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कृषि वैज्ञानिक कपास की इन किस्मों की बुवाई करने की सलाह दे रहे हैं

कृषि वैज्ञानिक कपास की इन किस्मों की बुवाई करने की सलाह दे रहे हैं

वर्तमान में गेहूं की फसल की कटाई हो चुकी है। साथ ही, कपास की बुवाई (cotton sowing) का वक्त प्रारंभ हो गया है। अब ऐसी स्थिति में जो किसान गेहूं के पश्चात कपास की खेती (cotton cultivation) करना चाहते हैं, उनके लिए कपास की बुवाई की कई बेहतरीन किस्में हैं, जो बेहतर उत्पादन प्रदान कर सकती हैं। 

कृषि वैज्ञानिकों ने अमेरिकन कपास या नरमा की खेती करने वाले कृषकों के लिए सलाह भी जारी कर दी है। इसके लिए कृषि वैज्ञानिकों की तरफ से कपास की अनुशंसित किस्में लगाने की सलाह दी जा रही है। 

इसके साथ इसकी बुवाई में ध्यान रखने वाली आवश्यक बातों के विषय में भी बताया जा रहा है। विभाग की तरफ से राजस्थान के कृषकों को 20 मई तक कपास की बिजाई करने के लिए कहा जा रहा है, जिससे कि कपास में गुलाबी सुंडी का प्रकोप न हो सके। इसके साथ ही कपास की उन्नत किस्मों के विषय में भी बताया जा रहा है।

नरमा (कपास) की आर.एस. 2818 किस्म 

RS of Narma (Cotton) 2818 नरमा आर.एस किस्म से 31 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उपज हांसिल की जा सकती है। इसके रेशे की लंबाई 27.36 मिलीमीटर, मजबूती 29.38 ग्राम टेक्स आंकी गई है। 

टिंडे का औसत भार 3.2 ग्राम होता है। बिनौलों में 17.85 प्रतिशत तेल की मात्रा पाई जाती है। इसकी ओटाई 34.6 प्रतिशत आंकी गई है।

नरमा (कपास) की आर.एस. 2827 किस्म 

RS of Narma (Cotton) 2827 नरमा (कपास) की आर.एस- 2827 किस्म से औसत 30.5 क्विंटल प्रति हैक्टेयर पैदावार प्राप्त की जा सकती है। 

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इसके रेशे की लंबाई 27.22 मिलीमीटर व मजबूती 28.86 ग्राम व टेक्स आंकी गई है। इसके टिंडे का औसत वजन 3.3 ग्राम होता है। इसके बिनौले में तेल की मात्रा 17.2 फीसद होती है।

नरमा (कपास) की आर.एस. 2013 किस्म

RS of Narma (Cotton) 2013 नरमा (कपास) की आरएस 2013 किस्म की ऊंचाई 125 से 130 सेमी होती है। इसकी पत्तियां मध्यम आकार की व हल्के हरे रंग की होती हैं। 

इसके फूलों की पखुड़ियों का रंग पीला होता है। यह किस्म 165 से 170 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म में गुलाबी सुड़ी द्वारा हानि अन्य किस्मों की अपेक्षा कम होती है। 

यह किस्म पत्ती मरोड़ विषाणु बीमारी के प्रति भी अवरोधी है। इस किस्म से प्रति हैक्टेयर 23 से 24 क्विंटल तक पैदावार प्राप्त की जा सकती है।

नरमा (कपास) की आरएसटी 9 किस्म 

RST 9 variety of Narma (cotton) नरमा (कपास) की आरएसटी 9 किस्म के पौधे की ऊंचाई 130 से 140 सेमी तक होती है। इसकी पत्तियां हल्के रंग की होती हैं और फूल का रंग हल्का पीला होता है। 

इसमें चार से छह एकांक्षी शाखाएं होती हैं। इसके टिंडे का आकार मध्यम है, जिसका औसत वजन 3.5 ग्राम होता है। यह किस्म 160 से 200 दिन में पककर तैयार हो जाती है। 

तेला (जेसिड) रोग से इस किस्म में कम हानि होती है। इस किस्म की ओटाई का प्रतिशत भी अन्य अनुमोदित किस्मों से अधिक है।

नरमा (कपास) की आर.एस. 810 किस्म

RS of Narma (Cotton) 810 नरमा (कपास) की आर.एस. 810 किस्म के पौधे की ऊंचाई 125 से 130 सेमी होती है। इसके फूलों का रंग पीला होता है। इसके टिंडे का आकार छोटा करीब 2.50 से 3.50 ग्राम होता है। 

इसके रेशे की लंबाई 24 से 25 मिलीमीटर व ओटाई क्षमता 33 से 34 फीसद होती है। यह किस्म 165 से 175 दिन में पककर तैयार हो जाती है। 

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यह किस्म पत्ती मोड़क रोग की प्रतिरोधी है। इस किस्म से लगभग 23 से 24 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उपज हांसिल की जा सकती है।

नरमा (कपास) की आर.एस. 875 किस्म

RS of Narma (Cotton) 875 नरमा (कपास) की आर.एस. 875 किस्म के पौधों की ऊंचाई 100 से 110 सेमी होती है। इसकी पत्तियां चौड़ी व गहरे हरे रंग की होती हैं। इसमें शून्य यानी जीरो से एक एकांक्षी शाखाएं पाई जाती हैं। 

इसके टिंडे का आकार मध्यम होता है और औसत वजन 3.5 ग्राम होता है। इसके रेशे की लंबाई 27 मिलीमीटर होती है। इसमें तेल की मात्रा 23 प्रतिशत पाई जाती है, जो कि अन्य अनुमोदित किस्मों से ज्यादा है। 

इस किस्म की फसल 150 से 160 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इससे उसी खेत में सामान्य समय पर गेहूं की बुवाई भी की जा सकती है।

बीकानेरी नरमा

बीकानेरी नरमा  (Bikaneri Narma) किस्म के पौधे की ऊंचाई लगभग 135 से 165 सेमी होती है। इसकी पत्तियां छोटी, हल्के हरे रंग की होती है और फूल छोटे और हल्के पीले रंग के होते हैं। 

इसमें चार से छह एकांक्षी शाखाएं पाई जाती हैं। इसके टिंडे का आकार मध्यम और औसत वजन 2 ग्राम होता है। इसकी फसल 160 से 200 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म में तेला (जेसिड) से अपेक्षाकृत कम हानि होती है।

मरू विकास (राज, एच.एच. 6) 

Desert Development (Kings, HH 6) नरमा (कपास) की मरू विकास (राज, एच.एच. 6) के पौधों की ऊंचाई 100 से 110 सेमी. और पत्तियां चौड़े आकार की होती हैं। इसका रंग हरे रंग का होता है। 

इसमें शून्य यानी जीरो से एक एकांक्षी शाखाएं पाई जाती हैं। इसके टिंडे का आकार मध्यम और औसत वजन 3.5 ग्राम होता है। इसके रेशे की लंबाई 27 मिलीमीटर होती है। 

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इसमे तेल की मात्रा 23 प्रतिशत पाई जाती है। इस किस्म की फसल 150 से 160 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इससे उसी खेत में सामान्य समय पर गेहूं की बुवाई कर सकते हैं।

नरमा कपास की उन्नत किस्मों की बुवाई का तरीका 

नरमा कपास की उन्नत किस्मों की बुवाई के लिए 4 किलोग्राम प्रति बीघा की दर से बीज की जरूरत पड़ती है। बुवाई के दौरान पंक्ति से पंक्ति का फासला 67.50 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे का फासला लगभग 30 सेंटीमीटर रखना चाहिए।

नरमा की बुवाई का समय 15 अप्रैल से 15 मई तक माना जाता है। लेकिन किसान मई के अंत तक इसकी बिजाई कर सकते हैं।

सरसों के कीट और उनसे फसल सुरक्षा 

सरसों के कीट और उनसे फसल सुरक्षा 

सरसों बेहद कम पानी व लागत में उगाई जाने वाली फसल है। इसकी खेती को बढ़ावा देकर किसान अपनी माली हालत में सुधार कर सकते हैं। इसके अलावा विदेशों से मंगाए जाने वाले खाद्य तेलों के आयात में भी कमी आएगी। राई-सरसों की फसल में 50 से अधिक कीट पाए जाते हैं लेकिन इनमें से एक दर्जन ही ज्यादा नुकसान करते हैं। सरसों का माँहू या चेंपा प्रमुख कीट है एवं अकेला कीट ही 10 से 95 प्रतिशत तक नुकसान पहुॅचा सकता है । अतः किसान भाइयों को सरसों को इन कीटों के नियंत्रण पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

 

चितकबरा कीट या पेन्टेड बग

  keet 

 इस अवस्था में नुकसान पहुॅचाने वाला यह प्रमुख कीट है । यह एक सुन्दर सा दिखने वाला काला भूरा कीट है जिस पर कि नारंगी रंग के धब्बे होते हैं। यह करीब 4 मिमी लम्बा होता है । इसके व्यस्क व बच्चे दोनों ही समूह में एकत्रित होकर पोधो से रस चूसते हैं जिससे कि पौधा कमजोर होकर मर जाता है। अंकुरण से एक सप्ताह के भीतर अगर इनका आक्रमण होता है तो पूरी फसल चैपट हो जाती है। यह कीट सितम्बर से नवम्बर तक सक्रिय रहता है । दोबारा यह कीट फरवरी के अन्त में या मार्च के प्रथम सप्ताह में दिखाई देता है और यह पकती फसल की फलियों से रस चूसता है । जिससे काफी नुकसान होता है । इस कीट द्वेारा किया जाने वाला पैदावार में नुकसान 30 प्रतिशत तथा तेल की मात्रा में 3-4 प्रतिशत आंका गया है ।

 

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नियंत्रणः जहा  तक सम्भव हो 3-4 सप्ताह की फसल में पानी दे देवें । कम प्रकोप की अवस्था में क्यूनालफास 1.5 प्रतिशत धूल का 20-25 किग्रा प्रति हैक्टेयर की दर से भुरकाव करें ।अधिक प्रकोप की अवस्था में मैलाथियान 50 ई.सी. 500 मि.ली. दवा को 500 ली. पानी में मिलाकर छिड़कें ।फसल को सुनहरी अवस्था मे कटाई करें व जल्दी से जल्दी मड़ाई कर लेवंे।

 

आरा मक्खी

  makhi 

 इस कीट की सॅंूड़ी ही फसल को नुकसान पहुचाती है जिसका कि सिर काला व पीठ पर पतली काली धारिया होती है। यह कीट अक्तूबर में दिखाई देता है व नबम्बर  से दिसम्बर तक काफी नुकसान करता है । यह करीब 32 प्रतिशत तक नुकसान करता है । अधिक नुकसान में खेत ऐसा लगता है कि जानवरों ने खा लिया हो ।


 

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नियंत्रणः खेत में पानी देने से सूंडिंया पानी में डूब कर मर जाती हैं ।अधिक प्रकोप की अवस्था में मैलाथियान 50 ई.सी. 500 मि.ली. दवा को 500 ली. पानी में मिलाकर  छिड़कें ।

 

