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बारिश

सोयाबीन, कपास, अरहर और मूंग की बुवाई में भारी गिरावट के आसार, प्रभावित होगा उत्पादन

सोयाबीन, कपास, अरहर और मूंग की बुवाई में भारी गिरावट के आसार, प्रभावित होगा उत्पादन

किसान भाई खेत में उचित नमी देखकर ही तिलहन और दलहन की फसलों की बुवाई शुरू करें

नई दिल्ली। बारिश में देरी के चलते और प्रतिकूल मौसम के कारण तिलहन और
दलहन की फसलों की बुवाई में भारी गिरावट के आसार बताए जा रहे हैं। माना जा रहा है कि सोयाबीन, अरहर और मूंग की फसल की बुवाई में रिकॉर्ड गिरावट आ सकती है। खरीफ सीजन की फसलों की बुवाई इस साल काफी पिछड़ रही है। तिलहन की फसलों में मुख्यतः सोयाबीन की बुवाई में पिछले साल के मुकाबले राष्ट्रीय स्तर पर 77.74 फीसदी कमी आ सकती है। वहीं अरहर की बुवाई में 54.87 फीसदी और मूंग की फसल बुवाई में 34.08 फीसदी की कमी आने की संभावना है। उधर बुवाई पिछड़ने के कारण कपास की फसल की बुवाई में भी 47.72 फीसदी की कमी आ सकती है। हालांकि अभी भी किसान बारिश के बाद अच्छे माहौल का इंतजार कर रहे हैं।

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तिलहन के फसलों के लिए संजीवनी है बारिश

- इन दिनों तिलहन की फसलों के लिए बारिश संजीवनी के समान है। जून के अंत तक 80 मिमी बारिश वाले क्षेत्र में सोयाबीन और कपास की बुवाई शुरू हो सकती है। जबकि दलहन की बुवाई में अभी एक सप्ताह का समय शेष है।

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दलहनी फसलों के लिए पर्याप्त नमी की जरूरत

- कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि दलहनी फसलों की बुवाई से पहले खेत में पर्याप्त नमी का ध्यान रखना आवश्यक है। नमी कम पड़ने पर किसानों को दुबारा बुवाई करनी पड़ सकती है। दुबारा बुवाई वाली फसलों से ज्यादा बेहतर उत्पादन की उम्मीद नहीं की जा सकती है। इसीलिए किसान भाई पर्याप्त नमी देखकर की बुवाई करें। ----- लोकेन्द्र नरवार
तेज बारिश और ओलों ने गेहूं की पूरी फसल को यहां कर दिया है बर्बाद, किसान कर रहे हैं मुआवजे की मांग

तेज बारिश और ओलों ने गेहूं की पूरी फसल को यहां कर दिया है बर्बाद, किसान कर रहे हैं मुआवजे की मांग

इस साल पड़ने वाली जोरों की ठंड ने सभी को परेशान किया है। अब घर में पाले के बाद ओले से किसान बेहद परेशान हो रहे हैं। मध्य प्रदेश के छतरपुर व अन्य जिलों में चना, मटर, गेहूं, सरसों की फसलों को अच्छा खासा नुकसान पहुंचा है। किसानों ने मुआवजे की मांग की है। किसानों का संकट खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। पहले सूखे के कारण बिहार, छत्तीसगढ़ में किसानों की फसलें ही सूख गई थीं। इनके आस पड़ोस के राज्यों में बाढ़ ने कहर बरपाया। वहीं खरीफ सीजन के आखिर में तेज बारिश ने धान समेत अन्य फसलों को बर्बाद कर दिया। पिछले कुछ दिनों से किसान पाले को लेकर बहुत ज्यादा परेशान हैं। इस बार बारिश और उसके साथ पड़े ओले ने फसलों को नुकसान पहुंचाया है। किसान मुश्किल से ही अपनी फसलों का बचाव कर पा रहे हैं। बारिश से पड़ने वाले पानी से तो किसान जैसे-तैसे बचाव कर लेते हैं। लेकिन ओलों से कैसे बचा जाए। 

मध्य प्रदेश में ओले से फसलों को हुआ भारी नुकसान

मध्य प्रदेश में ओले से कई जगहों पर फसलें बर्बाद हो गई हैं। छतरपुर में बारिश से गेहूं की फसल पूरी तरह खत्म होने की संभावना मानी गई है। इस क्षेत्र में किसानों ने सरसों, चना, दालों की बुवाई की है। अब ओले पड़ने के कारण इन फसलों को नुकसान पहुंचा है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, बारिश और ओले से हुए नुकसान को लेकर छतरपुर जिला प्रशासन ने भी जानकारी दी है।

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इन क्षेत्रों में चना, गेहूं को भी नुकसान

बुदेलखंड के छतरपुर जिले में बिजावर, बड़ा मल्हरा समेत अन्य क्षेत्रों में पिछले तीन दिनों में ओले पड़ना दर्ज किया गया है। इससे चना, गेहूं समेत रबी की अन्य फसलों को भी नुकसान पहुंचा है। किसानों से हुई बातचीत में पता चला है, कि जब तक खेती का सही ढंग से आंकलन नहीं किया जाएगा। तब तक उनकी तरफ से यह बताना संभव नहीं है, कि फसल को कितना नुकसान हुआ है। 

