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ऑफ सीजन में गाजर बोयें, अधिक मुनाफा पाएं (sow carrots in off season to reap more profit in hindi)

ऑफ सीजन में गाजर बोयें, अधिक मुनाफा पाएं (sow carrots in off season to reap more profit in hindi)

गाजर जो दिखने में बेहद ही खूबसूरत होती है और इसका स्वाद भी काफी अच्छा होता है स्वाद के साथ ही साथ विभिन्न प्रकार से हमारे शरीर को लाभ पहुंचाती है। गाजर से जुड़ी पूरी जानकारी प्राप्त करने के लिए हमारे इस पोस्ट के अंत तक जरूर बने रहें । जानें कैसे ऑफ सीजन में गाजर बोयें और अधिक मुनाफा पाएं। 

ऑफ सीजन में गाजर की खेती दें अधिक मुनाफा

सलाद के लिए गाजर का उपयोग काफी भारी मात्रा में होता है शादियों में फेस्टिवल्स विभिन्न विभिन्न कार्यक्रमों में गाजर के सलाद का इस्तेमाल किया जाता है। इसीलिए लोगों में इसकी मांग काफी बढ़ जाती है, बढ़ती मांग को देखते हुए इनको ऑफ सीजन भी उगाया जाता है विभिन्न रासायनिक तरीकों से और बीज रोपड़ कर। 

गाजर की खेती

गाजर जिसको इंग्लिश में Carrot के नाम से भी जाना जाता है। खाने में मीठे होते हैं तथा दिखने में खूबसूरत लाल और काले रंग के होते हैं। लोग गाजर की विभिन्न  विभिन्न प्रकार की डिशेस बनाते हैं जैसे; गाजर का हलवा सर्दियों में काफी शौक और चाव से खाया जाता है। ग्रहणी गाजर की मिठाइयां आदि भी बनाती है। स्वाद के साथ गाजन में विभिन्न प्रकार के विटामिन पाए जाते हैं जैसे विटामिनए (Vitamin A) तथा कैरोटीन (Carotene) की मात्रा गाजर में भरपूर होती है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए कच्ची गाजर लोग ज्यादातर खाते हैं इसीलिए गाजर की खेती किसानों के हित के लिए काफी महत्वपूर्ण होती है। 

गाजर की खेती करने के लिए जलवायु

जैसा कि हम सब जानते हैं कि गाजर के लिए सबसे अच्छी जलवायु ठंडी होती है क्योंकि गाजर एक ठंडी फसल है जो सर्दियों के मौसम में काफी अच्छी तरह से उगती है। गाजर की फसल की खेती के लिए लगभग 8 से 28 डिग्री सेल्सियस का तापमान बहुत ही उपयोगी होता है। गर्मी वाले इलाके में गाजर की फसल उगाना उपयोगी नहीं होता। 

ये भी देखें: गाज़र की खेती: लाखों कमा रहे किसान

ऑफ सीजन में गाजर की खेती के लिए मिट्टी का उपयोग

किसान गाजर की अच्छी फसल की गुणवत्ता प्राप्त करने के लिए तथा अच्छी उत्पादन के लिए दोमट मिट्टी का ही चयन करते हैं क्योंकि यह सबसे बेहतर तथा श्रेष्ठ मानी जाती है। फसल के लिए मिट्टी को भली प्रकार से भुरभुरा कर लेना आवश्यक होता है। बीज रोपण करने से पहले जल निकास की व्यवस्था को बना लेना चाहिए, ताकि किसी भी प्रकार की जलभराव की स्थिति ना उत्पन्न हो। क्योंकि जलभराव के कारण फसलें सड़ सकती हैं , खराब हो सकती है, जड़ों में गलन की समस्या भी उत्पन्न हो सकती है तथा फसल खराब होने का खतरा बना रहता है। 

गाजर की खेती का सही टाइम

किसानों और विशेषज्ञों के अनुसार गाजर की बुवाई का सबसे अच्छा और बेहतर महीना अगस्त से लेकर अक्टूबर तक के बीच का होता है। गाजर की कुछ अन्य किस्में  ऐसी भी हैं जिनको बोने का महीना अक्टूबर से लेकर नवंबर तक का चुना जाता है और यह महीना सबसे श्रेष्ठ महीना माना जाता है। गाजर की बुवाई यदि आप रबी के मौसम में करेंगे , तो ज्यादा उपयोगी होगा गाजर उत्पादन के लिए तथा आप अच्छी फसल को प्राप्त कर सकते हैं।

ऑफ सीजन में गाजर की फसल के लिए खेत को तैयार करे

किसान खेत को भुरभुरी मिट्टी द्वारा तैयार कर लेते हैं खेत तैयार करने के बाद करीब दो से तीन बार हल से जुताई करते हैं। करीब तीन से 5 दिन के भीतर अपने पारंपरिक हल से जुताई करना शुरू कर देते हैं और सबसे आखरी जुताई के लिए पाटा फेरने की क्रिया को अपनाते हैं।  खेत को इस प्रकार से फसल के लिए तैयार करना उपयुक्त माना जाता है।

गाजर की उन्नत किस्में

गाजर की बढ़ती मांग को देखते हुए किसान इनकी विभिन्न विभिन्न प्रकार की  किस्मों का उत्पादन करते हैं। जो ऑफ सीजन भी उगाए जाते हैं। गाजर की निम्न प्रकार की किस्में होती है जैसे:

  • पूसा मेघाली

पूसा मेघाली की बुआई लगभग अगस्त से सितंबर के महीने में होती है। गाजर की इस किस्म मे भरपूर मात्रा में कैरोटीन होता है जो स्वास्थ्य के लिए बहुत ही लाभदायक है। यह फसल उगने में 100 से लेकर 110 दिनों का समय लेते हैं और पूरी तरह से तैयार हो जाती हैं।

  • पूसा केसर

गाजर कि या किस्म भी बहुत ही अच्छी होती है या 110  दिनों में तैयार हो जाती हैं। पूसा केसर की बुआई का समय अगस्त से लेकर सितंबर का महीना उपयुक्त होता है।

  • हिसार रसीली

हिसार रसीली सबसे अच्छी किस्म होती है क्योंकि इसमें विटामिन ए पाया जाता है तथा इसमें कैरोटीन भी होता है। इसलिए बाकी किस्मों से यह सबसे बेहतर किसमें होती है। यह फसल तैयार होने में लगभग 90 से 100 दिनों का टाइम लेती है।

  • गाजर 29

गाजर की या किस्म स्वाद में बहुत मीठी होती है इस फसल को तैयार होने में लगभग 85 से 90 दिनों का टाइम लगता है।

  • चैंटनी

चैंटनी किस्म की गाजर दिखने में मोटी होती है और इसका रंग लाल तथा नारंगी होता है इस फसल को तैयार होने में लगभग 80 से 90 दिन का टाइम लगता है।

  • नैनटिस

नैनटिस इसका स्वाद खाने में बहुत स्वादिष्ट तथा मीठे होते हैं या फसल उगने में 100 से 120 दिनों का टाइम लेती है। 

 दोस्तों हम उम्मीद करते हैं आपको हमारा यह आर्टिकल Gajar (agar sinchai ki vyavastha ho to), Taki off-season mein salad ke liye demand puri ho aur munafa badhe काफी पसंद आया होगा और हमारा यह आर्टिकल आपके लिए बहुत ही लाभदायक साबित होगा। हमारे इस आर्टिकल से यदि आप संतुष्ट है तो ज्यादा से ज्यादा इसे शेयर करें।

धान की नई किस्म मचा रहीं धमाल

धान की नई किस्म मचा रहीं धमाल

हरित क्रांति की शुरुआत के दौर से अभी तक हुए अनुसंधानौं के बाद भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान पूसा दिल्ली ने धान की विश्व में धमाल मचाने वाली 1121, 1509,1637 ,1728 , 1718 के अलावा अनेक किस्में विकसित की हैं। समूचे विश्व में निर्यात होने वाली बासमती की अधिकांश किस्में पूसा संस्थान की देन हैं। 

किसान धान लगाने की तैयारी कर रहे हैं ऐसे में उन्हें यह जानना जरूरी है किस किस्म से उत्पादन अच्छा मिलेगा एवं बाजार में किस किस्म की अच्छी मांग होगी।

 

पूसा धान की 10 नई किस्में (Top10 New Varieties of Pusa Dhan)

पूसा बासमती 1509

वर्ष 2013 में यह मूर्छित इस किस्म को पंजाब एवं दिल्ली राज्य के बासमती उगाने वाले क्षेत्रों के लिए संस्तुत किया गया लेकिन यह किस्म पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर राजस्थान तक में अच्छा उत्पादन दे रही है। इसकी औसत उपज 50 से 60 कुंतल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है। इसके पौधे अर्ध बोने एवं गिरने के प्रति प्रतिरोधी है। पकने पर इसके दाने झड़ते नहीं हैं। यह पर्ण झुलसा रोग, भूरा धब्बा रोग के प्रति मध्यम प्रतिरोधी है । तीव्र सुगंध, लंबा दाना एवं पकने में गुणवत्ता युक्त होने के कारण इसकी समूचे विश्व में अच्छी मांग है। 

