Ad

Paddy Cultivation

चावल की बेहतरीन पैदावार के लिए इस प्रकार करें बुवाई

चावल की बेहतरीन पैदावार के लिए इस प्रकार करें बुवाई

धान की बेहतरीन पैदावार के लिए जुताई के दौरान प्रति हेक्टेयर एक से डेढ़ क्विंटल गोबर की खाद खेत में मिश्रित करनी है। आज कल देश के विभिन्न क्षेत्रों में धान की रोपाई की वजह खेत पानी से डूबे हुए नजर आ रहे हैं। किसान भाई यदि रोपाई के दौरान कुछ विशेष बातों का ध्यान रखें तो उन्हें धान की अधिक और अच्छी गुणवत्ता वाली पैदावार मिल सकती है। अमूमन धान की रोपाई जून के दूसरे-तीसरे सप्ताह से जुलाई के तीसरे-चौथे सप्ताह के मध्य की जाती है। रोपाई के लिए पंक्तियों के मध्य का फासला 20 सेंटीमीटर और पौध की दूरी 10 सेंटीमीटर होनी चाहिए। एक स्थान पर दो से तीन पौधे रोपने चाहिए। धान की फसल के लिए तापमान 20 डिग्री से 37 डिग्री के मध्य रहना चाहिए। इसके लिए दोमट मिट्टी काफी बेहतर मानी जाती है। धान की फसल के लिए पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और 2 से तीन जुताई कल्टीवेटर से करके खेत को तैयार करना चाहिए। साथ ही, खेत की सुद्रण मेड़बंदी करनी चाहिए, जिससे बारिश का पानी ज्यादा समय तक संचित रह सके।

धान शोधन कराकर खेत में बीज डालें

धान की बुवाई के लिए 40 से 50 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर के अनुसार बिजाई करनी चाहिए। साथ ही, एक हेक्टेयर रोपाई करने के लिए 30 से 40 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है। हालांकि, इससे पहले बीज का शोधन करना आवश्यक होता है। ये भी पढ़े: भूमि विकास, जुताई और बीज बोने की तैयारी के लिए उपकरण

खाद और उवर्रकों का इस्तेमाल किया जाता है

धान की बेहतरीन उपज के लिए जुताई के दौरान प्रति हेक्टेयर एक से डेढ़ क्विंटल गोबर की खाद खेत में मिलाते हैं। उर्वरक के रूप में नाइट्रोजन, पोटाश और फास्फोरस का इस्तेमाल करते हैं।

बेहतर सिंचाई प्रबंधन किस प्रकार की जाए

धान की फसल को सबसे ज्यादा पानी की आवश्यकता होती है। रोपाई के उपरांत 8 से 10 दिनों तक खेत में पानी का बना रहना आवश्यक है। कड़ी धूप होने पर खेत से पानी निकाल देना चाहिए। जिससे कि पौध में गलन न हो, सिंचाई दोपहर के समय करनी चाहिए, जिससे रातभर में खेत पानी सोख सके।

कीट नियंत्रण किस प्रकार किया जाता है

धान की फसल में कीट नियंत्रण के लिए जुताई, मेंड़ों की छंटाई और घास आदि की साफ सफाई करनी चाहिए। फसल को खरपतवारों से सुरक्षित रखना चाहिए। 10 दिन की समयावधि पर पौध पर कीटनाशक और फंफूदीनाशक का ध्यान से छिड़काव करना चाहिए।
बिहार में धान की दो किस्में हुईं विकसित, पैदावार में होगी बढ़ोत्तरी

बिहार में धान की दो किस्में हुईं विकसित, पैदावार में होगी बढ़ोत्तरी

बेगूसराय जनपद में 17061 हेक्टेयर के करीब बंजर जमीन है। वहीं, 11001 हेक्टेयर पर किसान खेती नहीं करते हैं। अब ऐसी स्थिति में इन जगहों पर किसान राजेंद्र विभूति प्रजाति की खेती कर सकते हैं। बतादें कि धान बिहार की मुख्य फसल है। नवादा, औरंगाबाद, पटना, गया, नालंदा और भागलपुर समेत तकरीबन समस्त जनपदों में धान की खेती की जाती है। मुख्य बात यह है, कि समस्त जनपदों में किसान मृदा के अनुरूप भिन्न-भिन्न किस्मों के धान की खेती किया करते हैं। सबका भाव एवं स्वाद भी भिन्न-भिन्न होता है। पश्चिमी चंपारण जनपद में सर्वाधिक मर्चा धान की खेती की जाती है। विगत अप्रैल महीने में इसको जीआई टैग भी मिला था। इसी प्रकार पटना जनपद में किसान मंसूरी धान अधिक उत्पादित करते हैं। यदि बेगूसराय के किसान धान की खेती करने की तैयार कर रहे हैं। तो उनके लिए आज हम एक शानदार समाचार लेकर आए हैं, जिसकी खेती चालू करते ही उत्पादन बढ़ जाएगा।

बेगूसराय जनपद की मृदा एवं जलवायु के अनुरूप दो किस्में विकसित की गईं

मीड़िया खबरों के अनुसार, कृषि विज्ञान केंद्र पूसा ने बेगूसराय जनपद की मृदा एवं जलवायु को ध्यान में रखते हुए धान की दो बेहतरीन प्रजातियों को विकसित किया है। जिसका नाम राजेन्द्र श्वेता एवं राजेन्द्र विभूति है। इन दोनों प्रजातियों की विशेषता यह है, कि यह कम वक्त में पक कर तैयार हो जाती है। मतलब कि किसान भाई इसकी शीघ्र ही कटाई कर सकते हैं। इसकी पैदावार भी शानदार होती है। साथ ही, कृषि विज्ञान केंद्र खोदावंदपुर के कृषि वैज्ञानिक डॉ. रामपाल ने बताया है, कि जून के प्रथम सप्ताह से बेगूसराय जनपद में किसान इन दोनों धान की नर्सरी को तैयार कर सकते हैं।

यहां राजेंद्र विभूति की खेती की जा सकती है

खोदावंदपुर के कृषि विशेषज्ञ अंशुमान द्विवेदी ने राजेंद्र श्वेता व राजेंद्र विभूति धान की प्रजाति का बेगूसराय में परीक्षण किया है। दोनों प्रजातियां ट्रायल में सफल रहीं। इसके उपरांत कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को इसकी रोपाई करने की सलाह दी है। यदि किसान भाई राजेन्द्र श्वेता एवं राजेन्द्र विभूति की खेती करना चाहते हैं, तो नर्सरी तैयार कर सकते हैं। साथ ही, कृषि विज्ञान केंद्र खोदावंदपुर में आकर खेती करने का प्रशिक्षण भी ले सकते हैं। विशेषज्ञों के बताने के मुताबिक, बेगूसराय जनपद के ग्रामीण क्षेत्रों में राजेंद्र विभूति की खेती की जा सकती है।

ये भी पढ़ें:
इस राज्य में धान की खेती के लिए 80 फीसद अनुदान पर बीज मुहैय्या करा रही राज्य सरकार

विकसित दो किस्मों से प्रति हेक्टेयर चार क्विंटल उत्पादन बढ़ जाता है

बतादें, कि बेगूसराय जनपद में 17061 हेक्टेयर बंजर भूमि पड़ी है। वहीं, 11001 हेक्टेयर भूमि पर किसान खेती नहीं करते हैं। अब ऐसी स्थिति में इन जमीनों पर किसान राजेंद्र विभूति प्रजाति की खेती कर सकते हैं। इस किस्म की विशेषता यह है, कि यह पानी के बिना भी काफी दिनों तक हरा भरा रह सकता है। मतलब कि इसके ऊपर सूखे का उतना प्रभाव नहीं पड़ेगा। साथ ही, यह बेहद कम पानी में पककर तैयार हो जाती है। तो उधर राजेंद्र श्वेता प्रजाति को खेतों में पानी की आवश्यकता होती है। परंतु, इतना भी ज्यादा नहीं होती। दोनों प्रजाति की खेती से प्रति हेक्टेयर चार क्विंटल उत्पादन बढ़ जाता है।
जानिए धान की फसल में लगने वाले प्रमुख रोगों और उनकी रोकथाम के बारे में