प्रशासन कर रहा फसल नुकसान का आंकलन

छतरपुर समेत आसपास के जिलों में ओले इतने ज्यादा गिरे हैं, कि ऐसा लगता है मानो पूरी बर्फ की चादर बिछ गई हो। किसान अपनी आर्थिक स्थिति को लेकर भी काफी परेशान हो गए हैं। इसीलिए छतरपुर जिला प्रशासन ने फसल के नुकसान को लेकर सर्वे कराना शुरू कर दिया है। ताकि प्रश्नों का सही ढंग से आकलन किया जा सके और उचित रिपोर्ट कृषि विभाग को भेजी जाए। प्रशासन द्वारा दी गई रिपोर्ट के आधार पर ही किसानों को मुआवजा दिया जाएगा 

किसान कर रहे मुआवजे की मांग

लोकल किसानों से हुई बातचीत से पता चला कि इस समय में होने वाली कम बारिश गेहूं की फसल के लिए बहुत ज्यादा फायदेमंद है। लेकिन पिछले 3 दिन से बारिश बहुत तेज हुई है और साथ में आने वाले ओलों ने फसलों को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया है। किसान अपनी फसल को लेकर परेशान हैं और निरंतर सरकार से मुआवजे की मांग कर रहे हैं।

सेब उत्पादन में इस साल काफी गिरावट की आशंका है

सेब उत्पादन में इस साल काफी गिरावट की आशंका है

देश में शीतलहर और बर्फवारी का कहर चल रहा है। परंतु, विगत वर्ष की तुलना में इस बार कम बारिश और बर्फबारी की वजह से देश में सेब उत्पादन काफी घट सकता है। मौसम विभाग के अनुसार, आगामी दिनों में बारिश-बर्फबारी होने की संभावना है। परंतु, ये सेब के चिलिंग पीरियड पूरे करने के लिए अनुकूल नहीं है। सेब की खेती करने वाले कृषकों के लिए एक काफी बुरी खबर है। भारत में इस साल औसत से कम बारिश एवं बर्फबारी की वजह से सेब की पैदावार में गिरावट आने की आशंका है। ये सेब बागवानों के लिए काफी बड़ी चुनौती खड़ी कर सकती है। दरअसल, उत्तराखंड, जम्मू कश्मीर एवं हिमाचल प्रदेश जैसे सेब उत्पादक राज्यों में इस बार ना के समान बर्फबारी दर्ज हुई है। इसकी वजह से किसान बेहद चिंतित हैं। 

जनवरी के माह में एक सप्ताह से ज्यादा का वक्त बीत जाने के उपरांत भी इन राज्यों में वर्षा नहीं हुई है। बरसात ना होने के चलते बर्फबारी का भी कोई नामोनिशान नहीं है। इससे सेब की फसल को आवश्यकता के अनुसार, सर्दियों वाला मौसम नहीं मिल रहा है। इस परिस्थिति में विशेषज्ञों ने कहा है, कि कम बर्फबारी की वजह से सेब के आकार पर काफी प्रभाव पड़ेगा और उसकी मिठास भी घट जाऐगी।

सेब उत्पादन में भारी कमी की आशंका 

बागवानी विशेषज्ञों का कहना है, कि यदि कुछ दिनों में बारिश और बर्फबारी नहीं होती है, तोसेब की पैदावार में 20 से 25 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। सेब पैदावार में गिरावट आने की वजह से सेब की कीमत भी काफी बढ़ सकती है। ऐसा कहा जा रहा है, कि बारिश न होने की वजह से भूमि से नमी गायब हो गई है। इसके परिणामस्वरूप सेब के पौधों को पर्याप्त नमी नहीं मिल पा रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक, सेब के पौधों के विकास के लिए न्यूनतम 800 से 1000 घंटे के चिलिंग पीरियड की आवश्यकता होती है। परंतु, बारिश-बर्फबारी न होने के चलते चिलिंग पीरियड पूर्ण नहीं हो पाया है। ऐसी स्थिति में सेब की उपज काफी प्रभावित होने की संभावना हैं।

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किसान बारिश व बर्फबारी के लिए ईश्वर से भी प्रार्थना कर रहे हैं 

अगर हिमाचल प्रदेश पर एक नजर डालें, तो यहां के कृषक भी बारिश और बर्फबारी न होने से निराशा है। प्रदेश में बारिश और बर्फबारी की कमी के परिणामस्वरूप सेब के 5500 करोड़ रुपये के व्यवसाय पर काफी संकट के बादल छा रहे हैं। क्योंकि, बर्फबारी अब तक प्रारंभ नहीं हुई है, जिससे चिलिंग पीरियड की प्रक्रिया भी आरंभ नहीं हो सकी है। बतादें, कि इससे प्रदेश के हजारों बागबानों की चिंता काफी बढ़ गई है। ऐसे में बागवान बारिश एवं बर्फबारी के लिए देवी-देवताओं की प्रार्थना कर रहे हैं।

बरसात होने को लेकर IMD ने क्या संदेश दिया है ? 

