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इस राज्य सरकार ने होली के अवसर पर गन्ना किसानों के खाते में भेजे 2 लाख करोड़

इस राज्य सरकार ने होली के अवसर पर गन्ना किसानों के खाते में भेजे 2 लाख करोड़

मुख्यमंत्री ने बताया है, कि भारत में नया रिकॉर्ड स्थापित होने जा रहा है। पहली बार दो लाख करोड़ से ज्यादा का गन्ना भुगतान किसानों भाइयों के बैंक खातों में हस्तांतरित हो रहा है। भारत के विभिन्न राज्य ऐसे भी हैं, जिनका सालाना बजट भी दो लाख करोड़ नहीं है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा सोमवार को यह दावा किया गया है, कि योगी सरकार द्वारा गन्ना किसानों को दलालों की चपेट से निजात प्रदान की है। विगत छह सालों के उनके शासन में प्रदेश में एक भी किसान ने आत्महत्या नहीं की है। मुख्यमंत्री ने होली से पूर्व गन्ना किसानों के बैंक खाते में शेष भाव के दो लाख करोड़ रुपये हस्तांतरित किए जाने के मोके पर कहा, कि पिछली सरकारों में किसान आत्महत्या को मजबूर रहता था। आज मैं गर्व से कह सकता हूं कि बीते छह सालों में उत्तर प्रदेश में कोई भी किसान भाई आत्महत्या करने पर मजबूर नहीं हुआ है। यह इसलिए संभव हो पाया है, कि हमारी सरकार में किसानों भाइयों के गन्ना मूल्य का भुगतान कर दिया गया है। समयानुसार धान एवं गेहूं की खरीद की है। योगी जी ने कहा है, कि याद कीजिए एक वक्त वो था जब राज्य के गन्ना किसान खेतों में ही अपनी फसल को जलाने के लिए मजबूर थे। उन्हें सिंचाई हेतु न तो वक्त से जल प्राप्त होता था और ना ही बिजली मुहैय्या कराई जाती थी। इतना ही नहीं समुचित समयानुसार किसानों की बकाया धनराशि का भुगतान भी नहीं हो पाता था। इसी कड़ी में योगी ने आगे बताया कि आज का दिन गन्ना किसानों के लिए ऐतिहासिक होने वाला है, जब होली की पूर्व संध्या पर सोमवार को दो लाख करोड़ की धनराशि उनके बैंक खातों में सीधे तौर पर हस्तांतरित करदी है। सरकार के इस ऐतिहासिक कदम से प्रदेश के गन्ना किसानों की होली की खुशी को दोगुना कर दिया जाएगा।

दलालों की दलाली की बंद

योगी जी ने कहा है, कि विगत समय पर जल, खाद एवं उत्पादन का सही भाव न मिलने की वजह से खेती-किसानी नुकसान का सौदा मानी जाती थी। हमने गन्ना किसानों को दलालों के दलदल से मुक्ति दिलाई है। आजकल किसान भाइयों को खरीद पर्ची हेतु इधर-उधर चक्कर नहीं काटने पड़ते हैं। उनकी पर्ची उनके स्मार्टफोन में पहुँच जाती है। मुख्यमंत्री ने बताया, कि आज किसानों के नाम पर शोषण एवं दलाली करने वालों की दुकान बंद हो गई हैं। ऐसी स्थिति में मानी सी बात है, कि उन्हें समस्या रहेगी।

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कोरोना महामारी के समय में भी 119 चीनी मिलें चालू हो रही थीं

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी का कहना है, कि विगत सरकारों के कार्यकाल में जहां चीनी मिलें बंद कर दी जाती थी। अन्यथा उचित गैर उचित भावों में बेच दी जाती थीं। जबकि, योगी सरकार द्वारा किसी चीनी मिल को बंद नहीं किया गया। साथ ही, बंद पड़े चीनी मिलों को पुनः आरंभ कराने का काम किया गया है। उन्होंने बताया कि, मुंडेरवा एवं पिपराइच चीनी मिलों को पुनः सुचारु किया गया है। कोरोना महामारी के चलते जब विश्व की चीनी मिलें बंद हो गई थीं। उस दौर में भी उत्तर प्रदेश में 119 चीनी मिलें चालू हो रही थीं।
दोगुना मुनाफा देने वाली हल्दी की खेती से संबंधित सम्पूर्ण जानकारी

