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रबी

सरसों की फसल में सफेद रतवे का प्रबंधन

सरसों की फसल में सफेद रतवे का प्रबंधन

सरसों की फसल कई रोगों से प्रभावित होती है। जिससे की किसानो को कम पैदावार प्राप्त होती है। सफेद रतवे (White Rust) रोग से फसल को अधिक नुकसान होता है। आज इस लेख में हम आपको सफेद रतवे (White Rust) की रोकथाम के बारे में जानकारी देंगे जिससे की आप समय से फसल में इस बीमारी का नियंत्रण कर सके। 

सरसों की फसल में सफेद रतवे (White Rust) से बचाव के लिए कुछ महत्वपूर्ण निर्देश निम्नलिखित हैं:

सही बीज बुवाई :

 सबसे पहले आपको ध्यान देना है कि फसल की बुवाई के लिए स्वस्थ बीजों का चयन करें जो रोगों से मुक्त हों। स्वस्थ बीजों का चयन करने से फसल में ये रोग नहीं आएगा।   

फसल की समय पर बोना:

 समय पर सरसों की बुवाई की जानी चाहिए ताकि फसल में बीमारी का प्रसार कम हो। देरी से बुवाई की गयी फसल में अधिक रोग का खतरा होता है। कई बार रोग अधिक लग जाता है जिससे आधी पैदावार कम हो जाती है। 

समुचित जल सिंचाई:

जल सिंचाई को समुचित रूप से प्रबंधित करें ताकि पौधों पर पानी जमा नहीं हो, जिससे सफेद रतवे का प्रसार कम हो। फसल में अधिक नमी होने के कारण भी रोग अधिक लगता है। 

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उचित फफूंदनाशकों का प्रयोग:

सरसों की सफेद रतवे के खिलाफ उचित फफूंदनाशकों का प्रयोग करें। कृषि विज्ञानी से सलाह लें और सुरक्षित रोगनाशकों का चयन करें। सफेद रतवा के नियंत्रण के लिए खड़ी फसल में मैंकोजेब(एम 45) फफुंदनाशक 400 से 500ग्राम को 200/250 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ के हिसाब से 15 दिन के अंतर पर कम से कम 2 छिड़काव अवश्य करें जिससे सफेद रतवा का नियंत्रण संभव हो सकता है।

फसल की देखभाल:

 फसल की देखभाल के लिए समय समय पर पौधों की सुरक्षा और मूल से देखभाल करें।

प्रभावित पौधों का हटाएं:

यदि किसी पौधे पर सफेद रतवे के प्रमुख संकेत हैं, तो उन्हें तुरंत उखाड़ कर मिट्टी में दबा दें ताकि बीमारी और फैलने से बचा जा सके।उचित तकनीकी तरीके का प्रयोग करें, जैसे कि स्थानीय परिस्थितियों, जलवायु और मौसम की विशेषताओं के आधार पर सिंचाई और पोषण का प्रबंधन करें।इन उपायों का अनुसरण करके, सरसों की फसल में सफेद रतवे से बचाव किया जा सकता है। ध्यान रहे कि स्थानीय कृषि विभाग या कृषि विज्ञानी से सलाह लेना हमेशा उत्तम होता है ताकि आपको विशेष रूप से अपने क्षेत्र के लिए सबसे उपयुक्त नियंत्रण उपायों की जानकारी मिले।

किसान इस रबी सीजन में मटर की इन उन्नत किस्मों से बेहतरीन उत्पादन उठा सकते हैं

किसान इस रबी सीजन में मटर की इन उन्नत किस्मों से बेहतरीन उत्पादन उठा सकते हैं

किसानों के द्वारा रबी के सीजन में मटर की बिजाई अक्टूबर माह से की जाने लगती है। आज हम आपको इसकी कुछ प्रमुख उन्नत किस्मों के विषय में जानकारी देने जा रहे हैं। किसान कम समयावधि में तैयार होने वाली मटर की किस्मों की बुवाई सितंबर माह के अंतिम सप्ताह से लेकर अक्टूबर के बीच तक कर सकते हैं। इसकी खेती से किसान अपनी आमदनी को दोगुना तक कर सकते हैं। बतादें, कि इसमें काशी नंदिनी, काशी मुक्ति, काशी उदय और काशी अगेती प्रमुख फसलें हैं। इनकी विशेष बात है, कि यह 50 से 60 दिन के दौरान पककर तैयार हो जाती हैं। इससे खेत शीघ्रता से खाली हो जाता है। इसके पश्चात किसान सुगमता से दूसरी फसलों की बिजाई कर सकते हैं। किसान भाई कम समयावधि में तैयार होने वाली मटर की प्रजातियों की बुवाई सितंबर के अंतिम सप्ताह से लेकर अक्टूबर के बीच तक कर दी जाती है।

मटर की उन्नत किस्म

मटर की उन्नत किस्म काशी नंदिनी

इस किस्म को साल 2005 में विकसित किया गया था। इसकी खेती जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल और पंजाब में की जाती है। इससे प्रति हेक्टेयर औसतन 110 से 120 क्विंटल तक पैदावार हांसिल की जा सकती है।

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मटर की उन्नत किस्म काशी मुक्ति

यह किस्म मुख्य तौर पर झारखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब और बिहार के लिए अनुकूल मानी जाती है। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि इससे प्रति हेक्टेयर 115 क्विंटल तक उत्पादन हांसिल हो सकता है। इसकी फलियां और दाने काफी बड़े होते हैं। मुख्य बात यह है, कि इसकी विदेशों में भी काफी मांग रहती है।

मटर की उन्नत किस्म काशी अगेती

यह किस्म 50 दिन की समयावधि में पककर तैयार हो जाती है। बतादें, कि इसकी फलियां सीधी और गहरी होती हैं। इसके पौधों की लंबाई 58 से 61 सेंटीमीटर तक होती है। इसके 1 पौधे में 9 से 10 फलियां लग सकती हैं। इससे प्रति हेक्टेयर 95 से 100 क्विंटल तक का पैदावार प्राप्त हो सकता है।

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मटर की उन्नत किस्म काशी उदय

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि इस प्रजाति को साल 2005 में तैयार किया गया था। इसकी खासियत यह है, कि इसकी फली की लंबाई 9 से 10 सेंटीमीटर तक होती है। इसकी खेती प्रमुख रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में की जाती है। इससे प्रति हेक्टेयर 105 क्विंटल तक की पैदावार मिल सकती है। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि इसकी खेती से किसान अपनी आमदनी को दोगुना तक कर सकते हैं। इसमें काशी मुक्ति, काशी उदय, काशी अगेती और काशी नंदिनी प्रमुख हैं। इनकी विशेष बात है, कि यह 50 से 60 दिन के अंदर तैयार हो जाती हैं। इससे खेत जल्दी खाली हो जाता है। इसके उपरांत किसान आसानी से दूसरी फसलों की बुवाई कर सकते हैं।
गेहूं समेत इन 6 रबी फसलों पर सरकार ने बढ़ाया MSP,जानिए कितनी है नई दरें?

