आखिर क्या होता है अल-नीनो जो लोगों की जेब ढ़ीली करने के साथ अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करता है

By: MeriKheti
Published on: 30-May-2023

आजकल आप बार-बार 'अल-नीनो' का नाम सुन रहे होंगे। क्या आपको मालूम है, कि यह कैसे आपकी और हमारी जेब पर प्रभाव डालता है। कैसे देश में खेती-किसानी और अर्थव्यवस्था को चौपट करता है। आगे हम आपको इस लेख में इसके विषय में बताने वाले हैं। आजकल ‘अल-नीनो’ का जिक्र बार-बार किया जा रहा है। इसकी वजह से महंगाई में इजाफा, मानसून खराब होने और सूखा पड़ने की संभावना भी जताई जा रही है। ऐसी स्थिति में क्या ये जानना आवश्यक नहीं हो जाता है, कि आखिर ‘अल-नीनो’ होता क्या है ? यह कैसे देश की अर्थव्यवस्था और आपकी हमारी जेब का पूरा हिसाब-किताब को प्रभावित करता है? सरल भाषा में कहा जाए तो ‘अल-नीनो’ प्रशांत महासागर में बनने वाली एक मौसमिक स्थिति है, जो नमी से भरी मानसूनी पवनों को बाधित और प्रभावित करती हैं। इस वहज से विश्व के भिन्न-भिन्न देशों का मौसम प्रभावित होता है। जानकारी के लिए बतादें, कि भारत, पेरू, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और प्रशांत महासागर से सटे विभिन्न देश इसके चंगुल में आते हैं।

अल-नीनो अपनी भूमिका शादी में ‘नाराज फूफा’ की तरह अदा करता है

भारत में आम लोगों के मध्य ‘शादी में नाराज हुआ फूफा’ का उलाहना दिया जाता है। बतादें, कि ‘अल-नीनो’ को भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता हैं। अंतर केवल इतना है, कि इस ‘फूफा’ को स्पेनिश नाम से जानते हैं। यह भारत की सरजमीं से दूर प्रशांत महासागर में रहता है। यह देश में शादी होने से पहले यानी ‘मानसून आने से पहले’ ही अपना मुंह फुला कर बैठ जाता है। ये भी देखें: जानें इस साल मानसून कैसा रहने वाला है, किसानों के लिए फायदेमंद रहेगा या नुकसानदायक दरअसल, जब प्रशांत महासागर की सतह सामान्य से भी अधिक गर्म हो जाती है। जब ऑस्ट्रेलिया से लेकर पेरू के मध्य चलने वाली पवनों का चक्र प्रभावित होता है। इसी मौसमी घटना को हम ‘अल-नीनो’ कहते है। सामान्य स्थिति में ठंडी हवाएं पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर चलती हैं। वहीं गर्म पवन पश्चिम से पूर्व की दिशा में चलती हैं। वहीं ‘अल-नीनो’ की स्थिति में पूर्व से पश्चिम की बहने वाली गर्म हवाएं पेरू के आसपास ही इकट्ठा होने लगती हैं अथवा इधर-उधर हो जाती हैं। इससे प्रशांत महासागर में दबाव का स्तर डगमगा जाता है। इसका प्रभाव हिंद महासागर से उठने वाली दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाओं पर दिखाई देता है। इन्हीं, पवनों से भारत में घनघोर वर्षा होती है।

अल-नीनो खेती-किसानी की ‘बैंड’ बजाकर रख देता है

बतादें, कि जब चर्चा शादी की हो और उसमें कोई ‘बैंड’ ना बजे तो शादी में मजा ही नहीं आता। दरअसल, ‘अल-नीनो’ से भारत में सबसे ज्यादा खेतीबाड़ी का ही बैंड बजता है। भारत में खेती आज भी बड़े स्तर पर ‘मानसूनी बारिश’ पर आधीन रहती है। ‘अल-नीनो’ के असर के चलते भारत में मानसून का विभाजन बिगड़ जाता है, इसी वजह से कहीं सूखा पड़ता है तो कहीं बाढ़ आती है।

अल-नीनो से अर्थव्यवस्था और जेब का बजट दोनों प्रभावित होते हैं

फिलहाल, यदि सीधा-सीधा देखा जाए तो ‘अल-नीनो’ का भारत से कोई संबंध नहीं, तो फिर आपकी-हमारी जेब पर असर कैसे पड़ेगा ? परंतु, अप्रत्यक्ष तौर पर ही हो, ‘अल-नीनो’ आम आदमी की जेब का बजट तो प्रभावित करता ही है। साथ ही, देश की अर्थव्यवस्था पर भी असर डालता है। खेती पर प्रभाव पड़ने से उत्पादन भी प्रभावित होता है। इसके साथ-साथ खाद्य उत्पादों की कीमतें भी बढ़ती हैं। इसका सीधा सा अर्थ है, कि महंगाई के चलते आपकी रसोई का बजट तो प्रभावित होना तय है। अन्य दूसरे कृषकों की आमदनी प्रभावित होने से भारत में मांग की एक बड़ी समस्या उपरांत होती है। साथ ही, महंगाई में बढ़ोत्तरी आने से लोग अपनी लागत को नियंत्रित करने लगते हैं। इसका परिणाम अन्य क्षेत्रों पर भी पड़ता है। भारत में मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री और ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री को इसका काफी बड़ा नुकसान वहन करना पड़ता है।

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