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नांदेड स्थित कपास अनुसंधान केंद्र ने विकसित की कपास की तीन नवीन किस्में

नांदेड स्थित कपास अनुसंधान केंद्र ने विकसित की कपास की तीन नवीन किस्में

किसान भाइयों की जानकारी के लिए बतादें, कि नांदेड़ मौजूद कपास अनुसंधान केंद्र ने विगत छह साल के शोध के उपरांत कपास की तीन बीटी किस्में विकसित की हैं। इन किस्मों को हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित केंद्रीय किस्म चयन समिति की बैठक में स्वीकृत दी गई है। दावा यह भी किया गया है, क‍ि इनके बीजों का तीन वर्ष तक इस्तेमाल किया जा सकता है। वसंतराव नाइक मराठवाड़ा कृषि विश्वविद्यालय, परभणी के नांदेड़ मौजूद कपास अनुसंधान केंद्र ने कपास की तीन नवीन किस्में इजात की हैं। अब इन किस्मों से किसानों को अधिक फायदा होगा। किसानों के लिए बीज की लागत को कम करने में सहायता मिलेगी। बतादें, कि पैदावार भी काफी अच्छी होगी। इन क‍िस्मों को शुष्क जमीन वाले इलाकों में भी उगाया जा सकता है। यह बीटी क‍िस्म है, बीटी कॉटन के बीज के ल‍िए किसानों को निजी कंपनियों पर आश्रित रहना पड़ता था, ज‍िससे उन्हें बीज पर अधिक धनराशि खर्च करनी पड़ती थी। वर्तमान में नवीन क‍िस्में किसानों को एक विकल्प मुहैय्या कराएगी। यूनिवर्सिटी की तरफ से यह दावा किया गया है।

कपास की तीन नई किस्में इजात की गई

नांदेड़ मौजूद कपास अनुसंधान केंद्र ने विगत छह साल के शोध के पश्चात कपास की तीन बीटी किस्में इजात की हैं। इनमें एनएच 1901 बीटी, एनएच 1902 बीटी एवं एनएच 1904 बीटी शम्मिलित हैं। इन किस्मों को वर्तमान में नई दिल्ली में आयोजित केंद्रीय किस्म चयन समिति की बैठक में स्वीकृति दी गई है। इनकी बिजाई लागत संकर किस्मों की तुलना में कम होने का दावा क‍िया गया है। दावा यह भी किया गया है, क‍ि इनके बीजों का तीन वर्ष तक इस्तेमाल किया जा सकता है। ये भी पढ़े: कपास की खेती की संपूर्ण जानकारी

ये किस्में क‍िन राज्यों के ल‍िए विकसित की गई हैं

बतादें, कि इन किस्मों में खादों का उपयोग भी कम होगा। हालांकि, किसानों की तरफ से कपास की ऐसी किस्मों की मांग है। परंतु, किस्मों की अनुपलब्धता की वजह राज्य में सबसे ज्यादा संकर कपास की खेती की गई है। इस जरूरत को ध्यान में रखते हुए ही नवीन क‍िस्में तैयार की गई हैं। महाराष्ट्र प्रमुख कपास उत्पादक राज्य है। यहां बड़े पैमाने पर क‍िसान कॉटन की खेती पर न‍िर्भर हैं। ये तीन नवीन क‍िस्में महाराष्ट्र, गुजरात एवं मध्य प्रदेश के ल‍िए उपयुक्त हैं।

दक्ष‍िण भारत के ल‍िए विकसित की गई अलग क‍िस्म

यह दावा किया गया है, क‍ि परभणी कृषि विश्वविद्यालय कपास की सीधी किस्मों को बीटी तकनीक में परिवर्तित करने वाला राज्य का पहला कृषि विश्वविद्यालय बन चुका है। इससे पूर्व यह प्रयोग नागपुर के केंद्रीय कपास अनुसंधान केंद्र ने किया था। यह किस्म अब किसानों को आगामी वर्ष में खेती के लिए उपलब्ध होगी। साथ ही, परभणी के मेहबूब बाग कपास अनुसंधान केंद्र ने स्वदेशी कपास की एक सीधी किस्म 'पीए 833' विकसित की है, जो दक्षिण भारत के लिए अनुकूल है। ये भी पढ़े: किसानों के लिए सफेद सोना साबित हो रही कपास की खेती : MSP से डबल हो गए कपास के दाम

विकसित की गई इन तीन नवीन क‍िस्मों की विशेषता

कपास की इन तीन नवीन क‍िस्मों में संकर किस्म के मुकाबले में कम रासायनिक उर्वरकों की जरूरत होती है। इस किस्म में रस चूसने वाले कीट, जीवाणु झुलसा रोग और पत्ती धब्बा रोग नहीं लगता है। यह इन रोगों के प्रत‍ि बेहद सहनशील है। इस किस्म की कपास का उत्पादन 35 से 37 प्रतिशत है। धागों की लंबाई मध्यम है। मजबूती और टिकाऊपन भी काफी अच्छा है। यूनिवर्सिटी का दावा है, कि यह किस्म सघन खेती के लिए भी अच्छी है।
तोरई की खेती में भरपूर पैसा

तोरई की खेती में भरपूर पैसा

तोरई को कद्दू वर्गीय खेती माना जाता है। तोरई की खेती कैसे करते हैं यह जानने के लिए इससे जुड़ी कुछ तकनीकों की जानकारी होना आवश्यक है। इ्सकी खेती से अच्छा पैसा प्राप्त करने के लिए लो-टनल तकनीक एक खास तकनीक है। इस तकनीक में एक पॉलीथिन की झोंपड़ी बनाई जाती है और इसमें समय से पूर्व पौध तैयार की जाती है। इस पौध को फसल के लिए उपयुक्त तापमान मिलने पर खेत में रोप दिया जाता है। यह नगदी फसल है और बाजार में इसकी कीमतें बहुत ज्यादा न गिरने से किसानों को इसकी खेती से नुकसान नहीं होता। तोरई उचित जल निकासी वाली मिट्टी, मीठा पानी और गर्म जलवायु में अच्छा उत्पादन देती है। शुष्क और आद्र मौसम में इससे अच्छा उत्पादन मिलता है। अच्छे उत्पादन के लिए सब्जी वाली फसलों में कम्पोस्ट खाद का प्रयोग करना बेहद आवश्यक है।

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तोरई की खेती कब करें

इसकी अगेती खेती के लिए किसान लो टनल पॉलीहाउस में बीजारोपण करने की तैयारी कर रहे हैं ताकि यहां नियंत्रित तापमान में पौध तैयार की जा सके। समय से बिजाई का उपयुक्त समय  जनबरी के बाद आता है। कद्दू वर्गीय किसी फसल को लगाने के लिए फरबरी में ही उपयुक्त तापमान आता है। 

तोरई की खेती करने का तरीका

कुछ लोग लो-टनल में पौध तैयार करके उन्हें जनवरी के अंत या फरवरी के प्रारंभ में खेत में रोपते हैं। दूसरा तरीका मल्चिंग का है। इस तकनीक में बीज जमीन में समय से पूर्व ही लगा दिए जाते हैं। इन्हें पॉलीथिन सीट से ढ़क दिया जाात है। बाद में अंकुरण होने और बढ़बार शुरू होने तक ढँक कर रखा जाता है। पॉलीथिन सीट तब हटाई जाती है जबकि मौसम सामान्य हो जाए। 

तोरई के लिए कैसी मिट्टी चाहिए

यह नगदी फसल है और बाजार में इसकी कीमतें बहुत ज्यादा न गिरने से किसानों को इसकी खेती से नुकसान नहीं होता । तोरई उचित जल निकासी वाली मिट्टी, मीठा पानी और गर्म जलवायु में अच्छा उत्पादन देती है। शुष्क और आद्र मौसम में इससे अच्छा उत्पादन मिलता है। अच्छे उत्पादन के लिए सब्जी वाली फसलों में कम्पोस्ट खाद का प्रयोग करना बेहद आवश्यक है। 

उन्न्त किस्मों का चयन

तोरई की अनेक उन्नत किस्में हैंं। सस्ते बीज सरकारी संस्थानों में मिलते हैं। प्राईवेट कंपनियों के अनेक हाइब्रिड बाजार में मौजूद हैं। घिया तोरई, पूसा नसदार किस्म जिसे कुछ इलाकों में खर्रा भी कहा जाता है दिल्ली जैसे महानगरों में पसंद की जाती है। इसे दूूसरे शहरों तक पहुंचाने में फल कम घिसते हैं। सरपुतिया, पंजाब सदाबहार, पी के एम 1, कोयम्बूर 2 आदि अनेक किस्में हैं। इनसे 70 से 80 दिन में फल मिलने शुरू हो जाते हैं। उपज 200 से 250 कुंतल प्रति हैक्टेयर मिलती है। 

बीजारोपण

खेत को अच्छे से तैयार करते हैं। सड़ी गोबर की खाद जोत में मिलाते हैं। इसके बीजों को खेत में उगाने से पहले थीरम या बाविस्टीन से उपचारित कर लेना चाहिए. ताकि पौधे को शुरुआत में होने वाले रोगों से बचाया जा सके। एक हेक्टेयर में इसकी रोपाई के लिए दो से तीन किलो बीज काफी होता है। खेत में तीन से चार मीटर की दूरी पर नाली बना लेते हैं। इनके किनारों पर बीज रोपकर पानी लगा देना चाहिए। 

पौधों की सिंचाई

तोरई के पौधों को सिंचाई की जरूरत बीजों के अंकुरित होने और पौधों पर फल बनने के दौरान अधिक होती है। इस दौरान पौधों की तीन या चार दिन के अंतराल में हल्की हल्की सिंचाई करते रहना चाहिए। खेत में 100 किलोग्राम एनपीके आखिरी जुताई मेेें मिलाने और गोबर की खाद डालने के बाद किसी खाद की जरूरत नहीं होती। फसल विकास के समय बेहद हल्का यूरिया डालना चाहिए। खरपतवार नियंत्रण के लिए निराई गुडाई करते रहें। 

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लालड़ी

कीट के प्रभाव से फसल को बचाने लिए अंकुरण के बाद ही पौधों पर नीम का तेल पानी के साथ मिलाकर छिडक देना चाहिए।