जानिए धान की फसल में लगने वाले प्रमुख रोगों और उनकी रोकथाम के बारे में

भारत धान का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। खरीफ के सीजन में धान की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। इस सीजन में वायुमंडल में आर्दरता होने के कारण फसल पर रोगों का प्रकोप भी बहुत होता है। धान की फसल कई रोगों से ग्रषित होती है जिससे पैदावार में बहुत कमी आती है। मेरी खेती के इस लेख में आज हम आपको धान के प्रमुख रोगों और उनकी रोकथाम के बारे में विस्तार से बताएंगे।  

धान के प्रमुख रोग और इनका उपचार   

  1. धान का झोंका (ब्लास्ट रोग) 

  • धान का यह रोग पाइरिकुलेरिया ओराइजी नामक कवक द्वारा फैलता है। 
  • धान का यह ब्लास्ट रोग अत्यंत विनाशकारी होता है।
  • पत्तियों और उनके निचले भागों पर छोटे और नीले धब्बें बनते है, और बाद मे आकार मे बढ़कर ये धब्बें नाव की तरह हो जाते है।


ये भी पढ़ें:
धान की इन किस्मों का उत्पादन करके उत्तर प्रदेश और बिहार के किसान अच्छा उत्पादन ले सकते हैं

उपचार 

  • रोग के नियंत्रण के लिए बीज को बोने से पहले बेविस्टीन 2 ग्राम या कैप्टान 2.5 ग्राम दवा को प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर लें।
  • खड़ी फसल मे रोग नियंत्रण के लिए  100 ग्राम Bavistin +500 ग्राम इण्डोफिल M -45 को 200 लीटर पानी मे घोलकर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करना चाहिए।
  • बीम नामक दवा की 300 मिली ग्राम मात्रा को 1000 लीटर पानी मे घोलकर छिड़काव किया जा सकता है।
  1. जीवाणुज पर्ण झुलसा रोग यानी की (Bacterial Leaf Blight)

लक्षण 

  • ये मुख्य रूप से यह पत्तियों का रोग है। यह रोग कुल दो अवस्थाओं मे होता है, पर्ण झुलसा अवस्था एवं क्रेसेक अवस्था। 
  • सर्वप्रथम पत्तियों के ऊपरी सिरे पर हरे-पीले जलधारित धब्बों के रूप मे रोग उभरता है।
  • धीरे-धीरे पूरी पत्ती पुआल के रंग मे बदल जाती है। 
  • ये धारियां शिराओं से घिरी रहती है, और पीली या नारंगी कत्थई रंग की हो जाती है।


ये भी पढ़ें:
फसलों पर कीटनाशकों का प्रयोग करते समय बरतें सावधानी, हो सकता है भारी नुकसान

उपचार 

  • रोग के नियंत्रण के लिए एक ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन या 5 ग्राम एग्रीमाइसीन में बीज को बोने से पहले 12 घंटे तक डुबो लें।
  • बीजो को स्थूडोमोनास फ्लोरेसेन्स 10 ग्राम प्रति किलो ग्राम बीज की दर से उपचारित कर लगावें।
  • खड़ी फसल मे रोग दिखने पर ब्लाइटाक्स-50 की 2.5 किलोग्राम एवं स्ट्रेप्टोसाइक्लिन की 50 ग्राम दवा 80-100 लीटर पानी मे मिलाकर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें।    
  1. पर्ण झुलसा पर्ण झुलसा

भारत के धान विकसित क्षेत्रों मे यह एक प्रमुख रोग बनकर सामने आया है। ये रोग राइजोक्टोनिया सोलेनाई नामक फफूँदी के कारण होता है, जिसे हम थेनेटीफोरस कुकुमेरिस के नाम से भी जानते है। पानी की सतह से ठीक ऊपर पौधें के आवरण पर फफूँद अण्डाकार जैसा हरापन लिए हुए स्लेट/उजला धब्बा पैदा करती है।

ये भी पढ़ें:
बिहार में धान की दो किस्में हुईं विकसित, पैदावार में होगी बढ़ोत्तरी
इस रोग के लक्षण मुख्यत पत्तियों एवं पर्णच्छद पर दिखाई पड़ते है। अनुकूल परिस्थितियों मे फफूँद छोटे-छोटे भूरे काले रंग के दाने पत्तियों की सतह पर पैदा करते है, जिन्हे स्कलेरोपियम कहते है। ये स्कलेरोसीया  हल्का झटका लगने पर नीचे गिर जाता है। सभी पत्तियाँ आक्रांत हो जाती है जिस कारण से पौधा झुलसा हुआ दिखाई देता है, और आवरण से बालियाँ बाहर नही निकल पाती है। बालियों के दाने भी पिचक जाते है। वातावरण मे आर्द्रता अधिक तथा उचित तापक्रम रहने पर, कवक जाल तथा मसूर के दानों के तरह स्कलेरोशियम दिखाई पड़ते है। रोग के लक्षण कल्लें बनने की अंतिम अवस्था मे प्रकट होते है। लीफ शीथ पर जल सतह के ऊपर से धब्बे बनने शुरू होते है। पौधों मे इस रोग की वजह से उपज मे 50% तक का नुकसान हो सकता है।

 उपचार 

धान के बीज को स्थूडोमोनारन फ्लोरेसेन्स की 1 ग्राम अथवा ट्राइकोडर्मा 4 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करके बुआई करें। जेकेस्टीन या बेविस्टीन 2 किलोग्राम या इण्डोफिल एम-45 की 2.5 किलोग्राम मात्रा को 200 लीटर पानी मे घोलकर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें। खड़ी फसल मे रोग के लक्षण दिखाई देते ही भेलीडा- माइसिन कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम या प्रोपीकोनालोल 1 ML का 1.5-2 मिली प्रति लीटर पानी मे घोल बनाकर 10-15 दिन के अन्तराल पर 2-3 छिड़काव करें।

ये भी पढ़ें:
धान की खड़ी फसलों में न करें दवा का छिड़काव, ऊपरी पत्तियां पीली हो तो करें जिंक सल्फेट का स्प्रे
  1. धान का भूरी चित्ती रोग (Brown Spot)

धान का यह रोग देश के लगभग सभी हिस्सों मे देखा जा सकता है। यह एक बीजजनित रोग है। यह रोग हेल्मिन्थो स्पोरियम औराइजी नामक कवक द्वारा होता है।    ये रोग फसल को नर्सरी से लेकर दाने बनने तक प्रभावित करता है। इस रोग के कारण पत्तियों पर गोलाकार भूरे रंग के धब्बें बन जाते है।  इस रोग के कारण पत्तियों पर तिल के आकार के भूरे रंग के काले धब्बें बन जाते है। ये धब्बें आकार एवं माप मे बहुत छोटी बिंदी से लेकर गोल आकार के होते है। धब्बों के चारो ओर हल्की पीली आभा बनती है।                       ये रोग पौधे के सारे ऊपरी भागों को प्रभावित करता है।    

ये भी पढ़ें:
कैसे डालें धान की नर्सरी

उपचार 

रोग दिखाई देने पर मैंकोजेब के 0.25 प्रतिशत घोल के 2-3 छिड़काव 10-12 दिनों के अन्तराल पर करना चाहिए। खड़ी फसल में इण्डोफिल एम-45 की 2.5 किलोग्राम मात्रा को 200 लीटर पानी मे घोल कर प्रति एकेड की दर से छिड़काव 15 दिनों के अन्तर पर करें।  इस लेख में आपने धान के प्रमुख रोगों और इनकी रोकथाम के बारे में जाना । मेरी खेती आपको खेतीबाड़ी और ट्रैक्टर मशीनरी से जुड़ी सम्पूर्ण जानकारी प्रोवाइड करवाती है। अगर आप खेतीबाड़ी से जुड़ी वीडियोस देखना चाहते हो तो हमारे यूट्यूब चैनल मेरी खेती पर जा के देख सकते है।  
महिंद्रा ने 6 आरओ धान ट्रांसप्लांटर को लॉन्च किया, जानिए इससे होने वाले लाभ

