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फसल की कटाई

गेहूं की फसल का समय पर अच्छा प्रबंधन करके कैसे किसान अच्छी पैदावार ले सकते हैं।

गेहूं की फसल का समय पर अच्छा प्रबंधन करके कैसे किसान अच्छी पैदावार ले सकते हैं।

गेहूं जैसा कि हम जानते हैं, विश्व में सबसे ज्यादा उगाई जाने वाली अनाज की फसल है। गेंहू विश्व में उत्पादन और सबसे अधिक उगाया जाता है, इसलिए गेहूं को फसलों का राजा कहा जाता है। गेहूं किसी भी अन्य अनाज की तुलना में मिट्टी और जलवायु की अधिक विविधता में खेती करने में सक्षम है और रोटी बनाने, ब्रेड बनाने, मैक्रोनी बनाने और बहुत रूप में उपयोग के लिए भी बेहतर अनुकूल है। गेहूं में एक ग्लूटेन नाम का प्रोटीन जो बेकिंग के लिए आवश्यक होता है। इसलिए ये बेकरी प्रोडक्ट्स बनने के लिए उपयोगी है। हमारे भारत में गेहूं की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। सबसे ज्यादा गेहूं की फसल की खेती उत्तरप्रदेश, हरियाणा और पंजाब में की जाती है। प्रति एकड़ की पैदावार पंजाब में सबसे अधिक है, क्योंकि पंजाब में 100% पानी आधारित खेती होती है।उत्पादन की बात की जाए तो हमें बढ़ती आबादी को देखते हुए 2025 तक गेहूं की मांग को पूरा करने के लिए 117 मिलियन टन गेहूं के उत्पादन करना होगा। इसके लिए हमें उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल करके गेहूं की पैदावार को ज्यादा करना होगा।

खरीफ की फसल की कटाई के बाद कैसे करें जमीन तैयार

खरीफ की फसल कटाई के बाद हमें अपने खेत को हैरो, कल्टीवेटर या रोटावेटर चलाकर अच्छी तरह से जोतना है ताकि भूमि में पिछली फसल के अवशेष खतम हो जाएं। इस के बाद हमें अपने खेत में गोबर की खाद डाल देनी है और, एक बार और हैरो चला देनी है जिस से गोबर की खाद मिट्टी में अच्छी तरह से मिल जाए। गेहूं की फसल बोने से पहले हमें मिट्टी में नमी भी देखनी है, अगर मिट्टी में सही नमी न हो तो हमें खेत में सिंचाई करनी चाहिए ताकि फसल की उपज अच्छी हो। गेहूं की फसल में सीड़ बेड समतल और प्लेन होना चाहिये। गेहूं की फसल में ग्रोथ के लिए 20-25 डिग्री सेल्सियस तापमान चाहिये। गेहूं की फसल के लिए काली या दोमट मिट्टी अच्छी पैदावार देती है और मिट्टी का pH मान 5-7 होना चाहिए।

पोषण व्यवस्था कैसे करें

सब से पहले हमें खेत की मिट्टी की जांच करनी है, उस के आधार पर हमें अपने खेत में पोषण तत्व देने हैं। गेहूं की फसल को 40-50 किलो नाइट्रोजन, 25-30 किलो फॉस्फोरस,15-20 किलो पोटास और 10 किलो जिंक और 10 किलो सल्फर डालने से अच्छी पैदावार होती है।

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नाइट्रोजन की आधी मात्रा, फास्फोरस, पोटाश व जिंक और सल्फर की पूरी मात्रा तथा गोबर की खाद की पूरी मात्रा खेत तैयार करते समय या अंतिम जुताई के समय खेत में मिला देनी चाहिए। कई बार खड़ी फसल में जिंक की कमी दिखने पर इस का स्प्रे भी कर सकते हैं। नाइट्रोजन की शेष मात्रा को दो भागों में बांटकर पहली सिंचाई 20-25 दिन बाद एवं दूसरी 40-45 दिन के बाद प्रयोग करें।

बिजाई का उत्तम समय और बीज की मात्रा

नवंबर महीने की 15 - 25 तारीख तक बिजायी का उत्तम समय होता है। 25 नवंबर के बाद हम पछेती किस्मों की बिजाई कर सकते हैं। पछेती बिजाई पर बीज और उर्वरक की मात्रा थोड़ी ज्यादा डालनी पड़ती है, जिससे पछेती फसल की भी अच्छी पैदावार हो सकती है। एक अकड़ के लिए 40 किलो बीज पर्याप्त होता है। कम पानी वाली इलाके में 50 किलो बीज प्रति एकड़ और पछेती बिजाई पर भी 20 किलो बीज सामान्य से ज्यादा लगता है। पौधे से पौधे की दुरी 8 -10 CM होनी चाहिये और कतार से कतार की दूरी 22. 5 CM होनी चाइए। बीज 4 से 5 CM मिट्टी की गहराई में डालना चाहिए। इन नई किस्मों, जिन्हें DBW-316, DBW-55, DBW-370, DBW-371 और DBW-372 नाम दिया गया है। भारतीय कृषि परिषद की गेहूं और जौ की प्रजाति पहचान समिति द्वारा अनुमोदित किया गया है। इन किस्मो का चुनाव कर के किसान अच्छी पैदावार ले सकते है।

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सिचाई प्रबंधन

फसल में हल्की मिट्टी में करीब 6 सेंटीमीटर की गहराई तक सिंचाई करनी चाहिए। वहीं दोमट मिट्टी में करीब 8 सेंटीमीटर की गहराई तक सिंचाई करनी चाहिए। अगर हमारी जमीन में पर्याप्त जल उपलब्ध है, तो हमें फसल में 5 से 6 बार सिंचाई करनी चाहिए। सिचाई की अवधियाँ इस प्रकार हैं। पहली सिंचाई मुख्य जड़ विकास (CROWN ROOT INITATION ) - 21 -25 दिन की हो जाने पर फसल में सिंचाई करना बहुत आवश्यक है। इस स्टेज पर फसल में सिंचाई करना बहुत आवश्यक है, क्योंकि इस स्टेज के नाम से ही पता चल रहा है कि 21 दिन बाद फसल में नई जड़ का विकास होता है। अगर इस समय पर फसल को पानी नहीं मिलता है तो फसल की पैदावार बिल्कुल घट जाती है। इस लिए कई स्थानों पर जहाँ पानी की कमी है, केवल एक सिंचाई संभव है, तो किसान इस स्टेज की फसल की सिंचाई अवश्य करनी चाहिए। दूसरी सिंचाई 40 -45 दिन की फसल हो जाने पर करनी चाहिए। इस समय फसल में टिलर्स बनते हैं, यानि की फसल में फुटाव होता है। तीसरी सिंचाई 60- 65 दिन पर करनी होती है। इस समय फसल पर गेहू का विकास बिंदु भूमि की सतह से ऊपर जाता है और फसल का पूर्ण विकास होता है। चोथी सिंचाई 80 -85 दिन बाद करते हैं। इस समय पर फसल में बालियाँ बननी शुरू हो जाती हैं। इस को बूट चरण भी बोलते हैं, तब शुरू होता है जब फ्लैग लीफ के अंदर बालियाँ बनने लगती हैं । दुग्ध विकास चरण 100 - 105 दिन बाद सिंचाई करते हैं। ये फूल आने के पूरा होने के बाद शुरू होता है और प्रारंभिक गठन चरण होता है। इसे अर्ली, मीडियम और लेट मिल्क में बांटा गया है। विकासशील एंडोस्पर्म एक दूधिया तरल पदार्थ के रूप में शुरू होता है, जो बाद में दाने बन जाते हैं। इस समय पर फसल में पानी देने से दाने मोटे हो जाते हैं, जिससे फसल की पैदावार बढ़ जाती है।

फसल में खरपतवार नियंत्रण

सब से पहले हमें अपने खेत का निरीक्षण करके देखना है, कि हमारे खेत में किस प्रकार के खरपतवार हैं। फिर उस आधार पर हमें दवा का छिड़काव करना है। डोज के आधार पर ही हमें खेत में दवा का छिड़काव करना है। रेकमेंडेड डोज से ज्यादा अगर किसी भी खरपतवार नाशी का प्रयोग किया जाये तो वो फसल को भी जला सकते हैं।

