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गेहूं व जौ की फसल को चेपा (अल) से इस प्रकार बचाऐं

गेहूं व जौ की फसल को चेपा (अल) से इस प्रकार बचाऐं

हरियाणा कृषि विभाग की तरफ से गेहूं और जौ की फसल में लगने वाले चेपा कीट से जुड़ी आवश्यक सूचना जारी की है। इस कीट के बच्चे व प्रौढ़ पत्तों से रस चूसकर पौधों को काफी कमजोर कर देते हैं। साथ ही, उसके विकास को प्रतिबाधित कर देते हैं। भारत के कृषकों के द्वारा गेहूं व जौ की फसल/ Wheat and Barley Crops को सबसे ज्यादा किया जाता है। क्योंकि, यह दोनों ही फसलें विश्वभर में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाली साबुत अनाज फसलें हैं।

गेहूं व जौ की खेती राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर में विशेष रूप से की जाती है। किसान अपनी फसल से शानदार उत्पादन हांसिल करने के लिए विभिन्न प्रकार के कार्यों को करते हैं। यदि देखा जाए तो गेहूं व जौ की फसल में विभिन्न प्रकार के रोग व कीट लगने की संभावना काफी ज्यादा होती है। वास्तविकता में गेहूं व जौ में चेपा (अल) का आक्रमण ज्यादा देखा गया है। चेपा फसल को पूर्ण रूप से  खत्म कर सकता है।

गेहूं व जौ की फसल को चेपा (अल) से बचाने की प्रक्रिया

गेहूं व जौ की फसलों में चेपा (अल) का आक्रमण होने पर इस कीट के बच्चे व प्रौढ़ पत्तों से रस चूसकर पौधों को कमजोर कर देते हैं. इसके नियंत्रण के लिए 500 मि.ली. मैलाथियान 50 ई. सी. को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ फसल पर छिड़काव करें. किसान चाहे तो इस कीट से अपनी फसल को सुरक्षित रखने के लिए अपने नजदीकी कृषि विभाग के अधिकारियों से भी संपर्क कर सकते हैं।

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चेपा (अल) से आप क्या समझते हैं और ये कैसा होता है ?

चेपा एक प्रकार का कीट होता है, जो गेहूं व जौ की फसल पर प्रत्यक्ष तौर पर आक्रमण करता है। यदि यह कीट एक बार पौधे में लग जाता है, तो यह पौधे के रस को आहिस्ते-आहिस्ते चूसकर उसको काफी ज्यादा कमजोर कर देता है। इसकी वजह से पौधे का सही ढ़ंग से विकास नहीं हो पाता है।

अगर देखा जाए तो चेपा कीट फसल में नवंबर से फरवरी माह के मध्य अधिकांश देखने को मिलता है। यह कीट सर्व प्रथम फसल के सबसे नाजुक व कमजोर भागों को अपनी चपेट में लेता है। फिर धीरे-धीरे पूरी फसल के अंदर फैल जाता है। चेपा कीट मच्छर की भाँति नजर आता है, यह दिखने में पीले, भूरे या फिर काले रंग के कीड़े की भाँति ही होता है।

इन रोगों से बचाऐं किसान अपनी गेंहू की फसल

इन रोगों से बचाऐं किसान अपनी गेंहू की फसल

मौसमिक परिवर्तन के चलते गेहूं की खड़ी फसल में लगने वाले कीट एवं बीमारियां काफी अधिक परेशान कर सकती हैं। किसानों को समुचित समय पर सही कदम उठाकर इससे निपटें नहीं तो पूरी फसल बेकार हो सकती है।

वर्तमान में गेहूं की फसल खेतों में लगी हुई है। मौसम में निरंतर परिवर्तन देखने को मिल रहा है। कभी बारिश तो कभी शीतलहर का कहर जारी है, इसलिए मौसम में बदलाव की वजह से गेहूं की खड़ी फसल में लगने वाले कीट और बीमारियां काफी समस्या खड़ी कर सकती हैं। किसान भाई वक्त पर सही कदम उठाकर इससे निपटें वर्ना पूरी फसल बेकार हो सकती है। गेंहू में एक तरह की बामारी नहीं बल्कि विभिन्न तरह की बामारियां लगती हैं। किसानों को सुझाव दिया जाता है, कि अपनी फसल की नियमित तौर पर देखरेख व निगरानी करें।

माहू या लाही

माहू या लाही कीट काले, हरे, भूरे रंग के पंखयुक्त एवं पंखविहीन होते हैं। इसके शिशु एवं वयस्क पत्तियों, फूलों तथा बालियों से रस चूसते हैं। इसकी वजह से फसल को काफी ज्यादा नुकसान होता है और फसल बर्बाद हो जाती है। बतादें, कि इस कीट के प्रकोप से फसल को बचाने के लिए वैज्ञानिकों द्वारा दी गई सलाहें।