महिंद्रा ने 6 आरओ धान ट्रांसप्लांटर को लॉन्च किया, जानिए इससे होने वाले लाभ

जब कभी कृषि से संबंधित किसी उपकरण या ट्रैक्टर का जिक्र होता है, तो सबसे पहले किसानों के मन में महिंद्रा की छवि आती है। ऐसा इसलिए क्योंकि महिंद्रा के सभी उपकरण और कृषि यंत्र वर्षों से अच्छा प्रदर्शन और विश्वसनीयता बनाए हुए हैं। 

विश्व की सबसे बड़ी ट्रैक्टर निर्माता कंपनी महिंद्रा एंड महिंद्रा लिमिटेड के फार्म इक्विपमेंट सेक्टर (एफईएस) ने महिंद्रा 6आरओ पैडी वॉकर नाम से एक नया 6 पंक्ति वाला धान ट्रांसप्लांटर अनावरित किया है। 

धान की रोपाई में नए मानक स्थापित करते हुए, महिंद्रा की नवीन उन्नत धान रोपाई मशीन उत्कृष्ट ऑपरेटर दक्षता प्रदान करती है और इसे एक ही पास में एक साथ छह पंक्तियों में सटीक और कुशल रोपाई के लिए विकसित किया गया है।

परिचालन क्षेत्र में एक समान प्रत्यारोपण सुनिश्चित करने के लिए, महिंद्रा 6आरओ पैडी वॉकर मैन्युअल रूप से संचालित होता है। डिजाइन में कॉम्पैक्ट है और इसे सीमित जगहों में भी चलाना सुगम है। वर्ना श्रम-केंद्रित प्रक्रिया के मुकाबले में श्रम लागत काफी कम हो जाती है।

नया धान ट्रांसप्लांटर कम खर्चा में ज्यादा उपज दिलाने में मददगार 

नया धान ट्रांसप्लांटर शक्ति, विश्वसनीयता और प्रदर्शन पर ध्यान देने के साथ अत्यधिक टिकाऊ गियरबॉक्स और इंजन का दावा करता है, जो उच्च उत्पादन और कम ईंधन खपत की गारंटी प्रदान करता है। 

धान की खेती में उत्पादकता को ज्यादा से ज्यादा बढ़ाता है। साथ ही, विस्तारित सेवा अंतराल भी देता है। नया समाधान जल संरक्षण को सामर्थ बनाएगा। 

चावल की खेती से जुड़े पर्यावरणीय प्रभाव को कम करेगा। वहीं, फसल की समग्र लाभप्रदता में भी सुधार करेगा। 

नया महिंद्रा 6आरओ पैडी वॉकर तमिलनाडु में महिंद्रा के व्यापक डीलर नेटवर्क के माध्यम से सीमित समय के विशेष ऑफर मूल्य 2, 49 999 रुपये के साथ उपलब्ध होगा। 

नए महिंद्रा 6आरओ पैडी वॉकर को महिंद्रा फाइनेंस और श्रीराम फाइनेंस से सर्वोत्तम श्रेणी के वित्तपोषण विकल्पों के साथ भी प्रस्तुत किया जाएगा।

महिंद्रा कृषि प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अग्रणी स्थान पर बना हुआ है। साथ ही, विश्व भर के किसानों को ज्यादा सफलता और स्थिरता हांसिल करने में सहयोग कर रहा है। 

ये भी पढ़ें: पूसा बासमती चावल की रोग प्रतिरोधी नई किस्म PB1886, जानिए इसकी खासियत

महिंद्रा पैडी वॉकर 6आरओ का अनावरण नवीन अत्याधुनिक कृषि प्रौद्योगिकी समाधानों के जरिए से खेती में परिवर्तन और किसानों के जीवन को समृद्ध और सशक्त बनाने के लिए कंपनी के समर्पण को रेखांकित करता है।

महिंद्रा पैडी वॉकर 6आरओ की प्रमुख विशेषताएं क्या-क्या हैं ?

इससे उच्च सटीकता और सटीक रोपण में मदद मिलती है। 

  • स्थिर अंकुर प्रत्यारोपण तंत्र: समायोज्य रोपण अंतर के साथ, तैरते हुए अंकुरों और गलत रोपण को रोकता है। 
  • स्थिर बीजारोपण फीड: उचित अंकुरण पोषण के लिए रबर स्पाइक्स की सुविधा। 
  • क्षैतिज नियंत्रण: असमान खेत की सतहों पर भी स्थिर रोपण गहराई बनाए रखता है।

सुविधाजनक एवं कुशल धान रोपाई इस प्रकार करता है

  • बड़े व्यास वाला पहिया: क्षेत्र संचालन और गतिशीलता के लिए अनुकूलन क्षमता को बढ़ाता है।
  • समायोजन: फसल की विविधता और रोपण के मौसम के आधार पर अंकुर फीड और रोपण की गहराई के आसान समायोजन की अनुमति देता है।
  • हल्का वजन: क्षेत्र में कॉम्पैक्ट और सुचारू रूप से काम करने में सक्षम बनाता है।

कम खर्चा में ज्यादा कमाई

अत्यधिक टिकाऊ गियरबॉक्स: गुणवत्ता और विश्वसनीयता के प्रति प्रतिबद्धता के साथ, नया महिंद्रा पैडी वॉकर 6आरओ एक उच्च गुणवत्ता और टिकाऊ गियरबॉक्स का उपयोग करता है जो लंबे समय तक चलने वाले प्रदर्शन के लिए जलरोधक है।

उच्च आउटपुट ओएचवी पेट्रोल विश्वसनीय इंजन: हल्का, कॉम्पैक्ट, कम शोर, कंपन और ईंधन-कुशल के साथ, नया महिंद्रा पैडी वॉकर 6आरओ लंबे समय तक चलने के लिए विकसित किया गया है।

ये भी पढ़ें: किसान धरमिंदर सिंह ने यांत्रिक रोपाई तकनीक से धान की रोपाई कर बेहतरीन उत्पादन अर्जित किया

बड़ा ईंधन टैंक: कुशल और निरंतर काम के लिए नया धान ट्रांसप्लांटर चार लीटर की बड़ी क्षमता वाले ईंधन टैंक से सुसज्जित है।

व्यापक बिक्री के पश्चात सेवा के साथ मन की शांति।

महिंद्रा सेवा: अनुभवी महिंद्रा सेवा कर्मियों द्वारा महिंद्रा डीलरों पर गुणवत्तापूर्ण सेवाएं।

असली हिस्से: असली महिंद्रा हिस्से महिंद्रा डीलरशिप पर उपलब्ध हैं।

मौसम विभाग के अनुसार इस बार पर्याप्त मात्रा में होगी बारिश, धान की खेती का बढ़ा रकबा

मौसम विभाग के अनुसार इस बार पर्याप्त मात्रा में होगी बारिश, धान की खेती का बढ़ा रकबा