गेहूं समेत इन 6 रबी फसलों पर सरकार ने बढ़ाया MSP,जानिए कितनी है नई दरें?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बुधवार को केंद्रीय कैबिनेट की बैठक हुई जिसमे गेहूं समेत अन्य रबी फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाने का निर्णय लिया गया। सरकार ने गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 40 रुपए बढ़ाकर 2,015 प्रति क्विंटल लेने का फैसला किया है। बता दें, गेहूं इससे पहले 1975 रुपए प्रति क्विंटल था। वहीं आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने चना पर 130 रुपए, मसूर पर 400 रुपए, जौ पर 35 रुपए, सरसों पर 400 रुपए और कुसुम (सूरजमुखी) पर 114 रुपए एमएसपी बढ़ाने का निर्णय लिया गया है। ऐसे में अब चना 5230 रुपए, जौ 1635 रुपए, सरसों 5050 रुपए, मसूर 5500 रुपए जबकि कुसुम 5471 रुपए प्रति क्विंटल की दर से खरीदना पड़ेगा। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि, न्यूनतम समर्थन मूल्य वह दर है जिस पर सरकार किसानों से अन्न  खरीदती है। सरकार रबी और खरीफ दोनों की ही करीब 23 फसलों पर एमएसपी तय करती है। बता दें इन 23 फसलों में से गेहूं और सरसों की फसल रवि की प्रमुख फसलें मानी जाती है। खरीफ की फसलें गर्मी में उगाई जाती है और रबी की फसलें सर्दियों में उगाई जाती है। गौरतलब है कि, पिछले कई दिनों से दिल्ली की सीमाओं पर किसानों का लगातार प्रदर्शन जारी है। इतना ही नहीं बल्कि इन दिनों किसान संगठनों ने अपने इस आंदोलन को और भी बढ़ा दिया है। यह किसान तीन कृषि कानून के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि सरकार अपने कृषि कानून वापस ले और एमएसपी पर कानून बनाए।

कितनी उचित मिलेगी कीमत

2022-23 के लिए रबी फसलों की एमएसपी में बढ़ोतरी केंद्रीय बजट 2018-19 में की गई घोषणा के अनुरूप है, जिसमें कहा गया कि देशभर के औसत उत्पादन को मद्देनजर रखते हुए एमएसपी में कम से कम डेढ़ गुना इजाफा किया जाना चाहिए, ताकि किसानों को उचित कीमत मिल सके। किसान द्वारा खेती में किए गए खर्च के आधार पर यह अनुमान लगाया गया है। इस आधार पर सरकार मानती है कि किसानों को गेहूं, केनोला और सरसों पर 100 प्रतिशत, दाल पर 79 प्रतिशत, चना पर 74 प्रतिशत, जौ पर 60 प्रतिशत एवं कुसुम पर उत्पादन में 50 प्रतिशत लाभ का अनुमान है।

खाद्य तेलों में आत्मनिर्भर हों

दशकों से खद्य तेलों के मामले में हम आत्म निर्भर नहीं हो पाए हैं। इसके चलते सरकार ने नीति बनाई है। बाजार में इस बार सरसेां की कीमतें ठीक ठाक रहने से किसान भी सरसों की खेती के लिए इच्छुक हैं। इधर राष्ट्रीय खाद्य तेल–
पाम ऑयल मिशन (एनएमईओ-ओपी) योजना को भी सरकार ने हाल में घोषित किया है। इस योजना से खाद्य तेलों का घरेलू उत्पादन बढ़ेगा और आयात पर निर्भरता कम होगी। इस योजना के लिये 11,040 करोड़ रुपये रखे गये हैं, जिससे क्षेत्रफल में इजाफे के साथ उत्पादन और आत्म निर्भरता बढ़ेगी। इसके अलावा केंद्रीय कैबिनेट ने कपड़ा क्षेत्र को भी मंजूरी दे दी है। मिली जानकारी के अनुसार, एमएमएफ फैब्रिक्स तथा एमएमएफ (कृत्रिम रेशे) परिधान, टेक्निकल टेक्सटाइल समेत दस अलग-अलग उत्पादों के लिए 10, 683 करोड रुपए से अधिक का पैकेज दिया जाएगा और यह पैकेज अगले 5 साल तक होगा। केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर का कहना है कि, इस योजना से निर्यात और घरेलू विनिर्माण दोनों को ही बढ़ावा मिलेगा।
दिवाली से पूर्व केंद्र सरकार गेहूं सहित 23 फसलों की एमएसपी में इजाफा कर सकती है

दिवाली से पूर्व केंद्र सरकार गेहूं सहित 23 फसलों की एमएसपी में इजाफा कर सकती है

लोकसभा चुनाव से पूर्व ही केंद्र सरकार किसानों को काफी बड़ा तोहफा दे सकती है। ऐसा कहा जा रहा है, कि सरकार शीघ्र ही गेहूं समेत विभिन्न कई फसलों की एमएसपी बढ़ाने की स्वीकृति दे सकती है। वह गेहूं की एसएमसपी में 10 प्रतिशत तक भी इजाफा कर सकती है। लोकसभा चुनाव से पूर्व केंद्र सरकार द्वारा किसानों को बहुत बड़ा गिफ्ट दिए जाने की संभावना है। ऐसा कहा जा रहा है, कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार रबी फसलों के मिनिमम सपोर्ट प्राइस में वृद्धि कर सकती है। इससे देश के करोड़ों किसानों को काफी फायदा होगा। सूत्रों के अनुसार, केंद्र सरकार गेहूं की एमएसपी में 150 से 175 रुपये प्रति क्विंटल की दर से इजाफा कर सकती है। इससे विशेष रूप से राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, बिहार और पंजाब के किसान सबसे ज्यादा लाभांवित होंगे। इन्हीं सब राज्यों में सबसे ज्यादा गेहूं की खेती होती है।

केंद्र सरकार गेंहू की अगले साल एमएसपी में 3 से 10 प्रतिशत वृद्धि करेगी

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार आगामी वर्ष के लिए गेहूं की एमएसपी में 3 प्रतिशत से 10 प्रतिशत के मध्य इजाफा कर सकती है। अगर केंद्र सरकार ऐसा करती है, तो गेहूं का मिनिमम सपोर्ट प्राइस 2300 रुपए प्रति क्विंटल तक पहुंच सकता है। हालांकि, वर्तमान में गेहूं की एमएसपी 2125 रुपए प्रति क्विंटल है। इसके अतिरिक्त सरकार मसूर दाल की एमएसपी में भी 10 प्रतिशत तक का इजाफा कर सकती है।

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यह निर्णय मार्केटिंग सीजन 2024- 25 के लिए लिया जाएगा

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि सरसों और सूरजमुखी (Sunflower) की एमएसपी में 5 से 7 प्रतिशत की बढ़ोतरी की जा सकती है। दरअसल, ऐसी आशा है कि आने वाले एक हफ्ते में केंद्र सरकार रबी, दलहन एवं तिलहन फसलों की एमएसपी बढ़ाने के लिए स्वीकृति दे सकती है। मुख्य बात यह है, कि एमएसपी में वृद्धि करने का निर्णय मार्केटिंग सीजन 2024-25 के लिए लिया जाएगा।

एमएसपी में समकुल 23 फसलों को शम्मिलित किया गया है

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की सिफारिश पर केंद्र मिनिमम सपोर्ट प्राइस निर्धारित करती है। एमएसपी में 23 फसलों को शम्मिलित किया गया है। 7 अनाज, 5 दलहन, 7 तिलहन और चार नकदी फसलें भी शम्मिलित हैं। आम तौर पर रबी फसल की बुवाई अक्टूबर से दिसंबर महीने के मध्य की जाती है। साथ ही, फरवरी से मार्च एवं अप्रैल महीने के मध्य इसकी कटाई की जाती है।

जानें एमएसपी में कितनी फसलें शामिल हैं

  • अनाज- गेहूं, धान, बाजरा, मक्का, ज्वार, रागी और जो
  • दलहन- चना, मूंग, मसूर, अरहर, उड़द,
  • तिलहन- सरसों, सोयाबीन, सीसम, कुसुम, मूंगफली, सूरजमुखी, निगर्सिड
  • नकदी- गन्ना, कपास, खोपरा और कच्चा जूट
रबी सीजन में प्याज उत्पादन करने वाले किसानों के लिए महत्वपूर्ण जानकारी

