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नांदेड स्थित कपास अनुसंधान केंद्र ने विकसित की कपास की तीन नवीन किस्में

नांदेड स्थित कपास अनुसंधान केंद्र ने विकसित की कपास की तीन नवीन किस्में

किसान भाइयों की जानकारी के लिए बतादें, कि नांदेड़ मौजूद कपास अनुसंधान केंद्र ने विगत छह साल के शोध के उपरांत कपास की तीन बीटी किस्में विकसित की हैं। 

इन किस्मों को हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित केंद्रीय किस्म चयन समिति की बैठक में स्वीकृत दी गई है। दावा यह भी किया गया है, क‍ि इनके बीजों का तीन वर्ष तक इस्तेमाल किया जा सकता है। 

वसंतराव नाइक मराठवाड़ा कृषि विश्वविद्यालय, परभणी के नांदेड़ मौजूद कपास अनुसंधान केंद्र ने कपास की तीन नवीन किस्में इजात की हैं। अब इन किस्मों से किसानों को अधिक फायदा होगा। 

किसानों के लिए बीज की लागत को कम करने में सहायता मिलेगी। बतादें, कि पैदावार भी काफी अच्छी होगी। इन क‍िस्मों को शुष्क जमीन वाले इलाकों में भी उगाया जा सकता है। 

यह बीटी क‍िस्म है, बीटी कॉटन के बीज के ल‍िए किसानों को निजी कंपनियों पर आश्रित रहना पड़ता था, ज‍िससे उन्हें बीज पर अधिक धनराशि खर्च करनी पड़ती थी। वर्तमान में नवीन क‍िस्में किसानों को एक विकल्प मुहैय्या कराएगी। यूनिवर्सिटी की तरफ से यह दावा किया गया है।

कपास की तीन नई किस्में इजात की गई

नांदेड़ मौजूद कपास अनुसंधान केंद्र ने विगत छह साल के शोध के पश्चात कपास की तीन बीटी किस्में इजात की हैं। इनमें एनएच 1901 बीटी, एनएच 1902 बीटी एवं एनएच 1904 बीटी शम्मिलित हैं। 

इन किस्मों को वर्तमान में नई दिल्ली में आयोजित केंद्रीय किस्म चयन समिति की बैठक में स्वीकृति दी गई है। इनकी बिजाई लागत संकर किस्मों की तुलना में कम होने का दावा क‍िया गया है। दावा यह भी किया गया है, क‍ि इनके बीजों का तीन वर्ष तक इस्तेमाल किया जा सकता है। 

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ये किस्में क‍िन राज्यों के ल‍िए विकसित की गई हैं

बतादें, कि इन किस्मों में खादों का उपयोग भी कम होगा। हालांकि, किसानों की तरफ से कपास की ऐसी किस्मों की मांग है। परंतु, किस्मों की अनुपलब्धता की वजह राज्य में सबसे ज्यादा संकर कपास की खेती की गई है। 

इस जरूरत को ध्यान में रखते हुए ही नवीन क‍िस्में तैयार की गई हैं। महाराष्ट्र प्रमुख कपास उत्पादक राज्य है। यहां बड़े पैमाने पर क‍िसान कॉटन की खेती पर न‍िर्भर हैं। ये तीन नवीन क‍िस्में महाराष्ट्र, गुजरात एवं मध्य प्रदेश के ल‍िए उपयुक्त हैं।

दक्ष‍िण भारत के ल‍िए विकसित की गई अलग क‍िस्म

यह दावा किया गया है, क‍ि परभणी कृषि विश्वविद्यालय कपास की सीधी किस्मों को बीटी तकनीक में परिवर्तित करने वाला राज्य का पहला कृषि विश्वविद्यालय बन चुका है। 

इससे पूर्व यह प्रयोग नागपुर के केंद्रीय कपास अनुसंधान केंद्र ने किया था। यह किस्म अब किसानों को आगामी वर्ष में खेती के लिए उपलब्ध होगी।

साथ ही, परभणी के मेहबूब बाग कपास अनुसंधान केंद्र ने स्वदेशी कपास की एक सीधी किस्म 'पीए 833' विकसित की है, जो दक्षिण भारत के लिए अनुकूल है। 

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विकसित की गई इन तीन नवीन क‍िस्मों की विशेषता

कपास की इन तीन नवीन क‍िस्मों में संकर किस्म के मुकाबले में कम रासायनिक उर्वरकों की जरूरत होती है। इस किस्म में रस चूसने वाले कीट, जीवाणु झुलसा रोग और पत्ती धब्बा रोग नहीं लगता है। 

यह इन रोगों के प्रत‍ि बेहद सहनशील है। इस किस्म की कपास का उत्पादन 35 से 37 प्रतिशत है। धागों की लंबाई मध्यम है। मजबूती और टिकाऊपन भी काफी अच्छा है। यूनिवर्सिटी का दावा है, कि यह किस्म सघन खेती के लिए भी अच्छी है।

कपास की उन्नत किस्मों के बारे में जानें

कपास की उन्नत किस्मों के बारे में जानें

कपास की खेती भारत में बड़े पैमाने पर की जाती है। कपास को नकदी फसल के रूप में भी जाना जाता है। कपास की खेती ज्यादातर बारिश और खरीफ के मौसम में की जाती है। 

कपास की खेती के लिए काली मिट्टी को उपयुक्त माना जाता है। इस फसल का काफी अच्छा प्रभाव हमारे देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है, क्योंकि यह एक नकदी फसल है। कपास की कुछ उन्नत किस्में भी हैं ,जिनका उत्पादन कर किसान मुनाफा कमा सकता है। 

 1 सुपरकॉट BG II 115 क़िस्म

यह क़िस्म प्रभात सीड की बेस्ट वैरायटी में से एक है। इस किस्म की बुवाई सिंचित और असिंचित दोनों क्षेत्रों में की जा सकती है। 

यह किस्म कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगना और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में ज्यादातर की जाती है। इस किस्म के पौधे ज्यादातर लम्बे और फैले हुए होते है। 

इस बीज की बुवाई कर किसान एक एकड़ जमीन में 20 -25 क्विंटल की पैदावार प्राप्त कर सकता है। यह फसल 160 -170 दिन में पककर तैयार हो जाती है। 

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2 Indo US 936, Indo US 955   

कपास की यह वैरायटी इंडो अमेरिकन की वेरायटीज में टॉप पर आती है। कपास की इस किस्म की खेती गुजरात और मध्य प्रदेश में की जाती है। इसकी खेती के लिए बहुत ही हल्की मिट्टी वाली भूमि की आवश्यकता रहती है। 

इस किस्म में कपास के बोल का वजन 7 -10 ग्राम होता है। कपास की इस किस्म में 45 -48 दिन फूल आना शुरू हो जाते है। यह किस्म लगभग 155 -165 दिन में पककर तैयार हो जाती है। 

इस किस्म में आने वाले फूल का रंग क्रीमी होता है। Indo US 936, Indo US 955 की उत्पादन क्षमता प्रति एकड़ 15 -20 क्विंटल है। 

3 Ajeet 177BG II 

यह किस्म सिंचित और असिंचित दोनों क्षेत्रों में उगाई जा सकती है। इस किस्म में कपास के पौधे की लम्बाई 145 से 160 सेंटीमीटर होती है। कपास की इस किस्म में बनने वाली बोल का वजन 6 -10 ग्राम होता है। 

Ajeet 177BG II में अच्छे किस्म के रेशें होते हैं। कपास की इस किस्म में पत्ती मोड़क कीड़े लगने की भी बहुत कम संभावनाएं होती हैं। 

यह फसल 145 -160 दिन के अंदर पककर तैयार हो जाती है। प्रति एकड़ में इसकी उत्पादन क्षमता 22 -25 क्विंटल होती है।     

4 Mahyco Bahubali MRC 7361 

इस किस्म का ज्यादातर उत्पादन राजस्थान, महाराष्ट्रा, कर्नाटक, तेलंगना, आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु में होता है। यह मध्यम काल अवधि में पकने वाली फसल है। 

कपास की इस किस्म का वजन भी काफी अच्छा रहता है। प्रति एकड़ में इस फसल की पैदावार 20 -25 क्विंटल के आस पास हो जाती है। 

