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फूल की खेती

गैलार्डिया यानी नवरंगा फूल की खेती से जुड़ी फायदेमंद जानकारी

गैलार्डिया यानी नवरंगा फूल की खेती से जुड़ी फायदेमंद जानकारी

गैलार्डिया को सामान्य तौर पर कंबल फूल या नवरंगा के नाम से भी पहचाना जाता है। इसका नाम मैत्रे गेलार्ड डी चारेनटोन्यू के नाम पर रखा गया था, जो एक 18वीं सदी के फ्रांसीसी मजिस्ट्रेट जो एक उत्साही वनस्पतिशास्त्री थे। 

यह एक वार्षिक या बारहमासी पौधा होता है। इसका तना सामान्यतः शाखाओं में बंटा होता है। वहीं, यह लगभग 80 सेंटीमीटर (31.5 इंच) की अधिकतम ऊंचाई तक खड़ा होता है। 

गैलार्डिया को नवरंगा फूल के नाम से भी जाना जाता है। यह फूल सुन्दर रूप से रंगीन, डेजी जैसे फूल पैदा करती है। इसका इस्तेमाल बड़े स्तर पर मंदिरों में व शादी समारोह में सजावट करने में किया जाता है। 

यह अल्पकालिक बारहमासी पौधा होता है, जो कि शुरूआती गर्मियों में पीले, नारंगी युक्तियों के साथ चमकदार लाल फूल पैदा करती है। 

नवरंगा फूलों के पौधे बहुमुखी और बहुत ही सहजता से उगने वाले पौधे हैं। इसकी खेती करके काफी मुनाफा प्राप्त किया जा सकता है।

गैलार्डिया की खेती के लिए जलवायु और भूमि

नवरंगा फूलों को गर्म जगहों में सहजता से लगाया जा सकता है। इसके लिए ऐसी जगहों का चयन करें जहां अधिकतम 6-8 घंटे सीधे सूर्य की रौशनी मिलती रहे, सही प्रकार से सूखी, चिकनी और रेतीली मृदा को इसकी खेती के लिए चुना जा सकता है। जो कि एक तटस्थ पीएच हो तो फूलों के पौधों को बहुत ही कम देखभाल की आवश्यकता पड़ती है।

गैलार्डिया के फूल की उन्नत किस्में निम्नलिखित हैं 

एरीजीयोना सन गैलार्डिया  

यह 6-12 इंच के विभिन्न प्रकार के चमकीले नारंगी, लाल रंग के केंद्र वाले पौधे होते है जिनकी बाहरी पुखुडिय़ां पीले रंग की होती है।

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गैलार्डिया फैनफेयर  

यह तुरही के आकर का 14 इंच का ऊंचा पौधा होता है जिसकी पुखुडिय़ां पीले रंग के साथ गहरे लाल रंग की होती है इन पौधों के केन्द्र नारंगी होते है ।

गैलार्डिया सनसेट पॉपी  

यह किस्मों के पौधे दिखने में सुन्दर डबल गुलाब जैसे लाल पुखुडिय़ां के पीले रंग में डूबे हुए होते है ।

गैलार्डिया गेबलीन   

यह कठोर किस्म के होते हैं जो कि गहरे हरे पत्तियों के साथ महरून रंग के पुखुडिय़ां वाले होते हैं।

बरगंडी कम्बल फूल  

यह किस्म अपने नाम के अनुसार गहरे लाल, बरगंडी रंग के होते है जिसकी लम्बाई 24-36 इंच तक होती है।

मुरब्बा के साथ गैलार्डिया  

इसके नारंगी रंग के फूल होते हैं जिसकी लम्बाई लगभग 2 फुट के आस-पास होती है इन किस्मों की लम्बाई अधिक होने के कारण इसे सहारे की आवश्यकता होती है।

गैलार्डिया संतरे और नींबू   

यह किस्म दूसरे नवरंगा फूलों की तुलना में नरम रंग के होते है जो कि 2 फुट लम्बे पौधे होते हैं, जिस पर पीले रंग के केंद्रीय शंकु आकर के फूल लगते हैं इन किस्मों को कठोर क्षेत्र में लगया जा सकता है।

गैलार्डिया के बीज की मात्रा व बुवाई प्रबंधन 

गैलार्डिया या नवरंगा फूलों के बीजों को गर्मियों में सीधे बगीचे में रोपा जा सकता है या फिर इनको गमलों में भी लगाया जा सकता है। गैलार्डिया को एक हेक्टेयर में उगाने के लिए 500 से 600 ग्राम बीज की जरूरत पड़ती है। 

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बीजों की बुवाई से पूर्व उन्हें फफूंदीनाशक से उपचारित कर लेना चाहिए। फफूंदीनाशक के रूप में केप्टान या थाइराम का इस्तेमाल किया जाता है।

बीजों की बुवाई करते समय एक बीज से दूसरे बीज की दूरी 3 सेमी तथा एक कतार की दूसरी कतार के बीच की दूरी 5 सेमी रखनी चाहिए तथा बीजों को 2 सेमी से ज्यादा गहरा नहीं बोना चाहिए। बीजों की बुवाई के बाद करीब 4 से 6 सप्ताह बाद पौध खेत में रोपाई के लिए तैयार हो जाती है। 

गैलार्डिया की पौध को कैसे तैयार किया जाता है ?

गैलार्डिया की पौध तैयार करने के लिए भूमि से लगभग 10 से 15 सेमी ऊपर क्यारियां बनाएं, ताकि अतिरिक्त जमा पानी आसानी से बाहर निकल सके। 

गैलार्डिया के एक हेक्टेयर की पौध तैयार करने के लिए 150 वर्ग मीटर क्षेत्रफल वाली नर्सरी पर्याप्त रहती है। पौध के लिए क्यारियां 3 मीटर, लंबी एक मीटर चौड़ी तथा 10 से 15 सेमी ऊंची तैयार करें। 

गैलार्डिया के लिए खेत तैयार करने के लिए 3 से 4 जुताई के बाद पाटा लगाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए। पौधों का खेत में रोपण हमेशा शाम के समय ही करना चाहिए तथा रोपण के तुरंत बाद सिंचाई करनी चाहिए।

गैलार्डिया में सिंचाई, खाद एवं उर्वरक प्रबंधन 

गमले में फूलों के लिए पानी और उर्वरक की आवश्यकता होती है। यह किसी भी उर्वरक के बिना भी सहजता से बढ़ सकती है। लेकिन, नवरंगा फूलों में पौधे निषेचन के लिए 1 बार उर्वरक की आवश्यकता होती है। 

कम्बल फूलों के बीजों को बोने से पूर्व अच्छी गुणवत्ता वाली जैविक खाद को मृदा में 2:1 के अनुपात में  सही ढ़ंग से मिला दें। 

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जैविक खाद के रूप में गोबर की खाद या केंचुए की खाद का इस्तेमाल कर सकते हैं, कम्बल फूलों को बहुत ही कम पानी की आवश्यकता होती है।

गैलार्डिया की खेती में खरपतवार नियंत्रण

खरपतवार नियंत्रण सामान्यतः एक महत्वपूर्ण क्रिया है। खरपतवार, पानी और पोषक तत्वों के लिए फसल के साथ प्रतिस्पर्धा करके बीजों की पैदावार को कम कर देते हैं। 

खरपतवार नियंत्रण के लिए मल्चिंग एक शानदार विकल्प हो सकता है। इसके अतिरिक्त रासायनिक खरपतवारों का छिडक़ाव करके भी नियंत्रण किया जा सकता है। जैसे पेनांट मैगनम एट्रिलीन 4 से पहले रोपण के एक छोटे से भाग पर इनका परीक्षण विवेकपूर्ण अवश्य करें।

फूलों की खेती से चमकी किसान श्रीकांत की तकदीर, जानें इनकी सफलता की कहानी

फूलों की खेती से चमकी किसान श्रीकांत की तकदीर, जानें इनकी सफलता की कहानी

भारत एक कृषि प्रधान देश है। देश की अधिकांश आबादी कृषि या कृषि से जुड़े कार्यों से आजीविका चलाती है। वर्तमान में भारत के कई पढ़े-लिखे शिक्षित लोग नौकरी को छोड़कर कृषि में अपनी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। 

साथ ही, सफलता भी हांसिल कर रहे हैं। इसी कड़ी में फूलों की खेती करके श्रीकांत बोलापल्ली ने एक छोटी स्तर से शुरुआत करके आज वार्षिक करोड़ों की आय का मुकाम हांसिल किया है। 

उन्होंने फूलों की खेती करने से पूर्व आधुनिक कृषि तकनीकों के विषय में सही से जानकारी ग्रहण की और इसका अनुसरण करके इसको कृषि में लागू किया। आज के समय में फूलों की खेती और इसके व्यवसाय में इनका काफी जाना-माना नाम है। 

फूलों की खेती की कहानी कब और कैसे शुरू हुई 

अपनी युवावस्था में आज से तकरीबन 22 वर्ष पूर्व तेलंगाना के एक छोटे से शहर से आने वाले श्रीकांत बोलापल्ली का सपना था, कि वह अपनी जमीन पर खेती करें। 

लेकिन, गरीबी के चलते और घर-परिवार की स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह जमीन खरीद सकें। समय के चलते हालात बिगड़ने पर श्रीकांत ने अपने शहर ‘निजामाबाद’ को छोड़ दिया और 1995 में बेंगलुरु करियर बनाने आ गये। 