संकरी पत्ती वाले खरपतवार

मंडूसी अथवा गुल्ली डंडा अथवा गेहूं का मामा खरपतवार और जंगली जई को मारने के लिए खरपतवार नासी स्ल्फोसफल्फ्यूरान या क्लोनिडाफाप प्रोपेरजिल 15 प्रतिशत डब्ल्यूपी 400 ग्राम प्रति एकड़ को पानी में घोलकर छिड़काव करें। मेटासुलफूरों 2 किलो डब्ल्यूपी का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार

बथुआ, जंगली पालक, मोथा के लिए टू फोर डी सोडियम साल्ट 80 प्रतिशत दवा आती है। 250 एमएल दवा एक एकड़ एवं 625 एमएल प्रति हैक्टेयर के लिए उपोग मे लाएं। पानी में मिलाकर 400 से 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करने से तीन दिन में चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार मर जाते हैं। टू फोर डी ईस्टर साल्ट का प्रयोग भी फसल के 30 - 35 दिन बाद की हो जाने पर करना चाहिये नहीं तो फसल में ग्रेन मलफोर्मेशन की दिक्क्त आ सकती है।

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फसल में रोग प्रबंधन

पूर्ण रतुआ /भूरा रतुआ रोग का पहला लक्षण पत्तियों पर अनियमित रूप से सूक्ष्म, गोल, नारंगी छोटे छोटे गोल दभ्भे का दिखना है। पत्तियों में गंभीर जंग लगने से उपज में कमी आती है, रोग आमतौर पर जनवरी के दूसरे पखवाड़े या फरवरी के पहले सप्ताह में प्रकट होता है। रोग इष्टतम 15-2oC के साथ 2-35oC के तापमान रेंज में दिखायी दे सकता है।

धारीदार रतुआ या पीला रतुआ

रोग मुख्य रूप से पत्तियों पर दिखायी देता है, हालांकि पत्ती के आवरण, डंठल और बालियां भी प्रभावित हो सकती हैं। नींबू के पीले रंग के छोटे-छोटे दाने लंबी पंक्तियों में व्यवस्थित होते हैं, जो धारियों का पैटर्न देते हैं। जो पर्यावरणीय परिस्थितियों के आधार पर दिसंबर या मध्य जनवरी के अंतिम सप्ताह में दिखायी देते हैं। बाद के चरणों में पत्तियों की निचली सतह पर फीकी काली धारियाँ बन जाती हैं। प्रभावित पौधों में दाने हल्के और सिकुड़े हुए हो जाते हैं, जिससे उपज में भारी कमी आती है।

काला रतुआ

रतुआ संक्रमण का पहला लक्षण पत्तियों, पर्णच्छदों, कल्मों और फूलों की संरचनाओं का छिलना है। ये धब्बे जल्द ही आयताकार, लाल-भूरे रंग के रूप में विकसित हो जाते हैं। जब बड़ी संख्या में स्पोर्स फटते हैं और अपने बीजाणु छोड़ते हैं, तो पूरी पत्ती का ब्लेड और अन्य प्रभावित हिस्से दूर से भी भूरे रंग के दिखाई देंगे।

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तीनों रतुआ का उपाय :

  • देर से बुआई करने से बचें।
  • नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों का संतुलित प्रयोग करें।
  • प्लांटवैक्स @ 0.1% के साथ बीज ड्रेसिंग के बाद एक ही रसायन के साथ दो छिड़काव।
  • 15 दिनों के अंतराल पर जिनेब @ 0.25% या मैनकोजेब @ 0.25% या प्लांटावैक्स @ 0.1% के साथ दो या तीन बार छिड़काव करें।
  • रोग के लक्षण दिखाई देते ही 200 मिली. प्रोपीकोनेजोल 25 ई.सी. या पायराक्लोट्ररोबिन प्रति लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव करें।
  • रोग के प्रकोप और फैलाव को देखते हुए दूसरा छिड़काव 10-15 दिन के अंतराल में करें।

करनाल बंट

खेत में करनाल बंट के लक्षणों को पहचानना अक्सर मुश्किल होता है, क्योंकि किसी दिए गए सिर पर संक्रमित गुठली की घटना कम होती है। लक्षण कटाई के बाद बीज पर सबसे आसानी से पाए जाते हैं।

लूज स्मट

यह रोग आंतरिक रूप से संक्रमित बीज से पैदा होता है तथा संक्रमित बीज ऊपर से देखने में बिल्कुल स्वस्थ बीजों की तरह ही दिखाई देता है। इस रोग से प्रति वर्ष उत्तर भारत में गेहूं की उपज में 1-2 प्रतिशत की हानि होती है। बुवाई से पहले बीज को वीटावैक्स 2 ग्राम प्रति किलो बीज से उपचारित करें। संक्रमित कानों को मिट्टी के अंदर दबा दें |
फसल उत्पादकता को बढ़ाने के लिए मई माह में कृषि से संबंधित महत्वपूर्ण कार्य

फसल उत्पादकता को बढ़ाने के लिए मई माह में कृषि से संबंधित महत्वपूर्ण कार्य

कृषि में अच्छी उत्पादकता के लिए कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना होता है। सबसे पहले जुताई किसी भी फसल की खेती के लिए सर्वप्रथम कार्य है। 

फसल की पैदावार खेत की जुताई पर आश्रित होती है। क्योंकि, अब रबी फसलों की कटाई का कार्य तकरीबन पूर्ण हो चुका है। 

अब ऐसे में किसान खरीफ सीजन की खेती की तैयारियों में जुट गए हैं। रबी फसल की कटाई के पश्चात खेत बिल्कुल खाली हो जाते हैं।

परंतु, खरीफ सीजन की खेती शुरू करने से पहले किसानों को ग्रीष्मकालीन जुताई अवश्य कर लेनी चाहिए। जमीन की उर्वरता को बढ़ाने के लिए ये काफी जरूरी है। 

इससे फसल उपज में काफी लाभ मिलता है। जानिए जुताई क्यों आवश्यक है। रबी फसल की कटाई के पश्चात खेत खाली हो जाते हैं। 

वहीं, गर्मी में खाली खेत पानी की कमी की वजह से सख्त हो जाते हैं, जिससे बचने के लिए खेत की ग्रीष्मकालीन जुताई अत्यंत आवश्यक है। कृषि वैज्ञानिकों की मानें तो खेत में केमिकल फर्टिलाइजेशन से भूमि के 6 इंच तक मृदा सख्त हो जाती है।

खरीफ के सीजन में कल्टीवेटर से जुताई करने पर खेत में 3 इंच तक ही जुताई हो पाती है। इससे खेत की कड़ी मिट्‌टी टूटती नहीं और जड़ों का विकास नहीं हो पाता है। इसके लिए कृषकों को गर्मी के मौसम में एक बार ग्रीष्मकालीन जुताई करनी अत्यंत आवश्यक है।

किस महीने में ग्रीष्मकालीन जुताई करनी चाहिए

ग्रीष्मकालीन जुताई करने का सबसे अनुकूल वक्त मई माह होता है। इस मौसम में तापमान काफी ज्यादा होता है। इस दौरान जमीन के अंदर कीड़े मकोड़े घर बना लेते हैं। 

साथ ही, जुताई करने से मृदा पलटती है, जिससे कीड़ों के साथ उनके अंडे और घर चौपट हो जाते हैं। इससे वो आगे खरीफ की फसल को हानि नहीं पहुंचा पाते। साथ-साथ जुताई के पश्चात मृदा के अंदर हवा का संचार होता है।

ग्रीष्मकालीन जुताई कितनी गहराई तक करनी चाहिए ?

ग्रीष्मकालीन जुताई जमीन में 6 इंच तक करनी आवश्यक है। बतादें, कि किसी भी फसल के जड़ का विकास 6 से 9 इंच तक होगा, जिससे फसल अच्छी तरह तैयार होती है। 

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इसके लिए किसान ट्रैक्टर के साथ दो हल वाले एमपी फ्लाई, डिस फ्लाई, क्यूचिजन फ्लाई मशीन के हल का उपयोग कर सकते हैं। इससे खेत में 6 इंच तक गहरी जुताई हो जाती है। जुताई करने पर बारिश होने के बाद खेत में पानी ठहरता है, जिससे मृदा में नमी बनी रहती है।

ग्रीष्मकालीन जुताई के क्या-क्या फायदे हैं ?