पूसा 1612

55 से 62 कुंतल प्रति हेक्टेयर उत्पादन देने वाली यह किस्म पंजाब ,हरियाणा ,दिल्ली एवं जम्मू कश्मीर राज्य में सिंचित अवस्था में रोपाई के लिए उपयुक्त है। यह किस्म पूसा सुगंध 5 का विकसित रूप है। यह ब्लास्ट बीमारी के प्रति प्रतिरोधी है।पकने में 120 दिन का समय लेती है। इस किस्म में लीफ ब्लास्ट बीमारी के प्रतिरोधक  जीन विद्यमान हैं। पैदावार की दृष्टि से पूसा बासमती 1,  तरावड़ी एवं पूसा बासमती 1121 से अच्छी है। 

पूसा बासमती 6- 1401

पंजाब, हरियाणा, पश्चिम बंगाल उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड में सिंचित अवस्था में यह किस्म 50 से 55 कुंतल प्रति हेक्टेयर तक उपज देती है । यह मध्यम बोनी किस्म है। यह पकने पर गिरती नहीं है । दानों की समानता और पकने की गुणवत्ता के हिसाब से यह किस्म पूसा बासमती 1121 से बहुत अच्छी है। पकने पर दाना एक समान रहता है। सुगंध अच्छी है । 150 से 155 दिन में पकती है। 

उन्नत पूसा बासमती 1 -1460

पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड में सिंचित अवस्था मैं यह किस्म 55 से 63 कुंतल तक उपज देती है। 135 से 40 दिन में पक्का तैयार होती है। 

उषा सुगंध 5-25 11

दिल्ली पंजाब हरियाणा पश्चिमी उत्तर प्रदेश और जम्मू कश्मीर राज्य में यह किस्म में 55 से 62 कुंतल प्रति हेक्टेयर तक उपज देती है। यह  उच्च उपज देने वाली सुगंधित चावल की किस्म उत्तर  भारत में वहु फसली पद्धति के लिए उत्तम है ।सुगंधित और लंबी देने वाली यह किस्म पकाव में गुणवत्तापूर्ण है। झड़ने के प्रति सहिष्णु है। यह  भूरे धब्बे की प्रतिरोधी, पत्ती लपेटक एवं  ब्लास्ट के प्रति माध्यम प्रतिरोधी है। 125 दिन में तैयार हो जाती है। 

पूसा बासमती 1121

पंजाब हरियाणा पश्चिमी उत्तर प्रदेश उत्तराखंड एवं बासमती धान उगाने वाले सभी क्षेत्रों में सिंचित अवस्था में यह किस्म 40 से 45 कुंतल प्रति हेक्टेयर उपज देती है। पकने में 140 से 45 दिन लगते हैं । इसका दाना 8 मिलीमीटर लंबा होता है जो पकने के बाद 20 मिलीमीटर तक लंबा हो जाता है। 

पूसा आर एच-10 संकर धान

पंजाब ,हरियाणा, दिल्ली ,पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में यह किस्म 65 से 70 कुंतल तक उपज देती है। यह बासमती गुण वाली धान की विश्व में प्रथम संकर किस्म है। इसका दाना अत्यधिक सुगंधित ,लंबा और पतला है जो पकने पर लंबाई में 2 गुना बढ़ जाता है । यह  110 से 15 दिन का समय लेती है। 

पूसा बासमती 1718

यह किशन पूसा बासमती 1121 को संशोधित कर बनाई गई है। यह 1121 से 15 दिन पहले पक जाती है। लंबाई उतनी ही है लेकिन यह 11 21 किस्म के मुकाबले थोड़ा कम गिरती है। रोग कम आते हैं और उपज 1121 से ज्यादा होती है। 

पूसा बासमती 1728

यह धान की 14 01  किस्म से तैयार संशोधित प्रजाति है। बीएलबी रोग नहीं आता है। उपज भी 32 कुंतल प्रति एकड़ तक आ जाती है। 

पूसा बासमती 1637

इस किस्म से  30 कुंतल प्रति एकड़ तक उत्पादन मिल जाता है। यह भी पूसा की पूर्व में विकसित किस्मों की संशोधित प्रजाति है। मुख्य रूप से पूसा बासमती एक का यह संशोधित वर्जन है और गर्दन तोड़ जैसी बीमारियों के प्रति प्रतिरोधी है।

बासमती चावल ने अन्य चावलों को बाजार से बिल्कुल गायब कर दिया है

बासमती चावल ने अन्य चावलों को बाजार से बिल्कुल गायब कर दिया है

बतादें, कि आजकल लोग बासमती चावलों की सुगंध से मोहित हो जाते हैं। यदि उन्होंने एक बार भी गोविन्द भोग चावलों की सुगंध सूंघ ली तो दंग हो जाएंगे। यदि आज आप भारत में किसी से जानकारी लेंगे कि कौन सा चावल सबसे अच्छा होता है, तो सामने वाला व्यक्ति बिना वक्त लिए सोचकर बोल देगा बासमती। परंतु क्या ये सत्य है? क्या केवल बासमती ही एक ऐसा चावल है जो सबसे अच्छा है? शायद नहीं क्योंकि, भारत में एक वक्त में ऐसी कई सारी चावल की प्रजातियां थीं, जो अपने स्वाद एवं सुगंध के लिए संपूर्ण विश्व में मशहूर थीं।

गोविन्द भोग चावल की सुगंध अच्छी होती है

जो लोग आज बासमती चावलों की खुशबू से मोहित हो जाते हैं, अगर उन्होंने एक बार भी गोविन्द भोग चावलों की खुशबू सूंघ ली तो हैरान हो जाऐंगे। इस चावल की सुगंध ऐसी होती है, कि यदि ये किसी के घर में पक रहा हो तो सारे मोहल्ले को भनक पड़ जाती है, कि किसी के यहां गोविन्द भोग चावल पक रहा है। यह चावल पश्चिम बंगाल के पूर्वी जनपद में बहने वाली नदी दक्षिण बेसिन के किनारे वाले इलाकों में पैदा की जाती है। वर्तमान में भारत के अंदर यह चावल पश्चिम बंगाल के हुगली, बांकुरा, पुरुलिया और बीरभूम में पैदा किया जाता है। साथ ही, बिहार के कैमूर एवं छत्तीसगढ़ के सरगुजा में भी इस चावल की खेती की जाती है। ये भी पढ़े: धान की किस्म पूसा बासमती 1718, किसान कमा पाएंगे अब ज्यादा मुनाफा

सुगंध के मामले में काला नमक चावल को कोई टक्कर नहीं दे सकता

वर्तमान दौर में यदि किसी भारतीय से काला नमक कहा जाए तो वो नमक वाला काला नमक समझेगा। परंतु, एक वक्त पर काला नमक चावल की किस्म संपूर्ण भारत में लोकप्रिय थी। इस चावल को किसी विशेष अवसर पर ही पकाया जाता था। क्योंकि, ये बेहद महंगा होता है। ऐसा कहा जाता है, कि गोविन्द भोग चावल की सुगंध को किसी चावल की सुगंध मात दे सकती है तो वो काला नमक ही है। ये चावल विशेष रूप से नेपाल के कपिलवस्तु और उसके समीपवर्ती पूर्वी उत्तर प्रदेश के तराई वाले क्षेत्रों में पैदा किया जाता है। इस चावल की प्रसिद्धि एक वक्त पर इतनी थी, कि इसे संयुक्त राष्ट्र संघ के खाद्य और कृषि संगठन ने संसार के विशिष्ट मतलब कि खास चावलों की सूची में स्थान दिया है।

काले चावल का बुद्ध से क्या संबंध है

ऐसा कहा जाता है, कि यह चावल स्वयं महात्मा बुद्ध ने किसानों को दिया था। बतादें कि इसके पीछे एक कहानी है, कि एक बार जब महात्मा बुद्ध लुम्बिनी के जंगलों से गुजर रहे थे, तो उन्होंने वहां के ग्रामीणों को काला नमक चावल के बीज देते हुए कहा था, कि इन बीजों से पैदा होने वाले चावल की सुगंध तुम्हें मेरी स्मृति दिलाती रहेगी। आप विचार करिए कि अभी तो हमने आपको केवल दो चावल की किस्मों के विषय में बताया है। हालाँकि, इस प्रकार की विभिन्न प्रजातियां भारत में पैदा की जाती थीं। फिलहाल, यह आहिस्ते-आहिस्ते बासमती की वजह से विलुप्त होती जा रही हैं।
धान की लोकप्रिय किस्म पूसा-1509 : कम समय और कम पानी में अधिक पैदावार : किसान होंगे मालामाल

धान की लोकप्रिय किस्म पूसा-1509 : कम समय और कम पानी में अधिक पैदावार : किसान होंगे मालामाल

धान की लोकप्रिय किस्म पूसा-1509 जो कम समय और कम पानी में अधिक पैदावार दे कर किसानों को कर रही है मालामाल

धान की कई किस्में हमारे लिए बहुत उपयोगी हैं इनमें से एक किस्म पूसा-1509 है जो किसानों को मालामाल कर रही है। एक एकड़ में ₹75000 तक की लागत देती है जिससे किसान की आर्थिक स्थिति में बहुत अच्छा असर पड़ता है। 

इस किस्म की धान लगाने से मुख्य फायदा यह है कि धान की कटाई होने के बाद हम उस खेत में सब्जियां भी लगा सकते हैं, ऐसे में किसान गेहूं लगाने के पहले सब्जियों से काफी रुपए कमा लेते हैं जिससे उनकी आय बढ़ जाती है। 