बिहार हेयरी केटरपिलर

  caterpillar 

 इस कीट की सूंड़िया ही फसल को नुकसान पहुंचाती हैं । छोटी सॅंड़ी समूह में रहकर नुकसान पहुचाती है जबकि बडी सूंडी जो करीब 40-50 मि.मी. बडी हो जाती है तथा उसके ऊपर धने, लम्बे नांरगी से कत्थई रंग के बाल आ जाते हैं। यह खेत में घूम-घूम कर नुकसान करती है|यह पत्तियों को अत्यधिक मात्रा में खाती है । यह एक दिन में अपने शरीर के वजन से अधिक पत्तियां खा सकती है जिससे फसल नष्ट हो जाती है और फसल दोबारा बोनी पड़ सकती है । 

नियंत्रणः छोटी सूंडियों के  समूह को पत्ती सहित तोड़कर 5 प्रतिशत केरोसिन तेल के घोल में डालकर नष्ट कर दें ।अधिक प्रकोप की अवस्था में मैलाथियान 50 ई.सी. 1 लीटर प्रति हैक्टेयर की दर से 500 ली. पानी में  मिलाकर छिड़कें ।


 

फूल निकलने से फसल पकने तक लगने वाले कीट रोग

  sarso fool 

सरसों का चेंपा या मांहूः यह राई-सरसों का सबसे मुख्य कीट है । यह काफी छोटा 1-2 मि.मी.  लम्बा,पीला हरा रंग का चूसक कीड़ा है। यह पौधे की पत्ती, फूल, तना व फलियों से रस चूसता है, जिससे पौधा कमजोर होकर सूख जाता है । इनकी बढ़वार बहुत तेजी से होती है। यह कीट मधु का श्राव करते हैं जिससे पोैधे पर काली फफूॅद पनप जाती है । यह कीट कम तापमान और ज्यादा आर्द्रता होने पर ज्यादा बढता है। इसलिए जनवरी के अंत तथा फरवरी में इस कीट का प्रकोप अधिक रहता है । यह कीट फसल को 10 से 95 प्रतिशत तक नुकसान पहुंचा सकता है । सरसों में तेल की मात्रा में भी 10 प्रतिशत तक की कमी हो सकती है ।


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नियंत्रणः चेंपा खेत के बाहरी पौधों पर पहले आता है। अतः उन पौधों की संक्रमित टहनियों को तोड़कर नष्ट कर देवें। जब कम से कम 10 प्रतिशत पौधों पर 25-26 चेंपा प्रति पौधा दिखाई देवंे तभी मोनोक्रोटोफास 36 एस.एल. या डाइमैथोएट 30 ई.सी. दवा को 1 लीटर प्रति हैक्टेयर की दर से 600-800 ली. पानी में मिलाकर छिड़काव करें । यदि दोबारा कीड़ों की संख्या बढ़ती है तो दोबारा छिड़काव करें। 

मटर का पर्णखनक -इस कीट की सॅंूडी़ छोटी व गंदे मटमेले रंग की होती है । पूरी बड़ी सॅंडी़ 3 मि.मी. लम्बी हल्के हरे रंग की होती हेै । यह पत्ती की दोनों पर्तों के बीच घुसकर खाती है और चमकीली लहरियेदार सुरंग बना देती है जिसे दूर से भी देखा जा सकता है । यह कीट 5-15 प्रतिशत तक नुकसान करता है । 

नियंत्रणः चेंपा के नियंत्रण करने से ही इस कीट का नियंत्रण हो जाता है ।

सरसों की खेती (Mustard Cultivation): कम लागत में अच्छी आय

सरसों की खेती (Mustard Cultivation): कम लागत में अच्छी आय

सरसों की खेती में किसान को कम लागत में अच्छी आय हो जाती है और इसमें ज्यादा लागत भी नहीं आती है सबसे बड़ी बात जहाँ पानी की कमी हो वहां इसका उत्पादन किया जा सकता है। इसके खेत को किसान दूसरी फसलों के लिए भी प्रयोग में ला सकता है. सरसों की फसल को दूसरी फसलों के साथ भी किया जा सकता है.इसको दूसरी फसलों के मेढ़ों पर लगा दिया जाता है इससे भी अच्छी पैदावार मिल सकती है.जैसे चने के खेत की मेंढ़, बरसीम की मेंढ़, गेंहूं की मेंढ़, मटर आदि की मेंढ़ पर भी लगाया जा सकता है। इसको जब किसी दूसरी फसल के साथ किया जाता है तो इसको बोलते हैं की सरसों की आड़ लगा दी है. इससे सरसों के पेड़ों की दूरी की वजह से सरसों की क्वालिटी भी बहुत अच्छी होती है और इनमे तेल भी अच्छा मिलता है।

सरसों की खेती के लिए खेत की तैयारी:

mustard Farming सरसों के खेत की तैयारी करते समय याद रखें की इसकी खेत में घास न होने पाए और हर बारिश के बाद खेत की जुताई कर देनी चाहिए जिससे की सरसों में पानी देने की जरूरत नहीं पड़ती या फिर कम पानी की जरूरत होती है। सरसों के खेत की जुताई गहरी होनी चाहिए तथा इसकी मिटटी भुरभुरी होनी चाहिए। सरसों की जड़ें गहरी जाती हैं इसलिए इसको गहरी जुताई की आवश्यकता होती है। याद रहे की इसकी खेती समतल खेत में ज्यादा सही होती है इसको ज्यादा पानी की आवश्यकता नहीं होती है तो इसके खेत में पानी नहीं भरना चाहिए नहीं तो इसकी फसल के गलने की समस्या हो जाती है।

सरसों की खेती के लिए बुवाई का समय:

mustard ki kheti सरसों की बुवाई दो समय पर की जा सकती है जो अगस्त से लेकर अक्टूबर तक की जाती है. राई सरसों को अगस्त के अंतिम सप्ताह या सितम्बर के पहले सप्ताह में लगा देना चाहिए। पीली सरसों को सितम्बर में लगा देना चाहिए तथा सामान्य सरसों या काली सरसों को 15 अक्टूबर से पहले बो देना चाहिए। ध्यान रहे की खेत में में पर्याप्त नमी होनी चाहिए जिससे की पौधे को पनपने में आसानी हो।

सरसों की खेती के लिए खाद और उर्वरक

mustard ki kheti उर्वरकों का प्रयोग मिट्‌टी परीक्षण के आधार पर किया जाना चाहिए, इसके लिए हमें अपने खेत की मिट्‌टी की जाँच करा लेनी चाहिए जिससे की हमें पता रहता है की हमारी फसल के लिए किन-किन आवश्यक पोषक तत्वों की जरूरत है इससे हमारी लागत में भी कमी आती है और फसल को भी भरपूर मात्रा में पोषक तत्व मिलते हैं। लेकिन फिर भी हम निम्न प्रकार से खाद और पोषक तत्व दे सकते हैं, सिचांई वाले क्षेत्रों मे नाइट्रोजन 120 किलोग्राम, फास्फेट 60 किलोग्राम एवं पोटाश 60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करने से अच्छी उपज प्राप्त होती है। फास्फोरस का प्रयोग सिंगिल सुपर फास्फेट के रूप में अधिक लाभदायक होता है। क्योकि इससे सल्फर की उपलब्धता भी हो जाती है, यदि सिंगल सुपर फास्फेट का प्रयोग न किया जाए तों गंधक की उपलब्धता की सुनिश्चित करने के लिए 40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से गंधक का प्रयोग करना चाहियें| साथ में आखरी जुताई के समय 15 से 20 टन गोबर की खाद या कम्पोस्ट का प्रयोग लाभकारी रहता है। असिंचित क्षेत्रों में उपयुक्त उर्वरकों की आधी मात्रा बेसल ड्रेसिग के रूप में प्रयोग की जानी चाहिए| यदि डी ए पी का प्रयोग किया जाता है, तो इसके साथ बुवाई के समय 200 किलोग्राम जिप्सम प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना फसल के लिये लाभदायक होता है तथा अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए 80 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से सड़ी हुई गोबर की खाद का प्रयोग बुवाई से पहले करना चाहियें. सिंचाई वाले क्षेत्रों में नाइट्रोजन की आधी मात्रा व फास्फेट एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय कूंड़ो में बीज के 2 से 3 सेंटीमीटर नीचे नाई या चोगों से दी जानी चाहिए।  नाइट्रोजन की शेष मात्रा पहली सिंचाई (बुवाई के 25 से 30 दिन) के बाद टापड्रेसिंग में डाली जानी चाहिए। ऊपर दी गई जानकारी क्षेत्र एवं मिटटी के अनुसार कम या ज्यादा भी हो सकती है।

सरसों की प्रजातियां:

mustard ki kheti 2018 तक एआईसीआरपी- आरएम की छतरी के तहत, रेपसीड-सरसों की कुल 248 किस्में जारी की गई हैं, इनमें से 185 किस्मों को अधिसूचित किया गया है (भारतीय सरसों-113; टोरिया -25; पीली सरसों -17; गोभी सरसों -11) भूरा सरसों -5; करन राई -5; तारामिरा -8 और काली सरसों -1)। इनमें छह संकर और जैविक (सफेद जंग, अल्टरनेरिया ब्लाइट, पाउडर फफूंदी) और अजैविक तनाव (लवणता, उच्च तापमान) के लिए सहिष्णुता वाले किस्में और विशिष्ट लक्षणों को विशिष्ट बढ़ती परिस्थितियों के लिए अनुशंसित किया गया है।

ICAR-DRMR द्वारा विकसित रेपसीड-मस्टर्ड वैरायटी

पहला सीएमएस आधारित हाइब्रिड (NRCHB 506) और भारतीय सरसों की 05 किस्में (NRCDR 02, NRCDR 601, NRCHB 101, DRMRI 31 और DRMR150-35) और एक किस्म की पीली सरसों (NRCYS 05-02) DRMR द्वारा विकसित की गई है।

NRCDR 2 (भारतीय सरसों)

पहचान का वर्ष: 2006 अधिसूचना का वर्ष: - 2006/2007 अधिसूचना संख्या: 122 (ई) अधिसूचना की तारीख: 06/02/2007 केंद्र / राज्य: केंद्रीय जोन के लिए अनुशंसित: II (दिल्ली, हरियाणा, J & K, पंजाब और राजस्थान) कृषि पारिस्थितिक स्थिति: समय पर सिंचित स्थितियों की बुवाई। पौधे की ऊंचाई: 165- 212 सेमी औसत बीज की उपज: 1951-2626 किग्रा / हे तेल सामग्री: 36.5- 42.5% बीज का आकार: 3.5-5.6 ग्रा परिपक्वता के दिन: 131-156 दिन बोने के समय लवणता और उच्च तापमान के लिए सहिष्णु है। सफेद जंग की कम घटना, अल्टरनेरिया ब्लाइट, स्क्लेरोटिनिया स्टेम रोट, पाउडर फफूंदी और एफिड्स।

NRCHB-506 हाइब्रिड (भारतीय सरसों)

