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बकरी

एकीकृत कृषि प्रणाली से खेत को बना दिया टूरिज्म पॉइंट

एकीकृत कृषि प्रणाली से खेत को बना दिया टूरिज्म पॉइंट

इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम मॉडल (Integrated Farming System Model) यानी एकीकृत या समेकित कृषि प्रणाली मॉडल (ekeekrt ya samekit krshi pranaalee Model) को बिहार के एक नर्सरी एवं फार्म में नई दशा-दिशा मिली है। पटना के नौबतपुर के पास कराई गांव में पेशे से सिविल इंजीनियर किसान ने इंटीग्रेटेड फार्मिंग (INTEGRATED FARMING) को विलेज टूरिज्म (Village Tourism) में तब्दील कर लोगों का ध्यान खींचा है। कराई ग्रामीण पर्यटन प्राकृतिक पार्क नौबतपुर पटना बिहार (Karai Gramin Paryatan Prakritik Park, Naubatpur, Patna, Bihar) महज दो साल में क्षेत्र की खास पहचान बन चुका है।

लीज पर ली गई कुल 7 एकड़ भूमि पर खान-पान, मनोरंजन से लेकर इंटीग्रेटेड फार्मिंग के बारे में जानकारी जुटाकर प्रेरणा लेने के लिए काफी कुछ मौजूद है। एकीकृत कृषि प्रणाली से खेती किसानी को ग्रामीण पर्यटन (Village Tourism) का केंद्र बनाने के लिए सिविल इंजीनियर दीपक कुमार ने क्या कुछ जतन किए, इसके बारे में जानने से पहले यह समझना जरूरी है कि आखिर इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम (Integrated Farming System) यानी एकीकृत या समेकित कृषि प्रणाली (ekeekrt ya samekit krshi pranaalee) क्या है।

एकीकृत या समेकित कृषि प्रणाली (Integrated Farming System)

एकीकृत कृषि प्रणाली किसानी की वह पद्धति है जिसमे, कृषि के विभिन्न घटकों जैसे फसल पैदावार, पशु पालन, फल एवं साग-सब्जी पैदावार, मधुमक्खी पालन, कृषि वानिकी, मत्स्य पालन आदि तरीकों को एक दूसरे के पूरक बतौर समन्वित तरीके से उपयोग में लाया जाता है। इस पद्धति की खेती, प्रकृति के उसी चक्र की तरह कार्य करती है, जिस तरह प्रकृति के ये घटक एक दूसरे के पूरक होते हैं। 

इसमें घटकों को समेकित कर संसाधनों की क्षमता, उत्पादकता एवं लाभ प्रदान करने की क्षमता में वृद्धि स्वतः हो जाती है। इस प्रणाली की सबसे खास बात यह है कि इसमें भूमि, स्वास्थ्य के साथ ही पर्यावरण का संतुलन भी सुरक्षित रहता है। हम बात कर रहे थे, बिहार में पटना जिले के नौबतपुर के नजदीकी गांव कराई की। यहां बिहार स्टेट हाउसिंग बोर्ड में कार्यरत सिविल इंजीनियर दीपक कुमार ने समेकित कृषि प्रणाली को विलेज टूरिज्म का रूप देकर कृषि आय के अतिरिक्त विकल्प का जरिया तलाशा है।

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सफलता की कहानी अब तक

जैसा कि हमने बताया कि, इंटीग्रेटेड फार्मिंग में खेती के घटकों को एक दूसरे के पूरक के रूप मेें उपयोग किया जाता है, इसी तर्ज पर इंजीनियर दीपक कुमार ने सफलता की इबारत दर्ज की है। उन्होंने अपनी पुश्तैनी जमीन बेचकर, पिछले साल 2 जून 2021 को 7 एकड़ लीज पर ली गई जमीन पर अपने सपनों की बुनियाद खड़ी की थी। बचपन से कृषि कार्य में रुचि रखने वाले दीपक कुमार इस भूमि पर समेकित कृषि के लिए अब तक 30 लाख रुपए खर्च कर चुके हैं। इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम के उदाहरण के लिए उनका फार्म अब इलाके के साथ ही, देश के अन्य किसान मित्रों के लिए आदर्श मॉडल बनकर उभर रहा है। उनके फार्म में कृषि संबंधी सभी तरह की फार्मिंग का लक्ष्य रखा गया है। 

इस मॉडल कृषि फार्म में बकरी, मुर्गा-मुर्गी, कड़कनाथ, मछली, बत्तख, श्वान, विलायती चूहों, विदेशी नस्ल के पिग, जापानी एवं सफेद बटेर संग सारस का लालन-पालन हो रहा है। मुख्य फसलों के लिए भी यहां स्थान सुरक्षित है। आपको बता दें प्रगतिशील कृषक दीपक कुमार ने इंटीग्रेटेड फार्मिंग के इन घटकों के जरिए ही विलेज टूरिज्म का विस्तार कर कृषि आमदनी का अतिरिक्त जरिया तलाशा है। मछली एवं सारस के पालन के लिए बनाए गए तालाब के पानी में टूरिस्ट या विजिटर्स नौकायन का लुत्फ ले सकते हैं।

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इसके अलावा यहां तैयार रेस्टॉरेंट में वे अपनी पसंद की प्रजाति के मुर्गा-मुर्गी और मछली के स्वाद का भी लुत्फ ले सकते हैं। इस फार्म के रेस्टॉरेंट में कड़कनाथ मुर्गे की चाहत विजिटर्स पूरी कर सकते हैं। इलाके के लोगों के लिए यह फार्म जन्मदिन जैसे छोटे- मोटे पारिवारिक कार्यक्रमों के साथ ही छुट्टी के दिन सैरगाह का बेहतरीन विकल्प बन गया है।

अगले साल से होगा मुनाफा

दीपक कुमार ने मेरीखेती से चर्चा के दौरान बताया, कि फिलहाल फार्म से होने वाली आय उसके रखरखाव में ही खर्च हो जाती है। इससे सतत लाभ हासिल करने के लिए उन्हें अभी और एक साल तक कड़ी मेहनत करनी होगी। नौकरी के कारण कम समय दे पाने की विवशता जताते हुए उन्होंने बताया कि पर्याप्त ध्यान न दिए जाने के कारण लाभ हासिल करने में देरी हुई, क्योंकि वे उतना ध्यान फार्म प्रबंधन पर नहीं दे पाते जितने की उसके लिए अनिवार्य दरकार है।

हालांकि वे गर्व से बताते हैं कि उनकी पत्नी उनके इस सपने को साकार करने में हर कदम पर साथ दे रही हैं। उन्होंने अन्य कृषकों को सलाह देते हुए कहा कि जितना उन्होंने निवेश किया है, उतने मेंं दूसरे किसान लगन से मेहनत कर एकीकृत किसानी के प्रत्येक घटक से लाखों रुपए की कमाई प्राप्त कर सकते हैं।

इनका सहयोग

उन्होंने बताया कि वेटनरी कॉलेज पटना के वीसी एवं डॉक्टर पंकज से उनको समेकित कृषि के बारे में समय-समय पर बेशकीमती सलाह प्राप्त हुई, जिससे उनके लिए मंजिल आसान होती गई। वे बताते हैं कि इस प्रोजेक्ट पर उन्होंने किसी और से किसी तरह की आर्थिक मदद नहीं जुटाई है एवं अपने स्तर पर ही आवश्यक धन राशि का प्रबंध किया।

युवाओं को जोड़ने की इच्छा

समेकित कृषि को अपनाने का कारण वे बेरोजगारी का समाधान मानते हैं। उनका मानना है कि ऐसे प्रोजेक्ट्स के कारण इलाके के बेरोजगारों को आमदनी का जरिया भी प्राप्त हो सकेगा।

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नए प्रयोग

आधार स्थापना के साथ ही अब दीपक कुमार के कृषि फार्म पर गोबर गैस प्लांट ने काम करना शुरू कर दिया है। उन्होंने बताया कि उनके फार्म पर गाय, बकरी, भैंस, सभी पशुओं के प्रिय आहार, सौ फीसदी से भी अधिक प्रोटीन से भरपूर अजोला की भी खेती की जा रही है। इस चारा आहार से पशु की क्षमता में वृद्धि होती है।

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आपको बता दें अजोला घास जिसे मच्छर फर्न (Mosquito ferns) भी कहा जाता है, जल की सतह पर तैरने वाला फर्न है। अजोला अथवा एजोला (Azolla) छोटे-छोटे समूह में गठित हरे रंग के गुच्छों में जल में पनपता है। जैव उर्वरक के अलावा यह कुक्कुट, मछली और पशुओं का पसंदीदा चारा भी है। इसके अलावा समेकित कृषि प्रणाली आधारित कृषि फार्म में हाइड्रोपोनिक्स (Hydroponics) तकनीक द्वारा निर्मित हरा चारा तैयार किया जा रहा है। 