दोगुना मुनाफा देने वाली हल्दी की खेती से संबंधित सम्पूर्ण जानकारी

किसान भाइयों आज के इस लेख में हम आपको ऐसे फसल के बारे में बताएंगे, जिसकी मांग खेती के साथ-साथ व्यवसाय में भी बहुत होती है। उस फसल का नाम है हल्दी। जी हाँ, हल्दी की मांग भोजन के साथ साथ व्यवसायिक क्षेत्र में इसके अंदर विघमान औषधीय गुणों की वजह से बनी रहती है। 

इसलिए किसान भाइयों के लिए हल्दी की खेती करना एक बड़े मुनाफे का सौदा साबित हो सकता है। यदि हल्दी की खेती के साथ-साथ आप हल्दी का कारोबार भी करते हैं, तो आपको और अधिक लाभ प्राप्त होगा। 

हल्दी के अंदर बहुत सारे औषधीय गुण विघमान होते हैं। अब ऐसे में यदि आप हल्दी की खेती करेंगे तो आपको तगड़ा मुनाफा हांसिल होगा। 

हल्दी की खेती कब और कैसे करें ? 

हल्दी की बुवाई मई-जून के दौरान की जाती है। हल्दी की खेती करने के लिए सर्वप्रथम खेत की 2-3 बार बेहतर ढ़ंग से जोत देना चाहिए। इससे मृदा भुरभुरी हो जाएगी। मिट्टी जितनी भुरभुरी होगी, उसमें हल्दी उतनी ही अच्छे ढ़ंग से बैठेगी।

खेत में जल निकासी की बेहतरीन सुविधा होनी जरूरी है, जिससे कि पानी ना रुके वरना हल्दी की फसल बर्बाद हो सकती है। हल्दी की खेती उसके छोटे-छोटे अंकुरित बीजों द्वारा की जाती है। 

हल्दी की खेती कतारबद्ध तरीके से की जाती है और थोड़ी बड़ी होने पर उस पर दोनों तरफ से थोड़ी-थोड़ी मिट्टी चढ़ा दी जाती है। 

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क्योंकि, इसकी वजह से हल्दी को फैलने और अच्छे से बैठने के लिए पर्याप्त मात्रा में मिट्टी और स्थान मिल जाता है। इसकी फसल लगभग 8 महीने में पककर तैयार हो जाती है। 

हल्दी की फसल की सबसे खास बात यह है, कि यह छायादार स्थान में भी शानदार उपज देती है। ऐसे में यदि आप बागवानी करते हैं, तो पेड़ों के मध्य की भूमि में आप हल्दी लगा सकते हैं और अतिरिक्त आय भी कर सकते हैं। 

हल्दी की खेती से कितनी उपज प्राप्त होगी ? 

हल्दी की खेती का उत्पादन काफी सीमा तक इस बात पर भी आश्रित होता है, कि आप किस गुणवत्ता का बीज लगाते हैं। हल्दी के बीज लेते समय ख्याल रखें, कि उन्हें शानदार ढ़ंग से उपचारित किया गया हो और उनमें बेहतर तरीके से अंकुर आ गया हो। 

बीज जितने मजबूत होंगे, आपकी फसल उतनी ही अच्छी होगी। इसके बीज आप अपने समीपवर्ती किसी बीज भंडार से ले सकते हैं अथवा फिर किसी ऐसे किसान से बीज प्राप्त कर सकते हैं, जिसने पहले हल्दी की खेती की हो। 

ये भी जानकारी कर लें कि आस-पास कोई सरकारी संस्था भी हल्दी के बीज उपलब्ध कराती है या नहीं। सरकारी संस्था से आपको बेहतरीन बीज भी काफी सस्ते भाव में मिल जाएंगे। एक हेक्टेयर में हल्दी की खेती के लिए आपको लगभग 20 क्विंटल तक बीज की आवश्यकता पड़ेगी। 

हल्दी की खेती में आने वाला खर्चा और लाभ  

हल्दी की खेती में लगभग 40-50 हजार रुपये का तो बीज ही लग जाएगा। वहीं, इसकी बुवाई से लेकर सिंचाई, उर्वरक और फिर कटाई तक में भी आपका लगभग 50 हजार रुपये की लागत आ जाएगी। 