पहचान का वर्ष: 2008 अधिसूचना का वर्ष: - २०० of / २०० ९ अधिसूचना संख्या: 454 (E) अधिसूचना की तारीख: 11/02/2009 केंद्र / राज्य: केंद्रीय जोन के लिए अनुशंसित: III (राजस्थान और उत्तर प्रदेश) कृषि पारिस्थितिक स्थिति: अत्यधिक अनुकूलन पौधे की ऊंचाई: 180- 205 सेमी औसत बीज की उपज: 1550-2542 किग्रा / हे तेल सामग्री: 38.6- 42.5% बीज का आकार: 2.9-6.5 ग्राम परिपक्वता के दिन: 127-148 दिन टिप्पणी: उच्च तेल सामग्री

NRCDR 601 (भारतीय सरसों)

पहचान का वर्ष: 2009 अधिसूचना का वर्ष: - 2009/2010 अधिसूचना संख्या: 733 (ई) अधिसूचना दिनांक: 01/04/2010 केंद्र / राज्य: केंद्रीय जोन के लिए अनुशंसित: II (दिल्ली, हरियाणा, J & K, पंजाब और राजस्थान) कृषि पारिस्थितिक स्थिति: समय पर सिंचित स्थितियों की बुवाई। पौधे की ऊंचाई: 161- 210 सेमी औसत बीज की उपज: 1939-2626 किग्रा / हे तेल सामग्री: 38.7- 41.6% बीज का आकार: 4.2-4.9 ग्राम परिपक्वता के दिन: 137-151 दिन टिप्पणी: बुवाई के समय खारेपन और उच्च तापमान पर सहिष्णु। सफेद जंग की कम घटना, (हरिण सिर), अल्टरनेरिया ब्लाइट और स्क्लेरोटेनिया सड़ांध।

NRCHB 101 (भारतीय सरसों)

पहचान का वर्ष: 2008 अधिसूचना का वर्ष: - २०० of / २०० ९ अधिसूचना संख्या: 454 (E) अधिसूचना की तारीख: 11/02/2009 केंद्र / राज्य: केंद्रीय जोन के लिए अनुशंसित: III (एम.पी., यू.पी., उत्तराखंड और राजस्थान) और वी (बिहार, जेके, डब्ल्यूबी, ओडिशा, असोम, छत्तीसगढ़, मणिपुर)। कृषि पारिस्थितिक स्थिति: जोन III के लिए सिंचित लेट ज़ोन और ज़ोन V स्थितियों के लिए वर्षा आधारित। पौधे की ऊंचाई: 170- 200 सेमी औसत बीज की उपज: 1382-1491 किग्रा / हे तेल सामग्री: 34.6- 42.1% बीज का आकार: 3.6-6.2 ग्राम परिपक्वता के दिन: 105-135 दिन टिप्पणी: देर से बोए गए सिंचित और वर्षा की स्थिति के लिए उपयुक्त है

DRMRIJ-31 (गिरिराज) (भारतीय सरसों)

पहचान का वर्ष: 2013 अधिसूचना का वर्ष: - 2013/2014 अधिसूचना संख्या: 2815 (E) अधिसूचना की तारीख: 19/09/2013 केंद्र / राज्य: केंद्रीय जोन के लिए अनुशंसित: II (दिल्ली, हरियाणा, जम्मू और कश्मीर, पंजाब और राजस्थान के कुछ हिस्से) कृषि पारिस्थितिक स्थिति: समय पर सिंचित स्थितियों की बुवाई पौधे की ऊंचाई: 180- 210 सेमी औसत बीज की उपज: 2225-2750 किग्रा / हे तेल सामग्री: 39- 42.6% बीज का आकार: 5.6 ग्राम परिपक्वता के दिन: 137-153 दिन टिप्पणी: बोल्ड बीज, उच्च तेल सामग्री और उच्च उपज किस्म।

DRMR 150-35 (भारतीय सरसों)

पहचान का वर्ष: 2015 अधिसूचना का वर्ष: - अधिसूचना संख्या: - अधिसूचना दिनांक: - केंद्र / राज्य: केंद्रीय जोन के लिए अनुशंसित: वी (बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असोम, छत्तीसगढ़ और मणिपुर) एग्रो इकोलॉजिकल कंडीशन: अर्ली बोई गई रेनफेड कंडीशन पौधे की ऊँचाई: जल्दी बोई गई बारिश की स्थिति औसत बीज की उपज: 1828 किग्रा / हे तेल सामग्री: 39.8% बीज का आकार: 4.66 ग्राम परिपक्वता का दिन: 114 दिन (86- 140 दिन) टिप्पणी: प्रारंभिक परिपक्वता, पाउडर फफूंदी और ए ब्लाइट के प्रति सहिष्णु

DRMR 1165-40 (भारतीय सरसों)

पहचान का वर्ष: 2018 अधिसूचना का वर्ष: - अधिसूचना संख्या: - अधिसूचना दिनांक: - केंद्र / राज्य: केंद्रीय जोन के लिए अनुशंसित: II (राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और जम्मू और कश्मीर) कृषि पारिस्थितिक स्थिति: समय पर बुवाई की गई स्थिति पौधे की ऊंचाई: 177-196 सेमी औसत बीज उपज: 2200-2600 किग्रा / हे तेल सामग्री: 40-42.5% बीज का आकार: 3.2-6.6 ग्राम परिपक्वता के दिन: 133- 151 दिन टिप्पणी: अंकुरित अवस्था में गर्मी सहनशील और नमी सहनशील होती है

NRCYS-05-02 (येलो सरसन)

पहचान का वर्ष: 2008 अधिसूचना का वर्ष: - २०० of / २०० ९ अधिसूचना संख्या: 454 (E) अधिसूचना की तारीख: 11/02/2009 केंद्र / राज्य: केंद्रीय अनुशंसित क्षेत्र / क्षेत्र: देश के पीले सरसों के बढ़ते क्षेत्र। कृषि पारिस्थितिक स्थिति: प्रारंभिक परिपक्वता पौधे की ऊंचाई: 110- 120 सेमी औसत बीज उपज: 1239-1715 किग्रा / हे तेल सामग्री: 38.2- 46.5% बीज का आकार: 2.2-6.6 ग्राम परिपक्वता के दिन: 94-181 दिन

खरपतवार नियंत्रण:

सरसों में खरपतवार नियंत्रण के लिए ज्यादा दवाओं का प्रयोग न करें जब सरसों में पहला पानी लगता है तो खरपतवार निकलने लगता है उसके लिए आप दवा या कीटनाशक की जगह खुरपी से निराई करा दें तो ज्यादा मुफीद रहेगा.अगर पानी से पहले सरसों के साथ अनेक प्रकार के खरपतवार उग आते है। इनके नियंत्रण के लिए निराई गुड़ाई बुवाई के तीसरे सप्ताह के बाद से नियमित अन्तराल पर 2 से 3 निराई करनी आवश्यक होती हैं। रासयानिक नियंत्रण के लिए अंकुरण पूर्व बुवाई के तुरंत बाद खरपतवारनाशी पेंडीमेथालीन 30 ई सी रसायन की 3.3 लीटर मात्रा को प्रति हैक्टर की दर से 800 से 1000 लीटर पानी में घोल कर छिडकाव करना चाहिए।
जानिए, पीली सरसों (Mustard farming) की खेती कैसे करें?

जानिए, पीली सरसों (Mustard farming) की खेती कैसे करें?

आज हम पीली सरसों की बात करेंगे पीली सरसों लाभदायक होने के साथ-साथ अपने पूजा पाठ में भी काम आती है जैसे सरसों दो तरह की होती हैं काली सरसों और पीली सरसो काली सरसों के लिए हम पहले ही अपने वेबसाइट पर लेख दे चुके हैं कई जगह पर लोग राइ को भी सरसों बोल देते हैं जबकि राई और सरसों में बहुत फर्क होता है. पीली सरसों से जो तेल निकलता है उच्च गुणवत्ता का होता है इसमें आप पकवान बनाने से लेकर अचार तक के प्रयोग में ला सकते हैं. सामान्यतः यह सरसों 110 से 125 दिन के बीच में पकती है इसकी मुख्यतः 3 प्रजातियां होती हैं पीतांबरी, नरेंद्र सरसों 2 , एक होती है के-88. इसको खेत की मेड़ों के सहारे भी लगा सकते हैं जैसे आप गेहूं की फसल की जो क्यारियां होती हैं उनकी मेंड़ पर इसको लगाया जा सकता है और अलग से इसकी कोई देखभाल भी नहीं की जाती इसकी लंबाई 6 फुट होती है इसका प्रयोग बीज निकालने के बाद माताएं और बहने झाड़ू के रूप में करती हैं आज भी गांव में जहाँ पशुओं की जगह होती है वहां झाड़ू के रूप में इसका प्रयोग होता है. ये भी पढ़े: गेहूं के साथ सरसों की खेती, फायदे व नुकसान

खेत की तयारी:

सरसों की खेती

जैसे हम दूसरी फसलों के लिए खेत की तयारी करते हैं वैसे ही इसके लिए भी हम खेत को गहराई में जुताई करके खेत की मिटटी को भुरभुरी कर लेते हैं. इसको ज्यादा पानी की जरूरत नहीं पड़ती है इसके लिए 2 पानी काफी होते हैं और अगर बारिश हो जाये तो एक पानी से ही काम चल जाता है. इसके खेत में अगर हम गोबर की बनी हुई खाद प्रयोग करते हैं तो आपको ज्यादा रासायनिक खाद पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा. इसके खेत को पहली जुताई गहरी लगा के बाकि की जुताई के समय पाटा या सुहागा जरूर लगाएं और ध्यान रहे इसके खेत में दूब खास न होने पाए नहीं तो वो फसल को ठीक से ज़माने नहीं देती है.

उन्नतिशील प्रजातियाँ

क्र.सं.प्रजातियाँविमोचनकीतिथिनोटीफिकेशनकीतिथिपकनेकीअवधि (दिनोमें)उत्पादनक्षमता (कु०/हे0)तेलकाप्रतिशतविशेषविवरण1 पीताम्बरी 2009 31.08.10 110-115 18-20 42-45 सम्पूर्ण उ.प्र. हेतु 2 नरेन्द्र सरसों-2 1996 09.09.97 125-130 16-20 44-45 सम्पूर्ण उ.प्र. हेतु 3 के-88 1978 19.12.78 125-130 16-18 40-45 सम्पूर्ण उ.प्र. हेतु  

पीली सरसों की बुवाई कब की जाती है?

पीली सरसों की बुबाई का समय 15 सितम्बर से 30 सितम्बर तक कर देनी चाहिए लेकिन यह समय मौसम और राज्य के हिसाब से आगे पीछे भी हो सकता है.

सिंचाई :

सिंचाई की बहुत ज्यादा आवश्यकता इसमें होती नहीं, अगर कोई माहोट लग जाये / या सर्दी में कोई बारिश हो जाये तो दूसरे पानी की जरूरत नहीं होती है.वैसे इसको एक पानी फूल बनने के समय और दूसरा फली में दाना पड़ने के समय चाहिए होता है.