सेब एक बेहद स्वादिष्ट फसल है। हिमाचल प्रदेश के अतिरिक्त उत्तराखंड में भी बड़े पैमाने पर सेब की खेती की जाती है। यहां लगभग 25 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सेब के बागान लगे हुए हैं, जिससे प्रति वर्ष तकरीबन 67 हजार टन सेब की पैदावार होती है। उत्तरकाशी, नैनीताल, चंपावत, चमोली, देहरादून, बागेश्वर और अल्मोड़ा जैसे जनपदों में किसान सेब उगाते हैं। साथ ही, इन क्षेत्रों में किसानों द्वारा पुलम, नाशपाती और खुबानी की खेती भी की जाती है। यही कारण है, कि यहां के कृषक बारिश और बर्फबारी न होने की वजह से बेहद परेशान हैं। किसानों का कहना है, कि यदि बारिश और बर्फबारी नहीं हुई तो इससे उनकी फसल बर्बाद हो जाऐगी। साथ ही, मौसम विभाग के अनुसार, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में आगामी कुछ दिनों में बारिश-बर्फबारी होने की संभावना हैं। 

मुंबई में आज भी टमाटर की कीमतें सातवें आसमान पर हैं

मुंबई में आज भी टमाटर की कीमतें सातवें आसमान पर हैं

मुंबई में जून में, टमाटर की कीमतें 30 रुपये प्रति किलोग्राम के रेगुलर भाव से तकरीबन दोगुनी होकर 13 जून को 50-60 रुपये हो गईं। जून के समापन तक 100 रुपये को पार कर गईं।

मुंबई में टमाटर की कीमतें

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि कंज्यूमर अफेयर के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में टमाटर के मैक्सीमम प्राइस 200 रुपये से नीचे आ गए थे। साथ ही, बात यदि मुंबई की करें तो विभाग के मुताबिक टमाटर का खुदरा भाव 160 रुपये प्रति किलोग्राम था। परंतु, वीकेंड पर टमाटर के रिटेल भावों के सारे रिकॉर्ड तोड़ने की खबरें सामने आ रही हैं। जी हां, मुंबई में टमाटर का भाव 200 रुपये प्रति को पार करते हुए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। कीमतों में बढ़ोतरी के कारण खरीदारों की संख्या पर भी प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिला है। यह अब तक के सबसे निचले स्तर पर आ चुकी है, जिससे ग्राहकों की कमी की वजह से कुछ इलाकों में टमाटर की दुकानें बंद करनी पड़ीं।

टमाटर की कीमत विगत सात हफ्ते में 7 गुना तक बढ़ी है

मूसलाधार बारिश की वजह से कुल फसल की कमी एवं बड़े पैमाने पर क्षतिग्रस्त होने की वजह से बहुत सारी जरूरी सब्जियों के अतिरिक्त टमाटर की कीमतें जून से लगातार बढ़ रही हैं। जून में, टमाटर की कीमतें 30 रुपये प्रति किलोग्राम के रेगुलर भाव से तकरीबन दोगुनी होकर 13 जून को 50-60 रुपये हो गईं। जून के आखिर तक 100 रुपये को पार कर गईं। 3 जुलाई को इसने 160 रुपये का एक नया रिकॉर्ड बनाया, सब्जी विक्रेताओं ने भविष्यवाणी की कि रसोई का प्रमुख उत्पाद अंतिम जुलाई तक 200 रुपये की बाधा को तोड़ देगा, जो उसने किया है। ये भी पढ़े: सरकार अब 70 रुपए किलो बेचेगी टमाटर

किस वजह से टमाटर के भाव में आया उछाल

टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एपीएमसी वाशी के डायरेक्टर शंकर पिंगले के मुताबिक टमाटर का थोक भाव 80 रुपये से 100 रुपये प्रति किलोग्राम के मध्य है। हालांकि, लोनावाला लैंडस्लाइड की घटना, उसके पश्चात ट्रैफिक जाम और डायवर्जन की वजह से वाशी मार्केट में प्रॉपर सप्लाई की बाधा खड़ी हो गई, जिसकी वजह से कीमतों में अस्थायी तौर पर इजाफा देखने को मिला। डायरेक्टर ने बताया है, कि कुछ दिनों के भीतर सप्लाई पुनः आरंभ हो जाएगी।

जानें भारत में कहाँ कहाँ टमाटर 200 से ऊपर है

बतादें, कि वाशी के एक और व्यापारी सचिन शितोले ने यह खुलासा किया है, कि टमाटर 110 से 120 रुपये प्रति किलोग्राम पर विक्रय किया जा रहा है। दादर बाजार में रोहित केसरवानी नाम के एक सब्जी विक्रेता ने कहा है, कि वहां थोक भाव 160 से 180 रुपये प्रति किलो है। अचंभित करने वाली बात यह है, कि उस मुख्य दिन पर वाशी बाजार में अच्छी गुणवत्ता वाले टमाटर मौजूद नहीं थे। माटुंगा, फोर बंगलोज, अंधेरी, मलाड, परेल, घाटकोपर, भायखला, खार मार्केट, पाली मार्केट, बांद्रा और दादर मार्केट में विभिन्न विक्रेताओं ने टमाटर की कीमतें 200 रुपये प्रति किलोग्राम तक बताईं। लेकिन, कुछ लोग 180 रुपये किलो बेच रहे थे।

बहुत सारे विक्रेताओं ने बंद की अपनी दुकान

रविवार को ग्राहकों की कमी के चलते फोर बंगलों और अंधेरी स्टेशन इलाके में टमाटर की दोनों दुकानें बिल्कुल बंद रहीं। टमाटर विक्रेताओं का कहना है, कि जब टमाटर की कीमतें गिरेंगी तब ही वो दुकान खोलेंगे। वैसे कुछ विक्रेताओं ने यह कहा है, कि त्योहारी सीजन जैसे कि रक्षाबंधन अथवा फिर जन्माष्टमी के दौरान दुकान खोलेंगे। बाकी और भी बहुत सारे दूसरे सब्जी दुकानदारों ने अपने भंडार को कम करने अथवा इसे प्रति दिन मात्र 3 किलोग्राम तक सीमित करने जैसे कदम उठाए गए हैं। विक्रेताओं में से एक ने हताशा व्यक्त की क्योंकि ज्यादातर ग्राहक सिर्फ और सिर्फ कीमतों के बारे में पूछ रहे हैं और बिना कुछ खरीदे वापिस लौट रहे हैं।