इसमेें गेहूं, मक्का का चारा तैयार होता है। आठ से दस दिन की इस प्रक्रिया के उपरांत चारा तैयार हो जाता है। अनुकूल परिस्थितियों में हाइड्रोपोनिक्स चारे में 9 दिन में 25 से 30 सेंटीमीटर तक वृद्धि दर्ज हो जाती है। इस स्पेशल कैटल डाइट में प्रोटीन और पाचन योग्य ऊर्जा का प्रचुर भंडार मौजूद है। उनके अनुभव से वे बताते हैं कि इस प्रक्रिया में लगने वाला एक किलो गेहूं या मक्का तैयार होने के बाद दस किलो के बराबर हो जाता है। अल्प लागत में प्रोटीन से भरपूर तैयार यह चारा फार्म में पल रहे प्रत्येक जीव के जीवन चक्र में प्राकृतिक रूप से कारगर भूमिका निभाता है।

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हाइड्रोपोनिक्स (Hydroponics) अर्थात जल संवर्धन विधि से हरा चारा तैयार करने में मिट्टी की जरूरत नहीं होती। इसे केवल पानी की मदद से अनाज उगाकर निर्मित किया जा सकता है। इस विधि से निर्मित चारे को ही हाइड्रोपोनिक्स चारा कहते हैं। यदि आप भी इस फार्म के आसपास से यदि गुजर रहे हों तो यहां समेकित कृषि प्रणाली में पलने बढ़ने वाले जीवों और उनके जीवन चक्र को समझ सकते हैं। 

अन्य कृषि मित्र इस तरह की खेती से अपने दीर्घकालिक लाभ का प्रबंध कर सकते हैं। (फार्म संचालक दीपक कुमार द्वारा दूरभाष संपर्क पर दी गई जानकारी पर आधारित, आप इस फार्म के बारे में फेसबुक लिंक पर जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।) 

संपर्क नंबर - 8797538129, दीपक कुमार 

फेसबुक लिंक- https://m.facebook.com/Karai-Gramin-Paryatan-Prakritik-Park-Naubatpur-Patna-Bihar-100700769021186/videos/1087392402043515/

यूट्यूब लिंक-https://youtube.com/channel/UCfpLYOf4A0VHhH406C4gJ0A

कोरोना मरीजों पर कितना कारगर होगा बकरी का दूध

कोरोना मरीजों पर कितना कारगर होगा बकरी का दूध

बकरी का दूध बहुत से लोगों को भले ही पसंद नहीं आता लेकिन उसके फायदे बहुत हैं।औषधीय गुणों के कारण यह विशेष गंध वाला होता है। इसे अब आम लोग भी समझने लगे हैं। इसलिए डेंगू जैसे रोगों के मरीजों के लिए इसकी मांग लगातार बढ़ी है।जरूरत इस बात की है कि कोविड मरीजों पर भी इसके प्रभावों का परीक्षण किया जाए ताकि वनस्पतियां खाकर दूध देने वाली बकरी के दूध की उच्च गुणवत्ता का लोगों को पता चल सके। 

यदि यह लाभकारी सिद्ध होता है तो विश्व में फैल रही महामारी मैं सहयोगी सप्लीमेंट के रूप में इसका प्रयोग हो सके। बकरी के दूध को दोयम दर्जे का समझा जाता है लेकिन यह दूध कई मामलों में औषधीय गुणों से भरपूर होता है। इसमें कई प्राण रक्षक तत्व तो गाय के दूध से भी ज्यादा होते हैं। दिनों दिन बढ़ती दूध की मांग के दौर में ग्रामीण अंचल में यह सस्ता और सहज ही मिल जाता है।कहावत जैसा खाए अन्न वैसा रहे मन भी सटीक बैठती है। 

बकरी या जंगल में औषधीय पौधों को ही अपना आहार बनाती हैं और उनके दूध में इसकी सुगंध और तत्व दोनों होते हैं। इस दूध में औषध ही गुणों की मात्रा भी प्रचुर होती है। बकरी का दूध मधुर, कसैला ,शीतल ,ग्राही ,हल्का ,रक्तपित्त ,अतिसार, क्षय, खांसी और ज्वर को नष्ट करने की क्षमता बढ़ाता है । यह वैज्ञानिकों द्वारा सत्यापित तथ्य है। बकरी पालन करने वाले लोग भी इसीलिए रोगों के शिकार कम होते हैं। पिछले सालों में डेंगू बुखार के दौरान बकरी के दूध की उपयोगिता जरूर सिद्ध हुई। 

लोग बकरी का दूध खोजते नजर आए।रूटीन में यदि बकरी के दूध का सेवन किया जाए तो अनेक बीमारियों से बचा जा सकता है। बकरी का दूध गाय के दूध से मिलता जुलता होता है लेकिन इसमें विटामिन बी 6, भी 12 सी एवं डी की मात्रा कम पाई जाती है।इसमें फोलेट बैंड करने वाले अवैध की मात्रा ज्यादा होने से फोलिक एसिड नामक आवश्यक विटामिन की बच्चों के शरीर में उपलब्धता कम हो जाती है।

लिहाजा 1 साल से कम उम्र के बच्चों को बकरी के दूध नहीं पिलाना चाहिए। बकरी के दूध में मौजूद प्रोटीन गाय भैंस की तरह जटिल नहीं होती। इसके चलते यह हमारे प्रतिरोधी रक्षा तंत्र पर कोई प्रतिकूल असर नहीं डालता। संयुक्त राज्य अमेरिका में गाय का दूध पीने से कई तरह की एलर्जी के लक्षण बच्चों में देखे जाते हैं। इनमें लाल चकत्ते बनना ,पाचन समस्या, एग्जिमा आदि प्रमुख हैं। बकरी के दूध इन सब से स्वयं बचाता है। बकरी के दूध में गाय के दूध से दोगुनी मात्रा में स्वास्थ्यवर्धक फैटी एसिड पाए जाते हैं। बकरी के दूध में प्रोटीन के अणु गाय के दूध से भी सूक्ष्म होते हैं। इसके कारण यह दूध कम गरिष्ठ होता है और गंभीर रोगी भी इसे बचा सकता है।

गाय का दूध किसी बच्चे के पेट में पचने में 8 घंटे लेता है वही बकरी के दूध मात्र 20 मिनट में पच जाता है।जो व्यक्ति लेप्टोंस को पचाने की पूर्ण क्षमता नहीं रखते हैं वह बकरी के दूध आसानी से पचा लेते हैं। बकरी का दूध अपच दूर करता है और आलसी को मिटाता है। इस दूध में शायरी बस में पाए जाने के कारण आंतरिक तंत्र में अम्ल नहीं बनता। थकान सिरदर्द मांसपेशियों में खिंचाव अत्याधिक वजन आदि विकार रक्तम लिया था और आंतरिक टी एच के स्तर से संबंध रखते हैं। बकरी के दूध से म्यूकस नहीं बनता है। पीने के बाद गली में चिपचिपाहट भी नहीं होती। मानव शरीर के लिए जरूरी सेलेनियम तत्व बकरी के दूध में अन्य पशुओं के दूध से ज्यादा होता है। यह तत्व एंटीऑक्सीडेंट के अलावा प्रतिरोधी रक्षा तंत्र को उच्च व निम्न करने का काम करता है। एचआईवी आदि रोगों में से कारगर माना जाता है। इसमें आने वाली विशेषकर इसके औषधीय गुणों को परिलक्षित करती है।  

बकरी पालन और नवजात मेमने की देखभाल में रखे यह सावधानियां (goat rearing and newborn lamb care) in Hindi

बकरी पालन और नवजात मेमने की देखभाल में रखे यह सावधानियां (goat rearing and newborn lamb care) in Hindi

पशुपालन की बात करें, तो हम बकरियों को कैसे भूल सकते हैं। इन बकरियों का इस्तेमाल किसान प्राचीन काल से ही करते आ रहे हैं। क्योंकि इन से प्राप्त गोबर से बनी जैविक खाद कृषि उत्पादन के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होती है। बकरियों का मुख्य स्त्रोत वैसे तो दूध देना होता है। परंतु या किसानों के लिए बहुत ही लाभदायक होती हैं। किसान खेती तथा पशुपालन कर अपना आय निर्यात करते हैं। यह कार्य किसान प्राचीन काल से करते चले आ रहे हैं। बकरियों का कृषि उपज में बहुत महत्वपूर्ण योगदान है कृषि के कई कार्यों में इनका इस्तेमाल किया जाता है। 

कभी-कभी  किसानों को अपने खेत द्वारा फायदा नहीं होता तो वह पशुपालन की ओर बढ़ते है। कुछ ही वक्त में किसान पशुपालन से ज्यादा लाभ  उठा लेता है। बकरी पालन व नवजात मेमने की देखभाल रखे कुछ सावधानियां । यदि आप भी पशुपालन द्वारा धन की प्राप्ति करना चाहते हैं। तो यह उच्च विचार है क्योंकि आप बकरी पालन में बहुत ज्यादा फायदा उठा सकते हैं। अब आप यह सोच रहे होंगे, कि बकरी पालन में इतना फायदा क्यों होता है, क्योंकि या मार्केट में उचित दाम पर बिकते हैं। जिससे आपको अच्छी धन की प्राप्ति होती है।बकरियों को बाजार में बेचने में कोई समस्या नहीं होती। किसान के लगाए हुए मूल्य पर यह बकरियां मार्केट में बिका करती हैं। 