रोग और फसल की सुरक्षा:

सरसों के रोग

1. आरा मक्खीइस

आरा मक्खीइस कीट की सूड़ियाँ काले स्लेटी रंग की होती है जो पत्तियो को किनारो से अथवा पत्तियों में छेद कर तेजी से खाती है। तीव्र प्रकोप की दशा में पूरा पौधा पत्ती विहीन हो जाता है।

सरसों के रोग और कीट

2. चित्रित बगइस

चित्रित बगइस कीट के शिशु एवं प्रौढ़ चमकीले काले, नारंगी एवं लाल रंग के चकत्ते युक्त होते है। शिशु एवं प्रौढ पत्तिया, शाखाओं, तनो, फूलो एवं फलियों का रस चूसते हैं जिससे प्रभावित पत्तियाँ किनारो से सूख कर गिर जाती है। प्रभावित फलियों में दाने कम बनते है। ये भी पढ़े: सरसों के फूल को लाही कीड़े और पाले से बचाने के उपाय

3. बालदार सूड़ी

बालदार सूड़ी काले एवं नारंगी रंग की होती है तथा पूरा शरीर बालो से ढका रहता है। सूडियाँ प्रारम्भ से झुण्ड मे रहकर पत्तियों को खाती है तथा बाद मे पूरे खेत में फैल कर पत्तियो को खाती है तीव्र प्रकोप की दशा में पूरा पौधा पत्ती विहीन हो जाता है।

सरसों के रोग और कीट

4. माहूँइस

माहूँइस कीट की शिशु एवं प्रौढ़ पीलापन लिए हुए रंग के होते है जो पौधो के कोमल तनों, पत्तियों, फूलो एवं नई फलियों के रस को चूसकर कमजोर कर देते हैं। माहूँ मधुस्राव करते है जिस पर काली फफूँदी उग आती है जिससे प्रकाश संश्लेषण में बाधा उत्पन्न होती है।

5. पत्ती सुरंगक कीट

पत्ती सुरंगक कीट इस कीट की सूडी पत्तियों में सुरंग बनाकर हरे भाग को खाती है जिसके फलस्वरूप पत्तियों में अनियमित आकार की सफेद रंग की रेखाये बन जाती है।गर्मी में गहरी जुताई करनी चाहिए।संतुलित उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए।आरा मक्खी की सूडियों को प्रातः काल इक्ट्ठा कर नष्ट कर देना चाहिए।प्रारम्भिक अवस्था में झुण्ड में पायी जाने वाली बालदार सूडियों को पकड़कर नष्ट कर देना चाहिए।प्रारम्भिक अवस्था में माहूँ से प्रभावित फूलों, फलियों एवं शाखाओं को तोड़कर माहूँ सहित नष्ट कर देना चाहिए।पकने का समय:पिली सरसों पकने में 110 से 125 दिन का समय लेती है.तेल की मात्रा:इसमें तेल की मात्रा सामान्य सरसों से ज्यादा होती है, लगभग 40 से 45 % तक होती है जब की सामान्य सरसों में यही तेल की मात्रा 30 से 35 % तक ही होती है.

जानिए सरसों की कम समय में अधिक उत्पादन देने वाली प्रजातियां

जानिए सरसों की कम समय में अधिक उत्पादन देने वाली प्रजातियां

किसान भाइयों वर्तमान समय में सरसों का तेल काफी महंगा बिक रहा है। उसको देखते हुए सरसों की खेती करना बहुत लाभदायक है। कृषि वैज्ञानिकों ने अनुमान जताया है कि इस बार सरसों की खेती से दोगुना उत्पादन मिल सकता है, यानी इस बार की जलवायु सरसों की खेती के अनुकूल रहने वाली है। तिलहनी फसल की एमएसपी काफी बढ़ गयी है। तथा बाजार में एमएसपी से काफी ऊंचे दामों पर सरसों की डिमांड चल रही है। इन संभावनाओं को देखते हुए किसान भाई अभी से सरसों की अगैती फसल लेने की तैयारी में जुट गये हैं। 

खाली खेतों में अगैती फसल लेने से होगा बहुत फायदा

Mustard ki kheti 

 जो किसान भाई खरीफ की खेती नहीं कर पाये हैं, वो अभी से सरसों की खेती की अगैती फसल लेने की तैयारी में जुट गये हैं। इन किसानों के अलावा अनेक किसान ऐसे भी हैं जो खरीफ की फसल को लेने के बाद सरसों की खेती करने की तैयारी कर रहे हैं। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि जिन किसानों ने गन्ना,प्याज, लहसुन व अगैती सब्जियों की खेती के लिए खेतों को खाली रखते हैं, वो भी इस बार सरसों के दामों को देखते हुए सरसों की खेती करने की तैयारी कर रहे हैं। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि जो किसान भाई सरसों की अगैती फसल लेंगे वे अतिरिक्त मुनाफा कमा सकते हैं। इंडियन कौंसिल ऑफ़ एग्रीकल्चर रिसर्च के कृषि विशेषज्ञ डॉ. नवीन सिंह का कहना है कि जो खेत सितम्बर तक खाली हो जाते हैं, उनमें कम समय में तैयार होने वाली सरसों की खेती करके किसान भाई अच्छा खासा मुनाफा कमा सकते हैं। उनका कहना है कि भारतीय सरसों की अनेक किस्में ऐसी हैं जो जल्दी तैयार हो जाती हैं और वो फसलें उत्पादन भी अच्छा दे जाती हैं।

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सरसों के कीट और उनसे फसल सुरक्षा 

अच्छी प्रजातियों का करें चयन

mustard ki kheti 

 किसान भाइयों, आइये जानते हैं कि सरसों की कम समय में अधिक उत्पादन देने वाली कौन-कौन सी अच्छी प्रजातियां हैं:- 

1.पूसा अग्रणी:- इस प्रजाति के बीज से सरसों की फसल मात्र 110 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। इस बीज से किसान भाइयों को प्रति हेक्टेयर लगभग 14 क्विंटल सरसों का उत्पादन मिल जाता है। 

2. पूसा तारक और पूसा महक:- सरसों की ये दो प्रजातियों के बीजों से भी अगैती फसल ली जा सकती है। इन दोनों किस्मों से की जाने वाली खेती की फसल 110 से 115 दिनों के बीच पक कर तैयार हो जाती है। खाद, पानी, बीज आदि का अच्छा प्रबंधन हो तो इन प्रजातियों से प्रति हेक्टेयर 15-20 क्विंटल की पैदावार मिल जाती है। 

3. पूसा सरसों-25 :- कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार पूसा सरसों-25 ऐसी प्रजाति है जिससे सबसे कम समय में फसल तैयार होती है। उन्होंने बताया कि इस प्रजाति से मात्र 100 दिनों में फसल तैयार हो जाती है। इससे पैदावार प्रति हेक्टेयर लगभग 15 क्विंटल उत्पादन मिल जाता है। 

4. पूसा सरसों-27:- इस प्रजाति के बीज से औसतन 115 दिन में फसल तैयार हो जाती है तथा पैदावार 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के आसपास रहती है। 

5. पूसा सरसों-28:- इस प्रजाति से खेती करने वालों को थोड़ा विशेष ध्यान रखना होता है। समय पर बुआई के साथ निराई-गुड़ाई एवं खाद-पानी का प्रबंधन अच्छा करके किसान भाई प्रति हेक्टेयर 20 क्विंटल तक की पैदावार ले सकते हैं। 

6. पूसा करिश्मा: इस प्रजाति से सरसों की फसल 148 दिनों के आसपास तैयार हो जाती है तथा इस प्रजाति से प्रति हेक्टेयर 22 क्विंटल तक की पैदावार ली जा सकती है। 

7. पूसा विजय: इस प्रजाति के बीजों से फसल लगभग 145 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है तथा इससे प्रति हेक्टेयर 25 क्विंटल तक फसल ली जा सकती है। 

8.पूसा डबल जीरो सरसों -31:- इस किस्म के बीज से  सरसों की खेती  140 दिनों में तैयार होती है तथा इससे उत्पादन प्रति हेक्टेयर 23 क्विंटल तक लिया जा सकता है। 

9. एनआरसीडीआर-2 :- इस उन्नत किस्म के बीज से सरसों की फसल 131-156 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है। अच्छे प्रबंधन से प्रति हेक्टेयर 20 से 27 क्विंटल तक का उत्पादन लिया जा सकता है। 

10. एनआरसीएचबी-506 हाइब्रिड:- अधिक पैदावार के लिए यह बीज अच्छा माना जाता है। इससे सरसों की फसल 127-145 दिनों में तैयार हो जाती है। जमीन, जलवायु और उचित देखरेख से इस बीज से प्रति हेक्टेयर 16 से 26 क्विंटल तक की पैदावार ली जा सकती है। 

11. एनआरसीएचबी 101:- इस प्रजाति के बीच सेसरसों की फसल 105-135 दिनों में तैयार होती है तथा पैदावार प्रति हेक्टेयकर 15 क्विंटल तक ली जा सकती है। 

12. एनआरसीडीआर 601:- यह प्रजाति भी अधिक पैदावार चाहने वाले किसान भाइयों के लिए सबसे उपयुक्त है। इस बीच से की जाने वाली खेती से फसल 137 से 151 दिनों में तैयार हो जाती है तथा प्रति हेक्टेयर 20 से 27 क्विटल तक पैदावार ली जा सकती है।

कब होती है बुवाई और कब होती है कटाई

mustard ki kheti 

 कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार सरसों की अगैती की फसल की बुआई का सबसे अच्छा समय सितम्बर का पहला सप्ताह माना जाता है। यदि किसी कारण से देर हो जाये तो सितम्बर के दूसरे और तीसरे सप्ताह में अवश्य ही बुआई हो जानी चाहिये। इस अगैती फसल की कटाई जनवरी के शुरू में ही हो जाती है। अधिक पैदावार वाली प्रजातियों में एक से डेढ़ महीने का समय अधिक लगता है। इस तरह की फसलें फरवरी के अंत तक तैयार हो जाती हैं। 

सरसों की अगैती फसल के लाभ

सरसों की कम अवधि में तैयार होने वाली अगैती फसल से अनेक लाभ किसान भाइयों को मिलते हैं। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं:-
  1. अगैती फसल लेने से सरसों की पैदावार माहू या चेपा कीट के प्रकोप से बच जाती है। इसके अलावा ये फसलें बीमारी से रहित होतीं हैं।
  2. सरसों की अगैती फसल लेने से खेत जल्दी खाली हो जाते हैं तथा एक साल में तीन फसल ली जा सकती है।