अगस्त महीने में खेती किसानी से संबंधित अहम कार्य जिनसे किसानों को होगा बेहतरीन फायदा

अगस्त महीने में खेती किसानी से संबंधित अहम कार्य जिनसे किसानों को होगा बेहतरीन फायदा

अगर आप भी आने वाले महीने यानी की अगस्त माह में अपनी फसल व पशुओं से अच्छा लाभ चाहते हैं, तो यह कार्य जरूर करें। किसानों को फसल से अच्छा मुनाफा पाने के लिए खेत पर सीजन के अनुसार ही फसलों की रोपाई करनी चाहिए। जिससे कि वह समय पर अच्छा लाभ और साथ ही अच्छी उत्पादन बढ़ा सके। इसी कड़ी में आज के इस लेख में हम आपके लिए अगस्त माह के कृषि कार्य की संपूर्ण जानकारी लेकर आए हैं। तो आइए इनके बारे में जानते हैं, सबसे पहले अगस्त माह की फसलों के विषय में जानने का प्रयास हैं।

अगस्त महीने में खेती किसानी से जुड़े संबंधित कार्य

धान, सोयाबीन, मूँगफली और सूरजमुखी से जुड़े कार्य

धान इस वक्त धान की रोपाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए, जिससे कि आप इससे अच्छी पैदावार ले सको। सोयाबीन की फसल अगस्त माह में किसानों को अपनी
सोयाबीन की फसल बुआई पर सबसे अधिक ध्यान रखने की आवश्यकता है। साथ ही, इनके रोग पर नियंत्रण करने के लिए कदम उठाने चाहिए। इसके लिए आप डाईमेथोएट 30 ई.सी. की एक लीटर मात्रा 700-800 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें। मूंगफली की बात की जाए तो इस माह में मूंगफली के खेत में मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए। सूरजमुखी की ओर ध्यान दें तो अगस्त माह में किसानों को खेत में सूरजमुखी के पौधे लाइन से लगाने चाहिए। ध्यान रहे कि पौधों का फासला कम से कम 20 सेमी तक कर होनी चाहिए।

बाजरा, गोभी, बैगन, कद्दू और अगेती गाजर से जुड़े कार्य

बाजरा की बात की जाए तो इस दौरान बाजरे के कमजोर पौधों को खेत से निकालकर फैंक देना चाहिए। पौधों से पौधों की दूरी 10-15 सेंमी तक होनी चाहिए। अरहर के लिए अगस्त में अरहर फसल के खेत में निराई-गुड़ाई करके आपको खरपतवार को निकाल देना है। बतादें, कि रोग निवारण के उपायों को अपनाना चाहिए। गोभी की बात की जाए तो इस महीने में गोभी की नर्सरी की तैयार करनी चाहिए। अगस्त में अगेती गाजर की बुवाई चालू कर देनी चाहिए। कद्दू की बात करें तो इस समय आपको मचान बनाकर सब्जियों पर बेल चढ़ा देनी चाहिए। बैंगन की सब्जी में इस समय बीज उपचारित करके फोमोप्सिस अंगमारी तथा फल विगलन की रोकथाम करें।

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आम और नींबू से संबंधित कार्य

आम की बात करें तो अगस्त महीने में आपको आम के पौधों में लाल रतुआ एवं श्यामवर्ण (एन्थ्रोक्नोज ) की बीमारी पर कॉपर ऑक्सिक्लोराइड (0.3 प्रतिशत ) दवा का छिड़काव करना चाहिए। नींबू के लिए अगस्त महीने में नींबू में रस चूसने वाले कीड़े आने पर मेलाथियान (2 मिली/ लीटर पानी) का छिड़काव अवश्य करें। किसान भाई हमेशा पारंपरिक खेती करके किसान ज्यादा मुनाफा नहीं उठा सकते हैं।

अगस्त माह के दौरान पशुपालन से संबंधित में कार्य

अगस्त माह में पशुपालन से संबंधित बात करें तो इस महीने में पशुओं को सबसे ज्यादा मौसम से जुड़ी बीमारी का खतरा होता है। क्योंकि, अगस्त माह में भारत के विभिन्न राज्यों में बारिश का सिलसिला सुचारु रहता है। इससे बचने के लिए पशुपालक भाइयों को विभिन्न प्रकार के अहम कदम अवश्य उठाने चाहिए। इसके अतिरिक्त सुनील ने यह भी कहा है, कि पशुओं में छोटा रोग भी होने पर उसका अतिशीघ्र उपचार करें, जिससे कि वह फैल कर बड़ा रूप ना ले पाए।
बारिश की वजह से इस राज्य में बढ़े सब्जियों के भाव

बारिश की वजह से इस राज्य में बढ़े सब्जियों के भाव

ज्यादा बारिश की वजह से फसलों को काफी क्षति हुई है। इसके चलते परवल, मूली, फूलगोभी और बैंगन समेत कई प्रकार की सब्जियों की पैदावार में गिरावट आई है। बतादें, कि बारिश से मंडियों में सब्जियों की आवक बेहद प्रभावित होने के चलते सब्जियों का भाव एक बार पुनः बढ़ गया है। बिहार में विगत बहुत दिनों से रूक-रूक कर हो रही बरसात ने एक बार पुनः महंगाई बढ़ा दी है। विशेष कर सब्जियों के भाव में आग लग चुकी है। महंगाई का मामला यह है, कि गुरुवार शाम को बहुत सारी सब्जियों का भाव 100 रुपये किलो के लगभग हो चुका है। ऐसी स्थिति में आम आदनी की थाली से हरी सब्जियां विलुप्त हो गई हैं। साथ ही, व्यापारियों का कहना है, कि बारिश के साथ-साथ जितिया पर्व की वजह से भी सब्जियों की कीमत में इतनी ज्यादा वृद्धि दर्ज की गई है।

