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अरबी की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

अरबी की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

अरबी गर्मी की फसल है, इसका उत्पादन गर्मी और वर्षा ऋतू में किया जाता है। अरबी की तासीर ठंडी रहती है। इसे अलग अलग नामों से जाना जाता है जैसे अरुई , घुइया , कच्चु और घुय्या आदि है।

यह फसल बहुत ही प्राचीन काल से उगाई जा रही है। अरबी का वानस्पातिक नाम कोलोकेसिया एस्कुलेंटा है। अरबी प्रसिद्ध और सबसे परिचित वनस्पति है, इसे हर कोई जानता है। सब्जी के अलावा इसका उपयोग औषिधीय में भी किया जाता है।  

अरबी का पौधा सदाबहार साथ ही शाकाहारी भी है। अरबी का पौधा 3 -4 लम्बा होता है , इसकी पत्तियां भी चौड़ी होती है। अरबी सब्जी का पौधा है, जिसकी जड़ें और पत्तियां दोनों ही खाने योग्य रहती है। 

इसके पत्ते हल्के हरे रंग के होते है, उनका आकर दिल के भाँती दिखाई पड़ता है। 

अरबी की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी

अरबी की खेती के लिए जैविक तत्वों से भरपूर मिट्टी की  जरुरत रहती है। इसीलिए इसके लिए रेतीली और दोमट मिट्टी को बेहतर माना जाता है। 

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इसकी खेती के लिए भूमि का पी एच मान 5 -7 के बीच में होना चाहिए। साथ ही इसकी उपज के लिए बेहतर जल निकासी  वाली भूमि की आवश्यकता पड़ती है। 

अरबी की उन्नत किस्में 

अरबी की कुछ उन्नत किस्में इस प्रकार है, जो किसानों को मुनाफा दिला सकती है। सफ़ेद गौरिया, पंचमुखी, सहस्रमुखी, सी -9, श्री पल्लवी, श्री किरन, श्री रश्मी आदि प्रमुख किस्में है, जिनका उत्पादन कर किसान लाभ उठा सकता है। 

अरबी -1 यह किस्म छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए अनुमोदित की गयी है, इसके अलावा नरेंद्र - 1 भी अरबी की अच्छी किस्म है। 

अरबी की खेती का सही समय 

किसान साल भर में अरबी की फसल से दो बार मुनाफा कमा सकते है। यानी साल में दो बार अरबी की फसल उगाई जा सकती है एक तो रबी सीजन में और दूसरी खरीफ के सीजन में। 

रबी के सीजन में अरबी की फसल को अक्टूबर माह में बोया जाता है और यह फसल अप्रैल से मई माह के बीच में पककर तैयार हो जाती है। 

यही खरीफ के सीजन में अरबी की फसल को जुलाई माह में बोया जाता है, जो दिसंबर और जनवरी माह में तैयार हो जाती है। 

उपयुक्त वातावरण और तापमान 

जैसा की आपको बताया गया अरबी गर्मी की फसल है। अरबी की फसल को सर्दी और गर्मी दोनों में उगाया जा सकता है। लेकिन अरबी की फसल के पैदावार के लिए गर्मी और बारिश के मौसम को बेहतर माना जाता है। 

इन्ही मौसम में अरबी की फसल अच्छे से विकास करती है। लेकिन गर्मी में पड़ने वाला अधिक तापमान भी फसल को नष्ट कर सकता है साथ ही सर्दियों के मौसम में पड़ने वाला पाला भी अरबी की फसल के विकास को रोक सकता है। 

अरबी की खेती के लिए कैसे करें खेत को तैयार ?

अरबी की खेती के लिए अच्छे जलनिकास वाली और दोमट मिट्टी की आवश्यकता रहती है। खेत में जुताई करने के 15 -20 दिन पहले खेत में 200 -250 क्विंटल खाद को डाल दे।

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उसके बाद खेत में 3 -4 बार जुताई करें , ताकि खाद अच्छे से खेत में मिल जाए। अरबी की बुवाई का काम किसानों द्वारा दो तरीको से किया जाता है।  पहला मेढ़ बनाकर और दूसरा क्वारियाँ बनाकर। 

खेत को तैयार करने के बाद किसानों द्वारा खेत में 45 से.मी की दूरी पर मेढ़ बना दी जाती है।  वही क्यारियों में बुवाई करने के लिए पहले खेत को पाटा लगाकर समतल बनाया जाता है। 

उसके बाद 0.5 से.मी की गहरायी पर इसके कंद की बुवाई कर दी जाती है। 

बीज की मात्रा 

अरबी की बुवाई कंद से की जाती है , इसीलिए प्रति हेक्टेयर में कंद की 8 -9 किलोग्राम मात्रा की जरुरत पड़ती है। अरबी की बुवाई से पहले कंद को पहले मैंकोजेब 75 % डब्ल्यू पी 1 ग्राम को पानी में मिलाकर 10 मिनट तक रख कर बीज उपचार करना चाहिए। 

बुवाई के वक्त क्यारियों के बीच की दूरी 45 से.मी और पौधो की दूरी 30 से.मी और कंद की बुवाई 0.5 से.मी की गहराई में की जाती है।  

अरबी की खेती के लिए उपयुक्त खाद एवं उर्वरक 

अरबी की खेती करते वक्त ज्यादातर किसान गोबर खाद का प्रयोग करते है ,जो की फसल की उत्पादकता के लिए बेहद फायदेमंद रहता है।  लेकिन किसानों द्वारा अरबी की फसल के विकास लिए उर्वरको का उपयोग किया जाता है। 

किसान रासायनिक उर्वरक फॉस्फोरस 50 किलोग्राम , नत्रजन 90 -100 किलोग्राम और पोटाश 100 किलोग्राम का उपयोग करें, इसकी आधी मात्रा को खेत की बुवाई करते वक्त और आधी मात्रा को बुवाई के एक माह बाद डाले। 

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ऐसा करने से फसल में वृद्धि होगी और उत्पादन भी ज्यादा होगा। 

अरबी की फसल में सिंचाई 

अरबी की फसल यदि गर्मी के मौसम बोई गयी है ,तो उसे ज्यादा पानी आवश्यकता पड़ेगी। गर्मी के मौसम में अरबी की फसल को लगातार 7 -8  दिन लगातार पानी देनी की जरुरत रहती है। 

यदि यही अरबी की फसल बारिश के मौसम में की गयी है ,तो उसे कम पानी की जरुरत पड़ती है। अधिक सिंचाई करने पर फसल के खराब होने की भी संभावनाएं रहती है। 

सर्दियों के मौसम में भी अरबी को कम पानी की जरुरत पड़ती है। इसकी हल्की  सिंचाई  15 -20 के अंतराल पर की जाती है।  

अरबी की फसल की खुदाई 

अरबी की फसल की खुदाई उसकी किस्मों के अनुसार होती है , वैसे अरबी की फसल लगभग 130 -140  दिन में पककर तैयार हो जाती है। जब अरबी की फसल अच्छे से पक जाए उसकी तभी खुदाई करनी चाहिए।

अरबी की बहुत सी किस्में है जो अच्छी उपज होने पर प्रति हेक्टेयर में 150 -180 क्विंटल की पैदावार देती है।  बाजार में अरबी की कीमत अच्छी खासी रहती है। 

अरबी की खेती कर किसान प्रति एकड़ में 1.5 से 2 लाख रुपए की कमाई कर सकता है। 

अरबी की खेती कर किसान अच्छा मुनाफा कमा सकती है।  साथ ही कीट और रोगों से दूर रखने के लिए किसान रासायनिक उर्वरको का भी उपयोग कर सकते है।

साथ ही फसल में खरपतवार जैसी समस्याओ को भी नियंत्रित करने के लिए समय समय पर गुड़ाई और नराई का भी काम करना चाहिए। 

इससे फसल अच्छी और ज्यादा होती है, ज्यादा उत्पादन के लिए किसान फसल चक्र को भी अपना सकता है। 

सरसों की फसल में सफेद रतवे का प्रबंधन

सरसों की फसल में सफेद रतवे का प्रबंधन

सरसों की फसल कई रोगों से प्रभावित होती है। जिससे की किसानो को कम पैदावार प्राप्त होती है। सफेद रतवे (White Rust) रोग से फसल को अधिक नुकसान होता है। आज इस लेख में हम आपको सफेद रतवे (White Rust) की रोकथाम के बारे में जानकारी देंगे जिससे की आप समय से फसल में इस बीमारी का नियंत्रण कर सके। 