अगैती फसल के लिए किस तरह करें देखभाल

  1. बुवाई के समय उर्वरक प्रबंधन के लिए खेत में प्रति हेक्टेयर एक क्विंटल सिंगल सुपर फास्फेट, 40 किलो यूरिया और 25 से 30 किलो एमओपी डालें।
  2. खरपतवार को रोकने के लिए बुआई से एक सप्ताह बाद पैंडीमेथलीन का 400 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें। एक माह बाद निराई-गुड़ाई की जानी चाहिये।
  3. सिंचाई के लिए खेत की देखभाल करते रहें। बुआई के लगभग 35 से 40 दिन बाद खेत का निरीक्षण करें। आवश्यकता हो तो सिंचाई करें। उसके बाद एक और सिंचाई फली में दाना आते समय करनी चाहिये लेकिन इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि जब फूल आ रहे हों तब सिंचाई नहीं करनी चाहिये।
  4. पहली सिंचाई के बाद पौधों की छंटाई करनी चाहिये। उस समय किसान भाइयों को इस बात का ध्यान रखना होगा कि लाइन से लाइन की दूरी 45 सेंटीमीटर और पौधों से पौधों की दूरी 20 सेंटी मीटर रहे। इसी समय यूरिया का छिड़काव करें।
  5. खेत की निगरानी करते समय माहू या चेपा कीट के संकेत मिलें तो पांच मिली लीटर नीम के तेल को एक लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।या इमीडाक्लोप्रिड की 100 मिली लीटर मात्रा को 200 लीटर पानी में मिलाकर शाम के समय छिड़काव करें। यदि लाभ न हो तो दस-बारह दिन बाद दुबारा छिड़काव करें।
  6. फलियां बनते समय थायोयूरिया 250 ग्राम को 200 लीटर पानी में मिलाकर खेत में छिड़काव करें। जब 75 प्रतिशत फलियां पीली हो जायें तब कटाई की जाये। पूरी फलियों के पकने का इंतजार न करें वरना दाने चिटक कर गिरने लगते हैं।

जानिए सरसों की बुआई के बाद फसल की कैसे करें देखभाल

जानिए सरसों की बुआई के बाद फसल की कैसे करें देखभाल

किसान भाइयों यदि हम आज सरसों की फसल की बात करे तो आजकल सरसों के तेल के दाम बहुत ऊंचे होने के कारण इसका महत्व बढ़ गया है। प्रत्येक किसान अधिक से अधिक लाभ कमाने के लिए सरसों की फसल करना चाहेगा। उस पर यदि सरसों की फसल अच्छी हो जाये तो सोने पर सुहागा हो जायेगा।  इसके लिये किसान भाइयों को शुरू से अंत तक फसल की देखभाल करनी होगी। किसान भाइयों को समय-समय पर जरूरत के हिसाब से खाद-पानी, निराई-गुड़ाई, रोग, कीट प्रकोप से बचाने के अनेक उपाय करने होंगे।

सबसे पहले पौधों की दूरी का ध्यान रखें

बुआई के बाद सबसे पहले किसान भाइयों को बुआई के लगभग 15 से 20 दिनों के बाद खेत का निरीक्षण करना चाहिये तथा पौधों  का विरलीकरण यानी निश्चित दूरी से अधिक पौधों की छंटाई करनी चाहिये ।  इससे फसल को  दो तरह के लाभ मिलते हैं। पहला लाभ  यह कि  पौधों के लिए आवश्यक 10-15 सेन्टीमीटर की दूरी मिल जाती है। जिससे फसल को होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है। दूसरा लाभ यह है कि खरपतवार का नियंत्रण भी  हो जाता है।

सिंचाई का विशेष प्रबंध करें

सरसों की फसल के लिए आवश्यकतानुसार सिंचाई करनी होती है। बरसात होती है तो उसका ध्यान रखते हुए सिंचाई का प्रबंधन करना होता है। सरसों की अच्छी फसल के लिए खेत की नमी, फसल की नस्ल और मिट्टी  की श्रेणी के अनुसार किसान भाइयों को खेत की जांच पड़ताल करनी चाहिये। उसके बाद आवश्यकता हो तो पहली सिंचाई 15 से 20 दिन में ही करें। उसके बाद 30 से 40 दिन बाद उस समय सिंचाई करें जब फूल आने वाले हों।  इसके बाद तीसरी सिंचाई 2 से ढाई महीने के बाद उस समय करनी चाहिये जब फलियां बनने वाली हों। जहां पर पानी की कमी हो या पानी खारा हो तो किसान भाइयों को चाहिये कि अपने खेतों में सिर्फ एक ही बार सिंचाई करें।



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कैसे करें खरपतवार का नियंत्रण

सिंचाई के अच्छे प्रबंधन के साथ ही सरसों की फसल की देखभाल में खरपतवार का नियंत्रण करना बहुत जरूरी होता है। क्योंकि किसान भाई जब खेत में खाद व सिंचाई का अच्छा प्रबंधन करते हैं तो खेत में सरसों के पौधों के साथ ही उसमें उग आये खरपतवार भी तेजी से विकसित होने लगते हैं। इसका फसल पर सीधा प्रभाव पड़ने लगता है। इसलिये किसान भाइयों को चाहिये कि सरसों की फसल की देखभाल करते समय खरपतवार के नियंत्रण पर विशेष ध्यान दें।  खरपतवार का नियंत्रण इस प्रकार करना चाहिये:-
  1. बुआई के लगभग 25 से 30 दिन बाद निराई गुड़ाई करनी चाहिये। इससे पौंधों के सांस लेने की क्षमता बढ़ जाती है तथा  इससे  पौधों को तेजी से अच्छा विकास होता है।
  2. खरपतवार का अच्छी तरह नियंत्रण करने से फसल में 60 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है। किसान भाइयों को अच्छी फसल का लाभ हासिल करने के लिए खरपतवार का प्रबंधन करना ही होगा।
  3. खरपतवार के नियंत्रण के लिए किसान भाई रासायनिक पदार्थों का भी उपयोग कर सकते हैं। इसके लिए पेन्डी मिथैलीन (30 ईसी) की 3.5 लीटर को 1000 लीटर पानी में मिलाकर बुआई के तुरन्त बाद छिड़काव करना चाहिये।  यदि पेन्डी मिथेलीन का प्रबंध न हो सके उसकी जगह फ्रलुक्लोरेलिन (45 ईसी) का घोल मिलाकर छिड़काव करना चाहिये ।  इससे खरपतवार नहीं उत्पन्न होता है।
sarson ki kheti

कीट प्रकोप व रोग का ऐसे करें उपचार

कहते हैं कि जब तक फसल सुरक्षित किसान भाई के घर न पहुंच जाये तब तक अनेक बाधाएं फसलों में लगतीं रहतीं हैं। ऐसी ही एक बड़ी व्याधि हैं कीट प्रकोप और फसली रोग। इनसे बचाने के लिए किसान भाइयों को लगातार अपनी फसल की निगरानी करते रहना चाहिये और जो भी कीटों का प्रकोप और रोग के संकेत दिखाई दें तत्काल उनका उपचार करना चाहिये। वरना फसल की पैदावार काफी प्रभावित होती है और किसान भाइयों को  होने वाले अच्छे लाभ पर ग्रहण लग जाता है। आइये जानते हैं कि सरसों की फसल पर कौन-कौन से रोग और कीट लगते हैं और किस प्रकार से किसान भाइयों को उनका उपचार करना चाहिये। सरसों की फसल पर लगने वाले रोग व कीट इस प्रकार हैं:-
  1. चेंपा या माहू
  2. आरा मक्खी
  3. चितकबरा कीट
  4. लीफ माइनर
  5. बिहार हेयरी केटर पिलर
  6. सफेद रतुवा
  7. काला धब्बा या पर्ण चित्ती
  8. चूर्णिल आसिता
  9. मृदूरोमिल आसिता
  10. तना गलन



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1. चेंपा या माहू: सरसों का प्रमुख कीट चेंपा या माहू है। जो फसल को पूरी तरह से बर्बाद कर देता है। सरसों में लगने वाले माहू पंखों वालें और बिना पंखों वाले हरे या सिलेटी रंग के होते हैं। इनकी लम्बी डेढ़ से तीन मिलीमीटर होती है। इस कीट के शिशु व प्रौढ़ पौधों के कोमल तनों, पत्तियों, फूलों एवं नई फलियों के रस चूसकर उनको कमजोर एवं क्षतिग्रस्त करते हैं। इस कीट के प्रकोप का खतरा दिसम्बर से लेकर मार्च तक बना रहता है।  इस दौरान किसान भाइयों को सतर्क रहना चाहिये।

क्या उपाय करने चाहिये

जब फसल चेंपा या माहू से प्रभावित दिखें और उसका प्रभाव बढ़ता दिखे तो किसान भाइयों को तत्काल एक्टिव होकर डाइमिथोएट  30 ईसी या मोनोग्रोटोफास (न्यूवाक्रोन) का लिक्विड एक लीटर को 800 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिये। यदि दुबारा कीट का प्रकोप हों तो 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिये।  माहू से प्रभावित पौधों की शाखाओं को तोड़कर जमीन में दबा देना चाहिये।  इसके अलावा किसान भाइयों को माहू से प्रभावित फसल को बचाने के लिए कीट नाशी फेंटोथिओन 50 ईसी एक लीटर को 800 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिये। इसका छिड़काव करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि शाम के समय स्प्रे करना होगा। sarson ki kheti 2. आरा मक्खी: सरसों की फसल में लगने वाले इस कीट के नियंत्रण के लिए मेलाथियान 50 ईसी की एक लीटर को 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर का छिड़काव करना चाहिये। एक बार में कीट न खत्म हों तो दुबारा छिड़काव करना चाहिये। 3.चितकबरा कीट : इस कीट से बचाव करने के लिए प्रति हेक्टेयर के हिसाब से क्यूलनालफास चूर्ण को 1.5 प्रतिशत को मिट्टी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिये। जब इस कीट का प्रकोप अपने चरम सीमा पर पहुंच जाये तो उस समय मेलाथियान 50 ईसी की 500 मि.ली. मात्रा को 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़कना चाहिये। 4.लीफ माइनर: इस कीट के प्रकोप के दिखते ही मेलाथियान 50 ईसी का छिड़काव करने से लाभ मिलेगा। 5.बिहार हेयरी केटर पिलर : डाइमोथिएट के घोल का छिड़काव करने से इस कीट से बचाव हो सकता है। 6. सफेद रतुवा : सरसों की फसल में लगने वाले रोग से बचाव के लिए मैन्कोजेब (डाइथेन एम-45) के 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें। आवश्यकतानुसार तीन बार तक छिड़काव किया जा सकता है। 7. काला धब्बा या पर्ण चित्ती: इस रोग से बचाव के लिए आईप्रोडियाँन, मेन्कोजेब के 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें। 8. चूर्णिल आसिता: इस रोग की रोकथाम करने के लिए सल्फर का 0.2 प्रतिशत या डिनोकाप 0.1 प्रतिशत का घोल बनाकर छिड़काव करे। 9. मृदूरोमिल आसिता: सफेद रतुआ के प्रबंधन से ये रोग अपने आप ही नियंत्रित हो जाता है। 10. तना गलन: फंफूदीनाशक कार्बेन्डाजिम 0.1 प्रतिशत का छिड़काव फूल आने के समय किया जाना चाहिये। बुआई के लगभग 60-70 दिन बाद यह रोग लगता है। उसी समय रोगनाशी का छिड़काव करने  से  फायदा मिलता है।



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सरसों की फसल को आम तौर पर बहुत ही आसान, कम खर्चीली व कम देखरेख वाली फसल बताया जाता है लेकिन कोई भी फसल बिना देखरेख वाली नहीं होती है। देखरेख में जरा सी लापरवाही से फसल को भारी नुकसान हो जाता है। किसान भाइयों आपके द्वारा की गयी मेहनत पर पानी भी फिर सकता है, उस वक्त आपके पास पछताने के अलावा कुछ नहीं रह जाता है। इसलिए हमें सरसों की फसल करते समय लापरवाही नहीं बरतना चाहिये यदि हमें सरसों की अच्छी फसल लेनी है तो बुआई से कटाई तक हमें हर समय फसल की हर जरूरत का ध्यान रखना होगा।

