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गुलाब

कृषि वैज्ञानिक कपास की इन किस्मों की बुवाई करने की सलाह दे रहे हैं

कृषि वैज्ञानिक कपास की इन किस्मों की बुवाई करने की सलाह दे रहे हैं

वर्तमान में गेहूं की फसल की कटाई हो चुकी है। साथ ही, कपास की बुवाई (cotton sowing) का वक्त प्रारंभ हो गया है। अब ऐसी स्थिति में जो किसान गेहूं के पश्चात कपास की खेती (cotton cultivation) करना चाहते हैं, उनके लिए कपास की बुवाई की कई बेहतरीन किस्में हैं, जो बेहतर उत्पादन प्रदान कर सकती हैं। 

कृषि वैज्ञानिकों ने अमेरिकन कपास या नरमा की खेती करने वाले कृषकों के लिए सलाह भी जारी कर दी है। इसके लिए कृषि वैज्ञानिकों की तरफ से कपास की अनुशंसित किस्में लगाने की सलाह दी जा रही है। 

इसके साथ इसकी बुवाई में ध्यान रखने वाली आवश्यक बातों के विषय में भी बताया जा रहा है। विभाग की तरफ से राजस्थान के कृषकों को 20 मई तक कपास की बिजाई करने के लिए कहा जा रहा है, जिससे कि कपास में गुलाबी सुंडी का प्रकोप न हो सके। इसके साथ ही कपास की उन्नत किस्मों के विषय में भी बताया जा रहा है।

नरमा (कपास) की आर.एस. 2818 किस्म 

RS of Narma (Cotton) 2818 नरमा आर.एस किस्म से 31 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उपज हांसिल की जा सकती है। इसके रेशे की लंबाई 27.36 मिलीमीटर, मजबूती 29.38 ग्राम टेक्स आंकी गई है। 

टिंडे का औसत भार 3.2 ग्राम होता है। बिनौलों में 17.85 प्रतिशत तेल की मात्रा पाई जाती है। इसकी ओटाई 34.6 प्रतिशत आंकी गई है।

नरमा (कपास) की आर.एस. 2827 किस्म 

RS of Narma (Cotton) 2827 नरमा (कपास) की आर.एस- 2827 किस्म से औसत 30.5 क्विंटल प्रति हैक्टेयर पैदावार प्राप्त की जा सकती है। 

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इसके रेशे की लंबाई 27.22 मिलीमीटर व मजबूती 28.86 ग्राम व टेक्स आंकी गई है। इसके टिंडे का औसत वजन 3.3 ग्राम होता है। इसके बिनौले में तेल की मात्रा 17.2 फीसद होती है।

नरमा (कपास) की आर.एस. 2013 किस्म

RS of Narma (Cotton) 2013 नरमा (कपास) की आरएस 2013 किस्म की ऊंचाई 125 से 130 सेमी होती है। इसकी पत्तियां मध्यम आकार की व हल्के हरे रंग की होती हैं। 

इसके फूलों की पखुड़ियों का रंग पीला होता है। यह किस्म 165 से 170 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म में गुलाबी सुड़ी द्वारा हानि अन्य किस्मों की अपेक्षा कम होती है। 

यह किस्म पत्ती मरोड़ विषाणु बीमारी के प्रति भी अवरोधी है। इस किस्म से प्रति हैक्टेयर 23 से 24 क्विंटल तक पैदावार प्राप्त की जा सकती है।

नरमा (कपास) की आरएसटी 9 किस्म 

RST 9 variety of Narma (cotton) नरमा (कपास) की आरएसटी 9 किस्म के पौधे की ऊंचाई 130 से 140 सेमी तक होती है। इसकी पत्तियां हल्के रंग की होती हैं और फूल का रंग हल्का पीला होता है। 

इसमें चार से छह एकांक्षी शाखाएं होती हैं। इसके टिंडे का आकार मध्यम है, जिसका औसत वजन 3.5 ग्राम होता है। यह किस्म 160 से 200 दिन में पककर तैयार हो जाती है। 

तेला (जेसिड) रोग से इस किस्म में कम हानि होती है। इस किस्म की ओटाई का प्रतिशत भी अन्य अनुमोदित किस्मों से अधिक है।

नरमा (कपास) की आर.एस. 810 किस्म

RS of Narma (Cotton) 810 नरमा (कपास) की आर.एस. 810 किस्म के पौधे की ऊंचाई 125 से 130 सेमी होती है। इसके फूलों का रंग पीला होता है। इसके टिंडे का आकार छोटा करीब 2.50 से 3.50 ग्राम होता है। 

इसके रेशे की लंबाई 24 से 25 मिलीमीटर व ओटाई क्षमता 33 से 34 फीसद होती है। यह किस्म 165 से 175 दिन में पककर तैयार हो जाती है। 

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यह किस्म पत्ती मोड़क रोग की प्रतिरोधी है। इस किस्म से लगभग 23 से 24 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उपज हांसिल की जा सकती है।

नरमा (कपास) की आर.एस. 875 किस्म

RS of Narma (Cotton) 875 नरमा (कपास) की आर.एस. 875 किस्म के पौधों की ऊंचाई 100 से 110 सेमी होती है। इसकी पत्तियां चौड़ी व गहरे हरे रंग की होती हैं। इसमें शून्य यानी जीरो से एक एकांक्षी शाखाएं पाई जाती हैं। 

इसके टिंडे का आकार मध्यम होता है और औसत वजन 3.5 ग्राम होता है। इसके रेशे की लंबाई 27 मिलीमीटर होती है। इसमें तेल की मात्रा 23 प्रतिशत पाई जाती है, जो कि अन्य अनुमोदित किस्मों से ज्यादा है। 

इस किस्म की फसल 150 से 160 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इससे उसी खेत में सामान्य समय पर गेहूं की बुवाई भी की जा सकती है।

बीकानेरी नरमा

बीकानेरी नरमा  (Bikaneri Narma) किस्म के पौधे की ऊंचाई लगभग 135 से 165 सेमी होती है। इसकी पत्तियां छोटी, हल्के हरे रंग की होती है और फूल छोटे और हल्के पीले रंग के होते हैं। 

इसमें चार से छह एकांक्षी शाखाएं पाई जाती हैं। इसके टिंडे का आकार मध्यम और औसत वजन 2 ग्राम होता है। इसकी फसल 160 से 200 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म में तेला (जेसिड) से अपेक्षाकृत कम हानि होती है।

मरू विकास (राज, एच.एच. 6) 

Desert Development (Kings, HH 6) नरमा (कपास) की मरू विकास (राज, एच.एच. 6) के पौधों की ऊंचाई 100 से 110 सेमी. और पत्तियां चौड़े आकार की होती हैं। इसका रंग हरे रंग का होता है। 

इसमें शून्य यानी जीरो से एक एकांक्षी शाखाएं पाई जाती हैं। इसके टिंडे का आकार मध्यम और औसत वजन 3.5 ग्राम होता है। इसके रेशे की लंबाई 27 मिलीमीटर होती है। 

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इसमे तेल की मात्रा 23 प्रतिशत पाई जाती है। इस किस्म की फसल 150 से 160 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इससे उसी खेत में सामान्य समय पर गेहूं की बुवाई कर सकते हैं।