सरसों की फसल में सफेद रतवे (White Rust) से बचाव के लिए कुछ महत्वपूर्ण निर्देश निम्नलिखित हैं:

सही बीज बुवाई :

 सबसे पहले आपको ध्यान देना है कि फसल की बुवाई के लिए स्वस्थ बीजों का चयन करें जो रोगों से मुक्त हों। स्वस्थ बीजों का चयन करने से फसल में ये रोग नहीं आएगा।   

फसल की समय पर बोना:

 समय पर सरसों की बुवाई की जानी चाहिए ताकि फसल में बीमारी का प्रसार कम हो। देरी से बुवाई की गयी फसल में अधिक रोग का खतरा होता है। कई बार रोग अधिक लग जाता है जिससे आधी पैदावार कम हो जाती है। 

समुचित जल सिंचाई:

जल सिंचाई को समुचित रूप से प्रबंधित करें ताकि पौधों पर पानी जमा नहीं हो, जिससे सफेद रतवे का प्रसार कम हो। फसल में अधिक नमी होने के कारण भी रोग अधिक लगता है। 

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उचित फफूंदनाशकों का प्रयोग:

सरसों की सफेद रतवे के खिलाफ उचित फफूंदनाशकों का प्रयोग करें। कृषि विज्ञानी से सलाह लें और सुरक्षित रोगनाशकों का चयन करें। सफेद रतवा के नियंत्रण के लिए खड़ी फसल में मैंकोजेब(एम 45) फफुंदनाशक 400 से 500ग्राम को 200/250 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ के हिसाब से 15 दिन के अंतर पर कम से कम 2 छिड़काव अवश्य करें जिससे सफेद रतवा का नियंत्रण संभव हो सकता है।

फसल की देखभाल:

 फसल की देखभाल के लिए समय समय पर पौधों की सुरक्षा और मूल से देखभाल करें।

प्रभावित पौधों का हटाएं:

यदि किसी पौधे पर सफेद रतवे के प्रमुख संकेत हैं, तो उन्हें तुरंत उखाड़ कर मिट्टी में दबा दें ताकि बीमारी और फैलने से बचा जा सके।उचित तकनीकी तरीके का प्रयोग करें, जैसे कि स्थानीय परिस्थितियों, जलवायु और मौसम की विशेषताओं के आधार पर सिंचाई और पोषण का प्रबंधन करें।इन उपायों का अनुसरण करके, सरसों की फसल में सफेद रतवे से बचाव किया जा सकता है। ध्यान रहे कि स्थानीय कृषि विभाग या कृषि विज्ञानी से सलाह लेना हमेशा उत्तम होता है ताकि आपको विशेष रूप से अपने क्षेत्र के लिए सबसे उपयुक्त नियंत्रण उपायों की जानकारी मिले।

जौ की खेती से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी

जौ की खेती से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि जौ कई उत्पाद निर्मित करने में काम आता है, जैसे दाने, पशु आहार, चारा और अनेक औद्यौगिक उपयोग (शराब, बेकरी, पेपर, फाइबर पेपर, फाइबर बोर्ड जैसे उत्पाद) बनाने के काम आता है। जौ रबी मौसम में बोई जाने वाली प्रमुख फसलों में से एक है, विगत कुछ वर्षों में बाजार में जौ की मांग बढ़ने से किसानों को इसकी खेती से मुनाफा भी हो रहा है। भारत में बिहार, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश और जम्मू व कश्मीर में जौ की खेती की जाती है। भारत में आठ लाख हेक्टेयर भूमि में प्रति वर्ष तकरीबन 16 लाख टन जौ का उत्पादन होता है।

जौ का इस्तेमाल कई प्रकार के उत्पादों को बनाने में किया जाता है

जैसा कि हम सब जानते हैं, कि जौ कई उत्पादों में काम आता है। जैसे कि दाने,
पशु आहार, चारा और अनेक औद्यौगिक उपयोग (शराब, बेकरी, पेपर, फाइबर पेपर, फाइबर बोर्ड जैसे उत्पाद) निर्माण के काम आता है। जौ की खेती ज्यादातर कम उर्वरा शक्ति वाली भूमियों में क्षारीय एवं लवणीय भूमियों में और पछेती बुवाई की परिस्थितियों में की जाती है। परंतु, उन्नत विधियों द्वारा जौ की खेती करने से औसत उत्पादन ज्यादा प्राप्त किया जा सकता है। ज्यादा पैदावार पाने के लिए अपने क्षेत्र के हिसाब से विकसित किस्मों का चुनाव करें। जौ की प्रजातियों में उत्तरी मैदानी क्षेत्रों के लिए ज्योति, आजाद, के-15, हरीतिमा, प्रीति, जागृति, लखन, मंजुला, नरेंद्र जौ-1,2 और 3, के-603, एनडीबी-1173 जौ की प्रमुख प्रजातियां हैं। यह भी पढ़ें: खरीफ सीजन क्या होता है, इसकी प्रमुख फसलें कौन-कौन सी होती हैं

जौ की बुवाई का उपयुक्त समय

जौ के लिए वक्त पर बुवाई करने से 100 किग्रा. बीज प्रति हैक्टेयर की आवश्यकता होती है। अगर बुवाई विलंभ से की गई है तो बीज की मात्रा में 25 प्रतिशत का इजाफा कर देना चाहिये। जौ की बुवाई का वक्त नवम्बर के पहले सप्ताह से आखिरी सप्ताह तक होता है। लेकिन, विलंभ होने पर बुवाई मध्य दिसम्बर तक की जा सकती है। बुवाई पलेवा करके ही करनी चाहिये और पंक्ति से पंक्ति का फासला 22.5 सेमी. और देरी से बुवाई की स्थिति में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 25 सेमी. रखनी चाहिये।

बीजोपचार और बेहतरीन गुणवत्ता वाले बीज की पैदावार में भूमिका

बीजोपचार ज्यादा पैदावार प्राप्त करने के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले बीज की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। बहुत से कीट एवं बीमारियों के प्रकोप को रोकने के लिए बीज का उपचारित होना बेहद जरूरी है। कंडुआ व स्मट रोग पर लगाम लगाने के लिए बीज को वीटावैक्स या मैन्कोजैब 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिये। दीमक पर नियंत्रण के लिए 100 किग्रा. बीज को क्लोरोपाइरीफोस (20 ईसी) की 150 मिलीलीटर या फोरमेंथियोन (25 ईसी) की 250 मिलीलीटर द्वारा बीज को उपचारित करके बिजाई करनी चाहिये। भूमि और उसकी तैयारी जौ की खेती अनेक प्रकार की भूमियों जैसे बलुई, बलुई दोमट या दोमट जमीन में की जा सकती है। परंतु, दोमट भूमि जौ की खेती के लिए सबसे अच्छी होती है। क्षारीय व लवणीय भूमियों में सहनशील किस्मों की बुवाई करनी चाहिये। खेत में जल निकासी की बेहतर व्यवस्था होनी चाहिये। यह भी पढ़ें: जौ की खेती में फायदा ही फायदा

जौ की खेती हेतु भूमि व उसकी तैयारी

जौ की अत्यधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए भूमि को बेहतर ढ़ंग से तैयार करना चाहिये। खेत में खरपतवार नहीं रहना चाहिये और अच्छी प्रकार से जुताई करके मृदा भुरभुरी बना देनी चाहिये। खेत में पाटा लगाकर खेत समतल एवं ढेलों रहित कर देनी चाहिये। खरीफ फसल की कटाई के उपरांत डिस्क हैरो से जुताई करनी चाहिये। इसके उपरांत दो क्रोस जुताई हैरो से करके पाटा लगा देना चाहिये। आखिरी जुताई से पूर्व खेत में 25 किलो. एन्डोसल्फॅान (4 प्रतिशत) या क्यूनालफॉस (1.5 प्रतिशत) या मिथाइल पैराथियोन (2 प्रतिशत) चूर्ण को समान रूप से छिड़कना चाहिये। सिंचाई जौ की बेहतरीन पैदावार प्राप्त करने के लिए चार-पांच सिंचाई पर्याप्त होती है। पहली सिंचाई बुवाई के 25-30 दिन पश्चात करनी चाहिये। इस वक्त पौधों की जड़ों की उन्नति होती है। दूसरी सिंचाई 40-45 दिन उपरांत देने से बालियां अच्छी लगती हैं। इसके उपरांत तीसरी सिंचाई फूल आने पर और चौथी सिंचाई दाना दूधिया अवस्था में आने की स्थिति पर करनी चाहिये।
जौ की फसल का शानदार उत्पादन पाने के लिए इन बातों की जानकारी बेहद आवश्यक