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उस दौरान डोड्डाबल्लापुरा क्षेत्र में श्रीकांत को फूलों की खेती से जुड़ी एक कंपनी में बतौर पर्यवेक्षक के रूप में काम मिला। इस समय श्रीकांत की सैलरी 1000 रुपये महीना हुआ करती थी।

बैंगलुरु से प्रारंभ किया फूलों का व्यवसाय 

2 सालों तक श्रीकांत ने इसी कंपनी में कार्य किया और फूलों की खेती करने के लिए वैज्ञानिक खेती के विषय में जानकारी अर्जित की है। 

उन्होंने यहां नौकरी करके 24000 हजार रुपये जमा किए और बैंगलुरु में ही फूलों का छोटा सा व्यवसाय शुरू किया। श्रीकांत ने विभिन्न कंपनियों और किसानों से संपर्क करके फूलों का व्यापार करना शुरू कर दिया। 

प्रारंभिक समय में वह अकेले ही फूलों को इकट्ठा किया करते थे और इनकी पैकिंग करके पार्सल किया करते थे। धीरे-धीरे मांग में वृद्धि हुई और उन्होंने दो कर्मचारियों को अपने साथ में जोड़ लिया।

श्रीकांत को इस साल करोड़ों की आय की संभावना 

बतादें, कि श्रीकांत ने काफी लंबे समय तक फूलों का व्यवसाय करने के बाद 2012 में श्रीकांत ने डोड्डाबल्लापुरा में ही 10 एकड़ भूमि खरीदी। किसान श्रीकांत ने इस भूमि पर आधुनिक तकनीकों के साथ फूलों की खेती करनी चालू की है।

श्रीकांत आज 30 एकड़ भूमि पर फूलों की खेती कर रहे हैं। फूलों की खेती करके उन्होंने पिछले वर्षों में 9 करोड़ रुपये का मुनाफा प्राप्त किया है। 

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उन्होंने इस वर्ष 12 करोड़ रुपये का लाभ कमाने का आंकलन किया है। 20 सालों में श्रीकांत के साथ कार्य करने वाले कर्मचारियों की तादात 40 हो चुकी है।

श्रीकांत ने आधुनिक कृषि तकनीकों का किया उपयोग  

किसान श्रीकांत ने पिछले चार वर्षों में आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाया और अपने खेतों में इन तकनीकों का उपयोग करने लगे। 

श्रीकांत ने अपने खेत में फूलों की खेती के लिए ग्रीन हाउस तैयार किया है। इस ग्रीन हाउस में उन्होंने उच्च कृषि तकनीकों को अपनाया और फूलों को अनुकूल वातावरण प्रदान किया। 

इस ग्रीन हाउस में श्रीकांत ने सिंचाई, उवर्रक का प्रयोग, घुलनशील उवर्रक, मिट्टी, कीटनाशक उपयोग और फूलों के विकास के नियमों का ख्याल रखा है। 

उन्होंने इस ग्रीन हाउस में फूलों के लिए सूर्य की रौशनी की भी व्यवस्था की हुई है। इसके अलावा उन्होंने कीट जाल भी बनाकर रखे हैं, ताकि कीटनाशक का कम से कम इस्तेमाल किया जा सके। 

श्रीकांत ने आधुनिक तकनीक को अपनाते हुए हवा की भी व्यवस्था की हुई है, जिससे फूलों को समुचित नमी प्राप्त हो सके। 

गेंदा के फूल की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

गेंदा के फूल की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

खेती-किसानी का जब जिक्र आता है। हमें गांव में बसने वाला उस असली किसान का चेहरा सामने नजर आता है। जो ओस-पाला, सर्दी, प्रचण्ड धूप, अखण्ड बरसात की परवाह किये बिना 24 घंटे सातों दिन अपने खून-पसीने से अपने खेतों को सींच कर अपनी फसल तैयार करता है। 

उसकी इस त्याग तपस्या का क्या फल मिलता है? शायद ही कोई जानता होगा। किसान का दर्द केवल किसान ही जान सकता है। इस हाड़ तोड़ मेहनत के बदले में किसान को केवल दो जून की रोटी ही नसीब हो पाती है। 

इसके अलावा किसान को किसी तरह के काम-काज की जरूरत होती है तो उसे कर्ज ही लेना पड़ता है। एक बार कर्ज  के जाल में फंसने वाला किसान पीढ़ियों तक इससे बाहर नहीं निकल पाता है।

किसान की भूमिका

  • देश की अर्थव्यवस्था में किसान बहुत बड़ी भूमिका होती है। वह भी भारत जैसे कृषि प्रधान देश में तो किसान अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। रीढ़ पूरे शरीर का भार उठाती है, उसे मजबूत करना चाहिये। क्या भारत में इस रीढ़ (किसान की) की पर्याप्त देखभाल हो रही है, शायद नहीं।
  • इसका ताजा उदाहरण हम कोविड-19 यानी कोरोना महामारी का ले सकते हैं। इस महामारी में जब सारे लोग अपनी जान बचाकर अपने-अपने घरों में छिप गये लेकिन किसान के जीवन में और कड़े दिन आ गये।
  • कोरोना की परवाह किये बिना अपने खेतों में दोगुनी मेहनत करनी पड़ी ताकि देश के लोगों की जान बचाई जा सके। लेकिन इस दुखियारे किसान की किसी ने भी सुधि नहीं ली।
  • कोरोना योद्धाओं में डॉक्टरों, नर्स, पैरामेडिकल स्टाफ, पुलिस कर्मी, सुरक्षा बल के कर्मचारियों, सफाई कर्मियों, मीडिया कर्मियों एवं समाजसेवियों का नाम लिया जाता है और उन्हें कोराना योद्धा की उपाधि देकर उनका गुणगान किया जाता है लेकिन जब सारे कल-कारखाने बंद हो गये थे तब जिस किसान ने देश की अर्थव्यवस्था को संभाले रखा, उस किसान को किसी ने एक बार भी कोरोना योद्धा, अन्नदाता या ग्राम देवता तक कह कर नहीं पुकारा।
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किसानों की दशा खुद किसान को ही सुधारनी होगी। इसके लिए अपने पैरों को और मजबूत करना होगा। इस काम के लिए किसान को देश की अर्थव्यवस्था के साथ ही अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करना होगा। 

इसके लिए किसान को परम्परागत खेती की जगह आधुनिक व उन्नत खेती तथा आर्थिक स्थिति मजबूत करने में सहायक लीक से हटकर वे फसले लेनी होंगी जो कम समय और कम लागत में अधिक से अधिक आमदनी दे सकतीं हों। 

इस तरह की फसलों में गेंदा के फूल की खेती भी उनमें से एक है। तो आइये जानते हैं गेंदा के फूल की खेती की सम्पूर्ण जानकारी।

गेंदा का फूल का महत्व

फूल की खेती

भारतीय समाज में गेंदा के फूल का बहुत अधिक महत्व है। भारतीय समाज में होने वाले प्रत्येक सामाजिक व धार्मिक कार्यों में गेंदे के फूल की बहुत अधिक मांग होती है। 

प्रत्येक साल में दो बार नवरात्र, दीवाली, दशहरा, बसंत पंचमी, होली, गणेश चतुर्थी, शिवरात्रि सहित अनेक छोटे-मोटे धार्मिक आयोजन होते ही रहते हैं। 

इसके अलावा प्रत्येक भारतीय घर में और व्यावासायिक संस्थानों में प्रतिदिन पूजा-अर्चना होती है जिसमें गेंदा के ताजे फूलों का इस्तेमाल किया जाता है। 

इसके अलावा सामाजिक कार्यों जन्म दिन की पार्टी हो, शादी, व्याह हो, मुंडन व यज्ञोपवीत कार्यक्रम हो, शादी की सालगिरह हो, व्यवसायिक संस्थानों के स्थापना दिवस हो, नये संस्थान का उदघाटन हो, कोई प्रतियोगिता हो । 

इन सभी कार्यक्रमों मुख्य द्वार, मंडप, स्टेज आदि की साज-सजावट के साथ माल्यार्पण, पुष्पहार व पुष्पार्पण आदि में गेंदे के फूल का इस्तेमाल बहुतायत में किया जाता है।

किस्में और पैदावार के स्थान

गेंदे के फूल के आकार और रंग के आधार पर मुख्य दो किस्में होतीं हैं। एक अफ्रीकी गेंदा होता है और दूसरा फ्रेंच गेंदा होता है। फ्रेंच गेंदे की किस्म का पौधा अफ्रीकी गेंदे के आकार से छोटा होता है। इसके अलावा भारत में पैदा होने वाली गेंदे की किस्में इस प्रकार हैं:- 

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  1. पूसा बसंती गेंदा
  2. फ्रेंच मैरीगोल्ड
  3. अफ्रीकन मैरीगोल्ड
  4. पूसा नारंगी गेंदा
  5. अलास्का
  6. एप्रिकॉट
  7. बरपीस मिराक्ल
  8. बरपीस हनाइट
  9. क्रेकर जैक
  10. क्राउन आफ गोल्ड
  11. कूपिड़
  12. डबलून
  13. गोल्डन ऐज
  14. गोल्डन क्लाइमेक्स
  15. गोल्डन जुबली
  16. गोल्डन मेमोयमम
  17. गोल्डन येलो
  18. ओरेंज जुबली
  19. येलो क्लाइमेक्स
  20. रिवर साइड
इन प्रमुख किस्मों के अलावा अन्य कई किस्में भी हैं, जिनकी खेती जलवायु और मिट्टी के अनुसार अलग-अलग स्थानों पर की जाती है। 