यह फसल न केवल कम दिनों में पकती है बल्कि इसकी खेती करने से किसानों को बहुत लाभ मिलता है इसलिए कई लोगों का कहना है कि धान की यह किस्म पूसा-1121 की जगह ले सकती है। 

ये भी देखें: तर वत्तर सीधी बिजाई धान : भूजल-पर्यावरण संरक्षण व खेती लागत बचत का वरदान (Direct paddy plantation) बासमती चावल 

ना केवल भारत में सप्लाई होता है बल्कि इसकी मांग विदेशों में भी है। यूरोप में भी इस चावल की सप्लाई काफी मात्रा में होती है। कई एक्सपार्टों का कहना है कि विश्व बाजार में इस चावल के अच्छे दाम मिलेंगे। 

इस किस्म का चावल बहुत सुंदर है। चावल में सुगंध भी अच्छी है। धान की यह किस्म रोपाई के तीन महीने बाद तक पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म की खेती करने में पानी और खाद काम मात्रा में लगता है, अधिक उत्पादन प्राप्त होता है। 

धान के इस किस्म के बीज की मांग बहुत है क्योंकि इससे किसानों को बहुत अच्छी पैदावार प्राप्त हो रही है। तरावडी की अनाज की मंडी बासमती की बड़ी मंडी है। 

और आजकल इस मंडी में पूसा-1509 किस्म की धान भी आना शुरू हो गई है। इस फसल का उत्पादन 20 से 22 क्विंटल प्रति एकड़ तक उत्पादन हो रहा है और इसे बेचने पर 3800 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से रुपए मिलते हैं। मतलब किसानों को इसमें 75000 रुपए प्रति एकड़ तक की पैदावार मिल रही है। 

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पूसा-1509 किस्म का दबदबा क्यों :

धान की पूसा-1509 किस्म के आने के पहले किसान धान की पूसा-1121 नमक किस्म की खेती करते थे। इसकी खेती करने में किसानों को कुछ दिक्कत आती थी। जैसे इस प्रकार की किस्म के पौधों की ऊंचाई अधिक होती थी। 

शुरू से लेकर फसल के तैयार होने में लगभग 5 महीने का वक्त लगता था और अगर कटने पर एक रात खेत में रुक गई तो 15-20% तो खेत में ही झड़ जाती थी। जिसके कारण किसानों का काफी नुकसान हो जाता था। 

लेकिन पूसा-1509 किस्म में ये सब परेशानियां नहीं आतीं। यह किस्म पूसा-1121 का उन्नत रूप है इसलिए इस किस्म की मांग ज्यादा है। इसके अलावा इस किस्म की खेती करने में पानी की कम मात्रा का इस्तेमाल होता है जिससे पानी की बचत होती है। 

इस प्रकार के किस्म की खेती करने से किसान को काफी फायदा मिलता है। जानकारी के मुताबिक इस साल करीब 200 क्विंटल बीज किसानों को दिया गया है जिसकी रोपाई लगभग 50 हजार हेक्टेयर में की गई है। 

और अगले वर्ष इसकी मात्रा बढ़ाई जाएगी जिससे किसानों को अच्छा लाभ मिल सके और उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हो सके। आने वाले समय में पानी की और कमी होगी, पानी को बचाना है तो किसानों को इस तरह की किस्मों का चयन जरूर करना होगा।

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बुआई की जानकारी :

इस किस्म की धान की बुआई 17 मई से 21 जून तक कर सकते हैं एवं रोपाई का सही समय जून के दूसरे सप्ताह से जुलाई के पहले सप्ताह तक है। एक एकड़ धान की रोपाई के लिए 4-5 कि.ग्रा. धान की आवश्यकता होती है। 

पूसा-1509 की कतार से कतार से दूरी 20cm और पौधे से पौधे की दूरी 15cm होनी चाहिए। बुआई के पूर्व बीजों का बीजोपचार कर लेना चाहिए। और उचित उर्वरक का चयन करना चाहिए। 

उर्वरकों का उपयोग मृदा के परीक्षण के हिसाब से करना चाहिए। खरपतवार नियंत्रण के लिए प्रिटी लक्नोर + सेफनर का उपयोग बुआई के 3-4 दिन बाद करना चाहिए। इस प्रकार की किस्म में ज्यादा पानी की आवश्यकता नहीं होती इसलिए समय समय पर आवश्यकता के अनुसार सिंचाई करनी चाहिए। जब दाने परिपक्व हो जाएं तो इसकी कटाई कर लें। 

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धान की यह किस्म किसानों को नुकसान दे सकती है :

धान की इस केस में इतनी खूबियां होने के बावजूद भी कुछ खामियां भी हैं। देश के कुछ राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा आदि राज्यों में बासमती जो सबसे पॉपुलर धान की किस्म थी उसमें एक दिक्कत सामने आ गई है। 

अभी तक ठीक काम कर रहे धान की इस किस्म में कुछ खामियों के कारण सरकार द्वारा इसके बीज वापस लिए जा रहे हैं इसलिए जो भी किसान धान कि इस किस्म की फसल करते हैं वह अब सावधान हो जाएं। 

ऐसा ठीक उसी प्रकार हुआ है जिस प्रकार किसी कंपनी की गाड़ी में खराबी आ जाने के कारण वह कंपनी उस गाड़ी को वापस ले लेती है। सरकार द्वारा ऐसा अहम फैसला इसलिए लिया गया है ताकि किसानों को ज्यादा नुकसान का सामना ना करना पड़े। 

अगर आप भी धान की किस्म के बीज वापस करना चाहते हैं तो आप 21 मई के पहले वापस कर सकते हैं। इसके लिए आपको खरीदी की ओरिजिनल रसीद दिखानी पड़ेगी तभी आप इस किस्म के बीजों को वापस कर सकते हैं। बीज वापसी के बदले किसानों को उनका पैसा या फिर नए बीज दिए जाएंगे।

इतने पॉपुलर बीज को क्यों लिया वापस लेने का फैसला :

जानकारी के मुताबिक एक किसान ने इस बीज के लिए शिकायत की थी जिसके कारण पूसा ने इसका टेस्ट किया जिसमें पता चला कि इसकी उपज सिर्फ 40 फ़ीसदी है जो कि 80 से 90 फ़ीसदी होना चाहिए इसीलिए सरकार द्वारा यह बीज वापस लिया जा रहा है। 

खराबी सिर्फ एक लाट में थी, जिसकी वजह से २५ फरवरी से ४ अप्रैल २०२२ तक की अवधी वाले कर्नाल क्षेत्र से बिक्री हुए एक लाट को वापस लिया जा रहा है। उस बिक्री की रसीद दिखा के किसान भाई बदले में नया बीज या पैसे वापस ले सकते हैं। 

किसान भाई क्षेत्रीय केंद्र करनाल, फोनः 018 42267169 पर बात कर सकते हैं। आशा करते हैं की पूसा-1509 की खेती से सम्बंधित जानकारी किसान भाइयों को पसंद आयी हो, इससे सम्बंधित किसी भी प्रकार की जानकारी चाहतें हों या अपने सुझाव देना चाहें तो कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।

पूसा बासमती चावल की रोग प्रतिरोधी नई किस्म PB1886, जानिए इसकी खासियत

पूसा बासमती चावल की रोग प्रतिरोधी नई किस्म PB1886, जानिए इसकी खासियत

हमारे देश में धान की खेती बहुत बड़ी मात्रा में की जाती है। धान की कई प्रकार की किस्में होती हैं जिनमें से एक किस्म PB1886 है। भारतीय किसान धान की इस किस्म की रोपाई 15 जून के पहले कर सकते हैं। जो 20 अक्टूबर से 15 नवंबर के बीच पककर तैयार हो जाती है। हमारे देश में कृषि को अधिक उन्नत बनाने के लिए सरकार की तरफ से नए नए बीज विकसित किए जा रहे हैं। और फसलों को और अधिक लाभदायक बनाने के लिए कृषि शोध संस्थानों की तरफ से फसलों की नई नई किस्में विकसित की जा रही हैं। यह किस्म न केवल फसलों की पैदावार में वृद्धि करती है। बल्कि किसानों की आय में भी वृद्धि करती हैं।

पूसा बासमती की नई किस्म PB 1886

इसी कड़ी में पूसा ने बासमती चावल की एक नई किस्म विकसित की है, जिसका नाम PB1886 है। बासमती चावल की यह किस्म किसानों के लिए फायदेमंद हो सकती है। यह किस्म बासमती पूसा 6 की तरह विकसित की गई है। जिसका फायदा भारत के कुछ राज्यों के किसानों को मिल सकता है। 

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रोग प्रतिरोधी है बासमती की यह नई किस्म :

बासमती की यह नई किस्म रोग प्रतिरोधी बताई जा रही है। बासमती चावल की खेती में कई बार किसानों को बहुत अधिक फायदा होता है तो कई बार उन्हें नुकसान का भी सामना करना पड़ता है।धान की फसल को झौंका और अंगमारी रोग बहुत अधिक प्रभावित करते हैं। अगर हम झौंका रोग की बात करें इस रोग के कारण धान की फसल के पत्तों में छोटे नीले धब्बे पड़ जाते हैं और यह धब्बे नाव के आकार के हो जाने के साथ पूरी फसल को बर्बाद कर देते हैं। इस वजह से किसान को भारी नुकसान का सामना करना पड़ता है। इसके साथ ही अंगमारी रोग के कारण धान की फसल की पत्ती ऊपर से मुड़ जाती है, धीरे-धीरे फसल सूखने लगती है और पूरी फसल बर्बाद हो जाती है।