जौ की फसल का शानदार उत्पादन पाने के लिए इन बातों की जानकारी बेहद आवश्यक

जौ की खेती रेतीली से लगाकर मध्यम दोमट मृदा तक में की जा सकती है। परन्तु, इसकी शानदार उपज प्राप्त करने के लिए समुचित जल निकासी एवं अच्छी उर्वरकता वाली दोमट मृदा उपयुक्त मानी जाती है। जौ की खेती बाकी तरह की भूमि जैसे-लवणीय, क्षारीय अथवा हल्की मृदा में भी की जा सकती है।

बुआई का समय

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि इसकी बिजाई के लिए जो बीज इस्तेमाल में लाया जाए, वह रोगमुक्त, प्रमाणित क्षेत्र के अनुसार उन्नत किस्म का होना चाहिए। बीजों में किसी अन्य किस्म के बीज उपलब्ध नहीं होने चाहिए। बोने से पूर्व बीज के अंकुरण का परीक्षण अवश्य कर लेना चाहिए। जौ रबी मौसम की फसल है, जिसे सर्दी के मौसम में उत्पादित किया जाता है। सामान्य तौर पर इसकी बिजाई अक्टूबर से लेकर दिसंबर तक की जाती है।

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सिंचाई 

असिंचित क्षेत्राें में 20 अक्टूबर से 10 नवंबर तक जौ की बिजाई करनी चाहिए। वहीं, सिंचित क्षेत्राें में 25 नवंबर तक बिजाई कर देनी चाहिए। पछेती जौ की बिजाई 15 दिसंबर तक कर देनी चाहिए।

बीज एवं बीजाेपचार

जौ के लिए 80-100 कि.ग्रा. बीज प्रति हैक्टयर बिजाई के लिए उपयुक्त है। जौ की बिजाई हल के पीछे कूंड़ों में अथवा सीडड्रिल से 20-25 सें.मी. पंक्ति से पंक्ति की दूरी पर 5-6 सें.मी. गहराई पर करें। असिंचित दशा में 6-8 सें.मी. गहराई में बिजाई करें। बीज से उत्पन्न होने वाले रोगों पर नियंत्रण के लिए बीज उपचार जरूरी है। खुली कंगियारी से संरक्षण के लिए 2 ग्राम बाविस्टन अथवा वीटावैक्स से प्रति कि.ग्रा. बीज उपचारित करें। बंद कंगियारी पर काबू करने हेतु थीरम तथा बाविस्टीन/ वीटावैक्स को 1:1 के अनुपात में मिलाकर 2.5 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज के लिए उपयोग करें।

असिंचित एवं सिंचित क्षेत्राें के लिए प्रजातियां 

जौ की छिलका वाली उन्नत प्रजातियां जैसे कि - अंबर, ज्योति, आजाद, के 141, आरडी 2035, आर.डी. 2052, आरडी 2503, आरडी 2508, आरडी 2552, आरडी 2559, आरडी 2624, आरडी 2660, आर.डी. 2668, आरडी 2660, हरितमा, प्रीती, जागृति, लखन, मंजुला, आरएस 6, नरेंद्र जाै1, नरेंद्र जाै 2, नरेंद्र जाै 3, के 603, एनडीबी 1173, एसओ 12 हैं। बिना छिलके वाली उन्नत प्रजातियां गीतांजलि (के-1149), डीलमा, नरेंद्र जौ 4 (एनडीबी 943)

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ऊसरीली भूमि के लिए कुछ बेहतर किस्में  

आजाद, के-141, जे.बी. 58, आर.डी. 2715, आर.डी. 2786, पी.एल. 751, एच.बीएल. 316, एच.बी.एल. 276, बी.एलबी. 85, बी.एल.बी. 56 लवणीय एवं क्षारीय भूमि के लिए एन.डी.बी. 1173, आर.डी. 2552, आर.डी 2794, नरेन्द्र जौ-1, नरेन्द्र जौ-3 हैं।

माल्ट बीयर के लिए उन्नत शानदार किस्में 

प्रगति, तंभरा, डीएल 88 (6 धारीय), आरडी 2715, डीडब्ल्यूआर 28 रेखा (2 धारीय) एवं डी.डब्ब्लूू आर. 28 तथा अन्य प्रजातियां जैसे-डी.डब्ल्यूआर.बी.91, डी.डब्ल्यू.आर.यू.बी. 52, बी.एच. 393, पी.एल. 419, पी.एल. 426, के. 560, के.-409, एन..आरजौ-5 आदि हैं। 

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जौ की फसल में उर्वरकाें का उपयोग इस प्रकार करें  

उर्वरकों का इस्तेमाल मृदा परीक्षण के आधार पर ही करना बेहतर रहता है। असिंचित दशा के लिए एक हैक्टेयर में 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 20 कि.ग्रा. फॉस्फोरस और 20 कि.ग्रा. पोटाश का इस्तेमाल करें। सिंचित तथा समय से बुआई के लिए प्रति हैक्टर 60 कि.ग्रा. नाइट्राेजन, 30 कि.ग्रा. फास्फाेरस तथा 20 कि.ग्रा. पोटाश और माल्ट प्रजातियाें के लिए 80 कि.ग्रा. नाइट्राेजन, 40 कि.ग्रा. फॉस्फोरस और 20 कि.ग्रा पोटाश इस्तेमाल करें। ऊसर और विलंब से बिजाई की दशा में नाइट्रोजन 30 कि.ग्रा., फॉस्फेट 20 कि.ग्रा. और जिंक सल्फेट 20-25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर उपयोग करें।
किसान इस रबी सीजन में मटर की इन उन्नत किस्मों से बेहतरीन उत्पादन उठा सकते हैं

किसान इस रबी सीजन में मटर की इन उन्नत किस्मों से बेहतरीन उत्पादन उठा सकते हैं

किसानों के द्वारा रबी के सीजन में मटर की बिजाई अक्टूबर माह से की जाने लगती है। आज हम आपको इसकी कुछ प्रमुख उन्नत किस्मों के विषय में जानकारी देने जा रहे हैं। किसान कम समयावधि में तैयार होने वाली मटर की किस्मों की बुवाई सितंबर माह के अंतिम सप्ताह से लेकर अक्टूबर के बीच तक कर सकते हैं। इसकी खेती से किसान अपनी आमदनी को दोगुना तक कर सकते हैं। बतादें, कि इसमें काशी नंदिनी, काशी मुक्ति, काशी उदय और काशी अगेती प्रमुख फसलें हैं। इनकी विशेष बात है, कि यह 50 से 60 दिन के दौरान पककर तैयार हो जाती हैं। इससे खेत शीघ्रता से खाली हो जाता है। इसके पश्चात किसान सुगमता से दूसरी फसलों की बिजाई कर सकते हैं। किसान भाई कम समयावधि में तैयार होने वाली मटर की प्रजातियों की बुवाई सितंबर के अंतिम सप्ताह से लेकर अक्टूबर के बीच तक कर दी जाती है।

मटर की उन्नत किस्म

मटर की उन्नत किस्म काशी नंदिनी

इस किस्म को साल 2005 में विकसित किया गया था। इसकी खेती जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल और पंजाब में की जाती है। इससे प्रति हेक्टेयर औसतन 110 से 120 क्विंटल तक पैदावार हांसिल की जा सकती है।

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मटर की उन्नत किस्म काशी मुक्ति

यह किस्म मुख्य तौर पर झारखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब और बिहार के लिए अनुकूल मानी जाती है। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि इससे प्रति हेक्टेयर 115 क्विंटल तक उत्पादन हांसिल हो सकता है। इसकी फलियां और दाने काफी बड़े होते हैं। मुख्य बात यह है, कि इसकी विदेशों में भी काफी मांग रहती है।