अफ्रीकन गेंदे की हाइब्रिड किस्में: शोबोट, इन्का येलो, इन्का गोल्ड, इन्का ओरेंज, अपोलो, फर्स्ट लेडी, गोल्ड लेडी, ग्रे लेडी, आदि फ्रेन्च गेंदे की हाइब्रिड किस्में: (डबल) बोलेरो, जिप्सी डवार्फ डबल, लेमन ड्राप, बरसीप गोल्ड, बोनिटा, बरसीप रेड एण्ड गोल्ड, हारमनी, रेड वोकेड आदि। (सिंगल) टेट्रा रफल्ड रेड, सन्नी,नॉटी मेरियटा आदि।

गेंदे की खेती के लिए मिट्टी व जलवायु

फूल की खेती

वैसे तो गेंदा विभिन्न प्रकार की मिट्टी में पैदा किया जा सकता है लेकिन इसके लिए बलुई दोमट मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है।जल जमाव वाली मिट्टी इसके लिए अच्छी नहीं होती है। 

तेजाबी व खारी मिट्टी भी इसके लिये अनुकूल नहीं होती है। गेंदे की खेती के लिए शीतोष्ण और सम शीतोष्ण जलवायु सबसे अच्छी होती है। इसके अलावा भारत की प्रत्येक जलवायु में गेंदे की खेती होती है। पाला गेंदे का दुश्मन है। इससे बचाना जरूरी होता है।

खेती की अवधि

गेंदे की खेती बहुत कम समय में होती है। तीन से चार माह में इसकी पूरी खेती होती है। साल भर में गेंदे की खेती तीन बार की जा सकती है। 

गेंदे की खेती के लिए 15 से 30 डिग्री तापमान सबसे उपयुक्त होता है। 35 डिग्री से अधिक तापमान गेंदे की खेती के लिए नुकसानदायक होता है।

खेत की तैयारी

मिट्टी की जुताई अच्छी तरीके से की जानी चाहिये। जब तक खेत की मिट्टी भुरभुरी न हो जाये तब तक उसकी जुताई की जानी चाहिये। आखिरी जुताई के समय रूड़ी की खास व गोबर की खाद को मिलाया जाना चाहिये।

बिजाई का समय

गेंदे की फसल साल में तीन बार ली जाती है। प्रत्येक फसल के लिए बीज बुवाई और पौधरोपाई का अलग-अलग समय निर्धारित होता है।  साल में गर्मी की फसल के लिए जनवरी-फरवरी के बीच बीज बुवाई का समय होता है। 

इसके जब पौध तैयार हो जाती है जिसे फरवरी-मार्च में पौधे की रोपाई की जाती है। इसके बाद वर्षा ऋतु की फसल के लिए मध्य जून में बीजों की बुवाई की जाती है। इससे तैयार पौधों की रोपाई जुलाई मध्य में की जाती है। 

इस तरह से सर्दी की फसल के लिए सितम्बर में बीज की बुवाई होती है और मध्य अक्टूबर में पौधों की रोपाई होती है।

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पौधों की रोपाई की मुख्य बातें

अच्छी तरह से तैयार क्यारियों के अच्छे पौधों को छांट कर पोपाई करनी चाहिये। पौधों की रोपाई शाम के समय ही की जानी चाहिये। पौधों की जड़ों को अच्छी तरह से मिट्टी से ढक दिया जाना चाहिये। साथ ही पानी का छिड़काव करना चाहिये।   फूल की खेती

पौधों से पौधों की दूरी

अफ्रीकन नस्ल के पौधे काफी घने और बड़े होते हैं। इसलिये इनकी पौधे से पौधे की दूरी 15 गुणा 10 इंच की रखी जानी चाहिये।फ्रेंच पौधों की दूरी कम भी रखी जा सकती है। इस किस्म के पौधों की पौधों से दूरी 8 गुणा 8 या 8 गुणा 6 इंच रखी जानी चाहिये।

सिंचाई

गेंदे की फसल 55 से 60 दिन में तैयार हो जाती है और यह फसल एक महीने तक लगातार देती रहती है। कुल मिलाकर तीन महीने में यह फसल पूर्ण हो जाती है। इसके लिए गर्मियों में सप्ताह में दो बार और सर्दियों में 10 दिन में सिंचाई की जानी चाहिये।

पौधों की कटाई छंटाई

गेंदे के पौधों की बढ़वार रोकने के लिए जब पौधा बाढ़ पा आये तो उसकी पिचिंग यानी ऊपर से छंटाई कर देनी चाहिये। ताकि पौधा घना तैयार हो उससे फूल अधिक आयेंगे।

उर्वरक प्रबंधन व खरपतवार नियंत्रण

गेंदे की खेती के लिए एक हेक्टेयर में 15 से 20 टन गोबर की खाद, 600 किलोग्राम यूरिया, 1000 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट और 200 किलोग्राम पोटाश की डाली जानी चाहिये। 

खाद का प्रयोग खेत को तैयार करते समय किया जाना चाहिये। उस समय गोबर की खाद, फास्फेट और पोटाश तो पूरे का पूरा मिलाना चाहिये लेकिन यूरिया का एक तिहाई हिस्सा मिलाना चाहिये। 

आखिरी जुताई से पहले ही यह पूरी खाद मिट्टी में मिलाना चाहिये। बची हुई यूरिया का पानी देने के समय इस्तेमाल किया जाना चाहिये। 

खरपतवार नियंत्रण के लिए मजदूरों से कम से कम दो बार निराई करानी चाहिये। उसके अलावा एनिबेन, प्रोपेक्लोर और डिफेनमिड का इस्तेमाल किया जाना लाभप्रद होता है।

बीमारियां व कीट नियंत्रण

गेंदे के पौधे को रेड स्पाइटर माइट नाम का कीड़ा बहुत अधिक नुकसान पहुंचाता है। इसके नियंत्रण के लिए मैलाथियान या मेटासिस्टॉक्स का पानी में घोल कर छिड़काव करें। 

चेपा कीड़ा भी खुद तो नुकसान पहुंचाता ही है और साथ में रोग भी फैलाता है। इसके नियंत्रण के लिए डाईमैथेएट (रोगोर) या मैटासिस्टॉक्स का छिड़काव करें। एक बार में कीट नियंत्रण में न आयें तो दस दिन बाद दोबारा छिड़काव करायें। 

आर्द्र गलन नामक गेंदे के पौधों में बीमारी लगती है। इसकी रोकथाम के लिए कैप्टान या बाविस्टिन के घोल का छिड़काव करें। धब्बा व झुलसा रोग से बढ़वार रुक जाती है। 

इसके नियंत्रण के लिए डायथेन एम के घोल का छिड़काव प्रत्येक पखवाड़े में करें। पाउडरी मिल्डयू नामक बीमारी से पौध मरने लगता है। इसकी रोकथाम घुलने वाली सल्फैक्स का या कैराथेन 40 ईसी का छिड़काव करायें।

फूलों की तुड़ाई व पैकिंग आदि

फूलों की तुड़ाई ठण्डे मौसम में यानी सुबह अथवा शाम को सिंचाई के बाद तोड़ें। इनकी पैकिंग करके मार्केट में भेजें । अफ्रीकन गेंदे से प्रति हेक्टेयर 20-22 टन तथा फ्रेंच पौधे से 10 से 12 टन फूल मिलता है।

गर्मियों के मौसम में लगाए जाने वाले फूल (Flowering Plants to be sown in Summer)

गर्मियों के मौसम में लगाए जाने वाले फूल (Flowering Plants to be sown in Summer)

गर्मियों का मौसम सबसे खतरनाक मौसम होता है क्योंकि इस समय बहुत ही तेज गर्म हवाएं चलती हैं। इनसे बचने के लिए हम सभी का मन करता है की ठंडी और खुसबुदार छाया में बैठ कर आराम करने का। 

यही आराम हम बाहर बाग बागीचो में ढूंढतेहै ,लेकिन अगर आप थोड़ी सी मेहनत करे तो आप इन ठंडी छाया वाले फूलों का अपने घर पर भी बैठ कर आनंद ले सकते है।

गर्मियों के मौसम में लगाए जाने वाले फूल (Flowers to plant in the summer season:)

गर्मियों के मौसम की एक खास बात यह होती है को यह पौधों की रोपाई के लिए सबसे अच्छा समय होता है। तेज धूप में पौधे अच्छे से अपना भोजन बना पाते है।

साथ ही साथ उन्हें विकसित होने में भी कम समय लगता है। ऐसे में आप गेंदे का फूल , सुईमुई का फूल , बलासम का फूल और सूरज मुखी के फूल बड़ी ही आसानी से अपने घर के गार्डन में लगा सकते है। 

इससे आपको घर पर ही गर्मियों के मौसम में ठंडी और खुसबुदार छाया का आनंद मिल जायेगा।अब बात यह आती है की हम किस प्रकार इन फुलों के पौधों को अपने घर पर लगा पाएंगे। 

इसके लिए सबसे पहले आपको मिट्टी, फिर खाद और उर्वरक और अंत में अच्छी सिंचाई करनी होगी। साथ ही साथ हमे इन पौधों की कीटो और अन्य रोगों से भी रोकथाम करनी होगी। तो चलिए अब हम आपको बताते है आप प्रकार इन मौसमी फुलों के पौधों लगा सकते है।