नरमा कपास की उन्नत किस्मों की बुवाई का तरीका 

नरमा कपास की उन्नत किस्मों की बुवाई के लिए 4 किलोग्राम प्रति बीघा की दर से बीज की जरूरत पड़ती है। बुवाई के दौरान पंक्ति से पंक्ति का फासला 67.50 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे का फासला लगभग 30 सेंटीमीटर रखना चाहिए।

नरमा की बुवाई का समय 15 अप्रैल से 15 मई तक माना जाता है। लेकिन किसान मई के अंत तक इसकी बिजाई कर सकते हैं।

अप्रैल माह में गुलाब के फूल की खेती की विस्तृत जानकारी

अप्रैल माह में गुलाब के फूल की खेती की विस्तृत जानकारी

गुलाब यानी रोज एक ऐसा फूल है, जिसको प्रेमी अपनी प्रेमिका को प्रेम स्वरुप भेंट करता है। अब इससे आप इस फूल की संसार में महत्ता और विशेषता को समझ सकते हैं। 

गुलाब का फूल दिखने में आकर्षक और सुन्दर होने के साथ-साथ बहुत सारे औषधीय गुणों से भी भरपूर होता है। गुलाब को सबसे पुराना सुगन्धित फूल माना जाता है। इन्हीं सब वजहों के चलते बाजार में इसकी हमेशा मांग बनी रहती है। इसलिए भारत के विभिन्न राज्यों में किसान गुलाब की खेती (Rose Cultivation) करते हैं। 

सामान्य तौर पर गुलाब का पौधा ऊंचाई में 4 से 6 फुट का होता है। इसके तने में असमान कांटे लगे होते हैं। इसके साथ ही गुलाब की 5 पत्तियां मिली हुई होती हैं। 

गुलाब का फल अंडाकार होता है, तो वहीं इसका तना कांटेदार, पत्तियां बारी-बारी से घेरे में होती हैं। इसकी पत्तियों के किनारे दांतेदार होते हैं। गुलाब की खेती उत्तर और दक्षिण भारत के मैदानी व पहाड़ी क्षेत्रों में जाड़े के दिनों में की जाती है। 

लेकिन, आज हम इस लेख में एक सफल किसान रविन्द्र सिंह तेवतिया से आपको रूबरू कराएंगे जो कि उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के मूल निवासी हैं। आइए जानते हैं, किसान रविंद्र  सिंह तेवतिया ने मार्च और अप्रैल में गुलाब की खेती (Rose Cultivation) करने वाले किसानों को किन-किन बातों का विशेष ध्यान रखने की सलाह दी है।

मौसमिक परिवर्तन के समय विशेष सावधानी की जरूरत  

रविन्द्र सिंह तेवतिया का कहना है, कि जब मौसम में बदलाव होता है यानी सर्दी से गर्मी के मौसम में प्रवेश करते हैं, तब पौधे का विकास हो रहा होता है। 

ऐसे में पौधे में बुवाई के बाद खरपतवार उग आती है। क्योंकि, बुवाई के बाद फसल को दैनिक सिंचाई की आवश्यकता होती है। इसलिए हर 1 से 2 महीने के बाद और फिर 3 से 4 महीने में खरपतवार को निकालना जरूरी होता है।

गुलाब के पौधों का कीट व रोगों से संरक्षण 

रविंद्र सिंह तेवतिया ने कहा, कि मौसमिक परिवर्तन के चलते कई बार गुलाब में विभिन्न तरह के कीट और रोगों का आक्रमण शुरू हो जाता है। 

इसलिए इसके बचाव के लिए पौधों पर सही कीटनाशकों का छिड़काव करना बेहद जरूरी होता है। रविन्द्र सिंह ने बताया कि अक्सर गुलाब में थिप्स और माइट कीट का प्रकोप हो जाता है। इसलिए ऐसी स्थिति में कीटनाशक का इस्तेमाल करना चाहिए। 

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कीट की रोकथाम के लिए गुलाब के खेत में सफाई बनाए रखें। साथ ही, ग्रसित पौधे के भागों को नष्ट कर दें, ताकि वह अधिक नुकसान ना पहुँचा सकें। 

डाइमेथोएट 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल का 10 से 15 दिन के समयांतराल पर छिड़काव कर दें। वहीं, दीमक पर काबू करने के लिए हर पौधे की मिट्टी में 10 से 15 ग्राम फोरट डालना चाहिए। 

गुलाब के फूलों की छटाई कब की जानी चाहिए 

गुलाब की खेती में फूल की एक या दो पंखुडियां खिल जाए, तो फूल को पौधे से अलग कर देना चाहिए। इसके लिए तेज धार वाले चाकू या ब्लेड का उपयोग करना चाहिए। 

फूल की कटाई के शीघ्र बाद उसको पानी से भरे बर्तन में रख दें। इसके बाद कोल्ड स्टोरेज में रख दें। इसका तापमान लगभग 10 डिग्री तक होना चाहिए। इसके बाद फूलों की ग्रेडिंग की जाती है, जिसे कोल्ड स्टोरेज में ही पूरा किया जाता है। इसको फूलों की छटाई भी कहा जाता है। 

गुलाब की खेती के लिए अत्यंत जरूरी बातें  

रविन्द्र सिंह तेवतिया का कहना है, कि गुलाब की खेती में फूलों को बढ़ाने के लिए बर्ड कैप का उपयोग करना चाहिए। इससे आप फूलों को तकरीबन 4 दिनों तक सुरक्षित व संरक्षित रख सकते हैं।

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गुलाब की खेती से किसान कितना मुनाफा कमा सकते हैं

गुलाब की खेती से मुनाफा कमाना सीजन पर निर्भर करता है। रविन्द्र सिंह तेवतिया ने बताया कि मौजूदा समय में फूल 40 से 120 रुपए प्रति किलो के हिसाब से बिक रहा है, जो कि अप्रैल में 100 से 150 रुपए प्रति किलो तक पहुंच जाएगा।

बतादें, कि अप्रैल में शादी का सीजन शुरू हो जाता है। इसके अलावा फरवरी में फूलों की कीमत 500 रुपए प्रति किलो तक थी। इस तरह किसान गुलाब की खेती से अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। सरकार गुलाब के फूलों की खेती को प्रोत्साहन देने के लिए अनुदान भी प्रदान करती है।

सामान्य आलू की तुलना में गुलाबी आलू दिलाऐगा किसानों अधिक मुनाफा

सामान्य आलू की तुलना में गुलाबी आलू दिलाऐगा किसानों अधिक मुनाफा

किसान भाइयों आज हम आपको इस लेख में गुलाबी आलू के बारे में बताने जा रहे हैं। गुलाबी आलू आम आलू की तुलना में विलंभ से खराब होता है। यह आलू स्वास्थ्य के लिए काफी लाभदायक होता है। अगर आप किसान हैं एवं आप आलू की खेती करते हैं, तो ये खबर आपके लिए बड़े काम की होने वाली है। अब किसान भाइयों को नॉर्मल आलू की खेती करने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि वर्तमान में गुलाबी आलू की भी खेती हो रही है। यह आलू दिखने में बेहद ही अच्छा लगता है। इसके साथ ही इसका स्वाद भी सामान्य आलू से अच्छा है। जानकारों का कहना है, कि ये आलू अत्यधिक पौष्टिक हैं। इसमें कार्बोहाइड्रेट व स्टार्च भरपूर मात्रा में होता है।