मटर की उन्नत किस्म काशी अगेती

यह किस्म 50 दिन की समयावधि में पककर तैयार हो जाती है। बतादें, कि इसकी फलियां सीधी और गहरी होती हैं। इसके पौधों की लंबाई 58 से 61 सेंटीमीटर तक होती है। इसके 1 पौधे में 9 से 10 फलियां लग सकती हैं। इससे प्रति हेक्टेयर 95 से 100 क्विंटल तक का पैदावार प्राप्त हो सकता है।

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मटर की उन्नत किस्म काशी उदय

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि इस प्रजाति को साल 2005 में तैयार किया गया था। इसकी खासियत यह है, कि इसकी फली की लंबाई 9 से 10 सेंटीमीटर तक होती है। इसकी खेती प्रमुख रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में की जाती है। इससे प्रति हेक्टेयर 105 क्विंटल तक की पैदावार मिल सकती है। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि इसकी खेती से किसान अपनी आमदनी को दोगुना तक कर सकते हैं। इसमें काशी मुक्ति, काशी उदय, काशी अगेती और काशी नंदिनी प्रमुख हैं। इनकी विशेष बात है, कि यह 50 से 60 दिन के अंदर तैयार हो जाती हैं। इससे खेत जल्दी खाली हो जाता है। इसके उपरांत किसान आसानी से दूसरी फसलों की बुवाई कर सकते हैं।
सरकार ने इस रबी सीजन के लिए 11.4 करोड़ टन का लक्ष्य निर्धारित किया है

सरकार ने इस रबी सीजन के लिए 11.4 करोड़ टन का लक्ष्य निर्धारित किया है

तूफान, ओलावृष्टि एवं अल नीनो जैसी खतरनाक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने जलवायु-प्रतिरोधी (गर्मी झेल सकने वाली) DBW 327 करण शिवानी, एचडी-3385 जैसी किस्मों की खेती करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस रबी सीजन में 11.4 करोड़ टन की रिकॉर्ड गेहूं पैदावार का लक्ष्य तय किया गया है। फसलों की पैदावार मिट्टी, मौसम, सिंचाई एवं बेहतरीन किस्म के बीजों पर आश्रित होती है। 

साथ ही, कभी-कभी मौसम की विषम परिस्थितियों की वजह से किसान की फसल की लागत तक भी नहीं निकल पाती है। किसान आर्थिक हालातों से खुद भी गुजरता है। साथ ही, उसका परिवार भी इन चुनौतियों का सामना करता है। ऐसी स्थिति में सरकार ने विषम परिस्थितियों को ध्यान में रख के एक लक्ष्य तय किया है। इस लक्ष्य के अंतर्गत गेहूं की बुवाई (Wheat Sowing) के समकुल क्षेत्रफल के 60 फीसद हिस्से में जलवायु-प्रतिरोधी DBW 327 करण शिवानी, एचडी-3385 एम.पी-3288, राज 4079, DBW-110, एच.डी.-2864, एच.डी.-2932 किस्मों की खेती का लक्ष्य तय किया गया है।

गेहूं की पैदावार का लक्ष्य निर्धारित किया गया है

केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने जलवायु परिवर्तन की समस्याओं को देखते हुए रबी सीजन में 11.4 करोड़ टन गेहूं उत्पादन का लक्ष्य तय किया है। वहीं, विगत वर्ष भी सरकार ने समान अवधि में गेहूं का उत्पादन 11.27 करोड़ टन का लक्ष्य रखा था।

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केंद्रीय कृषि सचिव मनोज आहूजा ने रणनीति तैयार की है

केंद्रीय कृषि सचिव मनोज आहूजा ने रबी फसलों की बुवाई की रणनीति पर चर्चा की है, जिसमें उन्होंने कहा है, कि जलवायु पारिस्थितिकी में आए दिन कुछ न कुछ परिवर्तन हो रहे हैं। इस वजह से फसलों में भी प्रभाव देखने को मिल रहा है, तो ऐसी स्थिति में रणनीति के मुताबिक जलवायु-प्रतिरोधी बीजों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। 

गर्मी-प्रतिरोधी वाली किस्मों के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है

भारत में 800 से ज्यादा जलवायु-प्रतिरोधी किस्में मौजूद हैं। इन बीजों को ‘सीड रोलिंग’ योजना के अंतर्गत सीड चेन में डालने की आवश्यकता है। किसानों को गर्मी-प्रतिरोधी किस्में उगाने के लिए प्रेरित करना चाहिए। इसके अतिरिक्त समस्त राज्यों में विशिष्ट इलाकों को चिह्नित करके उत्पादित की जाने वाली अच्छी किस्मों को लेकर नक्शा तैयार करना चाहिए। किस्मों को बेहतर सोच समझ से चयन करना उत्पादन के लिए बेहद महत्वपूर्ण कारक है। किसानों को हमेशा अच्छी और जलवायु प्रतिरोधी किस्मों का चयन करना चाहिए।

दिवाली से पूर्व केंद्र सरकार गेहूं सहित 23 फसलों की एमएसपी में इजाफा कर सकती है

दिवाली से पूर्व केंद्र सरकार गेहूं सहित 23 फसलों की एमएसपी में इजाफा कर सकती है

लोकसभा चुनाव से पूर्व ही केंद्र सरकार किसानों को काफी बड़ा तोहफा दे सकती है। ऐसा कहा जा रहा है, कि सरकार शीघ्र ही गेहूं समेत विभिन्न कई फसलों की एमएसपी बढ़ाने की स्वीकृति दे सकती है। वह गेहूं की एसएमसपी में 10 प्रतिशत तक भी इजाफा कर सकती है। लोकसभा चुनाव से पूर्व केंद्र सरकार द्वारा किसानों को बहुत बड़ा गिफ्ट दिए जाने की संभावना है। ऐसा कहा जा रहा है, कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार रबी फसलों के मिनिमम सपोर्ट प्राइस में वृद्धि कर सकती है। इससे देश के करोड़ों किसानों को काफी फायदा होगा। सूत्रों के अनुसार, केंद्र सरकार गेहूं की एमएसपी में 150 से 175 रुपये प्रति क्विंटल की दर से इजाफा कर सकती है। इससे विशेष रूप से राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, बिहार और पंजाब के किसान सबसे ज्यादा लाभांवित होंगे। इन्हीं सब राज्यों में सबसे ज्यादा गेहूं की खेती होती है।

केंद्र सरकार गेंहू की अगले साल एमएसपी में 3 से 10 प्रतिशत वृद्धि करेगी

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार आगामी वर्ष के लिए गेहूं की एमएसपी में 3 प्रतिशत से 10 प्रतिशत के मध्य इजाफा कर सकती है। अगर केंद्र सरकार ऐसा करती है, तो गेहूं का मिनिमम सपोर्ट प्राइस 2300 रुपए प्रति क्विंटल तक पहुंच सकता है। हालांकि, वर्तमान में गेहूं की एमएसपी 2125 रुपए प्रति क्विंटल है। इसके अतिरिक्त सरकार मसूर दाल की एमएसपी में भी 10 प्रतिशत तक का इजाफा कर सकती है।

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यह निर्णय मार्केटिंग सीजन 2024- 25 के लिए लिया जाएगा

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि सरसों और सूरजमुखी (Sunflower) की एमएसपी में 5 से 7 प्रतिशत की बढ़ोतरी की जा सकती है। दरअसल, ऐसी आशा है कि आने वाले एक हफ्ते में केंद्र सरकार रबी, दलहन एवं तिलहन फसलों की एमएसपी बढ़ाने के लिए स्वीकृति दे सकती है। मुख्य बात यह है, कि एमएसपी में वृद्धि करने का निर्णय मार्केटिंग सीजन 2024-25 के लिए लिया जाएगा।

एमएसपी में समकुल 23 फसलों को शम्मिलित किया गया है

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की सिफारिश पर केंद्र मिनिमम सपोर्ट प्राइस निर्धारित करती है। एमएसपी में 23 फसलों को शम्मिलित किया गया है। 7 अनाज, 5 दलहन, 7 तिलहन और चार नकदी फसलें भी शम्मिलित हैं। आम तौर पर रबी फसल की बुवाई अक्टूबर से दिसंबर महीने के मध्य की जाती है। साथ ही, फरवरी से मार्च एवं अप्रैल महीने के मध्य इसकी कटाई की जाती है।