गर्मियो में फूलों के पौधें लगाने के लिए इस प्रकार मिट्टी तैयार करें :-

mitti ke prakar

इसके लिए सबसे पहले आप जमीन की अच्छी तरह से उलट पलट यानी की पाटा अवश्य लगाएं।खेत को अच्छे से जोतें ताकि किसी भी प्रकार का खरपतवार बाद में परेशान न करे पौधों को।

मौसमी फूलों के पौधों के बीजों के अच्छे उत्पादन के लिए जो सबसे अच्छी मिट्टी होती हैं वह होते हैं चिकनी दोमट मिट्टी।इन फुलों को आप बीजो के द्वारा भी लगा सकते है और साथ ही साथ आप इनके छोटे छोटे पौधें लगाकर रोपाई भी कर सकते हैं। 

इसके अलावा बलुई दोमट मिट्टी का भी आप इस्तेमाल कर सकते है बीजों को पैदावार के लिए। इसके लिए आप 50% दोमट मिट्टी और 30% खाद और 20% रेतीली मिट्टी को आपस में अच्छे से तैयार कर ले। 

एक बार मिट्टी तैयार हो जाने के बाद आप इसमें बीजों का छिड़काव कर दे या फिर अच्छे आधा इंच अंदर तक लगा देवे। उसके बाद आप थोड़ा सा पानी जरूर देवे पौधों को।

गर्मियों में फूलों के पौधों को इस प्रकार खाद और उर्वरक डालें :-

khad evam urvarak

मौसमी फूलों के पौधों का अच्छे से उत्पादन करने के लिए आप घरेलू गोबर की खाद का इस्तमाल करे न की रासायनिक खाद का। रासायनिक खाद से पैदावार अच्छी होती है लेकिन यह खेत की जमीन को धीरे धीरे बंजर बना देती है। 

इसलिए अपनी जमीन को बंजर होने से बचाने के लिए आप घरेलू गोबर की खाद का ही इस्तमाल करे। यह फूलों के पौधों को सभी पोषक तत्व प्रोवाइड करवाती है।

100 किलो यूरिया और 100 किलो सिंगल फास्फेट और 60 किलो पोटाश को अच्छे मिक्स करके संपूर्ण बगीचे और गार्डन में मिट्टी के साथ मिला देवे। खाद और उर्वरक का इस्तेमाल सही मात्रा में ही करे । ज्यादा मात्रा में करने पर फुल के पौधों में सड़न आने लगती है।

गर्मियों में फूलों के पौधों की इस प्रकार सिंचाई करे :-

phool ki sichai

गर्मियों में पौधों को पानी की काफी आवश्यकता होती है। इसके लिए आप नियमित रूप से अपने बगीचे में सभी पौधों की समान रूप से पानी की सिंचाई अवश्य करें। 

पौधों को सिंचाई करना सबसे महत्वपूर्ण काम होता है, क्योंकि बिना सिंचाई के पौधा बहुत ही काम समय में जल कर नष्ट हो जायेगा। 

इसी के साथ यह भी ध्यान रखना चाहिए की गर्मियों के मौशम में पौधों को बहुत ज्यादा पानी की आवश्यकता होती हैं और वहीं दूसरी तरफ सर्दियों के मौसम में फूलों को काफी कम पानी की आवश्यकता होती है। 

इन फूलों के पौधों की सिंचाई के लिए सबसे अच्छा समय जल्दी सुबह और शाम को होता है।सिंचाई करते समय यह भी जरूर ध्यान रखे हैं कि खेत में लगे पौधों की मिट्टी में नमी अवश्य होनी चाहिए ताकि फूल हर समय खिले रहें। क्यारियों में किसी भी प्रकार का खरपतवार और जरूरत से ज्यादा पानी एकत्रित ना होने देवे।

गर्मियों के फुलों के पौधों में लगने वाले रोगों से बचाव इस प्रकार करे :-

phoolon ke rogo se bachav

गर्मियों के समय में ना  केवल पौधों को गर्मी से बचाना होता है बल्कि रोगों और कीटों से भी बचाना पड़ता है।

  1. पतियों पर लगने वाले दाग :-

इस रोग में पौधों पर बहुत सारे काले और हल्के भूरे रंग के दाग लग जाते है। इस से बचने के लिए ड्यूथन एम 45 को 3 ग्राम प्रति लिटर में अच्छे से घोल बना कर 8 दिनों के अंतराल में छिड़काव करे। इस से सभी काले और भूरे दाग हट जाएंगे।
  1. पतियों का मुर्झा रोग :-

इस रोग में पौधों की पत्तियां धीरे धीरे मुरझाने लगती है और बाद में संपूर्ण पौधा मरने लग जाता है।इस से बचाव के लिए आप पौधों के बीजों को उगाने से पहले ट्राइको टर्म और जिनॉय के घोल में अच्छे से मिक्स करके उसके बाद लगाए। इस से पोधे में मुर्झा रोग नहीं होगा।
  1. कीटों से सुरक्षा :-

जितना पसंद फूल हमे आते है उतना ही कीटो को भी। इस में इन फूलों पर कीट अपना घर बना लेते है और भोजन भी। वो धीरे धीरे सभी पतियों और फुलों को खाना शुरू कर देते है। इस कारण फूल मुरझा जाते है और पोधा भी। इस बचाव के लिए आप कीटनाशक का प्रति सप्ताह 3 से 4 बार याद से छिड़काव करे।इससे कीट जल्दी से फूलों और पोधें से दूर चले जायेंगे।

गर्मियों में मौसम में इन फुलों के पौधों को अवश्य लगाएं अपने बगीचे में :-

गर्मियों के मौसम में लगाए जाने वाले फूल - सूरजमुखी (sunflower)
  1. सुरजमुखी के फुल का पौधा :-

सूरजमुखी का फूल बहुत ही आसानी से काफी कम समय में बड़ा हो जाता है। ऐसे में गर्मियों के समय में सुरज मुखी के फूल का पौधा लगाना एक बहुत ही अच्छी सोच हो सकती है। 

आप बिना किसी चिंता के आराम से सुरज मुखी के पौधे को लगा सकते हैं। गर्मियों के मौसम में तेज धूप पहले से ही बहुत होती है और सूरज मुखी को हमेशा तेज धूप की ही जरूरत होती हैं।

  1. गुड़हल के फूल का पौधा :-

गर्मियों के मौसम में खिलने वाला फूल गुड़हल बहुत ही सुंदर दिखता है घर के बगीचे में।गुड़हल का फूल बहुत सारे भिन्न भिन्न रंगो में पाया जाता हैं। 

गुड़हल का सबसे ज्यादा लगने वाला लाल फूल का पौधा होता है। यह न केवल खूबसूरती के लिए लगाया जाता है बल्कि इस से बहुत अच्छी महक भी आती है।

  1. गेंदे के फूल का पौधा :-

गेंदे का फूल बहुत ही खुसबूदार होता है और साथ ही साथ सुंदर भी। गेंदे के फूल का पौधा बड़ी ही आसानी से लग जाता है और इसे आप अपने घर के गार्डन में आराम से लगाकर सम्पूर्ण घर को महका सकते है।।

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  1. बालासम के फूल का पौधा :-

बालासाम का पौधा काफी सुंदर होता है और इसमें लगने वाले रंग बिरंगे फूल इसकी खूबसूरती में चार चांद लगा देते हैं। यह फूल बहुत ही कम समय में खेलना शुरू हो जाते हैं यानी की रोपाई के बाद 30 से 40 दिनों के अंदर ही यह पौधा विकसित हो जाता है और फूल खिला लेता है।

फूलों की खेती से कमा सकते हैं लाखों में

फूलों की खेती से कमा सकते हैं लाखों में

भारत में फूलों की खेती एक लंबे समय से होती आ रही है, लेकिन आर्थिक रूप से लाभदायक एक व्यवसाय के रूप में फूलों का उत्पादन पिछले कुछ सालों से ही शुरू हुआ है. 

समकालिक फूल जैसे गुलाब, कमल ग्लैडियोलस, रजनीगंधा, कार्नेशन आदि के बढ़ते उत्पादन के कारण गुलदस्ते और उपहारों के स्वरूप देने में इनका उपयोग काफ़ी बढ़ गया है. 

फूलों को सजावट और औषधि के लिए उपयोग में लाया जाता है. घरों और कार्यालयों को सजाने में भी इनका उपयोग होता है. 

मध्यम वर्ग के जीवनस्तर में सुधार और आर्थिक संपन्नता के कारण बाज़ार के विकास में फूलों का महत्त्वपूर्ण योगदान है. लाभ के लिए फूल व्यवसाय उत्तम है. 

किसान यदि एक हेक्टेयर गेंदे का फूल लगाते हैं तो वे वार्षिक आमदनी 1 से 2 लाख तक प्राप्त कर सकते हैं. इतने ही क्षेत्र में गुलाब की खेती करते हैं तो दोगुनी तथा गुलदाउदी की फसल से 7 लाख रुपए आसानी से कमा सकते हैं. भारत में गेंदा, गुलाब, गुलदाउदी आदि फूलों के उत्पादन के लिए जलवायु अनुकूल है.