ग्रीष्मकालीन जुताई से मृदा में कार्बनिक पदार्थों की वृद्धि होती है। मिट्टी के पलट जाने से जलवायु का असर सुचारू रूप से मृदा में होने वाली प्रतिक्रियाओं पर पड़ता है। 

वहीं, वायु और सूर्य के प्रकाश की मदद से मिट्टी में विद्यमान खनिज ज्यादा सुगमता से पौधे के भोजन में परिणित हो जाते हैं। 

ग्रीष्मकालीन जुताई कीट एवं रोग नियंत्रण में सहायक है। हानिकारक कीड़े तथा रोगों के रोगकारक भूमि की सतह पर आ जाते हैं और तेज धूप से खत्म हो जाते हैं।

ग्रीष्मकालीन जुताई मृदा में जीवाणु की सक्रियता को काफी बढ़ाती है। यह दलहनी फसलों के लिए भी काफी ज्यादा उपयोगी है। ग्रीष्मकालीन जुताई खरपतवार नियंत्रण में भी मददगार है। 

कांस, मोथा आदि के उखड़े हुए हिस्सों को खेत से बाहर फेंक देते हैं। अन्य खरपतवार उखड़ कर सूख जाते हैं। खरपतवारों के बीज गर्मी व धूप से नष्ट हो जाते हैं।

बारानी खेती वर्षा पर निर्भर करती है अत: बारानी परिस्थितियों में वर्षा के पानी का अधिकतम संचयन करने लिए ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करना नितान्त आवश्यक है। 

अनुसंधानों से भी यह साफ हो चुका है, कि ग्रीष्मकालीन जुताई करने से 31.3 प्रतिशत बरसात का पानी खेत में समा जाता है। ग्रीष्मकालीन जुताई करने से बरसात के पानी द्वारा खेत की मिट्टी कटाव में भारी कमी होती है।

अर्थात् अनुसंधान के परिणामों में यह पाया गया है कि गर्मी की जुताई करने से भूमि के कटाव में 66.5 फीसद तक की कमी आती है। 

ग्रीष्मकालीन जुताई से गोबर की खाद व अन्य कार्बनिक पदार्थ जमीन में बेहतर तरीके से मिल जाते हैं, जिससे पोषक तत्व जल्द ही फसलों को उपलब्ध हो जाते हैं।

कटाई के बाद अप्रैल माह में खेत की तैयारी (खाद, जुताई ..)

कटाई के बाद अप्रैल माह में खेत की तैयारी (खाद, जुताई ..)

किसान फसल की कटाई के बाद अपने खेत को किस तरह से तैयार करता है? खाद और जुताई के ज़रिए, कुछ ऐसी प्रक्रिया है जो किसान अपने खेत के लिए अप्रैल के महीनों में शुरू करता है वह प्रतिक्रियाएं निम्न प्रकार हैं: 

कटाई के बाद अप्रैल (April) महीने में खेत को तैयार करना:

इस महीने में रबी की फसल तैयार होती है वहीं दूसरी तरफ किसान अपनी जायद फसलों की  तैयारी में लगे होते हैं। किसान इस फसलों को तेज तापमान और तेज  चलने वाली हवाओ से अपनी फसलों को  बचाए रखते हैं तथा इसकी अच्छी देखभाल में जुटे रहते हैं। किसान खेत में निराई गुड़ाई के बाद फसलों में सही मात्रा में उर्वरक डालना आवश्यक होता है। निराई गुड़ाई करना बहुत आवश्यक होता है, क्योंकि कई बार सिंचाई करने के बाद खेतों में कुछ जड़े उगना शुरू हो जाती है जो खेतों के लिए अच्छा नही होता है। इसीलिए उन जड़ों को उखाड़ देना चाहिए , ताकि खेतों में फसलों की अच्छे बुवाई हो सके। इस तरह से खेत की तैयारी जरूर करें। 

खेतों की मिट्टी की जांच समय से कराएं:

mitti ki janch 

अप्रैल के महीनों में खेत की मिट्टियों की जांच कराना आवश्यक है जांच करवा कर आपको यह  पता चल जाता है।कि मिट्टियों में क्या खराबी है ?उन खराबी को दूर करने के लिए आपको क्या करना है? इसीलिए खेतों की मिट्टियों की जांच कराना 3 वर्षों में एक बार आवश्यक है आप के खेतों की अच्छी फसल के लिए। खेतों की मिट्टियों में जो पोषक तत्व मौजूद होते हैं जैसे :फास्फोरस, सल्फर ,पोटेशियम, नत्रजन ,लोहा, तांबा मैग्नीशियम, जिंक आदि। खेत की मिट्टियों की जांच कराने से आपको इनकी मात्रा का भी ज्ञान प्राप्त हो जाता है, कि इन पोषक तत्व को कितनी मात्रा में और कब मिट्टियों में मिलाना है इसीलिए खेतों की मिट्टी के लिए जांच करना आवश्यक है। इस तरह से खेत की तैयारी करना फायेदमंद रहता है । 

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खेतों के लिए पानी की जांच कराएं

pani ki janch 

फसलो के लिए पानी बहुत ही उपयोगी होता है इस प्रकार पानी की अच्छी गुणवत्ता का होना बहुत ही आवश्यक होता है।अपने खेतों के ट्यूबवेल व नहर से आने वाले पानी की पूर्ण रूप से जांच कराएं और पानी की गुणवत्ता में सुधार  लाए, ताकि फसलों की पैदावार ठीक ढंग से हो सके और किसी प्रकार की कोई हानि ना हो।

अप्रैल(April) के महीने में खाद की बुवाई करना:

कटाई के बाद अप्रैल माह में खेत की तैयारी (खाद, जुताई) 

 गोबर की खाद और कम्पोस्ट खेत के लिए बहुत ही उपयोगी साबित होते हैं। खेत को अच्छा रखने के लिए इन दो खाद द्वारा खेत की बुवाई की जाती है।मिट्टियों में खाद मिलाने से खेतों में सुधार बना रहता है,जो फसल के उत्पादन में बहुत ही सहायक है।

अप्रैल(April) के महीने में हरी खाद की बुवाई

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कई वर्षों से गोबर की खाद का ज्यादा प्रयोग नहीं हो रहा है। काफी कम मात्रा में गोबर की खाद का प्रयोग हुआ है अप्रैल के महीनों में गेहूं की कटाई करने के बाद ,जून में धान और मक्का की बुवाई के बीच लगभग मिलने वाला 50 से 60 दिन खाली खेतों में, कुछ कमजोर हरी खाद बनाने के लिए लोबिया, मूंग, ढैंचा खेतों में लगा दिए जाते हैं। किसान जून में धान की फसल बोने से एक या दो दिन पहले ही, या फिर मक्का बोने से 10-15 दिन के उपरांत मिट्टी की खूब अच्छी तरह से जुताई कर देते हैं इससे खेतों की मिट्टियों की हालत में सुधार रहता है। हरी खाद के उत्पादन  के लिए सनई, ग्वार , ढैंचा  खाद के रूप से बहुत ही उपयुक्त होते हैं फसलों के लिए।  

अप्रैल(April) के महीने में बोई जाने वाली फसलें

april mai boi jane wali fasal 

अप्रैल के महीने में किसान निम्न फसलों की बुवाई करते हैं वह फसलें कुछ इस प्रकार हैं: 

साठी मक्का की बुवाई

साठी मक्का की फसल को आप अप्रैल के महीने में बुवाई कर सकते हैं यह सिर्फ 70 दिनों में पककर एक कुंटल तक पैदा होने वाली फसल है। यह फसल भारी तापमान को सह सकती है और आपको धान की खेती करते  समय खेत भी खाली  मिल जाएंगे। साठी मक्के की खेती करने के लिए आपको 6 किलोग्राम बीज तथा 18 किलोग्राम वैवस्टीन दवाई की ज़रूरत होती है। 

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बेबी कार्न(Baby Corn) की  बुवाई