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 उपरोक्त इन दोनों कारणों को देखते हुए पूसा ने इस बार धान की एक नई प्रकार की किस्म विकसित की है कि यह दोनों रोगों से लड़ सके। इसके साथ ही पूसा द्वारा यह समझाइश दी गई है कि पूसा की इस किस्म को बोने के बाद कृषक किसी भी प्रकार की कीटनाशक दवाओं का छिड़काव न करें। 

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इन क्षेत्रों के लिए है धान की यह किस्म लाभदायक :

धान की यह किस्म क्षेत्र की जलवायु के हिसाब से विकसित की गई है। इसलिए इसका प्रभाव केवल कुछ ही क्षेत्रों में हैं। जहां की जलवायु इस किस्म के हिसाब से अनुकूल नहीं हैं, उस जगह इस किस्म की धान नहीं होती है। उषा की तरफ से मिली जानकारी के अनुसार वैज्ञानिक डॉक्टर गोपालकृष्णन ने बासमती PB1886 की किस्म विकसित की है जो कि कुछ ही क्षेत्रों में प्रभावशाली है। पूसा के अनुसार यह किस्में हरियाणा और उत्तराखंड की जलवायु के अनुकूल है इसलिए वहां के किसानों के लिए यह किस्म फायदेमंद हो सकती है। 

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 इस किस्म के पौधों को 21 दिन के लिए नर्सरी में रखने के बाद रोपा जा सकता है। इसके साथ ही किसान भाई इस फसल को 1 से 15 जून के बीच खेत में रोप सकते हैं। जो कि नवंबर महीने तक पक कर तैयार हो जाती है। इसलिए इस फसल की कटाई नवंबर में हीं की जानी चाहिए।

पूसा बासमती 1728 : कम सिंचाई और रोगरोधी क्षमता काफी अधिक, जानिए पूरी जानकारी

पूसा बासमती 1728 : कम सिंचाई और रोगरोधी क्षमता काफी अधिक, जानिए पूरी जानकारी

हमारे देश में गेहूं के बाद जिस फसल के उत्पादन सबसे ज्यादा किया जाता है वह है धान। विश्व में सबसे ज्यादा चावल उत्पादन में भारत दूसरे नंबर पर आता है। इसी कारण सरकार धान के उत्पादन पर ज्यादा ध्यान दे रही है। जिस वजह से सरकार धान की नई नई किस्में ला रही है, जिनमें से पूसा बासमती 1728 भी धान की एक किस्म है। इस किस्म की धान में ज्यादा सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। किसान इसमें आवश्यकता पड़ने पर समय समय पर सिंचाई कर सकते हैं। इस प्रकार की धान में किसान को उर्वरक का इस्तेमाल मिट्टी के परीक्षण के आधार पर करना चाहिए। उर्वरक की मात्रा सीमित होनी चाहिए। पूसा द्वारा निर्मित धान की इस किस्म में रोगरोधी क्षमता काफी अधिक है।

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पूसा 1728, पूसा 6 का एक नया वर्जन है लेकिन इस किस्म का उत्पादन पूसा 1401 जैसा ही है। कृपा करके सानु स्पेशल की देखरेख बहुत अच्छे से करें तो वह स्पेशल से दोगुना मुनाफा कमा सकते हैं।

पूसा 1728 की तैयारी :

पूसा द्वारा विकसित यह बासमती चावल किस्म एक अच्छी उपज देने वाली किस्म है। इस किस्म की बुआई 20 मई से लेकर 22 जून के बीच करनी चाहिए। एवं इसके पौधों की रोपाई का समय 15 जून से 5 जुलाई के मध्य होता है।

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फसलों में बीमारी लगने पर किसान अनेक प्रकार की जहरीली दवाओं का छिड़काव चावल की फसल पर कार्य था। जिस कारण से हमारे देश का चावल विदेशों से कई बार रिजेक्ट हो जाता था। इसलिए इस किस्म के पौधों में दवाई के छिड़काव की आवश्यकता न के बराबर होती है। किसान को बहुत कम मात्रा में स्प्रे की जरूरत पड़ेगी। एसे में किसानों के पैसे की बचत होगी। इस प्रकार की धान में प्रति एकड़ 4 से 5 किलोग्राम रोपाई और अनुसंधित धान के लिए 1 से 20 किलोग्राम प्रति एकड़ की रोपाई है। इसमें दुख तारों की बीच की दूरी 20 सेंटीमीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए और दो पौधों की बीच की दूरी का अंतर 15 सेंटीमीटर होना चाहिए।

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पूसा 1728 : फसल का बीज उपचार :

किसी भी फसल के बीज की बुवाई से पहले उसके बीच का बीज उपचार करना बहुत जरूरी होता है धान की इस किस्म के बीज के बीज उपचार करने के लिए इसे पहले 10 ग्राम बाविस्टिन और 1 ग्राम स्ट्रैप्टोसाइगिसन का 8 लीटर पानी के घोल में 24 घंटे तक भिगोते हैं। यह घोल 4 किलोग्राम बीज के लिए पर्याप्त होता है। इससे बीज का अच्छी तरह से बीज उपचार हो जाता है और किसान द्वारा स्वस्थ बीज बोने से फसल की पैदावार भी अधिक होती है।

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पूसा 1728 में उर्वरक की मात्रा :

फसल में उर्वरक मिलाने से उस फसल की पैदावार में वृद्धि होती है। जैविक उर्वरक की अपेक्षा कीटनाशक उर्वरक से अधिक पैदावार होती है लेकिन कीटनाशक के छिड़काव से फसलें जहरीली हो जाती हैं। धान की फसल में उर्वरक का इस्तेमाल मिट्टी का परीक्षण के आधार पर करना चाहिए। इसमें उर्वरक का इस्तेमाल रोपाई के 35 से 40 दिन बाद करना चाहिए। इस प्रकार की फसल में औसत उपज पर्याप्त मात्रा में होती है। दोनों की परिपक्व होने पर इस फसल को काट लेते हैं। इसकी औसत उपज 20 से 24 क्विंटल प्रति एकड़ है। धान की इस किस्म से किसान अच्छी उपज प्राप्त करता है और मुनाफा कमाता है।

धान की किस्म पूसा बासमती 1718, किसान कमा पाएंगे अब ज्यादा मुनाफा

धान की किस्म पूसा बासमती 1718, किसान कमा पाएंगे अब ज्यादा मुनाफा

धान की किस्म पूसा बासमती 1718 : 4 से 5 क्विंटल प्रति एकड़ पैदावार अधिक, किसान कमा पाएंगे अब ज्यादा मुनाफा

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा
धान की एक और किस्म विकसित की गई है जिसका नाम पूसा बासमती 1718 है। धान की इस किस्म से किसानों को अधिक फायदा मिल रहा है। यह किस्म अन्य किस्मों के मुकाबले अधिक पैदावार दे रही है और धान की इस किस्में में बीमारियों का खतरा भी कम है। धान की यह किस्म अन्य किस्मों के मुकाबले 4 से 5 क्विंटल प्रति एकड़ पैदावार अधिक देती है। इस किस्म की धान का दाना लंबा और चमकदार है एवं तना मोटा है। इस फसल से आप अच्छी पैदावार प्राप्त करके अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।

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इस किस्म की धान के लिए ज्यादा पानी की आवश्यकता नहीं होती। इसलिए अपने खेत में ज्यादा पानी नहीं रुकने देना चाहिए और दूसरा पानी खेत की नमीं को देखते हुए देना चाहिए।

पूसा 1718 की तैयारी :

धान की इस किस्म की बुवाई हम 14 मई से 20 जून के बीच में कर सकते हैं अगर किसी कारणवश हम बुवाई करने में विलंब कर देते हैं तो भी हम इस किस्म से अच्छा उत्पादन कमा सकते हैं।

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इसके साथ ही आप इसकी रोपाई जून के दूसरे सप्ताह से लेकर जुलाई के पहले सप्ताह के बीच में कर सकते हैं। बासमती धान के लिए 4 से 5 किलोग्राम प्रति एकड़ रोपाई की आवश्यकता होती है। इस किस्म की रोपाई में क्यारियों और पौधों के बीच की दूरी पर भी ध्यान रखा जाता है। अगर हम कतार की बात करें तो कतार से कतार के बीच की दूरी 20 सेंटीमीटर इसके अलावा दो पौधों के बीच की दूरी 15 सेंटीमीटर होनी चाहिए। इसमें आप 110 किलोग्राम प्रति एकड़ नाइट्रोजन अर्थात यूरिया डाल सकते हैं। धान लगाने के 30 दिन के अंदर खेत में यूरिया डाल देना चाहिए। इसके साथ ही खेत में ज्यादा पानी ना रुकने दें और खेत की नमी को देखते हुए ही सिंचाई करें। ऐसा करने से पौधों की लंबाई ज्यादा नहीं बढ़ पाती है। जिससे धान के झड़ने की समस्या नहीं होती।