गुलाबी आलू सेहत के लिए काफी फायदेमंद है

गुलाबी आलू को स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद कहा जाता है। इसी के साथ - साथ ये शीघ्रता से सड़ता भी नहीं है। बाजार में यह आलू तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। बतादें, कि मांग बढ़ने के साथ किसान भाइयों को मुनाफा होना चालू हो गया है। अब जितनी इसकी मांग बढ़ेगी किसानों को भी उतना ही ज्यादा लाभ मिलेगा। यह भी पढ़ें: इस तरह करें अगेती आलू की खेती

गुलाबी आलू की खेती से कृषकों को मिलेगा फायदा

गुलाबी आलू की खेती तराई और पहाड़ी क्षेत्र दोनों में की जा सकती है। फसल को तैयार होने में 80 से 100 दिन का समय लग जाता है। गुलाबी आलू काफी चमकीला भी होता है, जिसकी वजह से लोग इसकी ओर तेजी से आकर्षित होते हैं। कीमत की बात की जाए तो बाजारों में इसका भाव आम आलू की तुलना में अधिक होती है। प्रति हेक्टेयर के खेत में इसकी 400 क्विंटल से भी ज्यादा पैदावार हो सकती है। गुलाबी आलू की एक बार की फसल से किसान भाई को एक से दो लाख रुपये का मुनाफा होता है।

गुलाबी आलू सेहत के लिए काफी अच्छा होता है

विशेषज्ञों का कहना है, कि ये आलू आम आलू की तुलना में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का कार्य करता है। साथ ही, गुलाबी आलू का कई महीनों तक सुगमता से भंडारण किया जा सकता है। इसमें वायरस के चलते पनपने वाले रोग भी नहीं लगा करते, जिसकी वजह से किसानों की लागत में कमी आती है और मुनाफा भी अधिक होता है।
घर की बालकनी को गुलाब के फूलों से महकाने का आसान तरीका

घर की बालकनी को गुलाब के फूलों से महकाने का आसान तरीका

नई दिल्ली। हर कोई अपने आशियाने को सुंदर और खूबसूरत बनाना चाहता है। घर के आस-पास के वातावरण को भी अच्छा रखना हर किसी की इच्छा रहती है। बालकनी में लगे पौधे न सिर्फ आपके घर को स्वच्छ बनाने का काम करते हैं बल्कि पूरे घर को ब्यूटीफुल भी बनाते हैं। इसलिए कई लोग आउटडोर प्लांट के अलावा इंडोर प्लांट भी लगाते हैं। अपने घर के अंदर लोगज्यादा फ्लावर प्लांट जैसे - चमेली, रोज प्लांट आदि लगाना पसंद करते हैं।

अगर आप भी अपने घर की बालकनी को सुंदर गुलाब के फूलों से महकता हुआ देखना चाहते हैं, तो पढ़िए ये पूरी खबर:

1. अच्छी नर्सरी से गुलाब के पौधे का चयन

- बालकनी में गुलाब के पौधा लगाने के लिए किसी अच्छी नर्सरी से ही पौधा लें। अच्छी नर्सरी से मिलने वाले पौधे जन्म से ही स्वस्थ होते हैं। इनमें कोई रोग नहीं होता है और रोगों से लड़ने की क्षमता भी अधिक होती है।

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2. गमले में उपयोगी मिट्टी पर विशेष ध्यान दें

- पौधों के लिए मिट्टी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। इसलिए आपकी बालकनी के गमले में उपयोगी मिट्टी ही होनी चाहिए। इस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। क्योंकि गुणवत्तापूर्ण मिट्टी से पौधे के विकास अच्छा होता है।

3. इस तकनीकी से लगाएं पौधे

- बालकनी में गुलाब का पौधा लगाने के लिए मिट्टी के बने हुए गमले खरीद लें। उसमें उचित मात्रा में उपयोगी मिट्टी डालें। पौधे को गमले में ठीक से लगाकर पानी डालें। फिर समय-समय पर पौधे की देखभाल करें। और बीच-बीच में कीट-पतंगों से भी बचाकर रखें। इसके लिए पौधे पर कीटनाशक छिड़काव भी करें। पौधे में पोषक तत्वों का छिड़काव भी आवश्यकता करते रहें। पौधे की वृद्धि का भी ख्याल रखें।

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4. गुलाब के पौधे के लिए ठंडा मौसम है अच्छा

- गुलाब के पौधे के लिए ठंडा मौसम काफी प्रतिकूल रहता है। अत्यधिक धूप और गर्मी से गुलाब के पौधे को नुकसान की आशंका रहती है। इसीलिए बालकनी में मौसम को देखते हुए गुलाब के गमले को रखें।

5. घर में गुलाब के फूल से फायदे

- गुलाब के फूल के पौधे सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाते हैं। इन पौधों को घर की उत्तर या पूर्व दिशा में लगाना चाहिए। - घर में पेड़-पौधे लगाने से वातावरण में ठंडक बनी रहती है। ये पर्यावरण के लिए भी बहुत फायदेमंद है। - गुलाब के फूल की खुशबू (महक) से घर का वातावरण भी शुद्ध रहता है। - गुलाब के फूल की पत्तियों को खाने के उपयोग में लिया जा सकता है। - गुलाब के साथ-साथ अन्य फूलों से भी बालकनी की रौनक बढ़ती है। ------- लोकेन्द्र नरवार
कपास की फसल को गुलाबी सुंडी से खतरा, कृषि विभाग ने जारी किया अलर्ट

कपास की फसल को गुलाबी सुंडी से खतरा, कृषि विभाग ने जारी किया अलर्ट

सिरसा। किसानों के लिए वरदान बनी कपास की खेती को गुलाबी सुंडी (Pink bollworm) का खतरा हो सकता है। हरियाणा राज्य में कृषि विभाग ने इसके लिए अलर्ट जारी किया है। 

सरकार ने कपास की खेती करने वाले सभी किसान भाईयों को गुलाबी सुंडी से कपास की फसल को बचाने के लिए निर्देश भी दिए हैं। पिछले दो साल से कपास की खेती किसानों के लिए सफेद सोना साबित हुई है। 

कपास ने किसानों को अच्छा मुनाफा दिया है। जिसके चलते किसानों में लगातार कपास की खेती के प्रति रुचि बढ़ रही है। अकेले सिरसा जिले में 2 लाख 10 हजार हेक्टेयर भूमि पर कपास की खेती की जा रही है।

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क्या है गुलाबी सुंडी?