फल मक्खी

इसके नियंत्रण के ​लिए जैविक उपचार के तौर पर नीम तेल या क्लोरोपायरीफास जैसे हल्के कीटनाशक का प्रयोग करें।

चूर्णी फफूंदी

इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर कार्बेन्डाजिम या एन्थ्रेक्नोज की उचित मात्रा का छिडकाव पौधों पर करना चाहिए।

पत्ती धब्बा

इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर मन्कोजेब या जिनेब की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए।

जड़ सड़न

इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों की जड़ों में बाविस्टीन या मेन्कोजेब की उचित मात्रा को पानी में मिलाकर पौधों पर छिड़कना चाहिए।

पिछले साल की अपेक्षा बढ़ सकती है, गेहूं की पैदावार, इतनी जमीन में हो चुकी है अभी तक बुवाई

पिछले साल की अपेक्षा बढ़ सकती है, गेहूं की पैदावार, इतनी जमीन में हो चुकी है अभी तक बुवाई

भारत के साथ दुनिया भर में गेहूं खाना बनाने का एक मुख्य स्रोत है। अगर वैश्विक हालातों पर गौर करें, तो इन दिनों दुनिया भर में गेहूं की मांग तेजी से बढ़ी है। जिसके कारण गेहूं के दामों में तेजी से इजाफा देखने को मिला है। दरअसल, गेहूं का उत्पादन करने वाले दो सबसे बड़े देश युद्ध की मार झेल रहे हैं, जिसके कारण दुनिया भर में गेहूं का निर्यात प्रभावित हुआ है। अगर मात्रा की बात की जाए तो दुनिया भर में निर्यात होने वाले गेहूं का एक तिहाई रूस और यूक्रेन मिलकर निर्यात करते हैं। पिछले दिनों दुनिया में गेहूं का निर्यात बुरी तरह से प्रभावित हुआ है, जिसके कारण बहुत सारे देश भुखमरी की कगार पर पहुंच गए हैं।


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दुनिया में घटती हुई गेहूं की आपूर्ति के कारण बहुत सारे देश गेहूं खरीदने के लिए भारत की तरफ देख रहे थे। लेकिन उन्हें इस मोर्चे पर निराशा हाथ लगी है। क्योंकि भारत में इस बार ज्यादा गर्मी पड़ने के कारण गेहूं की फसल बुरी तरह से प्रभावित हुई थी। अन्य सालों की अपेक्षा इस साल देश में गेहूं का उत्पादन लगभग 40 प्रतिशत कम हुआ था। जिसके बाद भारत सरकार ने गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। कृषि विभाग के अधिकारियों ने इस साल रबी के सीजन में एक बार फिर से गेहूं के बम्पर उत्पादन की संभावना जताई है।


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आईसीएआर आईआईडब्लूबीआर के डायरेक्टर ज्ञानेंद्र सिंह ने कहा है, कि इस साल देश में पिछले साल के मुकाबले 50 लाख टन ज्यादा गेहूं के उत्पादन की संभावना है। क्योंकि इस साल गेहूं के रकबे में भारी बढ़ोत्तरी हुई है। साथ ही इस साल किसानों ने गेहूं के ऐसे बीजों का इस्तेमाल किया है, जो ज्यादा गर्मी में भी भारी उत्पादन दे सकते हैं। आईसीएआर आईआईडब्लूबीआर गेहूं की फसल के उत्पादन एवं रिसर्च के लिए शीर्ष संस्था है। अधिकारियों ने इस बात को स्वीकार किया है, कि तेज गर्मी से भारत में अब गेहूं की फसल प्रभावित होने लगी है, जिससे गेहूं के उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है।

इस साल देश में इतना बढ़ सकता है गेहूं का उत्पादन

कृषि मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले आईसीएआर आईआईडब्लूबीआर के अधिकारियों ने बताया कि, इस साल भारत में लगभग 11.2 करोड़ टन गेहूं का उत्पादन हो सकता है। जो पिछले साल हुए उत्पादन से लगभग 50 लाख टन ज्यादा है। इसके साथ ही अधिकारियों ने बताया कि इस साल किसानों ने गेहूं की डीबीडब्लू 187, डीबीडब्लू 303, डीबीडब्लू 222, डीबीडब्लू 327 और डीबीडब्लू 332 किस्मों की बुवाई की है। जो ज्यादा उपज देने में सक्षम है, साथ ही गेहूं की ये किस्में अधिक तापमान को सहन करने में सक्षम हैं।


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इसके साथ ही अगर गेहूं के रकबे की बात करें, तो इस साल गेहूं की बुवाई 211.62 लाख हेक्टेयर में हुई है। जबकि पिछले साल गेहूं 200.85 लाख हेक्टेयर में बोया गया था। इस तरह से पिछली साल की अपेक्षा गेहूं के रकबे में 5.36 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। आईसीएआर आईआईडब्लूबीआर के अधिकारियों ने बताया कि इस साल की रबी की फसल के दौरान राजस्थान, बिहार और उत्तर प्रदेश में गेहूं के रकबे में सर्वाधिक बढ़ोत्तरी हुई है।

एमएसपी से ज्यादा मिल रहे हैं गेहूं के दाम

अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों को देखते हुए इस साल गेहूं के दामों में भारी तेजी देखने को मिल रही है। बाजार में गेहूं एमएसपी से 30 से 40 प्रतिशत ज्यादा दामों पर बिक रहा है। अगर वर्तमान बाजार भाव की बात करें, तो बाजार में गेहूं 30 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है। इसके उलट भारत सरकार द्वारा घोषित गेहूं का समर्थन मूल्य 20.15 रुपये प्रति किलो है। बाजार में उच्च भाव के कारण इस साल सरकार अपने लक्ष्य के अनुसार गेहूं की खरीदी नहीं कर पाई है। किसानों ने अपने गेहूं को समर्थन मूल्य पर सरकार को बेचने की अपेक्षा खुले बाजार में बेचना ज्यादा उचित समझा है। अगर इस साल एक बार फिर से गेहूं की बम्पर पैदावार होती है, तो देश में गेहूं की सप्लाई पटरी पर आ सकती है। साथ ही गेहूं के दामों में भी कमी देखने को मिल सकती है।
जानें चुकंदर कैसे पोषक तत्वों से भरपूर और स्वास्थ्य के लिए है फायदेमंद है ?

जानें चुकंदर कैसे पोषक तत्वों से भरपूर और स्वास्थ्य के लिए है फायदेमंद है ?

चुकंदर में बहुत सारे न्यूट्रिशनल गुण पाए जाते है , जो की स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होते है। चुकंदर का वैज्ञानिक नाम वल्गेरिस है। चुकंदर एक जड़ वाली सब्जी होती है , इसका उत्पादन बहुत से देशो में किया जाता है। चुकंदर में उपस्तिथ एक्टिव कंपाउंड स्वास्थ्य को लाभ प्रदान करते है , इसी कारन इसे फंक्शनल फ़ूड भी कहा  जाता है। बहुत से लोगो द्वारा इसे कच्चा खाया जाता है , सलाद और अन्य सब्जियों में भी इसका प्रयोग किया जाता है।  

हृदय रोगो में है लाभकारी 

चुकंदर हृदय से जुड़े रोगो के लिए लाभकारी है। हाइपरटेंशन बीमारी की वजह से रक्त वाहिकाएँ प्रभावित होती है ,जिससे दिल के दोहरे पड़ने और साँस रुकने की समस्या बढ़ जाती है। चुकंदर शरीर के अंदर रक्त के प्रवाह को बनाये रखती है , साथ ही ब्लड प्रेशर और कैलेस्ट्रोल की समस्याओ को भी दूर करती है। हृदय रोगो से जुडी कोई भी समस्या के लिए, चुकंदर का उपयोग डॉक्टर की परामर्श लेकर करें। 

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दिमाग को स्वस्थ बनाये रखता है 

शरीर में अच्छे से ब्लड सर्कुलेट ना होने की वजह से बहुत से परेशानिया हो सकती है जैसे : अच्छे से कोई चीज याद न रहना ,तर्क बिगड़ना और अन्य कई परेशानिया हो सकती है। चुकंदर खाने से शरीर में ब्लड सर्कुलेशन अच्छा बना रहता है। दिमाग में ब्लड सर्कुलेशन अच्छे से न होने की वजह से लोगो में ब्रेन डैमेज की समस्या भी उत्पन्न हो जाती है। दिमाग से जुडी समस्याओ में राहत पाने के लिए लोगो द्वारा चुकंदर के जूस या चुकंदर को साबुत भी खाया जा सकता है। 

इंफ्लेमेशन जैसी समस्याओ में है लाभकारी 

चुकंदर इन्फ्लेमेशन जैसी समस्याओ में भी सहायक रहता है ,यह सूजन साथ ही इन्फेक्शन जैसी समस्याओ में राहत देती है। इन्फ्लेमेशन के प्रभाव से इससे प्रभावित जगह लाल पड जाती है और दर्द होना शुरू हो जाता है। यदि शरीर में कही  भी सूजन हो तो उससे राहत पाने के लिए चुकंदर का उपयोग किया जा सकता है। यदि आप पहले से इस बीमारी से सम्बंधित कोई दवा ले रहे है , तो चुकंदर का उपयोग डॉक्टर के परामर्श द्वारा ही करें। 

थकावट को दूर करने में उपयोगी 

चुकंदर का उपयोग थकावट को दूर करने के लिए भी किया जाता है। शरीर में होने वाले दर्द या स्ट्रेस को दूर करने के लिए लोगो द्वारा चुकंदर का सेवन किया जाता है। शरीर में थकावट होना, ज्यादा व्यायाम करने की वजह से शरीर में होने वाला दर्द, इन्फेक्शन या गर्मियों में शरीर में पानी की कमी से आने वाली कमजोरी, को भी कम करता है। चुकंदर में  एंटीऑक्सीडेंट गुण पाए जाते है, जो वाहिकाओं में स्ट्रेस की वजह से आने वाली परेशानियों को कम करता है।  