रबी सीजन में प्याज उत्पादन करने वाले किसानों के लिए महत्वपूर्ण जानकारी

महाराष्ट्र भारत में प्याज उत्पादन के मामले में विशिष्ट राज्य है,क्योंकि महाराष्ट्र में प्याज का उत्पादन काफी किया जाता है। बतादें कि वर्ष में तीन बार प्याज की फसल उगाई जाती है। प्रदेश के सोलापुर, नासिक, पुणे, धुले व अहमदनगर जनपद में सर्वाधिक प्याज का उत्पादन होता है। प्रदेश में फिलहाल रबी सीजन के प्याज की पैदावार की तैयारी चालू है। महाराष्ट्र में किसान अधिकतर प्याज की खेती करते हैं। साथ ही, महाराष्ट्र राज्य में देश ही नहीं बल्कि एशिया की सबसे बड़ी प्याज मंडी नासिक जनपद के लासलगांव में स्थित है। सामान्य रूप से अधिकतर प्रदेशों द्वारा वर्ष में एक ही बार प्याज का उत्पादन किया जाता है। परंतु महाराष्ट्र में ऐसा नहीं है, प्रदेश में एक वर्ष के दौरान रबी सीजन, खरीफ, खरीफ के बाद इस तरह प्याज का तीन बार उत्पादन है।


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महाराष्ट्र राज्य के किसान अधिकतर प्याज का उत्पादन करते हैं और इस पर ही आश्रित रहते हैं हालाँकि सर्वाधिक प्याज उत्पादन रबी सीजन में ही प्राप्त होता है। प्याज के द्वितीय सीजन की बुआई अक्टूबर-नवंबर माह के मध्य में होती है। इसकी फसल जनवरी से मार्च के मध्य तैयार हो जाती है। प्याज का फसल का तीसरा समय रबी सीजन में होता है। रबी सीजन की बुवाई दिसंबर से जनवरी के मध्य होती है, और इसकी फसल की पैदावार मार्च से मई के मध्य ली जाती है। महाराष्ट्र में प्याज की कुल पैदावार का ६० प्रतिशत उत्पादन रबी सीजन के दौरान होता है।

ज्यादातर प्याज की खेती कौन से जिलों में होती है

महाराष्ट्र राज्य के नासिक, पुणे, सोलापुर, जलगाँव, धुले, अहमदनगर, सतारा जनपद में ज्यादा खेती होती है। बतादें कि मराठवाड़ा के कुछ जनपदों में भी प्याज उत्पादन किया जाता है। इसमें भी प्याज उत्पादन के मामले में नासिक जनपद अपनी अलग पहचान रखता है, इसकी मुख्य वजह देश के कुल प्याज उत्पादन का ३७ % महाराष्ट्र राज्य करता है जबकि १० % उत्पादन केवल नासिक जनपद में किया जाता है।


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प्याज उत्पादन के लिए कैसी मिट्टी व भूमि सही होती है

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार प्याज के उत्पादन हेतु कई प्रकार की मिट्टी का उपयोग हो सकता है। प्याज की अच्छी पैदावार लेने के लिए चिकनी, गार, रेतीली, भूरी एवं दोमट मिट्टी का प्रयोग होना चाहिए। प्याज की खेती से बेहतरीन उत्पादन लेने के लिए भूमि के जल निकासी हेतु अच्छा प्रबंधन होना चाहिए। प्याज उत्पादन से पूर्व जमीन तैयार करने हेतु सर्वप्रथम तीन से चार बार जुताई हो एवं रुड़ी खाद के इस्तेमाल से जैविक तत्वों की मात्रा में बढ़ोत्तरी करें। इसके बाद खेत को छोटे-छोटे भाग में बाँट दें। भूमि की सतह से १५ सेमी उंचाई पर 1.2 मीटर चौड़ी पट्टी पर बुवाई होनी चाहिये। [embed]https://www.youtube.com/watch?v=JeQ8zGkrOCI&t=34s[/embed]
प्याज की इस उम्दा किस्म से किसान बेहतरीन पैदावार अर्जित कर सकते हैं

प्याज की इस उम्दा किस्म से किसान बेहतरीन पैदावार अर्जित कर सकते हैं

अगर कृषक भाई अपने खेत में प्याज की उन्नत किस्म एग्रीफॉन्ड डार्क रेड केसर लगाते हैं, तो उन्हें कई गुणा मुनाफा अर्जित होगा। इस लेख में हम आपको बताऐंगे इस प्रजाति की विशेषता एवं अन्य कई अहम जानकारी। हमारे देश के किसान भाइयों की दिलचस्पी अब आधुनिक फसलों की दिशा में तेजी से बढ़ रही है। कुछ किसान तो अपनी पारंपरिक खेती को त्यागकर अन्य फसलों को अपना रहे हैं। आखिर क्यों न अपनाएं आखिरकार इससे किसानों को पहले की तुलना में कहीं ज्यादा मुनाफा प्राप्त हो रहा है। आज हम इस लेख में ऐसी ही एक फसल के बारे में बात करेंगे, जिसे आप अपने खेत में उगाकर लाभ अर्जित कर सकते हैं। दरअसल, जिस फसल की हम बात कर रहे है। वह प्याज की फसल है। आइए जानते हैं खरीफ प्याज की बेहतरीन किस्मों एवं खेती के बेहतर तरीके।

प्याज को रसोई की शान माना जाता है

जैसा कि सब मानते हैं, कि प्याज एक ऐसी सब्जी है, जो कि रसोई की शान मानी जाती है। यह हर घर में बड़ी सुगमता से मिल जाती है। ऐसा इसलिए क्योंकि इसके बिना खाने का स्वाद ही नहीं आता है। प्याज की खेती भारत के विभिन्न राज्यों में की जाती है, सिर्फ इतना ही नहीं भारत से पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल आदि बहुत सारे देशों में प्याज का निर्यात भी किया जाता है। प्याज की खेती को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार की तरफ से अनुदान भी दिया जाता है। इस सब्सिडी से किसानों की लागत कम होती है और मुनाफा भी बढ़ता है। यही वजह है, कि प्याज की खेती किसानों के लिए कम लागत में ज्यादा मुनाफा उठाने का एक शानदार तरीका है।

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प्याज की सर्वोत्तम किस्में और उचित खेती विधि

बुआई का समय प्याज की खेती के लिए मध्य जून एवं मध्य मार्च बेहतर महीने माने जाते हैं।

पनीरी बनाने की विधि क्या होती है

  • पनीरी की रोपाई के लिए 125 किलोग्राम सड़ी हुई खाद (Compost) प्रति मरला (25 वर्ग मीटर) डालकर भूमि को एकसार करें।
  • पनीरी और प्याज लगाए गए क्षेत्र के अनुपात (1:20) के मुताबिक 20 सेमी ऊंचे और 1 से 1.5 मीटर चौड़े ट्रैक निर्मित करें। ध्यान रहे, कि यह अच्छी स्थिति में बोयें हुए होना चाहिए, जिससे कि आपको इससे आगे चलकर कोई परेशानी न हो।
  • बीज को 3 ग्राम थेरम अथवा कैप्टान प्रति किलोग्राम की दर से उपचारित कर 1 से 2 सेमी. 5 सेमी गहरी दूरी पर कतारों में रोपाई करें।
  • बुआई के पश्चात अच्छी तरह सड़ी हुई देशी खाद की हल्की परत से ढक दें और तुरंत फव्वारे के माध्यम से सिंचाई करें।
  • बतादें कि दिन में दो बार सुबह एवं शाम, पौधों की सिंचाई
  • दोपहर में उच्च तापमान से बचाने के लिए बिस्तरों को ढकें।
  • आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि 1.5 मीटर चौड़ी क्यारियों को ढकने के लिए उत्तर-दक्षिण दिशा में 1.5 मीटर की ऊंचाई पर घास अथवा बाकी फसल की पत्तियां-तने आदि से अर्जित मल्च का इस्तेमाल करें। एक महीने उपरांत जब पौधे मजबूत हो जाएं तो इन गमलों को हटा दें।