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फसल की समय पर बुआई करें।

  • लेडी बर्ड विटिल की संख्या पर्याप्त होने पर कीटनाशी का व्यवहार नहीं करें।
  • खेत में पीला फंदा या पीले रंग के टिन के चदरे पर चिपचिपा पदार्थ लगाकर लकड़ी के सहारे खेत में खड़ा कर दें। उड़ते लाही इसमें चिपक जाएंगे।
  • थायोमेथॉक्साम 25 प्रतिशत डब्ल्यूजी का 50 ग्राम प्रति हेक्टेयर या क्विनलफोस 25 प्रतिशत ईसी का 2 मिली प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

हरदा रोग

वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस मौसम में वर्षा के बाद वायुमंडल का तापमान गिरने से इस रोग के आक्रमण एवं प्रसार बढ़ने की आशंका ज्यादा हो जाती है। गेहूं के पौधे में भूरे रंग एवं पीले रंग के धब्बे पत्तियों और तनों पर पाए जाते हैं। इस रोग के लिए अनुकूल वातावरण बनते ही सुरक्षात्मक उपाय करना चाहिए।

बुआई के समय रोग रोधी किस्मों का चयन करें।

बुआई के पहले कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण का 2 ग्राम या जैविक फफूंदनाशी 5 ग्राम से प्रति किलो ग्राम बीज का बीजोपचार अवश्य करें।

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खड़ी फसल में फफूंद के उपयुक्त वातावरण बनते ही मैंकोजेब 75 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण का 2 किलो ग्राम, प्रोपिकोनाजोल 25 प्रतिशत ईसी का 500 मिली प्रति हेक्टेयर या टेबुकोनाजोल ईसी का 1 मिली प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।

अल्टरनेरिया ब्लाईट

अल्टरनेरिया ब्लाईट रोग के लगने पर पत्तियों पर धब्बे बनते हैं, जो बाद में पीला पड़कर किनारों को झुलसा देते हैं। इस रोग के नियंत्रण के लिए मैकोजेब 75 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण का 2 किलो ग्राम या जिनेव 75 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण का 2 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

कलिका रोग

कलिका रोग में बालियों में दाने के स्थान पर फफूंद का काला धूल भर जाता है। फफूंद के बीजाणु हवा में झड़ने से स्वस्थ बाली भी आक्रांत हो जाती है। यह अन्तः बीज जनित रोग है। इस रोग से बचाव के लिए किसान भाई इन बातों का ध्यान रखें।

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रोग मुक्त बीज की बुआई करे।

  • कार्बेन्डाजिंग 50 घुलनशील चूर्ण का 2 ग्राम प्रति किलोग्राग की दर से बीजोपचार कर बोआई करें। 
  • दाने सहित आक्रान्त बाली को सावधानीपूर्वक प्लास्टिक के थैले से ढक कर काटने के बाद नष्ट कर दें। 
  • रोग ग्रस्त खेत की उपज को बीज के रूप में उपयोग न करें। 

बिहार सरकार ने किसानों की सुविधा के लिए 24 घंटे उपलब्ध रहने वाला कॉल सेंटर स्थापित कर रखा है। यहां टॉल फ्री नंबर 15545 या 18003456268 से संपर्क कर किसान अपनी समस्याओं का समाधान प्राप्त कर सकते हैं।

गेहूं की फसल बारिश और ओले के अलावा इस वजह से भी होगी प्रभावित

गेहूं की फसल बारिश और ओले के अलावा इस वजह से भी होगी प्रभावित

बेमौसम आई बारिश ने पुरे देश में गेहूं की फसल को काफी क्षतिग्रस्त कर दिया है। किसान वैसे ही बहुत सी समस्याओं से पीड़ित रहते हैं। अब प्राकृतिक आपदाएं भी उनके जी का जंजाल बन रही हैं। हालाँकि, राज्य सरकारें भी अपने स्तर से किसानों की क्षति पर ध्यान रखा जा रहा है। पहले भी खरीफ ऋतु की फसलों को प्राकृतिक आपदाएं जैसे कि बारिश, बाढ़ एवं सूखा के कारण बेहद नुकसान हुआ था। फिलहाल, रबी फसलों में किसान भाइयों को बेहतर आय की आशा थी। वहीं, इस सीजन के अंदर भारत में रिकॉर्ड तोड़ कर गेहूं के उत्पादन हेतु बीजारोपण भी किया गया है। किसान भाइयों का यह प्रयास है, कि खेतों में गेहूं के उत्पादन से मोटी आमदनी हो जाए। परंतु, बीते कुछ दिनों से मौसम परिवर्तन होने की वजह से किसानों की उम्मीद पर पानी फेरना चालू कर दिया है। भारत के बहुत से राज्यों में अत्यधिक मूसलाधार बारिश दर्ज की गई है। तो वहीं, मौसम विभाग ने बताया है, कि फिलहाल एक दो दिन अभी और बारिश होने की आशंका है। बारिश से क्षतिग्रस्त हुई फसल से अब देश को भी अनाज के संकट का सामना करना पड़ सकता है।