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परंपरागत खेती छोड़ हरी सब्जी की खेती से किसान कर रहा अच्छी कमाई दरअसल, राजधानी पटना सहित संपूर्ण बिहार राज्य में विगत चार- पांच दिन से थम-थम कर बारिश हो रही है। इसकी वजह से हरी सब्जियों की कीमत सातवें आसमान पर पहुंच चुकी है। ऐसा कहा जा रहा है, कि खराब मौसम के कारण मंडियों में सब्जियों की आवक भी काफी प्रभावित हुई है। इससे इनकी कीमत में 10 से 20 रुपये प्रति किलो की वृद्धि दाखिल की गई है।

कितनी कीमत पर बिक रही सब्जियां

पटना के स्थानीय सब्जी दुकानदारों का कहना है, कि विगत चार से पांच दिनों में सब्जियों की कीमत में अत्यधिक वृद्धि देखने को मिली है। चार दिन पूर्व जो फूलगोभी 40 रुपये किलो थी, अब वह 60 से 80 रूपये किलो रुपए किलो बिक रही है। इसी प्रकार टमाटर एवं नेनुआ भी काफी महंगे हो गए हैं। ये दोनों ही सब्जियां 30 रुपये किलो तक बिक रही हैं।

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नवरात्री के दिनों में कीमतें बढ़ेंगी

विशेष बात यह है, कि सरपुतिया (तुरई) सबसे अधिक लोगों को रूला रही है। गुरुवार शाम को यह 200 रुपये किलो हो गई थी, जब कि ऐसी स्थिति में यह 10 से 20 रुपये किलो बिकती थी। साथ ही, बहुत सारे लोग 10 रुपये पीस भी सरपुतिया (तुरई) खरीद रहे थे। साथ ही, किसानों का कहना है कि अक्टूबर माह में हुई मूसलाधार बारिश की वजह से सब्जियों के फूल झड़ गए हैं। वहीं, बैंगन, गोभी और मूली समेत बाकी सब्जियों की फसल खेत में ही खराब हो गई। ऐसे में सब्जियों की पैदावार में गिरावट देखने को मिली है। पटना बाजार समिति के फल सब्जी संघ के उपाध्यक्ष जय प्रकाश वर्मा ने बताया है, कि फलों की कीमत फिलहाल स्थिर है। परंतु, नवरात्र के दौरान इनकी कीमतों में भी उछाल देखने को मिल सकता है।
राजस्थान में कम बारिश के चलते सरकार ने 15000 तालाब बनाने का लिया फैसला : किसान फार्म पौंड स्कीम (Farm pond) - Khet talai (खेत तलाई)

राजस्थान में कम बारिश के चलते सरकार ने 15000 तालाब बनाने का लिया फैसला : किसान फार्म पौंड स्कीम (Farm pond) - Khet talai (खेत तलाई)

राजस्थान में बारिश कम होने के कारण और प्रचंड गर्मी से कभी कभी लोगो के पीने तक के लिए पानी नहीं रहता. कई सारे कुएं भी सूख जाते है. राजस्थान के किसानों को सबसे ज्यादा दिक्कत खेती में सिंचाई की होती है. हम सबको पता है कि यदि खेतो में सिंचाई न की जाएगी तो फसल नही होगी और यदि फसल नही होगी तो पहली दिक्कत पानी की दूसरी दिक्कत खाने की तो किसान कैसे जीवन यापन करेंगे. खेती ही कई किसानों का मुख्य व्यवसाय है. राजस्थान सरकार ने इस समस्या से निजात पाने के लिए किसान फार्म पौंड स्कीम (Farm pond (Khet talai )) निकाली है. इस योजना के तहत जो भी किसान इस योजना के लिए आवेदन करेगा तो उसके खेतो में पानी इकट्ठा करने के लिए तालाब बनवाना होगा. जिससे जब भी बारिश होगी तो उस तालाब में पानी इकट्ठा हो जाएगा जिसे किसान बाद में अपने खेतो की सिंचाई के लिए इस्तमाल कर सकता है. इस स्कीम की मदद से किसानो की फसल का नुकसान नहीं होगा. यह स्कीम किसानों के लिए बहुत मददगार साबित होगी. राज्य सरकार इसके निर्माण के लिए 63000 से 90000 रुपए तक की आर्थिक मदद देगी. योजना में प्लास्टिक लाइनिंग के लिए अलग से रकम मिलती है और कच्चे तालाब के लिए अलग.

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राज्य सरकार कितनी आर्थिक मदद देगी ?

सरकार ने कच्चे फार्म पौंड को बनवाने के लिए 63000 रुपए की मदद देगी. जबकि प्लास्टिक लाइनिंग के साथ वाले पोंड पर लगभग 90000 रुपए तक की मदद दी जाएगी. कच्चा तालाब लगभग इतना बड़ा होना चाहिए कि उसमे लगभग 1200 घनमीटर पानी इकट्ठा हो जाए. दूसरे तालाब को इस प्रकार बनाना होगा कि उसमे पानी को ज्यादा से ज्यादा समय तक स्टोर करके रखा जा सके.

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किसान फार्म पौंड स्कीम (Khet talai) योजना का लाभ कौन से किसान उठा सकते है ?