- कपास की कलियों और बीजकोषों को क्षति का कारण गुलाबी सुंडी (इल्ली) पेक्टिनोफोरा गॉसिपिएला का लार्वा है। वयस्कों का रंग और आकार अलग-अलग होता है लेकिन आम तौर पर वे चित्तीदार धूसर से धूसर-भूरे होते हैं। 

वे दिखने में लंबे पतले और भूरे से होते हैं। अंडाकार पंख झालरदार होते हैं। करीब 4 से 5 दिन में लार्वा अंडे से बाहर निकल आते हैं। और तुरंत ही कपास की कलियों या बीजकोष में घुस जाते हैं। और फिर करीब 12 से 14 दिन तक फसल को खाता है।

कैसे करें गुलाबी सुंडी से बचाव?

1- जैविक नियंत्रण के अनुसार पेक्टिनोफोरा गॉसिपिएला से प्राप्त सेक्स फेरोमोन्स का संक्रमित खेत में छिड़काव करने से गुलाबी सुंडी की क्षमता और तादात कम होती है। 

2- रासायनिक नियंत्रण के अनुसार इन गुलाबी पतंगों को मारने के लिए क्लोरपाइरिफास, एस्फेंवैलेरेट या इंडोक्साकार्ब के कीटनाशक फार्मूलेशन का पत्तियों पर छिड़काव किया जा सकता है।

 3- कीट के लक्षणों को पहचानने के लिए नियमित कपास के पौधों पर निगरानी रखें।

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कपास की उन्नत किस्में लगाएँ 

4- कपास की जल्द परिवक्व होने वाली वैरायटी का उपयोग करें, ताकि सीजन शुरू होने से पहले ही फसल की उपज मिल जाए। आमतौर पर गुलाबी सुंडी सीजन में ज्यादा जोर पकड़ती है।

5- कीटनाशक दवाओं का सावधानी से प्रयोग करें, ताकि कोई नुकसान न हो। 

6- कटाई के तुरंत बाद पौधों को नष्ट कर देना चाहिए। 

7- ध्यान रहे कि कभी भी दो रासायनिक पदार्थों को मिलाकर छिड़काव न करें। इससे फसल को नुकसान संभावना बढ़ जाती है। 8- अधिकांश तौर पर नीम आधारित दवाओं का इस्तेमाल करें। 

 ------- लोकेन्द्र नरवार

कपास की फसल को गुलाबी सुंडी से बचाने के लिए किसान कर रहे हैं इस तकनीकी का प्रयोग

कपास की फसल को गुलाबी सुंडी से बचाने के लिए किसान कर रहे हैं इस तकनीकी का प्रयोग

अच्छा मुनाफा मिलने के बाद इस बार बढ़ रहा है कपास की खेती का रकबा

मुंबई। महाराष्ट्र में इस सीजन कपास की खेती का रकबा बढ़ना तय है। क्योंकि बीते साल कपास की खेती किसानों के लिए सफेद सोना साबित हुई थी। 

कपास से किसानों ने अच्छा मुनाफा कमाया था, जिसके चलते इस सीजन कपास की खेती करने वाले किसानों की संख्या बढ़ रही है। लेकिन कपास के किसानों के किये गुलाबी सुंडी कीट सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है। 

पहले भी पिंक बॉलवर्म (Pink bollworm) की बढ़ती घटनाओं के कारण कपास उत्पादन घटता रहा है। इस खतरनाक कीट से अन्य दूसरी फसलें भी प्रभावित होती हैं। 

कपास के लिए सबसे खतरनाक बने इस गुलाबी सुंडी कीट से बचाव के लिए किसान मेटिंग डिस्टर्बन्स तकनीकी (Mating disruption (MD)  pest management technique) का उपयोग कर रहे हैं। 

यह तकनीकी कपास का उत्पादन करने वाले महाराष्ट्र के 23 जिलों में लागू हो चुकी है। इसके लिए एक निजी कंपनी के साथ समझौता किया गया है। और इसकी शुरुआत खरीफ सीजन से होने जा रही है। 

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समझें क्या है मेटिंग डिस्टर्बन्स तकनीक प्रक्रिया

- कपास की फसल के साथ-साथ अन्य फसलों में गुलाबी सुंडी के प्रकोप को रोकने के लिए सल्फर रसायनों का उपयोग किया जाएगा। 

गंधक को पौधे के एक विशिष्ट भाग में लगाने के बाद नर कीट मादा कीट की गंध से आकर्षित होंगे और बार-बार आने के बावजूद वे वापस लौट आएंगे। क्योंकि उन्हें मादा पतंग नहीं मिलेगी। 

ऐसे में वे एक दूसरे के संपर्क में नहीं आ पाएंगे और अंडे देने की प्रक्रिया में रुकावट के कारण नए कीटों का उत्पादन नहीं होगा। इससे कीटों के अत्यधिक बढ़ते प्रकोप को रोका जा सकता है। 

इस वर्ष कपास उत्पादन करने वाले 23 जिलों में यह प्रयोग शुरू किया जा रहा है। कपास अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ कृष्ण कुमार के बताए अनुसार यह प्रक्रिया काफी जटिल है, लेकिन इसे प्रभावी माना जाता है। इससे किसानों में कुछ सन्तोष दिखाई दे रहा है।

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गुलाबी सुंडी के प्रकोप के चलते कपास की खेती छोड़ चुके थे किसान

- बीते कई वर्षों से कपास की खेती में गुलाबी सुंडी कीट का भारी प्रकोप रहा है। पिंक बॉलवर्म के प्रकोप के चलते किसान कपास की खेती छोड़ चुके थे। लेकिन पिछले सीजन में कपास की खेती ने किसानों की बल्ले-बल्ले कर दी। 

बाजार में कपास का अच्छा भाव मिला और किसानों ने अच्छा मुनाफा कमाया। यही कारण है कि इस बार कपास का रकबा बढ़ने जा रहा है।

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कपास के साथ-साथ सोयाबीन का बढ़ेगा रकबा

- महाराष्ट्र में कपास की खेती के साथ-साथ सोयाबीन का रकबा बढ़ना तय है। कृषि विभाग भी इसकी भविष्यवाणी कर चुका है। पिछले साल कपास और सोयाबीन से किसानों को अच्छा मुनाफा मिला था। 

इसके अलावा राज्य में बारिश के सक्रिय होने के कारण खरीफ की बुवाई में तेजी आई है। दलहन की जगह किसान कपास और सोयाबीन की खेती पर जोर दे रहे हैं। ------ लोकेन्द्र नरवार

पंजाबः पिंक बॉलवर्म, मौसम से नुकसान, विभागीय उदासीनता, फसल विविधीकरण से दूरी

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लक्ष्य की आधी हुई कपास की खेती, गुलाबी सुंडी के हमले से किसान परेशान

मुआवजा न मिलने से किसानों ने लगाए आरोप

भूजल एवं कृषि
भूमि की उर्वरता में क्षय के निदान के तहत, पारंपरिक खेती के साथ ही फसलों के विविधीकरण के लिए, केंद्र एवं राज्य सरकारें फसल विविधीकरण प्रोत्साहन योजनाएं संचालित कर रही हैं। इसके बावजूद हैरानी करने वाली बात है कि, सरकार से सब्सिडी जैसी मदद मिलने के बाद भी किसान फसल विविधीकरण के तरीकों को अपनाने से कन्नी काट रहे हैं।