किसानों के अनुसार बेबी कॉर्न की फसल सिर्फ 60 दिन में तैयार हो जाती है और यह फसल निर्यात के लिए भी उत्तम है। जैसे : बेबी कॉर्न का इस्तेमाल सलाद बनाने, सब्जी बनाने ,अचार बनाने व अन्य सूप बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है। किसान बेबी कॉर्न की खेती साल में तीन चार बार कर अच्छे धन की प्राप्ति कर सकते हैं। 

अप्रैल(April) के महीने में मूंगफली की  बुवाई

मूंगफली की फसल की बुवाई किसान अप्रैल के आखिरी सप्ताह में करते हैं। जब गेहूं की कटाई हो जाती है, कटाई के तुरंत बाद किसान मूंगफली बोना शुरू कर देते है। मूंगफली की फसल को उगाने के लिए किसान इस को हल्की दोमट मिट्टी में लगाना शुरु करते हैं। तथा इस फसल के लिए राइजोवियम जैव खाद का  उपचारित करते हैं। 

अरहर दाल की बुवाई

अरहर दाल की बढ़ती मांग को देखते हुए किसान इसकी 120 किस्में अप्रैल के महीने में लगाते हैं। राइजोवियम जैव खाद में 7 किलोग्राम बीज को मिलाया जाता है। और लगभग 1.7 फुट की दूरियों पर लाइन बना बना कर बुवाई शुरू करते हैं। बीजाई  1/3  यूरिया व दो बोरे सिंगल सुपर फास्फेट  किसान फसलों पर डालते हैं , इस प्रकार अरहर की दाल की बुवाई की जाती है। 

अप्रैल(April) के महीने में बोई जाने वाली सब्जियां

April maon boi jane wali sabjiyan अप्रैल में विभिन्न विभिन्न प्रकार की सब्जियों की बुवाई की जाती है जैसे : बंद गोभी ,पत्ता गोभी ,गांठ गोभी, फ्रांसबीन , प्याज  मटर आदि। ये हरी सब्जियां जो अप्रैल के माह में बोई जाती हैं तथा कई पहाड़ी व सर्द क्षेत्रों में यह सभी फसलें अप्रैल के महीने में ही उगाई जाती है।

खेतों की कटाई:

किसान खेतों में फसलों की कटाई करने के लिए ट्रैक्टर तथा हार्वेस्टर और रीपर की सहायता लेते हैं। इन उपकरणों द्वारा कटाई की जाती है , काटी गई फसलों को किसान छोटी-छोटी पुलिया में बांधने का काम करता है। तथा कहीं गर्म स्थान जहां धूप पढ़े जैसे, गर्म जमीन , यह चट्टान इन पुलिया को धूप में सूखने के लिए रख देते है। जिससे फसल अपना प्राकृतिक रंग हासिल कर सके और इन बीजों में 20% नमी की मात्रा पहुंच जाए। 

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खेत की जुताई

किसान खेत जोतने से पहले इसमें उगे पेड़ ,पौधों और पत्तों को काटकर अलग कर देते हैं जिससे उनको साफ और स्वच्छ खेत की प्राप्ति हो जाती है।किसी भारी औजार से खेत की जुताई करना शुरू कर दिया जाता है। जुताई करने से मिट्टी कटती रहती है साथ ही साथ इस प्रक्रिया द्वारा मिट्टी पलटती रहती हैं। इसी तरह लगातार बार-बार जुताई करने से खेत को गराई प्राप्त होती है।मिट्टी फसल उगाने योग्य बन जाती है। 

अप्रैल(April) के महीने में बोई जाने वाली सब्जियां:

अप्रैल के महीनों में आप निम्नलिखित सब्जियों की बुवाई कर ,फसल से धन की अच्छी प्राप्ति कर सकते हैं।अप्रैल के महीने में बोई जाने वाली सब्जियां कुछ इस प्रकार है जैसे: धनिया, पालक , बैगन ,पत्ता गोभी ,फूल गोभी कद्दू, भिंडी ,टमाटर आदि।अप्रैल के महीनों में इन  सब्जियों की डिमांड बहुत ज्यादा होती है।  अप्रैल में शादियों के सीजन में भी इन सब्जियों का काफी इस्तेमाल किया जाता है।इन सब्जियों की बढ़ती मांग को देखते हुए, किसान अप्रैल के महीने में इन सब्जियों की पैदावार करते हैं। हम उम्मीद करते हैं कि आपको हमारे इस आर्टिकल द्वारा कटाई के बाद खेत को किस तरह से तैयार करते हैं , तथा खेत में कौन सी फसल उगाते हैं आदि की पूर्ण जानकारी प्राप्त कर ली होगी। यदि आप हमारी दी हुई खेत की तैयारी की जानकारी से संतुष्ट है, तो आप हमारे इस आर्टिकल को सोशल मीडिया तथा अपने दोस्तों के साथ शेयर कर सकते हैं.

खरीफ की फसल की कटाई के लिए खरीदें ट्रैक्टर कंबाइन हार्वेस्टर, यहां मिल रही है 40 प्रतिशत तक सब्सिडी

खरीफ की फसल की कटाई के लिए खरीदें ट्रैक्टर कंबाइन हार्वेस्टर, यहां मिल रही है 40 प्रतिशत तक सब्सिडी

भारत में इन दिनों खरीफ की फसल का सीजन चल रहा है, खरीफ की फसल की कटाई का समय बेहद तेजी से पास आता जा रहा है। सितम्बर के आखिरी सप्ताह से खरीफ की फसल की कटाई शुरू हो जाएगी। फसल की कटाई में भारत में मजदूरों की सहायता ली जाती है तथा थ्रेसिंग के लिए अलग से प्रबंध किया जाता है। कटाई का काम हाथों से करने से ज्यादा समय लगता है, इसके बाद थ्रेसिंग करने के लिए आपको अतिरिक्त समय देना होता है। इस प्रक्रिया में समय के साथ-साथ लागत की भी बढ़ोत्तरी होती है, जो किसान के हिसाब से बिलकुल फायदेमंद नहीं है। इसलिए अब बाजार में बहुत तरह की हार्वेस्टर मशीनें आ गईं हैं जो मानवीय श्रम को कम करने के साथ-साथ खेती की लागत में भी कमी करती हैं। दिनोदिन बाजार में उन्नत मशीनों के उपयोग से किसानों की सहूलियतें बढ़ती जा रही हैं। हाल फिलहाल में किसान अब पुराने हार्वेस्टरों की जगह नए और उन्नत हार्वेस्टर खरीद रहे हैं, जिससे कटाई या रीपिंग (reaping) के साथ-साथ थ्रेसिंग (threshing) यानी मड़ाई और विनोइंग (Winnowing) यानी ओसौनी का काम भी बेहद आसान हो जाए।

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खेत में ट्रैक्टर हार्वेस्टर मशीन किस प्रकार से काम करती हैं ?

एक कंबाइन ट्रैक्टर हार्वेस्टर मशीन (Combine Harvester Machine) पुराने हार्वेस्टर की अपेक्षा ज्यादा उन्नत और आधुनिक होती है। यह मशीन एक ही बार में एक साथ थ्रेसिंग, विनोनिंग और रीपिंग कर सकती है, इसके अलावा यह मशीन बेहद तेजी से काम करती है, जिससे समय की बचत होती है और इसकी मदद से कम समय में कृषि उत्पादकता को तेजी से बढ़ाया जा सकता है। यह मशीन मनुष्य द्वारा की जाने वाली कटाई की तुलना में फसल को ज्यादा सफाई से काटती है। इसके साथ ही यदि इसकी तुलना खेती की कटाई में आने वाली लागत से की जाए, तो मानव कटाई की तुलना में कंबाइन ट्रैक्टर हार्वेस्टर की कटाई बेहद सस्ती पड़ती है, जिससे समय के साथ-साथ पैसे की बचत होती है।

भारतीय बाजार में कितने प्रकार के कंबाइन ट्रैक्टर हार्वेस्टर मौजूद हैं ?