बकरियों की भारतीय नस्लें (Goat Breeds in India)

किसान द्वारा पशुपालन की नस्लों को निम्नलिखित भागों में बांटा गया हैं। पूर्ण रूप से भारत में लगभग 21 मुख्य बकरियों की नस्लें पाई जाती है। 

बकरियों की दुधारू नस्लें (Milch Breeds of Goats) in Hindi

बकरियों की नस्ल में दुधारू नस्लें कुछ इस प्रकार की होती हैं जैसे: बरबरी ,बीटल ,सूरती, जखराना, जमुनापारी आदि। 

बकरी पालने करने के तरीके:  ( Methods of Raising Goats:) in Hindi

bakri palan karne ka tarika


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 बकरियों को पालने के लिए आपको बहुत बड़ी जगह की आवश्यकता नहीं होती।आप साधारण स्थान पर भी उनका पालन पोषण कर सकते हैं। उन्हें आप अपने घर के किसी भी हिस्से में आसानी से रख सकते हैं।वह भी काफी बड़ी मात्रा में , अगर आप भी बकरी पालने का काम शुरू करना चाहते हैं। तो आपको बड़ी जगह लेने की जरूरत नही पड़ेगी। बकरी पालन का मुख्य क्षेत्र बुंदेलखंड है। जहां इन बकरियों का पालन पोषण किया जाता है। या बकरियां खेतों में घूमते फिरते, चारा चर अपना पेट भर लेती हैं। बकरियों के लिए अलग से चारों की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती है।

बकरियों की प्रजनन क्षमता: ( Fertility of Goats:)

बकरियों की प्रजनन क्षमता बहुत होती हैं ,यह सिर्फ करीबन डेढ़ साल की उम्र में ही बच्चा प्रजनन करने की क्षमता रखती है। 6 से 7 महीनों के अंदर उनका जन्म हो जाता है। एक बकरियां एक बार में तीन से चार या कभी-कभी उससे अधिक बच्चे भी पैदा करती हैं। इनकी वृद्धि का यह भी मुख्य कारण है। कि यह 1 साल में दो बार प्रजनन क्षमता की शक्ति रखती हैं।जिससे इनकी संख्या में काफी वृद्धि हो जाती है। किसान या बकरियों के मालिक इनको लगभग 1 वर्ष की उम्र में या फिर उससे कम समय से ही बेचना शुरू कर देते हैं।

बकरियों को पालते समय कुछ सावधानियां बरतें:( Some Precautions to Be Taken While Raising Goats) in Hindi

Bakri Palan

  • जब बकरियों के बच्चे छोटे होते हैं, तो उनको बहुत सावधानी के साथ रखना पड़ता है क्योंकि कुछ जंगली जानवर उनको नोच, दबाकर खा लेते हैं।
  • कम आबादी वाले क्षेत्र में जंगल बहुत ही पास होता है जिसकी वजह से जंगली जानवर बकरियों को खाने के लिए उनकी महक सूंघकर आते हैं।
  • बकरियों को हरे चारे बहुत पसंद होते हैं जिसकी वजह से वह खेत की ओर भागते हैं, इसीलिए खेत को सुरक्षित रखने के लिए बकरियों से सावधानी बरखनी चाहिए।
  • बकरियों के दूध में बहुत तरह के पौष्टिक तत्व पाए जाते हैं ,परंतु दूध में आने वाली महक लोगों को अच्छी नहीं लगती हैं, जिसकी वजह से बकरियों के दूध नहीं बिकते।
  • बारिश के मौसम में आपको इनकी देख रेख बहुत अच्छे ढंग से करनी होती है क्योंकि यह गीले स्थान पर बैठना पसंद नहीं करती हैं।
  • गीली जगह पर बैठने से बकरियों को कई तरह के रोग हो जाते हैं।
  • बकरियों के अच्छे स्वास्थ्य के लिए इनको प्रतिदिन जंगलों या खेतों में चराना बहुत ही आवश्यक होता है।
  • बकरी पालने के लिए आपको किसी तकनीकी या किसी भी अन्य ज्ञान की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती है। यह व्यवसाय काफी तेजी से बढ़ रहा है शहरों से कई लोग बकरी खरीदने के लिए गांव की ओर रुख करते हैं।
  • किसी भी तरह की आपत्ति या जरूरत आने पर आप उचित दामों में बकरी या बकरे को बेचकर धन की प्राप्ति कर सकते हैं यह व्यवसाय आय के साधनों को बढ़ाता है।

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गाभिन बकरियां ( Pregnant Goats) in Hindi

किसान गाभिन बकरियों की निम्नलिखित तरीकों से जांच करते हैं वह कुछ इस प्रकार है:

जब बकरियां गाभिन होती हैं तो उनको और उचित पोषक तत्व की जरूरत पड़ती है।ताकि उनको अपने शिशु को जन्म देते हुए कोई तरह  परेशानी ना हो। गाभिन बकरियों को अतिरिक्त पोषण के साथ कीड़ा में लिप्त मेमनों से सुरक्षा  का उचित ख्याल रखना होता है। बकरियां अतिरिक्त 144 या 152 दिन के अंदर अपना गर्भ धारण कर लेती हैं। पौष्टिक तत्व बकरियों की प्रजनन क्षमता को बहुत बढ़ाता है। जिससे या अधिक संतान पैदा कर सके। पौष्टिक तत्व की बिना पर यह जुड़वा बच्चे देने में भी सक्षम होती हैं।

बकरियों के प्रसव से जुड़ी कुछ सावधानियां:(Some Precautions Related to The Delivery of Goats) in Hindi

जब बकरियां प्रसव के करीब रहे, तो उनकी अच्छे से देखभाल करना आवश्यक होता है। किसान को उनके प्रसव के टाइम पर पूर्ण निगरानी रखनी चाहिए। जब प्रसव एकदम करीब आ जाए तो उसकी तैयारी के लिए किसानों के पास दूध की छोटी बोतल का होना जरूरी है ताकि  वह नवजात शिशु को दूध पिला सके। बकरियों के बच्चों के लिए अच्छा टिंक्चर आयोडीन तथा प्रतिजैविक दवाइयों का देना आवश्यक है। यदि बकरियां किसी भी प्रकार से जन्म देने के लिए तैयार ना हो तो पशु चिकित्सालय से संपर्क करें।

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बकरियों के नवजात मेमने की देखभाल:(Newborn Lamb Care of Goats) in Hindi:

बकरी के नवजात मेमने की देखभालmemne ki dekhbhal

बकरियों के बच्चे जैसे पैदा हो उनका मुंह ,नाक  साफ कपड़े से अच्छी तरह पोछे।

  • उनकी नाभि से कुछ दूरी पर नाल कांटे और साफ धागे से टिंचर लगा दे।
  • नवजात शिशु अच्छे से चल सके। इसको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए उनकी की खुर साफ करते हुए तोड़ कर अलग कर दें। जिससे बच्चा आसानी से खड़ा हो सके।
  • नवजात बकरियों के शिशु को मां के पास ही रखें।ताकि बकरियां उन्हें चाट कर उनके बदन में गर्मी पैदा कर सके।
  • पोटाश के पानियों से बकरियों के थन स्थल को अच्छे से साफ करें।
  • नवजात शिशु के लिए दूध बहुत ही उपयोगी होता है। जितना जल्दी हो सके वह बकरी का दूध पी ले। जिससे विभिन्न प्रकार की बीमारियों से नवजात शिशु की रक्षा हो सके।
  • 15 दिन के बाद बकरियों के शिशु को नरम हरा चारा देने की शुरुआत कर दें। इन में बढ़ोतरी करते रहे। जिससे बच्चा अच्छे से चलने लगे और फुर्तीला बना सके।
  • 3 महीने के बाद बकरियों के बच्चों को चरने के लिए खेतों में लेकर जाएं। किसी खुले स्थान पर छोड़ दें ताकि वह चर सके।
  • बकरियों के नवजात शिशु का वजन तीन महीनों पर करते रहे। जिससे उनके वजन का अंदाजा हो सके। ऐसा करने से वजन की बढ़ोतरी तथा घटने दोनों की जानकारी हो जाती हैं।
  • बकरियों के नवजात शिशु को कृमिनाशक दवाई पिलायें साथ ही साथ उनका टीकाकरण भी करें, तथा अपने पास के पशु चिकित्सा केंद्र भी जाते रहे।

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हमारी इस पोस्ट में बकरियों से जुड़ी विभिन्न प्रकार की जानकारी दी हुई है। जिससे आप बकरियों की पूर्ण रूप से देखभाल कर सकते हैं। यदि आप हमारी दी गई जानकारी से संतुष्ट हैं। तो आप इस आर्टिकल को Social Media और अपने दोस्तों के साथ ज्यादा से ज्यादा शेयर(Share) करें धन्यवाद।