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कैंसर जैसे रोग में है सहायक 

चुकंदर में एंटीऑक्सीडेंट गुण पाए जाते है, जो की कैंसर जैसी बीमारियों में राहत देते है। चुकंदर में उपस्तिथ गुण कैंसर के विकास की रोकथाम करने में सहायक होते है। कैंसर के रोगियों में अनिद्रा, थकान और कई गंम्भीर समस्याएँ देखने को मिलती है। स्वास्थ्य को बढ़ावा देने वाले कार्यात्मक भोजन के लिए चुकंदर का प्रयोग किया जाता है। चुकंदर में मौजूद पोषक तत्व कैंसर के रोगियों को लाभ प्रदान करते है, और स्वास्थ से जुडी  परेशानियों को भी कम करते है। 

खून की कमी को दूर करता है 

जिन व्यक्तियों के अंदर खून की कमी होती है, उन्हें चुकंदर खाने की सलाह दी जाती है। चुकंदर के अंदर भरपूर मात्रा में आयरन पाया जाता है, जो की शरीर के अंदर खून की कमी को पूरा करने में सहायक रहता  है। चुकंदर अनीमिया की बीमारी में भी राहत प्रदान करता है। शरीर के अंदर खून की कमी को पूरा करने के लिए चुकंदर का उपयोग किया जाता है। चुकंदर को कच्चा भी  खाया जा सकता है, इसका उपयोग सब्जी में, सलाद में या फिर जूस के रूप में भी किया जा सकता है।

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पाचन शक्ति को बढ़ाने में सहायक होता है 

चुकंदर को रोजाना सुबह खाली पेट खाने से पाचन किर्या स्वस्थ बनी रहती है। चुकंदर का उपयोग खाने के वक्त सलाद के रूप में भी कर सकते है। चुकंदर में भरपूर मात्रा में फाइबर पाया जाता है ,जो पाचन सम्बन्धी किर्यो में सहायक रहता है। रोजाना चुकंदर का सेवन करने से पेट में कब्ज और गैस जैसी समस्याओ में राहत मिलती है। पाचन किर्या को स्वस्थ बनाये रखने के लिए रोजाना चुकंदर के जूस का सेवन करना लाभकारी माना जाता है।

त्वचा के निखार के लिए है फायदेमंद 

चुकंदर का उपयोग त्वचा के निखार के लिए फायदेमंद होता है। चुकंदर के रस का उपयोग चेहरे पर रोजाना करने से , होने वाले कील और मुहासे में फायदा होता है। चुकंदर में भरपूर मात्रा में फोलेट और फाइबर पाया जाता है , जो त्वचा के निखार के लिए बेहद उपयोगी माना जाता है।  चुकंदर को डाइट का हिस्सा भी बनाया जा सकता है। 

चुकंदर में बहुत से पोषक तत्व पाए जाते है ,जो स्वास्थ के लिए बेहद लाभकारी होते है। चुकंदर का उपयोग मेमोरी पावर को भी बढ़ाने के लिए किया जाता है। साथ ही चुकंदर में कार्बोहायड्रेट भी पाया जाता है , जो शरीर के अंदर एनर्जी लेवल को बढ़ाने में सहायक होता है। इसके साथ ही दिल से जुडी समस्याओ को कम करने के लिए भी चुकंदर का उपयोग किया जाता है, चुकंदर में मौजूद नाइट्रेट खून के दवाब को कम करने में उपयोगी होता है।  

बिहार के इस किसान ने मधु उत्पादन से शानदार कमाई कर ड़ाली है

बिहार के इस किसान ने मधु उत्पादन से शानदार कमाई कर ड़ाली है

बिहार राज्य के मुजफ्फरपुर जनपद के मूल निवासी किसान आत्मानंद सिंह मधुमक्खी पालन के जरिए वार्षिक लाखों रुपये का मुनाफा उठा रहे हैं। उन्होंंने बताया कि मधुमक्खी पालन उनका खानदानी पेशा है। उनके दादा ने इस व्यवसाय की नीम रखी थी, जिसके पश्चात उनके पिता ने इस व्यवसाय में प्रवेश किया और आज वह इस व्यवसाय को काफी सफल तरीके से चला रहे हैं।

कुछ ही दिन पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री अर्जुन मुंडा ने देश के किसानों को खेती के नए तरीके सीखने की सलाह दी थी। उन्होंने कहा था कि खेती में कुछ नया करके किसान अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। उनकी यह बात बिहार के एक किसान पर पूर्णतय सटीक बैठती है। उन्होंने फसलों की अपेक्षा मधुमक्खी पालन को आमदनी का जरिया बनाया और आज वे वार्षिक लाखों का मुनाफा अर्जित कर रहे हैं। दरअसल, हम बात कर रहे हैं, बिहार के किसान आत्मानंद सिंह की जो कि मुजफ्फरपुर जनपद के गौशाली गांव के निवासी हैं। वह एक मधुमक्खी पालक हैं और इसी के माध्यम से अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं। अगर शिक्षा की बात करें तो उन्होंने स्नातक तक पढ़ाई की है। 

मधु उत्पादक किसान आत्मानंद के पास मधुमक्खी के कितने बक्से हैं ?

उन्होंने बताया कि मधु उत्पादन के क्षेत्र में अपने काम और योगदान के लिए उन्हें बहुत सारे पुरस्कार भी हांसिल हो चुके हैं। उन्होंने बताया कि वैसे तो वार्षिक उनके पास 1200 बक्से तक हो जाते हैं। परंतु, वर्तमान में उनके पास 900 ही बक्से हैं। उन्होंने बताया कि इस बार मानसून और मौसम की बेरुखी के चलते मधुमक्खियों को भारी हानि हुई है। इस वजह से इस बार उनके पास केवल 900 डिब्बे ही बचे हैं। उन्होंने बताया कि मधुमक्खी पालन एक सीजनल व्यवसाय है, जिसमें मधुमक्खी के बक्सों की कीमत बढ़ती है। उन्होंने बताया कि मधुमक्खी पालन के इस व्यवसाय को चालू करने में किसी ने भी उनकी सहायता नहीं की। उन्होंने स्वयं ही इस व्यवसाय को खड़ा किया और आज बड़े पैमाने पर मधुमक्खी पालन कर रहे हैं।

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किसान आत्मानंद वार्षिक कितना मुनाफा कमा रहा है 

उन्होंने बताया कि मधुमक्खी पालन की वार्षिक लागत बहुत सारी चीजों पर निर्भर करती है। वैसे तो इसमें वन टाइम इन्वेस्टमेंट होती है, जो शुरुआती वक्त में मधुमक्खियों के बॉक्स पर आती है। इसके अतिरिक्त लागत में मेंटेनेंस और लेबर कॉस्ट भी शम्मिलित होती है। उन्होंने बताया कि ये सब बाजार पर निर्भर करता है। मधुमक्खियों के बॉक्स की कीमत सीजन के अनुरूप बढ़ती घटती रहती हैं। इसी प्रकार वर्षभर विभिन्न तरह की चीजों को मिलाकर उनकी लागत 15 लाख रुपये तक पहुँच जाती है। वहीं, उनकी वार्षिक आमदनी 40 लाख रुपये के करीब है, जिससे उन्हें 10-15 लाख रुपये तक का मुनाफा प्राप्त हो जाता है।

मधुमक्खी पालन को बनाएं आय का स्थायी स्रोत : बी-फार्मिंग की सम्पूर्ण जानकारी और सरकारी योजनाएं

मधुमक्खी पालन को बनाएं आय का स्थायी स्रोत : बी-फार्मिंग की सम्पूर्ण जानकारी और सरकारी योजनाएं

जब भी हम कभी मधुमक्खी(मधुमक्षी / Madhumakkhi / Honeybee) का नाम सुनते हैं तो हमारे मन में मधु या शहद(अंग्रेज़ी:Honey हनी) का ख्याल जरूर आता है, जैसे की लोकप्रिय वैज्ञानिक आइंस्टीन ने कहा था- "यदि पृथ्वी से मधुमक्खियां खत्म हो जाएगी तो अगले 3 से 4 वर्षों में मानव प्रजाति भी खत्म हो जाएगी " इसी मंशा को ध्यान में रखते हुए मधुमक्खी पालन करने वाले किसानों की आय में बढ़ोतरी और प्रजाति के संरक्षण के लिए कृषि और पशु वैज्ञानिक निरंतर मधुमक्खी पालन से जुड़ी नई तकनीकों का विकास कर रहे हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2021 (Economic survey 2021-22) के अनुसार भारत में शहद का मार्केट लगभग 21 बिलियन रुपए का है, जो कि 2027 तक 40 बिलियन रुपए होने का अनुमान है। इतने बड़े वैल्यू मार्केट को सही समय पर सही तकनीक का फायदा पहुंचाने के लिए सरकार भी प्रयासरत है।

क्या होता है मधुमक्खी पालन (Bee-Farming) :

भारत के प्राचीन कालीन इतिहास से ही कई जनजातियां एवं जंगलों में रहने वाले किसानों के द्वारा मधुमक्खी पालन किया जा रहा है, हाल ही में शहद की बढ़ती डिमांड की वजह से इस क्षेत्र में कई युवा किसानों की रुचि भी बढ़ी है। मधुमक्खी पालन को 'एपीकल्चर' (Apiculture) के नाम से भी जाना जाता है। वर्तमान में आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर मधुमक्खियों के लिए अलग-अलग डिजाइन के छत्ते (honeycomb / beehive; बीहाइव )  तैयार किए जा रहे हैं और इन्हीं कॉम्ब में मधुमक्खियों को रखा जाता है, जो आस पास में ही स्थित फूलों से शहद इकट्ठा कर छत्ते में जमा करती है, जिसे बाद में एकत्रित कर बाजार में बेचा जाता है।

मधुमक्खी पालन से होने वाले फायदे :

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के अनुसार मधुमक्खी पालन से ना केवल किसानों की आय बढ़ेगी, बल्कि इस मधुमक्खी पालन वाले स्थान के आसपास स्थित खेत में मक्खियों के द्वारा परागण या पोलिनेशन (Pollination) करने की वजह से खेत से उगायी गयी फसल की उपज भी अधिक प्राप्त होती है।

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मधुमक्खी पालन से प्राप्त होने वाले उत्पाद :