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क्या वजह है कि किसान को फसल विविधीकरण विधि रास नहीं आ रही? क्यों किसान इससे दूर भाग रहे हैं? इन बातों को जानिये मेरी खेती के साथ। लेकिन पहले फसल विवधीकरण की जरूरत एवं इसके लाभ से जुड़े पहलुओं पर गौर कर लें।

फसल विविधीकरण की जरूरत

खेत पर परंपरागत रूप से साल दर साल एक ही तरह की फसल लेने से खेत की उपजाऊ क्षमता में कमी आती है। एक ही तरह की फसलें उपजाने वाला किसान एक ही तरह के रसायनों का उपयोग खेत में करता है। इससे खेत के पोषक तत्वों का रासायनिक संतुलन भी गड़बड़ा जाता है।

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भूमि, जलवायु, किसान का भला

यदि किसान एक सी फसल की बजाए भिन्न-भिन्न तरह की फसलों को खेत में उगाए तो ऐसे में भूमि की उर्वरकता बरकरार रहती है। निवर्तमान जैविक एवं प्राकृतिक खेती की दिशा में किए जा रहे प्रयासों से भी भूमि, जलवायुु संग कमाई के मामले में किसान की स्थिति सुधरी है।

नहीं अपना रहे किसान

पंजाब सरकार द्वारा विविधीकृत कृषि के लिए किसानों को सब्सिडी प्रदान करने के बावजूद किसान कृषि की इस प्रणाली की ओर रुख नहीं कर रहे है। प्रदेश में आलम यह है कि यहां कुछ समय तक विविधीकरण खेती करने वाले किसान भी अब पारंपरिक मुख्य खेती फसलों की ओर लौट रहे हैं।

किसानों को नुकसान

पंजाब सरकार खरीफ कृषि के मौसम में पारंपरिक फसल धान की जगह अन्य फसलों खास तौर पर कम पानी में पैदा होने वाली फसलों की फार्मिंग को सब्सिडी आदि के जरिए प्रेरित कर रही है।

सब्सिडी पर नुकसान भारी

सरकार द्वारा दी जा रही सब्सिडी के मुकाबले विविधीकृत फसल पर कीटों के हमले से प्रभावित फसल का नुकसान भारी पड़ रहा है।

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पंजाब के किसानों क मुताबिक उन्हें विविधीकरण कृषि योजना के तहत सब्सिडी आधारित फसलों पर कीटों के हमले के कारण पैदावार कम होने से आर्थिक नुकसान हो रहा है। इस कारण उन्होंने फसल विविधीकरण योजना एवं इस किसानी विधि से दूसी अख्तियार कर ली है।

कपास का लक्ष्य अधूरा

पंजाब कृषि विभाग द्वारा संगरूर जिले में तय किया गया कपास की खेती का लक्ष्य तय मान से अधूरा है। कपास के लिए निर्धारित 2500 हेक्टेयर खेती का लक्ष्य यहां अभी तक आधा ही है।

पिंक बॉलवर्म (गुलाबी सुंडी)

किसान कपास की खेती का लक्ष्य अधूरा होने का कारण पिंक बॉलवर्म का हमला एवं खराब मौसम की मार बताते हैं।

गुलाबी सुंडी क्या है

गुलाबी सुंडी (गुलाबी बॉलवार्म), पिंक बॉलवर्म या गुलाबी इल्ली (Pink Bollworm-PBW) कीट कपास का दुश्मन माना जाता है। इसके हमले से कपास की फसल को खासा नुकसान पहुंचता है। किसानो के मुताबिक, संभावित नुकसान की आशंका ने उनको कपास की पैदावार न करने पर मजबूर कर दिया। एक समाचार सेवा ने अधिकारियों के हवाले से बताया कि, जिले में 2500 हेक्टेयर कपास की खेती का लक्ष्य तय मान से अधूरा है, अभी तक केवल 1244 हेक्टेयर में ही कपास की खेती हो पाई है।

7 क्षेत्र पिंक बॉलवर्म प्रभावित

विभागीय तौर पर फिलहाल अभी तक 7 क्षेत्रों में पिंक बॉलवर्म के हमलों की जानकारी ज्ञात हुई है। विभाग के अनुसार कपास के कुल क्षेत्र के मुकाबले प्रभावित यह क्षेत्र 3 प्रतिशत से भी कम है।

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नुकसान आंकड़ों में भले ही कम हो, लेकिन पिछले साल हुए नुकसान और मुआवजे संबंधी समस्याओं के कारण भी न केवल फसल विविधीकरण योजना से जुड़े किसान अब योजना से पीछे हट रहे हैं, बल्कि प्रोत्साहित किए जा रहे किसान आगे नहीं आ रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में किसानों ने बताया कि, पिछली सरकार ने पिंक बॉलवर्म के हमले से हुए नुकसान के लिए आर्थिक सहायता देने का वादा किया था।

नहीं मिला धान का मुआवजा

भारी बारिश से धान की खराब हुई फसल के लिए मुआवजे से वंचित किसान प्रभावित 47 गांवों के किसानों की इस तरह की परेशानी पर नाराज हैं।

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बार-बार नुकसान वजह

किसानों की फसल विविधीकरण योजना से दूरी बनाने का एक कारण उन्हें इसमें बार-बार हो रहा घाटा भी बताया जा रहा है। दसका गांव के एक किसान के मुताबिक इस वर्ष गेहूं की कम उपज से उनको बड़ा झटका लगा। पिछले दो सीजन से नुकसान होने की जानकारी किसानों ने दी है। कझला गांव के एक किसान ने खेती में बार-बार होने वाले नुकसान को किसानों को नई फसलों की खेती के प्रयोग से दूर रहने के लिए मजबूर करने का कारण बताया है। उन्होंने कई किसानों का उदाहरण सामने रखने की बात कही जो, फसल विविधीकरण के तहत अन्य फसलों के लिए भरपूर मेहनत एवं कोशिशों के बाद वापस धान-गेहूं की खेती करने में जुट गए हैं। किसानों के अनुसार फसल विविधीकरण के विस्तार के लिए प्रदेश में सरकारी मदद की कमी स्पष्ट गोचर है।

सिर्फ जानकारी से कुछ नहीं होगा

इलाके के किसानो का कहना है कि, जागरूकता कार्यक्रमों के जरिए सिर्फ जानकारी प्रदान करने से लक्ष्य पूरे नहीं होंगे। उनके मुताबिक कृषि अधिकारी फसलों की जानकारी तो प्रदान करते हैं, लेकिन फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रोत्साहन राशि के साथ अधिकारी किसानों के पास बहुत कम पहुंचते हैं।

हां नुकसान हुआ

किसान हित के प्रयासों में लगे अधिकारियों ने भी क्षेत्र में फसलों को नुकसान होने की बात कही है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार किसानों को हो रहे नुकसान को उन्होंने भी फसल विविधीकरण नहीं अपनाने की वजह माना है। नाम पहचान की गोपनीयता रखने की शर्त पर कृषि विकास अधिकारी ने बताया कि, फसल के नुकसान की वजह से कृषक फसल विविधीकरण कार्यक्रम में अधिक रुचि नहीं दिखा रहे हैं। उन्होंने बताया कि, केवल 1244 हेक्टेयर भूमि पर इस बार कपास की खेती की जा सकी है।
फूलों की खेती से कमा सकते हैं लाखों में

फूलों की खेती से कमा सकते हैं लाखों में

भारत में फूलों की खेती एक लंबे समय से होती आ रही है, लेकिन आर्थिक रूप से लाभदायक एक व्यवसाय के रूप में फूलों का उत्पादन पिछले कुछ सालों से ही शुरू हुआ है. 