भारतीय बाजार में इन दिनों कंबाइन ट्रैक्टर हार्वेस्टर की एक बहुत बड़ी रेंज मौजूद है, जिसे किसान भाई अपने कटाई के काम को आसान बनाने के लिए खरीद सकते हैं। ये कंबाइन ट्रैक्टर हार्वेस्टर बाजार में आवश्यक कटिंग चौड़ाई के हिसाब से दो फिल्टर्स के साथ उपलब्ध हैं, इसके बाद भी अगर किसान फ़िल्टर को बदलना चाहें तो उसमें बदलाव संभव है। किसान भाई अपनी जरुरत के हिसाब से पावर सोर्स सेल्फ प्रोपेल्ड (Power source self-propelled) या ट्रैक्टर माउंटेड (tractor mounted) के अनुसार भी फिल्टर उपयोग कर सकते हैं। भारत में इस प्रकार के कंबाइन ट्रैक्टर हार्वेस्टर हिंद एग्रो, दशमेश, क्लास, न्यू हिंद, प्रीत जैसी प्रतिष्ठित कंपनियां बाजार में उपलब्ध करवाती है, जिन्हें किसान भाई इन कंपनियों के अधिकृत डीलरों से खरीद सकते हैं।

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(Combine Harvester Machine) की संपूर्ण जानकारी

भारतीय बाजार में एक कंबाइन ट्रैक्टर हार्वेस्टर की कीमत क्या है ?

भारत में कंपनियां कंबाइन ट्रैक्टर हार्वेस्टर को किसानों की जरुरत के हिसाब से बनाती हैं और उसकी कीमत भी उसी अनुसार तय करती हैं। फिलहाल भारत में एक कंबाइन ट्रैक्टर हार्वेस्टर की कीमत 5.35 लाख रुपये से शुरू होकर 26.70 लाख रुपये के बीच है। जो भी टॉप ब्रांड निर्माता कंबाइन ट्रैक्टर हार्वेस्टर को बनाते हैं, वो समय-समय पर इनमें भारी छूट भी प्रदान करते हैं जिसके लिए किसानों को अधिकृत डीलरों से संपर्क करना होगा। किसान मोलभाव करके कंबाइन ट्रैक्टर हार्वेस्टर की खरीद में ज्यादा से ज्यादा रूपये बचा सकते हैं। इसके साथ ही कंबाइन ट्रैक्टर हार्वेस्टर की कीमत राज्य दर राज्य अलग हो सकती है, क्योंकि राज्यों में लगने वाले टैक्स में अंतर होता है। इसके अलावा कई राज्य सरकारें कंबाइन ट्रैक्टर हार्वेस्टर की खरीद पर किसानों को भारी सब्सिडी प्रदान करती हैं। कंबाइन ट्रैक्टर हार्वेस्टर खरीदने के लिए आंध्र प्रदेश की सरकार 'वाईएसआर यंत्र सेवा' (YSR yantra Seva Pathakam scheme) स्कीम के तहत किसानों को 40 प्रतिशत की सब्सिडी प्रदान करती है। इसके अलावा किसान कंबाइन ट्रैक्टर हार्वेस्टर को खरीदने के लिए हार्वेस्टर की कीमत का 50 प्रतिशत लोन बैंक से ले सकते हैं। इस प्रकार किसानों को इस स्कीम के माध्यम से कंबाइन ट्रैक्टर हार्वेस्टर खरीदने के समय हार्वेस्टर की कुल कीमत के मात्र 10 प्रतिशत पैसे ही चुकाने होंगे। हाल ही में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएस जगमोहन रेड्डी ने घोषणा की थी कि राज्य में 10,750 वाईएसआर यंत्र सेवा केंद्र स्थापित किए जाएंगे, जहां पर किसानों को कृषि से सम्बंधित सभी प्रकार के यन्त्र उपलब्ध करवाए जाएंगे। मुख्यमंत्री ने कहा था कि जिन क्षेत्रों में धान की खेती ज्यादा होती है वहां पर क्लस्टर स्तर पर 1,615 हार्वेस्टर किसानों को उपलब्ध करवाए जाएंगे। इसके साथ ही किसानों को कृषि यन्त्र खरीदने के लिए 175 करोड़ रुपये की सब्सिडी प्रदान की जाएगी।

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सही कंबाइन ट्रैक्टर हार्वेस्टर मशीन का चुनाव करना किसानों के लिए थोड़ा कठिन हो सकता है क्योंकि बाजार में कंबाइन ट्रैक्टर हार्वेस्टरों की एक लम्बी रेंज उपलब्ध है। लेकिन किसान हार्वेस्टरों की रेटिंग देखकर भारत के टॉप ब्रांड के हार्वेस्टरों पर भरोसा कर सकते हैं। भारत में सबसे ज्यादा लोकप्रिय कंबाइन ट्रैक्टर हार्वेस्टर प्रीत 987, महिंद्रा अर्जुन 605, करतार 4000, दशमेश 9100 सेल्फ कॉम्बिनेशन हार्वेस्टर, न्यू हॉलैंड टीसी 5.30, कुबोटा हार्वेस्टिंग डीसी -68 जी-एचके इत्यादि हैं, जिनमें से किसान अपनी जरुरत के हिसाब से किसी भी हार्वेस्टर का चुनाव कर सकते हैं।
हरियाणा में फसल बेचने के लिए करवाएं रजिस्ट्रेशन, फिर से खुला 'मेरी फसल-मेरा ब्यौरा' पोर्टल

हरियाणा में फसल बेचने के लिए करवाएं रजिस्ट्रेशन, फिर से खुला 'मेरी फसल-मेरा ब्यौरा' पोर्टल

इन दिनों देश में खरीफ की फसल लगभग तैयार हो चुकी है और कई राज्यों में इस फसल की कटाई भी प्रारम्भ हो चुकी है। इसको देखते हुए कई राज्यों में MSP के तहत फसलों की खरीदी प्रक्रिया भी शुरू की जा चुकी है। अन्य राज्यों के साथ ही हरियाणा सरकार भी धान की खेती को MSP के तहत खरीदेगी, जिसके तहत सरकार ने खरीदी प्रक्रिया को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है। हरियाणा में किसानों को अपनी फसल को MSP पर बेचने के लिए आवश्यक रूप से रजिस्ट्रेशन करवाना होता है। इसलिए किसानों की सहूलियत को देखते हुए एक बार फिर से हरियाणा सरकार ने 'मेरी फसल-मेरा ब्यौरा' पोर्टल किसानों के लिए खोल दिया है। जो भी किसान इस पोर्टल में अपना रजिस्ट्रेशन करवाने से चूक गए हैं, वो शीघ्र ही अपना रजिस्ट्रेशन करा लें, ताकि उन्हें अपनी फसल को MSP पर बेचने में किसी भी प्रकार की दिक्कत का सामना न करना पड़े।

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हरियाणा सरकार की पूरी कोशिश है कि ज्यादा से ज्यादा किसान MSP पर अपनी फसल को बेचकर उचित लाभ कमा सकें। इसलिए सरकार ने किसानों के लिए कई नियम बनाये हैं, जिससे MSP फसल बेचने पर किसान को फायदा हो और इस प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की धांधली न होने पाए। हरियाणा सरकार इसके पहले भी एक बार अपना पोर्टल 'मेरी फसल-मेरा ब्यौरा' किसानों के लिए खोल चुकी है। यदि जिन भी किसानों ने तब अपना रजिस्ट्रेशन करा लिया था, उन्हें दोबारा रजिस्ट्रेशन करवाने की जरुरत नहीं है। हरियाणा सरकार ने एक बार फिर से यह पोर्टल मात्र 3 दिनों के लिए खोला है। इस पोर्टल में किसान 22 सितंबर से लेकर 24 सितंबर तक अपना रजिस्ट्रेशन करवा सकते हैं।

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हरियाणा सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड फार्मर वेलफेयर ने ट्वीट करके जानकारी दी कि, यह किसानों के लिए आखिरी मौका है। इसके बाद पोर्टल दोबारा नहीं खोला जाएगा। इच्छुक किसान अपना रजिस्ट्रेशन 'मेरी फसल-मेरा ब्यौरा' की ऑफिसियल वेबसाइट https://fasal.haryana.gov.in पर जाकर करवा सकते हैं।
पंजाब सरकार पराली जलाने से रोकने को ले कर सख्त, कृषि विभाग के कर्मचारियों की छुट्टी रद्द..

पंजाब सरकार पराली जलाने से रोकने को ले कर सख्त, कृषि विभाग के कर्मचारियों की छुट्टी रद्द..