मुख्यतः मधुमक्खी पालन शहद प्राप्त करने के लिए ही किया जाता है, मधुमक्खियों से प्राप्त होने वाले प्राकृतिक शहद में कई प्रकार की औषधीय गुण होते हैं और इसे मानवीय शरीर में होने वाली कई प्रकार की बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल किया जाता है। मधुमक्खी पालन से प्राप्त होने वाले अन्य उत्पाद :

  • मधुमक्खी वैक्स (मोम; Beeswax ) :

आपने अपने घर में कई बार मोमबत्ती का इस्तेमाल किया होगा, यह मोमबत्ती मधुमक्खी पालन से ही प्राप्त एक उत्पाद होता है। वर्तमान में बढ़ती मोम की डिमांड भी किसानों को अच्छा मुनाफा दे रही है।

इसके अलावा इस वैक्स का इस्तेमाल कई प्रकार के फार्मास्यूटिकल और कॉस्मेटिक व्यवसाय में भी किया जाता है।

  • मधुमक्खी जहर (Bee-Venom) :

जब मधुमक्खियां अपनी सुरक्षा के लिए डंक मारती है, तो उनके शरीर में पाया जाने वाला वेनम (venom) यानि जहर हमारे शरीर में चला जाता है, जिससे सूजन और मांसपेशियों में दर्द होता है।

आधुनिक तकनीक की मदद से अब इस इस वेनम को भी मधुमक्खियों से प्राप्त किया जा रहा है, इसका इस्तेमाल आर्थराइटिस यानी गठिया (arthritis) जैसी खतरनाक बीमारी के इलाज में किया जाता है और जोड़ों में होने वाले दर्द के लिए होने वाली एपिथेरेपी (Apitherapy) में भी इस उत्पाद का इस्तेमाल किया जाता है।

  • रॉयल जेली (Royal Jelly) :

मधुमक्खी पालन से ही प्राप्त होने वाला यह उत्पाद स्वास्थ्य के लिए काफी लाभप्रद होता है और इससे बनने वाली दवाइयों का इस्तेमाल फर्टिलिटी (Fertility) से जुड़े रोगों के इलाज के लिए किया जाता है।

सुपरफूड के रूप में इस्तेमाल किया जाने वाला यह उत्पाद कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के द्वारा खरीदा जा रहा है।

भारत में आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु क्षेत्र के कई किसान रॉयल जैली को बेचकर अच्छा खासा मुनाफा कमा रहे हैं।

  • मधुमक्खी के द्वारा तैयार किया गया छत्ता गोंद (Propolis) :

इसे मधुमक्खियों के घर के रूप में जाना जाता है। हरियाणा और पंजाब के कुछ आधुनिक किसानों के लिए मधुमक्खी का छत्ता भी आय का अच्छा स्रोत बन कर सामने आया है। इसका इस्तेमाल गोंद बनाने में किया जाता है, जिससे कई बीमारियों का इलाज किया जाता है।

ऊपर बताए गए इन सभी उत्पादों के अलावा भी मधुमक्खियों से कई दूसरे प्रकार के उत्पाद प्राप्त होते हैं, जोकि मधुमक्खियों के संरक्षण में किए जा रहे प्रयासों की सुदृढ़ता तो बढ़ाते ही है, साथ ही लोगों के लिए रोजगार उपलब्ध करवाने के अलावा किसानी परिवार को भी मदद प्रदान करते हैं।

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बड़ी ब्रांड की कंपनियों का शहद वर्तमान में पन्द्रह सौ रुपए प्रति किलो की दर से बिकता है और इसकी मांग भविष्य में और तेजी से बढ़ने की संभावनाएं हैं, इसीलिए समुचित विकास को ध्यान में रखते हुए किसान भाई भी नीचे बताए गए तरीके से मधुमक्खी पालन कर सकते हैं :

कैसे करें मधुमक्खी की प्रजाति का चयन ?

अलग-अलग पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुसार मधुमक्खी की अलग-अलग प्रजातियों का पालन किया जाता है, ऐसी ही कुछ प्रजातियां निम्न प्रकार है :-

  • यूरोपियन मधुमक्खी (European Bees) :

इस प्रकार के मधुमक्खी को पालने पर एक कॉलोनी से लगभग 25 से 30 किलोग्राम शहद इकट्ठा किया जा सकता है।

यह मधुमक्खी मुख्यतः पतझड़ मौसम के समय ज्यादा उत्पादन देती है।

  • भारतीय मधुमक्खी (Indian or Asian Bees ) :

मधुमक्खी पालन की शुरुआत करने वाले व्यक्ति ज्यादातर इसी मधुमक्खी को पालते हैं।

हालांकि इस प्रजाति की एक कॉलोनी में 6 से 8 किलोग्राम शहद ही प्राप्त किया जा सकता है, लेकिन इसका पालन करना आर्थिक रूप से कम दबाव वाला होता है।

  • स्टिंग्लेस मधुमक्खी (Stingless Bees) :

कम प्रति व्यक्ति आय वाले किसान भाई दवाइयां बनाने में इस्तेमाल आने वाले शहद और छत्ते के उत्पादन के लिए इस मधुमक्खी का पालन करते हैं।

यह मधुमक्खी एक बेहतरीन पोलिनेटर के रूप में भी काम करती है और इसके छत्ते के आसपास उगने वाले पेड़ पौधों और फसलों को फायदा पहुंचाती है।

इसके अलावा मधुमक्खियों की एक कॉलोनी में रहने वाली सभी मक्खियों को अलग-अलग श्रेणी में बांटा गया है, जिनमें रानी मधुमक्खी, ड्रोन मधुमक्खी और वर्कर मधुमक्खी को शामिल किया जाता है। रानी मधुमक्खी अंडे देती है और ज्यादातर समय कॉम्ब के अंदर ही बिताती है, जबकि ड्रोन मधुमक्खी रानी के साथ मेटिंग करने का काम करते हैं। इसके अलावा वर्कर श्रेणी की मधुमक्खियां छाते से बाहर निकल कर फूलों के मधुरस या नेक्टर (Nectar) से शहद का निर्माण करती हैं।

कैसे चुनें मधुमक्खी पालन के लिए सही जगह ?

मधुमक्खी पालन के लिए जगह चुनने से पहले ध्यान रखना चाहिए कि इनके कृत्रिम छत्तों को उसी स्थान पर लगाएं जहां पर पानी का कोई अच्छा स्रोत उपलब्ध हो, जैसे मानव निर्मित तालाब या नदी और झील का तटीय क्षेत्र। इसके अलावा छत्ते के आसपास के क्षेत्र में पर्याप्त मात्रा में वनस्पति होनी चाहिए, जिनमें सूर्यमुखी, मोरिंगा और कई दूसरे प्रकार के फूलों के पौधे हो सकते हैं। जगह को चुनने के बाद उसमें कृत्रिम छत्ते लगाने के उपरांत तुरंत इस जगह को बाहर से आने वाले लोगों के लिए पूरी तरीके से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। मधुमक्खी विकास क्षेत्र में काम कर रहे वैज्ञानिकों के अनुसार किसी सड़क और ध्वनि प्रदूषण वाले क्षेत्रों से मधुमक्खी के छत्तों को हमेशा दूर ही लगाना चाहिए, क्योंकि निरंतर ध्वनि प्रदूषण वर्कर मधुमक्खी की शहद एकत्रित करने की क्षमता को कम करने के अलावा कई प्रकार की बीमारियों के लिए भी जिम्मेदार हो सकता है।

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कैसे करें मधुमक्खी के छत्ते का चुनाव और क्या हो पूरी प्रक्रिया ?

मधुमक्खी पालन के लिए सबसे पहले मधुमक्खी के कृत्रिम छत्ते की आवश्यकता होती है। इस छत्ते का आकार और डिज़ाइन आपके निवेश और बिजनेस की अवधी पर निर्भर कर सकता है। एक एकड़ के क्षेत्र में लगभग 3 से 4 मधुमक्खी के बड़े छत्ते लगाए जा सकते हैं। इन छत्तों को समय पर निरंतर निगरानी करने के लिए और सुरक्षा के लिए एक बॉक्स की आवश्यकता होती है। इस प्रकार के बॉक्स में फ्लोर और बॉटम बोर्ड के अलावा लकड़ी के बने हुए फ्रेम होते है, जो कि एक सुपर चेंबर की तरह कार्य करते हैं। यह बॉक्स ऊपर और नीचे से ढका रहता है, जिसमें मधुमक्खियों के जाने के लिए जगह बनाई रहती है। बड़े स्तर पर व्यवसाय करने के लिए कई दूसरे प्रकार के उपकरण जैसे कि क्वीन गेट, हाउस टूल और शुगर फिटर के अतिरिक्त एक स्मोकर की आवश्यकता होती है। मधुमक्खी के छत्ते/बॉक्स को हमेशा पीले और हल्के हरे रंग से ही रंग किया चाहिए, जिससे मधुमक्खियों को जगह का आसानी से पता चल जाए, कभी भी मधुमक्खी के छत्ते को लाल या काले रंग से नहीं रँगना चाहिए। अब इस बॉक्स रूपी छत्ते में बाहर से लाकर मधुमक्खियों को डाल दिया जाता है। भारतीय मधुमक्खियां खासतौर पर पहले से तैयार किए हुए घर में रहना पसंद करती हैं, हालांकि यूरोपीयन मधुमक्खियां कई बार इस तरह तैयार छत्तों को छोड़कर आसपास में ही अपना खुद का छत्ता भी बना लेती हैं।

मधुमक्खी पालन में आने वाली समस्याएं और लगने वाले रोग :

वैसे तो मधुमक्खियां खुद ही एक बेहतरीन पोलिनेटर के रूप में कार्य करती हैं, इसलिए इनमें ज्यादा बीमारियां नहीं होती है, लेकिन बदलते पर्यावरणीय प्रभाव और कीटनाशकों के अधिक प्रयोग से फूलों में पहुंचे दूषित और केमिकल तत्व मधुमक्खियों के शरीर में चले जाते हैं, जो कि उनके लिए नुकसानदायक हो सकते हैं।

  • वरोआ माइट (Varroa mites) :