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5 रासी नियो 

कपास की यह किस्म हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र,तेलंगाना,गुजरात और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में ज्यादातर उगाई जाती है। चूसक कीड़ों के लिए यह किस्म सहिष्णु होती है। 

कपास की इस किस्म के पौधे हरे भरे होते है। रासी नियो की उत्पादन क्षमता प्रति एकड़ 20 -22 क्विंटल होती है। इस किस्म को हल्की और मध्यम भूमि के लिए काफी उपयुक्त माना गया है। 

कृषि वैज्ञानिक कपास की इन किस्मों की बुवाई करने की सलाह दे रहे हैं

कृषि वैज्ञानिक कपास की इन किस्मों की बुवाई करने की सलाह दे रहे हैं

वर्तमान में गेहूं की फसल की कटाई हो चुकी है। साथ ही, कपास की बुवाई (cotton sowing) का वक्त प्रारंभ हो गया है। अब ऐसी स्थिति में जो किसान गेहूं के पश्चात कपास की खेती (cotton cultivation) करना चाहते हैं, उनके लिए कपास की बुवाई की कई बेहतरीन किस्में हैं, जो बेहतर उत्पादन प्रदान कर सकती हैं। 

कृषि वैज्ञानिकों ने अमेरिकन कपास या नरमा की खेती करने वाले कृषकों के लिए सलाह भी जारी कर दी है। इसके लिए कृषि वैज्ञानिकों की तरफ से कपास की अनुशंसित किस्में लगाने की सलाह दी जा रही है। 

इसके साथ इसकी बुवाई में ध्यान रखने वाली आवश्यक बातों के विषय में भी बताया जा रहा है। विभाग की तरफ से राजस्थान के कृषकों को 20 मई तक कपास की बिजाई करने के लिए कहा जा रहा है, जिससे कि कपास में गुलाबी सुंडी का प्रकोप न हो सके। इसके साथ ही कपास की उन्नत किस्मों के विषय में भी बताया जा रहा है।

नरमा (कपास) की आर.एस. 2818 किस्म 

RS of Narma (Cotton) 2818 नरमा आर.एस किस्म से 31 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उपज हांसिल की जा सकती है। इसके रेशे की लंबाई 27.36 मिलीमीटर, मजबूती 29.38 ग्राम टेक्स आंकी गई है। 

टिंडे का औसत भार 3.2 ग्राम होता है। बिनौलों में 17.85 प्रतिशत तेल की मात्रा पाई जाती है। इसकी ओटाई 34.6 प्रतिशत आंकी गई है।

नरमा (कपास) की आर.एस. 2827 किस्म 

RS of Narma (Cotton) 2827 नरमा (कपास) की आर.एस- 2827 किस्म से औसत 30.5 क्विंटल प्रति हैक्टेयर पैदावार प्राप्त की जा सकती है। 

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इसके रेशे की लंबाई 27.22 मिलीमीटर व मजबूती 28.86 ग्राम व टेक्स आंकी गई है। इसके टिंडे का औसत वजन 3.3 ग्राम होता है। इसके बिनौले में तेल की मात्रा 17.2 फीसद होती है।

नरमा (कपास) की आर.एस. 2013 किस्म

RS of Narma (Cotton) 2013 नरमा (कपास) की आरएस 2013 किस्म की ऊंचाई 125 से 130 सेमी होती है। इसकी पत्तियां मध्यम आकार की व हल्के हरे रंग की होती हैं। 

इसके फूलों की पखुड़ियों का रंग पीला होता है। यह किस्म 165 से 170 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म में गुलाबी सुड़ी द्वारा हानि अन्य किस्मों की अपेक्षा कम होती है। 

यह किस्म पत्ती मरोड़ विषाणु बीमारी के प्रति भी अवरोधी है। इस किस्म से प्रति हैक्टेयर 23 से 24 क्विंटल तक पैदावार प्राप्त की जा सकती है।

नरमा (कपास) की आरएसटी 9 किस्म 

RST 9 variety of Narma (cotton) नरमा (कपास) की आरएसटी 9 किस्म के पौधे की ऊंचाई 130 से 140 सेमी तक होती है। इसकी पत्तियां हल्के रंग की होती हैं और फूल का रंग हल्का पीला होता है। 

इसमें चार से छह एकांक्षी शाखाएं होती हैं। इसके टिंडे का आकार मध्यम है, जिसका औसत वजन 3.5 ग्राम होता है। यह किस्म 160 से 200 दिन में पककर तैयार हो जाती है। 

तेला (जेसिड) रोग से इस किस्म में कम हानि होती है। इस किस्म की ओटाई का प्रतिशत भी अन्य अनुमोदित किस्मों से अधिक है।

नरमा (कपास) की आर.एस. 810 किस्म

RS of Narma (Cotton) 810 नरमा (कपास) की आर.एस. 810 किस्म के पौधे की ऊंचाई 125 से 130 सेमी होती है। इसके फूलों का रंग पीला होता है। इसके टिंडे का आकार छोटा करीब 2.50 से 3.50 ग्राम होता है। 

इसके रेशे की लंबाई 24 से 25 मिलीमीटर व ओटाई क्षमता 33 से 34 फीसद होती है। यह किस्म 165 से 175 दिन में पककर तैयार हो जाती है। 

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यह किस्म पत्ती मोड़क रोग की प्रतिरोधी है। इस किस्म से लगभग 23 से 24 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उपज हांसिल की जा सकती है।

नरमा (कपास) की आर.एस. 875 किस्म

RS of Narma (Cotton) 875 नरमा (कपास) की आर.एस. 875 किस्म के पौधों की ऊंचाई 100 से 110 सेमी होती है। इसकी पत्तियां चौड़ी व गहरे हरे रंग की होती हैं। इसमें शून्य यानी जीरो से एक एकांक्षी शाखाएं पाई जाती हैं। 

इसके टिंडे का आकार मध्यम होता है और औसत वजन 3.5 ग्राम होता है। इसके रेशे की लंबाई 27 मिलीमीटर होती है। इसमें तेल की मात्रा 23 प्रतिशत पाई जाती है, जो कि अन्य अनुमोदित किस्मों से ज्यादा है। 

इस किस्म की फसल 150 से 160 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इससे उसी खेत में सामान्य समय पर गेहूं की बुवाई भी की जा सकती है।

बीकानेरी नरमा

बीकानेरी नरमा  (Bikaneri Narma) किस्म के पौधे की ऊंचाई लगभग 135 से 165 सेमी होती है। इसकी पत्तियां छोटी, हल्के हरे रंग की होती है और फूल छोटे और हल्के पीले रंग के होते हैं। 

इसमें चार से छह एकांक्षी शाखाएं पाई जाती हैं। इसके टिंडे का आकार मध्यम और औसत वजन 2 ग्राम होता है। इसकी फसल 160 से 200 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म में तेला (जेसिड) से अपेक्षाकृत कम हानि होती है।

मरू विकास (राज, एच.एच. 6) 

Desert Development (Kings, HH 6) नरमा (कपास) की मरू विकास (राज, एच.एच. 6) के पौधों की ऊंचाई 100 से 110 सेमी. और पत्तियां चौड़े आकार की होती हैं। इसका रंग हरे रंग का होता है। 

इसमें शून्य यानी जीरो से एक एकांक्षी शाखाएं पाई जाती हैं। इसके टिंडे का आकार मध्यम और औसत वजन 3.5 ग्राम होता है। इसके रेशे की लंबाई 27 मिलीमीटर होती है। 

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इसमे तेल की मात्रा 23 प्रतिशत पाई जाती है। इस किस्म की फसल 150 से 160 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इससे उसी खेत में सामान्य समय पर गेहूं की बुवाई कर सकते हैं।

नरमा कपास की उन्नत किस्मों की बुवाई का तरीका 

नरमा कपास की उन्नत किस्मों की बुवाई के लिए 4 किलोग्राम प्रति बीघा की दर से बीज की जरूरत पड़ती है। बुवाई के दौरान पंक्ति से पंक्ति का फासला 67.50 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे का फासला लगभग 30 सेंटीमीटर रखना चाहिए।

नरमा की बुवाई का समय 15 अप्रैल से 15 मई तक माना जाता है। लेकिन किसान मई के अंत तक इसकी बिजाई कर सकते हैं।