पंजाब के कृषि मंत्री ने पराली जलाने (stubble burning) पर प्रतिबंध को जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए पिछले दिनों अधिकारियों के साथ बैठक की। बैठक के दौरान, उन्होंने अधिकारियों को जमीनी स्तर पर किसानों के साथ मिलकर काम करने की सलाह दी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि प्रतिबंध का ठीक से पालन हो। खेती का सीजन जोरों पर है। आने वाले दिनों में धान की फसल कटाई के लिए तैयार हो जाएगी। बहुत जगह फसल तैयार भी हो चुकी हैं और कटाई शुरू हो चुकी है। इसी कड़ी में पंजाब सरकार ने बहुत ही सक्रिय भूमिका निभाई है। पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए इस बार पंजाब सरकार जमीनी स्तर पर सक्रिय भूमिका निभा रही है और इसको ध्यान मे रखते हुए पंजाब सरकार ने एक उल्लेखनीय निर्णय लिया है जिसमे कृषि विभाग सहित सभी कर्मचारियों की छुट्टी रद्द कर दी है। कृषि मंत्री कुलदीप सिंह धालीवाल (Kuldeep Singh Dhaliwal ने इस बारे में जानकारी साझा की है। ये भी पढ़े: पराली जलाने पर रोक की तैयारी

इस तारीख तक छुट्टी रद्द

पंजाब सरकार ने पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए राज्य के कृषि विभाग के कर्मचारियों की 7 नवंबर तक की छुट्टी रद्द करने का फैसला किया है। दरअसल पंजाब के कृषि मंत्री कुलदीप सिंह धालीवाल ने बीते रोज पराली जलाने को रोकने के लिए अधिकारियों के साथ बैठक की और जिला स्तर पर क्रियान्वयन करने के लिए इसके रोडमैप पर चर्चा की। मंत्री महोदय ने कहा कि राज्य में पराली जलाने की प्रथा को रोकने के लिए विभिन्न कदम उठाए जा रहे हैं। इन कदमों में शिक्षा और प्रवर्तन भी शामिल हैं। मंत्री ने कृषि विभाग के सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को जमीनी स्तर पर ध्यान केंद्रित कर काम करने के लिए कहा। उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे 7 नवंबर तक विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों को छुट्टी न दें। कृषि मंत्री ने पराली जलाने को रोकने के लिए जागरूकता अभियान चलाने और सभी गतिविधियों की निगरानी के लिए एक राज्य स्तरीय समिति का गठन किया है। सख्त निर्देश देते हुए मंत्री महोदय ने सेंट्रल कंट्रोल रूम बनाने के भी आदेश दिए हैं। ये भी पढ़े: पराली प्रदूषण से लड़ने के लिए पंजाब और दिल्ली की राज्य सरकार एकजुट हुई दिल्ली-एनसीआर में हर साल सर्दी के मौसम में गंभीर वायु प्रदूषण होता है। प्रदूषण की शुरुआत अक्टूबर महीने से हो जाती है। यह वही समय है जब पंजाब और हरियाणा में किसानों द्वारा पराली जलाया जाता है जो की एक गंभीर समस्या का रूप ले लेता है। हाल के वर्षों में पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए तरह-तरह के प्रयास किए जा रहे हैं जिसमे किसानों को जागरूक भी किया जा रहा हैं। इसी समय दिल्ली एनसीआर में पराली के धुएं से होने वाले प्रदूषण का अनुपात 40% से अधिक दर्ज किया है। खुले में पराली को जलाने से वातावरण में बड़ी मात्रा में हानिकारक प्रदूषक निकलते हैं, जिनमें गैसें भी शामिल हैं जो पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं। ये प्रदूषक को वातावरण में फैलने से रोकना चाहिए क्योंकि ये भौतिक और रासायनिक परिवर्तनों से गुजरते हैं और अंततः धुंध की मोटी चादर बना देते हैं। इससे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ये भी पढ़े: पंजाब सरकार बनाएगी पराली से खाद—गैस पराली जलाने से बचने के लिए केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार राष्ट्रीय पराली नीति बनाई है। राज्यों को इसका सख्ती से पालन करने का दिशा निर्देश भी दिया गया है। आज तक, खेतों में पराली को नष्ट करने के लिए कोई प्रभावी और उपयुक्त तरीके और मिशनरी सामने नहीं आए हैं। हैपीसीडर व एसएमएस सिस्टम से प्रणाली भूसे को खेत में मिलाया जा सकता है, लेकिन यह पूरी तरह से ठोस प्रणाली नहीं है जिससे खेत अगली फसल के लिए पूरी तरह से तैयार हो सके। पराली जलाने की समस्या के समाधान के लिए पिछले चार साल में केंद्र सरकार ने पंजाब पर करोड़ों रुपये खर्च किए हैं, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है। खेतों में अभी भी बड़ी संख्या में पराली जलाई जा रही है।
अलसी की खेती से भाग जाएगा आर्थिक आलस

अलसी की खेती से भाग जाएगा आर्थिक आलस

किसान जितनी मेहनत करते हैं, उन्हें उतना पैसा मिल जाता तो क्या कहना था। लेकिन, एक समस्या यह भी है, कि किसान आमतौर पर पारंपरिक खेती से इतर प्रयोग करने से बचाते हैं। लेकिन, आज हम एक ऐसी फसल के बारे में बता रहे है, जिसकी खेती की जाए तो जिन्दगी से आर्थिक आलस का खात्मा तय है। आज हम बात कर रहे हैं, अलसी की।

अलसी एक प्रयोग अनेक

अलसी तिलहन फसल है और आजकल यह बहुत बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है। इसकी वजह है, इसमें ओमेगा फैटी एसिड का पाया जाना, अलसी के तेल का पेंट्स, वार्निश व स्नेहक बनाने के साथ पैड इंक तथा प्रेस प्रिटिंग हेतु स्याही तैयार करने में उपयोग किया जाता है। इसमें पोषक तत्वों की उचित मात्रा होने के कारण इसका उपयोग खाद के रूप में किया जाता है।


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मौसम:

इसकी खेती के लिए ठंडे व शुष्क जलवायु की जरूरत है, यह असल में रबी फसल है। इसके उचित अंकुरण हेतु 25-30 डिग्री से.ग्रे. तापमान तथा बीज बनते समय तापमान 15-20 डिग्री से.ग्रे. होना चाहिए।

जमीन:

इसकी खेती के लिये काली भारी एवं दोमट (मटियार) मिट्टी सही है, अधिक उपजाऊ मृदाओं की अपेक्षा मध्यम उपजाऊ मृदायें अच्छी समझी जाती हैं। उचित जल निकास का प्रबंध होना चाहिए। खेत भुरभुरा एवं खरपतवार रहित होना चाहिये, दो से तीन बार हैरो चलाना आवश्यक है, जिससे नमी संरक्षित रह सके। अलसी के बीज को कार्बेन्डाजिम की 2.5 से 3 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिये अथवा ट्राइकोडरमा विरीडी की 5 ग्राम मात्रा अथवा ट्राइकोडरमा हारजिएनम की 5 ग्राम एवं कार्बाक्सिन की 2 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीज को उपचारित कर बुवाई करनी चाहिये।


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बेहतर उत्पादन के लिए इसे 2 सिंचाई की आवश्यकता होती है, पहली सिंचाई बुवाई के एक माह बाद एवं दूसरी सिंचाई फल आने से पहले करनी चाहिये। विभिन्न प्रकार के रोग जैसे गेरूआ, उकठा, चूर्णिल आसिता तथा आल्टरनेरिया अंगमारी एवं कीट यथा फली मक्खी, अलसी की इल्ली, अर्धकुण्डलक इल्ली चने की इल्ली द्वारा भारी क्षति पहुचाई जाती है। इसके लिए उचित प्रबंधन किए जाने की जरूरत है। अलसी की जब पत्तियाँ सूखने लगें, केप्सूल भूरे रंग के हो जायें और बीज चमकदार बन जाय तब फसल की कटाई करनी चाहिये। बीज में 70 प्रतिशत तक सापेक्ष आद्रता तथा 8 प्रतिशत नमी की मात्रा भंडारण के लिये सर्वोत्तम है।
तैयार हुई चावल की नई किस्म, एक बार बोने के बाद 8 साल तक ले सकते हैं फसल