भेड़, बकरी, सुअर और मुर्गी पालन के लिए मिलेगी 50% सब्सिडी, जानिए पूरी जानकारी

भेड़, बकरी, सुअर और मुर्गी पालन के लिए मिलेगी 50% सब्सिडी, जानिए पूरी जानकारी

अगर आप भी भेड़, बकरी, सुअर या मुर्गी पालन से जुड़े काम में इच्छुक हैं और इनसे जुड़ा व्यवसाय शुरू करना चाहते हैं, तो आप भी इस योजना का लाभ ले सकते हैं। इसके अंतर्गत आपको 50% की सब्सिडी दी जाती है। हमारे देश में काफी लोग अभी भी पालतू पशुओं को पालते हैं जो उनकी जीविका का प्रमुख स्रोत है। देश में एसे ही पशुपालकों को बढ़ावा देने के साथ साथ उन्हें उचित रोजगार देने की व्यवस्था इस योजना में की गई है। केंद्र सरकार ने इस मिशन को नेशनल लाइवस्टॉक मिशन (National Livestock Mission) नाम से शुरु किया है।

इस मिशन के तहत अपना फार्म शुरु करने वाले किसानों को पशुपालन विभाग की तरफ से 50% सब्सिडी का प्रावधान है। उत्तराखंड लाइवस्टॉक डेवलपमेंट बोर्ड के अपर प्रबंधक डॉ विशाल शर्मा इस योजना के बारे में अपनी राय देते हुए कहते हैं, "ये छोटे पशुओं जैसे कि भेड़, बकरी और सुअर के लिए के लिए योजना है, इसमें कोई भी पशुपालक अपना कारोबार शुरू करना चाहता हो तो वो इसका लाभ ले सकता है।" इस योजना में अगर कोई पशुपालक भेड़ या बकरी पालने का इच्छुक है तो उसे 500 मादा बकरी के साथ ही 25 नर भी पालने होगें। अगर कोई भी व्यक्ति इस योजना का लाभ उठाना चाहता है तो वह भारत सरकार की वेबसाइट https://nlm.udyamimitra.in/ पर जाकर इसमें आवेदन कर सकता है।


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इस योजना में आगे डॉ. विशाल बताते हैं, "अगर आप इसके लिए फॉर्म भरते हैं और किसी बैंक की डिटेल सबमिट करते हैं तो उस बैंक अकाउंट में मिलने वाली कुल राशि की आधी राशि होनी चाहिए, जैसे कि अगर आपका प्रोजेक्ट 20 लाख का है तो आपके खाते में 10 लाख रुपए होने चाहिए, अगर आपके खाते में आधी राशि नहीं है तो इसके लिए आप बैंक से लोन भी ले सकते हैं।" लोन मिलने के बाद आपको आवेदन करते समय इसकी डिटेल भी सबमिट करनी होगी और अगर किसी कारणवश आपको लोन नहीं मिलता तो इसकी जानकारी आपको ऑनलाइन आवेदन करते समय देनी होगी। आपका फॉर्म ऑनलाइन सबमिशन के बाद उत्तराखंड के देहरादून मुख्यालय पर वरिष्ठ अधिकारी उसकी जांच करते हैं कि आपके द्वारा दिए गए सभी आंकड़े सही हैं। अगर आपके द्वारा दिए गए आंकड़े सही हैं तो उसे प्रिंसिपल सहमति दी जाएगी। इसके बाद आपके दस्तावेज बैंक के पास पुनः जांच के लिए जाएंगे, जिसे बैंक वेरीफाई करेगा की आपके द्वारा दी गई जानकारी सही है या नहीं। 

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इसके बाद आगे डॉ. शर्मा आगे कहते हैं, "वहां बैंक सब चेक करने के बाद आपका आवेदन एक बार फिर हमारे पास आ जाएगा, जो समिति के पास आएगा, वहां से सबमिट होने के बाद पशुपालन व डेयरी मंत्रालय, फिर भारत सरकार के पास जाएगा, इसके बाद आपके आवेदन में जिस बैंक की डिटेल भरी है वो बैंक सीधे लाभार्थी के खाते में 50% राशि भेज देगा।

बकरी बैंक योजना ग्रामीण महिलाओं के लिये वरदान 

बकरी बैंक योजना ग्रामीण महिलाओं के लिये वरदान 

भारत देश में कृषि और पशुपालन एक दुसरे के पूरक रहे हैं. हमारे ज्यादातर किसान भाई-बहन खेती के साथ-साथ पशुपालन भी करते हैं. ज्यादातर घरेलु या छोटे स्तर पर पशुपालन के कार्य को महिलाएं कुशलता के साथ संभाल रही हैं. ग्रामीण इलाकों में लगभग हर छोटे और मध्यम किसानों के घर में बकरी पालन किया जाता है, क्योंकि इसमें खर्च कम और मुनाफा अधिक होता है. बकरी के लिये आहार की उपलब्धता भी आसान है, वहीं खर्च भी कम होता है. बकरी पालन के लिये किसी बड़ी तकनीक की भी जरूरत नहीं होती है. कोई भी किसान आसानी से बकरी पालन कर लाभ कमा सकता है. इसीको देखते हुए ग्रामीण महिलाओं के उत्थान के लिय महाराष्ट्र सरकार की तरफ से बकरी पालन पर योजना चलाई जा रही है, जिसका नाम बकरी बैंक योजना है.  इस योजना में महिलाओं को बकरी पालने के लिए कम मूल्य पर बकरी उपलब्ध करवाई जाएगी. यही नहीं सरकार के इस बकरी पालन योजना में महिलाओं को बकरी पालन का उचित प्रशिक्षण भी दिया जाएगा. ये भी पढ़े: कोरोना मरीजों पर कितना कारगर होगा बकरी का दूध

बकरी बैंक योजना का उद्देश्य

बकरी बैंक योजना का उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाना है. इससे बकरी पालन के व्यवसाय को बढ़ावा मिलेगा और इस व्यवसाय से महिलाओं की आर्थिक स्थिति में सुधार आयेगी. अमूमन देखा जाता है कि ग्रामीण महिलाएं अपने घर आंगन में बकरी पालती हैं. लेकिन आबकारी खरीदने के लिये धनाभाव होता है, जिसके कारण चाह के भी वो बकरी नहीं पाल सकती हैं. इस योजना के तहत वैसी महिलाओं को बकरी उपलब्ध कराई जायेंगी, जिससे वो घर में रहते हुये बकरी पाल सकेंगी और इससे वे आर्थिक रूप से स्वावलंबी होंगी और उन्हें रोजगार भी उपलब्ध हो सकेगा. सबसे बड़ी बात यह है की बकरी के लिये महिलाओं को आसानी से चारा उपलब्ध हो जाता है और बीमा तथा टीकाकरण का खर्च भी सरकारी स्तर पर उठाया जायेगा.

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कैसे मिलेगा महिलाओं को बकरी बैंक योजना का

बकरी बैंक योजना का लाभ लेने के लिए महिलाओं को किसी भी नजदीकी सरकारी बैंक में जाकर आवेदन करना होगा. बकरी बैंक योजना के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को 2 हजार रुपए में एक गर्भवती बकरी उपलब्ध कराई जाएगी. इसके लिए लाभार्थी महिलाओं को बैंक में 2 हजार रुपए और साथ ही जितने बकरी के बच्चें होंगे उसमें से एक बच्चा बैंक को देना होगा. इस प्रक्रिया के पूरा हो जाने के बाद बकरी महिलाओं के नाम कर दी जाएगी. बकरी बैंक योजना के तहत बकरी का बीमा और उनके लिए टीकाकरण का खर्च भी बैंक द्वारा वहां किया जायेगा.

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बकरी बैंक योजना में निशुल्क होगा पंजीकरण

सरकार के इस योजना का लाभ उठाने के लिये इच्छुक महिलाओं को इसके लिए 1200 रुपए का पंजीकरण शुल्क देना होगा. इसके बाद बकरी के लिये ऋण के नियमों के तहत महिलाओं को बकरी उपलब्ध कराई जायेगी. बैंक नियमानुसार, 40 महीने के समय के अंदर योजना के तहत बकरी प्राप्त करने वाली महिलाओं को 4 बकरी के बच्चे बैंक को देने होंगे. इसके बाद ही बकरी पर महिला का पूर्ण अधिकार होगा. इसके पूर्व बकरी बैंक की ही मानी जाएगी.
कृषि में गाय, भेड़, बकरी, चींटी, केंचुआ, पक्षी, पेड़ों का महत्व

कृषि में गाय, भेड़, बकरी, चींटी, केंचुआ, पक्षी, पेड़ों का महत्व

भारतीय कृषि इतिहास में प्रकृति प्रदत्त जीव जंतुओं के खेती किसानी में उपयोग लेने संबंधी तमाम प्रमाण मौजूद हैं। बिसरा दिए गए ये वे प्रमाण हैं जिनको पुनः उपयोग में लाकर, किसान मित्र खेती की उर्वरता के साथ-साथ मानव स्वास्थ्य रक्षा मिशन में, देश-दुनिया के साथ हाथ बंटा सकते हैं।

कृषक करते हैं भेड़ के झुंड का इंतजार खाद के बदले किसान करते हैं भुगतान प्रकृतिक ड्रोन ऐसे करते हैं प्रकृति की मदद