जानें एमएसपी में कितनी फसलें शामिल हैं

  • अनाज- गेहूं, धान, बाजरा, मक्का, ज्वार, रागी और जो
  • दलहन- चना, मूंग, मसूर, अरहर, उड़द,
  • तिलहन- सरसों, सोयाबीन, सीसम, कुसुम, मूंगफली, सूरजमुखी, निगर्सिड
  • नकदी- गन्ना, कपास, खोपरा और कच्चा जूट
मार्च माह में बागवानी फसलों में किये जाने वाले आवश्यक कार्य

मार्च माह में बागवानी फसलों में किये जाने वाले आवश्यक कार्य

किसानों द्वारा बीज वाली सब्जियों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। किसानों द्वारा सब्जियों में चेपा की निगरानी करते रहना चाहिए। यदि चेपा से फसल ग्रसित है तो इसको नियंत्रित करने के लिए 25 मिली इमेडाक्लोप्रिड को प्रति लीटर पानी में मिलाकर, आसमान साफ़ होने पर छिड़काव करें। पके फलों की तुड़ाई छिड़काव के तुरंत बाद न करें। पके फलों की तुड़ाई कम से कम 1 सप्ताह बाद करें। 

1. कद्दूवर्गीय सब्जियों की बुवाई भी इस माह में की जाती है। कद्दूवर्गीय सब्जियाँ जैसे खीरा, लौकी, करेला, तोरी, चप्पन कद्दू, पेठा, तरबूज और खरबूजा है। इन सभी सब्जियों की भी अलग अलग किस्में है। 

  • खीरा - जापानीज लोंग ग्रीन, पूसा उदय,पोइंसेटऔर पूसा संयोग। 
  • लौकी - पूसा सन्देश, पूसा हाइब्रिड, पूसा नवीन, पूसा समृद्धि, पूसा संतुष्टी और पीएसपीएल।
  • करेला - पूसा दो मौसमी ,पूसा विशेष पूसा हाइब्रिड। 
  • चिकनी तोरी - पूसा स्नेहा, पूसा सुप्रिया। 
  • चप्पन कद्दू - ऑस्ट्रेलियन ग्रीन, पैटी पेन, पूसा अलंकार। 
  • खरबूजा - हरा मधु,पंजाब सुनहरी,दुर्गापुरा मधु,लखनऊ सफेदा और पंजाब संकर। 

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2. भिन्डी और लोबिया की बुवाई भी इसी समय की जाती है। भिन्डी की अगेती बुवाई के लिए ए-4 और परभनी क्रांति जैसी किस्मों को अपनाया जा सकता है। लोबिया की उन्नत किस्में पूसा कोमल, पूसा सुकोमल और पूसा फागुनी जैसी किस्मों की बुवाई की जा सकती है। दोनों फसलों के बीज उपचार के लिए 2 ग्राम थीरम या केपटान से 1 किलोग्राम बीज को उपचारित करें। 

3. इस वक्त प्याज की फसल में हल्की सिंचाई करे। प्याज की फसल की इस अवस्था में किसी खाद और उर्वरक का उपयोग न करें। उर्वरक देने से केवल प्याज के वानस्पतिक भाग की वृद्धि होगी ना की प्याज की, इसकी गाँठ में कम वृद्धि होती है। थ्रिप्स के आक्रमण की निरंतर निगरानी रखे। थ्रिप्स कीट लगने पर 2 ग्राम कार्बारिल को 4 लीटर पानी में किसी चिपकने पदार्थ जैसे टीपोल की 1 ग्राम मात्रा को मिलाकर छिड़काव करें। लेकिन छिड़काव करते वक्त ध्यान रखे मौसम साफ होना चाहिए। 

4. गर्मियों के मौसम में होने वाली मूली की बुवाई के लिए यह माह अच्छा है। मूली की सीधी बुवाई के लिए तापमान भी अनुकूल है। इस मौसम में बीजों का अंकुरण अच्छा होता है। मूली की बुवाई के लिए बीज किसी प्रमाणित स्रोत से ही प्राप्त करें। 

5. लहसुन की फसल में इस वक्त ब्लोच रोग अथवा कीटों का भी आक्रमण हो सकता है। इससे बचने के लिए 2 ग्राम मेंकोजेब को 1 ग्राम टीपोल आदि के साथ मिलाकर छिड़काव करें। 

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6. इस मौसम में बैगन की फसल में फली छेदक कीट को नियंत्रित करने के लिए किसान इस कीट से ग्रस्त पौधों को एकट्ठा करके जला दे। यदि इस कीट का प्रकोप ज्यादा है तो 1 मिली स्पिनोसेड को 4 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव कर दे। टमाटर की खेती में होने वाले फली छेदक कीटों को नियंत्रित करने के लिए इस उपाय को किया जा सकता है।

उद्यान 

इस माह में आम की खेती में किसी भी प्रकार के कीटनाशी का उपयोग ना करें। लेकिन आम के भुनगे का अत्यधिक प्रकोप होने पर 0.5 % मोनोक्रोटोफॉस के घोल का छिड़काव किया जा सकता है। आम में खर्रा रोग के प्रकोप होने पर 0.5 % डिनोकैप के घोल का छिड़काव किया जा सकता है। 

अंगूर, आड़ू और आलूबुखारा जैसे फलों में नमी की कमी होने पर सिंचाई करें। साथ ही मौसम को ध्यान में रखते हुए गेंदे की तैयार पौध की रोपाई करें। गेंदे की रोपाई करने से पहले खेत में खाद की उचित मात्रा डाले। गेंदे की रोपाई खेत में उचित नमी होने पर ही करें। खरपतवारो को खेत में उगने ना दे। समय समय पर खेत की नराई , गुड़ाई करते रहना चाहिए। 

अप्रैल माह के कृषि सम्बन्धी आवश्यक कार्य

अप्रैल माह के कृषि सम्बन्धी आवश्यक कार्य

अप्रैल माह में ज्यादातर कार्य फसल की कटाई से सम्बंधित होते है। इस माह में किसान रबी फसलों की कटाई कर दूसरी फसलों की बुवाई करते है। इस माह में कृषि से सम्बंधित किये जाने वाले आवश्यक कार्य कुछ इस प्रकार है। 

रबी फसलों की कटाई 

गेहूँ, मटर, चना, जौ और मसूर आदि की फसल की कटाई का कार्य इस माह में ही किया जाता है। इन फसलों की कटाई सही समय पर होना बेहद जरूरी है। यदि फसल की कटाई सही समय पर नहीं होती है, तो फसल की उत्पादकता और गुणवत्ता पर काफी बुरा प्रभाव पड़ेगा। देर से कटाई करने पर फलियाँ और बालियाँ टूटकर गिरने लगती है। इसके अलावा चिड़ियों और चूहों के द्वारा भी इस फसल को नुक्सान पहुँचाया जा  सकता है। 

फसल की कटाई का कार्य किसान स्वयं भी कर सकता है, या फिर मशीनों द्वारा भी इसकी कटाई करवा सकते है। कुछ किसान हँसिया द्वारा फसल की कटाई करवाते है, क्योंकि इसमें भूसे और दाने का बहुत कम नुक्सान होता है। कंबाइन द्वारा फसल की कटाई आसान होती है, और इसमें हँसिया के मुकाबले बहुत ही कम समय लगता है, और धन की भी बचत होती है। 

कंबाइन से कटाई करने के लिए फसल में 20 % नमी होना जरूरी है। यदि फसल की कटाई दरांती आदि से की जा रही है तो फसल को अच्छे से सुखा ले, उसके बाद कटाई प्रारम्भ करें। फसल को लम्बे समय तक खेत में एकट्ठा करके न रखें। फसल को शीघ्र ही थ्रेसर आदि से निकलवा लें। 

हरी खाद के लिए फसलों की बुवाई 

अप्रैल माह में किसानों द्वारा भूमि की उपजाऊ क्षमता को बढ़ाने के लिए हरी खाद वाली फसलों की बुवाई की जाती है। हरी खाद की फसलों में ढेंचा को भी शामिल किया जाता है। ढेंचा की बुवाई का कार्य अप्रैल माह के अंत तक कर देना चाहिए। ढेंचा की खेती से मिट्टी में पोषक तत्वों की उपस्तिथी बनी रहती है। 