यह कीट पिछले कई सालों से मधुमक्खी की कॉलोनियों को नुकसान पहुंचाने में सबसे बड़ी भूमिका निभा रहा है। यह बड़ी से बड़ी मधुमक्खियों को भी नुकसान पहुंचा सकता है।

मुख्यतः यह लार्वा और प्यूपा की मदद से प्रजनन करते हैं और धीरे-धीरे मधुमक्खियों के छत्ते तक अपनी पहुंच बना लेते हैं।

इससे ग्रसित हुई मधुमक्खियां के पंख धीरे-धीरे टूटने लगते हैं और उनके शरीर के कई अंगों को नुकसान होना शुरू हो जाता है।

हॉर्टिकल्चर क्षेत्र से जुड़े वैज्ञानिकों के अनुसार इस रोग के इलाज के लिए एपिवरोल टेबलेट (Apiwarol tablet) का इस्तेमाल किया जा सकता है, जिसे पानी में मिलाकर मधुमक्खी के छाते के ऊपर तीन दिन के अंतराल में चार से पांच बार स्प्रे करना रहता है।

  • होर्नेट कीट (Hornet pest) :

मधुमक्खी पालन के दौरान यह कीट सबसे ज्यादा हानिकारक होता है और यह मधुमक्खी की पूरी कॉलोनी पर ही आक्रमण कर देता है और उन्हें पूरी तरीके से कमजोर बना देता है और धीरे-धीरे मधुमक्खियों को मारते हुए उसके छत्ते पर ही अपना कब्जा कर लेता है।

इस प्रकार की कीट से बचने का सर्वश्रेष्ठ उपाय यह है कि उस पूरे छत्ते को ही नष्ट कर देना चाहिए, जिससे कि यह आसपास में ही स्थित दूसरे छत्तों में ना फैले।

हालांकि इसके अलावा भारतीय मधुमक्खी की प्रजाति में कई दूसरी प्रकार की माइक्रोबियल बीमारियां भी होती है, जोकि बैक्टीरिया के अधिक वृद्धि के कारण होती है। इसके इलाज के लिए एंटीमाइक्रोबॉयल टेबलेट का एक घोल बनाकर उसे कॉलोनी के आसपास के क्षेत्र में समय समय पर स्प्रे करना चाहिए।

कैसे करें मधुमक्खी की कॉलोनी का अच्छे से प्रबंधन ?

जब भी किसी फूल के पौधे से नेक्टर निकलने का समय होता है उस समय तो मधुमक्खियां अपने आप जाकर खाने की व्यवस्था कर लेती है, लेकिन बारिश और ऑक्सीजन के दौरान इनके भोजन के लिए 20 से 25 किलोग्राम शुगर की आवश्यकता होती है। मधुमक्खी पालन के दौरान किसान भाइयों को ध्यान रखना होगा कि किसी भी प्रजाति को भूखा नहीं रखना चाहिए और शुगर तथा पोलन सप्लीमेंट को मिलाकर एक पेस्ट तैयार करके इसमें प्रोटीन के कुछ मात्रा के लिए सोयाबीन का आटा मिला सकते हैं। इस तैयार पेस्ट को मधुमक्खियों की कॉलोनी के बाहर रख देना चाहिए, जिसे समय मिलने पर कॉलोनी के सभी सदस्य अपने आप भोजन के रूप में इस्तेमाल कर लेंगे।

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मधुमक्खी पालन बढ़ाने के लिए किए गए सरकारी प्रयास :

मधुमक्खी पालन व्यवसाय की भविष्यकारी सम्भावनाओं को समझते हुए भारत सरकार और कई स्थानीय राज्य सरकारें लोगों को मधुमक्खी पालन के लिए प्रोत्साहित कर रही है। पिछले कुछ समय से भारत सरकार ने 'स्वीटरिवॉल्यूशन' यानी 'मधु क्रांति'(Madhukranti) नाम का पायलट प्रोजेक्ट भी शुरू किया है, जो मुख्यतः मधुमक्खी उत्पादन व्यवसाय में सक्रिय लोगों को नई तकनीकों के बारे में जानकारी देने के अलावा उन्हें बेहतर उत्पादन के लिए अच्छी ट्रेनिंग की सुविधा भी उपलब्ध करवाता है। इसके अलावा राष्ट्रीय मधुमक्खी बोर्ड(National Bee Board - NBB) के द्वारा लांच किये गए राष्ट्रीय मधुमक्खीपालन और मधु मिशन(नेशनल बीकीपिंग एंड हनी मिशन; National Beekeeping and Honey Mission - NBHM) की मदद से भारत सरकार मधुमक्खी से प्राप्त होने वाले उत्पाद की गुणवत्ता की बेहतर जांच के लिए स्रोत उपलब्ध करवाने के साथ ही किसानों की आय बढ़ाने को मुख्य लक्ष्य के रूप में रखा गया है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में शहद के निर्यात में भारत की भागीदारी बढ़ाने के लिए किए जा रहे प्रयासों के तहत 'हनीकॉर्नर' नाम का एक मार्केटिंग टूल भी तैयार किया गया है। "मधुक्रांति पोर्टल" व "हनी कॉर्नर" सहित शहद परियोजनाओं का शुभारंभ कार्यक्रम से सम्बंधित सरकारी प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) रिलीज़ का दस्तावेज पढ़ने या पीडीऍफ़ डाउनलोड के लिए, यहां क्लिक करें आत्मनिर्भर भारत स्कीम के तर्ज पर काम करते हुए भारत सरकार मधु क्रांति के लिए साल 2017 से लगातार सब्सिडी उपलब्ध करवा रही है, इस प्रकार के नई सरकारी योजनाओं की अधिक जानकारी के लिए आप अपने राज्य सरकार के कृषि और बागवानी मंत्रालय की वेबसाइट पर जाकर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। शहदमिशन के अंतर्गत खादीऔरग्रामोद्योगआयोग (KVIC) किसानों को मधुमक्खी पालन के लिए जागरूकता के अलावा ट्रेनिंग और छत्ते के रूप में इस्तेमाल होने वाले 'बी-बॉक्स'(Beehive Box) उपलब्ध करवा रहा है। आशा करते हैं कि भविष्य में मधुमक्खी पालन के लिए प्रयासरत किसान भाइयों को MERIKHETI.COM के द्वारा इस व्यवसाय के बारे में संपूर्ण जानकारियां मिल गई होगी और भविष्य में आप भी सरकारी स्कीमों का बेहतर इस्तेमाल करते हुए समुचित विकास की अवधारणा पर चलकर भारत के निर्यात को बढ़ाने के अलावा स्वयं की आर्थिक स्थिति को भी मजबूत कर पाएंगे।

मधुमक्खी पालन को 500 करोड़ देगी सरकार

मधुमक्खी पालन को 500 करोड़ देगी सरकार

आत्मनिर्भर अभियान के तहत सरकार ने मधुमक्खी पालन के लिए 500 करोड़ रुपये का आवंटन किया है।भारत विश्‍व के पांच शीर्ष शहद उत्‍पादकों में शुमार है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेन्‍द्र सिंह तोमर ने कहा कि किसानों की आय दुगनी करने के अपने लक्ष्‍य के तहत सरकार मधुमक्खी पालन को बढ़ावा दे रही है। 

राष्‍ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) द्वारा आयोजित वेबिनार को सम्‍बोधित करते हुए श्री तोमर ने कहा कि सरकार ने आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत मधुमक्खी पालन के लिए 500 करोड़ रुपये का आवंटन किया है। उन्‍होंने कहा कि भारत विश्व में शहद के 5 सबसे बड़े उत्पादकों में शुमार है। भारत में वर्ष 2005-06 की तुलना में अब शहद उत्पादन 242 प्रतिशत बढ़ गया है, वहीं इसके निर्यात में 265 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 

 श्री तोमर ने कहा कि बढ़ता शहद निर्यात इस बात का प्रमाण है कि मधुमक्‍खी पालन 2024 तक किसानों की आय को दोगुना करने का लक्ष्‍य हासिल करने की दिशा में महत्‍वपूर्ण कारक रहेगा। उन्‍होंने कहा कि राष्‍ट्रीय मधुमक्‍खी बोर्ड ने राष्‍ट्रीय मधुमक्‍खी पालन एवं मधु मिशन (एनबीएचएम) के लिए मधुमक्खी पालन के प्रशिक्षण के लिए चार माड्यूल बनाए गए हैं, जिनके माध्यम से देश में 30 लाख किसानों को प्रशिक्षण दिया गया है। इन्हें सरकार द्वारा वित्‍तीय सहायता भी उपलब्ध कराई जा रही है।  

 श्री तोमर ने बताया कि सरकार मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देने के लिए गठित की गई समिति  की सिफारिशों का कार्यान्‍वयन कर रही है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी के मार्गदर्शन में सरकार ने  मीठी क्रांति के तहत हनी मिशन की भी घोषणा की है, जिसके चार भाग है, इसका भी काफी लाभ मिलेगा। मधुमक्खी पालन का काम गरीब व्यक्ति भी कम पूंजी में अधिक मुनाफा प्राप्त करने के लिए कर सकता है। इसीलिए, इसे बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री जी द्वारा 500 करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की गई है। इससे मधुमक्खी पालकों के साथ ही किसानों की भी दशा और दिशा सुधारने में मदद मिलेगी।

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 वेबिनार में उत्तराखंड के सहकारिता मंत्री डॉ. धनसिंह रावत ने उत्तराखंड को जैविक शहद उत्पादन की मुख्यधारा में लाने के राज्‍य सरकार के संकल्प पर प्रकाश डाला। उन्होंने हनी मिशन में संशोधन लाने की आवश्यकता का उल्लेख किया। एनसीडीसी के प्रबंध निदेशक  श्री सुदीप कुमार नायक ने महिला समूहों को बढ़ावा देने और एपिकल्चर सहकारी समितियों के विकास में एनसीडीसी की भूमिका पर प्रकाश डाला। शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर साइंस एंड टेक्नोलॉजी के वाइस चांसलर प्रो. नजीर अहमद ने कश्मीर में शहद की अनूठी विशेषताओं के बारे में जानकारी दी। यूएनएफएओ  के प्रतिनिधि श्री तोमियो शिचिरी ने शहद के निर्यात में गुणवत्ता आश्वासन के महत्व पर चर्चा की।