मौसम विभाग के अनुसार इस बार बारिश पिछले बीते हुए सालो की अपेक्षा ज्यादा होगी. इस बार बारिश की कमी के कारण सुखा नही पड़ेगा, न ही पानी के कमी के कारण फसलों का नुकसान होगा. इस बात से किसान बहुत खुश है. क्योंकि बारिश होने से फसल अच्छी होगी. जिसको देखते हुए खरीफ फसल के धन का रकबा बढ़ा दिया गया है. धान की खेती के लिए किसान तेजी से जुटे है. कुछ किसान धान की नर्सरी डाल चुके है वही कुछ किसान नर्सरी जल्द ही डालने वाले है. कृषि विभाग के अनुसार पहले धान की खेती के लिए 35 हजार हेक्टेयर निर्धारित किया गया था. परंतु मानसून को देखते हुए और मौसम विभाग के अनुमान की इस बार बारिश भरपूर होगी, इसकी वजह से 20 हजार हेक्टेयर रकबा बढ़ा दिया गया है. जिस वजह से अब 55 हजार हेक्टेयर में धान की खेती होगी. जिसके लिए 700 क्विटल बीज सरकारी बीज भंडार से बांटा जा चुका है. 200 क्विटल ढैंचा का बीट खेत की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने के लिए बीज भंडार से किसानों को बांटा जा चुका है. पैदावार को बढ़ाने के लिए ढैंचा की बुआई की जाती है. किसान इस बार जी जान से लगे है की पैदावार अच्छी हो क्योंकि बीते वर्ष के मुताबिक इस साल गेहूं की पदावर कम हुई है.
इस राज्य में धान की खेती के लिए 80 फीसद अनुदान पर बीज मुहैय्या करा रही राज्य सरकार

इस राज्य में धान की खेती के लिए 80 फीसद अनुदान पर बीज मुहैय्या करा रही राज्य सरकार

किसानों की उन्नति एवं प्रगति के लिए हर संभव प्रयास किया जा रहा है बिहार सरकार की तरफ से किसानों के लिए सहूलियत प्रदान की गई है। राज्य के किसान भाइयों को 50 से 80 प्रतिशत तक के अनुदान पर धान का बीज मुहैय्या कराया जा रहा है। किसान भाइयों को सस्ती दर पर बीज प्राप्त हो जाएगा। धान हो या गेहूं समस्त फसलों की खेती को प्रोत्साहन देने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की तरफ से कवायद की जा रही है। बिहार राज्य के अंतर्गत भी लाखों की तादात में किसान खेती-किसानी से जुड़े हैं। राज्य सरकार का प्रयास कोशिश यही रहता है, कि किसान भाइयों को अनुदानित दर पर बीज प्राप्त हो सके। प्रत्येक किसान अच्छी गुणवत्ता का बीज हांसिल कर सके। अब धान की पैदावार को लेकर बिहार सरकार द्वारा किसानों को बड़ी राहत प्रदान की है। किसानों को बीज अच्छे-खासे अनुदान पर उपलब्ध कराया जा रहा है। राज्य सरकार ने बताया है, कि किसान निर्धारित समय सीमा तक पंजीकरण करवाके धान का बीज प्राप्त कर सकते हैं।

बिहार सरकार 80 प्रतिशत अनुदान प्रदान कर रही है

बिहार सरकार की तरफ से मधेपुरा जनपद में धान की खेती को बढ़ावा देने के लिए बीज पर मोटा अनुदान दिया जा रहा है। बिहार सरकार अच्छी गुणवत्ता के बीज 50 से 80 प्रतिशत अनुदान पर मुहैय्या करा रही है। कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है, कि अनुदान पर बीज देने को लेकर कृषकों को जागरूक किया जा रहा है। किसान भाइयों को 3 किस्मों के बीजों पर अनुदान प्रदान किया जाएगा। ये भी पढ़े: इस राज्य सरकार ने की घोषणा, अब धान की खेती करने वालों को मिलेंगे 30 हजार रुपये

पंजीकरण की प्रक्रिया 30 मई तक ही हो पाएगी

कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है, कि अनुदान पर बीज प्राप्त करने के लिए किसानों का पंजीकरण होना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए किसानों को अधिकारिक वेबसाइट पर जाकर पंजीकरण करवाना होगा। पंजीकरण कराने की आखिरी तारीख 30 मई है। इसके उपरांत आवेदन मंजूर नहीं किए जाएंगे। इसके पश्चात विभागीय स्तर से आवेदकों का सत्यापन सुनिश्चित कराया जाएगा। जो किसान असलियत में पात्र हैं, उनको 15 मई से बीज बाटने की प्रक्रिया चालू कर दी जाएगी।

इस तरह अनुदान प्राप्त हो रहा है

कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है, कि मुख्यमंत्री तीव्र बीज उत्थान योजना के अंतर्गत धान के बीज पर 80 प्रतिशत तक अनुदान प्रदान किया जाएगा। वहीं, बीज वितरण योजना के अंतर्गत किसान को 50 फीसद अनुदान मुहैय्या कराया जाएगा। मधेपुरा जनपद में होने वाली सर्वाधिक धान की खेती संकर धान पर 50 फीसद तक अनुदान मिलेगा। बतादें, कि बिहार राज्य धान की खेती के लिए काफी मशूहर है। परंतु, विगत वर्ष बारिश कम होने की वजह से धान के उत्पादन रकबे में 4.32 लाख हेक्टेयर तक गिरावट दर्ज हुई है।
इस राज्य में मडुआ की खेती को प्रोत्साहन दिया जा रहा है

इस राज्य में मडुआ की खेती को प्रोत्साहन दिया जा रहा है

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि बिहार राज्य के गया में कृषकों को मडुआ की खेती के लिए बढ़ावा दिया जा रहा है। परंतु, फिलहाल किसान गया जनपद में मडुआ के साथ- साथ चीना फसल का भी उत्पादन करेंगे। एक बार पुनः भारतीय किसान मोटे अनाज की खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। किसानों की रूचि ज्वार, बाजरा और मक्का जैसी मोटे अनाज की फसलों की खेती के प्रति बढ़ रही है। विभिन्न राज्यों में किसानों ने तो विदेश से बीज मंगाकर इन मोटे अनाजों की खेती चालू कर दी है। दरअसल, यूनाइटेड नेशन द्वारा साल 2023 को अन्तरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष घोषित कर दिया है। केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकारें भी अपने-अपने स्तर से मोटे अनाज की खेती को प्रोत्साहन दे रही हैं। इसके लिए कृषकों को निःशुल्क बीज किट बांटी जा रही हैं। साथ ही, बिहार भी इसमें पीछे नहीं है। यहां के गया जनपद में किसानों को मोटे अनाज की खेती करने के लिए बढ़ावा दिया जा रहा है।

कृषि विभाग ने पांच हेक्टेयर में चीना की खेती कराई

मीडिया एजेंसियों के अनुसार, गया जनपद में कृषकों को मडुआ की खेती के लिए बढ़ावा दिया जा रहा है। बतादें, कि वर्तमान में किसान गया जिले में मडुआ के साथ- साथ चीना फसल का भी उत्पादन करेंगे। विशेष बात यह है, कि कृषि विभाग कृषकों से जनपद में पांच हेक्टेयर भूमि में चीना की खेती कराएगी, जिससे कि इसके बीज को कृषकों को बीज वितरित किया जा सके। यह भी पढ़ें: राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र ने मोटे अनाजों के उत्पादों को किया प्रोत्साहित

चीना को किस रूप में बनाकर सेवन किया जाता है

चीना की फसल मोटे अनाज की श्रेणी में आने वाली फसल है। चीना की खेती ऊसर भूमि, बलुई मृदा और ऊँचे खेत में भी सहजता से की जा सकती है। चीना की सबसे बड़ी विशेषता यह है, कि यह एक असिंचित श्रेणी की फसल है। चीना की खेती में बारिश से ही सिंचाई की आवश्यकता पूर्ण हो जाती है। अगर हम इसके अंदर मौजूद पोषक तत्वों की बात करें तो इसके अंदर फाइबर समेत विभिन्न पोषक तत्व भरपूर मात्रा उपलब्ध होते हैं। इतना ही नहीं चीना का सेवन करने वाले लोगों को मधुमेह और ब्लड़ प्रेशर जैसे रोगों से राहत मिलती है। चीना का उपयोग भात, रोटी और खीर निर्मित कर खाया जाता है।