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पूसा 1718 की विशेषताएं

धान की एक किस्म पूसा 1121 का डुप्लीकेट वर्जन है। यह पूसा 1121 की तरह ही बनाई गई है लेकिन इसमें कुछ परिवर्तन किए गए हैं जैसे पूसा 1121 में लगने वाली गर्दन मरोड़ बीमारी पूसा 1718 में नहीं लगती। इसके साथ ही इस किस्म के पौधे की लंबाई कम और मोटाई ज्यादा है। जिससे इसका दाना गिरता नहीं है। पूसा 1121 का दाना हल्का लाल और पूछा 1718 का दाना हल्का पीला होता है। भारत के 7 राज्यों में किसकी खेती की जाती है जिनमें हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, छत्तीसगढ़ आदि प्रमुख हैं। इस फसल में बीमारी ना के बराबर लगती है जिसके कारण इसमें हम कीटनाशकों का उपयोग ना भी करें तो भी कोई समस्या नहीं जाती। इसके साथ ही अगर हम उत्पादन की बात करें तो किस का उत्पादन 20 से 25 कुंटल प्रति एकड़ होता है जो कि किसानों के लिए लाभदायक होता है।

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धान की किस्म पूसा 1718, पूसा 1121 की समस्याओं को देखते बनाई गई है इससे जो समस्याएं पूसा 1121 की उत्पादन में आती थी वह 1718 के उत्पादन में नहीं आती।
मात्र 70 दिन में उगे यह रंग-बिरंगी उन्नत शिमला मिर्च (Capsicum)

मात्र 70 दिन में उगे यह रंग-बिरंगी उन्नत शिमला मिर्च (Capsicum)

किसान वर्ग के लिए बात है, न तीखी न फीकी, ऐसी चीज की, जिसका रंग ऐसा की व्यंजन को रंगदार बना दे। जी हां, बात है, लाल-पीली-हरी रंग-बिरंगी शिमला मिर्च (Capsicum) की, जिसके जायके का तड़का भारतीय रसोई से लेकर दुनिया भर की तमाम रेसिपी में शुमार है। कृषक वर्ग शिमला मिर्च (Capsicum) की खेती कर महज ढ़ाई महीने मेें तगड़ा मुनाफा कमा सकते हैं। जानिये ऐसी ही उमदा किस्म की कैप्सिकम (Capsicum) यानी शिमला मिर्च की प्रजातियों के बारे में आज, जिनसे न केवल मिलेगा स्वादिष्ट स्वाद, बल्कि उगाने वाले को होगी तगड़ी आय। कैप्सिकम वैराइटी (Capsicum Variety), यानी शिमला मिर्च की शीर्ष किस्मों मेें ऐसी प्रजातियां शामिल हैं, जो महज ढ़ाई माह के भीतर ही किसान को मुनाफा दे सकती हैं। मतलब 78 से 80 दिन में किसान रंग-बिरंगी शिमला मिर्च को बेचकर हरे नोट गिन सकता है।

भारत में कैप्सिकम पैदावार की संभावनाएं :

भारत के अधिकतर उत्तरी राज्यों हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, झारखंड, उत्तर प्रदेश के साथ ही कर्नाटक के आसपास के प्रदेशों में कैप्सिकम यानी कि शिमला मिर्च की पैदावार का प्रचलन ज्यादा है।


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कम समय और अच्छा बाजार :

फास्ट-फूड कल्चर (Fast Food Culture) जैसे चाइनीज व्यंजनों के साथ ही देसी तड़के में उपयोग की जाने वाली शिमला मिर्च की भारत समेत विदेशी बाजारों में खासी मांग है। ऐसे में महज 2 से 3 महीने में आय का विकल्प, शिमला मिर्च की खेती कृषक मित्रों के लिए अच्छी आय का जरिया बन सकती है।

शिमला मिर्च की प्रमुख किस्में और पैदावार की जानकारी :

भारत में शिमला मिर्च की उन्नत किस्मों (variety of Capsicum in India) की बात करें तो इसमे इंद्रा, कैलिफोर्निया वंडर, येलो वंडर आदि किस्म की शिमला मिर्चों के नाम शामिल हैं। इन मिर्चों की खासियत क्या है और इन्हें कैसे उगाया जाता है जानते हैं गूढ़ राज को।

इंद्रा शिमला मिर्च (Indra Capsicum)

इंद्रा शिमला मिर्च मध्यम लंबी और तेजी से पनपने वाले झाड़ीदार पौधों में से एक किस्म की प्रजाति है। पहचान की बात करें तो इसके गहरे हरे पत्ते मिर्च के फल को आधार प्रदान करते हैं। इस प्रजाति की शिमला मिर्च गहरी हरी, मोटे आवरण के साथ ही चमकदार होती हैं।
इंद्रा शिमला मिर्च के लिए मुफीद सीजन :
खरीफ सीजन में इंद्रा शिमला मिर्च की अच्छी पैदावार हीती है। मूल तौर पर महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात के साथ ही राजस्थान, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश एवं कलकत्ता, उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल समेत हरियाणा, उत्तराखंड, ओडिशा, पंजाब इंद्रा शिमला मिर्च (Indra Capsicum) का तगड़ा पैदावार क्षेत्र है।
इंद्रा शिमला मिर्च के लिए बुवाई और मिट्टी :
बोवनी की बात करें तो बुवाई के महज 70 से 80 दिनों के भीतर इंद्रा शिमला मिर्च की प्रजाति परिपक़्व हो जाती है, जिसे तोड़कर किसान अच्छा मुनाफा कमाते हैं।


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भारत शिमला मिर्च (Bharat Capsicum)

भारत शिमला मिर्च की प्रजाति के पौधे तेजी से पनपते हैं। यह गहरे हरे रंग के होते हैं। भारत शिमला मिर्च की प्रजाति की पैदावार के लिए सूखी एवं लाल दोमट मिट्टी अनिवार्य है। जून से दिसम्बर यानी सात महीनों तक का मौसम इसकी पैदावार के लिए अनुकूल माना गया है। इसे बोने के लगभग 90 से 100 दिनों यानी तीन माह से कुछ अधिक दिनों के बाद भारत शिमला मिर्च की तुड़ाई किसान कर सकते हैं।

कैलिफोर्निया वंडर शिमला मिर्च (California wonder Capsicum)

कैलिफोर्निया वंडर शिमला मिर्च (California wonder Capsicum) भारत में पैदावार की जाने वाली उन्नत किस्मों में से एक है। कैलिफोर्निया वंडर शिमला मिर्च का पौधा मध्यम ऊंचाई का होता है। हरे रंग के फल इसकी पहचान हैं। इसे बोने के करीब 75 दिनों उपरांत इसके पौधों से मिर्च के फल तोड़े जा सकते हैं। प्रति एकड़ जमीन के मान से तकरीबन 72 से 80 क्विंटल शिमला मिर्च पैदा होने की संभावना है।

येलो वंडर शिमला मिर्च (Yellow Wonder Capsicum) -

चटख पीले रंग की येलो वंडर शिमला मिर्च (Yellow Wonder Capsicum) के पौधों की बात करें तो चौड़े पत्तों वाले इन प्लांट्स की ऊंचाई मध्यम आकर की होती है। बीजारोपण के करीब 70 दिनों उपरांत येलो वंडर शिमला मिर्च (Yellow Wonder Capsicum) की पैदावार तैयार हो जाती है। कृषि वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार अनुकूल परिस्थितियों में प्रति एकड़ भूमि पर लगभग 48 से 56 क्विंटल येलो वंडर शिमला मिर्च (Yellow Wonder Capsicum) की पैदावार संभव है।

पूसा दीप्ती शिमला मिर्च (Pusa Deepti Capsicum)

पूसा दीप्ती शिमला मिर्च (Pusa Deepti Capsicum) हाइब्रिड प्रजाति की शिमला मिर्च है। इसका पौधा भी मध्यम आकार का झाड़ीनुमा होता है। पूसा दीप्ति कैप्सिकम (Pusa Deepti Capsicum) के फलों का रंग शुरुआत में हल्का हरा होता है, जो फल के पकने के उपरांत गहरे लाल रंग में तब्दील हो जाता है। बीजारोपण के महज ढ़ाई माह, यानी कि मात्र 70 से 75 दिनों के उपरांत इसके फल तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं।  
आजादी के अमृत महोत्सव में डबल हुई किसानों की आय, 75000 किसानों का ब्यौरा तैयार - केंद्र

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भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने पिछले साल तय अपने निर्धारित लक्ष्य को पूरा किया है। परिषद ने पिछले साल आजादी के अमृत महोत्सव में किसानों की सफलता का दस्तावेजीकरण करने का टारगेट तय किया था। इस वर्ग में ऐसे कृषक मित्र शामिल हैं जिनकी आय दोगुनी हुई है या फिर इससे ज्यादा बढ़ी है। परिषद के अनुसार ऐसे 75 हजार किसानों से चर्चा कर उनकी सफलता का दस्तावेजीकरण कर किसानों का ब्यौरा जारी किया गया है। आजादी के अमृत महोत्सव के उपलक्ष्य में आय बढ़ने वाले लाखों किसानों में से 75 हजार किसानों के संकलन का एक ई-प्रकाशन तैयार कर उसे जारी किया गया। [embed]https://youtu.be/zEkVlSwkq1g[/embed]