खेती द्वारा केसर प्याज की खेती

  • मार्च माह के बीच में 8 मरला (200 वर्ग मीटर) क्यारियों में 5 किलोग्राम बीज की रोपाई करें।
  • पनीरी को प्रति सप्ताह के अंतराल में दो बार सींचे।
  • जून के आखिर में कंदों को खोदें एवं उन्हें कमरे के तापमान पर खुली टोकरियों में संग्रहित करें।
  • ज्यादा बिक्री लायक उत्पादन प्राप्त करने के लिए 1.5-2.5 सेमी. परिधीय गांठें उपयुक्त होती हैं।

दूरी

  • कम जल निकास वाली भारी मिट्टी में बेहतर उपज के लिए 60 सेमी. चौड़ा और 10 सेमी. ऊँचे बिस्तर का निर्माण करें।
  • अगस्त के बीच में उन पर बल्ब लगाऐं।
  • नवंबर के आखिर तक फसल तैयार हो जाएगी।
  • खेत में पनीरी की खुदाई कर के रोपाई करें।
  • अगस्त माह के प्रथम सप्ताह में 6 से 8 सप्ताह की पौध को खोदकर खेत में रोप देना चाहिए।
  • बेहतरीन उत्पादन के लिए पंक्तियों के मध्य 15 सेमी व पौधों के मध्य 7.5 सेमी की जगह रखें।
  • खेत में पनीरी की रोपाई सदैव शाम के दौरान करें और उसके शीघ्र पश्चात सिंचाई करें। इसके अलावा आवश्यकतानुसार पानी देते रहें।


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प्याज की बेहतरीन किस्में कौन-कौन सी होती हैं

किसान खरीफ प्याज से अच्छी पैदावार अर्जित कर सकते हैं। यदि प्याज के प्रकार की बात की जाए तो एग्रीफाउंड डार्क रेड किस्म से किसान 120 क्विंटल प्रति एकड़ पैदावार सुगमता से अर्जित कर सकते हैं।

प्याज की फसल के लिए विशेष सावधानी बरतनी चाहिए

केसर प्याज की नर्सरी तैयार करने के दौरान खास सावधानी बरतनी पड़ती है। इस दौरान दिन में तापमान काफी ज्यादा रहता है और अचानक बारिश के उपरांत तापमान गिर जाता है। इससे नर्सरी को क्षति होने का भय रहता है। इस वजह से किसानों को सलाह दी जाती है, कि वे नर्सरी लगाने से पूर्व खेत को बेहतर ढ़ंग से तैयार कर लें। जिससे कि पौधा प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने में समर्थ बन सके।
अरबी की बुवाई का मौसम : फरवरी-मार्च और जून-जुलाई, सम्पूर्ण जानकारी

अरबी की बुवाई का मौसम : फरवरी-मार्च और जून-जुलाई, सम्पूर्ण जानकारी

दोस्तों आज हम बात करेंगे, अरबी(Arbi) की बुवाई साल में दो बार फरवरी मार्च, जून-जुलाई में की जाती है। इसके लिए आपको पर्याप्त मात्रा में जीवांश तथा रेतीली दोमट मिट्टी की आवश्यकता होती है। वह भी उच्च कोटि वाली जो सबसे अच्छी रहे। अरबी(Arbi) की बुवाई के लिए गहरी भूमि की आवश्यकता होती है। क्योंकि इसके कंदों का पूर्ण रूप से उच्च कोटि का विकास हो सके। अरबी(Arbi) की फसल की बुवाई के लिए आपको आठ से 10 क्विंटल बीज तथा हेक्टेयर की आवश्यकता होती है। 

अरबी(Arbi) की खेती

arbi ki kheti 

 अरबी(Arbi) की खेती से किसानों को बहुत लाभ होता है। क्योंकि अरबी(Arbi) के कंद के साथ इसके पत्तों का भी बहुत ज्यादा उपयोग किया जाता है।इस दृष्टिकोण से अरबी(Arbi) की खेती किसानों के लिए बहुत लाभदायक है। ज्यादातर अरबी के कंद का प्रयोग सब्जियां बनाने तथा अचार आदि के रूप में भी किया जाता है। व्यापार की दृष्टि से देखें तो लोग अरबी(Arbi) के पकोड़े बनाकर अच्छा व्यापार करते हैं और आय का साधन बना रहता है। 

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अरबी(Arbi) की खेती के लिए मिट्टी एवं जलवायु

अरबी(Arbi) की फसल के लिए सबसे अच्छा मौसम गर्मी का होता है , गर्म एवं नम जलवायु अरबी(Arbi) की खेती के लिए बहुत ही उपयोगी होती।21 से 27 डिग्री का तापमान इसकी खेती के उत्पादन के लिए बहुत ही अच्छा होता है।अधिक गर्मी होने से अरबी(Arbi) की फसल की ज्यादा पैदावार होती है।किसान अरबी की खेती के लिए जिस मिट्टी का प्रयोग करते हैं वह बलुई दोमट मिट्टी होती है और यह मिट्टी इस फसल के लिए बहुत ही उपयोगी मानी जाती है। 

अरबी(Arbi) रोपाई का समय और बीज उपचार

किसान अरबी(Arbi) की रोपाई फरवरी-मार्च और जून से जुलाई तक करते हैं।वहीं दूसरी ओर उत्तर भारत में फरवरी और मार्च में अरबी की फसलों की रोपाई की जाती है। अरबी(Arbi) की फसल की बुवाई से पहले प्रति किलोग्राम कंद 5 ग्राम रिडोमिल एम में कम से कम 10 से 15 मिनट डूबा कर रखना चाहिए। इसकी उपचारित करने के लिए। 

अरबी(Arbi) खेत की तैयारी

Arbi ki khet ki teyari 

 अरबी(Arbi) की खेती के लिए पहले खेतों को हल द्वारा अच्छी खुदाई की जरूरत होती है।एक नियमित रूप की गहराई प्राप्त करनी होती है। किसी भी हल द्वारा खेतों की मिट्टी को पलटना आवश्यक होता है। मिट्टी को भुरभुरी बनाने के लिए तीन से चार बार हल्की जुताई करनी चाहिए। ताकि खेत की मिट्टियों में भुरभुरा पन आ जाए। क्यारियां की ऊंचाई कम से कम 10 सेंटीमीटर रखनी चाहिए जमीन की सतह से लेकर। इन क्यारियों की दूरी कम से कम 60 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। इस प्रकार आप अरबी (Arbi) की खेती तैयार कर सकते हैं।

 

अरबी(Arbi) की फसल के लिए खाद एवं उर्वरक

किसान अरबी(Arbi) की फसल के लिए 40 से लेकर 60 क्विंटल सड़ी हुई गोबर की खाद का प्रयोग करते हैं।इस खाद का प्रयोग प्रति एकड़ खेत में किया जाता है। इन प्रति एकड़ओं में किसान जमीन में कम से कम 16 किलोग्राम नाइट्रोजन का इस्तेमाल करते हैं तथा 25 किलोग्राम फॉस्फोरस का और 25 किलोग्राम पोटाश पूर्ण रूप से मिलाते हैं। खाद तैयार करने के लिए फसलों पर 16 किलोग्राम नाइट्रोजन का छिड़काव करते हैं। 

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अरबी(Arbi) की फसल की सिंचाई

arbi ki fasal ki sinchai, अरबी की बुवाई और सिंचाई 

 अरबी(Arbi) की फसल की सिंचाई 7 से लेकर 10 दिन के अंदर करना शुरू कर देना चाहिए। रोपाई करने के बाद यह सिंचाई 5 महीने अंतराल पर लगातार करनी चाहिए। यदि किसी करण वर्षा नहीं हो रही है तो आपको यह सच्चाई 15 दिनों के भीतर करते रहना चाहिए। निराई - गुड़ाई करने के बाद खरपतवारों पर आसान तरीके से नियंत्रण पा लिया जाता है। 

अरबी(Arbi) की फसल की कटाई एवं खुदाई

फसल की विभिन्न विभिन्न किस्में एवं प्रकार के अनुसार इन को तैयार होने में लगभग 150 से 225 दिनों का समय लग सकता है। वहीं दूसरी ओर आप 40 से 50 दिनों बाद पत्तियों को काट सकते हैं।अरबी(Arbi) की फसल की पत्तियां जब हल्की हल्की पीली होकर सूखने लगे और पत्तियों का आकार छोटा हो, तब इनकी खुदाई अच्छी तरह से कर लेनी चाहिए।

