दुग्ध उत्पादन की कमी को दूर करने के लिए इन बातों का रखें खास ध्यान

By: Merikheti
Published on: 07-Dec-2023

वर्तमान में हमारे भारत में दूध की बेहद कमी है। हमें जितने दूध की जरूरत है, उतने दूध का उत्पादन पर्याप्त मात्रा में नहीं हो पा रहा है। विकसित देशों जैसे कि  स्वीडन, डेनमार्क, इजराइल और अमेरीका इत्यादि देशों में वार्षिक दूध पैदावार 5000 कि.ग्रा. प्रति पशु प्रतिवर्ष है। इसके मुकाबले भारत में महज 1000 कि.ग्रा. प्रति पशु प्रति वर्ष है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, हर एक व्यक्ति को 280 ग्राम प्रतिदिन दूध की जरूरत पड़ती है। वहीं, वर्तमान में 190 ग्राम दूध प्रतिदिन प्रति व्यक्ति ही मौजूद है। अत: हमारे भारत में दूध का उत्पादन बढ़ाने की बेहद आवश्यकता है। पशुओं को आहार से विशेष रूप से वसा, खनिज, विटामिंस, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट आदि पोषक पदार्थ मिलते हैं, जिनका इस्तेमाल ये मवेशी अपने जीवन निर्वाह, बढ़ोतरी, पैदावार, प्रजनन और कार्यक्षमता इत्यादि के लिये करते हैं। भारत के अंदर कम दूध देने वाले पशुओं की वजह करोड़ों भूमिहीन और सीमांत कृषक, फसलों के बचे अवशेष का उपयोग व चारागाहों की कमी आदि है। देश के ऐसे इलाके जहां पर मिश्रित खेती की जाती है, वहां पर दूध उत्पादन सामान्यतः ज्यादा पाया जाता है। दुग्ध उत्पादन को कारोबार के रूप में लेने के लिये चारे, दाने, खलियों और दानों के उपजात पदार्थ बहुतायत व सुगमता से उपलब्ध होने चाहिऐ।

बांझपन से ग्रसित पशुओं का झुंड से निष्कासन कर देना चाहिए   

सामान्यतः युवा पशुओं में बांझपन 2-3 फीसद तक और प्रौढ़ पशुओं में 5 से 6 फीसद तक देखने को मिल जाता है, जिनको कि झुंड से निकाल देना चाहिए। जिससे कि दुग्ध उत्पादन स्तर में गिरावट न हो सके और उनसे होने वाली आमदनी पर दुष्प्रभाव न पड़े। साथ ही, इन पशुओं पर चारा, दाना व देखभाल में होने वाले खर्च को बचाया जा सके।

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मवेशियों की सेहत की भरपूर देखभाल करें   

चिकित्सा के स्थान पर बीमारी की रोकथाम काफी अच्छी होती है, जिससे कि उपचार में बेहतर निदान की अनिश्चितता की वजह से होने वाले खर्च और जोखिम से बचाया जा सके। गाय तथा भैसों को विभिन्न प्रकार के रोग लगने की संभावना बनी रहती है। क्योंकि यहां के मौसम में गर्मी एवं आर्द्रता  काफी ज्यादा होती है। इससे पशुओं की मृत्यु भी ज्यादा होती है। इन बीमारियों से बचाने के लिए पशुओं का टीकाकरण अवश्य करवाना चाहिए।

पशुओं को पर्याप्त मात्रा में आहार प्रदान करें 

पशुओं के लिए समुचित भोजन वह है, जो स्थूल, रूचिकर, रोचक, भूखवर्धक एवं संतुलित हो। साथ ही, इसमें पर्याप्त हरे चारे भी मिले हो, उसमें रसीलापन मिला हो एवं वह संतुष्टि प्रदान करने वाला हो। पशुओं को सामान्य तौर पर दिन में थोड़े-थोड़े वक्त के समयांतराल पर 3 बार भोजन देना चाहिए। पशुओं को हरा चारा जैसे कि गेंहू का भूसा, पुआल इत्यादि के साथ मिलाकर देना चाहिए। चारे व दाने का संसाधन करने से जिस तरह दाना पीसना, कुट्टी काटना एवं भिगोना आदि से भी पशु आहार की उपयोगिता को बढ़ाया जा सकता है। जहां तक संभव हो पाए पशुओं को जरूरत के मुताबिक आहार बनाकर पृथक-पृथक तौर से दिया जाये। हर एक गोवंशीय पशु को 2 से 2.5 कि.ग्रा. और भैंस को 3 कि.ग्रा. प्रति 100 कि.ग्रा. शरीर भर पर शुष्क पदार्थ देना चाहिए। पशुओं को समकुल आहार का 2/3 भाग चारे के तौर में तथा 1/3 भाग दाने के रूप में दिया जाऐ। गर्भवती गाय और भैसों को 1.5 कि.ग्रा. दाना हर रोज देना चाहिए। शारीरिक विकास करने वाले पशुओं को 1 से 1.5 कि.ग्रा. प्रति पशु शरीर विकास के लिए दिया जाना चाहिए। पशु को जीवन निर्वाह करने हेतु 1 से 1.5 कि.ग्रा. दाना और दूध उत्पादन के लिए क्रमश: गायों को प्रति 3 लीटर दूध और भैंस को 2.5 लीटर दूध पर 1 कि.ग्रा. दाना देना चाहिए। पशु आहार में पर्याप्त खनिज लवण और विटामिंस भी होने अनिवार्य हैं।

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गर्भाधान कराकर अच्छी नस्ल की बछिया पैदा करें 

पशुओं को हमेशा स्वच्छ जल पर्याप्त मात्रा में मुहैय्या होना चाहिए। जीवन निर्वाह करने के लिए एक पशु को तकरीबन 30 लीटर रोजाना पानी की काफी मात्रा में जरूरत पड़ती है। चूंकि पानी की कमी से दुग्ध उत्पादन पर विपरीप असर पड़ता हैं। नर पशु से वीर्य कृत्रिम विधियों से अर्जित करके, जांच परख कर, मादा के जनन अंगों में स्वच्छतापूर्वक, उचित समय एवं उचित जगह पर पंहुचाने को कृत्रिम गर्भाधान कहा जाता है। दुधारू नस्ल के सांडों और उनके हिमीकृत वीर्य से अपनी गायों का गर्भाधान करवा कर उन्नत नस्ल की दुधारू बछिया अर्जित करनी चाहिए। जो कि दो वर्ष में गाय बनकर गर्भधारण करने लायक होगी, साथ ही, ज्यादा दूध भी प्रदान करेगी। कृत्रिम गर्भाधान के जरिए प्राप्त संकर गाय (जर्सी संतति) से ज्यादा दूध मिलता है। साथ ही, उस संकर जर्सी गाय को फिर से जर्सी नस्ल से गाभिन कराने पर 15-20 लीटर दूध देने वाली गाय हांसिल होती है।

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