतल खेत की आवश्यकता होती है। 

ग्वार की उन्नत किस्में 

FS-277:- यह किस्म CCSHAU, हिसार द्वारा स्थानीय सामग्री से चयन द्वारा विकसित की गई थी और पूरे भारत में खेती के लिए अनुशंसित है। एचएफजी-119:- यह किस्म सीसीएसएचएयू, हिसार द्वारा चयन द्वारा विकसित की गई थी और भारत के पूरे ग्वार उत्पादक क्षेत्र में खेती के लिए अनुशंसित है। फसल 130-135 दिनों में काटी जाती है। यह बेहद सूखा सहिष्णु, गैर-बिखरने वाली और अल्टरनेरिया लीफ स्पॉट किस्म के लिए प्रतिरोधी है।  गुआरा-80:- यह किस्म पीएयू, लुधियाना द्वारा इंटरवैराइटल क्रॉस (एफएस 277 × स्ट्रेन नं. 119) से विकसित की गई, यह देश के उत्तर पश्चिमी क्षेत्र में खेती के लिए अनुशंसित है। यह 26.8 टन/हेक्टेयर हरा चारा और 8 क्विंटल/एकड़ बीज पैदा करता है। HG-182:- इस किस्म को CCSHAU, हिसार द्वारा आनुवंशिक स्टॉक (परिग्रहण HFC-182) से एकल पौधे के चयन से विकसित किया गया था। यह 110-125 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है  मारू ग्वार (2470/12):- इस किस्म को काजरी, जोधपुर में एनबीपीजीआर, नई दिल्ली द्वारा आपूर्ति की गई जर्मप्लाज्म सामग्री की मदद से विकसित किया गया था। यह किस्म दो प्रकार की है जो पश्चिमी राजस्थान के लिए उपयुक्त है। यह भी पढ़ें: खरीफ सीजन क्या होता है, इसकी प्रमुख फसलें कौन-कौन सी होती हैं HFG-156:- इस किस्म को हरियाणा में खेती के लिए CCSHAU, हिसार द्वारा विकसित किया गया था। यह 35 टन/हे. हरे चारे की उपज देने वाली लंबी, शाखित किस्म है।  बुंदेल ग्वार-1:- इसे आईजीएफआरआई, झांसी में एकल पौधे चयन के माध्यम से विकसित किया गया था। यह 50-55 दिनों में पोषक चारा उपलब्ध कराती है। यह किस्म एपीफाइटोटिक क्षेत्र परिस्थितियों में पत्ती झुलसा रोग के लिए मध्यम प्रतिरोधी है। यह आवास प्रतिरोधी है, उर्वरकों के प्रति उत्तरदायी है, सूखा सहिष्णु है।  ग्वार क्रांति (आरजीसी-1031):- यह किस्म एआरएस, दुर्गापुरा में विकसित की गई थी और यह आरजीसी-936 × आरजीसी-986/पी-10 के बीच के इंटरवैरिएटल क्रॉस का व्युत्पन्न है। यह राजस्थान राज्य में खेती के लिए अनुशंसित है।

बीज की बुवाई कैसे की जाती है ?

5 -6 किलोग्राम बीज एक एकड़ में बुवाई करने के लिए पर्याप्त है।  फसल जुलाई के प्रथम सप्ताह से 25 जुलाई तक बोई जाती है। जहां सिंचाई की सुविधा हो वहां फसल जून के अंतिम सप्ताह में या मानसून आने के बाद भी उगाई जा सकती है। गर्मी के दिनों में इसे मार्च के महीने में उगाया जा सकता है। बुवाई करें समय पंक्ति से पंक्ति की दुरी 45 cm रखें और पीज से बीज की दुरी 30 cm रखें।    

बीज उपचार 

फसल को मिट्टी जनित रोग से बचाने के लिए बीज को 2 ग्राम थीरम और 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किलो बीज से उपचारित किया जा सकता है। बीजों को बोने से 2-3 दिन पहले उपचारित किया जा सकता है। कवकनाशी बीज उपचार के बाद बीज को उपयुक्त राइजोबियम कल्चर @ 600 ग्राम / 12-15 किलोग्राम बीज के साथ टीका लगाया जाता है। 

फसल में सिंचाई प्रबंधन 

वैसे तो ग्वार की फसल को अधिक पानी की आश्यकता नहीं होती है। क्योंकी ये एक खरीफ की फसल है। इस मौसम में समय समय  पर बारिश होती रहती है जिससे फसल में पानी की कमी पूरी हो जाती है। अगर लंबे समय तक बारिश नहीं होती है तो फसल में सिंचाई अवश्य करें। फसल में जीवन रक्षक सिंचाई विशेष रूप से फूल आने और बीज बनने की अवस्था में दी जानी चाहिए।

फसल में उर्वरक और पोषक तत्व प्रबंधन

बुवाई से कम से कम 15 दिन पहले लगभग 2.5 टन कम्पोस्ट या FYM का प्रयोग करना चाहिए। एफवाईएम या कम्पोस्ट का प्रयोग मिट्टी की जल धारण क्षमता में सुधार करने और पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक सभी पोषक तत्वों की आपूर्ति के लिए उपयोगी है।   दलहनी फसल होने के कारण ग्वार फली की प्रारंभिक वृद्धि अवधि के दौरान शुरुआती खुराक के रूप में नाइट्रोजन की थोड़ी मात्रा की आवश्यकता होती है। ग्वार की फसल के लिए प्रति हेक्टेयर 10-15 किग्रा नाइट्रोजन और 20 किग्रा फास्फोरस की आवश्यकता होती है। 

नाइट्रोजन एवं फास्फोरस की पूरी मात्रा बुवाई के समय देना चाहिए। 

उर्वरक को बीज से कम से कम 5 सेंटीमीटर नीचे रखना चाहिए। उपयुक्त राइजोबियम स्ट्रेन और फॉस्फोरस सॉल्यूबिलाइजिंग बैक्टीरिया (PSB) के साथ बीजों का उपचार फसल की उपज बढ़ाने के लिए फायदेमंद होता है। 

फसल में खरपतवार प्रबंधन 

ग्वार फली में बुवाई के 20-25 और 40-45 दिनों के बाद दो निराई - गुढ़ाई फसल को खरपतवार मुक्त रखने के लिए पर्याप्त होती है। हालांकि, कभी-कभी श्रम उपलब्ध न होने के कारण रासायनिक खरपतवार नियंत्रण किया जा सकता है।  यह भी पढ़ें: रासायनिक कीटनाशकों को छोड़ नीम के प्रयोग से करें जैविक खेती फसल के अंकुरण से पहले पेंडीमिथालिन 250 gram/एकड़  ए.आई. उभरने से पहले छिड़काव करें और फसल के उभरने के बाद  उपयोग के लिए इमेज़ेटापायर 20 ग्राम/एकड़  ए.आई. 150 लीटर पानी में बुवाई के 20-25 दिनों पर दिया जाता है जो खरपतवार नियंत्रण के लिए उपयुक्त होता है।

फसल की कटाई 

दाने वाली फसल के लिए, कटाई तब की जाती है जब पत्तियाँ सूख जाती हैं और 50% फली भूरी और सूखी हो जाती है। कटाई के बाद फसल को धूप में सुखाना चाहिए फिर थ्रेशिंग मैन्युअल रूप से या थ्रेशर द्वारा किया जाता है। चारे की फसल के लिए, फसल को फूल अवस्था में काटते समय। एक एकड़ में 6 - 8 क्विंटल बीज की उपज होती है। एक एकड़ में 100 क्विंटल तक हरे चारे की उपज हो जाती है।