यहां किए जा रहे चीना के बीज तैयार

कृषि जानकारों के मुताबिक, गया जनपद में आवश्यकतानुसार एवं समयानुसार बारिश ना होने की स्थिति में कई बार किसान काफी जमीन पर धान की रोपाई नहीं करते हैं। अब ऐसी स्थिति में किसान भाई जल की कमी के चलते खाली पड़ी ऐसी भूमि पर चीना की खेती कर सकते हैं। विशेष बात यह है, कि चीना की फसल 2 महीने के अंदर ही पककर तैयार हो जाती है। अब ऐसी स्थिति में इसकी खेती से किसान भाई हानि की भरपाई कर सकते हैं। इस वर्ष टनकुप्पा प्रखंड के मायापुर फार्म के अंतर्गत भी चीना के बीज तैयार किए जा रहे हैं।
धान की इन किस्मों का उत्पादन करके उत्तर प्रदेश और बिहार के किसान अच्छा उत्पादन ले सकते हैं

धान की इन किस्मों का उत्पादन करके उत्तर प्रदेश और बिहार के किसान अच्छा उत्पादन ले सकते हैं

पूसा सुगंध- 5 बासमती धान की एक उत्तम किस्म है। कृषि वैज्ञानिकों ने इस किस्म को हरियाणा, दिल्ली जम्मू- कश्मीर, पंजाब और उत्तर प्रदेश की जलवायु को देखते हुए विकसित किया है। मानसून की दस्तक के साथ ही धान की खेती चालू हो गई है। समस्त राज्यों में किसान भिन्न भिन्न किस्म के धान का उत्पादन कर रहे हैं। कोई मंसूरी धान की खेती कर रहा है, तो कोई अनामिका धान की खेती कर रहा है। परंतु, बासमती की बात ही कुछ ओर है। अगर पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और हरियाणा के किसान बासमती की खेती करना चाहते हैं, तो आज हम उनको कुछ ऐसी प्रमुख किस्मों के विषय में जानकारी प्रदान करेंगे, जिससे उनको अच्छी खासी पैदावार अर्जित होगी। विशेष बात यह है, कि इन प्रजातियों को कृषि वैज्ञानिकों ने भिन्न-भिन्न राज्यों के मौसम को ध्यान में रखते हुए इजात किया है।

पूसा सुगंध- 5:

पूसा सुगंध- 5 बासमती धान की एक उम्दा किस्म है। कृषि वैज्ञानिकों ने इस किस्म को जम्मू- कश्मीर, पंजाब, दिल्ली, यूपी और हरियाणा की जलवायु को ध्यान में रखते हुए विकसित किया है। यदि इन राज्यों के किसान पूसा सुगंध- 5 की खेती करते हैं, तो उनको बेहतरीन उत्पादन मिलेगा। पूसा सुगंध- 5 की रोपाई करने के 125 दिन पश्चात इसकी फसल पक कर तैयार हो जाती है। इसकी खेती करने पर एक हेक्टेयर में 60-70 क्विंटल तक पैदावार होगी। ये भी पढ़े: धान की लोकप्रिय किस्म पूसा-1509 : कम समय और कम पानी में अधिक पैदावार : किसान होंगे मालामाल

पूसा बासमती- 1121:

पूसा बासमती- 1121 को कृषि वैज्ञानिकों ने सिंचित क्षेत्रों के लिए विकसित किया है। इसकी फसल 145 दिन के अंतर्गत तैयार हो जाती है। पूसा बासमती- 1121 की उत्पादन क्षमता 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। विशेष बात यह है, कि पूसा बासमती- 1121 धान की एक अगेती किस्म है।

पूसा सुगंध- 3:

पूसा सुगंध- 3 को सुगंध और लंबे चावल के दाने के लिए जाना जाता है। यह खाने में बेहद ही स्वादिष्ट लगता है। यदि हरियाणा, पश्चिमी यूपी, उत्तराखंड, पंजाब और दिल्ली के सिंचित क्षेत्रों के किसान इसकी खेती करते हैं, तो प्रति हेक्टेयर 60-65 क्विंटल पैदावार अर्जित कर सकेंगे। इसकी फसल 125 दिन के अंतर्गत पक कर तैयार हो जाती है। ये भी पढ़े: पूसा बासमती 1692 : कम से कम समय में धान की फसल का उत्पादन

पूसा बासमती- 6:

पूसा बासमती- 6 की सिंचित इलाकों में रोपाई करने पर अधिक उत्पादन अर्जित होगा। यह एक बौनी प्रजाति का बासमती धान होता है। इसके दाने काफी ज्यादा सुगंधित होते हैं। पूसा बासमती- 6 की उत्पादन क्षमता प्रति हेक्टेयर 55 से 60 क्विंटल होती है।

पूसा बासमती- 1:

पूसा बासमती- 1 धान की एक ऐसी किस्म है, जिसका उत्पादन किसी भी प्रकार के सिंचित क्षेत्रों में किया जा सकता है। इसमें बीमारियों से लड़ने की क्षमता ज्यादा पाई जाती है। इसमें झुलसा रोग की संभावना ना के समान है। विशेष बात यह है, कि पूसा बासमती- 1 की फसल 135 दिन में पककर तैयार हो जाती है। मतलब कि 135 दिन के पश्चात किसान इसकी कटाई कर सकते हैं। यदि आप एक हेक्टेयर भूमि में पूसा बासमती- 1 की खेती करते हैं, तो लगभग 50-55 क्विटल तक उत्पादन मिल सकता है।
चावल के रकबे में अच्छी खासी बढ़ोत्तरी तो वहीं तिलहन के रकबे में आई गिरावट

चावल के रकबे में अच्छी खासी बढ़ोत्तरी तो वहीं तिलहन के रकबे में आई गिरावट

वर्तमान खरीफ सीजन में 21 जुलाई तक धान की बुवाई का रकबा तीन प्रतिशत बढ़कर 180.2 लाख हेक्टेयर तक पहुँच चुका है। लेकिन, दलहन का क्षेत्रफल 10 प्रतिशत गिर के 85.85 लाख हेक्टेयर रह गया है। भारत में चावल को लेकर बड़ी खबर आई है। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक वर्तमान खरीफ सीजन में विगत वर्ष की समान अवधि में 3 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी देखने को मिली है। विशेष बात यह है, कि हाल ही में केंद्र सरकार ने नॉन—बासमती चावल के निर्यात पर बैन लगा दिया है। इस वजह से ग्लोबल लेवल पर चावल के भाव में बढ़ोत्तरी देखने को मिल रही है। अमेरिका की दुकानों के बाहर चावल लेने के लिए भीड़ लंबी कतारों में लग गई हैं। वहीं दूसरी तरफ दलहन को लेकर थोड़ी हताशा भरी खबर देखने को मिली है। दलहन का क्षेत्रफल पिछले साल की समान अवधि में 10 प्रतिशत रकबा कम हुआ है। जिसका सीधा प्रभाव उत्पादन पर देखने को मिल सकता है और दालों की कीमतों में वृद्धि देखने को मिल सकती है।