इन प्रदेशों की स्थिति पश्चिमी विक्षोभ ने की खराब

मौसम के जानकारों ने बताया है, कि पश्चिमी विक्षोभ मतलब वेस्टर्न डिस्टर्बेंस की वजह से परिस्थितियां प्रतिकूल हो गई हैं। इसी लिए जल भरे बादलों का रुझान इन प्रदेशों की तरफ हुआ है। आपको बतादें कि बीते दो दिनों में उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, राजस्थान से महाराष्ट्र सहित भारत के विभिन्न राज्यों में जोरदार हवाओं के साथ-साथ बारिश एवं ओलावृष्टि देखने को मिली है।

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बारिश की मार से गेंहू की फसल सबसे ज्यादा बर्बाद

जैसा कि हम सब जानते हैं, कि गेंहू रबी सीजन में उगाई जाने वाली प्रमुख फसल है। देश विदेशों तक गेंहू की माँग काफी होती है। वर्तमान में तीव्र बारिश गेहूं की मृत्यु बन सकती है। बीते दो दिनों से बहुत से राज्यों में तेज वर्षा हो रही है। अब ऐसी स्थिति में किसानों को गेहूं की फसल बर्बादी होने का भय सता रहा है। जानकारों का मानना है, कि ज्यादा वर्षा हुई तो गेहूं की पैदावार निश्चित रूप से काफी प्रभावित होगी। तीव्र हवा, बारिश और ओले पड़ने की वजह से खेतों में ही गेहूं की फसल गिर चुकी है। मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और राजस्थान के विभिन्न जनपदों में गेहूं की फसल क्षतिग्रस्त होने की भी खबरें सामने आ रही हैं। इतना ही नहीं इसके चलते आम और लीची की पैदावार भी इन प्रदेशों में प्रभावित हो सकती है।

गेंहू की फसल को रोग एवं कीट संक्रमण की संभावना

किसान को केवल बारिश ही नुकसान नहीं पहुँचा रही है। बारिश की वजह से उत्पन्न कीट संक्रमण भी गेंहू फसल हानि करने में अपनी नकारात्मक भूमिका निभाएगा। इसके अतिरिक्त भी बारिश की वजह से होने वाली सड़न-गलन से भी गेहूं की फसल को काफी हानि होने की संभावना है। इसकी वजह से गेहूं की फसल में रोग और कीट लगने का संकट तो बढ़ा ही है। महाराष्ट्र राज्य के चंद्रपुर जनपद के खेतो में कटाई की हुई गेहूं-चना के साथ बाकी फसलों के भीगने और खेतों में जल भराव से किसानों को काफी हानि का सामना करना पड़ा है। प्रभावित किसानों द्वारा सरकार से फसल बीमा के अनुरूप सहायता धनराशि की मांग जाहिर की गई है। तो उधर, राजस्थान राज्य के बूंदी जनपद में भी फसल को काफी हानि पहुँची है। वहीं, महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में 62000 हेक्टयर से ज्यादा कृषि भाग को हानि हुई है। नांदेड़, बीड, लातूर, औरंगाबाद और हिंगोली में कृषकों को काफी नुकसान का सामना करना पड़ा है।
किसानों को 81 क्विंटल तक उपज देने की क्षमता रखती हैं गेंहू की ये 5 उन्नत किस्में

किसानों को 81 क्विंटल तक उपज देने की क्षमता रखती हैं गेंहू की ये 5 उन्नत किस्में

भारतीय कृषि वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई गेहूं की टॉप पांच उन्नत किस्में श्रीराम 303 गेहूं की किस्म, GW 322 किस्म, पूसा तेजस 8759 किस्म, श्री राम सुपर 111 गेहूं और HI 8498 किस्म प्रति हेक्टेयर 81 क्विंटल तक उत्पादन देने में सक्षम हैं। साथ ही, यह समस्त किस्में 100 से 120 दिन में पककर तैयार हो जाती हैं। गेहूं की खेती से ज्यादा मुनाफा पाने के लिए कृषकों को गेहूं की उन्नत किस्मों का चुनाव करना चाहिए। जिससे कि किसान कम वक्त में ही ज्यादा से ज्यादा उपज हाँसिल कर उसे बाजार में बेच सकें। साथ ही, कृषि वैज्ञानिकों के द्वारा भी समयानुसार फसलों की नवीन-नवीन किस्मों को तैयार किया जाता है। इसी कड़ी में आज हम देश के कृषकों के लिए भारतीय कृषि वैज्ञानिकों के द्वारा विकसित की गई गेहूं की टॉप पांच उन्नत किस्मों की जानकारी लेकर आए हैं। जो 100 से 120 दिन में पक जाती हैं। साथ ही, ये किस्में 81 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पैदावार देती हैं। गेहूं की जिन टॉप पांच उन्नत किस्मों के बारे में हम चर्चा कर रहे हैं। वह श्रीराम 303 गेहूं की किस्म, GW 322 किस्म, पूसा तेजस 8759 किस्म, श्रीराम सुपर 111 गेहूं और HI 8498 किस्म हैं।