मतलब कि 1 हेक्टेयर (करीब 2.5 एकड़) में हल्दी की खेती में आपकी करीब 1 लाख रुपये की लागत आ जाएगी। यदि आपकी फसल सही रहती है, तो आप एक हेक्टेयर से 200 क्विंटल तक हल्दी की उपज आसानी से हासिल कर सकते हैं। यह आराम से 160-180 क्विंटल तक मिल ही जाती है। 

यदि मान लें कि आपकी फसल औसत रहती है और आपको केवल 160 क्विंटल ही हल्दी हांसिल होती है तो भी आपको लाभ ही होगा। कच्ची हल्दी बाजार में बेचने से फायदा नहीं होता है, ऐसे में उसे उबालकर सुखाया जाता है और फिर पीसकर बेचा जाता है। 

सूखने के बाद हल्दी एक चौथाई रह जाती है। अर्थात आपकी हल्दी 40 क्विंटल के करीब रह जाएगी। अगर आप इसे बिना पीसे भी बेचना चाहते हैं तो भी आसानी से आपको 70-80 रुपये प्रति किलो का भाव मिल जाएगा। 

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यानी आपकी हल्दी 2.80-3.20 लाख रुपये तक की बिकेगी। इस तरह आपको हल्दी की खेती से केवल 8 माह में ही दोगुने से तीन गुने तक का मुनाफा मिलेगा। 

किसान इस तरह हल्दी की खेती से कमा सकते हैं अधिक मुनाफा   

यदि आप किसी फार्मा या कॉस्मेटिक कंपनी से पहले से ही कॉन्ट्रैक्ट कर लें, तो आपको काफी तगड़ा मुनाफा मिलेगा। ऐसा इस वजह से क्योंकि इस प्रकार खेती के माध्यम से आप पहले ही निश्चित कर पाएंगे कि किस किस्म की हल्दी उगानी है और कितनी मात्रा में उगानी है। 

यानी हल्दी उगाने के बाद आपको उसकी बिक्री की भी कोई चिंता नहीं रहेगी। इस तरह खेती में आप शानदार कीमत पहले ही निर्धारित कर सकते हैं और हल्दी को प्रोसेस कर के पीसकर या बिना पीसे सीधे कंपनी को भेज सकते हैं। इससे कंपनियों को बेहतरीन हल्दी मिलेगी और आपको शानदार कीमत हांसिल होगी।

कटहल की खेती की सम्पूर्ण जानकारी (Jackfruit Farming Information In Hindi)

कटहल की खेती की सम्पूर्ण जानकारी (Jackfruit Farming Information In Hindi)

किसान भाइयों बहुत पुराने जमाने से एक कहावत चली आ रही है कि कटहल की खेती कभी गरीब नहीं होने देती यानी इसकी खेती से किसान धनी बन जाते हैं। 

वैसे तो इसे भारतीय जंगली फल या सब्जी कहा जाता है। इसके अलावा कटहल को मीट का विकल्प कहा जाता है। इसके कारण बहुत से लोग इसे पसंद नहीं करते हैं। 

इस बात की जानकारी बहुत कम लोगों को है कि ये कटहल अनेक बीमारियों में फायदा करता है। किसान भाइयों के लिए कटहल की खेती अब लाभकारी हो गयी है। 

इसका कारण यह है कि कटहल के कई ऐसी भी किस्में आ गयीं हैं जिनमें साल के बारहों महीने फल लगते हैं। इससे किसानों को पूरे साल कटहल से आमदनी मिलती रहती है। 

इसलिये किसानों के लिए कटहल की खेती नकदी फसल की तरह बहुत ही लाभकारी है।

कटहल से मिलने वाले लाभ

  1. कटहल में विटामिन ए, सी, थाइमिन, कैल्शियम, राइबोफ्लेविन, आयरन, जिंक आदि पौष्टिक तत्व पाए जाते हैं
  2. कटहल का पल्प का जूस हार्ट की बीमारियों में लाभदायक होता है
  3. कटहल की पोटैशियम की मात्रा अधिक पायी जाती है जिससे ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रहता है
  4. रेशेदार सब्जी व फल होने के कारण कटहल से एनीमिया रोग में लाभ मिलता है
  5. कटहल की जड़ उबाल कर पीने से अस्थमा रोग में लाभ मिलता है
  6. थायरायड रोगियों के लिए भी कटहल काफी लाभकारी होता है
  7. कटहल से हड्डियों को मजबूत करता है आॅस्टियोपोरोसिस के रोगों से बचाता है
  8. कटहल में विटामिन ए और सी पाये जाने के कारण वायरल इंफेक्शन में लाभ मिलता है
  9. अल्सर, कब्ज व पाचन संबंधी रोगों में भी कटहल फायदेमंद साबित होता है
  10. कटहल में विटामिन ए पाये जाने के कारण आंखों की रोशनी भी बढ़ती है।
कटहल से मिलने वाले लाभ
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व्यावसायिक लाभ