भारत के धर्म शास्त्र एवं पुराण में योनिज और आयोनिज जैसे दो वर्गों में विभाजित 84 लाख योनियों का उल्लेख किया गया है। इन समस्त जीव योनियों के प्रति भारत में सम्मान का भाव रखने की सीख बचपन से दी जाती है। कुल 84 लाख योनियों से जनित जीवों के जीवन चक्र में बगैर खलल डाले, सहज प्राकृतिक चक्र के मुताबिक जीवन उपभोग की सामग्री जुटाने की कृषि विधियां भी भारत में बखूबी पल्लवित हुईं। गायों की सेवा कर बछड़ा, दूध, दही, मक्खन, छाछ और धरती के सर्वोत्कृष्ट खाद्य पदार्थ घी की उत्पत्ति के अलावा सर्प (सांप) नियंत्रण तक की मान्य विधियां भारत के गौरवमयी इतिहास का हिस्सा रही हैं। चींटी को दाना देने से लेकर कौओं तक को भोजन समर्पित करने की परंपरा भी भारतीय जीवन दर्शन की बड़ी उपलब्धि है। भारतीय कृषि इतिहास में प्रकृति प्रदत्त जीव जंतुओं के खेती किसानी में उपयोग लेने संबंधी तमाम प्रमाण मौजूद हैं। बिसरा दिए गए ये वे प्रमाण हैं जिनको पुनः उपयोग में लाकर, किसान मित्र खेती की उर्वरता के साथ-साथ मानव स्वास्थ्य रक्षा मिशन में देश-दुनिया के साथ हाथ बंटा सकते हैं।

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आधुनिक कृषि के दुष्परिणाम

दुष्परिणामों को आधुनिक कृषि में उपयोग में लाए जा रहे खेती किसानी के तरीकों से बखूबी समझा जा सकता है। निश्चित ही ट्रैक्टर, रसायन, उपचारित बीजों जैसे आधुनिक कृषि तरीकों से किसान को कम समय में बंपर पैदावार के साथ ज्यादा कमाई हासिल हो रही हो, लेकिन उसके उतनी तेज गति से दुष्परिणाम भी हो रहे हैं। आधुनिक कृषि तरीकों को अपनाने के कारण खेत की उपजाऊ क्षमता के साथ ही, पर्यावरण एवं मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। मानव स्वास्थ्य से जुड़े अध्ययनों में रसायन प्रयुक्त उपज उत्पाद के सेवन से मानव की औसत आयु के साथ ही उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आ रही है। ऐसे में आधुनिक कृषि के मुकाबले परंपरागत कृषि में अपनाए जाने वाले प्राकृतिक तरीकों को अपनाकर मानव और प्रकृति स्वास्थ्य संबंधी संतुलन को बरकरार रखा जा सकता है। ट्रेक्टर से खेत की जुताई आसान जरूर है, लेकिन इससे खेत में मौजूद प्राकृतिक जीव जंतुओं के आवास (बिल, बामी आदि) के खराब होने का खतरा रहता है। कृषि में कैसे मददगार हैं जीव-जंतु आधुनिक ड्रोन तकनीक का खेती में भले ही नया मशीनी प्रयोग देख मानव आश्चर्यचकित हो, लेकिन तोतों, कौओं, गौरैया आदि के जरिये प्रकृति बगैर किसी तरह का प्रदूषण फैलाए अपना विस्तार करती रही है। बगैर डीजल, पेट्रोल बिजली के संचालित होने वाले पक्षी प्राकृतिक रूप से बीजारोपण आदि में प्रकृति का सहयोग प्रदान करते हैं। कीट प्रबंधन में भी पक्षी एवं अन्य जीव प्रकृति चक्र का अहम हिस्सा एवं सहयोगी कारक हैं।

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कृषि में पशुओं का महत्व

प्राकृतिक कृषि पद्धति में पशुओं का अहम स्थान है। बैल आधारित जुताई खेतों के स्वास्थ्य के लिए अच्छी मानी गई है। ट्रैक्टर के बजाए हल से खेत जोतने पर खेत की मिट्टी की गहराई में मौजूद उर्वरा शक्ति नष्ट नहीं होती। ट्रैक्टर के मुकाबले पशु धुआं नहीं छोड़ते, पेट्रोल-डीजल नहीं पीते ऐसे में पर्यावरण संतुलन बनाने में भी मददगार साबित होते हैं। उल्टे इनके गोबर से खेत की उपजाऊ शक्ति में ही वृद्धि होती है।

भेड़-बकरी से कृषि में लाभ

भेड़-बकरी की इन विशेषताओं को जानकर अनभिज्ञ किसान भी मालवा, राजस्थान के किसानों की तरह इन पशुओं को पालने वाले पालकों और पशुओं का काफिला गुजरने का बेसब्री से इंतजार करने लगेंगे। मध्य प्रदेश में मालवा अंचल के किसान उनके खेतों के आसपास से गुजरने वाले भेड़, बकरी के समूहों का बेसब्री से इंतजार करते हैं। दरअसल, राजस्थान के भेड़ (गाटर), बकरी, ऊंट आदि मवेशियों को पालने वालों का समूह प्रतिवर्ष अपने मवेशियों को चराने के लिए मध्य प्रदेश के पहाड़ी इलाकों से होकर गुजरता है। मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र के किसान यायावर जीवन जीने वाले इन पशु पालकों से उनके मवेशियों के झुंड को खेत में रोकने का अनुरोध करते हैं। इतना ही नहीं खेत के मालिक किसान, पशुपालकों को अनाज, कपड़े एवं रुपए तक पशुओं को खेत में ठहराने के ऐवज में प्रदान करते हैं।

भेड़ की लेंड़ी की शक्ति

आधुनिक किसानी में परंपरागत खेती का सम्मिश्रण कर जैविक, या फिर हर्बल पदार्थों एवं घोलों को खेत की मिट्टी में मिलाने की सलाह दी जाती है, हालांकि यह विधि भारत के लिए नई नहीं है। अनुभवी किसान भेड़ों के झुंड को इसलिए अपने खेतों में ठहरवाते हैं ताकि भेड़, बकरियों की लेंड़ियां खेत की मिट्टी में मिल जाएं। जंगली पत्ती, वनस्पति चारा खाने वाली भेड़-बकरियों की लेंड़ी में भूमि की उर्वरा शक्ति में वृद्धि करने की अपार क्षमता होती है। ऐसे में बगैर किसी कृत्रिम तरीके से तैयार खाद के मुकाबले प्राकृतिक तरीके से ही खेत में भेड़-बकरी जनित जैविक खाद का सम्मिश्रण भी हो जाता है। शाजापुर जिले के खामखेड़ा ग्राम निवासी पवन कुमार बताते हैं कि, वे अपने दादा-परदादा के समय से खेतों में भेड़-बकरियों के झुंड को ठहरवाते देख रहे हैं। इससे खेत की उत्पादन क्षमता में प्राकृतिक तरीके से काफी वृद्धि होती है। यह हमारे लिए एक परंपरा बन चुकी है क्योंकि भेड़ पालक प्रति वर्ष हमारे इलाके से गुजरते हैं तो हमारे या आसपास के किसानों के खेतों पर अपना डेरा जमाते हैं।

जैविक खाद

मिट्टी की उर्वरा शक्ति में चींटी, केंचुआ के अलावा अन्य दृश्य-अदृस्य सूक्षम जीवों की जरूरत एवं महत्व को जानकर अब अधिकतर किसान जैविक खाद के उपयोग को अपना रहे हैं। छोटे समझ में आने वाले चींटी और केंचुआ खेती के स्वास्थ्य के लिए खासे मददगार हैं। इनकी मदद से भूमि का भुरभुरापन कायम रहता है वहीं कीट रक्षा प्रबंधन में भी ये किसान का प्राकृतिक रूप से हाथ बंटाते हैं।

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पेड़ों का महत्व

खेत का दायरा बढ़ाने के लिए आज के कृषक खेत के उन फलदार पेड़ों को काटने में भी गुरेज नहीं करते, जिन्हें उनके दूरदर्शी पूर्वजों ने बतौर विरासत सौंपा था। मौसम में इन पेड़ों से जहां फल के रूप में आय सुनिश्चित रहती है, वहीं फल, पत्ती, छाल, लकड़ी आदि से भी अतिरिक्त आय किसान को होती रहती है। अमरूद, आम, बेर, बांस, करौंदा, बेल, कैंथा, जामुन आदि के पेड़ों को खेत की मेढ़ के आसपास करीने से लगाकर किसान अपनी अतिरिक्त आय सुनिश्चित कर सकता है। इन पेड़ों पर पक्षियों का बसेरा होने से कीट-पतिंगों के नियोजन में भी किसान को मदद मिलती है। या यूं कहें कि पक्षियों के निवास के कारण कीट-पतिंगे खेत के पास कम ही फटकते हैं।

आधुनिक तरीकों का समावेश

प्राकृतिक कृषि पद्धिति में आधुनिक तरीकों का सम्मिश्रण कर किसान खेती को कम लागत वाला भरपूर मुनाफे का धंधा बना सकते हैं। उदाहरण के तौर पर सख्त भूमि, अनाज की ढुलाई आदि कृषि कार्य में ट्रैक्टर आदि की मदद ली जा सकती है। क्यारी एवं टपक सिंचन विधि में आधुनिक तरीकों का उपयोग कर उसे और लाभदायक बनाया जा सकता है। रासायनिक पदार्थों की जगह गौपालन, भेड़-बकरी पालन कर जैविक खाद का खेत पर ही उत्पादन कर प्राकृतिक चक्र बरकरार रखा जा सकता है।