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जहाँ इत्र, अगरबत्ती, गुलाल, तेल बनाने के लिए सुगंध के लिए फूलों का इस्तेमाल किया जाता है, वहीं कई फूल ऐसे हैं जिन का औषधि उपयोग भी किया जाता है. कुल मिलाकर देखें तो अगर किसान फूलों की खेती करते हैं तो वे कभी घाटे में नहीं रहते.

भारत में फूलों की खेती

भारत में फूलों की खेती की ओर किसान अग्रसर हो रहे हैं, लेकिन फूलों की खेती करने के पहले कुछ बातें ऐसे हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी हो जाता है. 

यह ध्यान देना आवश्यक है की सुगंधित फूल किस तरह की जलवायु में ज्यादा पैदावार दे सकता है. फिलवक्त भारत में गुलाब, गेंदा, जरबेरा, रजनीगंधा, चमेली, ग्लेडियोलस, गुलदाउदी और एस्टर बेली जैसे फूलों की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. ध्यान रखने वाली बात यह है कि फूलों की खेती के दौरान सिंचाई की व्यवस्था दुरुस्त होनी चाहिए.

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बुआई के समय दें किन बातों पर दें ध्यान

फूलों की बुवाई के दौरान कुछ बातों पर ध्यान देना आवश्यक होता है. सबसे पहले की खेतों में खरपतवार ना हो पाए. ऐसा होने से फूलों के खेती पर बुरा असर पड़ता है. 

खेत तैयार करते समय पूरी तरह खर-पतवार को हटा दें. समय-समय पर फूल की खेती की सिंचाई की व्यवस्था जरूरी होती है. वहीं खेतों में जल निकासी की व्यवस्था भी सही होनी चाहिए. 

ताकि अगर फूलों में पानी ज्यादा हो जाये तो खेत से पानी को निकला जा सके. ज्यादा पानी से भी पौधों के ख़राब होने का दर होता है.

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फूलो की बिक्री के लिये बाज़ार

फूलों को लेकर किसान को बाजार खोजने की मेहनत नहीं करनी पड़ती है, क्योंकि फूलों की आवश्यकता सबसे ज्यादा मंदिरों में होती है. इसके कारण फूल खेतों से ही हाथों हाथ बिक जाते हैं. 

इसके अलावा इत्र, अगरबत्ती, गुलाल और दवा बनाने वाली कंपनियां भी फूलों के खरीदार होती है. फूल व्यवसाई भी खेतों से ही फूल खरीद लेते हैं, और बड़े बड़े शहरों में भेजते हैं.

फूल की खेती में खर्च

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार फूलों की खेती में ज्यादा खर्च भी नहीं आता है. एक हेक्टेयर में अगर फूल की खेती की जाए तो आमतौर पर 20000 रूपया से 25000 रूपया का खर्च आता है, 

जिसमें बीज की खरीदारी, बुवाई का खर्च, उर्वरक का मूल्य, खेत की जुताई और सिंचाई वगैरह का खर्च भी शामिल है, फूलों की कटाई के बाद इसे बड़ी आसानी से बाजार में बेचकर शुद्ध लाभ के रूप में लाखों का मुनाफा लिया जा सकता है

बिहार सरकार की किसानों को सौगात, अब किसान इन चीजों की खेती कर हो जाएंगे मालामाल

बिहार सरकार की किसानों को सौगात, अब किसान इन चीजों की खेती कर हो जाएंगे मालामाल

बिहार सरकार किसानों को एक बड़ी सौगात दे रही है जिसकी खूब चर्चा हो रही है। दरअसल बिहार सरकार का उद्यान विभाग मुख्यमंत्री बागवानी मिशन योजना एवं राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत फल और फूलों के बगीचे लगाने के लिए किसानों को 40 से 75 प्रतिशत तक की सब्सिडी प्रदान कर रहा है, जिससे बिहार के किसानों के चेहरे पर खुशी झलक रही है। मौजूदा दौर में देश के कई राज्यों में किसानों के द्वारा मुख्य फसल की जगह पर तरह तरह के फल और फूलों की खेती की जा रही है।  खेती करने की मुख्य वजह फल और फूलों की घरेलू बाजार के साथ-साथ विश्व की बाजारों मे बढ़ती हुई मांग है।  किसानों को उनके द्वारा उगाए गए फूलों का उचित रेट भी मिल रहा है।  उचित मुनाफा होने के कारण किसान भी जोर–शोर से फल और फूलों की खेती कर रहे हैं।


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भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है। यहां के अधिकतर लोग कृषि के कार्यक्षेत्र से जुड़े हुए हैं, जो अपना भरण-पोषण अपने द्वारा उपजाए गए फसलों को बाजारों में बेचकर करते हैं। मुख्य फसलों की जगह पर फल फूलों की खेती करना आज के इस दौर में कृषि के क्षेत्र में एक प्रमुख विकल्प बनकर उभर रहा है। राज्य सरकार और भारत सरकार भी किसानों की आय में बढ़ोतरी और किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए तरह-तरह की स्कीम और नए-नए तकनीक के साथ खेती करने का प्रशिक्षण दे रही है। इसी कड़ी में बिहार सरकार ने भी किसानों को एक बहुत बड़ी सौगात दी है। फलों एवं फूलों की खेती करने के लिए बिहार के किसानों को उद्यान विभाग राष्ट्रीय बागवानी मिशन एवं मुख्यमंत्री मिशन योजनाओं 40 से 75 प्रतिशत का अनुदान दे रही है। सब्सिडी को प्राप्त करने के लिए आवेदन प्रक्रिया को शुरू कर दिया गया है। सरकार सरकार के द्वारा फल और फूलों की खेती करने पर इस तरह से अनुदान देना एक सराहनीय कदम माना जा रहा है।

अभी सिर्फ इन जिले के किसानों को ही मिलेगा लाभ

एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट गवर्नमेंट ऑफ़ बिहार के ट्विटर आईडी पर पूरी जानकारी स्पष्ट रूप से दी गई हुई है जिसमें ऑनलाइन आवेदन करने के बारे में भी बताया गया है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन और मुख्यमंत्री बागवानी मिशन योजना के तहत आच्छादित जिलों की सूची भी दी गई है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अंतर्गत आवेदन करने वाले जिले पटना, नालंदा, रोहताश, गया, औरंगाबाद, मुजफ्फर पुर, पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, वैशाली, दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, सहरसा, पूर्णिया, कटिहार, अररिया, किशनगंज, मूंगेर, बेगूसराय, जमुई, खगड़िया, बांका और भागलपुर है। वहीं मुख्यमंत्री बागवानी मिशन योजना के अंतर्गत आवेदन करने वाले जिले भोजपुर, बक्सर, कैमूर, जहानाबाद, अरवल, नावादा, सारण, सिवान, गोपालगंज, सीतामढी, शिवहर, सुपौल, मधेपुरा, लखीसराय और शेखपुरा है।

जानिए किस फल पर मिल रही है कितनी सब्सिडी

उद्यान विभाग, राष्ट्रीय बागवानी मिशन और मुख्यमंत्री बागवानी मिशन योजना के तहत चयनित जिलों के किसानों को ड्रैगन फ्रूट और स्ट्रॉबेरी उपजाने के लिए 40 फीसदी की सब्सिडी दी जा रही है। वहीं अनानास, फूल की खेती जैसे गेंदा और अन्य फूल, मसाले की खेती और सुगंधित पौधे की खेती (मेंथा) पर 50 फीसदी की सब्सिडी दी जा रही है। बिहार सकार मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देने के लिए भी सब्सिडी का प्रावधान रखा है। केन्द्र सरकार द्वारा नेशनल बीकीपिंग एंड हनी मिशन का भी गठन किया जा रहा है।


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सबसे ज्यादा यानी 75 फ़ीसदी की सब्सिडी पपीते की खेती पर दी जा रही है, जिससे कम लागत में किसान आसानी से उत्पादन कर सकता है। लोगों में इस फल की मांग भी काफी ज्यादा रहती है। अगर आप ड्रैगन फ्रूट्स, स्ट्रॉबेरी, पपीता, गेंदे की फूल की खेती और सुगंधित पौधे (मेंथा) की खेती करना चाहते है और आप सरकार द्वारा चयनित जिले के निवासी हैं, तो आप http://horticulture.bihar.gov.in/ पर जाकर ऑनलाइन आवेदन करके योजनाओं का लाभ पा सकते हैं। अगर आप इन योजनाओं की विस्तृत जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं तो आप अपने जिले के सहायक निदेशक उद्यान से संपर्क कर सकते हैं और किसान अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र पर जाकर बीज प्राप्त करने कि जानकारी और नए तकनीक के साथ खेती को और बेहतर बनाने के लिए प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हैं।


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भारत के अनेक राज्यों में फल फूल की खेती लोग तेजी से कर रहे हैं। मुख्य तौर पर लोग अब मुनाफा अर्जित करने के लिए ड्रैगन फ्रूट जैसे फलों की उपज करने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। यह एक वानस्पतिक फल वाला पौधा है जो आम तौर पर मानसून के दौरान या उसके बाद में फलता है। इसे आमतौर पर रोपने के 18-24 महीने बाद यह फल देना शुरू कर देता है। प्रत्येक फल का वजन लगभग 300 से 1000 ग्राम तक होता है। एक पेड़ में आमतौर पर लगभग 15 से 25 किलो फल लगते हैं, ये फल बाजार में 300 से 400 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से बिकते हैं, लेकिन सामान्य कृषि दर लगभग रु 125 से 200 प्रति किलो। अगर आप इसकी उपज करते हैं तो आप प्रति एकड़ 5-6 टन की औसत उपज पा सकते हैं।