गेहूं की टॉप पांच उन्नत किस्में इस प्रकार हैं

HI 8498 किस्म

गेहूं की HI 8498 किस्म को जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के द्वारा विकसित की गई है। इससे किसान प्रति हेक्टेयर 77 क्विंटल तक उत्पादन हांसिल कर सकते हैं। साथ ही, यह प्रजाति 125-130 दिन में पूर्णतय पककर तैयार हो जाती है।

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श्रीराम 303 गेहूं की किस्म

गेहूं की यह किस्म खेत में 156 दिनों के समयांतराल में पककर तैयार हो जाती है। इसका औसतन पैदावार तकरीबन 81.2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक किसानों को मिलती है। गेहूं की यह श्रीराम 303 गेहूं की किस्म पीला, भूरा और काला रतुआ रोधी किस्म है।


 

GW 322 किस्म

गेहूं की यह किस्म 3-4 बार सिंचाई के अंतर्गत ही पक जाती है। गेहूं की GW 322 किस्म से भारत के किसान लगभग 60-65 क्विंटल उपज हांसिल कर सकते हैं। इस किस्म की संपूर्ण फसल लगभग 115-125 दिन की समयावधि में बेहतर ढ़ंग से पककर तैयार हो जाती है।

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पूसा तेजस 8759 किस्म

गेहूं की पूसा तेजस किस्म 110 से 115 दिनों के समयांतराल में पककर तैयार हो जाती है। बतादें, कि गेहूं की यह किस्म जबलपुर के कृषि विश्वविद्यालय में विकसित की गई गई है। इसे किसान प्रति हेक्टेयर तकरीबन 70 क्विंटल तक पैदावार प्राप्त कर सकते हैं।


 

श्री राम सुपर 111 गेहूं

गेहूं की यह उन्नत किस्म किसानों के लिए अत्यंत फायदेमंद है। क्योंकि यह किस्म बंजर भूमि पर भी सुगमता से उत्पादित की जा सकती है। गेहूं की श्रीराम सुपर 111 गेहूं से किसान प्रति हेक्टेयर लगभग 80 क्विंटल तक उपज हांसिल कर सकते हैं। साथ ही, इस प्रजाति से किसान बंजर भूमि पर तकरीबन 30 क्विंटल/हेक्टेयर तक उपज हांसिल कर सकते हैं। गेहूं की यह प्रजाति 105 दिनों के अंदर पक कर तैयार हो जाती है।

गेहूं की टॉप पांच बायो फोर्टिफाइड प्रजातियां इस प्रकार हैं

गेहूं की टॉप पांच बायो फोर्टिफाइड प्रजातियां इस प्रकार हैं

गेहूं की ये टॉप पांच बायो फोर्टिफाइड किस्में देश के अधिकांश राज्यों के किसानों के लिए उपयुक्त हैं। गेहूं की ये समस्त किस्में 117 से 150 दिनों के अंतर्गत पक जाती है। साथ ही, किसान इनसे प्रति हेक्टेयर 76 क्विंटल तक उत्पादन हांसिल कर सकते हैं। गेहूं की फसल से ज्यादा फायदा अर्जित करने के लिए किसान को इनकी नवीनतम उच्च पैदावार देने वाली किस्मों का चुनाव करना चाहिए। इसी कड़ी में आज हम भारत के कृषकों के लिए गेहूं की बायो फोर्टिफाइड किस्मों की जानकारी लेकर आए हैं, जो कम खर्चा में कम समय में ज्यादा उत्पादन देने में सक्षम है। दरअसल, जिन किस्मों के बारे में हम बात कर रहे हैं, ये समस्त किस्में 117 से 150 दिनों के समयांतराल में पककर तैयार हो जाती है। वहीं, ये किस्में प्रति हेक्टेयर 76 क्विंटल तक उत्पादन देती हैं।

गेहूं की टॉप पांच बायो फोर्टिफाइड प्रजातियां इस प्रकार हैं

गेहूं की PBW 872 किस्म

गेहूं की यह किस्म दिल्ली, राजस्थान, पश्चिम उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और हरियाणा के क्षेत्रों के लिए उपयुक्त हैं। यह किस्म 152 दिनों के समयांतराल में पक जाती है। किसान गेहूं की PBW 872 किस्म से प्रति हेक्टेयर तकरीबन 75 क्विंटल तक उत्पादन हांसिल कर सकते हैं। गेहूं की इस किस्म में बायोफोर्टिफाइड गुण आयरन 42.3 पीपीएम, जिंक 40.7 पीपीएम विघमान रहते हैं।