कटहल के उत्पादन से व्यावसायिक लाभ भी मिलते हैं। कटहल को हरा व पक्का बेचा जा सकता है। इसके हरे कटहल की सब्जी बनायी जाती है। 

इसके अलावा इसका अचार, पापड़ व जूस भी बनाया जाता है। कटहल का फल तो लाभकारी है और इसकी जड़ भी कई तरह की दवाओं के काम आती है।

कटहल की खेती किस प्रकार से की जाती है

आइये जानते हैं कि बहुउपयोगी कटहल की खेती या बागवानी कैसे की जाती है। इसके लिए आवश्यक भूमि, जलवायु, खाद, सिंचाई आदि के बारे में विस्तार से जानते हैं।

मिट्टी एवं जलवायु

कटहल की खेती वैसे तो सभी प्रकार की जमीन में हो जाती है लेकिन दोमट और बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त बताई जाती है। कटहल की खेती पीएच मान 6.5 से 7.5 वाली मृदा में भी की जा सकती है।

रेतीली जमीन में भी इसकी खेती की जा सकती है। समुद्र तल से 1000 मीटर ऊंचाई वाली पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी खेती की जा सकती है। जलभराव वाली जमीन में इसकी खेती से परहेज किया जाता है क्योंकि जलजमाव से कटहल की जड़ें गल जातीं हैं तथा पौधा गिर जाता है। 

कटहल की खेती शुष्क एवं शीतोष्ण दोनों प्रकार की जलवायु में आसानी से की जा सकती है। कटहल की खेती अत्यधिक सर्दी बर्दाश्त नहीं कर पाती है। 

दक्षिण भारत में कटहल की खेती अधिक होती है। इसके अलावा असम को कटहल की खेती के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।

कटहल की उन्नत किस्में

कटहल की उन्नत किस्मों में खजवा, गुलाबी, रुद्राक्षी, सिंगापुरी, स्वर्ण मनोहर, स्वर्ण पूर्ति, नरेन्द्र देव कृषि विश्वाविद्यालय की एनजे-1, एनजे-2, एनजे-15 एनजे-3 व केरल कृषि विवि की मुत्तम वरक्का प्रमुख हैं।

कटहल की खेती किस प्रकार से की जाती है

कटहल की रोपाई कैसे करें

कृषक बंधुओं को खेत या बाग की भूमि की अच्छी तरह से जुताई करके और पाटा करके समतल और भुरभुरी बना लेना चाहिये। उसके बाद 10 मीटर लम्बाई चौड़ाई में एक मीटर लम्बाई चौड़ाई और गहराई के थाले बना लेने चाहिये। 

प्रत्येक थालों के हिसाब से 20 से 25 किलो गोबर की खाद व कम्पोस्ट तथा 250 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट, 500 पोटाश, 1 किलोग्राम नीम की खली तथा 10 ग्राम थाइमेट को डालकर मिट्टी में अच्छी तरह से मिला लें।

रोपाई दो तरह से होती है

कटहल की रोपाई दो तरह से होती है। पहला बीजू और दूसरा कलमी तरीका होता है। बीजू रोपाई करने के लिए 40 एमएम की काली पॉलीथिन में पके हुए फल का बीज गोबर की खाद और रेत मिलाकर दबा देना चाहिये। 

दूसरे कलम की पौध नर्सरी से लाकर थाले के बीच एक फूट लम्बे चौड़े और डेढ़ फुट का गहरा गड्ढा बनाकर उसमें लगा देना चाहिये।

रोपाई का समय

रोपाई का सबसे अच्छा समय वर्षाकाल माना जाता है। वर्षाकाल में रोपाई करने से पानी की व्यवस्था अलग से नहीं करनी होती है। कटहल के पौधों की रोपाई करने का सबसे उपयुक्त समय अगस्त सितम्बर का होता है।