भाकृअनुप ने अपना 94वां स्थापना दिवस और पुरस्कार समारोह – 2022 का किया आयोजन

प्रेस रिलीज़ :

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के 94वें स्थापना दिवस पर कृषि मंत्री की अध्यक्षता में समारोह, पुरस्कार दिए

केंद्रीय मंत्री तोमर ने किया विमोचन

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने समारोह में कहा कि, देश में कृषि क्षेत्र एवं कृषक मित्रों का तेजी से विकास हो रहा है। केंद्र एवं राज्य सरकारों, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), भारत के कृषि विज्ञान केंद्रों के समन्वित प्रयास के साथ ही जागरूक किसान भाईयों के सहयोग से किसान की आय में वृद्धि हुई है। परिषद ने 'डबलिंग फार्मर्स इनकम' पर राज्य आधारित संक्षिप्त प्रकाशन भी तैयार किया है। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने विमोचन अवसर पर ई-बुक को जारी किया।

पुरस्कार से नवाजा

कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के 94वें स्थापना दिवस पर मंत्री तोमर ने उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए वैज्ञानिकों व किसानों को पुरस्कृत भी किया। पूसा परिसर, दिल्ली में आयोजित समारोह में तोमर ने कहा कि, आज का दिन ऐतिहासिक है, क्योंकि आईसीएआर ने पिछले साल, आजादी के अमृत महोत्सव में ऐसे 75 हजार किसानों से चर्चा कर उनकी सफलता का दस्तावेजीकरण करने का लक्ष्य निर्धारित किया था, जिनकी आय दोगुनी या इससे ज्यादा दर से बढ़ी है। उन्होंने कहा कि सफल किसानों का यह संकलन भारत के इतिहास में मील का पत्थर साबित होगा। केंद्रीय मंत्री तोमर ने आईसीएआर के समारोह में अन्य प्रकाशनों का भी विमोचन किया। उन्होंने आईसीएआर के स्थापना दिवस को संकल्प दिवस के रूप में मनाने की बात इस दौरान कही।

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कृषि क्षेत्र में निर्मित किए जा रहे रोजगार अवसर

कृषि मंत्री तोमर ने कहा कि, कृषि प्रधान भारत देश में निरंतर कार्य की जरूरत है। इस क्षेत्र में आने वाली सामाजिक, भौगोलिक, पर्यावरणीय चुनौतियों के नित समाधान की जरूरत भी इस दौरान बताई। उन्होंने पारंपरिक खेती को बढ़ावा देने के मामले में तकनीक के समन्वित इस्तेमाल का जिक्र अपने संबोधन में किया। उन्होंने कहा, प्रधानमंत्री की कोशिश है कि गांव और गरीब-किसानों के जीवन में बदलाव आए। मंत्री तोमर ने ग्रामीण क्षेत्र में एग्री इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित कर, कृषि का मुनाफा बढ़ाने के लिए किए जा रहे केंद्र सरकार के कार्यों पर इस दौरान प्रकाश डाला।

एग्री इंफ्रास्ट्रक्चर से की जा रही फंडिंग

केंद्रीय मंत्री ने बताया कि नव रोजगार सृजन के लिए हितग्राही योजनाएं लागू कर उचित फंडिंग की जा रही है। ग्रामीण नागरिकों को रोजगार से जोड़ा जा रहा है। खास तौर पर कृषि में रोजगार के ज्यादा अवसर निर्मित करने का सरकार का लक्ष्य है।

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जलवायु परिवर्तन चिंतनीय

केंद्रीय कृषि मंत्री ने आईसीएआर की स्थापना के 93 साल पूर्ण होने के साथ ही वर्ष 1929 में इसकी स्थापना से लेकर वर्तमान तक संस्थान द्वारा जारी की गईं लगभग 5,800 बीज-किस्मों पर गर्व जाहिर किया। वहीं इनमें से वर्ष 2014 से अभी तक 8 सालों में जारी की गईं लगभग दो हजार किस्मों को उन्होंने अति महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। उन्होंने जलवायु परिवर्तन की स्थिति को चिंतनीय कारक बताकर कृषि वैज्ञानिकों, साथियों से इसके सुधार की दिशा में रोडमैप बनाकर आगे बढ़ने का आह्वान किया।

नई शिक्षा नीति का उदय -

मंत्री तोमर ने प्रधानमंत्री की विजन आधारित नई शिक्षा नीति का उदय होने की बात कही। उन्होंने स्कूली शिक्षा में कृषि पाठ्यक्रम के समावेश में कृषि शिक्षा संस्थान द्वारा प्रदान किए जा रहे सहयोग पर प्रसन्नता व्यक्त की। मंत्री तोमर ने दलहन, तिलहन, कपास उत्पादन में प्रगति के लिए आईसीएआर (ICAR) और केवीके ( कृषि विज्ञान केंद्र (KVK)) को अपने प्रयास बढ़ाने प्रेरित किया। समारोह के पूर्व देश के विभिन्न हिस्सों के किसानों से कृषि मंत्री ने ऑनलाइन तरीके से विचार साझा किए। हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात के किसानों से हुई चर्चा में सरकारी योजनाओं, संस्थागत सहयोग से किसानों की आय में किस तरह वृद्धि हुई इस बात की जानकारी मिली।
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समय-समय पर भारतीय कृषि मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले कृषि वैज्ञानिक, अपनी एडवाइजरी के जरिए भारत के किसानों को फायदा पहुंचाने का कार्य बखूबी करते रहते हैं। इसी कड़ी में, इस सप्ताह के लिए इन्होंने अपनी एक नई एडवाइजरी जारी कर दी है। इस एडवाइजरी में बताई गई सलाह को जानने से पहले, आप यह समझ लें कि वैज्ञानिकों के द्वारा जारी की गई एडवाइजरी पूर्णतया किसानों के फायदे के लिए ही की जाती है और इसका सही तरीके से पालन करने पर आप की फ़सल की उत्पादकता और यील्ड बहुत ही तेजी से ग्रोथ करती हुई दिखाई देगी। दिल्ली में स्थित पूसा इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (Pusa Institute Of Technology, DSEU Pusa campus) के द्वारा जारी की गई एडवाइजरी में कहा गया है कि, जिस समय
धान की रोपाई की जाए उस समय, एक पंक्ति और दूसरी पंक्ति के बीच 20 सेंटीमीटर की दूरी रखनी चाहिए और दो छोटे पौधों के बीच की दूरी 10 सेंटीमीटर से अधिक होनी चाहिए। इस एडवाइजरी के अनुसार कहा गया है कि, जिन किसानों ने अपनी फसल का रोपण बारिश की पहली श्रंखला में ही कर दिया था, वह अपनी फसलों की निराई गुड़ाई का कार्य जल्दी से जल्दी करने की कोशिश करें, क्योंकि, इसमें देरी हो जाने पर फसल की जितनी अनुमानित उत्पादकता होगी, वास्तविक उत्पादकता उससे काफी कम प्राप्त हो सकती हैं। यह बात तो आप जानते ही हैं, कि भारत की मिट्टी में कई जगहों पर नाइट्रोजन की कमी देखी जाती है और इसी की पूर्ति करने के लिए, भारत सरकार सॉइल हेल्थ कार्ड (Soil Health Card) के जरिए किसानों को समय-समय पर यूरिया की सप्लाई करती रहती है। सब्सिडी पर मिलने वाले यूरिया को बहुत ही सीमित मात्रा में इस्तेमाल करना चाहिए, यदि आपने अपने खेतों में एक बार नाइट्रोजन की मात्रा का छिड़काव कर दिया है, तो अति शीघ्र दूसरे छिड़काव की तैयारी भी कर लें।

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इस समय यह ध्यान रखें कि बारिश आने में और यूरिया के छिड़काव के बीच में थोड़े समय का अंतराल होना अनिवार्य है, क्योंकि यदि यूरिया के छिड़काव के तुरंत बाद ही बारिश आ जाती है, तो बारिश के पानी के द्वारा पूरे न्यूट्रिएंट्स को बहाकर ले जाया जा सकता है, जिससे कि आप की मेहनत और पैसा दोनों ही बर्बाद हो सकते हैं। यदि आपकी फ़सल समय से पहले पक कर तैयार हो चुकी है, तो उनके उचित प्रबंधन का भी ध्यान रखें।

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सॉइल हेल्थ कार्ड के द्वारा बताई गई माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी को दूर करने के लिए उसी के अनुसार नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और जिंक सल्फेट को मिलाना चाहिए। यदि एक औसत निकाला जाए तो आपको अपने खेत में प्रति हेक्टेयर के अनुसार 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश का इस्तेमाल करना चाहिए। पोटाश (Potash) का इस्तेमाल मुख्यतया फर्टिलाइजर के रूप में किया जाता है और इसका इस्तेमाल फसल के थोड़े से बड़े होने के बाद ही करना चाहिए, छोटे पौधों में इसका इस्तेमाल करने से उनकी ग्रोथ में रुकावट भी पैदा हो सकती है। इस समय मक्का, फूल गोभी, बैंगन और मिर्च इत्यादि की खेती करने का वक्त भी शुरू हो चुका है। यदि आप मक्का की खेती करना चाहते हैं, तो पूसा के वैज्ञानिकों के द्वारा बताई गई हाइब्रिड किस्में एएच-401 और एएच- 58 के साथ ही पूसा कम्पोसिट- 4 का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। बुवाई के दौरान आपको ध्यान रखना होगा कि प्रति हेक्टेयर के अनुसार 20 किलोग्राम तक के बीज का ही इस्तेमाल करना चाहिए। मक्का की खेती में पंक्ति के बीच में दूरी को 70 से 80 सेंटीमीटर के बीच में रखना चाहिए और जैसे ही मक्का की पौध जमीन से थोड़ी सी बाहर निकले, तो साथ में उगे खरपतवार को खत्म करने के लिए एट्राजिन (Atrazine) नाम के एक खरपतवार नाशी का इस्तेमाल कर सकते हैं।