अरबी(Arbi) की फसल में लगने वाले रोगों से बचाव

arbi ki fasal mein hone wale rog, अरबी की बुवाई 

 अरबी(Arbi) की फसल में मुख्य रूप से कुछ रोग एवं कीट पैदा हो जाते हैं। रोगों और कीटों के लगने से अरबी(Arbi) की फसल की पत्तियां गलकर गिरना शुरू हो जाती है। फसल उपज में काफी बुरा असर पड़ता है।कीटो और रोगों से बचने के लिए और इनकी रोकथाम के लिए किसान 15 से 20 दिन के अंदर खेतों में डाईथेन एम-45 2.5 ग्राम प्रति लिटर तथा कार्बेन्डाजिम 12 प्रतिशत डब्ल्यू. पी. 2 ग्राम प्रति लिटर, मेन्कोजेब 63 प्रतिशत का मिक्सर बनाकर पानी में घोलकर फसलों पर छिड़काव करते हैं। इन क्रियाओं द्वारा अरबी(Arbi) की फसल पूर्ण रूप से कीटो और रोगों से सुरक्षित रहती है। किसी तरह के अन्य कीट और रोगों की कोई संभावना नहीं होती है। हम उम्मीद करते हैं कि हमारे इस आर्टिकल के जरिए ,आपको अरबी(Arbi) की बुवाई साल में दो बार फरवरी-मार्च तथा जून- जुलाई में की जाती है, यदि सभी प्रकार की जानकारियां प्राप्त कर आप संतुष्ट है, तो हमारी इस आर्टिकल को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।

राजस्थानः किसान संग मछली और पशु पालकों की भी चांदी, जीरो परसेंट ब्याज पर मिलेगा लोन

राजस्थानः किसान संग मछली और पशु पालकों की भी चांदी, जीरो परसेंट ब्याज पर मिलेगा लोन

इस साल 20 हजार करोड़ का ब्याज मुक्त फसली लोन देगी राजस्थान सरकार, पांच लाख नए किसान जोड़ने की तैयारी

राजस्थान सरकार ने इस साल 5 लाख नए सदस्य किसानों को शून्य प्रतिशत पर फसली ऋण का लाभ देने का निर्णय किया है। यह निर्णय इसलिए अहम है क्योंकि इस ऋण सुविधा का लाभ किसानों के साथ ही मत्स्य एवं पशु पालकों को भी मिलेगा।
सहकारिता विभाग की प्रमुख शासन सचिव श्रेया गुहा ने इस बारे में निर्देश दिए हैं। मत्स्य एवं पशु पालकों को भी जीरो परसेंट ब्याज पर लोन प्रदान करने के लिए विभागों को निर्देश जारी किए गए हैं।


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प्रबंध निदेशकों की बैठक

अपेक्स बैंक में सभी केन्द्रीय सहकारी बैंकों के प्रबंध निदेशकों की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित हुई। सहकारिता विभाग की प्रमुख शासन सचिव श्रेया गुहा ने इस बैठक को संबोधित किया। संबोधन के दौरान उन्होेंने जीरो परसेंट ब्याज पर लोन प्रदान करने के संबंध में निर्देश देकर सहकारी कार्यों की समीक्षा की।

नए सदस्य किसानों को जोड़ने का लक्ष्य

बैठक में गुहा ने कहा कि, मछली और पशु पालकों को भी शून्य प्रतिशत ब्जाज दर पर लोन प्रदान करने से मछली एवं पशु पालन करने वाले लोगों की भी आवश्यक्ताओं की पूर्ति होगी। उन्होंने अधिक से अधिक नए सदस्य किसानों को फसली ऋण से जोड़ने के बारे में भी विभागों को निर्देश दिए। इस साल सरकार के लक्ष्य के अनुसार 5 लाख नए सदस्य किसानों को शून्य फीसदी ब्याज पर फसली ऋण का लाभ प्राप्त हो सकेगा।


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टारगेट बढ़ाया

राजस्थान में इस साल 20 हजार करोड़ रुपये का ब्याज मुक्त फसली कर्ज बांटने का टारगेट तय किया गया है। पिछले साल की बात करें, तो साल 2021-22 में कृषकों को 18,500 करोड़ रुपये का ब्याज मुक्त कर्ज प्रदान करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था।

ब्याज मुक्त कर्ज का विस्तार

पहले इस लोन योजना के तहत किसानों को शामिल किया गया था। अब मछली और पशु पालने वालों को भी दायरे में शामिल कर लेने से निश्चित ही ब्याज मुक्त कर्ज योजना का विस्तार हो जाएगा। दी गई जानकारी के अनुसार राज्य सरकार ने पिछले टारगेट के आसपास किसानों को कर्ज प्रदान कर दिया है। सरकारी निर्णय से अब क्रेडिट कार्ड की तरह ब्याज मुक्त लोन में भी मछली और पशु पालन को जोड़ने से ज्यादा वर्ग के जरूरतमंद लोगों को आर्थिक मदद मिल सकेगी।


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व्यवसाय विविधीकरण

ग्राम सेवा सहकारी समितियों की स्वयं की आवश्यकता के साथ ही आस-पास के लोगों की जरूरतों को भी पूरा करने के उद्देश्य से ग्राम सेवा सहकारी समितियों को व्यवसाय के विविधीकरण के लिए भी प्रेरित करने के निर्देश बैठक में दिए गए।

समितियों का गठन

बैठक में सभी बैंकों को यह सुनिश्चित करने निर्देशित किया गया कि, आजीविका से जुड़े स्वयं सहायता समूहों को जरूरत के मुताबिक लोन मिल सके। गुहा ने बताया कि, इस साल 25 करोड़ रुपए का ऋण सहायता समूहों कोे प्रदान किया जाएगा। इस प्रक्रिया के अंतर्गत पंचायत स्तर पर ग्राम सेवा सहकारी समितियों का गठन किया जाएगा। ग्राम सेवा सहकारी समितियों को अपनी आय के लिए केवल फसली ऋण वितरण तक ही सीमित नहीं रहने के लिए भी बैठक में निर्देशित किया गया।


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सहकारी बैंक करें नियमों का पालन - गुहा

सहकारिता विभाग की प्रमुख शासन सचिव श्रेया गुहा ने सहकारी बैंकों को कमर्शियल बैकों की तरह अपडेट रहने के लिए निर्देशित किया। उन्होंने सहकारी बैंकों की स्थिति में सुधार के लिए नाबार्ड (राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक / NABARD) और आरबीआई (RBI - Reserve Bank of India) के नियमों का सख्त पालन करने निर्देश दिए।

कर्मचारियों की होगी भर्ती

बैठक में अपने संबोधन में गुहा ने कहा कि, बैंकों में कर्मचारियों की भर्ती की जाएगी। इस प्रक्रिया के तहत 500 से अधिक कर्मचारियों की भर्ती के लिए अतिशीघ्र विज्ञप्ति जारी की जाएगी। उन्होंने जुलाई माह तक सभी पैक्स का ऑडिट सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।
बारिश के चलते बुंदेलखंड में एक महीने लेट हो गई खरीफ की फसलों की बुवाई

बारिश के चलते बुंदेलखंड में एक महीने लेट हो गई खरीफ की फसलों की बुवाई

झांसी। बुंदेलखंड के किसानों की समस्या कम होने की बजाय लगातार बढ़ती जा रहीं हैं। पहले कम बारिश के कारण बुवाई नहीं हो सकी, अब बारिश बंद न होने के चलते बुवाई लेट हो रहीं हैं। इस तरह बुंदेलखंड के किसानों के सामने बड़ी परेशानी खड़ी हो गई है। मौसम खुलने के 5-6 दिन बाद ही मूंग, अरहर, तिल, बाजरा और ज्वर जैसी फसलों की बुवाई शुरू होगी। लेकिन बुंदेलखंड में इन दिनों रोजाना बारिश हो रही है, जिससे बुवाई काफी पिछड़ रही है।