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कृषि में संगीत का सहारा

कृषि में म्यूजिक का भी तड़का लगाते देखा जा रहा है। देश-विदेश के कई किसानों ने खेतों में समय आधारित राग-रागनियों की ध्वनि पैदा कर उपज पैदावार में वृद्धि के दावे किए हैं। आवाज की रिकॉर्डिंग आधारित उपकरणों एवं लाउड स्पीकर से कुत्तों या जिन जानवरों से फसल को नुकसान पहुंचाने वाले मवेशी डरते हैं की आवाज निकालकर खेतों की जानवरों से सुरक्षा की जा सकती है।

बकरी पालन व्यवसाय में है पैसा ही पैसा

बकरी पालन व्यवसाय में है पैसा ही पैसा

बकरी पालन के आधुनिक तरीके को अपना कर आप मोटा मुनाफा कमा सकते हैं। जरूरत सिर्फ इतनी है, कि आप चीजों को बारीकी से समझें और एक रणनीति बना कर ही काम करें। पेशेंस हर बिजनेस की जरूरत है, अतः उसे न खोएं, बकरी पालन एक बिजनेस है और आप इससे बढ़िया मुनाफा कमा सकते हैं।

गरीबों की गाय

पहले बकरी को गरीब किसानों की गाय कहा जाता था। जानते हैं क्यों क्योंकि बकरी कम चारा खाकर भी बढ़िया दूध देती थी, जिसे किसान और उसका परिवार पीता था। गाय जैसे बड़े जानवर को पालने की कूवत हर किसान में नहीं होती थी। खास कर वैसे किसान, जो किसी और की खेती करते थे। 

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आधुनिक बकरी पालन

अब दौर बदल गया है, अब बकरियों की फार्मिंग होने लगी है। नस्ल के आधार पर क्लोनिंग विधि से बकरियां पैदा की जाती हैं। देसी और फार्मिंग की बकरी, दोनों में फर्क होता है। यहां हम देसी की नहीं, फार्मिंग गोट्स की बात कर रहे हैं। 

जरूरी क्या है

बकरी पालन के लिए कुछ चीजें जरूरी हैं, पहला है, नस्ल का चुनाव, दूसरा है शेड का निर्माण, तीसरा है चारे की व्यवस्था, चौथा है बाजार की व्यवस्था और पांचवां या सबसे जरूरी चीज है, फंड का ऐरेन्जमेंट। ये पांच फंडे क्लीयर हैं, तो बकरी पालन में कोई दिक्कत नहीं जाएगी। 

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नस्ल या ब्रीड का चयन

अगर आप बकरी पालने का मूड बना ही चुके हैं, तो कुछ ब्रीडों के बारे में जान लें, जो आने वाले दिनों में आपके लिए फायदे का सौदा होगा। आप अगर पश्चिम बंगाल और असम में बकरी पालन करना चाहते हैं, तो आपके लिए ब्लैक बेंगार ब्रीड ठीक रहेगा। लेकिन, अगर आप यूपी, बिहार और राजस्थान में बकरी पालन करना चाहते हैं, तो बरबरी बेस्ट ब्रीड है। ऐसे ही देश के अलग-अलग हिस्सों में आप बीटल, सिरोही जैसे ब्रीड को ले सकते हैं। इन बकरियों का ब्रीड बेहतरीन है। ये दूध भी बढ़िया देती हैं, इनका दूध गाढ़ा होता है और बच्चों से लेकर बड़ों तक के लिए आदर्श माना जाता है। 

ट्रेनिंग कहां लें

आप बकरी पालन करना तो चाहते हैं, लेकिन आपको उसकी एबीसी भी पता नहीं है। तो चिंता न करें, एक फोन घुमाएं नंबर है 0565-2763320 यह नंबर केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान, मथुरा, यूपी का है। यह संस्थान आपको हर चीज की जानकारी दे देगा। अगर आप जाकर ट्रेनिंग लेना चाहते हैं, तो उसकी भी व्यवस्था है। 

शेड का निर्माण

इसका शेड आप अपनी जरूरत के हिसाब से बना सकते हैं, जैसे, शुरुआत में आपको अगर 20 बकरियां पालनी हैं, तो आप 20 गुणे 20 फुट का इलाका भी चूज कर सकते हैं। उस पर एसबेस्डस शीट लगा कर छवा दें, बकरियां सीधी होती हैं। उनको आप जहां भी रखेंगे, वो वहीं रह जाएंगी, उन्हें किसी ए सी की जरूरत नहीं होती। 

भोजन

बकरियों को हरा चारा चाहिए, आप उन्हें जंगल में चरने के लिए छोड़ सकते हैं, आपको अलग से चारे की व्यवस्था नहीं करनी होगी। लेकिन, आप अगर जंगल से दूर हैं, तो आपको उनके लिए हरे चारे की व्यवस्था करनी होगी। हरे चारे के इतर बकरियां शाकाहारी इंसानों वाले हर भोजन को बड़े प्यार से खा लेती हैं, उसके लिए आपको टेंशन नहीं लेने का। 

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कितने दिनों में तैयार होती हैं बकरियां

एक बकरी का नन्हा बच्चा/बच्ची 10 माह में तैयार हो जाता है, आपको जो मेहनत करनी है, वह 10 माह में ही करनी है। इन 10 माह में वह इस लायक हो जाएगा कि परिवार बढ़ा ले, दूध देना शुरू कर दे। 

बाजार

आपकी बकरी का नस्ल ही आपके पास ग्राहक लेकर आएगा, आपको किसी मार्केटिंग की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। इसलिए नस्ल का चयन ठीक से करें। 

फंड की व्यवस्था

आपके पास किसान क्रेडिट कार्ड है, तो उससे लोन ले सकते हैं। बकरी पालन को उसमें ऐड किया जा चुका है। केसीसी (किसान क्रेडिट कार्ड) नहीं है तो आप किसी भी बैंक से लोन ले सकते हैं। 

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कोई बीमारी नहीं

अमूमन बकरियों में कोई बीमारी नहीं होती, ये खुद को साफ रखती हैं। हां, अब कोरोना टाइप की ही कोई बीमारी आ जाए तो क्या कहा जा सकता है , इसके लिए आपको राय दी जाती है, कि आप हर बकरी का बीमा करवा लें। खराब हालात में बीमा आपकी बेहद मदद करेगा।

बरसात के मौसम में बकरियों की इस तरह करें देखभाल | Goat Farming

बरसात के मौसम में बकरियों की इस तरह करें देखभाल | Goat Farming

बरसात में बकरियों का विशेष रूप से ख्याल रखना पड़ता है। इस मौसम में उनको बीमार होने का खतरा ज्यादा रहता है। इसलिए आज हम आपको इस लेख में बताएंगे कि आप बारिश के दिनों में कैसे अपनी बकरी की देखभाल करें। गांव में गाय-भैंस की भांति बकरी पालने का भी चलन आम है। आज के वक्त में बहुत सारे लोग बकरी पालन से प्रति वर्ष मोटी आमदनी करने में सफल हैं। हालांकि, बरसात के दौरान बकरियों को बहुत सारे गंभीर रोग पकड़ने का खतरा रहता है। इस वजह से इस मौसम में पशुपालकों द्वारा उनका विशेष ख्याल रखा जाता है। आज हम आपको यह बताएंगे कि बरसात में बकरियों की देखभाल किस तरह की जा सकती है। 

बकरियों की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखें

पशुपालन विभाग द्वारा जारी सुझावों के मुताबिक, बरसात में बकरियों को जल से भरे गड्ढों अथवा खोदे हुए इलाकों से दूर रखें ताकि वे फंस न जाएं। बारिश से बचाने के लिए उन्हें घर से बाहर भी शेड के नीचे रखें। क्योंकि पानी में भीगने से उनकी सेहत पर काफी दुष्प्रभाव पड़ सकता है। 

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बकरियों के लिए चारा-जल इत्यादि की उचित व्यवस्था करें

बरसात के समय, बकरियों के लिए स्वच्छ पानी मुहैय्या कराएं। अगर वे बाहर रहते हैं, तो उनके लिए छत के नीचे पानी की व्यवस्था करें। जिससे कि वे ठंड और बरसात से बच सकें। आपको उन्हें स्वच्छ एवं सुरक्षित भोजन भी प्रदान करना होगा। बरसात में आप चारा, घास अथवा अन्य विशेष आहार उनको प्रदान कर सकते हैं। 

बकरियों के आसपास स्वच्छता का विशेष बनाए रखें

बरसात में इस बात का ध्यान रखें, कि बकरियों के आसपास की स्वच्छता कायम रहे। उनके लिए स्थायी अथवा अस्थायी शेल्टर का भी उपयोग करें, जिससे कि वे ठंड और नमी से बच सकें। 