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यदि आप मिर्च, फूलगोभी और बैंगन की तैयार पौध का इस्तेमाल करना चाहते हैं, तो अपने खेत में एक बार हार्वेस्टर के इस्तेमाल के बाद में उथली हुई क्यारियों पर ही इनकी पौध को लगाना चाहिए। इस समय किसान भाइयों को ध्यान रखना चाहिए, कि खेत में ज्यादा पानी को रुकने ना दें। यदि थोड़ा भी ज्यादा पानी रह गया हो, तो तुरंत उसको खेत से बाहर निकालने का प्रयास करें, क्योंकि आजकल नर्सरी में तैयार की गई पौध पहले के जैसे नहीं बनाई जाती और उनमें हाइब्रिड गुणों का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे कि हानिकारक कीट और बीमारियां लग सकती हैं। इसके अलावा पूसा के वैज्ञानिकों ने एक और खास एडवाइजरी जारी की है, जिसमें उन्होंने बताया है कि बदलते वक्त के साथ ही आपके द्वारा उगाई गई पालक, चौलाई और भिंडी जैसी फसलों पर होपर अटैक होने की संभावनाएं भी बढ़ती जाएगी। इसलिए यदि आपने अभी तक बीज नहीं बोयें हैं, तो किसी भी सर्टिफाइड सेंटर से ही बीजों को खरीदें और उन्हें पूरी तरीके से उपचारित करके ही अपने खेत में इस्तेमाल करें।

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इस समय उगाई जाने वाली धनिया और पालक जैसी फसलों में माइट और होपर की निगरानी पर पूरा ध्यान दें। यदि आपको पता चलता है कि आप के खेत में माइट जैसे हानिकारक जीव पाए जाते हैं (जो कि आप की खेती का नुकसान कर सकते हैं), तो इसके निदान के लिए फॉस्माइट (FOSMITE) का इस्तेमाल कर सकते हैं। यह ध्यान रहे कि फॉस्माइट का इस्तेमाल केवल मौसम साफ होने पर ही करें और 1 लीटर पानी में 2 मिलीलीटर से ज्यादा फॉसमाइट को ना मिलाएं। आशा करते हैं कि हमारे प्लेटफार्म Merikheti.com के माध्यम से आपको भारतीय कृषि वैज्ञानिकों के द्वारा जारी की गई एडवाइजरी के बारे में पूरी जानकारी मिल चुकी होगी और अति शीघ्र ही आप इस एडवाइजरी का पूरी तरह से पालन करते हुए अपनी फसल की अच्छी ग्रोथ को प्राप्त कर सकेंगे।
वैज्ञानिकों ने निकाली प्याज़ की नयी क़िस्में, ख़रीफ़ और रबी में उगाएँ एक साथ

वैज्ञानिकों ने निकाली प्याज़ की नयी क़िस्में, ख़रीफ़ और रबी में उगाएँ एक साथ

पिछले कुछ महीनों में भारत में प्याज की अच्छी खासी कमी देखी गई थी और इसी वजह से प्याज पिछले २ से ३ सालों में मांग में बढ़ोतरी होने पर मुंह मांगे दामों पर भी बेचा जाता है। भारत में प्याज गुजरात, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्य में उगाया जाता है। प्याज के तीखे पन और कैंसर के खिलाफ पाए जाने वाली गुणों की वजह से भारत के लोगों के द्वारा इसे अपने भोजन में शामिल किया जाता है।

प्याज की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु व मिट्टी

वैसे तो प्याज ठंडी जलवायु वाले क्षेत्रों में उगाया जाता है, लेकिन भारत में इसकी खेती
खरीफ के दौरान भी की जाती है।अलग-अलग जगह के प्याज की कीमत, वहां की जलवायु के प्रभाव की वजह से इनकी लंबाई और तापमान में आए अंतर के कारण होती है। इनकी पकाई के समय में उच्च तापमान और लंबे समय तक धूप रहने वाले दिनों की आवश्यकता होती है। इसे २५ से ३० डिग्री सेंटीग्रेड तापमान वाले जलवायु क्षेत्र में उगाने से, प्रसंस्करण करने में भी काफी मदद मिलती है और लंबे समय तक बिना बिगड़े इस्तेमाल करने योग्य रहते हैं। यदि आपके खेत की जमीन में ऑर्गेनिक खाद की आपूर्ति पहले से ही पर्याप्त है, तो आप भी प्याज की खेती कर सकते हैं। इसे मुख्यतः दोमट और बलुई मिट्टी के में उगाया जाता है। यदि आपके खेत की मिट्टी रेगिस्तानी क्षेत्र में है, तो उसमें क्षारीयता और अम्लता ज्यादा होने की वजह से प्याज के लिए उत्पादक उपयुक्त नहीं समझी जाती है। कुछ सालों से वैज्ञानिकों ने बेहतरीन परीक्षण कर, भारतीय जमीन के लिए प्याज की अलग-अलग किस्में तैयार कर दी है, जिनमें सबसे लोकप्रिय है पूसा रत्नाकर (Pusa Ratnakar) - इस किस्म के पौधे लगभग 30 मीटर की ऊंचाई तक बढ़ते है और तैयार होने पर इनका आकार बड़ा और गोलाकार होता है। भारतीय बाजारों में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मार्केट में भी इस किस्म की बहुत ही डिमांड रहती है और केवल एक हेक्टेयर जमीन में ही ३०० से ४०० क्विंटल प्याज पैदा कर सकती है। इसके अलावा, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद या इंडियन काउंसिल फॉर एग्रीकल्चर रिसर्च (ICAR) ने अर्का बिंदु (Arka Bindu) नाम की एक लाल रंग वाली प्याज की वैरायटी भी तैयार की है, जो कि आकार में बहुत ही छोटे होते हैं और इन्हें लगभग 100 दिनों में ही पका कर तैयार किया जा सकता है। इस किस्म की प्याज की खेती के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है उन्नत किस्म का चुनाव और भूमि की तैयारी। यदि आप प्याज की खेती करना चाहते हैं तो खेत की एक जुताई गर्मी की शुरुआत में ही हल से करनी चाहिए और उसके बाद कल्टीवेटर की मदद से हर जुताई के बाद खेत को समतल बनाना चाहिए, जिससे कि मिट्टी की नमी बरकरार रहे।

प्याज की बुवाई में पौधों के बीच दूरी

प्याज की पौध को लगाते समय इनमें 1 मीटर की दूरी रखनी चाहिए, वैसे तो आजकल प्याज की पौध बाजार में भी आसानी से मिल जाती है परंतु वहां आपको पता नहीं रहता कि यह किस किस्म का प्याज है तो अपने कम जलभराव वाले खेत में आप भी प्याज की पौध बना सकते है। इसके लिए उस जगह पर पहले पर्याप्त मात्रा में ऑर्गेनिक खाद्य कंपोस्ट का इस्तेमाल करना चाहिए, इसके लिए आप दो से तीन क्यारियां लगाकर पौध बना सकते है। किसान भाई ध्यान रखे कि बीजों को एक पंक्ति में ही लगाना चाहिए, जब क्यारी अलग से तैयार हो जाए तो उन पर सुखी घास के कटे हुए बारीक कणों को फैला देना चाहिए, जिससे की प्याज के बीजों का अंकुरण बहुत ही आसानी और तेजी से हो सके। एक बार आप के पौधे नर्सरी में अंकुरित हो जाए तो उन्हें बहुत ही सीमित मात्रा में पानी देने शुरू कर देना चाहिए, खरीफ मौसम के दौरान आपको प्रति हेक्टेयर क्षेत्र में लगभग 10 से 12 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है जबकि रबी की फसल के दौरान इसकी मात्रा कम भी की जा सकती है। कृषि विभाग के द्वारा जारी किए गए सॉइल हेल्थ कार्ड के अनुसार ही आपको अपने खेत में खाद और उर्वरक का इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि प्याज की पौध को उचित मात्रा में उर्वरक नहीं मिलने पर उनके आकार बहुत ही छोटे हो जाते हैं और स्वाद भी पूरी तरीके से खत्म हो जाता है। प्राथमिक स्तर पर आप गोबर की खाद का इस्तेमाल भी कर सकते हैं, इसके बाद प्रति हेक्टेयर में 50 किलोग्राम तक फास्फोरस और पोटास के मिश्रण को मिलाकर छिड़काव किया जा सकता है।

प्याज की खेती में खरपतवार नियंत्रण

यदि आप की जमीन में खरपतवार बहुत ही तेजी से उगता है तो इसे रोकने के लिए तीन से चार बार हाथों से ही निराई गुड़ाई कर खरपतवार को कम किया जा सकता है, इसके अलावा ऑक्सीफ्लोरफेन जैसे खरपतवार नाशी का भी सीमित मात्रा में छिड़काव करना प्रभावी साबित होता है।