चावल का क्षेत्रफल बढ़ा तो तिलहन के क्षेत्रफल में आई गिरावट

खरीफ सीजन में 25 जुलाई तक धान की रोपाई का क्षेत्रफल तीन प्रतिशत बढ़कर 180.2 लाख हेक्टेयर तक पहुँच गया है। लेकिन, दलहन का क्षेत्रफल 10 प्रतिशत घटकर 85.85 लाख हेक्टेयर रह गया है। कृषि मंत्रालय के सोमवार को जारी आंकड़ों से यह जानकारी प्राप्त हुई है। बीते वर्ष इसी अवधि में धान का क्षेत्रफल 175.47 लाख हेक्टेयर और दलहन का क्षेत्रफल 95.22 लाख हेक्टेयर था। धान खरीफ सीजन की मुख्य फसल है, जिसकी बुवाई सामान्य तौर पर दक्षिण-पश्चिम मानसून के साथ चालू होती है। भारत के कुल चावल उत्पादन का तकरीबन 80 प्रतिशत खरीफ सत्र से आता है। आंकड़ों के मुताबिक, श्री अन्न यानी मोटे अनाज का रकबा 25 जुलाई तक बढ़कर 134.91 लाख हेक्टेयर हो गया है, जो पिछले साल इसी अवधि में 128.75 लाख हेक्टेयर था। ये भी पढ़े: धान की खेती की रोपाई के बाद करें देखभाल, हो जाएंगे मालामाल

तिल एवं मूंगफली की फसल की स्थिति

नॉन फूड कैटेगिरी में तिलहन का क्षेत्रफल बढ़कर 160.41 लाख हेक्टेयर हो गया है, जो विगत वर्ष की इसी अवधि में 155.29 लाख हेक्टेयर था। मूंगफली का रकबा 34.56 लाख हेक्टेयर से थोड़ा बढ़कर 34.94 लाख हेक्टेयर हो गया है। साथ ही, सोयाबीन का क्षेत्रफल 111.31 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 114.48 लाख हेक्टेयर हो गया है। मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, कपास का क्षेत्रफल 109.99 लाख हेक्टेयर से ना के बराबर गिरावट के साथ 109.69 लाख हेक्टेयर रह गया है। गन्ने का क्षेत्रफल 53.34 लाख हेक्टेयर की तुलना में 56 लाख हेक्टेयर रहा है।

खरीफ के समकुल क्षेत्रफल में बढ़ोत्तरी

समस्त प्रमुख खरीफ फसलों का कुल क्षेत्रफल अब तक बढ़कर 733.42 लाख हेक्टेयर हो चुका है, जो कि विगत वर्ष की इसी अवधि में 724.99 लाख हेक्टेयर था। दक्षिण-पश्चिम मानसून ने भारत में केरल के तट पर आठ जून को दस्तक दी थी। लेकिन इसकी सामान्य तारीख एक जून है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने पहले कहा था, कि अल नीनो के हालात बनने के बावजूद दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान भारत में सामान्य बारिश होने की आशा है।
धान की फसल के अंतर्गत बालियां बढ़ाने के लिए दवा एवं तकनीक का इस प्रकार उपयोग करें

धान की फसल के अंतर्गत बालियां बढ़ाने के लिए दवा एवं तकनीक का इस प्रकार उपयोग करें

धान की फसल खरीफ सीजन की एक महत्वपूर्ण फसल है। धान की बालियां बढ़ाने की किसान हर संभव कोशिश करते हैं। इसलिए आज हम आपको इस लेख में इसके लिए दवा व तकनीक की जानकारी देने वाले हैं। जैसा कि हम सब जानते हैं, कि धान खरीफ सीजन की सबसे प्रमुख फसल मानी जाती है। हमारे देश के किसान भाइयों के द्वारा धान की फसल सबसे ज्यादा मात्रा में की जाती है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, चीन के पश्चात भारत में धान का उत्पादन सबसे ज्यादा होता है। इसी के चलते भारत धान उत्पादन के मामले में दूसरे स्थान पर बना हुआ है।

उत्पादन हेतु नवीन तकनीक का इस्तेमाल

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि भारतीय किसानों के द्वारा धान की बेहतरीन पैदावार अर्जित करने के लिए नई तकनीकों का उपयोग किया जाता है। इसके लिए वह कृषि वैज्ञानिकों की सहायता लेते हैं। यदि आप धान के ज्यादा मात्रा में कल्ले अर्जित करना चाहते हैं, तो इसके लिए आपको कुछ तकनीकों के साथ दवाओं का भी उपयोग करना होगा। परंतु, आपको इस बात का भी ख्याल रखना है, कि आज के वक्त में बाजार में विभिन्न प्रकार की नकली औषधियां आ रही हैं, जिससे फसल पूर्णतय चौपट हो जाती है।

कल्ले फूटने के दौरान फसल को न्यूट्रीशन यानी पोषण की आवश्यकता पड़ती है

यदि आप कृषक हैं, तो इस बात से तो अच्छे से परिचित होंगे कि धान की रोपाई करने के पश्चात उसमें 20-30 दिन के अंदर कल्ले फूटने चालू हो जाते हैं। इस दौरान फसल को ज्यादा मात्रा में पोषक तत्वों की जरूरत होती है। ध्यान रखें की इस दौरान आप फसल में अधिक पानी को न रखें। साथ ही, प्रति एकड़ 20 किलो नाइट्रोजन एवं 10 किलो जिंक की मात्रा डालें।

ये भी पढ़ें:
धान की लोकप्रिय किस्म पूसा-1509 : कम समय और कम पानी में अधिक पैदावार : किसान होंगे मालामाल

धान में रोपाई के 10-15 दिन के बाद पाटा लगा दें

जब आप खेत में धान की रोपाई कर लें, तो आप कम से कम 10-15 दिनों के उपरांत ही इसमें पाटा लगादें। ऐसा करने से छोटी व हल्की जड़ें तीव्रता के साथ विकसित होना शुरू हो जाती है। जब आप खेत के अंदर एक बार पाटा लगा दें, तो फिर दूसरी बार विपरीत दिशा में पाटा लगाएं। ऐसा करने से पौधे में लगने वाले सुंडी कीड़े मर जाते हैं। साथ ही, बाकी विभिन्न प्रकार के रोग लगने की आशंका नहीं होती है।

धान के कल्ले बढ़ाने वाली औषधियां

धान की बाली ज्यादा बढ़ाने के लिए आपको समयानुसार खरपतवारनाशी और निराई-गुड़ाई का कार्य करते रहना चाहिए। इसके अतिरिक्त आप बाजार में मिलने वाली कुछ दवाओं का उपयोग कर सकते हैं। जैसे कि - खरपतवार के लिए 2-4D, फसल रोपाई के लिए 3-4 दिन में पेंडीमेखली 30 ई.सी 3.5 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से दें। इस दवा में आप 800-900 लीटर पानी को मिश्रित कर खेत में छिड़काव कर सकते हैं।
धान उत्पादक किसान ने महज 45 दिन के अंदर अगस्त माह में ही धान की कटाई कर मिशाल पेश की

धान उत्पादक किसान ने महज 45 दिन के अंदर अगस्त माह में ही धान की कटाई कर मिशाल पेश की

किसान संजय सिंह का कहना है, कि जायद सीजन में धान की खेती करना किसान भाइयों के लिए काफी लाभकारी रहेगा। क्योंकि इस सीजन में खेती करने पर जल की बर्बादी नहीं होती है। बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है। यहां पर जुलाई के अंतिम सप्ताह तक कई किसान धान की रोपाई ही कर रहे थे। परंतु, आज हम आपको एक ऐसे किसान से मिलवाएंगे, जिन्होंने अगस्त माह में ही धान की कटाई चालू कर दी। मुख्य बात यह है, कि इन्होंने एक एकड़ भूमि में इंडिया गेट धान की खेती की थी। इससे लगभग 16 क्विंटल के आसपास इंडिया गेट धान की पैदावार हुई है। वर्तमान में इस किसान की चर्चा संपूर्ण जनपद में हो रही है। वे लोगों के लिए एक नजीर बन गए हैं। समीपवर्ती क्षेत्रों के किसान इनसे खेती के गुण सीखने आ रहे हैं।