कपास की खेती में लगने वाले कीटों से जुड़ी जानकारी

कपास की खेती में लगने वाले कीटों से जुड़ी जानकारी

कपास संपूर्ण भारत के कृषकों के लिए एक नकदी फसल मानी जाती है। इसकी खेती सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि दुनियाभर में भी की जाती है। लेकिन कपास के उत्पादन में भारत का स्थान सबसे पहले आता है। 

चूँकि कपास एक नकदी फसल है, इस वजह से इसकी खेती किसानों की अर्थव्यवस्था में भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। 

विगत कुछ वर्षों में कपास फसल के उत्पादन और कीमत में काफी बढ़ोतरी देखी गई है। कपास की फसल से जहाँ एक तरफ किसान अधिक आय प्राप्त करते हैं, तो वहीं दूसरी ओर किसानों को अपनी फसल से कीटों एवं रोगों की वजह से काफी हानि भी झेलनी पड़ती है। 

जी हाँ, अधिकांश तोर पर मौसम में ज्यादा नमी और अनियमितता की वजह से फसल में कई तरह के कीटों का आक्रमण हो जाता है, जो फसलों को काफी हानि पहुंचाते हैं। 

साथ ही, किसानों की मेहनत और आमदनी को भी प्रभावित करते हैं। इसलिए यदि आपने भी अपने खेतों में कपास की खेती की है एवं उसमें किसी भी प्रकार के कीटों के हमले का सामना कर रहे हैं, तो आप इस लेख में बताए गए सुझाव के अनुरूप अपनी कपास की फसल को बचाकर रख सकते हैं।  

कपास की फसल में लगने वाले विभिन्न कीट

1- अमेरिकन बॉलवॉर्म/ अमेरिकन सुंडी 

  • वैज्ञानिक नाम: हेलिकोवर्पा आर्मिगेरा
  • कीट की प्रभावित करने वाली अवस्था – लार्वा 
  • कीट के आक्रमण की अवस्था – सभी अवस्था में 

लक्षण 

लार्वा पत्तियों, फूलों और छोटे बीजकोषों को खाते हैं। लार्वा पहले पत्तियों को खाते हैं, फिर उनके सिर अंततः उनके शरीर को एक वर्ग में अंदर की ओर धकेल देते हैं या बाकी को बाहर छोड़ देते हैं। 

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क्षतिग्रस्त बीजकोषों के आधार पर बड़े गोलाकार छेद नजर आते हैं और छेदों के अंदर मल भरा हुआ होता है। एक अकेला लार्वा 30 से 40 फलदार रूपों या बीजकोषों को समाप्त कर सकता है। बोल्स और प्रभावित हिस्से टूटकर गिर जाते हैं। 

ऐसी परिस्थितियाँ जो अमेरिकन बॉलवर्म द्वारा कपास की फसल में संक्रमण को बढ़ावा देती हैं। अनुकूल परिस्थितियों में निरंतर फसल और मोनोक्रॉपिंग तथा फसल के अवशेषों की उपस्थिति व अत्यधिक नाइट्रोजनयुक्त उर्वरक का उपयोग।  

2- पिंक बॉलवॉर्म / गुलाबी सुंडी:

  • वैज्ञानिक नाम – पेक्टिनोफोरो गॉसिपिएला
  • कीट की प्रभावित करने वाली अवस्था – लार्वा 
  • कीट के आक्रमण की अवस्था – फसल की मध्य अवस्था से लेकर अंत अवस्था तक 

लक्षण  

  • यह कीट कपास के बीजकोषों को खाने के अलावा, लार्वा फूलों की कलियों और फूलों को भी खा जाते हैं।
  • “गुलाबी फूल” गुलाबी बॉलवॉर्म के हमले का खास लक्षण है।
  • लार्वा का मल उन छिद्रों में भर जाता है।
  • यह कीट कपास के बीजों को लिंट के जरिए से बीजकोषों में छेद करके खाता है।
  • संक्रमित कलियाँ और अपरिपक्व बीजकोष काफी शीघ्रता से गिर जाते हैं।
  • ऐसी परिस्थितियाँ जो पिंक बॉलवर्म द्वारा कपास की फसल में संक्रमण को बढ़ावा देती हैं। जैसे कि बार-बार सिंचाई करना, उर्वरकों का अत्यधिक प्रयोग करना, मोनोक्रॉपिंग करना और कृषि संबंधी प्रथाओं में विलंभ होना।

मानसून सीजन में तेजी से बढ़ने वाली ये 5 अच्छी फसलें

मानसून सीजन में तेजी से बढ़ने वाली ये 5 अच्छी फसलें

मानसून का मौसम किसान भाइयों के लिए कुदरती वरदान के समान होता है। मानसून के मौसम होने वाली बरसात से उन स्थानों पर भी फसल उगाई जा सकती है, जहां पर सिंचाई के साधन नहीं हैं। पहाड़ी और पठारी इलाकों में सिंचाई के साधन नही होते हैं। इन स्थानों पर मानसून की कुछ ऐसी फसले उगाई जा सकतीं हैं जो कम पानी में होतीं हों। इस तरह की फसलों में दलहन की फसलें प्रमुख हैं। इसके अलावा कुछ फसलें ऐसी भी हैं जो अधिक पानी में भी उगाई जा सकतीं हैं। वो फसलें केवल मानसून में ही की जा सकतीं हैं। आइए जानते हैं कि कौन-कौन सी फसलें मानसून के दौरान ली जा सकतीं हैं।

मानसून सीजन में बढ़ने वाली 5 फसलें:

1.गन्ना की फसल

गन्ना कॉमर्शियल फसल है, इसे नकदी फसल भी कहा जाता है। गन्ने  की फसल के लिए 32 से 38 डिग्री सेल्सियस का तापमान होना चाहिये। ऐसा मौसम मानसून में ही होता है। गन्ने की फसल के लिए पानी की भी काफी आवश्यकता होती है। उसके लिए मानसून से होने वाली बरसात से पानी मिल जाता है। मानसून में तैयार होकर यह फसल सर्दियों की शुरुआत में कटने के लिए तैयार हो जाती है। फसल पकने के लिए लगभग 15 डिग्री सेल्सियश तापमान की आवश्यकता होती है। गन्ने की फसल केवल मानसून में ही ली जा सकती है। इसकी फसल तैयार होने के लिए उमस भरी गर्मी और बरसात का मौसम जरूरी होता है। गन्ने की फसल पश्चिमोत्तर भारत, समुद्री किनारे वाले राज्य, मध्य भारत और मध्य उत्तर और पूर्वोत्तर के क्षेत्रों में अधिक होती है। सबसे अधिक गन्ने का उत्पादन तमिलनाडु राज्य  में होता है। देश में 80 प्रतिशत चीनी का उत्पादन गन्ने से ही किया जाता  है। इसके अतिरिक्त अल्कोहल, गुड़, एथेनाल आदि भी व्यावसायिक स्तर पर बनाया जाता है।  चीनी की अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मांग को देखते हुए किसानों के लिए यह फसल अत्यंत लाभकारी होती है। [embed]https://www.youtube.com/watch?v=XeAxwmy6F0I&t[/embed]

2. चावल यानी धान की फसल

भारत चावल की पैदावार का बहुत बड़ा उत्पादक देश है। देश की कृषि भूमि की एक तिहाई भूमि में चावल यानी धान की खेती की जाती है। चावल की पैदावार का आधा हिस्सा भारत में ही उपयोग किया जाता है। भारत के लगभग सभी राज्यों में चावल की खेती की जाती है। चावलों का विदेशों में निर्यात भी किया जाता है। चावल की खेती मानसून में ही की जाती है क्योंकि इसकी खेती के लिए 25 डिग्री सेल्सियश के आसपास तापमान की आवश्यकता होती है और कम से कम 100 सेमी वर्षा की आवश्यकता होती है। मानसून से पानी मिलने के कारण इसकी खेती में लागत भी कम आती है। भारत के अधिकांश राज्यों व तटवर्ती क्षेत्रों में चावल की खेती की जाती है। भारत में धान की खेती पारंपरिक तरीकों से की जाती है। इससे यहां पर चावल की पैदावार अच्छी होती है। पूरे भारत में तीन राज्यों  पंजाब,पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक चावल की खेती की जाती है। पर्वतीय इलाकों में होने वाले बासमती चावलों की क्वालिटी सबसे अच्छी मानी जाती है। इन चावलों का विदेशों को निर्यात किया जाता है। इनमें देहरादून का बासमती चावल विदेशों में प्रसिद्ध है। इसके अलावा पंजाब और हरियाणा में भी चावल केवल निर्यात के लिए उगाया जाता है क्योंकि यहां के लोग अधिकांश गेहूं को ही खाने मे इस्तेमाल करते हैं। चावल के निर्यात से पंजाब और हरियाणा के किसानों को काफी आय प्राप्त होती है। [embed]https://www.youtube.com/watch?v=QceRgfaLAOA&t[/embed]