• किसान जिसके पास 0.3 हेक्टेयर तक कृषि योग्य जमीन है वो इस योजना के लिए आवेदन कर सकता है. • जो किसान लीज एग्रीमेंट के तहत खेती कर रहे है वो किसान भी इस योजना का फायदा उठा सकते है. • जो किसान लीज एग्रीमेंट पर खेती कर रहे है उनके लिए इस योजना में आवेदन के लिए शर्त रखी गई है. शर्त यह है कि वो किसान कम से कम 7 साल से खेती कर रहे होने चाहिए. • संयुक्त खाते की स्थिति में सह खातेदार प्रति कृषक हिस्सा एक हेक्टेयर से अधिक होने पर आपसी सहमति के आधार पर एक ही खसरे में अलग - अलग फॉर्म पौंड बनवाने के लिए मदद ले सकता है.

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किसान फार्म पौंड स्कीम योजना के लिए कैसे आवेदन करे ?

• इस योजना में आवेदन करने के लिए आप नागरिक सेवा केंद्र या ई - मित्र केंद्र में आवेदन कर सकते है. • आवेदक मूल आवेदन पत्र को ऑनलाइन ई - प्रपत्र में भरेगा. • स्कैन कर दस्तावेज को अपलोड करवाएगा . • किसान को सपथ पत्र देना होगा कि उसके पास कितनी संचित एवं असंचित जमीन है. • आधार कार्ड, बैंक अकाउंट नंबर, भूमि पहचान पत्र और भामाशाह कार्ड जरूरी है. • आवेदनकर्ता को जमाबंदी की नकल देनी होगी • छह महीने से अधिक पुरानी न होनी चाहिए जमाबंदी की नकल.
मौसम विभाग के अनुसार इस बार पर्याप्त मात्रा में होगी बारिश, धान की खेती का बढ़ा रकबा

मौसम विभाग के अनुसार इस बार पर्याप्त मात्रा में होगी बारिश, धान की खेती का बढ़ा रकबा

मौसम विभाग के अनुसार इस बार बारिश पिछले बीते हुए सालो की अपेक्षा ज्यादा होगी. इस बार बारिश की कमी के कारण सुखा नही पड़ेगा, न ही पानी के कमी के कारण फसलों का नुकसान होगा. इस बात से किसान बहुत खुश है. क्योंकि बारिश होने से फसल अच्छी होगी. जिसको देखते हुए खरीफ फसल के धन का रकबा बढ़ा दिया गया है. धान की खेती के लिए किसान तेजी से जुटे है. कुछ किसान धान की नर्सरी डाल चुके है वही कुछ किसान नर्सरी जल्द ही डालने वाले है. कृषि विभाग के अनुसार पहले धान की खेती के लिए 35 हजार हेक्टेयर निर्धारित किया गया था. परंतु मानसून को देखते हुए और मौसम विभाग के अनुमान की इस बार बारिश भरपूर होगी, इसकी वजह से 20 हजार हेक्टेयर रकबा बढ़ा दिया गया है. जिस वजह से अब 55 हजार हेक्टेयर में धान की खेती होगी. जिसके लिए 700 क्विटल बीज सरकारी बीज भंडार से बांटा जा चुका है. 200 क्विटल ढैंचा का बीट खेत की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने के लिए बीज भंडार से किसानों को बांटा जा चुका है. पैदावार को बढ़ाने के लिए ढैंचा की बुआई की जाती है. किसान इस बार जी जान से लगे है की पैदावार अच्छी हो क्योंकि बीते वर्ष के मुताबिक इस साल गेहूं की पदावर कम हुई है.
उपभोक्ता मंत्रालय ने बताया प्याज-टमाटर के दामों में हुई कितनी गिरावट

उपभोक्ता मंत्रालय ने बताया प्याज-टमाटर के दामों में हुई कितनी गिरावट

जानिए एक महीने में कितने कम हो गए प्याज-टमाटर के दाम

आपने सुना होगा "आसमान से गिरे खजूर में अटके"…. लेकिन प्याज-टमाटर के मामले में "खेत में टूटे..मंडी में पिचके" वाली बात साबित हो रही है… जी हां, प्याज-टमाटर की कीमतों में आई गिरावट के बारे में केंद्र सरकार ने जानकारी दी है। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय की जानकारी कहती है कि
मानसूनी बारिश के कारण मंडियों में आवक बढ़ी है। इससे औसत खुदरा मूल्य में पिछले महीने की तुलना में 29 फीसदी गिरावट आई है। मंत्रालय के अनुसार प्याज की खुदरा कीमत भी पिछले साल के मुकाबले 9 प्रतिशत कम यानी काफी हद तक नियंत्रण में है। आम आदमी की बात करें तो पिछले दिनों टमाटर के भाव जहां सुर्ख रहे तो वहीं प्याज की कीमतें नियंत्रण में रहीं। अंतर की बात करें तो टमाटर की खुदरा कीमत में पिछले माह के मुकाबले 29 जबकि प्याज के दाम में 9 फीसदी तक की कमी आई।

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उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के अनुसार टमाटर के अखिल भारतीय औसत खुदरा मूल्य पिछले महीने की तुलना में 29 प्रतिशत कम हुए। मंत्रालय के आंकड़े कहते हैं कि, टमाटर का अखिल भारतीय औसत खुदरा मूल्य मंगलवार को 37.35 रुपए प्रति किलोग्राम था। एक महीने पहले की समान अवधि में टमाटर की कीमत 52.5 रुपए प्रति किलोग्राम थी। बीते दिनों टमाटर के दाम (Tomato Price) में बढ़त के कारण आम जनता को खासी परेशानी हुई थी। टमाटर के मुकाबले हालांकि प्याज की कीमतें (Onion Price) नियंत्रण में रहीं।

