मशरूम की खेती ने किसान संतोष की जिंदगी बदल डाली

Published on: 03-Dec-2023

ओडिशा में पुरी जनपद के पिपली शहर में, संतोष मिश्रा का कलिंगा मशरूम केंद्र उनके अथक व कठोर मेहनत एवं लगन का एक नतीजा है। दंडमुकुंदपुर गांव के बीजेबी कॉलेज से ग्रेजुएट संतोष ने इलाके में मशरूम की खेती में क्रांति लाकर रख दी है। हालांकि, संतोष का सफर काफी चुनौतियों से भरा हुआ था, परंतु उन्होंने बिल्कुल हार नहीं मानी।  भारतीय रसोई में मशरूम की मांग काफी तीव्रता से बढ़ रही है। यही वजह है, कि ज्यादातर किसान भाई पारंपरिक फसलों के साथ-साथ मशरूम की खेती की  तरफ भी रुझान कर रहे हैं। हालाँकि, संपूर्ण विश्व में मशरूम की 2000 से ज्यादा किस्में पाई जाती हैं। परंतु, मशरूम की कुछ किस्मों की खपत भारत में सर्वाधिक होती है। वहीं, दूसरी तरफ किसान भिन्न-भिन्न किस्मों के मशरूम की खेती कर काफी शानदार मुनाफा हांसिल कर रहे हैं। सिर्फ इतना ही नहीं बहुत सारे किसान अपने साथ-साथ अन्य कृषकों के भी हित में लगे हुए हैं। ऐसी स्थिति में आज हम एक ऐसे सफल कृषक के संबंध में चर्चा करेंगे जो न केवल स्वयं बल्कि अन्य दूसरे कृषकों के लिए भी ट्रेनिंग देकर सफल बनाने का प्रयास कर रहा है। 

संतोष ने मशरूम की खेती में क्रांति लाकर रख दी है 

ओडिशा में पुरी जनपद के पिपली शहर में संतोष मिश्रा का कलिंगा मशरूम केंद्र उनके परिश्रम और प्रयासों का एक परिणाम है। दंडमुकुंदपुर गांव के बीजेबी कॉलेज से ग्रेजुएट संतोष ने क्षेत्र में मशरूम की खेती में क्रांति लाकर रख दी है। हालांकि, संतोष का सफर चुनौतियों से घिरा हुआ था, परंतु उन्होंने कभी हार नहीं मानी। ग्रेजुएशन के दौरान पढ़ाई में शानदार होने के बावजूद संतोष मिश्रा उच्च शिक्षा अर्जित नहीं कर पाए। 

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सन 1989 में मशरूम खेती के प्रशिक्षण में हिस्सा लिया था 

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि उन्होंने 1989 में भुवनेश्वर में ओडिशा कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (ओयूएटी) में मशरूम खेती प्रशिक्षण कार्यक्रम में  हिस्सा लिया। अपने मीडिया साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि उस वक्त उनके पास अपनी बचत के 36 रुपये थे, जिससे उन्होंने ओयूएटी से ऑयस्टर मशरूम स्पॉन (बीज) की चार बोतलें खरीदीं थी।  

संतोष प्रति दिन 5,000 बोतल स्पॉन उत्पादन करते हैं  

संतोष ने मशरूम की खेती एवं स्पॉन उत्पादन के लिए एक भिन्न विधि तैयार की और तब से उन्होंने आज तक पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने अपने गांव में एक स्पॉन उत्पादन-सह-प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किया है। जहां वह दो किस्मों के बीज उत्पन्न करते हैं। एक धान के भूसे वाला मशरूम (वोल्वेरिएला वोल्वेसी) और दूसरा ऑयस्टर  मशरूम। वह कलिंगा मशरूम के बीज ओडिशा, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, असम और पांडिचेरी के लोगों को 15 रुपये प्रति बोतल के भाव से बेचते हैं। उनकी प्रतिदिन 5,000 बोतल स्पॉन उत्पादन करने की क्षमता है। साथ ही, वर्तमान में वह प्रतिदिन 2,000 बोतल (30,000 रुपये) का उत्पादन कर रहे हैं। संतोष फिलहाल मशरूम का इस्तेमाल करके मूल्यवर्धित उत्पाद बनाने की योजना तैयार कर रहे हैं।

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मशरूम से ये विभिन्न उत्पाद निर्मित किए जा रहे हैं

इस प्रशिक्षण केंद्र में वह पहले से ही अचार, पापड़, वड़ी (सूखे पकौड़े) एवं सूप पाउडर तैयार करने के लिए मशरूम का प्रसंस्करण कर रहे हैं। फिलहाल प्रशिक्षण केंद्र में ऑयस्टर मशरूम को मशीन में सुखाकर पाउडर निर्मित किया जाता है। इस पाउडर का इस्तेमाल पकौड़े, वड़ी, पापड़, अचार, चपाती (गेहूं के आटे के साथ मिश्रित), चीनी मुक्त बिस्कुट एवं स्नैक्स तैयार करने के लिए किया जा सकता है। अपने कार्य के लिए संतोष को 2005 में राज्य पुरस्कार मिला एवं 2011 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) द्वारा सम्मानित किया गया था। उन्हें 2013 में गुजरात शिखर सम्मेलन में वैश्विक कृषि पुरस्कार मिला एवं उसके पश्चात 2021 में ओडिशा नागरिक पुरस्कार हांसिल हुआ। 

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