3. कपास की फसल

कपास की खेती भी मानसून के सीजन में की जाती है। कपास को सूती धागों के लिए बहुमूल्य माना जाता है और इसके बीज को बिनौला कहते हैं। जिसके तेल का व्यावसायिक प्रयोग होता है। कपास मानसून पर आधारित कटिबंधीय और उष्ण कटिबंधीय फसल है। कपास के व्यापार को देखते हुए विश्व में इसे सफेद सोना के नाम से जानते हैं। कपास के उत्पादन में भारत विश्व का दूसरा बड़ा देश है। कपास की खेती के लिए 21 से 30 डिग्री सेल्सियश तापमान और 51 से 100 सेमी तक वर्षा की जरूरत होती है। मानसून के दौरान 75 प्रतिशत वर्षा हो जाये तो कपास की फसल मानसून के दौरान ही तैयार हो जाती है।  कपास की खेती से तीन तरह के रेशे वाली रुई प्राप्त होती है। उसी के आधार पर कपास की कीमत बाजार में लगायी जाती है। गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश,हरियाणा, राजस्थान, कर्नाटक,तमिलनाडु और उड़ीसा राज्यों में सबसे अधिक कपास की खेती होती है। एक अनुमान के अनुसार पिछले सीजन में गुजरात में सबसे अधिक कपास का उत्पादन हुआ था। अमेरिका भारतीय कपास का सबसे बड़ा आयातक है। कपास का व्यावसायिक इस्तेमाल होने के कारण इसकी खेती से बहुत अधिक आय होती है। [embed]https://www.youtube.com/watch?v=nuY7GkZJ4LY[/embed]

4.मक्का की फसल

मक्का की खेती पूरे विश्व में की जाती है। हमारे देश में मक्का को खरीफ की फसल के रूप में जाना जाता है लेकिन अब इसकी खेती साल में तीन बार की जाती है। वैसे मक्का की खेती की अगैती फसल की बुवाई मई माह में की जाती है। जबकि पारम्परिक सीजन वाली मक्के की बुवाई जुलाई माह में की जाती है। मक्का की खेती के लिए उष्ण जलवायु सबसे उपयुक्त रहती है। गर्म मौसम की फसल है और मक्का की फसल के अंकुरण के लिए रात-दिन अच्छा तापमान होना चाहिये। मक्के की फसल के लिए शुरू के दिनों में भूमि ंमें अच्छी नमी भी होनी चाहिए। फसल के उगाने के लिए 30 डिग्री सेल्सियश का तापमान जरूरी है। इसके विकास के लिए लगभग तीन से चार माह तक इसी तरह का मौसम चाहिये। मक्का की खेती के लिए प्रत्येक 15 दिन में पानी की आवश्यकता होती है।मक्का के अंकुरण से लेकर फसल की पकाई तक कम से कम 6 बार पानी यानी सिंचाई की आवश्यकता होती है  अर्थात मक्का को 60 से 120 सेमी वर्षा की आवश्यकता होती है। मानसून सीजन में यदि पानी सही समय पर बरसता रहता है तो कोई बात नहीं वरना सिंचाई करने की आवश्यकता होती है। अन्यथा मक्का की फसल कमजोर हो जायेगी। भारत में उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, कर्नाटक में सबसे अधिक मक्का की खेती होती है। छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, जम्मू कश्मीर और हिमाचल में भी इसकी खेती की जाती है।

5.सोयाबीन की फसल

सोयाबीन ऐसा कृषि पदार्थ है, जिसका कई प्रकार से उपयोग किया जाता है। साधारण तौर पर सोयाबीन को दलहन की फसल माना जाता है। लेकिन इसका तिलहन के रूप में बहुत अधिक प्रयोग होने के कारण इसका व्यापारिक महत्व अधिक है। यहां तक कि इसकी खल से सोया बड़ी तैयार की जाती है, जिसे सब्जी के रूप में प्रमुखता से इस्तेमाल किया जाता है। सोयाबीन में प्रोटीन, कार्बोहाइडेट और वसा अधिक होने के कारण शाकाहारी मनुष्यों के लिए यह बहुत ही फायदे वाला होता है। इसलिये सोयाबीन की बाजार में डिमांड बहुत अधिक है। इस कारण इसकी खेती करना लाभदायक है। सोयाबीन की खेती मानसून के दौरान ही होती है। इसकी बुवाई जुलाई के अन्तिम सप्ताह में सबसे उपयुक्त होती है। इसकी फसल उष्ण जलवायु यानी उमस व गर्मी तथा नमी वाले मौसम में की जाती है। इसकी फसल के लिए 30-32 डिग्री सेल्सियश तापमान की आवश्यकता होती है और फसल पकने के समय 15 डिग्री सेल्सियश के तापमान की जरूरत होती है।  इस फसल के लिए 600 से 850 मिलीमीटर तक वर्षा चाहिये। पकने के समय कम तापमान की आवश्यकता होती है। [embed]https://www.youtube.com/watch?v=AUGeKmt9NZc&t[/embed]
ग्रीव्स कॉटन एसटी960 पावर टिलर से कृषि को बनाएं आसान

ग्रीव्स कॉटन एसटी960 पावर टिलर से कृषि को बनाएं आसान

किसान भाई कृषि के लिए विभिन्न कृषि यंत्रों अथवा उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं। कृषि उपकरण खेतीबाड़ी के बहुत सारे कार्यों को कम लागत और कम वक्त में पूरा करने में सहयोग करते हैं। 

खेती के कार्यों को पूरा करने के लिए किसानों को मजदूर और मजदूरी लागत पूरी करने के लिए विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ता है। 

खेती के कार्यों में कृषि मशीनें भिन्न-भिन्न भूमिका निभाती हैं। इनमें एक पावर टिलर मशीन भी शम्मिलित है, जो खेत की मृदा को तैयार करने, बीज बोने और बुवाई करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। 

अगर आप भी खेती के लिए एक शक्तिशाली पावर टिलर मशीन खरीदने की योजना बना रहें हैं, तो आपके लिए ग्रीव्स कॉटन एसटी960 पावर टिलर काफी बेहतरीन विकल्प हो सकता है।

ग्रीव्स कॉटन एसटी960 की क्या-क्या विशेषताएं हैं ? 

ग्रीव्स कॉटन एसटी960 पावर टिलर में 744 सीसी क्षमता वाला सिंगल सिलेंडर में Water Cooled, Horizontal, 4 Stroke, Direct Injection, Diesel इंजन दिया गया है, जो 12 एचपी उत्पन्न करता है। 

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कंपनी के इस पावर टिलर में Wet, Oil Bath टाइप एयर फिल्टर आता है, जो धूल-मृदा से इंजन को सुरक्षित रखता है। इस ग्रीव्स कॉटन पावर टिलर में आपको 11 लीटर क्षमता वाला फ्यूल टैंक देखने को मिल जाता है। 

इस पावर टिलर मशीन का समकुल भार 480 किलोग्राम है। आप इस मशीन के साथ 1.2 से 1.5 घंटे तक बगैर किसी रुकावट के कार्य कर सकते हैं। इस पावर टिलर मशीन के इंजन से 2000 आरपीएम उत्पन्न होता है। 

ग्रीव्स कॉटन एसटी960 पावर टिलर को 2910 MM लंबाई और 920 MM चौड़ाई के साथ 1200 MM ऊंचाई में तैयार किया है। इसका ग्राउंड क्लीयरेंस 210 MM निर्धारित किया गया है।

ग्रीव्स कॉटन एसटी960 के फीचर्स क्या-क्या हैं ?