बफर स्टॉक का सहारा -

भविष्य में भी प्याज की कीमत पर नियंत्रण के लिए सरकार की ओर से किए जा रहे इंतजाम के बारे में भी जानकारी दी गई है। मंत्रालय ने बताया है कि, सरकार ने चालू वर्ष में प्याज के 2.50 लाख टन भंडारण की व्यवस्था की है। ये भी पढ़े: अत्यधिक गर्मी से खराब हो रहे हैं आलू और प्याज, तो अपनाएं ये तरीके आज यह अभी तक का सबसे अधिक खरीदा गया प्याज का बफर स्टॉक है। मंत्रालय का कहना है कि बफर की खरीद ने कृषि मंत्रालय द्वारा 317.03 लाख टन के रिकॉर्ड उत्पादन के बावजूद इस साल, प्याज के मंडी दाम को टूटने से बचाने में मदद प्रदान की है। बताया गया है कि, अगस्त-दिसंबर के दौरान कीमतों की तेजी को कम करने के लिए प्याज का बफर स्टॉक सुनियोजित तरीके से जारी किया जाएगा। इस संग्रह को लक्षित खुले बाजार में बिक्री के माध्यम से रिलीज़ किया जाएगा। इसे खुदरा दुकानों के माध्यम से आपूर्ति के लिए राज्यों और सरकारी एजेंसियों को प्रदान किया जाएगा। खुले बाजार में जारी करने के लिए उन राज्यों/शहरों को लक्षित किया जाएगा, जहां कीमत पिछले महीने की तुलना में बढ़ रही है।
बारिश के चलते बुंदेलखंड में एक महीने लेट हो गई खरीफ की फसलों की बुवाई

बारिश के चलते बुंदेलखंड में एक महीने लेट हो गई खरीफ की फसलों की बुवाई

झांसी। बुंदेलखंड के किसानों की समस्या कम होने की बजाय लगातार बढ़ती जा रहीं हैं। पहले कम बारिश के कारण बुवाई नहीं हो सकी, अब बारिश बंद न होने के चलते बुवाई लेट हो रहीं हैं। इस तरह बुंदेलखंड के किसानों के सामने बड़ी परेशानी खड़ी हो गई है। मौसम खुलने के 5-6 दिन बाद ही मूंग, अरहर, तिल, बाजरा और ज्वर जैसी फसलों की बुवाई शुरू होगी। लेकिन बुंदेलखंड में इन दिनों रोजाना बारिश हो रही है, जिससे बुवाई काफी पिछड़ रही है।

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बारिश से किसानों पर पड़ रही है दोहरी मार

- 15 जुलाई को क्षेत्र के कई हिस्सों में करीब 100 एमएम बारिश हुई, जिससे किसानों ने थोड़ी राहत की सांस ली और किसान खेतों में बुवाई की तैयारियों में जुट गए। लेकिन रोजाना बारिश होने के चलते खेतों में अत्यधिक नमी बन गई है, जिसके कारण खेतों को बुवाई के लिए तैयार होने में वक्त लगेगा। वहीं शुरुआत में कम बारिश के कारण बुवाई शुरू नहीं हुई थी। इस तरह किसानों को इस बार दोहरी मार झेलनी पड़ रही है।

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नमी कम होने पर ही खेत मे डालें बीज

- खेत में फसल बोने के लिए जमीन में कुछ हल्का ताव जरूरी है। लेकिन यहां रोजाना हो रही बारिश से खेतों में लगातार नमी बढ़ रही है। नमी युक्त खेत में बीज डालने पर वह बीज अंकुरित नहीं होगा, बल्कि खेत में ही सड़ जाएगा। इसमें अंकुरित होने की क्षमता कम होगी। बारिश रुकने के बाद खेत में नमी कम होने पर ही किसान बुवाई कर पाएंगे।

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रबी की फसल में हो सकती है देरी

- खरीफ की फसलों की बुवाई लेट होने का असर रबी की फसलों पर भी पड़ता दिखाई दे रहा है। जब खरीफ की फसलें लेट होंगी, तो जाहिर सी बात है कि आगामी रबी की फसल में भी देरी हो सकती है।
कम बारिश के चलते धान की खेती नहीं कर पाएंगे झारखंड के किसान

कम बारिश के चलते धान की खेती नहीं कर पाएंगे झारखंड के किसान

रांची। - लोकेन्द्र नरवार इस साल झारखंड में काफी कम बारिश हो रही है। बारिश की कमी के चलते झारखंड के किसान धान की खेती नहीं कर पाएंगे। इससे किसानों को काफी नुकसान झेलना पड़ेगा। इस सीजन झारखंड में मानसून पूरी तरह फेल साबित हो रहे हैं। यही कारण है कि राज्य में धान की खेती से मुनाफा कमाने वाले किसानों को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ेगा। माना जा रहा है कि इस नुकसान से किसान दो साल में ही उभर पाएंगे।


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15 अगस्त तक करते हैं धान की रोपाई