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बकरियों का टीकाकरण कराऐं

बकरियों के स्वास्थ्य को अच्छा रखने के लिए उनको नियमित तौर पर वैक्सीनेशन उपलब्ध कराएं। इसके लिए पशु चिकित्सक से सलाह भी लें एवं उन्हें बकरियों के लिए अनुशासनिक टीकाकरण अनुसूची बनाने की बात कही है।

सरकार द्वारा जारी पांच एप जो बकरी पालन में बेहद मददगार साबित होंगे

सरकार द्वारा जारी पांच एप जो बकरी पालन में बेहद मददगार साबित होंगे

बकरी पालन एक लाभकारी व्यवसाय है। अगर आप भी वैज्ञानिकों की सलाह के अनुरूप अच्छी नस्ल की बकरी का पालन करना चाहते हैं, तो ये 5 मोबाइल एप आपकी सहायता करेंगे। ये ऐप 4 भाषाओं में मौजूद हैं। किसान भाई खेती के साथ-साथ पशुपालन भी हमेशा से करते आ रहे हैं। परंतु, कुछ ऐसे किसान भी हैं, जो अपनी आर्थिक तंगी की वजह से गाय-भैंस जैसे बड़े-बड़े पशुओं का पालन नहीं कर पाते हैं। इसलिए वह मुर्गी पालन और बकरी पालन आदि करते हैं। भारतीय बाजार में इनकी मांग भी वर्षभर बनी रहती है। यदि देखा जाए तो किसानों के द्वारा बकरी पालन सबसे ज्यादा किया जाता है। यदि आप भी छोटे पशु मतलब कि बकरी पालन (Goat Farming) से बेहतरीन मुनाफा कमाना चाहते हैं, तो आपको नवीन तकनीकों की सहायता से इनका पालन करना चाहिए। साथ ही, केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान (Central Goat Research Institute) के द्वारा निर्मित बकरी पालन से जुड़े कुछ बेहतरीन मोबाइल ऐप का उपयोग कर आप अच्छे से बकरी पालन कर सकते हैं। इन ऐप्स में वैज्ञानिक बकरी पालन, बकरियों का सही प्रबंधन, उत्पादन एवं कीमत आदि की जानकारी विस्तार से साझा की गई है।

बकरी पालन से संबंधित पांच महत्वपूर्ण एप

बकरी गर्भाधान सेतु

बकरी की नस्ल में सुधार करने के लिए बकरी गर्भाधान सेतु एप को निर्मित किया गया है। इस एप में वैज्ञानिक प्रोसेस से बकरी पालन की जानकारी प्रदान की गई है।

गोट ब्रीड ऐप

यह एप बकरियों की बहुत सारी नस्लों की जानकारी के विषय में विस्तार से बताता है, ताकि आप बेहतरीन नस्ल की बकरी का पालन कर उससे अपना एक अच्छा-खासा व्यवसाय खड़ा कर पाएं।

गोट फार्मिंग ऐप

यह एप लगभग 4 भाषाओं (हिंदी, तमिल, कन्नड़ और अंग्रेजी) में है। इसमें बकरी पालन से जुड़ी नवीन तकनीकों के विषय में बताया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें देसी नस्ल की बकरी, प्रजनन प्रबंधन, बकरी की उम्र के हिसाब से डाइट, बकरी का चारा, रखरखाव एवं देखभाल के साथ-साथ मांस और दूध उत्पादन आदि की जानकारी के विषय में जानकारी प्रदान की गई है।

बकरी उत्पाद ऐप

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि इस एप के अंदर बाजार में कौन-कौन की बकरियों की मूल्य वर्धित उत्पादों की बाजार में मांग। साथ ही, कैसे बाजार में इससे अच्छा मुनाफा उठा सकते हैं। यह एप भी हिंदी, तमिल, कन्नड़ और अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध है।

बकरी मित्र

इस एप में बकरियों के प्रजनन प्रबंधन, मार्केटिंग, आश्रय, पोषण प्रबंधन, स्वास्थ्य प्रबंधन एवं खान-पान से संबंधित जानकारी प्रदान की जाती है। साथ ही, इसमें बकरी पालन के प्रशिक्षण कार्यक्रम भी होते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें किसानों की सहायता के लिए कॉल की सुविधा भी दी गई है। जिससे कि किसान वैज्ञानिकों से बात कर बेहतर ढ़ंग से बकरी पालन कर सकें। बकरी मित्र एप को विशेषतौर पर यूपी एवं बिहार के किसानों के लिए तैयार किया गया है।
भेड़-बकरियों में होने वाले पीपीआर रोग की रोकथाम व उपचार इस प्रकार करें

भेड़-बकरियों में होने वाले पीपीआर रोग की रोकथाम व उपचार इस प्रकार करें

भेड़-बकरियों को विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ होती हैं, जिसमें से एक पीपीआर रोग भी शम्मिलित है। यह गंभीर बीमारी भेड़-बकरियों को पूर्णतय कमजोर कर देती है। परंतु, अगर आप शुरू से ही पीपीआर रोग का टीकाकरण एवं दवा का प्रयोग करें, तो भेड़-बकरियों को संरक्षित किया जा सकता है। साथ ही, इसकी रोकथाम भी की जा सकती है। बहुत सारे किसानों और पशुपालकों की आधे से ज्यादा भेड़-बकरियां अक्सर बीमार ही रहती हैं। अधिकांश तौर पर यह पाया गया है, कि इनमें पीपीआर (PPR) बीमारी ज्यादातर होती है। PPR को 'बकरियों में महामारी' अथवा 'बकरी प्लेग' के रूप में भी जाना जाता है। इसी वजह से इसमें मृत्यु दर सामान्य तौर पर 50 से 80 प्रतिशत होती है, जो कि बेहद ही गंभीर मामलों में 100 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। आज इस लेख के माध्यम से हम आपको बताऐंगे भेड़-बकरियों में होने वाली बीमारियों और उनकी रोकथाम के बारे में।

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आपको ज्ञात हो कि पीपीआर एक वायरल बीमारी है, जो पैरामाइक्सोवायरस (Paramyxovirus) की वजह से उत्पन्न होती है। विभिन्न अन्य घरेलू जानवर एवं जंगली जानवर भी इस बीमारी से संक्रमित होते रहते हैं। परंतु, भेड़ और बकरी इस बीमारी से सर्वाधिक संक्रमित होने वाले पशुओं में से एक हैं।

भेड़-बकरियों में इस रोग के होने पर क्या संकेत होते हैं

इस रोग के चलते भेड़-बकरियों में बुखार, दस्त, मुंह के छाले तथा निमोनिया हो जाता है, जिससे इनकी मृत्यु तक हो जाती है। एक अध्ययन के अनुसार भारत में बकरी पालन क्षेत्र में पीपीआर रोग से साढ़े दस हजार करोड़ रुपये की हानि होती है। PPR रोग विशेष रूप से कुपोषण और परजीवियों से पीड़ित मेमनों, भेड़ों एवं बकरियों में बेहद गंभीर और घातक सिद्ध होता है। इससे इनके मुंह से ज्यादातर दुर्गंध आना एवं होठों में सूजन आनी चालू हो जाती है। आंखें और नाक चिपचिपे अथवा पुटीय स्राव से ढक जाते हैं। आंखें खोलने और सांस लेने में भी काफी कठिनाई होती है।

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 कुछ जानवरों को गंभीर दस्त तो कभी-कभी खूनी दस्त भी होते हैं। पीपीआर रोग गर्भवती भेड़ और बकरियों में गर्भपात का कारण भी बन सकता है। अधिकांश मामलों में, बीमार भेड़ व बकरी संक्रमण के एक सप्ताह के भीतर खत्म हो जाते हैं। 

पीपीआर रोग का उपचार एवं नियंत्रण इस प्रकार करें

पीपीआर की रोकथाम के लिए भेड़ व बकरियों का टीकाकरण ही एकमात्र प्रभावी तरीका है। वायरल रोग होने की वजह से पीपीआर का कोई विशिष्ट उपचार नहीं है। हालांकि, बैक्टीरिया एवं परजीवियों पर काबू करने वाली औषधियों का इस्तेमाल करके मृत्यु दर को काफी कम किया जा सकता है। टीकाकरण से पूर्व भेड़ तथा बकरियों को कृमिनाशक दवा देनी चाहिए। सबसे पहले स्वस्थ बकरियों को संक्रमित भेड़ तथा बकरियों से अलग बाड़े में रखा जाना चाहिए, जिससे कि रोग को फैलने से बचाया जा सके। इसके पश्चात बीमार बकरियों का उपचार शुरू करना चाहिए।

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फेफड़ों के द्वितीयक जीवाणु संक्रमण को नियंत्रित करने हेतु पशु चिकित्सक द्वारा निर्धारित एंटीबायोटिक्स औषधियों (Antibiotics) का इस्तेमाल किया जाता है। आंख, नाक और मुंह के समीप के घावों को दिन में दो बार रुई से अच्छी तरह साफ करना चाहिए। इसके अतिरिक्त मुंह के छालों को 5% प्रतिशत बोरोग्लिसरीन से धोने से भेड़ और बकरियों को काफी लाभ मिलता है। बीमार भेड़ एवं बकरियों को पौष्टिक, स्वच्छ, मुलायम, नम एवं स्वादिष्ट चारा ही डालना चाहिए। PPR के माध्यम से महामारी फैलने की स्थिति में तत्काल समीपवर्ती शासकीय पशु चिकित्सालय को सूचना प्रदान करें। मरी हुई भेड़ और बकरियों को जलाकर पूर्णतय समाप्त कर देना चाहिए। इसके साथ-साथ बकरियों के बाड़ों और बर्तन को साफ व शुद्ध रखना अत्यंत आवश्यक है।