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भले ही बिहार में बड़े उद्योग लग नहीं पा रहे हैं, लेकिन बावजूद इसके कृषि से जुड़े क्षेत्र में लगातार बेहतर कार्य हो रहे है। बिहार सरकार दूसरी हरित क्रांति लाने के प्रयास में जुट गयी है। भारत के पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने भी बिहार के बारे कहा था की बिहार में दूसरी हरित क्रांति की पूरी संभावना है और जिस तरह से बिहार कृषि के क्षेत्र बढ़ रहा है, इससे अर्थव्यवस्था में काफी हद तक सुधार होगी। बिहार को कृषि में आगे बढ़ने और औद्योगीकरण की ओर बढ़ने के लिए एक बड़ी छलांग की जरूरत है।


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वर्तमान में, हमारे किसान देखते हैं कि पिछले सीजन में किसी विशेष उपज के लिए उन्हें क्या कीमत मिली थी। उदाहरण के लिए, यदि सरसों से उन्हें अच्छी कीमत मिलती है, तो हर कोई उसी की खेती करना पसंद करता है।  लेकिन जिस तरह से सरकार फल फूलों को उपजाने के लिए सब्सिडी दे रही है उससे किसानों का आत्मबल मजबूत हो रहा है और साथ ही बिहार में किसानों कि हालात में भी सुधार हो रहा हैं।
पारंपरिक खेती की जगह इस फूल की खेती किसानों को कर सकता है मालामाल

पारंपरिक खेती की जगह इस फूल की खेती किसानों को कर सकता है मालामाल

हाल के दिनों में आपको देखने को मिलता होगा कि पारंपरिक खेती से किसान अपना रुख बदल रहे हैं, क्योंकि पारंपरिक खेती में किसानों को लागत के अनुसार मुनाफा नहीं मिल पा रहा है। 

विगत कुछ दिनों में आपको ये भी देखने को मिल रहा होगा कि किसान फूलों की खेती की तरफ अपना रुझान दे रहे हैं, क्योंकि उनको ऐसा लगता है कि फूलों की खेती में पारंपरिक खेती से ज्यादा मुनाफा मिल सकता है। 

इसके अलावा भी फूलों की खेती करने के पीछे किसानों की मंशा ये भी है कि आए दिन फूलों की मांग पूरे देश में काफी बढ़ गयी है। गौरतलब हो कि पूरे भारत में लगभग 2 लाख मैट्रिक टन फूल का उत्पादन किया जाता है।

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फूलों में भी आजकल जिस फूल की खेती सबसे ज्यादा की जा रही है वो है गुलाब (Gulab; Rose)। गुलाब को फूलों का राजा कहा जाता है, आपको बता दें कि इसका कारण यह नहीं है की सिर्फ इसको सजावट के लिए प्रयोग करते हैं। 

अपितु इसका बहुत सारा औषधीय प्रयोग भी है, जैसे कि गुलाब जल, गुलाब इत्र आदि। आपको यह जान कर भी हैरानी होगी कि किसान इस फूल को एक बार लगा कर इससे लगभग 10 साल तक फूलों का उत्पादन कर पैसा कमा सकते हैं।

आपको बताते चलें कि गुलाब की खेती के लिए किसान को किसी खास तरह की मिट्टी की बाध्यता नहीं है। किसान इसे किसी भी तरह के मिट्टी में उपजा कर अच्छा मुनाफा कमा सकता है। 

लेकिन अगर किसान बलुई या दोमट मिट्टी का प्रयोग करते हैं, तो फसल और भी अच्छी होगी। लेकिन अगर मिट्टी की उपज अच्छी हो या फिर इसमें जीवांश की मात्रा अधिक हो तो उपज और भी अच्छी होती है। लेकिन किसान एक बात का हमेशा ध्यान रखें कि इस मिट्टी का पीएच मान 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए।

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अगर बात करें गुलाब के खेती के लिए जलवायु का तो इसके लिए जलवायु समशीतोष्ण किस्म का होना चाहिए। किसानों को यह भी ध्यान रखना होगा कि गुलाब की खेती के लिए गर्म जलवायु काफी नुकसानदेह हो सकता है, 

जिससे किसानों को नुकसान भी हो सकता है। आपको बता दें कि किसानों को गुलाब की खेती के लिए 25 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान से नीचे का तापमान अच्छी उपज दे सकता है। 

गौरतलब हो की पूरे भारत में गुलाब के किस्म की बात करें तो लगभग 20 हजार से ज्यादा है। लेकिन जिस किस्म का प्रयोग किसान आमतौर पर करते हैं, उनमें मोहनी, प्रेमा, डेलही प्रिंसेज नूरजहां आदि शामिल हैं।

बारह महीने उपलब्ध रहने वाले इस फूल की खेती से अच्छा मुनाफा कमा रहे किसान

बारह महीने उपलब्ध रहने वाले इस फूल की खेती से अच्छा मुनाफा कमा रहे किसान

उत्तर प्रदेश राज्य के जनपद मिर्जापुर में भदोही निवासी किसान नजम अंसारी गुलाब और जरबेरा के फूलों का उत्पादन करके अच्छा खासा लाभ उठा रहा है। जरबेरा के फूलों मांग अधिकांश बड़े शहरों में होती है और किसान इसके फूलों की आपूर्ति भी करता है। किसान इन फूलों की खेती पाली हाउस की सहायता से तैयार करता है। इन फूलों के उत्पादन से बहुत सारे जरूरतमंदों को रोजगार का अवसर प्राप्त होता है। जरबेरा एवं गुलाब के फूलों की विशेष बात यह है कि इनका प्रयोग खुशनुमा समारोह में अधिकतर होता है जैसे जन्मोत्सव, विवाह समारोह एवं अतिथि गृह को सजाने इत्यादि। इस वजह से कई सारे किसान फूल की खेती की तरफ अपना रुख कर रहे हैं।

नजीम अंसारी कितनी भूमि में कर रहे हैं, जरबेरा की खेती

बतादें कि उत्तर प्रदेश राज्य के जनपद मिर्जापुर में भदोही निवासी किसान नजम अंसारी ने तकरीबन ३ बीघे भूमि पर गुलाब एवं जरबेरा के पुष्पों का उत्पादन किया है। जरबेरा एवं गुलाब के फूलों का उत्पादन करने हेतु पाली हाउस तकनीक की सहायता ली जा रही है। फूलों के उत्पादन के लिए १५ से २० लोग कार्यरत हैं। जरबेरा के फूलों की आपूर्ति प्रयागराज, वाराणसी, कानपुर लखनऊ समेत और भी बहुत सारे जिलों की जाती है। यदि इनकी कीमत की बात की जाये तो जरबेरा का एक फूल ८ से १० रूपये में बिकता है। समारोह कार्यक्रमों के दौरान इसकी मांग के साथ साथ इसकी कीमत में भी बढ़ोत्तरी हो जाती है।


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प्रत्येक फूल अपने आप में मूल्यवान होता है, जरबेरा फूल की खेती भी किसानों को धनवान बनाने में सक्षम है। जरबेरा के फूलों को पाली हाउस में निर्धारित तापमान में ही रखा जाता है। भदोही किसान नजम अंसारी का कहना है, कि जरबेरा फूलों का उत्पादन उन्होंने कुछ वर्ष पूर्व ही की थी, परंतु अब इसकी सहायता से बेहद अच्छा खासा लाभ अर्जित कर रहे हैं। इन फूलों के उत्पादन में पाली हाउस एक अहम भूमिका निभाते हैं, क्योंकि पालीहाउस में २० से २५ डिग्री सेल्सियस तापमान स्थिरता रखने में मदद करता है, जो कि इन फूलों के बेहतर उत्पादन में बेहद सहायक साबित होता है। हालाँकि, ठंड के समय इसके उत्पादन में घटोत्तरी होती है।

जरबेरा का फूल कितने दिन तक ज्यों का त्यों रह सकता है

जरबेरा एक बहुत ही सुंदर और आकर्षक पुष्प है, इसकी रंग बिरंगी पंखुड़ियों को निहारने से बेहद आन्तरिक सुकून और चैन मिलता है। इसी वजह से जरबेरा के पुष्पों का इस्तेमाल कार्यालयों, भोजनालयों, विश्रामालयों, गुलदस्ते बनाने एवं वैवाहिक समारोहों में सजावट हेतु इत्यादि में इस्तेमाल होता है। यह सफेद, गुलाबी, लाल पीला, नारंगी एवं और भी रंगों वाला जरबेरा वर्ष के १२ माह उपलब्ध होता है। बतादें कि जरबेरा के फूल से आयुर्वेदिक औषधियां भी निर्मित होती हैं। जरबेरा पुष्प की एक विशेषता यह भी है, कि पानी के बोतल में इसे रखने पर यह दो सप्ताह तक से भी ज्यादा ज्यों का त्यों रह सकता है।
सेना में 18 साल नौकरी करने के बाद, गेंदे की खेती कर कमा रहे हैं लाखों