 पश्चिम बंगाल के अपर मुख्य सचिव डॉ. एम.वी. राव ने महिला समूहों द्वारा जैविक शहद व जंगली शहद के उत्पादन, ब्रांडिंग और विपणन को बढ़ावा देने के लिए अपनी सरकार के कदमों के बारे में बताया। बागवानी आयुक्त डॉ. बी.एन.एस. मूर्ति ने नए मिशन में नवाचारों पर प्रकाश डाला। मध्य प्रदेश, कश्मीर, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, बिहार, केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश व झारखंड के सफल मधुमक्खी पालकों और उद्यमियों ने अपने अनुभवों को साझा किया और मीठी क्रांति लाने के लिए आगे के तरीके सुझाए। ‘

’मीठी क्रांति और आत्मनिर्भर भारत’’  विषय पर राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) ने यह वेबिनार राष्‍ट्रीय मधुमक्‍खी बोर्ड, पश्चिम बंगाल सरकार, उत्तराखंड सरकार और शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कश्मीर के साथ मिलकर आयोजित किया था।  इस आयोजन का उद्देश्य कृषि आय और कृषि उत्पादन बढ़ाने के साधन के रूप में भूमिहीन ग्रामीण गरीब, छोटे और सीमांत लोगों के लिए आजीविका के स्रोत के रूप में वैज्ञानिक मधुमक्खी पालन को लोकप्रिय बनाना है।

मधुमक्खी पालन कारोबार को संबल देगी हरियाणा सरकार की नई योजना

मधुमक्खी पालन कारोबार को संबल देगी हरियाणा सरकार की नई योजना

हरियाणा में बेहतर गुणवत्ता के शहद के उत्पादन एवं व्यापार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने मधुमक्खी पालकों के लिए ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ आर्थिक पैकेज के तहत 32.28 करोड़ रुपये की विभिन्न आधारभूत संरचना विकास परियोजनाएं और प्रशिक्षण कार्यक्रम 1. इनमें एकीकृत मधुमक्खी पालन विकास केंद्र, रामनगर, जिला कुरुक्षेत्र में 20 करोड़ रुपये की लागत से एक गुणवत्ता नियंत्रण परीक्षण प्रयोगशाला स्थापित करना शामिल है।  इसके अलावा, इस केन्द्र में संग्रहण, विपणन एवं भंडारण केन्द्रों, पोस्ट हारवेस्टिंग और मूल्य संवर्धन सुविधाओं की स्थापना के लिए40 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए हैं। अन्य घटकों जैसे कि मधुमक्खी छत्तों, मधुमक्खी कॉलोनियों, मधुमक्खी प्रजनकों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और अन्य राज्य कृषि विश्वविद्यालय परियोजनाओं पर 10.88 करोड़ रुपये खर्च करने का प्रस्ताव है। Bee Farming 2. कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव श्री संजीव कौशल ने आज यहां यह जानकारी देते हुए बताया कि प्रयोगशाला, जिसे मान्यता प्राप्त होगी, की स्थापना मधुमक्खी पालकों एवं शहद उत्पादकों को घरेलू उपभोग के साथ-साथ निर्यात के लिए बेहतर गुणवत्ता के शहद का उत्पादन करने में मदद करेगी। 3. यह प्रयोगशाला हरियाणा के अलावा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और उत्तराखंड सहित सभी उत्तरी राज्यों की आवश्यकता को भी पूरा करेगी जिनकी शहद उत्पादन में एक बड़ी हिस्सेदारी है।

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4. उन्होंने कहा कि एकीकृत मधुमक्खी पालन विकास केंद्र में पर्याप्त मानव शक्ति सहित अन्य सभी बुनियादी सुविधाएं पहले से ही उपलब्ध हैं। इस प्रयोगशाला के लिए विशेषज्ञों की भर्ती की जाएगी, जो किफायती दरों पर लगातार परीक्षण की मधुमक्खी पालकों और निर्यातकों की आवश्यकताओं को पूरा करेंगे। Bee Farming 5. उन्होंने कहा की हरियाणा सरकार शहद के व्यापार और नीलामी के लिए इस केन्द्र में एक हनी ट्रेड सेंटर स्थापित कर रही है।केंद्र में भंडारण सुविधा भी होगी, जहां मधुमक्खी पालक, उत्पादक, व्यापारी और निर्यातक लेन-देन कर सकेंगे। उन्होंने कहा कि इससे शहद उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा और उपभोक्ताओं को गुणवत्तापरक शहद उपलब्ध करवाया जा सकेगा। 6. यहां यह उल्लेखनीय होगा की राज्य सरकार ने ‘राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन एवं शहद मिशन’ नामक केंद्रीय योजना के क्रियान्वयन और कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव की अध्यक्षता में राज्य स्तरीय संचालन समिति के गठन को स्वीकृति प्रदान कर दी है। श्री कौशल ने कहा कि एकीकृत मधुमक्खी पालन विकास केंद्र राज्य में इस मिशन के लिए कार्यान्वयन एजेंसी होगा। 7. ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ के तहत केंद्र सरकार ने एकीकृत मधुमक्खी पालन विकास केंद्रों से संबंधित बुनियादी ढांचे के विकास और संग्रहण, विपणन एवं भंडारण केन्द्रों तथा पोस्ट हारवेस्टिंग एवं मूल्य संवर्धन सुविधाओं की स्थापना के लिए 500 करोड़ रुपये आबंटित किए हैं।
चुकंदर की खेती - Chukandar (Beet Root Farming information in Hindi)

चुकंदर की खेती - Chukandar (Beet Root Farming information in Hindi)

दोस्तों आज हम बात करेंगे चुकंदर की, इसको इंग्लिश में Beet Root भी कहते हैं। चुकंदर के एक नहीं बहुत सारे फायदे हैं, चुकंदर की खेती की पूरी जानकारी और उनसे होने वाले बेनिफिट्स के बारे में जानने के लिए हमारी इस पोस्ट के अंत तक जरूर बने रहें है। 

चुकंदर

चुकंदर एक ऐसा फल है जिसको लोग खाना बहुत पसंद करते हैं। लोग चुकंदर को सब्जियों के तौर पर पकाकर ,बिना पकाए ,कच्चा,आदि के रूप में खाना पसंद करते हैं। क्योंकि चुकंदर में विभिन्न विभिन्न प्रकार के औषधि गुण है जो शरीर को बहुत फायदा पहुंचाते हैं। चुकंदर का स्वाद थोड़ा मीठा होता है चुकंदर जमीन के अंदर पाए जाते हैं। लोग चुकंदर के फल के साथ ही साथ इनके पत्तों का भी इस्तेमाल करते हैं। सब्जी सलाद आदि के तौर पर, चुकंदर हमारे लिए इतना उपयोगी होता है कि कभी-कभी डॉक्टर विभिन्न प्रकार के रोग हो जाने पर चुकंदर खाने की सलाह देते हैं। जैसे: खून की कमी ,एनीमिया, कैंसर ,हृदय रोग, पित्ताशय विकारों, बवासीर, गुर्दे के विकारों जैसी समस्या को दूर करने के लिए डॉक्टर चुकंदर खाने की सलाह मरीजों को देते हैं। इन कारणों से चुकंदर की मांग बहुत बढ़ जाती है और किसान इस फसल से काफी अच्छा धन निर्यात कर लेते हैं। 

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चुकंदर की फसल की खेती

चुकंदर जैसी लाभदायक फसल की खेती करने के लिए किसान ज्यादातर बलुई दोमट मिट्टी का इस्तेमाल करते हैं। चुकंदर की खेती करते समय किसान जलभराव वाली समस्या से बचने का भी पूर्ण ध्यान रखते हैं। क्योंकि जलभराव वाली भूमि चुकंदर के फल को पूरी तरह से सड़ा सकती हैं और विभिन्न  प्रकार की समस्याओं को भी पैदा कर सकती है। खेती के लिए कम से कम भूमि का पीएच मान 6 से 7 के बीच का होना आवश्यक होता है। 

चुकंदर की खेती के लिए जलवायु तथा तापमान :

चुकंदर की फसल के लिए सबसे अच्छा मौसम ठंड का बताते हैं, क्योंकि ठंडी के मौसम में चुकंदर की फसल काफी अच्छी तरह से उत्पादन के साथ ही साथ, विकास भी भरपूर होता है। जो प्रदेश ठंडे होते हैं वहां चुकंदर की फसल को काफी उपयुक्त माना जाता है। चुकंदर एक ऐसी फसल है जिसके लिए बहुत ज्यादा बारिश की कोई आवश्यकता नहीं होती है।बारिश किसी भी प्रकार से चुकंदर की फसल को प्रभावित नहीं करती है। चुकंदर की फसल के लिए 20 डिग्री का तापमान इसकी फसल के लिए काफी होता है। सामान तापमान भी चुकंदर की फसल के लिए उपयुक्त समझा जाता है। 

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चुकंदर की फसल के लिए खेत को तैयार करना

सर्वप्रथम चुकंदर की फसल के लिए खेत को अच्छी तरह से तैयार करना आवश्यक होता है। चुकंदर की फसल को उगाने के लिए भूमि की अच्छी गहरी जुताई करनी चाहिए। जुताई के बाद खेतों को कुछ देर के लिए ऐसी ही खुला छोड़ना चाहिए। क्योंकि ऐसा करने से खेतों में भली प्रकार से धूप लग जाती है। चुकंदर की जड़े काफी गहराई में रहती है जिसके फलस्वरूप यह खनिज पदार्थों को ग्रहण करने की क्षमता नहीं रखते। उवर्रक की मात्रा अच्छे से देना जरूरी होता है खेत तैयार करते समय या खेतों के लिए उपयोगी माना जाता है। खेतों में किसान लगभग 14 से 15 गाड़ी पुरानी गोबर की खाद और कल्टीवेटर के जरिए, कम से कम दो से तीन बार तिरछी जुताई करते हैं जिससे मिट्टी में खाद अच्छे से भिन्न जाए।