समकालिक फूल जैसे गुलाब, कमल ग्लैडियोलस, रजनीगंधा, कार्नेशन आदि के बढ़ते उत्पादन के कारण गुलदस्ते और उपहारों के स्वरूप देने में इनका उपयोग काफ़ी बढ़ गया है. 

फूलों को सजावट और औषधि के लिए उपयोग में लाया जाता है. घरों और कार्यालयों को सजाने में भी इनका उपयोग होता है. 

मध्यम वर्ग के जीवनस्तर में सुधार और आर्थिक संपन्नता के कारण बाज़ार के विकास में फूलों का महत्त्वपूर्ण योगदान है. लाभ के लिए फूल व्यवसाय उत्तम है. 

किसान यदि एक हेक्टेयर गेंदे का फूल लगाते हैं तो वे वार्षिक आमदनी 1 से 2 लाख तक प्राप्त कर सकते हैं. इतने ही क्षेत्र में गुलाब की खेती करते हैं तो दोगुनी तथा गुलदाउदी की फसल से 7 लाख रुपए आसानी से कमा सकते हैं. भारत में गेंदा, गुलाब, गुलदाउदी आदि फूलों के उत्पादन के लिए जलवायु अनुकूल है.

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जहाँ इत्र, अगरबत्ती, गुलाल, तेल बनाने के लिए सुगंध के लिए फूलों का इस्तेमाल किया जाता है, वहीं कई फूल ऐसे हैं जिन का औषधि उपयोग भी किया जाता है. कुल मिलाकर देखें तो अगर किसान फूलों की खेती करते हैं तो वे कभी घाटे में नहीं रहते.

भारत में फूलों की खेती

भारत में फूलों की खेती की ओर किसान अग्रसर हो रहे हैं, लेकिन फूलों की खेती करने के पहले कुछ बातें ऐसे हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी हो जाता है. 

यह ध्यान देना आवश्यक है की सुगंधित फूल किस तरह की जलवायु में ज्यादा पैदावार दे सकता है. फिलवक्त भारत में गुलाब, गेंदा, जरबेरा, रजनीगंधा, चमेली, ग्लेडियोलस, गुलदाउदी और एस्टर बेली जैसे फूलों की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. ध्यान रखने वाली बात यह है कि फूलों की खेती के दौरान सिंचाई की व्यवस्था दुरुस्त होनी चाहिए.

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बुआई के समय दें किन बातों पर दें ध्यान

फूलों की बुवाई के दौरान कुछ बातों पर ध्यान देना आवश्यक होता है. सबसे पहले की खेतों में खरपतवार ना हो पाए. ऐसा होने से फूलों के खेती पर बुरा असर पड़ता है. 

खेत तैयार करते समय पूरी तरह खर-पतवार को हटा दें. समय-समय पर फूल की खेती की सिंचाई की व्यवस्था जरूरी होती है. वहीं खेतों में जल निकासी की व्यवस्था भी सही होनी चाहिए. 

ताकि अगर फूलों में पानी ज्यादा हो जाये तो खेत से पानी को निकला जा सके. ज्यादा पानी से भी पौधों के ख़राब होने का दर होता है.

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फूलो की बिक्री के लिये बाज़ार

फूलों को लेकर किसान को बाजार खोजने की मेहनत नहीं करनी पड़ती है, क्योंकि फूलों की आवश्यकता सबसे ज्यादा मंदिरों में होती है. इसके कारण फूल खेतों से ही हाथों हाथ बिक जाते हैं. 

इसके अलावा इत्र, अगरबत्ती, गुलाल और दवा बनाने वाली कंपनियां भी फूलों के खरीदार होती है. फूल व्यवसाई भी खेतों से ही फूल खरीद लेते हैं, और बड़े बड़े शहरों में भेजते हैं.

फूल की खेती में खर्च

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार फूलों की खेती में ज्यादा खर्च भी नहीं आता है. एक हेक्टेयर में अगर फूल की खेती की जाए तो आमतौर पर 20000 रूपया से 25000 रूपया का खर्च आता है, 

जिसमें बीज की खरीदारी, बुवाई का खर्च, उर्वरक का मूल्य, खेत की जुताई और सिंचाई वगैरह का खर्च भी शामिल है, फूलों की कटाई के बाद इसे बड़ी आसानी से बाजार में बेचकर शुद्ध लाभ के रूप में लाखों का मुनाफा लिया जा सकता है

पारंपरिक खेती की जगह इस फूल की खेती किसानों को कर सकता है मालामाल

पारंपरिक खेती की जगह इस फूल की खेती किसानों को कर सकता है मालामाल

हाल के दिनों में आपको देखने को मिलता होगा कि पारंपरिक खेती से किसान अपना रुख बदल रहे हैं, क्योंकि पारंपरिक खेती में किसानों को लागत के अनुसार मुनाफा नहीं मिल पा रहा है। 

विगत कुछ दिनों में आपको ये भी देखने को मिल रहा होगा कि किसान फूलों की खेती की तरफ अपना रुझान दे रहे हैं, क्योंकि उनको ऐसा लगता है कि फूलों की खेती में पारंपरिक खेती से ज्यादा मुनाफा मिल सकता है। 

इसके अलावा भी फूलों की खेती करने के पीछे किसानों की मंशा ये भी है कि आए दिन फूलों की मांग पूरे देश में काफी बढ़ गयी है। गौरतलब हो कि पूरे भारत में लगभग 2 लाख मैट्रिक टन फूल का उत्पादन किया जाता है।

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फूलों में भी आजकल जिस फूल की खेती सबसे ज्यादा की जा रही है वो है गुलाब (Gulab; Rose)। गुलाब को फूलों का राजा कहा जाता है, आपको बता दें कि इसका कारण यह नहीं है की सिर्फ इसको सजावट के लिए प्रयोग करते हैं। 

अपितु इसका बहुत सारा औषधीय प्रयोग भी है, जैसे कि गुलाब जल, गुलाब इत्र आदि। आपको यह जान कर भी हैरानी होगी कि किसान इस फूल को एक बार लगा कर इससे लगभग 10 साल तक फूलों का उत्पादन कर पैसा कमा सकते हैं।

आपको बताते चलें कि गुलाब की खेती के लिए किसान को किसी खास तरह की मिट्टी की बाध्यता नहीं है। किसान इसे किसी भी तरह के मिट्टी में उपजा कर अच्छा मुनाफा कमा सकता है। 

लेकिन अगर किसान बलुई या दोमट मिट्टी का प्रयोग करते हैं, तो फसल और भी अच्छी होगी। लेकिन अगर मिट्टी की उपज अच्छी हो या फिर इसमें जीवांश की मात्रा अधिक हो तो उपज और भी अच्छी होती है। लेकिन किसान एक बात का हमेशा ध्यान रखें कि इस मिट्टी का पीएच मान 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए।