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बारिश से किसानों पर पड़ रही है दोहरी मार

- 15 जुलाई को क्षेत्र के कई हिस्सों में करीब 100 एमएम बारिश हुई, जिससे किसानों ने थोड़ी राहत की सांस ली और किसान खेतों में बुवाई की तैयारियों में जुट गए। लेकिन रोजाना बारिश होने के चलते खेतों में अत्यधिक नमी बन गई है, जिसके कारण खेतों को बुवाई के लिए तैयार होने में वक्त लगेगा। वहीं शुरुआत में कम बारिश के कारण बुवाई शुरू नहीं हुई थी। इस तरह किसानों को इस बार दोहरी मार झेलनी पड़ रही है।

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नमी कम होने पर ही खेत मे डालें बीज

- खेत में फसल बोने के लिए जमीन में कुछ हल्का ताव जरूरी है। लेकिन यहां रोजाना हो रही बारिश से खेतों में लगातार नमी बढ़ रही है। नमी युक्त खेत में बीज डालने पर वह बीज अंकुरित नहीं होगा, बल्कि खेत में ही सड़ जाएगा। इसमें अंकुरित होने की क्षमता कम होगी। बारिश रुकने के बाद खेत में नमी कम होने पर ही किसान बुवाई कर पाएंगे।

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रबी की फसल में हो सकती है देरी

- खरीफ की फसलों की बुवाई लेट होने का असर रबी की फसलों पर भी पड़ता दिखाई दे रहा है। जब खरीफ की फसलें लेट होंगी, तो जाहिर सी बात है कि आगामी रबी की फसल में भी देरी हो सकती है।
वैज्ञानिकों ने निकाली प्याज़ की नयी क़िस्में, ख़रीफ़ और रबी में उगाएँ एक साथ

वैज्ञानिकों ने निकाली प्याज़ की नयी क़िस्में, ख़रीफ़ और रबी में उगाएँ एक साथ

पिछले कुछ महीनों में भारत में प्याज की अच्छी खासी कमी देखी गई थी और इसी वजह से प्याज पिछले २ से ३ सालों में मांग में बढ़ोतरी होने पर मुंह मांगे दामों पर भी बेचा जाता है। भारत में प्याज गुजरात, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्य में उगाया जाता है। प्याज के तीखे पन और कैंसर के खिलाफ पाए जाने वाली गुणों की वजह से भारत के लोगों के द्वारा इसे अपने भोजन में शामिल किया जाता है।

प्याज की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु व मिट्टी

वैसे तो प्याज ठंडी जलवायु वाले क्षेत्रों में उगाया जाता है, लेकिन भारत में इसकी खेती
खरीफ के दौरान भी की जाती है।अलग-अलग जगह के प्याज की कीमत, वहां की जलवायु के प्रभाव की वजह से इनकी लंबाई और तापमान में आए अंतर के कारण होती है। इनकी पकाई के समय में उच्च तापमान और लंबे समय तक धूप रहने वाले दिनों की आवश्यकता होती है। इसे २५ से ३० डिग्री सेंटीग्रेड तापमान वाले जलवायु क्षेत्र में उगाने से, प्रसंस्करण करने में भी काफी मदद मिलती है और लंबे समय तक बिना बिगड़े इस्तेमाल करने योग्य रहते हैं। यदि आपके खेत की जमीन में ऑर्गेनिक खाद की आपूर्ति पहले से ही पर्याप्त है, तो आप भी प्याज की खेती कर सकते हैं। इसे मुख्यतः दोमट और बलुई मिट्टी के में उगाया जाता है। यदि आपके खेत की मिट्टी रेगिस्तानी क्षेत्र में है, तो उसमें क्षारीयता और अम्लता ज्यादा होने की वजह से प्याज के लिए उत्पादक उपयुक्त नहीं समझी जाती है। कुछ सालों से वैज्ञानिकों ने बेहतरीन परीक्षण कर, भारतीय जमीन के लिए प्याज की अलग-अलग किस्में तैयार कर दी है, जिनमें सबसे लोकप्रिय है पूसा रत्नाकर (Pusa Ratnakar) - इस किस्म के पौधे लगभग 30 मीटर की ऊंचाई तक बढ़ते है और तैयार होने पर इनका आकार बड़ा और गोलाकार होता है। भारतीय बाजारों में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मार्केट में भी इस किस्म की बहुत ही डिमांड रहती है और केवल एक हेक्टेयर जमीन में ही ३०० से ४०० क्विंटल प्याज पैदा कर सकती है। इसके अलावा, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद या इंडियन काउंसिल फॉर एग्रीकल्चर रिसर्च (ICAR) ने अर्का बिंदु (Arka Bindu) नाम की एक लाल रंग वाली प्याज की वैरायटी भी तैयार की है, जो कि आकार में बहुत ही छोटे होते हैं और इन्हें लगभग 100 दिनों में ही पका कर तैयार किया जा सकता है। इस किस्म की प्याज की खेती के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है उन्नत किस्म का चुनाव और भूमि की तैयारी। यदि आप प्याज की खेती करना चाहते हैं तो खेत की एक जुताई गर्मी की शुरुआत में ही हल से करनी चाहिए और उसके बाद कल्टीवेटर की मदद से हर जुताई के बाद खेत को समतल बनाना चाहिए, जिससे कि मिट्टी की नमी बरकरार रहे।

प्याज की बुवाई में पौधों के बीच दूरी

प्याज की पौध को लगाते समय इनमें 1 मीटर की दूरी रखनी चाहिए, वैसे तो आजकल प्याज की पौध बाजार में भी आसानी से मिल जाती है परंतु वहां आपको पता नहीं रहता कि यह किस किस्म का प्याज है तो अपने कम जलभराव वाले खेत में आप भी प्याज की पौध बना सकते है। इसके लिए उस जगह पर पहले पर्याप्त मात्रा में ऑर्गेनिक खाद्य कंपोस्ट का इस्तेमाल करना चाहिए, इसके लिए आप दो से तीन क्यारियां लगाकर पौध बना सकते है। किसान भाई ध्यान रखे कि बीजों को एक पंक्ति में ही लगाना चाहिए, जब क्यारी अलग से तैयार हो जाए तो उन पर सुखी घास के कटे हुए बारीक कणों को फैला देना चाहिए, जिससे की प्याज के बीजों का अंकुरण बहुत ही आसानी और तेजी से हो सके। एक बार आप के पौधे नर्सरी में अंकुरित हो जाए तो उन्हें बहुत ही सीमित मात्रा में पानी देने शुरू कर देना चाहिए, खरीफ मौसम के दौरान आपको प्रति हेक्टेयर क्षेत्र में लगभग 10 से 12 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है जबकि रबी की फसल के दौरान इसकी मात्रा कम भी की जा सकती है। कृषि विभाग के द्वारा जारी किए गए सॉइल हेल्थ कार्ड के अनुसार ही आपको अपने खेत में खाद और उर्वरक का इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि प्याज की पौध को उचित मात्रा में उर्वरक नहीं मिलने पर उनके आकार बहुत ही छोटे हो जाते हैं और स्वाद भी पूरी तरीके से खत्म हो जाता है। प्राथमिक स्तर पर आप गोबर की खाद का इस्तेमाल भी कर सकते हैं, इसके बाद प्रति हेक्टेयर में 50 किलोग्राम तक फास्फोरस और पोटास के मिश्रण को मिलाकर छिड़काव किया जा सकता है।