तैयार हुई चावल की नई किस्म, एक बार बोने के बाद 8 साल तक ले सकते हैं फसल

दुनिया की बढ़ती हुई जनसंख्या को ध्यान में रखते हुए दुनिया भर के कृषि वैज्ञानिक अनाज की नई-नई किस्में विकसित करने में लगे हुए हैं। ताकि दुनिया भर में रहने वाली 8 अरब से ज्यादा जनता को खाना खिलाया जा सके। इसी कड़ी में चीन के कृषि वैज्ञानिकों ने हाल ही में चावल की एक नई किस्म विकसित की है। जिसे PR23 नाम दिया गया है। चीनी कृषि वैज्ञानिकों का दावा है, कि चावल की इस किस्म की रोपाई करने के बाद लगातार 8 साल तक फसल ली जा सकती है। वैज्ञानिकों ने बताया है, कि चावल की इस किस्म के पेड़ की जड़ें बहुत ज्यादा गहरी होती हैं। जो चावल के पेड़ को मजबूती प्रदान करती हैं। चावल की PR23 किस्म की फसल की कटाई करने के बाद दोबारा से चावल का पौधा जड़ों से ऊपर निकल आता है। पौधे के ऊपर निकालने की रफ्तार भी पहले वाले पेड़ के समान होती है। जिससे इसमें समय से बीज लगते हैं और किसान को समय पर फसल प्राप्त हो जाती है।

इस किस्म को विकसित करने में क्रॉस ब्रीडिंग का हुआ है उपयोग

चीनी वैज्ञानिकों ने इस किस्म को विकसित करने के लिए क्रॉस ब्रीडिंग का सहारा लिया है। उन्होंने PR23 प्रजाति को विकसित करने के लिए अफ्रीकी चावल ओरिजा सैटिवा (Oryza sativa) का प्रयोग किया है। यह बारहमासी चावल है, जिसने PR23 प्रजाति को विकसित करने में महत्वपूर्ण रोल अदा किया है। कृषि वैज्ञानिकों ने बताया है, कि चावल की इस किस्म को इस तरह से तैयार किया गया है, जिससे इसमें खाद की जरूरत कम से कम हो। अगर उपज की बात करें तो यह चावल एक हेक्टेयर जमीन में 6.8 टन तक उत्पादित हो जाता है। साथ ही इसकी खेती करने के लिए किसानों को अन्य चावल के मुकाबले कम खर्च करना पड़ता है।


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लंबे समय से चल रही थी इस चावल पर रिसर्च

चावल की इस किस्म को विकसित करना चीन के लिए मील का पत्थर साबित हुआ है। क्योंकि चावल की इस किस्म को विकसित करने के लिए चीनी कृषि वैज्ञानिक साल 1970 से लगातार रिसर्च कर रहे थे। ज्यादातर रिसर्च चीन की युन्नान अकादमी में की गई है। शुरुआती दिनों में चीनी कृषि वैज्ञानिकों को इसमें सफलता हासिल नहीं हुई थी। लेकिन लगातार कोशिश करने के बाद वैज्ञानिकों ने 1990 के दशक में बारहमासी चावल विकसित करने में कुछ सफलता पाई थी। इसके बाद अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान ने एक रिसर्च शुरू की, जिसमें चीनी वैज्ञानिक फेंगयी हू ने बारहमासी चावल को विकसित करने पर काम किया था। धन की कमी के कारण साल 2001 में अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान ने रिसर्च को बंद कर दिया। लेकिन फेंगयी हू ने हार नहीं मानी। वो लगातार चावल की इस किस्म को विकसित करने में लगे रहे। इस दौरान उन्होंने द लैंड इंस्टीट्यूट, कंसास और यूएसए का बहुमूल्य सहयोग से युन्नान विश्वविद्यालय में अपनी रिसर्च जारी रखी। जिसके परिणामस्वरूप फेंगयी हू चावल की PR23 किस्म को विकसित करने में सफल हुए। अब यह किस्म चीन के किसानों को उत्पादन के लिए दे दी गई है। चावल की PR23 किस्म के साथ चीन किसान अब निश्चिंत होकर खेती कर सकेंगे।
इस राज्य में बारिश और ओलावृष्टि से ग्रसित किसानों को मिलेगी 15 हजार रूपए एकड़ के हिसाब से सहायक धनराशि

इस राज्य में बारिश और ओलावृष्टि से ग्रसित किसानों को मिलेगी 15 हजार रूपए एकड़ के हिसाब से सहायक धनराशि

पंजाब राज्य में बेमौसम बारिश होने की वजह से सर्वाधिक हानि गेहूं की फसल को हुई है। अब ऐसी स्थिति में यहां के किसान भाइयों को प्राकृतिक आपदा से संरक्षण देने के लिए शीघ्र ही सरकार की ओर से फसल बीमा योजना जारी की जाएगी। पंजाब में अचानक बारिश और ओलावृष्टि से लाखों हेक्टेयर में लगी गेहूं की फसल चौपट हो गई है। जिसकी वजह से किसानों को प्रचंड आर्थिक हानि पहुंची है। परंतु, इसी कड़ी में राज्य के किसानों हेतु एक राहत भरा समाचार सुनने को मिला है। मुख्यमंत्री भगवंत मान जी ने बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से क्षतिग्रस्त हुई फसल को लेकर बड़ी घोषणा की है। उन्होंने बताया है, कि जिन किसानों की फसल वर्षा और ओलावृष्टि से नष्ट हुई है, उन्हें मुआवजा दिया जाएगा। जानकारी के अनुसार, निरंतर आ रही फसल बर्बादी के समाचारों के मध्य सीएम मान ने रविवार को वर्षा से प्रभावित हुए जनपदों का दौरा किया। मुख्यमंत्री भगवंत मान जी ने बठिंडा, पटियाला, मुक्तसर और मोगा जनपद में जाकर प्रभावित किसानों का हाल चाल जाना। विशेष बात यह है, कि इन चारों जनपदों में ही सर्वाधिक गेहूं की फसल को हानि पहुंची है। बहुत सारे जनपदों में तो 70 प्रतिशत से भी अधिक फसलों की तबाही हुई है। बारिश सहित तीव्र हवा चलने की वजह से गेहूं की फसल खेत में गिर पड़ी है। फिलहाल, किसानों को इस गिरी हुई गेंहू की फसल की कटाई करने में बेहद परेशानी होगी।

किसानों की हजारों एकड़ फसल हुई बर्बाद

सीएम मान ने मीडिया के माध्यम से बताया है, कि बेमौसम बारिश से राज्य के किसानों को बेहद हानि हुई है। ऐसे में वे किसानों के दर्द को भली भाँति समझ सकते हैं। उन्होंने कहा है, कि निरीक्षण के उपरांत आई प्रारंभिक रिपोर्ट से पता चलता है, कि हजारों एकड़ में लगी फसल नष्ट हुई है। ये भी पढ़े: सर्दी में पाला, शीतलहर व ओलावृष्टि से ऐसे बचाएं गेहूं की फसल

घर के हानि होने की स्थिति में 95,100 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी

मुख्यमंत्री भगवंत मान ने बताया है, कि जिन किसानों की 75 फीसद फसल नष्ट हो चुकी है। उन किसानों को 15 हजार रुपयए प्रति एकड़ के भाव से सहायता धनराशि दी जाएगी। साथ ही, जिन किसान भाइयों की फसल में हानि 33 से 75 प्रतिशत के मध्य हुई है, उनको 6750 रुपये प्रति एकड़ के भाव से सहायता धनराशि प्रदान की जाएगी। साथ ही, मजदूरों को घर के नुकसान होने पर 95,100 रुपये की सहायक धनराशि प्रदान की जाएगी।