धान उत्पादक किसान संजय सिंह कहाँ के मूल निवासी हैं

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि संजय सिंह कैमूर जनपद के बगाढ़ी गांव के निवासी हैं। उन्होंने एक एकड़ भूमि में गरमा धान का उत्पादन किया था। विशेष बात यह है, कि संजय सिंह विगत दो वर्ष से इंडिया गेट धान का उत्पादन कर रहे हैं। परंतु, इस बार उन्होंने जायद सीजन में इसकी खेती करने का निर्णय किया और उन्हें काफी हद तक इसमें सफलता भी प्राप्त हुई। संजय सिंह ने बताया है, कि गरमा धान की खेती करने में खरीफ सीजन की तुलना में कम खर्चे हुए। साथ ही, पानी की बर्बादी भी काफी कम हुई है। वे धान की बेहतरीन पैदावार से काफी उत्साहित हैं। उन्होंने बताया है, कि आगामी वर्ष वे 10 एकड़ में धान की खेती करेंगे।

ये भी पढ़ें:
पूसा बासमती 1692 : कम से कम समय में धान की फसल का उत्पादन

फसल केवल 45 दिन के अंदर पककर तैयार हो गई

संजय सिंह ने बताया है, कि गरमा धान की खेती करने का विचार उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर से मिला है। वहां पर उन्होंने किसानों को जायद सीजन में धान की खेती करते हुए पाया। इसके पश्चात उन्होंने अपने गांव में आकर गरमा धान की खेती चालू कर दी। उन्होंने बताया कि अप्रैल माह में इंडिया गेट धान की नर्सरी तैयार करने के लिए बुवाई की थी। साथ ही, मई माह के अंतिम सप्ताह में इसकी रोपाई की गई। संजय सिंह की माने तो केवल 45 दिन में ही फसल पककर तैयार हो गई थी। परंतु, बारिश के कारण इसकी कटाई करने में 20 दिनों का विलंभ हुआ। इसकी वजह से अगस्त माह में धान काटना पड़ा।

चावल विक्रय कर एक लाख रुपये तक की आमदनी कर सकते हैं

किसान संजय सिंह ने बताया है, कि जायद सीजन में महज दो बार ही धान की फसल की सिंचाई करनी होती है, जिससे कि खेत के अंदर नमी बनी रहे। साथ ही, खेती के ऊपर खर्चा भी कम आता है। उनके बताने के अनुसार जायद सीजन की सबसे बड़ी विशेषता यह है, कि मात्र 45 से 50 दिनों में ही फसल पूर्णतय पककर तैयार हो जाती है। इस प्रकार धान की फसल को तैयार होने में करीब 130 से 140 दिन लग जाते हैं। उन्होंने बताया है, कि 16 क्विंटल धान में लगभग 11 क्विंटल तक चावल का उत्पादन होगा। वर्तमान में 1000 रुपये में 10 किलो इंडिया गेट चावल आ रहा है। इस प्रकार वे 1100 किलो चावल बेचकर एक लाख रुपये से ज्यादा की आमदनी कर सकते हैं।
पराली (धान का पुआल) समस्या नही कई समस्या का समाधान है, इसका सदुपयोग करके अधिक से अधिक लाभ उठाए

पराली (धान का पुआल) समस्या नही कई समस्या का समाधान है, इसका सदुपयोग करके अधिक से अधिक लाभ उठाए

Dr SK Singhडॉ एसके सिंह
प्रोफेसर (प्लांट पैथोलॉजी) एवं विभागाध्यक्ष,पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी, प्रधान अन्वेषक, 
अखिल भारतीय फल अनुसंधान परियोजना,डॉ राजेंद्र प्रसाद सेंट्रल एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, पूसा-848 125, 
समस्तीपुर,बिहार 
Send feedback 
sksraupusa@gmail.com/sksingh@rpcau.ac.in
सरकार एवं मीडिया दोनों जितना पराली न जलाने का आग्रह कर रहा है ।किसान उतना ही पराली जला रहा है।जिसकी मुख्य वजह यह है कि उसे यह पता ही नही है की वह स्वयं का कितना नुकसान कर रहा है।आज से 10 वर्ष पूर्व पराली जलाने की घटनाएं बहुत ही कम थी। पराली जलाने से किसानों को तात्कालिक फायदा जो भी होता हो,उनका दीर्घकालिक नुकसान बहुत होता है। अधिकांश किसान अब धान की कटाई हारवेस्टर से कराने लगे हैं। इससे खेतों में धान का अवशेष बच जाता है। बचे अवशेष को किसान खेतों में ही जला देते हैं। इससे खेत के साथ ही पर्यावरण को भी नुकसान पहुंच रहा है। किसान खेतों में बचे फसल अवशेष को खेत में ही जला देते हैं। फसल अवशेषों को जलाने से मिट्टी का तापमान बढ़ता है। जिससे मिट़्टी में उपलब्ध जैविक कार्बन जल कर नष्ट हो जाता है। इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है और धीरे-धीरे मिट्टी बंजर होती चली जाती है। किसानों को यह जानना अत्यावश्यक है की जिस मिट्टी में जितना अधिक से अधिक सूक्ष्मजीव (माइक्रोब्स)होंगे वह मिट्टी उतनी ही सजीव होगी ,उस मिट्टी से हमे अधिक से अधिक उपज प्राप्त होगी । इसके विपरित जिस मिट्टी में जितने कम सूक्ष्मजीव होंगे वह मिट्टी उतनी ही निर्जीव होगी उस मिट्टी से अच्छी उपज प्राप्त करना उतना ही कठिन होगा। मिट्टी में पाए जाने वाले अधिकांश सूक्ष्मजीव मिट्टी की ऊपरी परत में पाए जाते है।जब पराली जलाते है तो मिट्टी की ऊपरी परत के अत्यधिक गरम हो जाने से ये सूक्ष्म जीव मर जाते है जिससे हमारी मिट्टी धीरे धीरे करके खराब होने लगती है और अंततः बंजर हो जाती है।

ये भी पढ़ें:
हरियाणा सरकार ने पराली आदि जैसे अवशेषों से पर्यावरण को बचाने की योजना बनाई धान के अवशेष को जलाने से मिट्टी में नाइट्रोजन की भी कमी हो जाती है। जिसके कारण उत्पादन घटता है और वायुमंडल में कार्बन डाइआक्साइड की मात्रा बढ़ती है। इससे वातावरण प्रदूषित होने से जलवायु परिवर्तन होता है। एक अनुमान के मुताबिक एक टन फसल अवशेष जलने से लगभग 60 किलोग्राम कार्बन मोनोआक्साइड, 1460 किलोग्राम कार्बन डाईआक्साइड तथा दो किलोग्राम सल्फर डार्डआक्साइड गैस निकलकर वातावरण में फैलता है, जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। किसान जागरूकता के अभाव में पराली जला रहे है। पराली जलाने से हमारे मित्र कीट भारी संख्या में मारे जाते है। जिसकी वजह से तरह तरह की नई बीमारी एवं कीट हर साल समस्या पैदा कर रहे है जिन्हे प्रबंधित करने के लिए हमें कृषि रसायनों के ऊपर निर्भर होना पड़ता है। मृदा के अंदर के हमारे मित्र सूक्ष्मजीव जो खेती बारी में बहुत ही आवश्यक है ,वे भी जलने की वजह से मारे जाते है,जिससे मृदा की संरचना खराब होती है।फसल अवशेष जो सड़ गल कर मृदा की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने में सहायक होते उस लाभ से भी किसान वंचित रह जाते है।उपरोक्त इतने लाभ से किसान वंचित होकर तात्कालिक लाभ के लिए पराली जलाता है,उसे इसके बारे में जागरूक करने की आवश्यकता है। आवश्यकता इस बात की है की किसानों को प्रेरित किया जाय की इस कृषि अवशेष को कार्बनिक पदार्थ में बदला जाय ,डिकंपोजर का प्रयोग करके इसे जल्द से जल्द सड़ने गलने हेतु प्रोत्साहित किया जाय । जागरूकता अभियान चला कर पराली जलाने से होने वाले नुकसान से अवगत कराया जाय की किसान तात्कालिक लाभ के लिए अपने दीर्घकालिक फायदे से वंचित हो रहे है।पर्यावरण का कितना नुकसान होता है यह बताने की आवश्यकता नहीं है। धान की पुआल का प्रबंधन टिकाऊ कृषि और पर्यावरण संरक्षण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