सरसों के फूलों को झड़ने से बचाने के उपाय करें

किसान भाइयों, मौजूदा समय में सरसों की फसल में फूलों के आने का समय है। इसके तत्काल बाद इस फसल में फलियों के आने का समय है। जिन किसान भाइयों ने सरसों की अगैती फसल की होगी तो इस समय फूलों के साथ फलियां भी आने लगीं होंगी। इस समय हमें फूलों को सुरक्षित रखने व उनसे अच्छी फलियां बनने के उपाय करने होंगे।

closeup of mustard flower

सरसों के खेती पर की गयी सारी मेहनत पर फिर सकता है पानी

वर्तमान समय में सरसों की फसल में कीट आक्रमण या सिंचाई प्रबंधन की कमी या खाद प्रबंधन की कमी से फूलों का झड़ना शुरू हो जाता है। इसका अर्थ यह हुआ कि फूलों के झड़ने से आपकी फसल कमजोर होने वाली है। दूसरे शब्दों में कहं तो किसान भाइयों आपकी बुआई से लेकर अब तक की गयी मेहनत पर पानी फिरने वाला है और इस समय जरा सी लापरवाही हुई तो आपका उत्पादन गिरने वाला है। इसलिये हमें इस समय कौन-कौन से उपाय करने चाहिये उपन ध्यान देना होगा। आइये हम इन्हीं बातों का जिक्र करते हैं।

सरसों की सिंचाई का करें सही प्रबंधन

किसान भाइयों, सरसों की फसल में सिंचाई जमीन की किस्म के आधार पर की जाती है। यदि आपकी खेत की मिट्टी भारी है तो सरसों की फसल में आपको दो बार सिचांई करने की आवश्यकता होती है। यदि आपके खेत की मिट्टी हल्की है तो आपको सरसों की फसल में तीन बार सिंचाई करनी होती है। इसके अलावा आप सिंचाई प्रबंधन सर्दियों में होने वाले बरसात को भी देखकर आवश्यकतानुसार कर सकते हैं। भारी व हल्की मिट्टी में दूसरी सिंचाई आपको फूलों के आने से पहले या जब खेत में फूल 50 से 60 प्रतिशत आ गये हों तब करना चहिये। इससे आपके खेत में सरसों की फसल के फूल झड़ने से बच जायेंगे और जब फलियां बनेंगी तब खेत में पर्याप्त नमी रहेगी।

गरम पानी से करें सरसों की सिंचाई

सिंचाई करते समय किसान भाइयों को एक बात का ध्यान रखना चाहिये। यदि आप अपने फसल की सिंचाई नहर से कर रहे हों तो कोशिश करें कि आप अपने खेत की सिंचाई दिन में करें। दिन में करने से धूप से पानी गरम रहेगा तो पौधे पर सर्दी से होने वाला तनाव नहीं पड़ेगा। इसके अलावा यदि आपके पास नहर व ट्यूबवेल दोनों से ही सिंचाई की सुविधा है तो आपको अपने खेत की सिंचाई नहर की जगह ट्यूबवेल से करनी चाहिये ताकि पौधों को सर्दी में गरम पानी मिल सके। इससे आपके पौधों को काफी फायदा होगा।

जरूरत पड़ने पर करें सरसों का उर्वरक प्रबंधन

यदि आपने फूल आने से पहले खाद प्रबंधन के दौरान 20 किलो यूरिया और 3 किलो सल्फर प्रति एकड़ के हिसाब से डाला है तो फूल आने बाद आपको कुछ भी नहीं डालना है। खाद के अलावा आपको इस समय किसी तरह के कीट प्रबंधन के पदार्थो का भी प्रयोग नहीं करना है।

स्वस्थ सरसों के फूलों के लिए करें ये उपाय

सरसों के फूलों को मजबूती देने के लिए और स्वस्थ फलियों और उनमें मोटे दाने के लिए आप इस समय फसल में एनपीके 05234 तथा बोरोन का छिड़काव करना चाहिये। किसान भाइयों आप अपनी सरसों की फसल में फूल को अच्छी तरह से विकसित करने के लिए एनपीके 05234 प्रति एकड़ एक किलो और बोरोन 100 ग्राम को 100 से 150 लीटर पानी में डालकर छिड़काव करें तो फूलों के गिरने से बचाव हो सकता है। क्योंकि एनपीके 05234 में 34 प्रतिशत पोटाश होता है जो फूलों को गिरने से बचाने में सहायक होता है। बोरोना में फूल सेटिंग व सीट सेटिंग की अच्छी क्षमता होती है। इससे सरसों की फसल को काफी लाभ होता है।

पोटाश से होता है सरसों के फूलों का बचाव

पोटाश ट्रांसपोर्र्टर का काम करता है यानी यह पौधों के तनों, पत्तों, फूलों को आवश्यकतानुसार क्लोरोफिल, प्रोटीन, फाइबर हाइडेट वर्गरह पहुंचाता है। जो पौधे का मुख्य भोजन होता है। अच्छा भोजन मिलने से जब पौधा स्वस्थ होगा तो उसमें लगने वाले फूल भी स्वस्थ रहेंगे और जल्दी से नहीं गिरेंगे। जब फूल सुरक्षित रहेंगे तो उनसे अच्छी फलियां भी बनेंगी और फलियों में जब अच्छे दाने बनेंगे तो फसल अपने आप ही अच्छी होगी और उत्पादन बढेगा। कहने का मतलब किसान भाइयों को लाभ ही लाभ होगा।

Mustard crop, Sarso



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सरसों की फसल में कीट लगने पर करें ये काम

सरसों की फसल में फूल आने के वक्त एक खास प्रकार के कीट का हमला होता है, जिसे क्षेत्रीय भाषा में अलग अलग नाम से पुकारा जाता है, कोई लहि के नाम से जानता है तो कोई मोइला के नाम से जानता है। इस कीट के लगने से सरसों के फूल कमजोर हो जाते हें और उनका तेजी से झड़ना शुरू हो जाता है। किसान भाइयों को चाहिये कि वह इस कीट का हमला देखते ही सतर्क हो जायें और इसके प्रबंधन का उपाय करने लगें। इस कीट को समाप्त करने के लिए इमिडा क्लोग्रीड का इस्तेमाल करें काफी फायदा होगा। यह इमिडा मार्केट में अनेक कंपनियों की बनायी हुइ आसानी से मिल जाती है। आप अपने क्षेत्र के हिसाब से इसका चयन कर सकते हैं।

कम ओस या सर्दी में किये जाने वाला उपाय

जहां पर्याप्त ओस व ठण्ड न पड्ने से पौधे कमजोर हो जाते हें और उनमें फूल नहीं आता या कम आता है और यदि आता भी है तो झड़ जाता है। तो उसके लिए सिंचाई प्रबंधन व खाद प्रबंधन करना चाहिये। दूसरी सिंचाई के समय यूनिया व सल्फर डालना चाहिये। लेकिन इस बात का ध्यान रहे कि जब खेत में 10 से 15 प्रतिशत फूल आये हों तब सिंचाई खाद नहीं डालनी चाहिये बल्कि जब खेत में 50 से 60 प्रतिशत फूल आ गये हों तभी सिंचाई करके उर्वरक डालने चाहिये।

अधिक ठंड व पाला से बचाव इस प्रकार करें

यदि मौसम का मिजाज बिगड़ जाये तो किसान भाइयों तब भी सरसों की फसल प्रभावित हो जाती है। उसके फूल कम विकसित होते हैं और यदि फूल का विकास हो भी जाता है तो फलियों का विकास सही तरीके से नहीं हो पाता है। फलियां पतली रह जातीं है, उनमें दाने कम बनते हैं और पतले भी बनते हैं। इससे उत्पादन पूरी तरह से प्रभावित होता है। किसान भाइयों को चाहिये कि अंधिक ठंड और पाला से भी सरसों की फसल को बचाना चाहिये। उसके लिए हमें डस्ट वाले सल्फर का प्रयोग करना चाहिये या इसकी जगह आप गुड़ का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। सबसे अच्छा सफेद पाउडर वाले थायो यूरिया का प्रयोग करना चाहिये। किसान भाइयों सल्फर में पाला से बचाने की क्षमता होती है साथ ही साथ 15 प्रतिशत तक फसल पैदावार बढ़ाने की क्षमता होती है। गुड़ गरम होता है तो उसके प्रयोग से पाला से पूरी तरह से बचाव हो जाता है और फसल अच्छी हो जाती है। सर्दी और पाले से बचाव के लिए सबसे अच्छा थायो यूरिया को माना जाता है। सफेद पाउडर के रूप में मिलने वाले थायो यूरिया को 100 ग्राम प्रति एकड़ में 150 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करने से पाला भी बचता है और फसल की पैदावार भी बढ़ती है।  

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किसान सरसों की इस किस्म की खेती कर बेहतरीन मुनाफा उठा सकते हैं

किसान सरसों की इस किस्म की खेती कर बेहतरीन मुनाफा उठा सकते हैं

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि नवगोल्ड किस्म के सरसों का उत्पादन आम सरसों के मुकाबले अच्छी होती है। जानें इसकी खेती के तरीके के बारे में। हमारे भारत देश में सरसों की खेती रबी के सीजन में की जाती है। इसकी खेती के लिए खेतों की बेहतरीन जुताई सहित सिंचाई की उत्तम व्यवस्था भी होनी चाहिए। बाजार में आजकल कई तरह की सरसों की किस्में पाई जाती हैं। ऐसी स्थिति में नवगोल्ड भी सरसों की एक विशेष किस्म की फसल हैं, जिसकी खेती कर आप कम परिश्रम में अधिक पैदावार कर सकते हैं।

नवगोल्ड किस्म के सरसों के उत्पादन हेतु तापमान

नवगोल्ड किस्म के सरसों की पैदावार 20 से 25 डिग्री सेल्सियस के तापमान में की जाती है। इसकी खेती समस्त प्रकार की मृदाओं में की जा सकती है। परंतु, बलुई मृदा में इसकी बेहतरीन पैदावार होती है। इसके बीज की बुआई बीजोपचार करने के बाद ही करें, जिससे पैदावार काफी बेहतरीन होती है।

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नवगोल्ड किस्म के सरसों के उत्पादन हेतु सर्वप्रथम खेत को रोटावेटर के माध्यम से जोत लें। साथ ही, पाटा लगाकर खेत को एकसार करलें। साथ ही, इस बात का खास ख्याल रखें कि एकसार भूमि पर ही सरसों के पौधों का अच्छी तरह विकास हो पाता है।

नवगोल्ड किस्म की फसल में सिंचाई

नवगोल्ड किस्म के बीजों का निर्माण नवीन वैज्ञानिक विधि के माध्यम से किया जाता है। इस फसल को पूरी खेती की प्रक्रिया में बस एक बार ही सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। फसल में सिंचाई फूल आने के दौरान ही कर देनी चाहिए।