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गेहूं की Pusa Ojaswi (HI 1650) किस्म

गेहूं की इस बायो फोर्टिफाइड किस्म में जिंक 42.7 पीपीएम उपलब्ध होते हैं। यह किस्म मप्र, छत्तीसगढ़, गुजरात, राजस्थान और उत्तरप्रदेश के हिस्सों के लिए उपयुक्त मानी जाती है। गेहूं की यह किस्म 117 दिनों के समयांतराल में पूरी तरह से पककर तैयार हो जाती है। किसान इस किस्म से तकरीबन 57 क्विंटल/हेक्टेयर तक उत्पादन अर्जित कर सकते हैं।

गेहूं की Karan Vrinda (DBW 371) किस्म

गेहूं की इस बायो फोर्टिफाइड किस्म करण वृंदा (DBW 371) किस्म में प्रोटीन 12.2%, आयरन 44.9 पीपीएम मौजूद होता है। यह किस्म दिल्ली, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और हरियाणा के क्षेत्रों के लिए काफी उपयुक्त होती है। गेहूं की यह किस्म 150 दिन के समयांतराल में पककर तैयार हो जाती है। इसके साथ-साथ देश के किसान इससे तकरीबन 76 क्विंटल/हेक्टेयर उत्पादन हांसिल कर सकते हैं।

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गेहूं की Karan Varuna (DBW 372) किस्म

गेहूं की इस किस्म में प्रोटीन 12.2%, जिंक 40.8ppm विघमान रहता है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, पश्चिम उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड राज्यों के किसानों के लिए यह अनुकूल है। गेहूं की यह बायो फोर्टिफाइड किस्म 151 दिन के समयांतराल में पूर्णतय पककर तैयार हो जाती है। किसान भाई इस किस्म से प्रति हेक्टेयर लगभग 75 क्विंटल तक उत्पादन हांसिल कर सकते हैं।

गेहूं की Unnat (HD 2967) (HD 3406) किस्म

गेहूं की यह उन्नत (एचडी 2967) (एचडी 3406) किस्म 146 दिनों के समयांतराल में पककर बाजार में बिकने के लिए तैयार हो जाती है। किसान इस किस्म से सुगमता से प्रति हेक्टेयर 55 क्विंटल तक उत्पादन हांसिल कर सकते हैं। बतादें, कि इस किस्म में प्रोटीन 12.25 प्रतिशत तक पाई जाती है।
रबी सीजन में गेहूं फसल की उपज को बढ़ाने के लिए सिंचाई की अहम भूमिका

रबी सीजन में गेहूं फसल की उपज को बढ़ाने के लिए सिंचाई की अहम भूमिका

भारत के अंदर रबी सीजन में सरसों व गेहूं की खेती Mustard and wheat cultivation अधिकांश की जाती है। गेहूं की खेती wheat cultivation में चार से छह सिंचाईयों की जरूरत होती है। ऐसे कृषकों को गेहूं की उपज बढ़ाने के लिए गेहूं की निर्धारित समय पर सिंचाई करनी चाहिए। अगर कृषक भाई गेहूं की समय पर सिंचाई करते हैं तो उससे काफी शानदार पैदावार हांसिल की जा सकती है। इसके साथ ही सिंचाई करते वक्त किन बातों का ख्याल रखना चाहिए। कृषकों को इस बात की भी जानकारी होनी आवश्यक है। सामान्य तौर पर देखा गया है, कि बहुत सारे किसान गेहूं की बिजाई करते हैं। परंतु, उनको प्रत्याशित उपज नहीं मिल पाती है। वहीं, किसान गेहूं की बुवाई के साथ ही सिंचाई पर भी विशेष तौर पर ध्यान देते हैं तो उन्हें बेहतर उत्पादन हांसिल होता है। गेहूं एक ऐसी फसल है, जिसमें काफी पानी की जरूरत होती है। परंतु, सिंचाई की उन्नत विधियों का इस्तेमाल करके इसमें पानी की काफी बचत की जा सकती है। साथ ही, शानदार उत्पादन भी हांसिल किया जा सकता है।

गेहूं की फसल में जल खपत Wheat crop required water

गेहूं की फसल Wheat Crop की कब सिंचाई की जाए यह बात मृदा की नमी की मात्रा पर निर्भर करती है। अगर मौसम ठंडा है और भूमि में नमी बरकरार बनी हुई है, तो सिंचाई विलंभ से की जा सकती है। इसके विपरीत अगर जमीन शुष्क पड़ी है तो शीघ्र सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। वहीं, अगर मौसम गर्म है तो पौधों को सिंचाई की ज्यादा जरूरत होती है। ऐसी स्थिति में समय-समय पर सिंचाई की जानी चाहिए ताकि जमीन में नमी की मात्रा बनी रहे और पौधे बेहतर ढ़ंग से बढ़ोतरी कर सके। गेहूं की शानदार उपज के लिए इसकी फसल को 35 से 40 सेंटीमीटर जल की जरूरत होती है। इसकी पूर्ति कृषक भिन्न-भिन्न तय वक्त पर कर सकते हैं। 