ग्रीव्स कॉटन एसटी960 पावर टिलर में 6 Forward + 2 Reverse गियर वाला Combination of ding & Constant Mesh गियरबॉक्स प्रदान किया गया है। 

यह पावर टिलर काफी शानदार ग्रिप वाले हैंडल के साथ आता है, जिससे घंटो खेत में निरंतर काम करने के बाद भी किसान को कम से कम थकान का अहसास होता है। 

ग्रीव्स कॉटन के इस पावर टिलर के साथ आप 600 MM चौड़ाई और 150 MM गहराई तक जुताई कर सकते हैं। इस पावर टिलर में आपको Hand Operated ब्रेक्स देखने को मिल जाते हैं। 

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कंपनी ने अपने इस पावर टिलर में 6-12, (6-Ply Rating) टायर दिए है, जो हर तरह के मौसम में काम कर सकते हैं।

ग्रीव्स कॉटन एसटी960 की कितनी कीमत है ?

भारत में ग्रीव्स कॉटन एसटी960 पावर टिलर की कीमत 1.72 लाख से 2.25 लाख रुपये निर्धारित की गई है। इस पावर टिलर के साथ आप जुताई, पोखर बनाना, बुवाई, निराई, सिंचाई, छिड़काव और ढुलाई जैसे कार्यों को कर सकते हैं।

कपास की उन्नत किस्में लगाएँ

कपास की उन्नत किस्में लगाएँ

कम पानी वाले इलाकों में गर्मियों में कपास की खेती की जाती है। ​महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश सहित कई अन्य राज्यों में कपास की खेती किसान करते हैं। 

अब देशी कपास के बजाय हाइिब्रिज और बीटी कपास का क्षेत्र लगतार बढ़ रहा है। इसके लिए जरूरी है कि कपास की उन्नत किस्मों की जानकारी किसानों को हो। 

कपास की खेती के लिए अभी तक उन्नत किस्मों के हा​इब्रिड एनआरसी 7365, एसीएच 177-2, शक्ति 9, पीसीएच 9611, आरसीएच 314, 602, 791,776,650,773, 653, 809 नेमकोट 617,2502-2,311-1, केसीएच 999,  जेकेसीएच 8940, 841-2, एसीएच 155-2, एनएसपीएल 252, सीआरसीएच 653, एबीसीएच 243, एमएच 5302, एसडबल्यूसीएच 4757, 4748, वीआईसीएच 308, आईसीएच 809,जेकेसीएच 0109, अंकुर 3244 की संस्तुति की गई है। 

इसके अलावा उत्तर  प्रदेश के लिए देशी किस्मों में पुरानी लोहित, आरजी 8, सीएडी 4, सभी 150 से 180 दिन लेती हैं। औसत उपज 13 से 16 कुंतल प्रति हैक्टेयर है। 

अमेरिकन कपास की उन्नत किस्में की एचएस 6, विकास, एच 777, एफ 846, आरएस 810 से भी उपरोक्तानुसार उपज मिलती है। कपास की उन्नत किस्में कम लागत, कम पानी और जमीन से कम पोषक तत्वों का अवशेषण करती है।

इसकी जडें मूसला होती हैं यानी यह जमीन में काफी गहरे तक चली जाती हैं। जमीन की उपज क्षमता बढ़ाने के लिए भी यह बेहद अच्दी फसल है। इसके पत्ते झड़ कर खेत में खाद का काम करते हैं।

कपास की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

कपास की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

कपास की खेती को नगदी फसल के रूप में जाना जाता है. एक प्रश्न ये भी उठता है कि कपास की खेती कहाँ होती है? इसको भारत के लगभग सभी राज्यों में उगाया जाता है. 

मुख्य रूप से इसे गुजरात में सबसे ज्यादा उगाया जाता है. वैसे तो इसको उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटका आदि राज्यों में भी उगाया जाता है. कपास को सफेद सोना भी बोला जाता है. 

इसको सफेद सोना इस लिए बोला जाता है क्योंकि इसके उत्पादन से किसानों को अच्छी आय होती है तथा इससे उनके जीवन स्तर में सुधार आता है. 

आजकल कपास की भी कई उन्नत और नई प्रजातियां आ गई है इसलिए इसे किसी भी तरह की मिटटी में उगाया जा सकता है. लम्बे रेशे वाली कपास को सर्वोत्तम माना जाता है. इसकी पैदावार भी ज्यादा होती है.

कपास की खेती के लिए उपयुक्त मिटटी:

कपास की खेती के लिए मिटटी या कपास की खेती के लिए सबसे अच्छी मिटटी कौन सी होती है. इस पर हम चर्चा करेंगें. वैसे तो कपास के लिए दोमट, काली और बलुई मिटटी सर्वोत्तम होती है. 

इस मिटटी में इसकी फसल ज्यादा उपजाऊ होती है लेकिन आजकल इतनी प्रजातियां आ चुकी हैं की अपने खेत की मिटटी के हिसाब से आप प्रजाति का चुनाव कर सकते हैं और कपास की अच्छी पैदावार ले सकते हैं.

कपास की खेती कैसे होती है:

कपास की खेती के लिए ज्यादा पानी की आवश्यकता नहीं होती है कम पानी में भी इसकी अच्छी खेती की जा सकती है. इसकी फूल आने के समय बारिश से फसल ख़राब हो जाती है.

ध्यान रखें की बुवाई में इतना समय हो की फूल आने के समय बारिश न हो नहीं तो इसका फूल ख़राब हो जाता है. इसके खेत को तैयार करने के बाद बोने से पहले एक रात का समय दिया जाना चाहिए और इसकी बुवाई शाम के समय में करनी चाहिए. 

कपास की खेती को तेज धूप की जरूरत होती है. इसके फूल जब अच्छे से खिल जाए तभी इनको तोडा जाए अन्यथा की स्थिति में इसके कच्चे फूल पूरे पके फूलों को भी ख़राब कर सकते हैं.

खेत की तैयारी:

खेत की तैयारी करते समय हमें पहली जोत गहरी लगानी चाहिए जिससे की नीचे की मिटटी ऊपर आ जाए और खेत की उपजाऊ मिटटी ऊपर आ जाए. इससे आपकी फसल को पोषक तत्व मिलेंगें. 

इसके बाद इसमें गोबर की सड़ी हुई खाद लगभग 40 से 60 क्विंटल पर एकड़ के हिसाब से मिलाना चाहिए. इसके बाद इसकी पलेवा करके जब मिटटी भुरभुरी होने लायक हो जाए तो कल्टीवेटर से जुताई कर के उस पर पाटा लगा देना चाहिए. 

जिससे की खेत समतल हो जाये. उसके बाद एक रात का समय देकर अगले दिन शाम को खेत की बुवाई कर देनी चाहिए.

कपास की खेती का इतिहास / कपास कितने प्रकार के होते हैं:

कपास सामान्यतः 3 प्रकार के होते हैं.

  1. लम्बे रेशे वाली कपास.
  2. मध्य रेशे वाली कपास.
  3. छटे रेशे वाली कपास.
1 - लम्बे रेशे वाली कपास: लम्बे रेशे वाली कपास को सबसे उत्तम कपास माना जाता है. इसके रेशों की लम्बाई लगभग 5 सेंटीमीटर से ज्यादा होती है. इस श्रेणी की कपास का इस्तेमाल उच्च कोटि या महगे कपड़ों को बनाने में किया जाता है. भारत में इस श्रेणी की किस्मों को दूसरे नंबर पर उगाया जाता है. कुल उत्पादन में इसका 40% हिस्सा होता है. इसकी खेती मुख्य रूप से गुजरात के तटीय हिस्सों में की जाती है. इस कारण इसे समुद्र द्वीपीय कपास भी कहा जाता है. 

2 - मध्य रेशे वाली कपास: इस श्रेणी के कपास के रेशों की लम्बाई 3.5 से 5 सेंटीमीटर तक पाई जाती है. इसे मिश्रित श्रेणी की कपास भी कहा जाता है. इस श्रेणी की किस्मों को भारत के लगभग सभी राज्यों में उगाया जाता है. कुल उत्पादन में इसका सबसे ज्यादा 45% हिस्सा होता है. 