नवगोल्ड किस्म की खेती के लिए खाद और उर्वरक

नवगोल्ड किस्म के बीजों के लिए जैविक खाद का इस्तेमाल अच्छा माना जाता है। इसके उत्पादन के लिए गोबर के खाद का इस्तेमाल करना चाहिए। मृदा में नाइट्रोजन, पोटाश की मात्रा एवं फास्फोरस को संतुलन में रखना चाहिए।

सरसों की खेती के लिए खरपतवार का नियंत्रण

सरसों की खेती के लिए इसके खेत को समयानुसार निराई एवं गुड़ाई की जरूरत पड़ती है। बुवाई के 15 से 20 दिन उपरांत खेत में खर पतवार आने शुरू हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में आप खरपतवार नाशी पेंडामेथालिन 30 रसायन का छिड़काव मृदा में कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त यदि इसमें लगने वाले प्रमुख रोग सफ़ेद किट्ट, चूणिल, तुलासिता, आल्टरनेरिया और पत्ती झुलसा जैसे रोग लगते हैं, तो आप फसलों पर मेन्कोजेब का छिड़काव कर सकते हैं। नवगोल्ड किस्म के सरसों में सामान्य किस्म के मुकाबले अधिक तेल का उत्पादन होता है। साथ ही, इसकी खेती के लिए भी अधिक सिंचाई एवं परिश्रम की आवश्यकता नहीं पड़ती है।
कृषि वैज्ञानिकों ने विकसित की सरसों की तीन नई उन्नत किस्में, जानें इनकी खासियत

कृषि वैज्ञानिकों ने विकसित की सरसों की तीन नई उन्नत किस्में, जानें इनकी खासियत

सीएसएसआरआई (CSSRI) के कृषि वैज्ञानिकों द्वारा सोडिक मतलब कि क्षारीय भूमि इलाकों के लिए सरसों की तीन उन्नत किस्में सीएस-61, सीएस-62 और सीएस-64 विकसित की गई हैं। बतादें, कि विकसित की गई सरसों की ये तीनों किस्में कृषकों को वर्ष 2024 तक मिलेगी। भारत के किसानों को ज्यादा लाभ हांसिल कराने के लिए केंद्रीय मृदा एवं लवणता अनुसंधान संस्थान (CSSRI) ने सरसों की 3 नवीन उन्नत किस्मों को तैयार किया है। सरसों की इन तीनों बेहतरीन किस्मों से किसानों को ज्यादा उत्पादन मिलेगा। साथ ही, सरसों की इन तीनों किस्मों की खेती सोडिक अर्थात क्षारीय भूमि में भी सहजता से की जा सकेगी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वैज्ञानिकों के द्वारा विकसित की गई सरसों की तीनों प्रजातियां किसानों के हाथों में साल 2024 तक उपलब्ध हो पाऐंगी। दरअसल, हम बात कर रहे हैं, सीएस-61, सीएस-62 और सीएस-64 किस्मों के बारे में।

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किसान सरसों की इस किस्म की खेती कर बेहतरीन मुनाफा उठा सकते हैं ज्ञात हो कि इन किस्मों से पूर्व भी कृषि वैज्ञानिकों के द्वारा सरसों की कुछ लवण सहनशील किस्में सीएस-56, सीएस-58 और सीएस-60 किस्में तैयार की जा चुकी हैं, जो वर्तमान में किसानों को उपलब्ध कराई जा रही हैं। इसके साथ ही, सरसों के यह बीज कृषि विभागों व बीज संस्थानों के द्वारा बांटे जा रहे हैं।

सरसों की नवीन उन्नत किस्मों की खेती

केंद्रीय मृदा एवं लवणता अनुसंधान संस्थान में विकसित की गईं सरसों की बेहतरीन किस्में सीएस-61, सीएस-62 और सीएस-64 वैसे तो प्रत्येक इलाके में अच्छी पैदावार देंगी। परंतु, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और जम्मू, कश्मीर के क्षेत्रों में ज्यादा उपज प्रदान करेंगी। बतादें, कि इन तीनों किस्मों से किसान के खेतों में सरसों की फसल बेहतरीन ढ़ंग से लहलहाएगी। इसके अतिरिक्त बाजार में भी इसकी अच्छी-खासी कीमत मिल सकेगी।

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सरसों की इन विकसित की गई उन्नत किस्मों की खूबियां

सरसों की इन तीनों उन्नत किस्मों की खेती ऐसे इलाकों के लिए वरदान का काम करेगी, जहां की मिट्टी में सरसों की खेती नहीं हो पाती है। सरसों की सीएस-61, सीएस-62 एवं सीएस-64 किस्म को ऐसे ही क्षेत्रों के लिए तैयार किया गया है, जिन इलाकों में आज भी सरसों की पैदावार नहीं होती है। वहां के किसान भाई भी इन किस्मों की सहायता से सरसों की फसल का फायदा उठा सकें। साथ ही, सरसों की यह तीनों नवीन किस्में प्रति हेक्टेयर तकरीबन 27 से 29 क्विंटल तक उत्पादन देंगी। वहीं, सोडिक मतलब की क्षारीय जमीन में यह किस्म प्रति हेक्टेयर 21 से 23 क्विंटल पैदावार प्रदान करेगी। इसके अतिरिक्त सरसों की इन किस्मों में तेल की मात्रा लगभग 41 फीसद तक रहेगी।

भारत के किन क्षेत्रों में सरसों की खेती नहीं होती है

भारत के बहुत से राज्यों में सरसों की खेती नहीं हो पाती है। जैसे कि हरियाणा एवं पंजाब के कुछ इलाकों में सरसों का उत्पादन नहीं होता है। इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़, कौशांबी, लखनऊ, कानपुर, इटावा और हरदोई इत्यादि बहुत सारे क्षेत्रों में सरसों की खेती नहीं की जाती है। वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई सरसों की इन तीनों किस्मों से अब इन क्षेत्रों में भी सरसों की फसल लहराएगी।
रबी सीजन में सरसों की खेती के लिए ये पांच उन्नत किस्में काफी शानदार हैं

रबी सीजन में सरसों की खेती के लिए ये पांच उन्नत किस्में काफी शानदार हैं

सरसों रबी की प्रमुख फसलों में से एक है। बतादें, कि सरसों की खेती भारत के बहुत से राज्यों में प्रमुखता से की जाती है। यदि सरसों की उन्नत किस्मों की बात की जाए तो उनमें राज विजय सरसों-2, पूसा मस्टर्ड 21, पूसा सरसों आरएच 30, पूसा बोल्ड और पूसा सरसों 28 हैं। दरअसल, भारत के तकरीबन समस्त राज्यों में फसलों की बिजाई से लेकर कटाई तक सबकुछ मौसम पर आश्रित रहता है। जैसा की आप जानते हैं, कि खरीफ की फसलों की कटाई का समय चल रहा है। साथ ही, किसान रबी फसलों की बिजाई की तैयारी कर रहे हैं। वहीं, रबी फसल में बोई जाने वाली प्रमुख फसलों में आलू, मटर, सरसों, गेंहू आदि हैं। आज हम आपको सरसों की बेहतरीन किस्मों के संबंध में आपको जानकारी देंगे। सरसों की इन उन्नत किस्मों के नाम पूसा बोल्ड, पूसा सरसों 28, राज विजय सरसों-2, पूसा मस्टर्ड 21 और पूसा सरसों आरएच 30 हैं। यह सभी भारत में तिलहन के उत्पादन में सर्वाधिक पसंद की जाने वाली सरसों की किस्में हैं। ये किस्में किसानों प्रति हेक्टेयर कम लागत में ज्यादा मुनाफा देती हैं। इनका उत्पादन भी बाकी किस्मों की तुलना में ज्यादा होता है। तो चलिए सरसों की इन किस्मों के संबंध में विस्तार से जानते हैं।

सरसों की खेती के लिए 5 उन्नत किस्में

सरसों पूसा बोल्ड

सरसों पूसा बोल्ड की कटाई हेतु पकने की समयावधि 100 से 140 दिन होती है। इसकी बुवाई करने के लिए राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र एवं दिल्ली का क्षेत्र उपयुक्त माना जाता है। अगर हम इसकी प्रति हेक्टेयर पैदावार की बात करें तो यह 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पैदावार प्रदान करती है। इसके अंदर तेल की मात्रा तकरीबन 40 प्रतिशत तक होती है।

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पूसा सरसों 28

फसल पकने व कटाई की समयावधि 105 से 110 दिन होती है। इसकी बुआई हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में की जाती है। किसान भाई इससे प्रति हेक्टेयर 18 से 20 क्विंटल उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। तेल की मात्रा की बात की जाए तो तकरीबन 21 प्रतिशत तक है।

राज विजय सरसों-2

फसल पकने की समयावधि 120 से 130 दिन तक की होती है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में इसका उत्पादन किया जाता है। वहीं, इससे औसत पैदावार 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है। तेल की मात्रा तकरीबन 37 से 40 प्रतिशत तक होती है।

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पूसा सरसों आर एच 30

सरसों की इस किस्म की फसल को पकने में लगभग 130 से 135 दिनों का समय लगता है। इस किस्म की बुआई का इलाका हरियाणा, पंजाब एवं पश्चिमी राजस्थान होता है। वहीं, अगर हम प्रति हेक्टेयर की बात करें तो वह 16 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होता है। अगर हम इसके अंदर तेल की मात्रा की बात करें तो वह लगभग 39 प्रतिशत तक होती है।

पूसा मस्टर्ड 21

इस किस्म की फसल के पकने की समयवधि 137 से 152 दिनों के लगभग होती है। बतादें, कि पंजाब, राजस्थान और दिल्ली में प्रमुख तौर पर इसका उत्पादन किया जा सकता है। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि इससे प्रति हेक्टेयर 18 से 21 क्विंटल उत्पादन लिया जा सकता है। इस किस्म की सरसों से तेल की मात्रा की बात करें तो वह करीब 37 से 40 प्रतिशत तक होती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुवांशिकी संस्थान के मुताबिक इन इलाकों के किसान यदि ज्यादा उत्पादन चाहते हैं, तो सरसों की ये किस्में कृषकों के लिए मुनाफे का सौदा साबित हो सकती हैं। ये समस्त किस्में प्रति हेक्टेयर अधिक उत्पादन के साथ में अधिक प्रतिशत तेल की मात्रा पैदा करती हैं।
GM Mustard: आखिर जीएम सरसों क्या है और इसके क्या फायदे हैं ?

GM Mustard: आखिर जीएम सरसों क्या है और इसके क्या फायदे हैं ?