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चना और सरसों की कटाई 

अप्रैल के महीने में सरसों, आलू और चना की कटाई हो जाती है। इन सभी फसलों की कटाई के बाद किसान उसमें तुरई, खीरा, टिण्डा, करेला और ककड़ी जैसी सब्जियां भी उगा सकता है। ध्यान रखें बुवाई करते वक्त पौधे से पौधे की दूरी 50 सेंटीमीटर से 100 सेंटीमीटर के बीच में रखें। यदि इन सभी सब्जियों की बुवाई कर दी गई हो, तो सिंचाई का विशेष रूप से ध्यान रखें। फसल के अधिक उत्पादन के लिए हाइड्रोजाइड और ट्राई आयोडो बेन्जोइक एसिड को पानी में मिलाकर छिड़काव करें। 

मूली और अदरक की बुवाई 

रबी फसलों की कटाई के बाद इस माह में मूली और अदरक की बुवाई की जाती है। मूली की आर आर डब्ल्यू और पूसा चेतकी किस्म इस माह में उगाई जा सकती है। अदरक की बुवाई करने से पहले बीज उपचार कर लें।  बीज उपचार के लिए बाविस्टीन नामक दवा का उपयोग करें। 

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टमाटर की फसल में लगने वाला कीट 

टमाटर की बुवाई का कार्य अप्रैल माह से पहले ही कर दिया जाता है। अप्रैल माह में टमाटर की फसल को फल छेदक रोगों से बचाने के लिए मैलाथियान रासायनिक दवा को 1 मिली पानी में मिला कर छिड़काव कर दें। लेकिन छिड़काव करने से पहले पके फलों को तोड़ लें। छिड़काव करने के बाद फलों की 3 - 4 दिनों तक तुड़ाई न करें। 

भिन्डी की फसल 

वैसे तो भिन्डी के पौधो में ग्रीष्मकालीन से ही फल लगने शुरू हो जाते है। नरम और कच्चे फलों को उपयोग के लिए तोड़ लिया जाता है। भिन्डी में लगने वाले फलों को 3-4 दिन के अंतराल पर तोड़ लेना चाहिए। यदि फलो की देरी से तुड़ाई होती है, तो फल कड़वे और कठोर रेशेदार हो जाते है। 

कई बार भिन्डी के पौधे की पत्तियां पीली पड़ने लगती है, और फलों का आकर भी छोटा हो जाता है। भिन्डी की फसल में यह रोग पीला मोजेक विषाणु द्वारा होता है। इस रोग से फसल को बचाने के लिए रोग ग्रस्त पौधो को उखाड़कर फेक दें या फिर रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग कर इस फसल को नष्ट होने से बचाया जा सकता है। 

प्याज और लहसुन की खुदाई 

अप्रैल माह में प्याज और लहसुन की खुदाई शुरू कर दी जाती है। प्याज और लहसुन की खुदाई करने से 15 -20 दिन पहले ही सिंचाई का काम बंद कर देना चाहिए। जब पौधा अच्छे से सूख जाए तभी उसकी खुदाई करें। पौधा सूखा है या नहीं इसकी पहचान किसान पौधे के सिरे को तोड़कर कर सकता है। 

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शिमला मिर्च की देख रेख 

शिमला मिर्च की फसल में 8 -10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए। फसल में खरपतवार को कम करने के लिए  निराई और गुड़ाई का काम भी करते रहना चाहिए। शिमला मिर्च की खेती को कीटों के प्रकोप से बचाने के लिए रोगेर 30 ई सी को पानी में मिलाकर छिड़काव करें। कीट का ज्यादा प्रकोप होने पर 10 -15 दिन के अंतराल पर फिर से छिड़काव कर सकते है। 

बैंगन की फसल 

बैंगन की फसल में निरंतर निगरानी रखे, बैंगन की फसल में तना और फल छेदक कीटों की ज्यादा संभावनाएं रहती है। इसीलिए फसल को कीटों से बचाने के लिए कीटनाशक दवाइयों का उपयोग करें।

कटहल की फसल 

गलन जैसे रोगों की वजह से कटहल की खेती खराब हो सकती है। इसकी रोकथाम के लिए जिंक कार्बामेट के घोल का छिड़काव करें। 

प्याज की इस उम्दा किस्म से किसान बेहतरीन पैदावार अर्जित कर सकते हैं

प्याज की इस उम्दा किस्म से किसान बेहतरीन पैदावार अर्जित कर सकते हैं

अगर कृषक भाई अपने खेत में प्याज की उन्नत किस्म एग्रीफॉन्ड डार्क रेड केसर लगाते हैं, तो उन्हें कई गुणा मुनाफा अर्जित होगा। इस लेख में हम आपको बताऐंगे इस प्रजाति की विशेषता एवं अन्य कई अहम जानकारी। हमारे देश के किसान भाइयों की दिलचस्पी अब आधुनिक फसलों की दिशा में तेजी से बढ़ रही है। कुछ किसान तो अपनी पारंपरिक खेती को त्यागकर अन्य फसलों को अपना रहे हैं। आखिर क्यों न अपनाएं आखिरकार इससे किसानों को पहले की तुलना में कहीं ज्यादा मुनाफा प्राप्त हो रहा है। आज हम इस लेख में ऐसी ही एक फसल के बारे में बात करेंगे, जिसे आप अपने खेत में उगाकर लाभ अर्जित कर सकते हैं। दरअसल, जिस फसल की हम बात कर रहे है। वह प्याज की फसल है। आइए जानते हैं खरीफ प्याज की बेहतरीन किस्मों एवं खेती के बेहतर तरीके।

प्याज को रसोई की शान माना जाता है

जैसा कि सब मानते हैं, कि प्याज एक ऐसी सब्जी है, जो कि रसोई की शान मानी जाती है। यह हर घर में बड़ी सुगमता से मिल जाती है। ऐसा इसलिए क्योंकि इसके बिना खाने का स्वाद ही नहीं आता है। प्याज की खेती भारत के विभिन्न राज्यों में की जाती है, सिर्फ इतना ही नहीं भारत से पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल आदि बहुत सारे देशों में प्याज का निर्यात भी किया जाता है। प्याज की खेती को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार की तरफ से अनुदान भी दिया जाता है। इस सब्सिडी से किसानों की लागत कम होती है और मुनाफा भी बढ़ता है। यही वजह है, कि प्याज की खेती किसानों के लिए कम लागत में ज्यादा मुनाफा उठाने का एक शानदार तरीका है।

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प्याज की सर्वोत्तम किस्में और उचित खेती विधि

बुआई का समय प्याज की खेती के लिए मध्य जून एवं मध्य मार्च बेहतर महीने माने जाते हैं।

पनीरी बनाने की विधि क्या होती है

  • पनीरी की रोपाई के लिए 125 किलोग्राम सड़ी हुई खाद (Compost) प्रति मरला (25 वर्ग मीटर) डालकर भूमि को एकसार करें।
  • पनीरी और प्याज लगाए गए क्षेत्र के अनुपात (1:20) के मुताबिक 20 सेमी ऊंचे और 1 से 1.5 मीटर चौड़े ट्रैक निर्मित करें। ध्यान रहे, कि यह अच्छी स्थिति में बोयें हुए होना चाहिए, जिससे कि आपको इससे आगे चलकर कोई परेशानी न हो।
  • बीज को 3 ग्राम थेरम अथवा कैप्टान प्रति किलोग्राम की दर से उपचारित कर 1 से 2 सेमी. 5 सेमी गहरी दूरी पर कतारों में रोपाई करें।
  • बुआई के पश्चात अच्छी तरह सड़ी हुई देशी खाद की हल्की परत से ढक दें और तुरंत फव्वारे के माध्यम से सिंचाई करें।
  • बतादें कि दिन में दो बार सुबह एवं शाम, पौधों की सिंचाई
  • दोपहर में उच्च तापमान से बचाने के लिए बिस्तरों को ढकें।
  • आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि 1.5 मीटर चौड़ी क्यारियों को ढकने के लिए उत्तर-दक्षिण दिशा में 1.5 मीटर की ऊंचाई पर घास अथवा बाकी फसल की पत्तियां-तने आदि से अर्जित मल्च का इस्तेमाल करें। एक महीने उपरांत जब पौधे मजबूत हो जाएं तो इन गमलों को हटा दें।