3 - छोटे रेशे वाली कपास: इस श्रेणी की कपास के रेशों की लम्बाई 3.5 सेंटीमीटर से कम होती है. कपास की इन किस्मों को उत्तर भारत में ज्यादा उगाया जाता है. जिनमें असम, हरियाणा, राजस्थान, त्रिपुरा, मणिपुर, आन्ध्र प्रदेश, पंजाब, उत्तर प्रदेश और मेघालय शामिल हैं. उत्पादन की दृष्टि से इस श्रेणी की कपास का उत्पादन कुल उत्पादन का 15% होता है.

कपास के बीज को क्या कहते हैं:

कपास की खेती

सामान्यतः कपास के बीज को बिनोला कहा जाता है. इसके बीज को रुई से अलग करके दुधारू पशुओं को खिलाया जाता है जिससे की उनका दूध गाढ़ा और ताकतवर होता है. 

बिनोला खाने वाले पशु के दूध में घी की मात्रा बढ़ जाती है. कपास को ओषधि के रूप में भी प्रयोग में लाया जाता है. कपास स्वभाव वश प्रकृति से मधुर, थोड़ी गर्म तासीर की होती है। 

इसके अलावा यह पित्त को बढ़ाने वाली, वातकफ दूर करने वाली, रुचिकारक; प्यास, जलन, थकान, बेहोशी, कान में दर्द, कान से पीब निकलना, व्रण या घाव, कटने-छिलने जैसे शारीरिक समस्याओं के लिए औषधि के रुप में काम करती है।

इसके बीज  (बिनोला ) मधुर, गर्म, स्निग्ध, वात दूर करने वाले,स्तन का आकार बढ़ाने वाले तथा वात कफ को बढ़ाने वाले होते हैं। कपास का अर्क या काढ़ा सिर और कान दर्द को कम करने के साथ-साथ शंखक रोग नाशक होता है। 

कपास के फल कड़वे, मधुर, गर्म, रुचिकारक तथा वातकफ कम करने वाले होते हैं। बीज रोपाई करने का तरीका: बीज रोपाई का तरीका आप पवेर ( बीज छिड़कना ) कर भी बोया जा सकता है. 

जो किसान भाई कई सालों से खेती करते आ रहे हैं तो वो अपने आप ही ऐसे पवेर करते हैं की हर बीज एक निश्चित दूरी पर गिरता है. 

अगर आपको पवेर करना नहीं आता है तो आप ट्रेक्टर द्वारा मशीन से भी इसकी बुबाई कर सकते हैं. इसमें पौधे से पौधे की दूरी करीब 50 सेंटी मीटर रखनी चाहिए जिससे की पौधे को फूलने का पर्याप्त जगह मिलें.

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फसल की तुड़ाई:

कपास की फसल की तुड़ाई

जब इसका फूल पूरी तरह से खिल जाये और थोड़ा बहार की तरफ निकलने लगे तो समझो की इसको अब अलग कर लेना चाहिए. ध्यान रहे कि कच्चे या अधपके फूल को नहीं निकलना चाहिए. 

ये दूसरे फूलों को भी पीलापन दे देता है. इसको तोड़ते समय ध्यान रखने योग्य बातें है कि इसकी सुखी हुई पत्तियां कपास में नहीं मिलनी चाहिए. 

इसको तोड़ कर धूप में पूरी तरह से सूखा लेना चाहिए. इससे इसको रूई में पीलापन नहीं आता है. इसकी तुड़ाई ओस सूखने के बाद ही करनी चाहिए.

कपास की पैदावार से आमदनी:

किसानों को कपास की खेती से अच्छी आमदनी होती है. इसकी अलग-अलग किस्मों से अलग-अलग पैदावार मिलती हैं. जहां देसी किस्मों की खेती होती है, 

वहां लगभग 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और जहां अमेरिकन संकर किस्मों की खेती होती है, वहां लगभग 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार हो सकती है. 

बाजार में इसका भाव 5 हज़ार प्रति क्विंटल के हिसाब से होता है, इसलिए किसान एक हेक्टेयर से एक बार में लगभग 3 लाख से ज्यादा पैसा कमा कर सकते हैं.

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कपास में लगने वाले रोग:

सामान्यतः कपास में रोग काम ही आता है. लेकिन कभी कभी मौसम ख़राब या ज्यादा बारिश भी कपास में रोगों को बढाती है. 

  1. हरा मच्छर: ये पौधों की पत्तियों पर निचे की तरफ चिपक के उनका रास चूसता रहता है तथा पत्ती को सुखा देता है. 
  2. सफेद मक्खी: सफेद मक्खी भी इसी तरह निचे वाली सतह पर चिपक कर पत्ती का रास चूसती रहती है. 
  3. चितकबरी सुंडी: इसका प्रकोप जब पेड़ पर फूल और टिंडे बनने के समय दिखाई देता है. इसके प्रकोप से टिंडे के अंदर ही फूल नष्ट हो जाता है. 
  4. तेला: फसल पर तेला रोग भी कीटों की वजह से लगता हैं. इसके कीट का रंग काला होता है तथा ये तेल जैसा पदार्थ छोड़ता रहता है इस लिए इसको तेल भी बोला जाता है. जो आकर में छोटा दिखाई देता हैं. यह कीट नई आने वाली पत्तियों को ज्यादा नुकसान पहुंचता है. 
  5. तम्बाकू लट: पौधे को ये कीट सबसे ज्यादा नुक्सान पहुँचाता है. यह कीट एक लम्बे कीड़े के रूप में होता है. जो पत्तियों को खाकर उन्हें जालीनुमा बना देता हैं. इससे पत्तियां सूख जाती हैं तथा धीरे धीरे पेड़ ही नष्ट हो जाता है. 
  6. झुलसा रोग: पौधों पर लगने वाला झुलसा रोग सबसे खरनाक रोग हैं. इसके लगने पर टिंडों पर काले रंग के चित्ते बनने लगते हैं. और टिंडे समय से पहले ही खिलने लग जाते हैं. जिनकी गुणबत्ता अच्छी नहीं होती तथा ये दूसरे फूलों को भी ख़राब कर देते हैं. 
  7. पौध अंगमारी रोग: इस रोग के लगने पर कपास के टिंडों के पास वाले पत्तों पर लाल कलर दिखाई देने लगता है. इसके लगने पर खेत में नमी के होने पर भी पौधा मुरझाने लगता हैं. 
  8. अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा रोग: अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा रोग बीज जनित रोग होता है. इसके लगने पर शुरुआत में पौधों की पत्तियों पर भूरें रंग के छोटे धब्बे बनने लगते हैं 
  9. जड़ गलन रोग: जड़ गलन की समस्या पौधों में ज्यादा पानी की वजह से होता है. इसकी रोकथाम का सबसे अच्छा उपचार खेत में पानी जमा ना होने दें. जड़ गलन का रोग मुख्य रूप से बारिश के मौसम में देखने को मिलता है.

किसानों के लिए सफेद सोना साबित हो रही कपास की खेती : MSP से डबल हो गए कपास के दाम

किसानों के लिए सफेद सोना साबित हो रही कपास की खेती : MSP से डबल हो गए कपास के दाम

MSP से डबल हो गए कपास के दाम - किसानों के लिए सफेद सोना साबित हो रही कपास की खेती

नई दिल्ली। कपास की खेती करने वाले किसानों की इस साल खूब बल्ले-बल्ले हुई है। बाजार में कपास को अच्छा भाव मिला है। एमएसपी से भी डबल दामों में कपास की बिक्री हुई। 

कपास की खेती किसानों के लिए सफेद सोना साबित हुई है। लांग स्टेपल कॉटन का न्यूनतम समर्थन मूल्य 6025 रुपए प्रति क्विंटल है। जबकि बाजार में इसके भाव 12000 से 13000 रुपए प्रति क्विंटल चल रहा है। 

ऐसे में किसानों के लिए इस बार कपास की खेती सफेद सोना बनी हुई है। पिछले साल प्रकृति के कहर से सभी फसल बर्बाद हुईं थीं। उधर कपास को अच्छा भाव भी नहीं मिला। 

जिसके चलते किसानों व बड़े व्यापारियों ने कपास का भंडारण भी कम ही किया गया। जिसके चलते इस बार कपास की फसल ने किसानों को अच्छा मुनाफा दिया है। और उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले सीजन में भी कपास की खेती फायदे का सौदा रहेगी।