भारत में तेल का आयात काफी बड़ी मात्रा में किया जाता है। भारत सरकार की तरफ से जीएम सरसों की व्यवसायिक की खेती को मंजूरी दिए जानें के बाद इस पर विवाद जारी है। भारत में आजकल जीएम सरसों (जेनेटिकली मॉडिफाइड सरसों) की व्यवसायिक खेती पर काफी बहस छिड़ी हुई है। केंद्र सरकार द्वारा इसकी व्यवसायिक खेती को स्वीकृति दिए जानें के उपरांत इस पर विवाद जारी है। बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट में इस पर बहस भी हुई। परंतु, यहां जानने वाली बात यह है, कि अंततः जीएम सरसों पर विवाद क्यों छिड़ा है।

आखिर जीएम सरसों क्या है और इसके क्या फायदें हैं ? दरअसल, ये विवाद तब आरंभ हुआ था जब विगत वर्ष केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के बायोटेक नियामक जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी ने जीएम सरसों की व्यवसायिक खेती को स्वीकृति दी थी। समिति के इस निर्णय के बाद बहुत सारे किसान समूहों, एजीओ और पर्यावरण से संबंधित संगठनों ने इसका काफी विरोध किया था। इसके बाद ये मामला कोर्ट जा पहुंचा था।

इसके खिलाफ मोर्चा में खड़े संगठनों का क्या कहना है ?

अब जहां एक तरफ इसके विरुद्ध खड़े संगठनों का कहना है, कि भारत में जीएम सरसों के इस्तेमाल के चलते खेती को काफी हानि पहुंचेगी। साथ ही, विशेषज्ञों के मुताबिक, इससे उत्पादकता में बढ़ोतरी होगी और कृषकों को इससे काफी लाभ होगा। विशेषज्ञों का ये भी कहना है, कि बहुत सारे देशों में इसकी खेती सफल ढ़ंग से की जा रही है। ऐसी स्थिति में यदि भारत भी इसे अपनाता है, तो आगामी समय में इसके बहुत सारे लाभ होंगे। परंतु, इससे कृषकों का क्या लाभ होगा ?

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जीएम सरसों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी 

जेनेटिकली मॉडिफाइड सरसों (जीएम सरसों), सरसों की एक प्रजाति है, जिसको पौधों की दो भिन्न-भिन्न किस्मों को मिलाकर निर्मित किया गया है। इसका मतलब यह है, कि यह एक हाइब्रिड प्रजाति है, जिसे लैब में निर्मित किया गया है। इसमें रोग लगने की संभावना काफी कम होते हैं। साथ ही, इसका उत्पादन भी अधिक रहता है। अब ऐसी क्रॉसिंग से मिलने वाली फर्स्ट जेनरेशन हाइब्रिड प्रजाति की उपज मूल किस्मों से अधिक होने की संभावना रहती है। हालांकि, सरसों के साथ ऐसा करना सहज नहीं था। इसकी वजह यह है, कि इसके फूलों में नर और मादा, दोनों रीप्रोडक्टिव ऑर्गन होते हैं। मतलब कि सरसों का पौधा काफी हद तक स्वयं ही पोलिनेशन कर लेता है। किसी दूसरे पौधे से परागण की आवश्यकता नहीं होती है। ऐसे में मक्का, टमाटर अथवा कपास की भांति सरसों की हाइब्रिड किस्म निर्मित करने का अवसर काफी कम हो जाता है।

जीएम सरसों का उत्पादन करने के विभिन्न लाभ 

उत्पादकता में वृद्धि: समर्थकों का यह तर्क है, कि जीएम सरसों, विशेष रूप से धारा सरसों हाइब्रिड (डीएमएच-11) में सरसों की फसल की उत्पादकता में उल्लेखनीय विकास करने की क्षमता है। इस वजह से वर्तमान में भारत के अंदर सरसों की खेती देखने को सामने आ रही है। कम उत्पादकता की समस्या से निपटने में सहायता मिल सकती है।

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आयात निर्भरता में कमी: भारत बड़ी मात्रा में खाद्य तेलों का आयात करता है और जीएम सरसों घरेलू सरसों तेल उत्पादन को बढ़ाकर इस निर्भरता को कम कर सकती है। इससे संभावित रूप से विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है और खाद्य तेल उत्पादन में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिल सकता है। 

फसल सुरक्षा: आनुवांशिक संशोधन कीटों एवं बीमारियों के प्रति प्रतिरोध अदा कर सकता है, जिससे रासायनिक कीटनाशकों की जरूरतें कम हो जाती हैं। इससे पर्यावरण के अनुकूल एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहन मिल सकता है।

तिल की खेती से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी

तिल की खेती से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी

भारत के अंदर तिल की खेती मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु,महाराष्ट्र, कर्नाटक और राजस्थान में की जाती हैI भारत के कुल उत्पादन का 20 फीसद उत्पादन केवल गुजरात से होता है I उत्तर प्रदेश में तिल की खेती विशेषकर बुंदेलखंड के राकर जमीन में और फतेहपुर, आगरा, मैनपुरी, मिर्जापुर, सोनभद्र, कानपुर और इलाहाबाद में शुद्ध और मिश्रित तौर पर की जाती है I तिल की पैदावार काफी हद तक कम है, सघन पद्धतियाँ अपनाकर उपज को बढाया जा सकता है I तकनीकी तरीको से तिल की खेती करने पर तिल की उपज 7 से 8 कुन्तल प्रति हेक्टेयर तक होती है I

तिल की खेती के लिए कैसी जलवायु एवं मृदा उपयुक्त है

तिल की खेती से अच्छी उपज लेने के लिए शीतोषण जलवायु उपयुक्त मानी जाती है। विशेषकर बरसात अथवा खरीफ में इसकी खेती की जाती है। दरअसल, अत्यधिक वर्षा अथवा सूखा पड़ने पर फसल बेहतर नहीं होती है I इसके लिए हल्की जमीन और दोमट भूमि अच्छी होती है I यह फसल पी एच 5.5 से 8.2 तक की भूमि में उगाई जा सकती है I फिर भी यह फसल बलुई दोमट से काली मृदा में भी उत्पादित की जाती है I तिल की विभिन्न प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जैसे कि बी.63, टाईप 4, टाईप12, टाईप13, टाईप 78, शेखर, प्रगति, तरुण और कृष्णा प्रजातियाँ हैं।

तिल की खेती के लिए जमीन की तैयारी और बिजाई कैसे करें

खेत की तैयारी करने के लिए प्रथम जुताई मृदा पलटने वाले हल से एवं दो-तीन जुताई कल्टीवेटर या फिर देशी हल से करके खेत में पाटा लगा भुरभुरा बना लेना चाहिए I इसके पश्चात ही बुवाई करनी चाहिए I 80 से 100 कुंतल सड़ी गोबर की खाद को अंतिम जुताई में मिश्रित कर देना चाहिए। यह भी पढ़ें: तिल की खेती से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी तिल की बिजाई करने हेतु जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई का दूसरा पखवारा माना जाता है I तिल की बिजाई हल के पीछे कतार से कतार 30 से 45 सेंटीमीटर की दूरी पर बीज को कम गहरे रोपे जाते हैं I तिल की बिजाई हेतु एक हेक्टेयर भूमि के लिए तीन से चार किलोग्राम बीज उपयुक्त होता है I बीज जनित रोगों से संरक्षण के लिए 2.5 ग्राम थीरम या कैप्टान प्रति किलोग्राम बीज की दर से शोधन करना चाहिए I तिल की बुवाई का उचित समय जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई का दूसरा पखवारा माना जाता हैI तिल की बुवाई हल के पीछे लाइन से लाइन 30 से 45 सेंटीमीटर की दूरी पर बीज को कम गहराई पर करते हैI

पोषण प्रबंधन कब करें

उर्वरकों का इस्तेमाल भूमि परीक्षण के आधार पर होना चाहिए I 80 से 100 कुंतल सड़ी गोबर की खाद खेत तैयारी करने के दौरान अंतिम जुताई में मिला देनी चाहिए। इसके साथ-साथ 30 किलोग्राम नत्रजन, 15 किलोग्राम फास्फोरस और 25 किलोग्राम गंधक प्रति हेक्टेयर इस्तेमाल करना चाहिए I रकार और भूड भूमि में 15 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर इस्तेमाल करना चाहिए I नत्रजन की आधी मात्रा और फास्फोरस,पोटाश व गंधक की भरपूर मात्रा बिजाई के दौरान बेसल ड्रेसिंग में और नत्रजन की आधी मात्रा पहली ही निराई-गुडाई के समय खड़ी फसल में देनी चाहिए।

तिल की खेती के लिए सिंचाई प्रबंधन कैसे किया जाए

सिंचाई प्रबंधन तिल की फसल में कब होना चाहिए किस प्रकार होना चाहिए इस बारे में बताईये? वर्षा ऋतू की फसल होने के कारण सिंचाई की कम आवश्यकता पड़ती हैI यदि पानी न बरसे तो आवश्यकतानुसार सिंचाई करनी चाहिएI फसल में 50 से 60 प्रतिशत फलत होने पर एक सिंचाई करना आवश्यक हैI यदि पानी न बरसे तो सिंचाई करना आवश्यक होता हैI यह भी पढ़ें: सिंचाई समस्या पर राज्य सरकार का प्रहार, इस योजना के तहत 80% प्रतिशत अनुदान देगी सरकार

तिल की खेती में निराई-गुडाई

किसान भाईयो प्रथम निराई-गुडाई बुवाई के 15 से 20 दिन बाद दूसरी 30 से 35 दिन बाद करनी चाहिएI निराई-गुडाई करते समय थिनिंग या विरलीकरण करके पौधों के आपस की दूरी 10 से 12 सेंटीमीटर कर देनी चाहिएI खरपतवार नियंत्रण हेतु एलाक्लोर50 ई.सी. 1.25 लीटर प्रति हेक्टेयर बुवाई के बाद दो-तीन दिन के अन्दर प्रयोग करना चाहिएI

तिल की खेती के लिए रोग नियंत्रण

इसमें तिल की फिलोड़ी और फाईटोप्थोरा झुलसा रोग लगते हैं। फिलोड़ी की रोकथाम के लिए बुवाई के दौरान कूंड में 10जी. 15 किलोग्राम अथवा मिथायल-ओ-डिमेटान 25 ई.सी 1 लीटर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए। फाईटोप्थोरा झुलसा की रोकथाम करने के लिए 3 किलोग्राम कापर आक्सीक्लोराइड अथवा मैन्कोजेब 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से जरूरत के अनुसार दो-तीन बार छिड़काव करना चाहिए I यह भी पढ़ें: इस फसल को बंजर खेत में बोएं: मुनाफा उगाएं – काला तिल (Black Sesame)

तिल की खेती में कीट प्रबंधन

तिल में पत्ती लपेटक और फली बेधक कीट लग जाते हैं I इन कीटों की रोकथाम करने के लिए क्यूनालफास 25 ई.सी. 1.25 लीटर या मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए I

तिल की कटाई एवं मड़ाई

तिल की पत्तियां जब पीली होकर झड़ने लगें एवं पत्तियां हरा रंग लिए हुए पीली हो जाएं तब समझ जाना चाहिए कि फसल पककर तैयार हो चुकी है I इसके पश्चात कटाई नीचे से पेड़ सहित करनी चाहिए I कटाई के पश्चात बण्डल बनाके खेत में ही भिन्न-भिन्न स्थानों पर छोटे-छोटे ढेर में खड़े कर देना चाहिए I जब बेहतर ढ़ंग से पौधे सूख जाएं तब डंडे छड़ आदि की मदद से पौधों को पीटकर अथवा हल्का झाड़कर बीज निकाल लेना चाहिए I