- अगर बारिश का थोड़ा बहुत भी साथ मिलता है, तो झारखंड के किसान 15 अगस्त तक धान की रोपाई करते हैं। लेकिन इस साल किसानों को बारिश की बेरुखी का सामना करना पड़ रहा है। इससे किसानों की तमाम योजनाएं फेल हो रहीं हैं। कम बारिश भी होती तो 15 अगस्त तक किसान धान की रोपाई कर देते। हालांकि इससे धान की पैदावार कम होती, लेकिन किसानों का मनोबल बना रहता। लेकिन बारिश की ऐसी बेरुखी ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है।
किसी की पढ़ाई, तो किसी की शादी में होगी रुकावट
- माना जा रहा है कि इस साल झारखंड के किसानों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो सकता है। लिहाजा किसानों के बच्चों की पढ़ाई एवं कई किसानों के बच्चों की शादी में भी रुकावट आ सकती है। किसान सरकार से मदद की मांग कर रहे हैं।


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खेतों में खड़ा है बिचड़ा, ऊपर से काटकर धान रोपें किसान

- इन दिनों झारखंड के अधिकांश जिलों में अत्यधिक धूप के कारण, धान वाले खेतों में बिचड़ा खड़ा हुआ है, जो काफी बड़ा हो चुका है। बिचड़ा खेतों में ही झुलस रहा है। किसान बारिश के अभाव में खेत तैयार नहीं कर पा रहे हैं। हालांकि, कृषि विभाग ने किसानों से बिचड़ा को ऊपर से काटकर धान रोपाई करने का सुझाव दिया है। लेकिन इसमें किसानों को ज्यादा सफलता मिलती नहीं दिख रही है।
यूपी के ज्यादातर जिले सूखे की चपेट में लेकिन सूखाग्रस्त नहीं घोषित हुआ प्रदेश

यूपी के ज्यादातर जिले सूखे की चपेट में लेकिन सूखाग्रस्त नहीं घोषित हुआ प्रदेश

भले ही पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश भारी बारिश की चपेट में आकर बाढ़ झेल रहा हो, लेकिन उत्तर प्रदेश राज्य में इस साल बारिश की भारी किल्लत देखने को मिल रही है। अगस्त का महीना विदा लेने को है और उत्तर प्रदेश के कई जिलों में अभी सामान्य से बेहद कम बारिश दर्ज की गई, जिसकी वजह से किसान बेहाल हैं और परिस्थितियां सूखे जैसी हो गई हैं। जब कोई क्षेत्र सूखा घोषित होता है तो उसे सरकार मुआवजा देती है, लेकिन चौंकाने वाली बात है कि सूखे के आंकलन को लेकर सरकारी कागजों में अलग ही खेल चल रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अगर विश्लेषण सही से किया जाए, तो पता चलेगा कि राज्य के 38 ज़िलों में सामान्य से कम बारिश हुई है जिसकी वजह से वहां के ज्यादातर इलाकों में खरीफ की फसलें नहीं बोई गईं। लेकिन जब बात सरकारी अमले की आती है, तो उन्होंने जिलेवार आंकड़े तो तैयार किए हैं लेकिन ये आंकड़े कहानी कुछ और ही बयां कर रहे हैं।

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यूपी कृषि विभाग का कहना है कि इस बार खरीफ की फसल किसानों ने जमकर बोई और रोपी है। आंकड़ों में ये भी कहा गया है कि 98 प्रतिशत भूमि पर बुवाई और रोपाई का काम पूरा हो चुका है। अब इसी बात के चलते उत्तर प्रदेश में सूखे की घोषणा नहीं की गई है जबकि प्रदेश में सूखे जैसे हालात तो हैं ही। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो प्रदेश के 38 जिलों में खरीफ की फसलें बहुत कम बोई या रोपी गई हैं और किसान बदहाल हैं। ऐसे में उन्हें इलाका सूखाग्रस्त घोषित होने से सरकार से कुछ उम्मीदें थीं, लेकिन अब ये उम्मीदें भी खत्म नजर आ रही हैं। यूपी का इटावा जिला कम बारिश होने से सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है।

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आलम यह है कि यहां किसान बेहद परेशान हैं। लेकिन सरकारी आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इटावा जिलें में 50 हजार हेक्टेयर में बुवाई और रोपाई की जानी थी, जिसमें से 43 हजार हेक्टेयर में धान की रोपाई हुई है। इसके अलावा रोपाई और बुवाई जिन जिलों में नहीं हुई है उनके नाम गाजीपुर, जौनपुर, प्रयागराज, प्रतापगढ़, मुरादाबाद, सोनभद्र, मऊ, सुल्तानपुर, अमेठी और लखनऊ हैं। बारिश न होने से खेतों में दरारें पड़ गई हैं, जिसकी वजह से सूख चुके धान के खेतों पर कई किसानों ने ट्रैक्टर से जुताई कर दी है। देवरिया के एक किसान ने बताया कि उन्होंने अपने खेत में धान बोई थी, लेकिन जब बारिश नहीं हुई तो मजबूरी में उन्हें धान लगे खेत को ट्रैक्टर से जोतना पड़ा। वैसे तो ज्यादातर जगहों पर किसानों ने बुवाई या रोपाई की ही नहीं थी, लेकिन जहां की गई वहां की फसलें खराब हो गई हैं।

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प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से किसानों को क्या है फायदा इस साल यूपी के अधिकतर इलाकों में 65 प्रतिशत से कम बारिश दर्ज की गई है, जिसकी वजह से धान की फसल पीली होकर सूख गई है। जाहिर है कि किसान इस वजह से बेहद परेशान हैं। ऐसे में अगर प्रदेश सूखाग्रस्त घोषित कर दिया जाता है, तो उन्हें कुछ अनुदान मिल जाएगा और उनकी जिंदगी की गाड़ी पटरी पर आ जाएगी।