कपास के बीज खरीदने लगे किसान

- कपास की खेती करने वाले किसानों ने कपास के बीज खरीदना शुरू कर दिया है। कपास के बीज बिक्री पर 31 मई तक रोक थी, 

अब बाजार में कपास के बीज की बिक्री शुरू हो गई है। अनुमान है कि बारिश होते ही कपास की बुवाई शुरू हो जाएगी। 

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कपास के पौधों का रखरखाव एवं बचाव

- कपास की खेती में जब पौधों में फूल लगने वाले हो तब खरपतवार पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। उस समय कई तरह के खरपतवार उग आते है, जिसमे कई प्रकार की कीट जन्म लेते है | 

यही कीट पौधों में कई तरह के रोग उत्पन्न करते है। इन रोगो से बचाव के लिए ही खरपतवार नियंत्रण पर अधिक ध्यान देना चाहिए। इसके लिए समय-समय पर कपास के खेत की निराई – गुड़ाई करते रहना चाहिए। 

खेत में बीज लगाने के 25 दिन के बाद से ही निराई-गुड़ाई शुरू कर देनी चाहिए। इससे पौधों के विकास में किसी तरह की रुकावट नहीं आती है, तथा पौधे अच्छे से विकास भी कर पाते है।

कैसे करें कपास की फसल की सिंचाई

- कपास की खेती में बहुत ही कम पानी की जरूरत होती है, यदि फसल बारिश के मौसम में की गयी है तो इसे पहली सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है, 

और यदि खेती बारिश के मौसम में नहीं की गयी है तो 45 दिन के बाद सिंचाई कर देनी चाहिए। कपास के पौधे अधिक धूप में अच्छे से विकसित होते है 

इसलिए पहली सिंचाई करने के बाद जरूरत पड़ने पर ही इसकी सिंचाई करनी चाहिए किन्तु पौधों में फूल लगने के वक़्त खेत में नमी की उचित मात्रा बनी रहनी चाहिए जिससे पौधों के फूल झड़े नहीं, किन्तु अधिक पानी भी नहीं देना चाहिए इससे फूलो के ख़राब होने का खतरा हो सकता। ----- लोकेन्द्र नरवार

महाराष्ट्र में शुरू हुई कपास की खेती के लिए अनोखी मुहिम - दोगुनी होगी किसानों की आमदनी

महाराष्ट्र में शुरू हुई कपास की खेती के लिए अनोखी मुहिम - दोगुनी होगी किसानों की आमदनी

कपास की खेती से दोगुनी होगी किसानों की आमदनी - महाराष्ट्र में शुरू हुई कपास की खेती के लिए अनोखी मुहिम

मुम्बई। कपास की खेती किसानों के लिए सफेद सोना बन गई है। भले ही केन्द्र सरकार ने वित्तीय वर्ष 2022-23 के लिए कॉटन का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 6380 रु. तय किया है। जबकि महाराष्ट्र में किसानों को कॉटन का भाव 12000 रु. प्रति क्विंटल मिल रहा है। इसीलिए इस साल कपास की बुवाई पर किसान काफी जोर दे रहे हैं। कृषि विभाग भी चाहता है कि किसान ज्यादा से ज्यादा कपास की बुवाई करें, जिससे किसानों को फायदा मिले। और किसानों की आमदनी दोगुनी हो जाए। कृषि विभाग के अधिकारियों के मार्गदर्शन और किसानों की भागी से इस बार उत्पादन में वृद्धि होने की उम्मीद जताई जा रही है। महाराष्ट्र के कई गांवों में कपास की एक ही किस्म लगाने और उत्पादन में इजाफा करने का प्लान बनाया गया है।

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कपास का रकबा बढाने के लिए पहल

- 'एक-गांव, एक-पहल' के तहत महाराष्ट्र के 63 गांवों में 6 हजार 225 हेक्टेयर में एक साथ कपास की बुवाई की जाएगी। इसकी शुरुआत भी हो चुकी है। यहां कपास का रकबा साल दर साल बढ़ रहा है। इस अभियान का मकसद तभी पूरा होगा, जब किसानों को फसल का पूरा दाम मिले। ये भी देखें: कपास की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

ये ब्लॉक होंगे अभियान में शामिल

- 'एक गांव-एक किस्म' अभियान के तहत नगर तालुका में 9 गांव शामिल होंगे। इसमें 774 हेक्टेयर में कपास की खेती होगी। पथरडी तालुका में 13 गांवों को शामिल किया गया है। इनमें 1460 हेक्टेयर क्षेत्र शामिल होगा। शेवगांव तालुका के 8 गांवों में 1 हजार 200 हेक्टेयर एरिया शामिल किया जाएगा। इस पहल के जरिए रकबा तो बढ़ेगा ही साथ में उत्पादन में भी इजाफा होगा. जिससे किसानों की आय बढ़ेगी। ------ लोकेन्द्र नरवार
कपास की फसल को गुलाबी सुंडी से खतरा, कृषि विभाग ने जारी किया अलर्ट

कपास की फसल को गुलाबी सुंडी से खतरा, कृषि विभाग ने जारी किया अलर्ट

सिरसा। किसानों के लिए वरदान बनी कपास की खेती को गुलाबी सुंडी (Pink bollworm) का खतरा हो सकता है। हरियाणा राज्य में कृषि विभाग ने इसके लिए अलर्ट जारी किया है। 

सरकार ने कपास की खेती करने वाले सभी किसान भाईयों को गुलाबी सुंडी से कपास की फसल को बचाने के लिए निर्देश भी दिए हैं। पिछले दो साल से कपास की खेती किसानों के लिए सफेद सोना साबित हुई है। 

कपास ने किसानों को अच्छा मुनाफा दिया है। जिसके चलते किसानों में लगातार कपास की खेती के प्रति रुचि बढ़ रही है। अकेले सिरसा जिले में 2 लाख 10 हजार हेक्टेयर भूमि पर कपास की खेती की जा रही है।

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क्या है गुलाबी सुंडी?

- कपास की कलियों और बीजकोषों को क्षति का कारण गुलाबी सुंडी (इल्ली) पेक्टिनोफोरा गॉसिपिएला का लार्वा है। वयस्कों का रंग और आकार अलग-अलग होता है लेकिन आम तौर पर वे चित्तीदार धूसर से धूसर-भूरे होते हैं। 

वे दिखने में लंबे पतले और भूरे से होते हैं। अंडाकार पंख झालरदार होते हैं। करीब 4 से 5 दिन में लार्वा अंडे से बाहर निकल आते हैं। और तुरंत ही कपास की कलियों या बीजकोष में घुस जाते हैं। और फिर करीब 12 से 14 दिन तक फसल को खाता है।

कैसे करें गुलाबी सुंडी से बचाव?

1- जैविक नियंत्रण के अनुसार पेक्टिनोफोरा गॉसिपिएला से प्राप्त सेक्स फेरोमोन्स का संक्रमित खेत में छिड़काव करने से गुलाबी सुंडी की क्षमता और तादात कम होती है। 

2- रासायनिक नियंत्रण के अनुसार इन गुलाबी पतंगों को मारने के लिए क्लोरपाइरिफास, एस्फेंवैलेरेट या इंडोक्साकार्ब के कीटनाशक फार्मूलेशन का पत्तियों पर छिड़काव किया जा सकता है।

 3- कीट के लक्षणों को पहचानने के लिए नियमित कपास के पौधों पर निगरानी रखें।

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कपास की उन्नत किस्में लगाएँ 

4- कपास की जल्द परिवक्व होने वाली वैरायटी का उपयोग करें, ताकि सीजन शुरू होने से पहले ही फसल की उपज मिल जाए। आमतौर पर गुलाबी सुंडी सीजन में ज्यादा जोर पकड़ती है।

5- कीटनाशक दवाओं का सावधानी से प्रयोग करें, ताकि कोई नुकसान न हो। 

6- कटाई के तुरंत बाद पौधों को नष्ट कर देना चाहिए। 

7- ध्यान रहे कि कभी भी दो रासायनिक पदार्थों को मिलाकर छिड़काव न करें। इससे फसल को नुकसान संभावना बढ़ जाती है। 8- अधिकांश तौर पर नीम आधारित दवाओं का इस्तेमाल करें। 