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अगर बात करें गुलाब के खेती के लिए जलवायु का तो इसके लिए जलवायु समशीतोष्ण किस्म का होना चाहिए। किसानों को यह भी ध्यान रखना होगा कि गुलाब की खेती के लिए गर्म जलवायु काफी नुकसानदेह हो सकता है, 

जिससे किसानों को नुकसान भी हो सकता है। आपको बता दें कि किसानों को गुलाब की खेती के लिए 25 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान से नीचे का तापमान अच्छी उपज दे सकता है। 

गौरतलब हो की पूरे भारत में गुलाब के किस्म की बात करें तो लगभग 20 हजार से ज्यादा है। लेकिन जिस किस्म का प्रयोग किसान आमतौर पर करते हैं, उनमें मोहनी, प्रेमा, डेलही प्रिंसेज नूरजहां आदि शामिल हैं।

बारह महीने उपलब्ध रहने वाले इस फूल की खेती से अच्छा मुनाफा कमा रहे किसान

बारह महीने उपलब्ध रहने वाले इस फूल की खेती से अच्छा मुनाफा कमा रहे किसान

उत्तर प्रदेश राज्य के जनपद मिर्जापुर में भदोही निवासी किसान नजम अंसारी गुलाब और जरबेरा के फूलों का उत्पादन करके अच्छा खासा लाभ उठा रहा है। जरबेरा के फूलों मांग अधिकांश बड़े शहरों में होती है और किसान इसके फूलों की आपूर्ति भी करता है। किसान इन फूलों की खेती पाली हाउस की सहायता से तैयार करता है। इन फूलों के उत्पादन से बहुत सारे जरूरतमंदों को रोजगार का अवसर प्राप्त होता है। जरबेरा एवं गुलाब के फूलों की विशेष बात यह है कि इनका प्रयोग खुशनुमा समारोह में अधिकतर होता है जैसे जन्मोत्सव, विवाह समारोह एवं अतिथि गृह को सजाने इत्यादि। इस वजह से कई सारे किसान फूल की खेती की तरफ अपना रुख कर रहे हैं।

नजीम अंसारी कितनी भूमि में कर रहे हैं, जरबेरा की खेती

बतादें कि उत्तर प्रदेश राज्य के जनपद मिर्जापुर में भदोही निवासी किसान नजम अंसारी ने तकरीबन ३ बीघे भूमि पर गुलाब एवं जरबेरा के पुष्पों का उत्पादन किया है। जरबेरा एवं गुलाब के फूलों का उत्पादन करने हेतु पाली हाउस तकनीक की सहायता ली जा रही है। फूलों के उत्पादन के लिए १५ से २० लोग कार्यरत हैं। जरबेरा के फूलों की आपूर्ति प्रयागराज, वाराणसी, कानपुर लखनऊ समेत और भी बहुत सारे जिलों की जाती है। यदि इनकी कीमत की बात की जाये तो जरबेरा का एक फूल ८ से १० रूपये में बिकता है। समारोह कार्यक्रमों के दौरान इसकी मांग के साथ साथ इसकी कीमत में भी बढ़ोत्तरी हो जाती है।


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प्रत्येक फूल अपने आप में मूल्यवान होता है, जरबेरा फूल की खेती भी किसानों को धनवान बनाने में सक्षम है। जरबेरा के फूलों को पाली हाउस में निर्धारित तापमान में ही रखा जाता है। भदोही किसान नजम अंसारी का कहना है, कि जरबेरा फूलों का उत्पादन उन्होंने कुछ वर्ष पूर्व ही की थी, परंतु अब इसकी सहायता से बेहद अच्छा खासा लाभ अर्जित कर रहे हैं। इन फूलों के उत्पादन में पाली हाउस एक अहम भूमिका निभाते हैं, क्योंकि पालीहाउस में २० से २५ डिग्री सेल्सियस तापमान स्थिरता रखने में मदद करता है, जो कि इन फूलों के बेहतर उत्पादन में बेहद सहायक साबित होता है। हालाँकि, ठंड के समय इसके उत्पादन में घटोत्तरी होती है।

जरबेरा का फूल कितने दिन तक ज्यों का त्यों रह सकता है

जरबेरा एक बहुत ही सुंदर और आकर्षक पुष्प है, इसकी रंग बिरंगी पंखुड़ियों को निहारने से बेहद आन्तरिक सुकून और चैन मिलता है। इसी वजह से जरबेरा के पुष्पों का इस्तेमाल कार्यालयों, भोजनालयों, विश्रामालयों, गुलदस्ते बनाने एवं वैवाहिक समारोहों में सजावट हेतु इत्यादि में इस्तेमाल होता है। यह सफेद, गुलाबी, लाल पीला, नारंगी एवं और भी रंगों वाला जरबेरा वर्ष के १२ माह उपलब्ध होता है। बतादें कि जरबेरा के फूल से आयुर्वेदिक औषधियां भी निर्मित होती हैं। जरबेरा पुष्प की एक विशेषता यह भी है, कि पानी के बोतल में इसे रखने पर यह दो सप्ताह तक से भी ज्यादा ज्यों का त्यों रह सकता है।
कपास की बढ़ती कीमतों पर भी किसान को क्यों नहीं मिल पा रहा लाभ

कपास की बढ़ती कीमतों पर भी किसान को क्यों नहीं मिल पा रहा लाभ

महाराष्ट्र राज्य के जलगांव जनपद के खानदेश में कपास की फसलों पर बड़ी मात्रा में गुलाबी सूंडी कीटों ने आक्रमण कर दिया है। खानदेश में लगभग दो लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में कपास समाप्त हो चुकी है। कीटों के भय से किसान अब खेती खाली कर दूसरी फसलों पर जोर दे रहे हैं। महाराष्ट्र में कपास की कृषि करने वाले किसानों की परेशानी समाप्त होने का नाम नहीं ले रही है। पूर्व में बारिश की वजह से कपास की फसलों का उच्च स्तर पर हानि हुई है, फिर सीजन के आरंभ में ही किसानों को कम मूल्य प्राप्त हुआ। वहीं अब जब कपास के मूल्यों में बेहतरी आने के साथ ही फसलों पर गुलाबी सुंडी कीटों का प्रकोप तीव्रता से बढ़ रही है। महाराष्ट्र के खानदेश में लगभग दो लाख हेक्टेयर कपास का क्षेत्रफल रिक्त हो गया है। गुलाबी सुंडी के प्रकोप, कपास की गुणवत्ता में आयी कमी व मूल्यों में अनिश्चितता की वजह से अधिकाँश किसानों द्वारा अतिशीघ्र इसी सप्ताह फसल काट ली गयी।

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इस वर्ष भी मध्यम भूमि में किसानों द्वारा मात्र चार से पांच क्विंटल प्रति एकड़ ही पैदावार हुई है। किसानों के अनुसार, इस साल मूसलाधार बारिश की वजह से कपास की गुणवत्ता में गिरावट आई थी, उसके बाद किसानों द्वारा पुनः खेती करने पर अब उनकी फसलें कीटों के संक्रमण से बर्बाद हो रही हैं। इसकी वजह से किसान काफी प्रभावित हो रहा है। इसी वजह से किसानों ने खेतों को साफ कर रबी सीजन की बुवाई प्रारंभ कर दी है। .