खेती द्वारा केसर प्याज की खेती

  • मार्च माह के बीच में 8 मरला (200 वर्ग मीटर) क्यारियों में 5 किलोग्राम बीज की रोपाई करें।
  • पनीरी को प्रति सप्ताह के अंतराल में दो बार सींचे।
  • जून के आखिर में कंदों को खोदें एवं उन्हें कमरे के तापमान पर खुली टोकरियों में संग्रहित करें।
  • ज्यादा बिक्री लायक उत्पादन प्राप्त करने के लिए 1.5-2.5 सेमी. परिधीय गांठें उपयुक्त होती हैं।

दूरी

  • कम जल निकास वाली भारी मिट्टी में बेहतर उपज के लिए 60 सेमी. चौड़ा और 10 सेमी. ऊँचे बिस्तर का निर्माण करें।
  • अगस्त के बीच में उन पर बल्ब लगाऐं।
  • नवंबर के आखिर तक फसल तैयार हो जाएगी।
  • खेत में पनीरी की खुदाई कर के रोपाई करें।
  • अगस्त माह के प्रथम सप्ताह में 6 से 8 सप्ताह की पौध को खोदकर खेत में रोप देना चाहिए।
  • बेहतरीन उत्पादन के लिए पंक्तियों के मध्य 15 सेमी व पौधों के मध्य 7.5 सेमी की जगह रखें।
  • खेत में पनीरी की रोपाई सदैव शाम के दौरान करें और उसके शीघ्र पश्चात सिंचाई करें। इसके अलावा आवश्यकतानुसार पानी देते रहें।


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प्याज की बेहतरीन किस्में कौन-कौन सी होती हैं

किसान खरीफ प्याज से अच्छी पैदावार अर्जित कर सकते हैं। यदि प्याज के प्रकार की बात की जाए तो एग्रीफाउंड डार्क रेड किस्म से किसान 120 क्विंटल प्रति एकड़ पैदावार सुगमता से अर्जित कर सकते हैं।

प्याज की फसल के लिए विशेष सावधानी बरतनी चाहिए

केसर प्याज की नर्सरी तैयार करने के दौरान खास सावधानी बरतनी पड़ती है। इस दौरान दिन में तापमान काफी ज्यादा रहता है और अचानक बारिश के उपरांत तापमान गिर जाता है। इससे नर्सरी को क्षति होने का भय रहता है। इस वजह से किसानों को सलाह दी जाती है, कि वे नर्सरी लगाने से पूर्व खेत को बेहतर ढ़ंग से तैयार कर लें। जिससे कि पौधा प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने में समर्थ बन सके।
गेहूं फसल की कटाई करने वाली तीन बेहद सस्ती कटाई मशीन

गेहूं फसल की कटाई करने वाली तीन बेहद सस्ती कटाई मशीन

रबी की फसल कटाई का समय अब चरम सीमा पर चल रहा है। किसान भाइयों को अपने गेहूं की कटाई करवाने के लिए मजदूरों की उचित मूल्य और समय पर उपलब्धता में कमी आ रही है। 

ऐसे में गेहूं की फसल की कटाई के लिए किसानों के लिए हम कुछ ऐसी गेहूं कटाई करने वाली मशीनों की जानकारी लेकर आए हैं, जिससे कृषकों की यह समस्या आसानी से समाप्त हो सकती है। 

जी हाँ, किसान भाई इन मशीनों के उपयोग से गेहूं कटाई की लागत में कमी आने के साथ साथ फसल कटाई का कार्य समय से पूरा हो जाएगा। 

स्वचालित वर्टिकल कन्वेयर रीपर

स्वचालित वरटिकल कनवेयर रीपर फसल कटाई के लिए उपयोग में लायी जाने वाली एक इंजन संचालित मशीन है। इस मशीन को संचालित करने के लिए चालक को पीछे पैदल चलना पड़ता है। इस मशीन द्वारा अनाज एवं तिलहनी फसलों को काटकर एक कतार में व्यवस्थित रखा जा सकता है। 

इस स्वचालित वरटिकल कनवेयर रीपर मशीन में इंजन, शक्ति संचरण बॉक्स, कटाई पट्टी, फसल पंक्ति विभाजक, लग सहित कनवेयर पट्टी, स्टार पहिया और संचालन प्रणाली एक मजबूत फ्रेम पर लगे होते हैं। 

इसमें पट्टा व घिरनी के द्वारा इंजन की शक्ति; कटाई पट्टी और कनवेयर पट्टी को प्रेषित की जाती है।

रीपर को आगे चलाने के समय फसल पंक्ति विभाजक फसल को विभाजित करते हैं। साथ ही, फसल के तने कटाई पट्टी के संपर्क में आने पर कट जाती है। 

फसल को हाथों-हाथ गट्ठर बनाकर गहाई स्थान पर ले जाया जाता है। मशीन द्वारा काटी फसल का वहन खड़ी दिशा मे होने के कारण फसल के बिखेरने से होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है। 

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इस मशीन की लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई तकरीबन 2450, 1200 और 1000 मिमी, क्रमशः होती है। इस मशीन का वजन तकरीबन 145 किग्रा तथा कटाई पट्टी की लंबाई एवं पिच 1000 एवं 75 मिमी क्रमशः होती है। 

इस मशीन का इस्तेमाल मुख्यतः गेहूं, धान, सोयाबीन तथा अन्य अनाज एवं तिलहन फसलों की कटाई के लिए अच्छा है। 

इस मशीन की कार्य क्षमता तकरीबन 0.15 हेक्ट./घंटा होती है। इस मशीन की ईधन खपत करीब 1 लीटर प्रति घंटा होती है। इस मशीन का अनुमानित मूल्य लगभग रुपये 85,000/- है।

बैठकर चलाने वाला स्वचालित रीपर

बतादें, कि बैठकर चलाने वाला स्वचालित रीपर एक स्वचालित मशीन है, जिस पर चालक के लिए सीट मुहैय्या कराई जाती है। इस मशीन में दो बड़े हवा युक्त पहिये लगे होते हैं। 

इसका संचालन पिछले धुरे से किया जाता है। इस मशीन को संचालित करने के लिए करीब 6 एचपी का डीजल इंजन लगा होता है। 

इस मशीन मे सुविधा के अनुरूप ब्रेक, क्लच और स्टेयरिंग द्रव्यचलित प्रणाली और शक्ति संप्रेषण प्रणाली लगी हुयी है। जो कि मशीन को सुगमता से चलाने मे सहयोग करती है। 

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इसमें फसल पंक्ति विभाजक, स्टार पहिया, कटाई पट्टी, कनवेयर पट्टी और वायर स्प्रिंग इत्यादि लगे हुए होते हैं। इस रीपर में दो आगे और एक पीछे चाल का प्रावधान है। 

इस मशीन द्वारा फसल काटने के पश्चात कनवेयर पट्टी द्वारा खींचकर मशीन के एक ओर पंक्ति मे डाल दी जाती है।

इस मशीन की लंबाई, चौड़ाई और उंचाई तकरीबन 3185, 1900 और 1450 मिमी क्रमशः होती है। मशीन का वजन करीब 1530 किग्रा होता है। 

वहीं, प्रचालन गति करीब 3.0 से 3.5 किमी/घंटा होती है। इस मशीन की क्षेत्र क्षमता 0.25 से 0.30 हेक्ट/घंटा तथा क्षेत्र कार्य कुशलता 60-70% तक होती है। 

इसमें इंधन की खपत 0.90 – 1.15 लीटर/घण्टा तथा फसल हानि 5.0 – 5.9 प्रतिशत होती है। इस मशीन का इस्तेमाल धान, गेहूं, सोयाबीन और अन्य अनाज एवं तिलहन फसलों की कटाई के लिए उपयुक्त है। इस मशीन की अनुमानित लागत तकरीबन 1,50,000/- रुपए है।

ट्रैक्टर चलित वरटिकल कनवेयर रीपर

यह एक ट्रेक्टर चलित कटाई उपकरण है। इस यंत्र को ट्रैक्टर के आगे लगाया जाता है और इसे ट्रैक्टर के पी.टी.ओ. द्वारा कपलिंग शाफ्ट एवं मध्यवर्ती शाफ्ट के जरिए से संचालित किया जाता है। 

जमीन के ऊपर मशीन की ऊंचाई घिरनी एवं स्टील रस्सी की मदद से ट्रैक्टर के हाइड्रोलिक द्वारा संचालित की जाती है। 