 खेतों में पानी देने के बाद तीन से चार दिनों के लिए खेतों को ऐसे ही छोड़ देना आवश्यक होता है। जब मिट्टी पानी को अपने अंदर अवशोषित कर ले और ऊपरी सता सूखी नजर आने लगे तो रोटावेटर के जरिए जुताई कर लेनी चाहिए। खेतों को समतल करने के लिए पाटा लगाकर अच्छी तरह जुताई करें। इस प्रक्रिया से जमीन पूरी तरह से समतल हो जाती है और कोई भी जलभराव की समस्या नहीं पैदा होती।चुकंदर की फसलों के छिड़काव के लिए कुछ रसायनिक उर्वरकों का भी इस्तेमाल किया जाता है। जैसे : नाइट्रोजन 40 किलो पोटाश 60 किलो तथा 80 किलो पोटाश की मात्रा प्रति हेक्टेयर का इस्तेमाल जुताई के लिए किया जाता है, यह आखरी जुताई होती है।

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चुकंदर की बीजो की रोपाई, समय तथा तरीका

चुकंदर के लिए रोपाई का समय सबसे अच्छा ठंडी का होता है। बीज रोपण किसान अक्टूबर और नवंबर के महीने में करना शुरू कर देते हैं। बीज रोपण करने से पहले बीजो को अच्छी तरह से उपचारित कर लेना आवश्यक होता है। उपचारित करने से खेतों में किसी भी प्रकार का रोग नहीं लगता। अनुमान के हिसाब से एक हेक्टेयर खेत में लगभग 8 किलो बीजों की जरूरत पड़ती है। इन क्रियाओं के बाद बीज रोपण किया जाता है।

चुकंदर के पौधों की सिंचाई के तरीके

चुकंदर के पौधों की सिंचाई के लिए भूमि में नमी बरकरार रहना आवश्यक होता है। क्योंकि इससे पौधे बहुत अच्छी तरह से अंकुरित होते हैं। बीज रोपण के बाद सर्वप्रथम सिंचाई देनी चाहिए। जब बीज अंकुरित हो जाए ,तो आप खेतों में पानी की मात्रा को कम कर सकते हैं। चुकंदर के पौधों की सिंचाई लगभग 8 से10 दिनों के अंदर करते रहना चाहिए। दोस्तों हम उम्मीद करते हैं कि हमारा Chukandar (Beet Root) वाला आर्टिकल आपको काफी पसंद आया होगा। इस आर्टिकल में चुकंदर की पूर्ण जानकारी दी गई है। जो आपके भविष्य में काम आ सकती है यदि आप हमारी दी हुई जानकारी से संतुष्ट हुए हैं। तो हमारी इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा सोशल मीडिया और अन्य स्थानों और दोस्तों के साथ शेयर करें।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से किसानों को क्या है फायदा

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से किसानों को क्या है फायदा

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का मकसद है की जो भी किसान फसल नुकसान से जूझ रहे है, उन्हें आर्थिक मदद देकर उनका हौसला कायम रखे. किसानों को आधुनिक उपकरणों के इस्तमाल के लिए प्रेरित करना. इस योजना के प्रचार प्रसार के लिए छत्तीसगढ़ के कृषि और जल संसाधन मंत्री रविन्द्र चौबे ने फसल बीमा जागरूकता सप्ताह कि शुरुआत की. जागरूकता रथों को हरी झंडी दिखाकर 15 जुलाई तक किसानों को फसल बीमा योजना के बारे में बताने के लिए और ज्यादा से ज्यादा किसानों को इस बीमा योजना से जोड़ने के लिए रवाना किया गया है. 15 जुलाई तक जागरूकता रथ पूरे राज्य में भ्रमण कर किसानों को बीमा योजना से जुड़ने के लिए जागरूक करेगा. रविद्र चौबे जी के अनुसार 2021-22 में 1063 करोड़ बीमा दावा राशि का भुगतान राज्य के 5 लाख 66 हजार किसानों को मिला.

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किसानों को कितने प्रीमियम में कितना मिल चुका है लाभ ?

डेढ़ लाख किसानों को खरीफ सीजन शुरू होने से पहले उनके द्वारा दी गई प्रीमियम 15 करोड़ 96 लाख रुपए की एवज में 304 करोड़ 38 लाख की क्लेम राशि भुगतान की गई. 4 लाख से अधिक किसानों को 157 करोड़ 65 लाख रुपए के प्रीमियम के एवज में 758 करोड़ 43 लाख तक का क्लेम भुगतान किया गया.

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के लिए प्रीमियम कितना देना होगा ?

इस बीमा योजना में किसानों को बीमा प्रीमियम का सिर्फ डेढ प्रतिशत राशि देनी होती है. जबकि मौसम पर आधारित फसल जैसे की बागवानी फसलों के लिए 5 प्रतिशत प्रीमियम राशि का देना होता है और बाकी बचा हुआ सरकार देती है.

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के लिए आवेदन कैसे करें ?

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में आवेदन करने के लिए आपके पास दो तरीके है :- 1. ऑनलाइन आवेदन  ऑनलाइन आवेदन करने के लिए आपको pmfby.gov.in में जाकर ऑनलाइन फॉर्म भरना होगा. 2. ऑफलाइन आवेदन ऑफलाइन आवेदन करने के लिए आपको कृषि विभाग जाकर फॉर्म लेना होगा और वही भरकर देना होगा.

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के लिए जरूरी दस्तावेज

ऑनलाइन या ऑफलाइन आवेदन करने के लिए आपके पास बैंक खाता, खेत का खसरा नंबर, पहचान पत्र, राशन कार्ड, आधार कार्ड, आवेदनकर्ता की पासपोर्ट साइज फोटो, आवेदनकर्ता का निवास प्रमाण पत्र, यदि खेत किराए पर है तो मालिक के साथ इकरार नामा की कॉपी, फसल बुआई शुरू किए हुए दिन की तारीख, ये सारे दस्तावेज आपके पास होने आवश्यक है.  
घर पर करें बीजों का उपचार, सस्ती तकनीक से कमाएं अच्छा मुनाफा

घर पर करें बीजों का उपचार, सस्ती तकनीक से कमाएं अच्छा मुनाफा

एक किसान होने के नाते यह बात तो आप समझते ही हैं कि किसी भी प्रकार की फसल के उत्पादन के लिए सही बीज का चुनाव बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है और यदि बात करें सब्जी उत्पादन की तो इनमें तो बीज का महत्व सबसे ज्यादा होता है। स्वस्थ और उन्नत बीज ही अच्छी सब्जी का उत्पादन कर सकता है, इसीलिए कृषि वैज्ञानिकों के द्वारा आपको हमेशा सलाह दी जाती है कि बीज को बोने से पहले अनुशंसित कीटनाशी या जीवाणु नाशी बीज का ही इस्तेमाल करना चाहिए। इसके अलावा कृषि वैज्ञानिकों के द्वारा समय समय पर किसान भाइयों को बीज के उपचार की भी सलाह दी जाती है।


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आज हम आपको बताएंगे ऐसे ही कुछ बीज-उपचार करने के तरीके, जिनकी मदद से आप घर पर ही अपने साधारण से बीज को कई रसायनिक पदार्थों से तैयार होने वाले लैब के बीज से भी अच्छा बना सकते है। बीज उपचार करने का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि इसे स्टोर करना काफी आसान हो जाता है और सस्ता होने के साथ ही कई मृदा जनित रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है। यह बात तो किसान भाई जानते ही होंगे कि फसलों में मुख्यतः दो प्रकार के बीज जनित रोग होते है, जिनमें कुछ रोग अंतः जनित होते हैं, जबकि कुछ बीज बाह्य जनित होते है।अंतः जनित रोगों में आलू में लगने वाला अल्टरनेरिया और प्याज में लगने वाली अंगमारी जैसी बीमारियों को गिना जा सकता है। बीज उपचार करने की भौतिक विधियां प्राचीन काल से ही काफी प्रचलित है। इसकी एक साधारण सी विधि यह होती है कि बीज को सूर्य की धूप में गर्म करना चाहिए, जिससे कि उसके भ्रूण में यदि कोई रोग कारक है तो उसे आसानी से नष्ट किया जा सकता है। इस विधि में सबसे पहले पानी में 3 से 4 घंटे तक बीज को भिगोया जाता है और फिर 5 से 6 घंटे तक तेज धूप में रखा जाता है।


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दूसरी साधारण विधि के अंतर्गत गर्म जल की सहायता से बीजों का उपचार किया जाता है। बीजों को पानी में मिलाकर उसे 50 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर 20 से 25 मिनट तक गर्म किया जाता है, जिससे कि उसके रोग नष्ट हो जाते है। इस विधि का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें बीज के अंकुरण पर कोई भी विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता है, जैसे कि यदि आप आलू के बीच को 50 डिग्री सेल्सियस पर गर्म करते हैं तो इसमें लगने वाला अल्टरनेरिया रोग पूरी तरीके से नष्ट हो सकता है। बीज उपचार की एक और साधारण विधि गरम हवा के द्वारा की जाती है, मुख्यतया टमाटर के बीजों के लिए इसका इस्तेमाल होता है। इस विधि में टमाटर के बीज को 5 से 6 घंटे तक 30 डिग्री सेल्सियस पर रखा जाता है, जिससे कि इसमें लगने वाले फाइटोप्थोरा इंफेक्शन का असर कम हो जाता है। इससे अधिक डिग्री सेल्सियस पर गर्म करने पर इस में लगने वाला मोजेक रोग का पूरी तरीके से निपटान किया जा सकता है। इसके अलावा कृषि वैज्ञानिक विकिरण विधि के द्वारा बीज उपचार करते है, जिसमें अलग-अलग समय पर बीजों के अंदर से पराबैगनी और एक्स किरणों की अलग-अलग तीव्रता गुजारी जाती है। इस विधि का फायदा यह होता है कि इसमें बीज के चारों तरफ एक संरक्षक कवच बन जाता है, जो कि बीज में भविष्य में होने वाले संक्रमण को भी रोकने में सहायता प्रदान करता है।