केंद्र सरकार द्वारा जारी फसल बीमा योजना कागजों तक ही सीमित : भगवंत मान

बतादें, कि पंजाब राज्य में बेमौसम बारिश की वजह से सर्वाधिक गेहूं की फसल को हानि हुई है। अब ऐसी स्थिति में यहां के किसान भाइयों को प्राकृतिक आपदा से संरक्षण देने के लिए अतिशीघ्र ही सरकार के माध्यम से फसल बीमा योजना चालू की जाएगी। सीएम मान के मुताबिक, केंद्र सरकार द्वारा चल रही फसल बीमा योजना से किसानों को कोई भी फायदा नहीं होने वाला है। वह केवल कागजों तक ही सीमित रह गई है। यही कारण है, कि पंजाब सरकार के लिए किसानों और मजदूरों का विकास पहली प्राथमिकता है।
मक्का की खेती के लिए मृदा एवं जलवायु और रोग व उनके उपचार की विस्तृत जानकारी

मक्का की खेती के लिए मृदा एवं जलवायु और रोग व उनके उपचार की विस्तृत जानकारी

मक्का का उपयोग हर क्षेत्र में समय के साथ-साथ बढ़ता चला जा रहा है। अब चाहे वह खाने में हो अथवा औद्योगिक छेत्र में। मक्के की रोटी से लेकर भुट्टे सेंककर, मधु मक्का के कॉर्नफलेक्स, पॉपकार्न आदि के तौर पर होता है। 

वर्तमान में मक्का का इस्तेमाल कार्ड आइल, बायोफयूल हेतु भी होने लगा है। लगभग 65 प्रतिशत मक्का का इस्तेमाल मुर्गी एवं पशु आहार के तौर पर किया जाता है। 

भुट्टे तोड़ने के उपरांत शेष बची हुई कड़वी पशुओं के चारे के तौर पर उपयोग की जाती है। औद्योगिक दृष्टिकोण से मक्का प्रोटिनेक्स, चॉक्लेट, पेन्ट्स, स्याही, लोशन, स्टार्च, कोका-कोला के लिए कॉर्न सिरप आदि बनने के उपयोग में लिया जाता है। 

बिना परागित मक्का के भुट्टों को बेबीकार्न मक्का कहा जाता है। जिसका इस्तेमाल सब्जी एवं सलाद के तौर पर किया जाता है। बेबीकार्न पौष्टिक दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण साबित होता है।

मक्का की खेती करने हेतु कैसी जमीन होनी चाहिए

सामान्यतः
मक्के की खेती को विभिन्न प्रकार की मृदा में की जा सकती है। परंतु, इसके लिए दोमट मृदा अथवा बुलई मटियार वायु संचार एवं जल की निकासी की उत्तम व्यवस्था के सहित 6 से 7.5 पीएच मान वाली मृदा अनुकूल मानी गई है।

मक्का की खेती हेतु कौन-सी मृदा उपयुक्त होती है

मक्के की फसल के लिए खेत की तैयारी जून के माह से ही शुरू करनी चाहिए। मक्के की फसल के लिए गहरी जुताई करना काफी फायदेमंद होता है। 

खरीफ की फसल के लिए 15-20 सेमी गहरी जुताई करने के उपरांत पाटा लगाना चाहिए। जिससे खेत में नमी बनी रहती है। इस प्रकार से जुताई करने का प्रमुख ध्येय खेत की मृदा को भुरभुरी करना होता है। 

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फसल से बेहतरीन उत्पादन लेने के लिए मृदा की तैयारी करना उसका प्रथम पड़ाव होता है। जिससे प्रत्येक फसल को गुजरना पड़ता है।

मक्का की फसल के लिए खेत की तैयारी के दौरान 5 से 8 टन बेहतरीन ढ़ंग से सड़ी हुई गोबर की खाद खेत मे डालनी चाहिए। 

भूमि परीक्षण करने के बाद जहां जस्ते की कमी हो वहां 25 किलो जिंक सल्फेट बारिश से पहले खेत में डाल कर खेत की बेहतर ढ़ंग से जुताई करें। रबी के मौसम में आपको खेत की दो वक्त जुताई करनी पड़ेगी।

मक्के की खेती को प्रभवित करने वाले कीट और रोग तथा उनका इलाज

मक्का कार्बोहाईड्रेट का सबसे अच्छा स्रोत होने साथ-साथ एक स्वादिष्ट फसल भी है, जिसके कारण इसमें कीट संक्रमण भी अधिक होता है। मक्का की फसल को प्रभावित करने वाले प्रमुख कीट एवं रोगों के विषय में चर्चा करते हैं।

गुलाबी तनाबेधक कीट

इस कीट का संक्रमण होने से पौधे के बीच के हिस्से में हानि पहुँचती है, जिसके परिणामस्वरूप मध्य तने से डैड हार्ट का निर्माण होता है। इस वजह से पौधे पर दाने नहीं आते है।

मक्का का धब्बेदार तनाबेधक कीट

इस तरह के कीट पौधे की जड़ों को छोड़कर सभी हिस्सों को बुरी तरह प्रभावित करते है। इस कीट की इल्ली सबसे पहले तने में छेद करती है। इसके संक्रमण से पौधा छोटा हो जाता है और उस पौधे में दाने नहीं आते हैं। आरंभिक स्थिति में डैड हार्ट (सूखा तना) बनता है। इसे पौधे के निचले भाग की दुर्गंध से पहचाना जा सकता है।

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उक्त कीट प्रबंधन हेतु निम्न उपाय है

तनाछेदक की रोकथाम करने के लिये अंकुरण के 15 दिन के उपरांत फसल पर क्विनालफास 25 ई.सी. का 800 मि.ली./हे अथवा कार्बोरिल 50 फीसद डब्ल्यू.पी. का 1.2 कि.ग्रा./हे. की दर से छिड़काव करना उपयुक्त होता है। इसके 15 दिनों के उपरांत 8 कि.ग्रा. क्विनालफास 5 जी. अथवा फोरेट 10 जी. को 12 कि.ग्रा. रेत में मिलाकर एक हेक्टेयर खेत में पत्तों के गुच्छों पर डाल दें।

मक्का में लगने वाले मुख्य रोग

1. डाउनी मिल्डयू :- इस रोग का संक्रमण मक्का बुवाई के 2-3 सप्ताह के उपरांत होना शुरू हो जाता है। बतादें, कि सबसे पहले पर्णहरिम का ह्रास होने की वजह से पत्तियों पर धारियां पड़ जाती हैं, प्रभावित भाग सफेद रूई की भांति दिखाई देने लगता है, पौधे की बढ़वार बाधित हो जाती है। 

उपचार :- डायथेन एम-45 दवा को पानी में घोलकर 3-4 छिड़काव जरूर करना चाहिए। 

2. पत्तियों का झुलसा रोग :- पत्तियों पर लंबे नाव के आकार के भूरे धब्बे निर्मित होते हैं। रोग नीचे की पत्तियों से बढ़ते हुए ऊपर की पत्तियों पर फैलना शुरू हो जाते हैं। नीचे की पत्तियां रोग के चलते पूर्णतया सूख जाती हैं। 

उपचार :- रोग के लक्षण नजर पड़ते ही जिनेब का 0.12% के घोल का छिड़काव करना चाहिए। 

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3. तना सड़न :- पौधों की निचली गांठ से रोग संक्रमण शुरू होता है। इससे विगलन के हालात उत्पन्न होते हैं एवं पौधे के सड़े हुए हिस्से से दुर्गंध आनी शुरू होने लगती है। पौधों की पत्तियां पीली होकर के सूख जाती हैं। साथ ही, पौधे भी कमजोर होकर नीचे गिर जाती है। 

उपचार :- 150 ग्रा. केप्टान को 100 ली. पानी मे घोलकर जड़ों में देना चाहिये।

मक्का की फसल की कटाई और गहाई कब करें

फसल समयावधि पूरी होने के बाद मतलब कि चारे वाली फसल की बुवाई के 60-65 दिन उपरांत, दाने वाली देशी किस्म की बुवाई के 75-85 दिन बाद, एवं संकर एवं संकुल किस्म की बुवाई के 90-115 दिन पश्चात तथा दाने मे करीब 25 प्रतिशत तक नमी हाने पर कटाई हो जानी चाहिए। 

 मक्का की फसल की कटाई के पश्चात गहाई सबसे महत्वपूर्ण काम है। मक्का के दाने निकालने हेतु सेलर का इस्तेमाल किया जाता है। सेलर न होने की हालत में थ्रेशर के अंदर सूखे भुट्टे डालकर गहाई कर सकते हैं।