प्याज की खेती में खरपतवार नियंत्रण

यदि आप की जमीन में खरपतवार बहुत ही तेजी से उगता है तो इसे रोकने के लिए तीन से चार बार हाथों से ही निराई गुड़ाई कर खरपतवार को कम किया जा सकता है, इसके अलावा ऑक्सीफ्लोरफेन जैसे खरपतवार नाशी का भी सीमित मात्रा में छिड़काव करना प्रभावी साबित होता है।

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प्याज के पौधों की सिंचाई व्यवस्था

यह बात सभी किसान भाइयों को ध्यान रखनी चाहिए कि प्याज की पौध की सही समय पर सिंचाई करना अनिवार्य है, क्योंकि जब तक मानसून है तब तक तो बिना सिंचाई के भी काम चल सकता है लेकिन जब कन्द का निर्माण शुरू हो जाता है, उस समय पानी की कमी होने से कुछ रोग भी हो सकते है, जिनमें पर्पल ब्लीच नाम का रोग आपके प्याज की बिक्री को बहुत ही कम कर देता है। एक बार पककर तैयार हुए प्याज के कंद की खुदाई लगभग 2 से 3 माह में की जा सकती है, जैसे ही प्याज की गांठ अपना पूर्ण स्वरूप धारण कर लेती है तो धीरे-धीरे उसकी पत्तियां सूखने लगती है और इसके बाद 5 से 10 दिन में आपको उसकी सिंचाई को बंद करना होगा और उन्हें खोदकर खेत में ही नमी को सुखाने के लिए धूप में रख देना चाहिए। इसके अलावा, बड़े स्तर पर उत्पादन होने पर तैयार प्याज को फंगस से होने वाले रोगों से बचाने के लिए ठंडी जगह पर भी भंडारण करके रखा जा सकता है।

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प्याज में कीट प्रबंधन

यदि बात करें प्याज में लगने वाले प्रमुख कीट और बीमारियों की तो थ्रिप्स नाम का कीट प्याज की पत्तियों का रस चूस लेता है, जिससे कि प्याज का स्वाद पूरी तरीके से खत्म हो जाता है। इन्हें रोकने के लिए नीम के तेल से बने हुए कीटनाशकों का इस्तेमाल करना चाहिए, इनमें इमिडाक्लोप्रिड एक प्रमुख कीटनाशी है। हमारे किसान भाई प्याज की फसल में लगने वाले एक कीड़े 'प्याज की मक्खी' का नाम तो जरुर जानते होंगे। यह कीड़ा पूरी तरीके से ही पौधे को खत्म करने की क्षमता रखता है, इसलिए इसे रोकने के लिए क्विनालफ़ास के मिश्रण का छिड़काव किया जाता है। आशा करते हैं कि हमारे किसान भाई, हमारे द्वारा दी गई जानकारी का पूरा फायदा उठा कर रबी और खरीफ, दोनों ही समय की फसलों के साथ प्याज की फसल को भी आसानी से उगाकर अच्छा मुनाफा कमा पाएंगे।
देश में दलहन और तिलहन का उत्पादन बढ़ाने के प्रयास करेगी सरकार, देश भर में बांटेगी मिनी किट

देश में दलहन और तिलहन का उत्पादन बढ़ाने के प्रयास करेगी सरकार, देश भर में बांटेगी मिनी किट

इस साल देश के कई राज्यों में खरीफ की फसल मानसून की बेरुखी के कारण बुरी तरह से प्रभावित हुई है, जिसके कारण उत्पादन में भारी गिरावट आई है। उत्पादन में यह गिरावट किसानों की कमर तोड़ने के लिए पर्याप्त है, क्योंकि यदि किसान खरीफ की फसल में लाभ नहीं कमा पाए तो उनके लिए नई चुनौतियां खड़ी हो जाएंगी। इसके अलावा अगर किसानों के पास पैसा नहीं रहा तो किसानों के लिए रबी की फसल में बुआई करना मुश्किल हो जाएगा। बिना पैसों के खेती से जुड़ी चीजें जैसे कि खाद, बीज, कृषि उपकरण, डीजल इत्यादि सामान खरीदना किसानों के लिए मुश्किल हो जाएगा। किसानों की इन चुनौतियों को देखते हुए केंद्र सरकार किसानों की मदद करने जा रही है। केंद्र सरकार किसानों के लिए रबी सीजन में दलहन और तिलहन की फसलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए मुफ्त मिनी किट वितरित करेगी। कृषि मंत्रालय के अधिकारियों और विशेषज्ञों का अनुमान है कि इससे देश भर में दलहन के उत्पादन में लगभग 20-25 फीसदी की वृद्धि की जा सकती है। इसको देखते हुए मिनी किट वितरण की रूप रेखा तैयार कर ली गई है। ये भी पढ़े: दलहनी फसलों पर छत्तीसढ़ में आज से होगा अनुसंधान देश भर में मिनी किट का वितरण भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ लिमिटेड (NAFED) के अंतर्गत आने वाली संस्था राष्ट्रीय बीज निगम - एनएससी (NSC) करेगी। इन मिनी किटों का भुगतान भारत सरकार अंतर्गत आने वाले राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत किया जाएगा। केंद्रीय कृषि व किसान कल्याण मंत्रालय की योजना के अनुसार इन मिनी किटों का वितरण उन्हीं राज्यों में किया जाएगा, जहां दलहन एवं तिलहन का उत्पादन किया जाता है।

इस योजना का उद्देश्य क्या है

केंद्रीय कृषि व किसान कल्याण मंत्रालय की तरफ से दी गई जानकारी के अनुसार, इस योजना का मुख्य उद्देश्य उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के साथ ही किसानों के बीच फसलों की नई किस्मों को लेकर जागरूक करना है, ताकि किसान इन मिनी किटों के माध्यम से नई किस्मों के प्रति आकर्षित हों और ज्यादा से ज्यादा रबी की बुआई में नई किस्मों का इस्तेमाल करें। इस योजना के अंतर्गत किसानों के बीच मिनी किटों में उच्च उत्पादन वाले बीजों का वितरण किया जाएगा। मिनी किटों का वितरण महाराष्ट्र के विदर्भ में रेपसीड और सरसों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए, साथ ही तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्यों में वहां की प्रमुख तिलहन फसल मूंगफली के उत्पादन को बढ़ाने के लिए तथा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान में अलसी और महाराष्ट्र, कर्नाटक और तेलंगाना में कुसुम (सूरजमुखी) का उत्पादन बढ़ाने के लिए किया जाएगा। ये भी पढ़े: तिलहनी फसलों से होगी अच्छी आय केंद्रीय कृषि व किसान कल्याण मंत्रालय ने इस साल देश भर के 11 राज्यों में दलहन की बुवाई बढ़ाने के लिए, उड़द के 4.54 लाख बीज मिनी किट और मसूर के 4.04 लाख बीज मिनी किट राज्यों को भेज दिए हैं। उत्तर प्रदेश के लिए सबसे ज्यादा 1,11,563 मिनी किट भेजे गए हैं, इसके बाद झारखण्ड के लिए 12,500 मिनी किट और बिहार के लिए 12,500 मिनी किट भेजे गए हैं। इसके अतिरिक्त कृषि मंत्रालय एक और योजना लागू करने जा रही है, जिसके अंतर्गत देश भर के 120 जिलों में मसूर और 150 जिलों में उड़द का उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा। इस योजना को विशेष कार्यक्रम '(TMU 370; टीएमयू 370) 'तूर मसूर उड़द - 370'' के नाम से प्रचारित किया जाएगा।
"केंद्र सरकार के रबी 2022-23 के लिए दलहन और तिलहन के बीज मिनीकिट वितरण" से सम्बंधित 
सरकारी प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) रिलीज़ का दस्तावेज पढ़ने या पीडीऍफ़ डाउनलोड के लिए, यहां क्लिक करें।
ये भी पढ़े: किस क्षेत्र में लगायें किस किस्म की मसूर, मिलेगा ज्यादा मुनाफा अगर आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले 3 सालों के दौरान देश में दलहन और तिलहन के उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि देखने को मिली है। अगर साल 2018-19 तक अब की तुलना करें तो दलहन के उत्पादन में 34.8% की वृद्धि दर्ज की गई है। जहां साल 2018-19 में दलहन का उत्पादन 727 किग्रा/हेक्टेयर था। जबकि मौजूदा वर्ष मे दलहन का उत्पादन बढ़कर 1292 किग्रा/हेक्टेयर पहुंच गया है।
भारत सरकार के सामने नई चुनौती, प्रमुख फसलों के उत्पादन में विगत वर्ष की अपेक्षा हो सकती है कमी