सेना में 18 साल नौकरी करने के बाद, गेंदे की खेती कर कमा रहे हैं लाखों

विगत कुछ दिनों में फूलों की खेती किसानों के बीच काफी लोकप्रिय हो रही हैं, जिसका मुख्य कारण कम लागत और बढ़िया मुनाफा है। पूरे भारत में गुलाब से लेकर सूरजमुखी और अन्य फूलों की खेती बड़े स्तर पर की जा रही है। किसान पारंपरिक खेती से फूलों की खेती की तरफ ज्यादा रुझान दिखा रहे हैं, जिसका मुख्य कारण कम लागत में अच्छा मुनाफा बताया जा रहा है। फूलों की खेती में जो सबसे ज्यादा लोकप्रिय हो रहा है, वह है गेंदा की खेती। किसानों का कहना है, कि गेंदे की खेती में काफी अच्छा मुनाफा है। किसान यह भी बता रहे हैं, कि गेंदे की खेती में लागत कम है और इसे करना भी अन्य फूलों की खेती से आसान है। आज इस लेख में गेंदे की खेती करने वाले उस पूर्व सैनिक की कहानी बताएंगे जो विगत कुछ दिनों से गेंदा की खेती के लिए काफी चर्चित हो रहे हैं।

कौन है गेंदा की खेती करने वाला चर्चित किसान

गेंदा की खेती कर चर्चित होने वाले किसान जमशेदपुर से लगभग 40 किलोमीटर दूर रहने वाला एक आदिवासी बताया जा रहा है। आपको यह जानकर बेहद हैरानी होगी कि यह किसान पूर्व में 18 साल तक सैनिक के तौर पर सेवाएँ दे चुके हैं। 18 साल सेना में सेवा देने के बाद एरिक मुंडा नामक व्यक्ति अब गेंदा की खेती कर काफी चर्चित हो रहे हैं।


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क्या कहते हैं एरिक मुंडा

गेंदा की खेती कर चर्चित होने वाले किसान एरिक मुंडा का कहना है, कि इसी खेती से वो अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा दे पा रहा है। वो कहते हैं, कि इसी खेती की कमाई की वजह से उनके बच्चों ने इंजीनियरिंग, बीकॉम(B.Com) की पढ़ाई की। गौरतलब है, कि उनके बच्चों ने पढ़ाई करने के बाद भी कहीं नौकरी करने की जगह उसी फूल की खेती करना उचित समझा और आज उनके सभी बच्चे उनके साथ फूल की खेती कर रहे हैं। एरिक मुंडा का कहना है, कि ये बच्चे उन किसानों के लिए मिसाल हैं, जो अभी भी नौकरी की तलाश में है या फिर बेरोजगार हैं।


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एरिक मुंडा 18 साल तक देश की सेवा करने के बाद जब वापस आए, तो वह दलमा के तराई वाले इलाकों में फूल की खेती करना शुरू किया। एरिक मुंडा के पुत्र अनीश मुंडा का कहना है, कि वह अपने पिता से प्रभावित होकर उन्हीं के साथ फूल की खेती शुरू कर दिए हैं। अनीश मुंडा यह भी कहते हैं, कि वह अपने पिता की तरह फूल की खेती में अपना भविष्य भी देख रहे हैं। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि आज का यह चर्चित किसान ने कभी मात्र चार एकड़ में गेंदे की खेती शुरू की थी और आज लाखों लाख मुनाफा कमा रहे हैं। एरिक मुंडा किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत है, जो आज भी नौकरी की तलाश कर रहे हैं या फिर बेरोजगार हैं।


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कई बीमारियों में गेंदे के रस का इस्तेमाल

गेंदे की बढ़ती मांग को देखते हुए भी किसान इसकी खेती की तरफ रुझान कर रहे हैं। आपको यह जानकर बेहद आश्चर्य होगा कि गेंदे के फूल के रस का इस्तेमाल बहुत सारी बीमारियों में किया जाता है। किसान यह भी बताते हैं, कि अगर आपके पास एक हेक्टेयर खेती योग्य जमीन है तो आप हर साल लगभग छः लाख की कमाई कर सकते हैं।
इस फूल की खेती कर किसान हो सकते हैं करोड़पति, इस रोग से लड़ने में भी सहायक

इस फूल की खेती कर किसान हो सकते हैं करोड़पति, इस रोग से लड़ने में भी सहायक

कैमोमाइल फूल में निकोटीन नहीं होता है, यह पेट से जुड़े रोगों से लड़ने में काफी सहायक है। इसके अतिरिक्त इन फूलों का प्रयोग सौंदर्य उत्पाद निर्माण हेतु किया जाता है। कैमोमाइल फूल की खेती किसानों के अच्छे दिन ला सकती है। देश में करीब समस्त प्रदेश फूलों की खेती अच्छे खासे अनुपात में करते हैं क्योंकि फूलों के उत्पादन से किसानों को बेहतर लाभ अर्जित होता है। भारत के फूलों की मांग देश-विदेशों में भी काफी होती है। राज्य सरकारें भी फूलों की खेती को प्रोत्साहित करने हेतु विभिन्न प्रकार का अनुदान प्रदान कर रही हैं। अब हम बात करेंगे एक ऐसे फूल के बारे में जिसकी खेती किसानों को मालामाल कर सकती है। इस फूल की विशेषता यह है, कि इस फूल की खेती करने में बेहद कम लागत लगती है, जबकि आमंदनी अच्छी खासी होती है। इसी कारण से इस फूल की खेती को अद्भुत व जादुई व्यापार भी बोलते हैं। मतलब इसमें हानि होने का जोखिम काफी कम होता है।


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पारंपरिक खेती की जगह इस फूल की खेती किसानों को कर सकता है मालामाल
बतादें कि जिस फूल के बारे में हम बता रहे हैं, उस फूल का नाम है कैमोमाइल फूल इसका उत्पादन कर बेचने से किसान काफी लाभ उठा सकते हैं। उत्तर प्रदेश राज्य के जनपद हमीरपुर में व बुंदेलखंड में इस फूल का उत्पादन अच्छे खासे पैमाने पर हो रहा है, निश्चित रूप से वहां के कृषकों की आय में भी वृद्धि हुई है। फायदा देख अन्य भी बहुत सारे किसान कैमोमाइल फूल की खेती करना शुरू कर रहे हैं। इस जादुई फूल का उपयोग होम्योपैथिक व आयुर्वेदिक औषधियों के निर्माण में किया जाता है। औषधियाँ बनाने के लिए इन फूलों को दवा बनाने वाली निजी कंपनियों द्वारा खरीदा जाता है।

कैमोमाइल फूल किस रोग में काम आता है

न्यूज वेबसाइट मनी कंट्रोल के अनुसार, कैमोमाइल फूल में निकोटीन नहीं होता है। यह पेट से संबंधित रोगों के लिए बहुत लाभकारी है। इसके अतिरिक्त भी इन फूलों का उपयोग सौंदर्य उत्पादों के निर्माण में होता है। स्थानीय किसानों ने बताया है, कि इस फूल के उत्पादन करने के आरंभ से किसानों की किस्मत बदल गई है। कम लागत में अधिक मुनाफा अर्जित हो रहा है, किसानों के मुताबिक आयुर्वेद कंपनी में जादुई फूलों की मांग बहुत ज्यादा बढ़ गयी है। अब फायदा देखते हुए बहुत से किसानों ने इस फूल की खेती शुरू कर दी है।

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जल्द ही करोड़पति बन सकते हैं

कैमोमाइल फूल की विशेषता यह है, कि इसे बंजर भूमि पर भी उत्पादित किया जा सकता है। इसकी वजह इस फूल के उत्पादन में जल खपत का कम होना है। साथ ही, एक एकड़ में इसकी खेती कर आप ५ क्विंटल कैमोमाइल फूल अर्जित कर सकते हैं, वहीं एक हेक्टेयर में करीब १२ क्विंटल जादुई फूल पैदा होते हैं। किसानों के अनुसार, इस फूल की खेती में आने वाले खर्च से ५-६ गुना अधिक आय प्राप्त हो सकती है। इसकी फसल तैयार होने में ६ महीने का समय लगता है। यानी किसान ६ माह में लाखों की आमंदनी कर सकते हैं। यदि आप इस कैरोमाइल फूल का उत्पादन आरंभ करते हैं, तो शीघ्र ही करोड़पति भी बन सकते हैं।
इस तरीके से किसान अब फूलों से कमा सकते हैं, अच्छा खासा मुनाफा

इस तरीके से किसान अब फूलों से कमा सकते हैं, अच्छा खासा मुनाफा

भारत में फूलों का अच्छा खासा बाजार मौजूद है। किसान के कुछ किसान फूलों की खेती करके अच्छा खासा लाभ कमाते हैं। साथ ही, कुछ किसान बिना फूलों का उत्पादन किये बेहतरीन आमदनी करते हैं। 

इस तरह के व्यापार से भी बेहतरीन मुनाफा लिया जा सकता है। भारत के किसान रबी, खरीफ, जायद सभी सीजनों में करोड़ों हेक्टेयर में फसलों का उत्पादन करते हैं। उसी से वह अपनी आजीविका को भी चलाते हैं। 

किसानों का ध्यान विशेषकर परंपरागत खेती की ओर ज्यादा होता है। हालाँकि, विशेषज्ञों के अनुसार किसान पारंपरिक खेती के अतिरिक्त फसलों का भी उत्पादन कर सकते हैं। 