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प्याज के पौधों की सिंचाई व्यवस्था

यह बात सभी किसान भाइयों को ध्यान रखनी चाहिए कि प्याज की पौध की सही समय पर सिंचाई करना अनिवार्य है, क्योंकि जब तक मानसून है तब तक तो बिना सिंचाई के भी काम चल सकता है लेकिन जब कन्द का निर्माण शुरू हो जाता है, उस समय पानी की कमी होने से कुछ रोग भी हो सकते है, जिनमें पर्पल ब्लीच नाम का रोग आपके प्याज की बिक्री को बहुत ही कम कर देता है। एक बार पककर तैयार हुए प्याज के कंद की खुदाई लगभग 2 से 3 माह में की जा सकती है, जैसे ही प्याज की गांठ अपना पूर्ण स्वरूप धारण कर लेती है तो धीरे-धीरे उसकी पत्तियां सूखने लगती है और इसके बाद 5 से 10 दिन में आपको उसकी सिंचाई को बंद करना होगा और उन्हें खोदकर खेत में ही नमी को सुखाने के लिए धूप में रख देना चाहिए। इसके अलावा, बड़े स्तर पर उत्पादन होने पर तैयार प्याज को फंगस से होने वाले रोगों से बचाने के लिए ठंडी जगह पर भी भंडारण करके रखा जा सकता है।

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प्याज में कीट प्रबंधन

यदि बात करें प्याज में लगने वाले प्रमुख कीट और बीमारियों की तो थ्रिप्स नाम का कीट प्याज की पत्तियों का रस चूस लेता है, जिससे कि प्याज का स्वाद पूरी तरीके से खत्म हो जाता है। इन्हें रोकने के लिए नीम के तेल से बने हुए कीटनाशकों का इस्तेमाल करना चाहिए, इनमें इमिडाक्लोप्रिड एक प्रमुख कीटनाशी है। हमारे किसान भाई प्याज की फसल में लगने वाले एक कीड़े 'प्याज की मक्खी' का नाम तो जरुर जानते होंगे। यह कीड़ा पूरी तरीके से ही पौधे को खत्म करने की क्षमता रखता है, इसलिए इसे रोकने के लिए क्विनालफ़ास के मिश्रण का छिड़काव किया जाता है। आशा करते हैं कि हमारे किसान भाई, हमारे द्वारा दी गई जानकारी का पूरा फायदा उठा कर रबी और खरीफ, दोनों ही समय की फसलों के साथ प्याज की फसल को भी आसानी से उगाकर अच्छा मुनाफा कमा पाएंगे।
धान के दुश्मन कीटों से कैसे करें बचाव, वैज्ञानिकों ने बताए टिप्स

धान के दुश्मन कीटों से कैसे करें बचाव, वैज्ञानिकों ने बताए टिप्स

धान की बुवाई गतिविधियों को प्रभावित करने वाले पूर्वी क्षेत्रों में मानसूनी वर्षा में इस साल काफी कमी दर्ज की गयी है। अनुमान है कि 2022-23 फसल वर्ष (जुलाई-जून) के लिए देश का चावल उत्पादन पिछले साल के रिकॉर्ड स्तर से कम से कम 10 मिलियन टन कम हो सकता है। मानसून के कमजोर होने के कारण उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार और झारखंड के कुछ हिस्सों में धान की बुवाई पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। सबसे बड़े चावल उत्पादक पश्चिम बंगाल में 23 में से 15 जिलों में कम बारिश हुई है, जिससे फसल के नुकसान की संभावना बढ़ गई है। लेकिन, इसके साथ ही अब धान में विभिन्न तरह के कीटों के कारण रोगों की भी आशंका बन रही है। पंजाब में पहले से ही एक रहस्यमयी वायरस के कारण धान के पौधे बौने होते जा रहे हैं, साथ ही तना छेदक कीट का प्रकोप भी झेलना पड़ सकता है। ऐसे में, कृषि वैज्ञानिकों की राय अहम् हो जाती है। यह भी पढ़ें : अकेले कीटों पर ध्यान देने से नहीं बनेगी बात, साथ में करना होगा ये काम: एग्री एडवाइजरी

ब्राउन प्लांट होपर से बचाव

पूसा के एग्रीकल्चरल साइंटिस्ट्स ने अपनी सलाह में कहा है कि इस साल ब्राउन प्लांट होपर (पौधे का कत्थई फुदका - Brown Plant Hopper) जैसे कीट का आक्रमण देखने को मिल सकता है। इससे बचाव के लिए किसानों को खेत में जा कर मच्छारानुमा कीट को देखने की जरूरत है। यदि वे इसे वहाँ पाते हैं, तो किसानों को उस क्षेत्र में डाईनेटोफुरान ( Dinotefuran ) नाम की दवा का इस्तेमाल करना होगा और प्रति एकड़ 200 लीटर पानी में इसका 100 ग्राम ले कर छिड़काव करना चाहिए, ताकि ब्राउन प्लांट होपर को ख़त्म किया जा सके।

बासमती की सुरक्षा

धान का आभासी कांगियारी या कंडुवा रोग यानी राइस फाल्स स्मट डिजीज (False smut of rice (Villosiclava virens) disease), जो फंगस यूस्टिलागिनोइडिया विरेन्स  के कारण होता है, वर्तमान में दुनिया में सबसे विनाशकारी चावल कवक रोगों में से एक है। राइस फाल्स स्मट रोग न केवल गंभीर उपज हानि और अनाज की गुणवत्ता में कमी का कारण बनता है, बल्कि इसके माइकोटॉक्सिन के उत्पादन के कारण खाद्य सुरक्षा को भी खतरा है। इस रोग के कई लक्षण हैं, जैसे धान की गांठों पर छोटे नारंगी दाने दिखाई देने लगते हैं, प्रभावित दानों में पीली हल्दी या काला पाउडर दिखाई देता है। दानों को छूने पर यह चूर्ण हाथ में लग जाता है। इस रोग से प्रभावित होने पर दानों का रंग फीका पड़ जाता है और उनका वजन कम हो जाता है। इस रोग के लक्षण फूल आने की अवस्था में प्रकट होते हैं, इसका समाधान यही है कि रोग ग्रस्त बीजों का प्रयोग न करें। यह भी पढ़ें : धान की खड़ी फसलों में न करें दवा का छिड़काव, ऊपरी पत्तियां पीली हो तो करें जिंक सल्फेट का स्प्रे बीज हमेशा प्रमाणित स्रोतों से ही खरीदें, फिर रोग प्रतिरोधी किस्मों का चुनाव करें। खेतों, खेत के बांधों और सिंचाई नालियों को खरपतवारों से मुक्त रखें। इस बीमारी से बचने के लिए बुवाई से पहले बीज को 52 डिग्री सेंटीग्रेड पर 10 मिनट तक उपचारित करें इसके अलावा फफूंदनाशक दवाओं से भी बीजों का उपचार किया जा सकता है। रोकथाम के लिए पिकोक्सीस्ट्रोबिन 7.05% एससी, प्रोपिकोनाजोल 11.7% एससी जो बाजार में गैलीलियो (ड्यूपॉन्ट) के रूप में उपलब्ध है, इसको 360 मिली 200 लीटर पानी में 10 दिनों के अंतराल पर फूल आने की अवस्था में दो बार स्प्रे करें। दवाओं का छिड़काव सुबह या शाम को ही सूर्योदय से पहले करें।

तना छेदक से कैसे बचाएं धान

तना छेदक यानी स्टेम बोरर (stem borer) की छह प्रजातियां चावल पर हमला करती हैं। तना छेदक धान को अंकुर से लेकर परिपक्वता तक किसी भी अवस्था में नष्ट कर सकते हैं। तना छेदक लार्वा पौधों के तना और जड़ पर छेद करते हैं। तनों और टिलर पर छोटे छेद हो तो इसका अर्थ है की आपकी फसल पर इसका आक्रमण हो चुका है, इसके लिए आपको धान की प्रतिरोधी किस्मों का प्रयोग करना चाहिए। यह भी पढ़ें : धान की उन्नत किस्में अपनाकर छत्तीसगढ़ के किसान हो रहे मजबूत सीड बेड और ट्रांसप्लांट के समय इसके अंडे को हाथ से तोड़कर नष्ट कर दें। समय-समय पर सिंचाई के पानी का स्तर बढ़ाएं ताकि पौधे के निचले हिस्से में जमा अंडे जलमग्न हो जाएं। रोपाई से पहले, बीज की क्यारी से खेत तक अंडों के ले जाने को कम करने के लिए पत्ती के उपरी हिस्से को काट लें। जैविक नियंत्रण एजेंटों को प्रोत्साहित करें जैसे ब्रोकोनिड, यूलोफिड, मायमैरिड, स्केलिओनिड, चेल्सीड, टेरोमेलिड और ट्राइकोग्रामाटिड ततैया, चींटियाँ, लेडी बीटल, स्टैफिलिनिड बीटल, ग्रिलिड, ग्रीन मीडो टिड्डा,और मिरिड, फोरिड और प्लैटिसोमैटिड मक्खियाँ, बेथिलिड, ब्रोकोनिड और एलास्मिड।