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गेहूं की फसल हेतु सिंचाई Wheat Crop Irrigation 

सामान्य तौर पर गेहूं की फसल में 4 से 6 सिंचाई करना काफी अनुकूल रहता है। बतादें, कि इसमें रेतीली भूमि में 6 से 8 सिंचाई की जरूरत होती है। रेतीली मृदा में हल्की सिंचाई की जानी चाहिए, जिसके लिए 5 से 6 सेंटीमीटर पानी की आवश्यकता होती है। साथ ही, भारी मिट्‌टी में गहरी सिंचाई की आवश्यकता होती है। इसमें कृषकों को 6-7 सेंटीमीटर तक सिंचाई करनी चाहिए। यह समस्त सिंचाई गेहूं के पौधे की भिन्न-भिन्न अवस्था में करनी चाहिए, जिससे ज्यादा लाभ हांसिल किया जा सके।

गेहूं काटने की मशीन से जुड़ी विस्तृत जानकारी

गेहूं काटने की मशीन से जुड़ी विस्तृत जानकारी

हमारे भारत में खेती-किसानी के लिए आधुनिक यंत्रो का काफी उपयोग किया जाने लगा है। इसके माध्यम से हम अधिक से अधिक फसल उगाते हैं और फिर उसकी कटाई करते हैं। फसल की कटाई करना भी एक बड़ा कार्य होता है। इसके लिए ज्यादा समय और परिश्रम लगता है। किन्तु, फसल की कटाई के लिए रीपर बाइंडर मशीन का उपयोग कर इस कार्य को सुगमता से किया जा सकता है। यह एक ऐसी मशीन है, जिसे फसल की कटाई के लिए बनाया गया है। 

रीपर बाइंडर मशीन फसल को जड़ से 5 से 7 CM की ऊंचाई पर काटता है। यह एक घंटे में 25 मजदूरों के बराबर फसल की कटाई कर सकता है, जिस वजह से यह बहुत ही उपयोगी मशीन है। गेहूं फसल की कटाई में भी रीपर बाइंडर मशीन का इस्तेमाल करते हैं। जिन स्थानों पर कंपाउंड हार्वेस्टर और ट्रैक्टर नहीं पहुंच पाता है, वहां इसे मुख्य तौर पर उपयोग में लाते हैं। इस लेख में आपके साथ गेहूं काटने की मशीन 2024 तथा रीपर (Reaper) मशीन की कीमत की जानकारी प्रदान करें। 

गेहूं काटने की मशीन 2024 / Reaper Binder Machine

यह एक कृषि यंत्र है, जिसे अनाज वाली फसल को काटने के लिए उपयोग में लिया जाता है। इस यंत्र के द्वारा घंटे में होने वाले कार्य को कुछ ही समय में पूर्ण कर लिया जाता है। यह खेत में तैयार फसल को उसकी जड़ के नजदीक 1 से 2 इंच की ऊंचाई पर काटता है, जिन राज्यों अथवा क्षेत्रों में हरे चारे के लिए फसल काटनी होती है। वहां कम्बाइंड हार्वेस्टर की अपेक्षा में रीपर बाइंडर मशीन का ज्यादा प्रयोग करते हैं। इस मशीन की मदद से मक्का, धान, मूंग, चना, गेहूं, ज्वार, बाजरा जैसी विभिन्न फसलों की कटाई की जा सकती है।

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रीपर मशीन कितने प्रकार की होती है / Types of Reaper Binder Machine

सामान्य तौर पर दो तरह की रीपर मशीन ज्यादा प्रचलित है। इसमें पहली मशीन को हाथ के सहारे से चलाते हैं तथा दूसरी मशीन को ट्रैक्टर से जोड़कर चलाया जाता है। हाथ से चलने वाली मशीन में पेट्रोल और डीजल डालकर चलाया जाता है।

ट्रैक्टर रीपर मशीन। 

  • स्ट्रॉ रीपर मशीन। 
  • हैंड रीपर बाइंडर मशीन। 
  • स्वचालित रीपर मशीन। 
  • वाकिंग बिहाइंड रीपर मशीन। 

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रीपर मशीन की क्या-क्या विशेषताऐं हैं  / Reaper Binder Machine Features