जानें दुम्बा बकरी की विशेषता और कीमत के बारे में

जानें दुम्बा बकरी की विशेषता और कीमत के बारे में

दुम्बा बकरी का बाजार में शानदार भाव इसकी खूबसरती तथा चकली के भारी पन के अधार मिलता है। बतादें, कि दो माह के समयांतराल में ही दुम्बा के बच्चे की कीमत 30000 रुपए तक पहुँच जाती है। बतादें, कि तीन चार महीने तक इसकी कीमत 70-75 हजार रुपए तक पहुँच जाती है। कृषकों की आमदनी बढ़ाने के लिए कृषि के अतिरिक्त पशुपालन भी एक शानदार विकल्प हो सकता है। पशुपालन में अब तक गाय बकरी एवं सुअर पालन के बारे में आपने सामान्यतः सुना होगा। लेकिन, दुम्बा पशुपालन इन्ही में से एक अच्छा विकल्प है। निश्चित तौर पर यह भी रोजगार का एक अच्छा विकल्प है। दुम्बा पालन की विशेष बात यह है, कि इसमें आमदनी काफी शानदार होती है। दरअसल, बाजार में दुम्बा की मांग भी होती है। इसके साथ ही, यह शीघ्रता से तैयार भी हो जाता है। अपनी इन्हीं समस्त विशेषताओं की वजह यह पशुपालन के माध्यम से पैसे कमाने का अच्छा विकल्प हो सकता है।

उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले में भी दुम्बा पालन

उत्तर प्रदेश के अमरोहा जनपद के किसान गुड्डू अंसारी विगत चार वर्षों से दुम्बा पालन कर रहे हैं। इससे वो हर एक वर्ष लाखों रुपए अर्जित कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि वो एक ऐसा रोजगार चाह रहे थे, जिसमें कम वक्त निवेश करना पड़े। साथ ही, शानदार मुनाफा प्राप्त हो इस वजह से उन्होंने दुम्बा पालन करने का निर्णय किया। गुड्ड का कहना है, कि शुरुआत में उन्होंने पांच दुम्बा से अपना व्यवसाय शुरु किया, जिसमें चार मादा एवं एक नर को रखा। इसके पश्चात उन्होंने बीस और दुम्बा खरीदा।

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दुम्बा बकरी की कीमत एवं वजन

दुम्बा बकरी की एक प्रजाति जिनकी दुम चक्की की पाट की तरह गोल और भारी होती है। दुम्बा की इस खूबी की वजह से इसकी कीमत भी अच्छी रहती है। इसलिए लोग इसे बेहद पसंद करते हैं। विशेष रूप से लोग नर को काफी ज्यादा पसंद करते हैं। साथ ही, इसके अतिरिक्त बच्चों को भी बेचते हैं। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि एक बार में दुम्बा एक ही बच्चे को पैदा करती है। बाजार मांग पर गुड्डू अंसारी उन्हें दुम्बा के बच्चे विक्रय करते हैं। दुम्बा सात माह से लगाकर 1 वर्ष के मध्य 9वें माह में बच्चा देती है। प्रारंभिक दो माह में ही बच्चा 25 – किलो का हो जाता है। इसकी शानदार खूबसरती एवं चकली के भारी पन के अनुरूप भाव मिलता है। बतादें, कि दो माह में ही दुम्बा के बच्चे की कीमत 30000 तक पहुँच जाती है। बतादें, कि तीन चार माह तक इसकी कीमत 70-75 हजार रुपए हो जाती है। दुम्बा के भाव नर अथवा मादा नहीं उसकी गुणवत्ता पर मिलते हैं। हालांकि, मादा दुम्बा का भाव अच्छा मिलता है, जो बच्चे दे सकती है। एक वर्ष के दुम्बे का वजन 100 किलोग्राम हो जाता है।

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दुम्बा पालक गुड्डू बकरी का चारा एवं रखरखाव किस तरह करते हैं

गुड्डू अंसारी का कहना है, कि वो दुम्बा को भूस की सानी खिलाते तथा चने का दाना खाने के तौर पर देते हैं। सर्दी के मौसम में चने का दाना, जौ एवं बाजरा खिलाते हैं। इसके अतिरिक्त शर्दियों से बचाने के लिए सरसों तेल का इस्तेमाल किया जाता है। 
जानें इन सरकारी योजनाओं के बारे में जिनसे आप अच्छा खासा लाभ उठा सकते हैं

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प्रधानमंत्री कुसुम योजना के अंतर्गत केंद्र सरकार सिंचाई करने हेतु सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से किसान भाइयों को अनुदान पर सोलर पंप मुहैया कराती है। भारत में किसान कृषि के साथ-साथ पशुपालन किया करते हैं। दूध उत्पाद बेचकर उनकी अच्छी आय हो सकती है। राज्य सरकारें भी पशुपालन को प्रोत्साहन देने के लिए विभिन्न प्रकार की योजनाएं जारी की जा रही हैं। साथ ही, विभिन्न राज्यों में तो दुधारू पशु पालने के लिए सीमांत किसानों को बेहतरीन पैदावार भी दी जा रही है। इस लेख में आज हम किसान भाइयों को उन मुख्य योजनाओं के विषय में बताने जा रहे हैं। जिनकी जानकारी लेकर वह सरकारी योजनाओं का खूब फायदा ले सकते हैं।

राष्ट्रीय बागवानी मिशन

राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अंतर्गत सरकार सब्जी की खेती, फल- फूल की खेती एवं औषधीय फसलों की खेती को प्रोत्साहन दे रही है। इसके लिए सरकार बंपर अनुदान दे रही है। वास्तविकता में सरकार यह मानती है, कि कम भूमि रखने वाले किसान भूमि के छोटे से हिस्से में ही सब्जी एवं फलों का उत्पादन करके बेहतरीन आय कर सकते हैं। विशेष बात यह है, कि इस मिशन के अंतर्गत किसानों को बागवानी करने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। इस मिशन के चलते किसान सब्सिड़ी पाने के लिए आवेदन कर ग्रीनहाउस, पॉलीहॉउस एवं लो टनल जैसे ढांचे लगा सकते हैं। जिसमें सब्जियों की पैदावार बेहतरीन होती है और जलवायु परिवर्तन का भी प्रभाव नहीं पड़ता है। ये भी देखें: बागवानी के साथ-साथ फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाकर हर किसान कर सकता है अपनी कमाई दोगुनी

राष्ट्रीय पशुधन मिशन

राष्ट्रीय पशुधन मिशन केंद्र द्वारा जारी की गई एक योजना है। इस योजना के अंतर्गत केंद्र सरकार सीमांत किसानों की आय को बढ़ाना चाहती है। इसके लिए सरकार की ओर से मछली पालन, बकरी पालन, भेड़ पालन एवं गाय- भैंस पालन करने वाले किसानों की आर्थिक सहायता करी जाती है। इसके अतिरिक्त किसान भाइयों को अनुदान भी दिया जाता है। ऐसी स्थिति में किसान भाई इस योजना से फायदा उठाकर अपनी कमाई में बढ़ोत्तरी कर सकते हैं। खबरों के अनुसार, इस राष्ट्रीय पशुधन मिशन के अंतर्गत गांव में पोल्ट्री फॉर्म एवं गोशाला शुरू करने के लिए 50 प्रतिशत तक अनुदान दिया जाता है। इस योजना से जुड़ी विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिए आप https://dahd.nic.in/national_livestock_miss पर जा सकते हैं।

पीएम कुसुम योजना

प्रधानमंत्री कुसुम योजना के अंतर्गत केंद्र सरकार सिंचाई करने हेतु किसान भाइयों के हित में सोलर पंप उपलब्ध कराती है। इसके लिए केंद्र सरकार किसानों को 60 प्रतिशत तक अनुदान दे रही है। देश में लाखों किसानों ने इस योजना का फायदा उठाया है। अब इन किसानों को फसलों को सिंचित करने के लिए वर्षा पर आश्रित नहीं रहना पड़ रहा है। साथ ही, यह डीजल भी नहीं खरीद रहे हैं। फिलहाल, किसान सौर उर्जा के जरिए से सिंचाई कर रहे हैं। इससे किसानों को कृषि पर किए जाने वाले व्यय से राहत मिली है। विशेष बात यह है, कि सरकार अनुदान के अतिरिक्त सोलर पंप स्थापित करने के लिए समकुल व्यय का 30 प्रतिशत कर्ज भी मुहैय्या करा रही है। यदि देखा जाए तो किसान भाइयों को केवल सोलर पंप स्थापित करने में अपनी जेब से 10 फीसद ही कुल लागत का खर्च करना होगा।