भारत सरकार के सामने नई चुनौती, प्रमुख फसलों के उत्पादन में विगत वर्ष की अपेक्षा हो सकती है कमी

फिलहाल भारत सरकार के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है, इस साल खरीफ और रबी की फसलों में भारी कमी होने की संभावना है, इसका कारण है कई जगहों पर वर्षा की असमानता। इस साल कई राज्यों के कई क्षेत्रों में या तो औसत से ज्यादा बरसात हुई है या औसत से बहुत कम वर्षा हुई है, जिसका असर सीधा फसलों के उत्पादन में पड़ रहा है। औसत से ज्यादा बरसात वाले क्षेत्रों में फसलें बुरी तरह से प्रभावित हुई हैं, कई जगह फसलें सड़ के पूरी तरह से चौपट हो गई हैं, तो कई जगह सूखे की वजह से फ़सलों की वैसी ग्रोथ नहीं हुई है जैसी उम्मीद की जा रही थी। हरियाणा और पंजाब में कम बरसात की वजह से एक बहुत बड़े रकबे की धान की खेती अविकसित रह गई है। इसलिए नीति निर्माताओं का अनुमान है कि 2022-23 में प्रमुख फसलों के उत्पादन में भारी कमी आ सकती है, जिसका असर भारत के सामान्य लोगों पर पड़ेगा। अगर तय लक्ष्य के मुताबिक़ फसलों का उत्पादन नहीं हुआ तो बाजार में अनाज की कमी हो जाएगी, जिससे खाने पीने की चीजों के दाम में बढ़ोत्तरी हो सकती है, जो सरकार के लिए एक नया सिरदर्द है। सरकार को इससे निपटने के लिए जल्द से जल्द योजना बनाने की जरुरत है।

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यूपी, बिहार, गंगीय पश्चिम बंगाल और झारखंड में इस साल बेहद कम बरसात हुई है, जिसका असर खरीफ की खेती पर पड़ना तय है। यह क्षेत्र चावल के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन इस साल कम वर्षा के कारण यहां पर चावल के उत्पादन में भारी कमी हो सकती है, इस सीजन में इन राज्यों में कम से कम 11 मिलियन टन चावल के उत्पादन में कमी हो सकती है। पिछले साल इन राज्यों में चावल का कुल उत्पादन 111.8 मिलियन टन था, इस साल घटकर 100-102 मिलियन टन होने की संभावना है, इसको देखते ही सरकार पहले से ही अलर्ट हो गई है, इसलिए सरकार ने पहले गैर-बासमती चावल निर्यात  (chawal niryat) पर प्रतिबन्ध लगाया उसके बाद टुकड़ा चावल के निर्यात पर भी प्रतिबंध लगा दिया है। चावल के अतिरिक्त कपास के उत्पादन में भी भारी कमी की संभावना है, क्योंकि इस खेती में भी असमान वर्षा और मौसम की मार पड़ी है, जिससे कपास की खेती भी प्रभावित हुई है। कपास के उत्पादन में कमी घरेलू कपड़ा उद्योग को प्रभावित करेगी। उत्पादन की कमी के कारण बाजार में कपास महंगा हो सकता है जिसका सीधा असर कपड़ा बनाने में आने वाली लागत पर पडेगा। आगामी वर्ष में कपड़ा उत्पादन की लागत बढ़ भी सकती है।

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कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, इस साल कपास का उत्पादन तय लक्ष्य से लगभग 35 लाख गांठ कम हो सकता है, जो एक चिंता का विषय है। भारत सरकार के लक्ष्य के अनुसार इस साल कपास का उत्पादन 370 लाख गांठ होना चाहिए था। लेकिन अब इसके 335-345 लाख गांठ होने की संभावना है, जो लक्ष्य से काफी कम है। बाजार में कपास की मांग में हुई अप्रत्याशित वृद्धि के हिसाब से कपास का उत्पादन नहीं हो रहा है जिसका नकारात्मक प्रभाव सीधे कपड़ा उद्योग पर दिखेगा। इस साल वस्त्रोद्योग के लिए कपास की उपलब्धता सीमित हो सकती है। असमान्य वर्षा और मौसम की मार का असर दलहन की फसलों पर भी पड़ा है। भारत में ऐसा कई बार हो चुका है जब मौसम की मार के कारण दलहन की फसलें खराब हो चुकी हैं और जिसके कारण दालें सामान्य लोगों की थाली से गायब हो गईं थीं, क्योंकि इस दौरान दालों के दामों में अप्रत्याशित वृद्धि देखी गई। वैसी ही स्थित इस बार भी निर्मित हो सकती है, क्योंकि दलहन की फसल इस बार बुरी तरह से प्रभावित हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार इस बार दलहन की फसलों का उत्पादन अपने तय लक्ष्य 10.5 मिलियन टन से काफी कम हो सकता है, जिसकी वजह से भारत सरकार को बाजार में सुचारू रूप से सप्प्लाई जारी रखने के लिए चुनौती का सामना करना होगा। इसके लिए हो सकता है कि भारत को लगभग 30 लाख टन दालों का आयात करना पड़े। भारत सरकार के द्वारा दालों का आयत करना कोई नया मामला नहीं है। अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत पहले भी दालों का आयात करता रहा है।

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देश में निर्मित हो रही इन सभी परिस्तिथियों का असर तिलहन पर भी पड़ना तय है। अन्य फसलों की तरह तिलहन के उत्पादन में भी कमी का अनुमान है। जिसका असर भारतीय बाजार पर होगा। पिछले कुछ सालों से खाद्य तेलों की कीमतों में अप्रत्याशित रूप से उतार चढ़ाव देखने को मिल रहा है जो इस साल भी जारी रह सकता है। सरकार के आंकड़ों के अनुसार इस साल तिलहन का उत्पादन 21.5-22.5 मिलियन टन होने का अनुमान है जो तय लक्ष्य से लगभग 5 मिलियन टन कम है। भारत सरकार ने इस साल देश में 26.9 मिलियन टन तिलहन के उत्पादन का लक्ष्य रखा था, जो पिछले साल हुए उत्पादन से 3 मिलियन टन ज्यादा था। पिछले साल देश में लगभग 23.9 मिलियन टन तिलहन का उत्पादन हुआ था। यह पहली बार नहीं है जब भारत को तिलहन के उत्पादन में कमी का सामना करना पडेगा। पहले भी भारत में ऐसा हो चुका है, जिसकी भरपाई के लिए सरकार बड़ी मात्रा में खाद्य तेल का आयात करती है ताकि भारत के बाजार में खाद्य तेल की उपलब्धता को सुनिश्चित किया जा सके और खाद्य तेल की कीमतों को कंट्रोल में रखा जा सके।

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कुल मिलाकर देखा जाए तो असमान्य वर्षा और मौसम की मार की वजह से ज्यादातर फसलों के उत्पादन में कमी होने की सम्भावना है। जिसका सीधा असर बाजार में चीजों की उपलब्धता पर पडेगा, हो सकता है कि इसके कारण खाद्य चीजों के साथ वस्त्रों जैसी मूलभूत चीजों के दामों में भी उतार चढ़ाव देखने को मिले। हालांकि अभी से सितम्बर के बाद आने वाले मौसम की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। अगर मौसम करवट लेता है तो उसका असर आने वाली फसलों पर जरूर पडेगा, जिससे उत्पादन में कमी या वृद्धि होना संभव है।