रीपर मशीन किसी भी तरह की फसल कटाई के लिए यह मशीन काफी उपयोगी है। यह मशीन फसल की कटाई कर उसकी बाइडिंग भी कर देता है। इससे काटी गयी फसल से थ्रेसिंग करने में आसानी होती है। यह छोटी और बड़ी दोनों ही फसलों को आसानी से काट देता है। यह मशीन एक एकड़ की फसल को एक घंटे में काट सकने में सक्षम है। 25 से 40 मजदूरों का काम इस मशीन से अकेले किया जा सकता है। यह स्वचालित मशीन है, जिस वजह से इसमें परिवहन की भी समस्या नहीं होती है। इस मशीन से आप सरसों, मक्का, चना, गेहूं, जौ, धान जैसी बहुत सारी फसलों को आसानी से काट सकते है।

कुट्टू की खेती से किसान रातोंरात हो सकते हैं मालामाल, ऐसे करें खेती

कुट्टू की खेती से किसान रातोंरात हो सकते हैं मालामाल, ऐसे करें खेती

कुट्टू एक ऐसा अनाज है जिसकी पैदावार देश में सीमित स्थानों पर होती है। पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले किसान इसकी खेती ज्यादा करते हैं। कुट्टू में अन्य अनाजों की तुलना में पोशक तत्वों की प्रचुर मात्रा पाई जाती है। चूंकि इसकी खेती सीमित मात्रा में और सीमित इलाकों में होती है इसलिए इसके रेट भी धान, गेहूं और अन्य मोटे अनाजों की तुलना में ज्यादा होते हैं। ऐसे में किसान कुट्टू की खेती करके अच्छी खासी आमदनी हासिल कर सकते हैं।

इन उत्पादों को बनाने में इस्तेमाल होते हैं कुट्टू के बीज

कुट्टू के बीजों से आटा बनाया जाता है जो बाजार में ऊंचे दामों पर बिकता है। इसके साथ ही इसके बीजों से नूडल, सूप, चाय और ग्लूटिन फ्री-बीयर भी बनाई जाती है। कुट्टू के पेड़ के तने का उपयोग सब्जी बनाने में किया जाता है, इसके साथ ही इसके फूल और पत्तियों से कई तरह की हर्बल दवाइयों का निर्माण किया जाता है। ये भी पढ़े: इस हर्बल फसल की खेती करके कमाएं भारी मुनाफा, महज तीन महीने में रकम होगी 3 गुना

ऐसे करें कुट्टू की खेती

कुट्टू के खेती के लिए ऐसी जमीन उपयुक्त मानी जाती है जिसमें मार्च, अप्रैल में भी पर्याप्त नमी बनी रहती हो। ऐसी परिस्थितियां पहाड़ी इलाकों में आसानी से मिल जाती हैं इसलिए इस अनाज की खेती वहीं पर सर्वाधिक की जाती है। इसकी खेती के लिए मिट्टी का पीएच मान 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए। इसके साथ ही बुवाई के पहले खेत को तीन से चार बार जुताई करके अच्छे से तैयार कर लें। कुट्टू के बीजों की बुवाई छिड़काव विधि से की जाती है। छिड़काव के बाद किसान भाई पाटा चलाकर बीजों को पूरी तरह से ढंक दें। एक हेक्टेयर कृषि भूमि में 40 से लेकर 80 किलोग्राम तक कुट्टू के बीज बोए जा सकते हैं। बीजों की बुवाई की मात्रा उनकी किस्मों पर निर्भर करती है। बुवाई के वक्त ध्यान रखें की पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर होना जरूरी है। ये भी पढ़े: अप्रैल माह में किसान भाई इन फसलों की बुवाई करके कमाएं मोटा मुनाफा

इस प्रकार से करें उर्वरक और कीटनाशकों का प्रयोग

कुट्टू की फसल में उर्वरक डालने से अच्छा उत्पादन प्राप्त होता है। एक हेक्टेयर फसल में 40 किलोग्राम नाइट्रोजन, 20 किलोग्राम पोटाश और 20 किलोग्राम फॉस्फोरस को मिश्रित करके डालना चाहिए। इसके साथ ही फसल की कम से कम 5 से 6 बार सिंचाई करना चाहिए। इस बात का ध्यान रखें कि खेत में हमेशा नमी बनी रहे। कुट्टू की फसल में कीटों का हमला नहीं होता है। इसलिए इस खेती में किसी भी प्रकार के कीटनाशक का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

कटाई और पैदावार

इस फसल में बीजों के झड़ने की समस्या सबसे ज्यादा होती है ऐसे में जब फसल 80 फीसदी पक जाए तब कटाई शुरू कर दें। कटाई के बाद फसल का गट्ठर बनाकर, इसे सुखाने के बाद गहाई करनी चाहिए। एक हेक्टेयर में लगभग 13 क्विंटल तक कुट्टू का उत्पादन हो जाता है। इस हिसाब से कुट्टू की खेती करके किसान भाई कम समय में  मालामाल हो सकते हैं।
गेंहू से भी ज्यादा महंगी बिकने वाली इस फसल का उत्पादन करके किसान अच्छी आय कर सकते हैं