 ------- लोकेन्द्र नरवार

पंजाबः पिंक बॉलवर्म, मौसम से नुकसान, विभागीय उदासीनता, फसल विविधीकरण से दूरी

पंजाबः पिंक बॉलवर्म, मौसम से नुकसान, विभागीय उदासीनता, फसल विविधीकरण से दूरी

लक्ष्य की आधी हुई कपास की खेती, गुलाबी सुंडी के हमले से किसान परेशान

मुआवजा न मिलने से किसानों ने लगाए आरोप

भूजल एवं कृषि
भूमि की उर्वरता में क्षय के निदान के तहत, पारंपरिक खेती के साथ ही फसलों के विविधीकरण के लिए, केंद्र एवं राज्य सरकारें फसल विविधीकरण प्रोत्साहन योजनाएं संचालित कर रही हैं। इसके बावजूद हैरानी करने वाली बात है कि, सरकार से सब्सिडी जैसी मदद मिलने के बाद भी किसान फसल विविधीकरण के तरीकों को अपनाने से कन्नी काट रहे हैं।

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क्या वजह है कि किसान को फसल विविधीकरण विधि रास नहीं आ रही? क्यों किसान इससे दूर भाग रहे हैं? इन बातों को जानिये मेरी खेती के साथ। लेकिन पहले फसल विवधीकरण की जरूरत एवं इसके लाभ से जुड़े पहलुओं पर गौर कर लें।

फसल विविधीकरण की जरूरत

खेत पर परंपरागत रूप से साल दर साल एक ही तरह की फसल लेने से खेत की उपजाऊ क्षमता में कमी आती है। एक ही तरह की फसलें उपजाने वाला किसान एक ही तरह के रसायनों का उपयोग खेत में करता है। इससे खेत के पोषक तत्वों का रासायनिक संतुलन भी गड़बड़ा जाता है।

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भूमि, जलवायु, किसान का भला

यदि किसान एक सी फसल की बजाए भिन्न-भिन्न तरह की फसलों को खेत में उगाए तो ऐसे में भूमि की उर्वरकता बरकरार रहती है। निवर्तमान जैविक एवं प्राकृतिक खेती की दिशा में किए जा रहे प्रयासों से भी भूमि, जलवायुु संग कमाई के मामले में किसान की स्थिति सुधरी है।

नहीं अपना रहे किसान

पंजाब सरकार द्वारा विविधीकृत कृषि के लिए किसानों को सब्सिडी प्रदान करने के बावजूद किसान कृषि की इस प्रणाली की ओर रुख नहीं कर रहे है। प्रदेश में आलम यह है कि यहां कुछ समय तक विविधीकरण खेती करने वाले किसान भी अब पारंपरिक मुख्य खेती फसलों की ओर लौट रहे हैं।

किसानों को नुकसान

पंजाब सरकार खरीफ कृषि के मौसम में पारंपरिक फसल धान की जगह अन्य फसलों खास तौर पर कम पानी में पैदा होने वाली फसलों की फार्मिंग को सब्सिडी आदि के जरिए प्रेरित कर रही है।

सब्सिडी पर नुकसान भारी

सरकार द्वारा दी जा रही सब्सिडी के मुकाबले विविधीकृत फसल पर कीटों के हमले से प्रभावित फसल का नुकसान भारी पड़ रहा है।

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पंजाब के किसानों क मुताबिक उन्हें विविधीकरण कृषि योजना के तहत सब्सिडी आधारित फसलों पर कीटों के हमले के कारण पैदावार कम होने से आर्थिक नुकसान हो रहा है। इस कारण उन्होंने फसल विविधीकरण योजना एवं इस किसानी विधि से दूसी अख्तियार कर ली है।

कपास का लक्ष्य अधूरा

पंजाब कृषि विभाग द्वारा संगरूर जिले में तय किया गया कपास की खेती का लक्ष्य तय मान से अधूरा है। कपास के लिए निर्धारित 2500 हेक्टेयर खेती का लक्ष्य यहां अभी तक आधा ही है।

पिंक बॉलवर्म (गुलाबी सुंडी)

किसान कपास की खेती का लक्ष्य अधूरा होने का कारण पिंक बॉलवर्म का हमला एवं खराब मौसम की मार बताते हैं।

गुलाबी सुंडी क्या है

गुलाबी सुंडी (गुलाबी बॉलवार्म), पिंक बॉलवर्म या गुलाबी इल्ली (Pink Bollworm-PBW) कीट कपास का दुश्मन माना जाता है। इसके हमले से कपास की फसल को खासा नुकसान पहुंचता है। किसानो के मुताबिक, संभावित नुकसान की आशंका ने उनको कपास की पैदावार न करने पर मजबूर कर दिया। एक समाचार सेवा ने अधिकारियों के हवाले से बताया कि, जिले में 2500 हेक्टेयर कपास की खेती का लक्ष्य तय मान से अधूरा है, अभी तक केवल 1244 हेक्टेयर में ही कपास की खेती हो पाई है।

7 क्षेत्र पिंक बॉलवर्म प्रभावित

विभागीय तौर पर फिलहाल अभी तक 7 क्षेत्रों में पिंक बॉलवर्म के हमलों की जानकारी ज्ञात हुई है। विभाग के अनुसार कपास के कुल क्षेत्र के मुकाबले प्रभावित यह क्षेत्र 3 प्रतिशत से भी कम है।

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नुकसान आंकड़ों में भले ही कम हो, लेकिन पिछले साल हुए नुकसान और मुआवजे संबंधी समस्याओं के कारण भी न केवल फसल विविधीकरण योजना से जुड़े किसान अब योजना से पीछे हट रहे हैं, बल्कि प्रोत्साहित किए जा रहे किसान आगे नहीं आ रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में किसानों ने बताया कि, पिछली सरकार ने पिंक बॉलवर्म के हमले से हुए नुकसान के लिए आर्थिक सहायता देने का वादा किया था।

नहीं मिला धान का मुआवजा

भारी बारिश से धान की खराब हुई फसल के लिए मुआवजे से वंचित किसान प्रभावित 47 गांवों के किसानों की इस तरह की परेशानी पर नाराज हैं।

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बार-बार नुकसान वजह

किसानों की फसल विविधीकरण योजना से दूरी बनाने का एक कारण उन्हें इसमें बार-बार हो रहा घाटा भी बताया जा रहा है। दसका गांव के एक किसान के मुताबिक इस वर्ष गेहूं की कम उपज से उनको बड़ा झटका लगा। पिछले दो सीजन से नुकसान होने की जानकारी किसानों ने दी है। कझला गांव के एक किसान ने खेती में बार-बार होने वाले नुकसान को किसानों को नई फसलों की खेती के प्रयोग से दूर रहने के लिए मजबूर करने का कारण बताया है। उन्होंने कई किसानों का उदाहरण सामने रखने की बात कही जो, फसल विविधीकरण के तहत अन्य फसलों के लिए भरपूर मेहनत एवं कोशिशों के बाद वापस धान-गेहूं की खेती करने में जुट गए हैं। किसानों के अनुसार फसल विविधीकरण के विस्तार के लिए प्रदेश में सरकारी मदद की कमी स्पष्ट गोचर है।

सिर्फ जानकारी से कुछ नहीं होगा

इलाके के किसानो का कहना है कि, जागरूकता कार्यक्रमों के जरिए सिर्फ जानकारी प्रदान करने से लक्ष्य पूरे नहीं होंगे। उनके मुताबिक कृषि अधिकारी फसलों की जानकारी तो प्रदान करते हैं, लेकिन फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रोत्साहन राशि के साथ अधिकारी किसानों के पास बहुत कम पहुंचते हैं।

हां नुकसान हुआ

किसान हित के प्रयासों में लगे अधिकारियों ने भी क्षेत्र में फसलों को नुकसान होने की बात कही है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार किसानों को हो रहे नुकसान को उन्होंने भी फसल विविधीकरण नहीं अपनाने की वजह माना है। नाम पहचान की गोपनीयता रखने की शर्त पर कृषि विकास अधिकारी ने बताया कि, फसल के नुकसान की वजह से कृषक फसल विविधीकरण कार्यक्रम में अधिक रुचि नहीं दिखा रहे हैं। उन्होंने बताया कि, केवल 1244 हेक्टेयर भूमि पर इस बार कपास की खेती की जा सकी है।