धान के पुआल के प्रबंधन का महत्व

धान की पुआल जलाने से वातावरण में हानिकारक प्रदूषक फैलते हैं, जिससे धुंध और खराब वायु गुणवत्ता में योगदान होता है।खेतों में पुआल छोड़ने से मृदा क्षरण होता है, जिससे कृषि भूमि का दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है। पुआल के सड़ने से जल निकायों में रसायन और पोषक तत्व निकलते हैं, जिससे जल प्रदूषण होता है। धान के भूसे को मिट्टी में शामिल करने से भूमि में आवश्यक पोषक तत्व वापस लौटकर मिट्टी की उर्वरता में सुधार करते है। धान का भूसा कार्बनिक पदार्थ का एक स्रोत है, जो मिट्टी की संरचना और जल-धारण क्षमता को बढ़ाता है।धान के भूसे को पशुओं के लिए एक आवश्यक चारे के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे वैकल्पिक चारे की मांग कम हो जाएगी और किसानों के लिए लागत में कटौती होगी।

धान की पुआल प्रबंधन में चुनौतियाँ

धान की पराली का प्रबंधन कई चुनौतियाँ यह वायु प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में योगदान देता है। कई किसान अनुचित धान के भूसे प्रबंधन के प्रतिकूल प्रभावों से अनजान हैं। पुआल को मिट्टी में मिलाने के लिए विशेष उपकरण और श्रम की आवश्यकता होती है, जो छोटे पैमाने के किसानों के लिए महंगा हो सकता है।

ये भी पढ़ें:
पराली जलायी तो इस राज्य में पी एम किसान सम्मान निधि से होंगे वंचित

धान की पुआल प्रबंधन की विधियाँ

धान अवशेष को पुनः मिट्टी में मिलाना धान के अवशेष की जुताई करके वापस मिट्टी में मिलाने के लिए विशेष जुताई यंत्र की आवश्यकता होती है। लेकिन जुताई करके इन अवशेषों को मिट्टी में मिला देने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है एवं कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ती है और रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता में भारी कमी आती है।

मशरूम की खेती में उपयोग

धान का पुआल मशरूम की खेती के लिए सर्वोत्तम सबस्ट्रेट है । इसका उपयोग करके मशरूम की खेती करके अतरिक्त से प्राप्त किया जा सकता है।

पशु आहार के रूप में उपयोग

धान के भूसे का उपयोग मवेशियों और अन्य पशुओं के लिए पूरक आहार के रूप में किया जा सकता है। जिसकी वजह से चारे की लागत में कमी आती है और पशुओं के लिए पोषण का एक अतिरिक्त स्रोत मिलता है।

ऊर्जा उत्पादन

धान के भूसे का उपयोग बायोमास बिजली संयंत्रों में बिजली पैदा करने के लिए किया जा सकता है। जिसकी वजह से हमे स्वच्छ ऊर्जा मिलती है और जीवाश्म ईंधन की आवश्यकता को कम हो जाती है।

ये भी पढ़ें:
इस राज्य में हिम ऊर्जा सोलर पॉवर यूनिट लगवाने पर 40% प्रतिशत अनुदान दिया जाएगा

पलवार (मल्चिंग)

धान के भूसे का उपयोग मिट्टी को ढकने, नमी बनाए रखने और खरपतवार की वृद्धि को रोकने के लिए गीली घास के रूप में किया जा सकता है। जिसकी वजह से जल दक्षता और मिट्टी के तापमान विनियमन में सुधार होता है।

खाद

पोषक तत्वों से भरपूर खाद बनाने के लिए धान के भूसे को अन्य जैविक सामग्रियों के साथ मिलाया जा सकता है। वर्मी कंपोस्ट में इसका उपयोग करके उच्च कोटि की खाद बनाई जा सकती है।कृषि के लिए मूल्यवान जैविक उर्वरक बनाता है।

जैव ईंधन उत्पादन

धान के भूसे को बायोएथेनॉल या बायोगैस जैसे जैव ईंधन में परिवर्तित किया जा सकता है। जिसकी वजह से जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम हो जाती है और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम हो जाता है।

सरकारी नीतियां

कई सरकारों ने धान के भूसे के उचित प्रबंधन को प्रोत्साहित करने के लिए नीतियां बनाई हैं। इनमें टिकाऊ प्रथाओं को अपनाने के लिए प्रोत्साहन, पुआल जलाने पर जुर्माना और उपकरण खरीदने के लिए सब्सिडी शामिल है। अभी हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने भी पराली जलाने पर कठोर दण्ड का प्राविधान किया है। पराली जलाने की प्रथा को तोड़ने के लिए कृषि विभाग,बिहार सरकार द्वारा अनेक कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। कृषि यांत्रिकरण योजना के माध्यम से रीपर कम बाईंडर, हैप्पी सीडर तथा रोटरी मल्चर पर आकर्षक अनुदान की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी गई है। इसके अलावे कृषि यंत्र बैंक भी स्थापित किया जा रहा है, जिसमें रियायती दर पर पराली प्रबंधन करने वाले यंत्र उपलब्ध रहेंगे।सभी हार्वेस्टर मालिकों को अपने हार्वेस्टर में जीपीएस लगाने को कहा गया है, साथ ही हार्वेस्टर में एसएमएस का प्रयोग कर ही फसलों की कटाई करेंगे। ऐसा नहीं करने वाले हार्वेस्टर मालिकों को चिन्हित कर विधि सम्मत कार्रवाई की जायेगी। कृषि विभाग द्वारा पराली जलाने वाले किसानों पर कार्रवाई भी की जा रही है, जिसमें किसानों का पंजीकरण पर रोक लगाते हुए कृषि विभाग द्वारा उपलब्ध कराये जा रहे सभी प्रकार के अनुदान से वंचित करने का निर्णय लिया गया है । इतने कठोर कदम उठाने के वावजूद बिना भय के किसान पराली जला रहे है जो कत्तई उचित नहीं है।

प्रभावी धान पुआल प्रबंधन के लाभ

धान के भूसे का कुशल प्रबंधन करने से अनेक लाभ है जैसे मृदा स्वास्थ्य और उर्वरता में सुधार होता है। मृदा सजीव होती है।पर्यावरण प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी होती है। कृषि उत्पादकता में भारी वृद्धि होती है। पशु के लिए अतरिक्त आधार मिलता है। ऊर्जा उत्पादन और मूल्य वर्धित उत्पादों के माध्यम से आर्थिक लाभ मिलता है। मशरूम उत्पादन के लिए सर्वोत्तम सस्ट्रेट होने की वजह से इसका उपयोग करके मशरूम उत्पादन किया जा सकता है।

निष्कर्ष

धान की पुआल का उचित प्रबंधन टिकाऊ कृषि और पर्यावरण संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है। मृदा संशोधन, पशु चारा उपयोग, ऊर्जा उत्पादन, मल्चिंग, कम्पोस्टिंग और बायोमास रूपांतरण जैसे विभिन्न तरीकों को अपनाकर, हम कृषि और पर्यावरण के लिए कई लाभ प्राप्त करते हुए धान के भूसे से जुड़ी चुनौतियों का समाधान कर सकते हैं। सरकारी नीतियां और नियम जिम्मेदार धान के भूसे प्रबंधन को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, और सकारात्मक बदलाव लाने के लिए किसानों के बीच जागरूकता बढ़ाना आवश्यक है। अंततः, धान की पुआल का कुशल प्रबंधन कृषि की समग्र स्थिरता और पर्यावरण के दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण है। की भलाई में योगदान देता है।