गेंहू से भी ज्यादा महंगी बिकने वाली इस फसल का उत्पादन करके किसान अच्छी आय कर सकते हैं

आज हम आपको एक ऐसी फसल के बारे में बताने जा रहे हैं, जिससे निर्मित आटा गेंहू से भी अधिक दाम में बेचा जाता है। साथ ही, इसके अंदर अन्य अनाजों के तुलनात्मक प्रचुर मात्रा में पोषक तत्व विघमान रहते हैं। जैसा कि हम सब जानते हैं कि भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है। इसकी वजह यह है कि यहां 60 से 70 प्रतिशत आबादी कृषि क्षेत्र पर निर्भर रहती है। भारत के विभिन्न राज्यों में विभिन्न प्रकार की फसलों का उत्पादन किया जाता है। उत्तर भारत में गेंहू का उत्पादन काफी बड़े पैमाने पर किया जाता है। दूसरी तरफ दक्षिण भारत के अंदर धान एवं नारियल का उत्पादन अधिक होता है। उसी प्रकार पहाड़ी प्रदेशों की भी अपनी भिन्न फसल है। इन पहाड़ी राज्यों में किसान भाई धान गेंहू सहित मोटे अनाज एवं जंगली फ्रूट्स का भी उत्पादन किया जाता है। परंतु, पहाड़ी प्रदेशों के किसानों को फसल उत्पादन करने हेतु काफी परिश्रम करना होता है। ऐसी स्थिति में वह खेती किसानी से अपना रुख बदल कर अन्य कार्य करने दूसरे बड़े शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं। हालाँकि, अब इन किसान भाइयों को किसी भी तरह की कोई दिक्कत परेशानी लेने की जरूरत नहीं है।

केंद्र सरकार कुट्टू की खेती को प्रोत्साहन दे रही है

आजतक की रिपोर्ट के अनुसार, पहाड़ी राज्य के किसानों को पलायन करने से रोकने और उनकी आर्थिक आय बढ़ाने के लिए कुट्टू की खेती को प्रोत्साहित कर रही है। बतादें, कि कुट्टू के अंदर गेंहू धान सहित अन्य अनाजों के तुलनात्मक काफी ज्यादा मात्रा में पोषक तत्व विघमान होते हैं। दरअसल, भारत में कुट्टू का उत्पादन करने वाले काफी कम किसान पाए जाते हैं। इसीलिए कुट्टू का आटा गेंहू के मुकाबले ज्यादा दाम में बिकता है। यदि पहाड़ी क्षेत्र के किसान इसकी खेती करते हैं तो उनको काफी आमदनी अर्जित हो पाएगी। ये भी पढ़े: कुट्टू की खेती से किसान रातोंरात हो सकते हैं मालामाल, ऐसे करें खेती

कुट्टू के बीज से काफी चीजें बनाई जा सकती हैं

आपकी जानकारी के लिए बतादें कि कुट्टू सिर्फ एक फसल ही नहीं है। यह एक जड़ी- बूटी भी है। बतादें कि इसके बीज द्वारा जहां आटा निर्मित किया जाता है, तो उधर इसके तने से स्वादिष्ट सब्जियां भी बनाई जाती हैं। इसका सेवन करने से शरीर को भरपूर मात्रा में विटामिन्स प्राप्त होते हैं। विशेष बात यह है, कि कुट्टू के फूल एवं पत्तियों द्वारा दवाइयां निर्मित की जाती हैं। ऐसी स्थिति में हम यह बोल सकते हैं, कि कुट्टू एक ऐसी फसल है, जिसके बीज से लेकर पत्ते, फूल एवं तने तक का इस्तेमाल धन अर्जित करने में किया जा सकता है। साथ ही, इसके बीज के माध्यम से चाय, नूडल और सूप भी निर्मित किया जाता है।

कुट्टू को 80 प्रतिशत पकते ही काट सकते हैं

जानकारी के अनुसार, कुट्टू का उत्पादन करने के लिए मृदा का पीएच 6.5 से 7.5 के मध्य बेहतर माना गया है। इसक उत्पादन करने हेतु एक हेक्टेयर भूमि में 80 किलोग्राम तक बीज की आवश्यकता होती है। विशेष बात यह है, कि इसका बीजारोपण एक निश्चित दूरी पर किया जाता है। इससे बेहतरीन उत्पादन मिलता है। कुट्टू की फसल पर कीट- पतंगों का किसी तरह का प्रभाव नहीं पड़ता है। साथ ही, कुट्टू को 80 प्रतिशत पकने के बाद काटा जा सकता है। एक हेक्टेयर भूमि में आपको 11 से 13 क्विंटल उत्पादन प्राप्त हो सकता है। अब ऐसी स्थिति में इसका उत्पादन करने से किसानों की आय काफी बढ़ जाएगी।