वर्तमान में ऐसी ही खेती के संबंध में हम चर्चा करने वाले हैं। हम बात करेंगे फूलों की खेती के बारे में जिनका उपयोग शादी से लेकर घर, रेस्टोरेंट, दुकान, होटल, त्यौहारों समेत और भी भी बहुत से समारोह एवं संस्थानों को सजाने हेतु किया जाता है। 

फूलों की सजावट में प्रमुख भूमिका तो होती ही है, साथ ही अगर फूलों के व्यवसाय को बिना बुवाई के भी सही तरीके से कर पाएं तो खूब दाम कमा सकते हैं।

फूलों के व्यवसाय से अच्छी आय अर्जित कर सकते हैं

भारत के बाजार में फूलों का अच्छी खासी मांग है। फूलों का व्यापार को आरंभ करने के लिए 50 हजार से एक लाख रुपये का खर्च आता है। मुख्य बात यह है, कि फूलों के इस व्यवसाय को 1000 से 1500 वर्ग फीट में किया जा सकता है।

फूल कारोबार से जुड़े लोगों ने बताया है, कि कृषि की अपेक्षा फूलों के व्यवसाय से जुड़ रहे हैं। तो कम धनराशि की आवश्यकता पड़ती है। 

यदि इसके स्थान की बात की जाए तो 1000 से 1500 वर्ग फीट भूमि ही व्यवसाय करने हेतु काफी है। इसके अतिरिक्त फूलों को तरोताजा रखने हेतु एक फ्रिज की आवश्यकता होती है। 

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फूलों के व्यवसाय में कितने मानव संसाधन की आवश्यकता पड़ेगी

किसान यदि फूलों का व्यवसाय करने के बारे में सोच रहे हैं, तो उसके लिए कुछ मानव संसाधन की आवश्यकता भी होती है। क्योंकि फूलों की पैकिंग व ग्राहकों के घर तक पहुँचाने हेतु लोगों की आवश्यकता पड़ती है। 

फूल की खेती करने वाले किसानों से फूलों की खरीदारी करने के लिए भी सहकर्मियों की जरूरत अवश्य होगी। भिन्न-भिन्न समय पर भिन्न-भिन्न प्रकार के फूलों की आवश्यकता पड़ती है। 

इसलिए समस्त प्रकार के फूलों का प्रबंध व्यवसायी को स्वयं करना होगा। फूलों को काटने, बांधने एवं गुलदस्ता निर्मित करने के लिए भी कई उपकरणों की जरूरत पड़ेगी।

इस प्रकार बढ़ाएं फूलों का व्यवसाय

सामान्यतः हर घर में जन्मदिन, शादी, ब्याह जैसे अन्य समारोह होते रहते हैं। इसके अतिरिक्त प्रतिष्ठान हो अथवा घर लोग सुबह शाम पूजा अर्चना में फूलों का उपयोग करते हैं। 

अगर फूलों का कारोबार करते हैं, तो प्रतिष्ठान एवं ऐसे परिवारों से जुड़कर अपने कारोबार को बढ़ाएं। किसी प्रतिष्ठान, दुकान एवं घरों पर संपर्क करना अति आवश्यक है। 

उनको अवगत कराया जाए कि ऑनलाइन अथवा ऑनकॉल फूल भेजने की सुविधा भी दी जाती है। आप अपने फूलों के व्यापार को सोशल मीडिया जैसे कि व्हाटसएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम इत्यादि के माध्यम से भी बढ़ा सकते हैं। 

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सर्वाधिक मांग वाले फूल कौन से हैं

दरअसल, बाजार में सैंकड़ों प्रकार के फूल उपलब्ध हैं। परंतु, सामान्यतः समारोहों में रजनीगंधा, कार्नेशन, गुलाब, गेंदा, चंपा, चमेली, मोगरा, फूल, गुलाब, कमल, ग्लैडियोलस सहित अतिरिक्त फूलों की मांग ज्यादा होती है।

फूलों से आपको कितनी आमदनी हो सकती है

हालाँकि बाजार में समस्त प्रकार के फूल पाए जाते हैं, इनमें महंगे एवं सस्ते दोनों होते हैं। दरअसल, गुलाब और गेंदा के भाव में ही काफी अंतर देखने को मिल जाता है। कमल का फूल ज्यादा महंगा बिकता है। 

कमल से सस्ता गुलाब व गुलाब से सस्ता गेंदा होता है। जिस कीमत पर आप किसानों से फूल खरीदें, आपको उस कीमत से दोगुने या तिगुने भाव पर अपने फूलों को बेचना चाहिए। 

अगर आप किसी फूल को 2 रुपये में खरीदते हैं, तो उसको आप बाजार में 6 से 7 रुपये के भाव से बाजार में आसानी से बेच सकते हैं। किसी विशेष मौके पर फूल का भाव 10 से 20 रुपये तक पहुँच जाता है। 

गेंदे के फूल का भाव 50 से 70 रुपये प्रति किलो के हिसाब से प्राप्त हो जाता है। साथ ही, गुलाब का एक फूल 20 रुपये में बिक रहा है। 

वहीं मोगरा का फूल 1000 रुपये प्रति क्विंटल तक भाव प्राप्त हो रहा है। जूलियट गुलाब के गुलदस्ते का भाव तकरीबन 90 पाउंड मतलब की 9,134 रुपये के लगभग है।

इस फूल की खेती से किसान तिगुनी पैदावार लेकर अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं

इस फूल की खेती से किसान तिगुनी पैदावार लेकर अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं

किसान भाई आजकल कम खर्च में अधिक आय देने वाली फसलों की कृषि को अधिकाँश तवज्जो दे रहे हैं। ऐसी स्थिति में किसानों के मध्य फूलों का उत्पादन को लेकर लोकप्रियता बहुत बढ़ी है। इसी क्रम में महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, बिहार कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और ओडिशा के किसान उच्च स्तर पर सूरजमुखी की कृषि से मोटी आय अर्जित कर रहे हैं। रबी फसलों की कटाई केवल कुछ दिनों के अंदर ही चालू होने वाली है। इसके उपरांत कुछ माह खेत खाली रहेंगे, उसके उपरांत खरीफ की फसलों की खेती की शुरुआत हो जाएगी। रबी फसलों की कृषि आरंभ हो जाएगी। रबी फसलों की कटाई एवं खरीफ फसलों की बुवाई के मध्य किसान नगदी फसलों का उत्पादन कर सकते हैं। इसके चलते आप मार्च माह में सूरजमुखी के पौधों की भी कृषि कर सकते हैं। इस फसल की खेती पर भारत सरकार द्वारा अनुदान भी दिया जाता है।

सूरजमुखी के फूल की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी कौन-सी है

सूरजमुखी का पौधा तिलहन फसलों के अंतर्गत आता है। सूरजमुखी को साल में तीन बार उगाया जा सकता है। तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और महाराष्ट्र में इसका उत्पादन बड़े रकबे पर की जाती है। रेतीली दोमट मिट्टी एवं काली मिट्टी इसके उत्पादन हेतु सर्वाधिक उपयुक्त मानी जाती है। जिस भूमि पर इसका खेती की जाती है। उसका पीएच मान 6.5 एवं 8.0 के मध्य होना आवश्यक है।

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सूरजमुखी के बीज का उपचार किस प्रकार होता है

खेतों में सूरजमुखी के बीज रोपने से पूर्व उसका उपचार करना काफी आवश्यक है। नहीं तो, विभिन्न बीज जनित बीमारियों से आपकी फसल प्रभावित होकर नष्ट हो सकती है। सर्व प्रथम सूरजमुखी के बीजों को साधारण जल में 24 घंटे के लिए भिगो दें एवं उसके बाद बुवाई से पूर्व छाया में सुखा लें। बीजों पर थीरम 2 ग्राम प्रति किग्रा व डाउनी फफूंदी से संरक्षण हेतु मेटालैक्सिल 6 ग्राम प्रति किलो अवश्य छिड़कें। इसके उपरांत ही एक निश्चित दूरी की क्यारियों में इसकी बुवाई करें। बुवाई के उपरांत जब पौधा निकल आए तब 20 से 25 दिनों के समयांतराल पर इसकी सिंचाई करते रहें।

सूरजमुखी फूल तैयार होकर कटाई के लिए कब तैयार हो जाता है

सूरजमुखी की फसल की कटाई तब की जाती है, जब समस्त पत्ते सूख जाते हैं। साथ ही, सूरजमुखी के फूल के सिर का पिछला हिस्सा नींबू पीला पड़ जाता है। समय लगने पर दीमक का संक्रमण हो सकता है एवं फसल नष्ट हो सकती है। सूरजमुखी के पौधे से तेल निकालने के अतिरिक्त औषधियों तक में इसका इस्तेमाल किया जाता है। कृषक इस फसल से कम खर्च, कम समय में लाखों की आय कर सकते हैं।

फूलों के उत्पादन से किसान लाखों कमा सकते हैं

फूलों के उत्पादन से किसान भाई काफी अच्छी आमदनी कर सकते हैं। यह बात अब किसान समझने भी लगे हैं। इसलिए आजकल किसान फूलों की खेती करने की दिशा में अपनी काफी रूचि दिखा रहे हैं। भारत के अधिकांश किसान आज भी परंपरागत खेती किया करते हैं। जिसकी वजह से किसानों को कोई खास प्रगति या उन्नति नहीं मिल पाती है। किसान भाई काफी सजग और जागरूक दिखाई दे रहे हैं। तभी आज फूलों की खेती के रकबे मे काफी वृद्धि देखने को मिल रही है।