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इसके अलावा सभी किसान भाई अपने घर पर फफूंदनाशक दवाओं की मदद से मटर, भिंडी, बैंगन और मिर्ची जैसी फलदार सब्जियों की उत्पादकता को बढ़ा सकते है। इसके लिए एक बड़ी बाल्टी में पानी और फफूंदनाशक दवा की उपयुक्त मात्रा मिलाई जाती है, इसे थोड़ी देर घोला जाता है,जिसके बाद इसे मिट्टी के घड़े में डालकर 10 मिनट तक रख दिया जाता है। इस प्रकार तैयार बीजों को निकालकर उन्हें आसानी से खेत में बोया जा सकता है। हाल ही में यह विधि आलू, अदरक और हल्दी जैसी फसलों के लिए भी कारगर साबित हुई है। इसके अलावा फफूंद नाशक दवा की मदद से ही स्लरी विधि के तहत बीज उपचार किया जा सकता है, इस विधि में एक केमिकल कवकनाशी की निर्धारित मात्रा मिलाकर उससे गाढ़ा पेस्ट बनाया जाता है, जिसे बीज की मात्रा के साथ अच्छी तरीके से मिलाया जाता है। इस मिले हुए पेस्ट और बीज के मिश्रण को खेत में आसानी से बोया जा सकता है।


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सभी किसान भाई अपने खेतों में जैविक बीज उपचार का इस्तेमाल भी कर सकते है, इसके लिए एक जैव नियंत्रक जैसे कि एजोटोबेक्टर को 4 से 5 ग्राम मात्रा को अपने बीजों के साथ मिला दिया जाता है, सबसे पहले आपको थोड़ी सी पानी की मात्रा लेनी होगी और उसमें लगभग दो सौ ग्राम कल्चर मिलाकर एक लुगदी तैयार करनी होगी। इस तैयार लुगदी और बोये जाने वाले बीजों को एक त्रिपाल की मदद से अच्छी तरह मिला सकते है और फिर इन्हें किसी पेड़ की ठंडी छाया में सुखाकर बुवाई के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। हम आशा करते है कि हमारे किसान भाइयों को जैविक और रासायनिक विधि से अपने बीजों के उपचार करने के तरीके की जानकारी मिल गई होगी। यह बात आपको ध्यान रखनी होगी कि महंगे बीज खरीदने की तुलना में, बीज उपचार एक कम लागत वाली तकनीक है और इसे आसानी से अपने घर पर भी किया जा सकता है। वैज्ञानिकों की राय के अनुसार इससे आपकी फ़सल उत्पादन में लगभग 15 से 20% तक मुनाफा हो सकता है।
बिहार सरकार की किसानों को सौगात, अब किसान इन चीजों की खेती कर हो जाएंगे मालामाल

बिहार सरकार की किसानों को सौगात, अब किसान इन चीजों की खेती कर हो जाएंगे मालामाल

बिहार सरकार किसानों को एक बड़ी सौगात दे रही है जिसकी खूब चर्चा हो रही है। दरअसल बिहार सरकार का उद्यान विभाग मुख्यमंत्री बागवानी मिशन योजना एवं राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत फल और फूलों के बगीचे लगाने के लिए किसानों को 40 से 75 प्रतिशत तक की सब्सिडी प्रदान कर रहा है, जिससे बिहार के किसानों के चेहरे पर खुशी झलक रही है। मौजूदा दौर में देश के कई राज्यों में किसानों के द्वारा मुख्य फसल की जगह पर तरह तरह के फल और फूलों की खेती की जा रही है।  खेती करने की मुख्य वजह फल और फूलों की घरेलू बाजार के साथ-साथ विश्व की बाजारों मे बढ़ती हुई मांग है।  किसानों को उनके द्वारा उगाए गए फूलों का उचित रेट भी मिल रहा है।  उचित मुनाफा होने के कारण किसान भी जोर–शोर से फल और फूलों की खेती कर रहे हैं।


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भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है। यहां के अधिकतर लोग कृषि के कार्यक्षेत्र से जुड़े हुए हैं, जो अपना भरण-पोषण अपने द्वारा उपजाए गए फसलों को बाजारों में बेचकर करते हैं। मुख्य फसलों की जगह पर फल फूलों की खेती करना आज के इस दौर में कृषि के क्षेत्र में एक प्रमुख विकल्प बनकर उभर रहा है। राज्य सरकार और भारत सरकार भी किसानों की आय में बढ़ोतरी और किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए तरह-तरह की स्कीम और नए-नए तकनीक के साथ खेती करने का प्रशिक्षण दे रही है। इसी कड़ी में बिहार सरकार ने भी किसानों को एक बहुत बड़ी सौगात दी है। फलों एवं फूलों की खेती करने के लिए बिहार के किसानों को उद्यान विभाग राष्ट्रीय बागवानी मिशन एवं मुख्यमंत्री मिशन योजनाओं 40 से 75 प्रतिशत का अनुदान दे रही है। सब्सिडी को प्राप्त करने के लिए आवेदन प्रक्रिया को शुरू कर दिया गया है। सरकार सरकार के द्वारा फल और फूलों की खेती करने पर इस तरह से अनुदान देना एक सराहनीय कदम माना जा रहा है।

अभी सिर्फ इन जिले के किसानों को ही मिलेगा लाभ

एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट गवर्नमेंट ऑफ़ बिहार के ट्विटर आईडी पर पूरी जानकारी स्पष्ट रूप से दी गई हुई है जिसमें ऑनलाइन आवेदन करने के बारे में भी बताया गया है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन और मुख्यमंत्री बागवानी मिशन योजना के तहत आच्छादित जिलों की सूची भी दी गई है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अंतर्गत आवेदन करने वाले जिले पटना, नालंदा, रोहताश, गया, औरंगाबाद, मुजफ्फर पुर, पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, वैशाली, दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, सहरसा, पूर्णिया, कटिहार, अररिया, किशनगंज, मूंगेर, बेगूसराय, जमुई, खगड़िया, बांका और भागलपुर है। वहीं मुख्यमंत्री बागवानी मिशन योजना के अंतर्गत आवेदन करने वाले जिले भोजपुर, बक्सर, कैमूर, जहानाबाद, अरवल, नावादा, सारण, सिवान, गोपालगंज, सीतामढी, शिवहर, सुपौल, मधेपुरा, लखीसराय और शेखपुरा है।

जानिए किस फल पर मिल रही है कितनी सब्सिडी

उद्यान विभाग, राष्ट्रीय बागवानी मिशन और मुख्यमंत्री बागवानी मिशन योजना के तहत चयनित जिलों के किसानों को ड्रैगन फ्रूट और स्ट्रॉबेरी उपजाने के लिए 40 फीसदी की सब्सिडी दी जा रही है। वहीं अनानास, फूल की खेती जैसे गेंदा और अन्य फूल, मसाले की खेती और सुगंधित पौधे की खेती (मेंथा) पर 50 फीसदी की सब्सिडी दी जा रही है। बिहार सकार मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देने के लिए भी सब्सिडी का प्रावधान रखा है। केन्द्र सरकार द्वारा नेशनल बीकीपिंग एंड हनी मिशन का भी गठन किया जा रहा है।


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सबसे ज्यादा यानी 75 फ़ीसदी की सब्सिडी पपीते की खेती पर दी जा रही है, जिससे कम लागत में किसान आसानी से उत्पादन कर सकता है। लोगों में इस फल की मांग भी काफी ज्यादा रहती है। अगर आप ड्रैगन फ्रूट्स, स्ट्रॉबेरी, पपीता, गेंदे की फूल की खेती और सुगंधित पौधे (मेंथा) की खेती करना चाहते है और आप सरकार द्वारा चयनित जिले के निवासी हैं, तो आप http://horticulture.bihar.gov.in/ पर जाकर ऑनलाइन आवेदन करके योजनाओं का लाभ पा सकते हैं। अगर आप इन योजनाओं की विस्तृत जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं तो आप अपने जिले के सहायक निदेशक उद्यान से संपर्क कर सकते हैं और किसान अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र पर जाकर बीज प्राप्त करने कि जानकारी और नए तकनीक के साथ खेती को और बेहतर बनाने के लिए प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हैं।


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भारत के अनेक राज्यों में फल फूल की खेती लोग तेजी से कर रहे हैं। मुख्य तौर पर लोग अब मुनाफा अर्जित करने के लिए ड्रैगन फ्रूट जैसे फलों की उपज करने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। यह एक वानस्पतिक फल वाला पौधा है जो आम तौर पर मानसून के दौरान या उसके बाद में फलता है। इसे आमतौर पर रोपने के 18-24 महीने बाद यह फल देना शुरू कर देता है। प्रत्येक फल का वजन लगभग 300 से 1000 ग्राम तक होता है। एक पेड़ में आमतौर पर लगभग 15 से 25 किलो फल लगते हैं, ये फल बाजार में 300 से 400 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से बिकते हैं, लेकिन सामान्य कृषि दर लगभग रु 125 से 200 प्रति किलो। अगर आप इसकी उपज करते हैं तो आप प्रति एकड़ 5-6 टन की औसत उपज पा सकते हैं।


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भले ही बिहार में बड़े उद्योग लग नहीं पा रहे हैं, लेकिन बावजूद इसके कृषि से जुड़े क्षेत्र में लगातार बेहतर कार्य हो रहे है। बिहार सरकार दूसरी हरित क्रांति लाने के प्रयास में जुट गयी है। भारत के पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने भी बिहार के बारे कहा था की बिहार में दूसरी हरित क्रांति की पूरी संभावना है और जिस तरह से बिहार कृषि के क्षेत्र बढ़ रहा है, इससे अर्थव्यवस्था में काफी हद तक सुधार होगी। बिहार को कृषि में आगे बढ़ने और औद्योगीकरण की ओर बढ़ने के लिए एक बड़ी छलांग की जरूरत है।


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वर्तमान में, हमारे किसान देखते हैं कि पिछले सीजन में किसी विशेष उपज के लिए उन्हें क्या कीमत मिली थी। उदाहरण के लिए, यदि सरसों से उन्हें अच्छी कीमत मिलती है, तो हर कोई उसी की खेती करना पसंद करता है।  लेकिन जिस तरह से सरकार फल फूलों को उपजाने के लिए सब्सिडी दे रही है उससे किसानों का आत्मबल मजबूत हो रहा है और साथ ही बिहार में किसानों कि हालात में भी सुधार हो रहा हैं।