किसान क्यों नहीं निकाल पा रहे अपनी फसल पर किये गए व्यय को भी

महाराष्ट्र के अधिकाँश जनपद प्रचंड बारिश की वजह से अपनी तैयार फसलों को खो चुके हैं। किसानों के मुताबिक, खरीद खर्च २० रुपये प्रति किलो तक हो चुकी है। प्रत्येक मजदूर २५० रुपये प्रतिदिन देकर पांच से छह किलो कपास चुनता है। खर्च बढ़ोत्तरी के साथ कपास के मूल्य में भी कोई स्थिरता नहीं है। इस वजह से किसान कपास के अतिरिक्त दूसरी फसलों की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।

आखिर किस वजह से कपास के मूल्य में वृध्दि के बाद भी किसानों को नहीं मिल पायेगा लाभ

इस वक्त ज्यादातर मंडियों में कपास के भाव में सुधार आया है। परंतु किसानों की मानें तो इसका लाभ अधिकाँश किसानों को प्राप्त नहीं हो पायेगा, क्योंकि बहुत से किसानों के पास कपास बेचने के लिए बचा ही नहीं है। बारिश की वजह से कपास की गुणवत्ता काफी प्रभावित हो गई है, साथ ही, कपास पर कीटों का प्रकोप तीव्रता से बढ़ रहा है। जिसकी वजह से किसानों द्वारा स्वयं ही खेत को खाली करने का निर्णय लिया गया है। किसानों के अनुसार पूर्व के 10 से १२ दिनों में गुलाबी सुंडी वाले कीटों का संक्रमण बढ़ा है, जबकि फसल पर दवाइयों का छिड़काव किया जा चुका है।

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महाराष्ट्र में किस क्षेत्र में सर्वाधिक कपास की खेती की जाती है

बात करें सर्वाधिक कपास की खेती होने वाले क्षेत्रों की तो महाराष्ट्र राज्य के खानदेश में प्रति वर्ष ९ से ९.५ लाख हेक्टेयर रकबे में कपास उत्पादन किया जाता है। इस वर्ष धुले में २.५ लाख हेक्टेयर, नंदुरबार में लगभग १.५ लाख हेक्टेयर और जलगाँव जनपद में ५ लाख ६५ हजार हेक्टेयर में कपास की खेती की गई थी। इसमें लगभग १.५२ लाख हेक्टेयर में प्री-सीजन कपास की फसल है। तकरीबन २ लाख हेक्टेयर रकबा में इस फसल की कटाई हो चुकी है। साथ ही, शुष्क क्षेत्र में कपास की फसल में गुलाबी सुंडी पायी जा रही है। अनुमानुसार इस वर्ष भी उत्पादन में घटोत्तरी होने की संभावना है।
सेना में 18 साल नौकरी करने के बाद, गेंदे की खेती कर कमा रहे हैं लाखों

सेना में 18 साल नौकरी करने के बाद, गेंदे की खेती कर कमा रहे हैं लाखों

विगत कुछ दिनों में फूलों की खेती किसानों के बीच काफी लोकप्रिय हो रही हैं, जिसका मुख्य कारण कम लागत और बढ़िया मुनाफा है। पूरे भारत में गुलाब से लेकर सूरजमुखी और अन्य फूलों की खेती बड़े स्तर पर की जा रही है। किसान पारंपरिक खेती से फूलों की खेती की तरफ ज्यादा रुझान दिखा रहे हैं, जिसका मुख्य कारण कम लागत में अच्छा मुनाफा बताया जा रहा है। फूलों की खेती में जो सबसे ज्यादा लोकप्रिय हो रहा है, वह है गेंदा की खेती। किसानों का कहना है, कि गेंदे की खेती में काफी अच्छा मुनाफा है। किसान यह भी बता रहे हैं, कि गेंदे की खेती में लागत कम है और इसे करना भी अन्य फूलों की खेती से आसान है। आज इस लेख में गेंदे की खेती करने वाले उस पूर्व सैनिक की कहानी बताएंगे जो विगत कुछ दिनों से गेंदा की खेती के लिए काफी चर्चित हो रहे हैं।

कौन है गेंदा की खेती करने वाला चर्चित किसान

गेंदा की खेती कर चर्चित होने वाले किसान जमशेदपुर से लगभग 40 किलोमीटर दूर रहने वाला एक आदिवासी बताया जा रहा है। आपको यह जानकर बेहद हैरानी होगी कि यह किसान पूर्व में 18 साल तक सैनिक के तौर पर सेवाएँ दे चुके हैं। 18 साल सेना में सेवा देने के बाद एरिक मुंडा नामक व्यक्ति अब गेंदा की खेती कर काफी चर्चित हो रहे हैं।


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क्या कहते हैं एरिक मुंडा

गेंदा की खेती कर चर्चित होने वाले किसान एरिक मुंडा का कहना है, कि इसी खेती से वो अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा दे पा रहा है। वो कहते हैं, कि इसी खेती की कमाई की वजह से उनके बच्चों ने इंजीनियरिंग, बीकॉम(B.Com) की पढ़ाई की। गौरतलब है, कि उनके बच्चों ने पढ़ाई करने के बाद भी कहीं नौकरी करने की जगह उसी फूल की खेती करना उचित समझा और आज उनके सभी बच्चे उनके साथ फूल की खेती कर रहे हैं। एरिक मुंडा का कहना है, कि ये बच्चे उन किसानों के लिए मिसाल हैं, जो अभी भी नौकरी की तलाश में है या फिर बेरोजगार हैं।


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एरिक मुंडा 18 साल तक देश की सेवा करने के बाद जब वापस आए, तो वह दलमा के तराई वाले इलाकों में फूल की खेती करना शुरू किया। एरिक मुंडा के पुत्र अनीश मुंडा का कहना है, कि वह अपने पिता से प्रभावित होकर उन्हीं के साथ फूल की खेती शुरू कर दिए हैं। अनीश मुंडा यह भी कहते हैं, कि वह अपने पिता की तरह फूल की खेती में अपना भविष्य भी देख रहे हैं। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि आज का यह चर्चित किसान ने कभी मात्र चार एकड़ में गेंदे की खेती शुरू की थी और आज लाखों लाख मुनाफा कमा रहे हैं। एरिक मुंडा किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत है, जो आज भी नौकरी की तलाश कर रहे हैं या फिर बेरोजगार हैं।


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कई बीमारियों में गेंदे के रस का इस्तेमाल

गेंदे की बढ़ती मांग को देखते हुए भी किसान इसकी खेती की तरफ रुझान कर रहे हैं। आपको यह जानकर बेहद आश्चर्य होगा कि गेंदे के फूल के रस का इस्तेमाल बहुत सारी बीमारियों में किया जाता है। किसान यह भी बताते हैं, कि अगर आपके पास एक हेक्टेयर खेती योग्य जमीन है तो आप हर साल लगभग छः लाख की कमाई कर सकते हैं।