कत्तई पट्टी द्वारा फसल की कटाई के बाद फसल को लग्ड़ कनवेयर पट्टी की मदद से ऊर्ध्वाधर स्थिति में मशीन के एक तरफ ले जाया जाता है और कटी फसल मशीन की चलने की दिशा से अधोलंब दिशा मे एक कतार मे खेत पर गिर जाती है। 

बतादें, कि इस मशीन में 75 मि.मी. पिच का कटाई पट्टी असेम्बली, 7 फसल पंक्ति विभाजक, लग सहित 2 कनवेयर पट्टी, दबाव स्प्रिंग, घिरनी और पावर संचरण गियर बक्सा लगे होते हैं। 

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फसल पंक्ति विभाजक कटाई पट्टी असेम्बली के सामने फिट किए जाते हैं तथा स्टार पहिया फसल पंक्ति विभाजक के ऊपर लगे होते है। 

इस मशीन में 7 स्टार पहिया, जिनका व्यास 270 – 282 मि. मी. तथा 2000 – 2210 मि. मी. प्रभावी चौड़ाई की कटाई पट्टी होती है। 

इसमें 55 - 60 मि. मी. चौड़ाई की कनवेयर पट्टी, 118 -140 मि. मी. व्यास की घिरनी तथा 1600 – 2010 मि. मी. लंबाई का कटर बार लगा होता है। 

ट्रैक्टर चलित वरटिकल कनवेयर रीपर का इस्तेमाल गेहूं और धान की फसल को काटकर एक कतार मे भूमि पर रखने के लिए किया जाता है। इस मशीन का अनुमानित मूल्य करीब 55,000/- रुपए है।

सीसीईए ने वित्तीय वर्ष 2019-20 के लिए रबी फसलों के एमएसपी को मंजूरी दी

सीसीईए ने वित्तीय वर्ष 2019-20 के लिए रबी फसलों के एमएसपी को मंजूरी दी

रबी विपणन सत्र 2020-21 के लिए चिह्नित किया जाना है गेहूं किसानों को उत्पादन की औसत लागत के दोगुने से अधिक प्राप्त करना प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में संपन्न आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति (सीसीईए) ने वित्तीय वर्ष 2019-20 के लिए सभी रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में वृद्धि, जिसे रबी विपणन सत्र 2020-21 के लिए चिह्नित किया जाना है, को मंजूरी प्रदान की है। 

लाभ और प्रमुख प्रभाव:

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 रबी विपणन सत्र 2020-21 के लिए चिह्नित रबी फसलों के एमएसपी को मंजूरी देकर सरकार उत्पादन की औसत लागत केकरीब डेढ़ गुने तक लाने का प्रयास किया जिसकी घोषणा  सरकार ने केन्द्रीय बजट 2018-19 में ही किया था।

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 इस एमएसपी नीति के माध्यम से सरकार ने किसानों को न्यूनतम 50 प्रतिशत लाभ प्रदान करने के उद्देश्य एवं 2022 तक इनकी आय को दोगुना कर जीवन शैली में सुधार लाने हेतु किया गया प्रमुख एवं प्रगतिशील कदम है। रबी विपणन सत्र 2020-21 (आरएमएस) के लिए, सबसे ज्यादा एमएसपी मसूर (325 रूपए प्रति क्विंटल) की, उसके बाद कुसुम (270 रूपए प्रति क्विंटल) और चना (255 रूपए प्रति क्विंटल) बढ़ाने की अनुशंसा की जो किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में लिया गया एक महत्वपूर्ण कदम है। सफेद सरसों और राई का एमएसपी 225 रूपए प्रति क्विंटल बढ़ाया गया है। गेहूं और जौ दोनों का एमएसपी 85 रूपए प्रति क्विंटल बढ़ाया गया है।इससे गेहूं किसानों को लागत पर करीब 109 प्रतिशत (नीचे टेबल देखें) वापस प्राप्त होगा। एमएसपी के निर्धारण में उत्पादन पर लागत एक प्रमुख कारक है। रबी फसलों के लिए आरएमएस 2020-21 के इस वर्ष के एमएसपी में इस वृद्धि से किसानों को औसत उत्पादन लागत के पर 50 प्रतिशत ज्यादा वापसी (कुसुम को छोड़कर) मिलेगा। भारत की भारित औसत उत्पादन लागत के बनिस्पत गेहूं के लिए वापसी 109 प्रतिशत है; जौ के लिए 66 प्रतिशत; चना के लिए 74 प्रतिशत; मसूर के लिए 76 प्रतिशत;सफेद सरसों के लिए 90 प्रतिशत एवं कुसुम के लिए 50 प्रतिशत है। 

रबी विपणन सत्र (आरएमएस)2020-21 के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य

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क्रम फसल उत्पादन लागत आरएमएस 2020-21 आरएमएस 2019-20 के लिए एमएसपी आरएमएस 2020-21 के लिए एमएसपी एमएसपी में निरपेक्ष वृद्धि लागत की तुलना में वापसी (प्रतिशत में)    

 1. गेहूं   923 1840 1925 85 109       

 2. जौ   919 1440 1525 85 66      

 3. चना  2801 4620 4875 255 74        

4. मसूर  2727 4475 4800 325 76        

5. सफेद सरसों और सरसों  2323 4200 4425 225 90        

6. कुसुम  3470 4945 5215 270 50  

  • व्यापक लागत, जिसमें सभी भुगतान के लागत शामिल होते हैं जैसे कि किराए पर मानव श्रम / घंटा, बैलों द्वारा किया गया श्रम / मशीन द्वारा किया गया श्रम, पट्टे पर ली गई जमीन के किराए का भुगतान, बीज, उर्वरक, खाद, सिंचाई पर खर्च, कार्यान्वयन और कृषि भवनों पर मूल्यह्रास, कार्यशील पूंजी पर ब्याज, पंप सेटों के संचालन के लिए डीजल एवं बिजली पर व्यय, कार्यान्वयन और कृषि भवनों पर मूल्यह्रास, कार्यशील पूंजी पर ब्याज, पंप सेटों के संचालन के लिए डीजल एवं बिजली पर व्यय, विविध खर्च और परिवार के श्रम के मूल्य को कम करना आदि शामिल हैं
अनाजों के मामले में, एफसीआई एवं अन्य नामित राज्य एजेंसियां किसानों को समर्थन मूल्य प्रदान करना जारी रखेंगी।राज्य सरकारें भारत सरकार की पूर्व स्वीकृति से दानेदार (मोटे) अनाजों की खरीद का काम करेंगी और एनएफएसए के तहत पूरी खरीद की गई इस मात्रा को वितरित भी करेंगी।एनएफएसए के तहत जारी की गई राशि के लिए ही सब्सिडी प्रदान की जाएगी। नेफेड, एसएफएसीऔर अन्य नामित केंद्रीय एजेंसियां दाल और तिलहन की खरीद का कार्य जारी रखेंगी। इस तरह के कार्य में नोडल एजेंसियों द्वारा किए गए नुकसान को सरकार द्वारा दिशानिर्देशों के तहत पूरी तरह से प्रतिपूर्ति की जा सकती है।

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 किसानों को आय सुरक्षा प्रदान करने के लिए पर्याप्त नीति बनाने के उद्देश्य से, सरकार का दृष्टिकोण उत्पादन-केंद्रित से बदलकर आय-केंद्रित हो गया है। किसानों की आय में सुधार की दिशा में 31 मई 2019 को संपन्न पहली केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) योजना के दायरे को बढ़ाने पर फैसला लिया गया था। पीएम-किसान योजना की घोषणा वित्तीय वर्ष 2019-2020 के अंतरिम बजट में किया गया था, जिसके तहत वैसे कियानों को लाया गया था जिनके पास करीब 2 एकड़ तक की भूमि थी, इसके तहत इन्हें 6000 रूपए वार्षिक सरकार द्वारा प्रदान करने का फैसला किया गया था। एक अन्य योजना “प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान” की घोषणा सरकार द्वारा 2018 में ही किया गया था जिसके तहत किसानों को उनके उत्पाद का सही पारिश्रमिक देना था। इस योजना के तहत तीन अन्य उप-योजनाएं जैसे मूल्य समर्थन योजना (पीएसएस), मूल्य में कमी पर भुगतान योजना(पीडीपीएस) और निजी खरीद एवं भंडारण योजना (पीपीएसएस) पायलट आधार पर शामिल किए गए।