सिंचाई प्रबंधन

वर्षा के समय पौधों की रोपाई करने के बाद सिंचाई का विशेष ध्यान रखन होगा। यदि वर्षा हो रही है तो कोई बात नहीं यदि वर्षा न होतो प्रत्येक सप्ताह में सिंचाई करते रहना चाहिये। 

सर्दी के मौसम में प्रत्येक 15 दिन में सिंचाई करना आवश्यक होता है। दो से तीन साल तक पौधों की सिंचाई का विशेष ध्यान रखन होता है। जब पेड़ में फूल आने की संभावना दिखे तब सिंचाई नहीं करनी चाहिये।

पौधों की विशेष निगरानी

कटहल का पौधा लगाने के एक साल बाद तक विशेष निगरानी करते रहना चाहिये। समय समय पर थाले की निराई गुड़ाई करते रहना चाहिये। 

अगस्त सितम्बर माह में खाद व उर्वरक का प्रबंधन करते रहना चाहिये। इसके अलावा समय-समय पर सिंचाई की भी देखभाल करते रहना चाहिये। इसके अलावा पौधों की बढ़वार के लिए समय-समय पर कांट छांट भी की जानी चाहिये।

जड़ से पांच-छह फीट तक तनों व शाखाओं को काट कर पेड़ को सीधा बढ़ने देना चाहिये। उसके बाद चार-पांच तनों को फैलने देना चाहिये। इस तरह से पेड़ का ढांचा अच्छी तरह से विकसित हो जाता है तो अधिक फल लगते हैं।

खाद व उर्वरक प्रबंधन

कटहल के पेड़ में प्रत्येक वर्ष फल आते हैं, इसलिये अच्छे उत्पादन के लिए पेड़ों को खाद व उर्वरक उचित समय पर पर्याप्त मात्रा में देना चाहिये। 

प्रत्येक पौधे को 20 से 25 किलोग्राम गोबर की खाद, 100 ग्राम यूरिया, 200 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट और 100 ग्राम पोटाश प्रतिवर्ष बरसात के समय देना चाहिये। 

जब पौधों की उम्र 10 वर्ष हो जाये तो खाद व उर्वरकों की मात्रा बढ़ा देनी चाहिये। उस समय प्रति पौधे के हिसाब से 80 से 100 किलो तक गोबर की खाद, एक किलोग्राम यूरिया, 2 किलो सिंगल सुपर फास्फेट तथा एक किलो पोटाश देना चाहिये।

कीट-रोग व रोकथाम

कटहल की खेती में अनेक प्रकार के कीट एवं रोग व कीटजनित रोग लगते हैं। उनकी रोकथाम करना जरूरी होता है। आइये जानते हैं कीट प्रबंधन किस तरह से किया जाये। 

1. माहू : कटहल में लगने वाला माहू कीट पत्तियों, टहनियों, फूलों व फलों का रस चूसते हैं। इससे पौधों की बढ़वार रुक जाती है। 

जैसे ही इस कीट का संकेत मिले। वैसे ही इमिडाक्लोप्रिट 1 मिलीलीटर को एक लीटर पानी में मिलाकर घोल बनाकर छिड़काव करें।

2. तना छेदक: इस कीट के नवजात कीड़े कटहल के मोटे तने व डालियों मे छेद बनाकर घुस जात हैं और अंदर ही अंदर पेड़ को नुकसान पहुंचाते हैं। इससे पेड़ सूखने लगता है तथा फसल पर विपरीत असर पड़ने लगता है। 

इसका पता लगते ही पेड़ में दिखने वाले छेद को अच्छी तरह से किसी पतले तार आदि से सफाई करना चाहिये फिर उसमें नुवाक्रान का तनाछेदक घोल 10 मिलीलीटर एक लीटर पेट्रोल या करोसिन में मिलाकर तेल की चार-पांच बूंद रुई में डालकर छेद को गीली चिकनी मिट्टी से बंद कर दें तो लाभ होगा। 

3. गुलाबी धब्बा : इस रोग से पत्तियों में नीचे की ओर से गुलाबी रंग का धब्बा बनने लगता है। इसकी रोकथाम के लिए कॉपर जनित फफूंदनाशी कॉपर आक्सीक्लोराइड या ब्लू कॉपर 3 मिली लीटर को प्रति लीटर पानी में मिलकार छिड़काव करना चाहिये। 

4. फल सड़न रोग: यह एक फफूंदी रोग। इस रोग के लगने के बाद कोमल फलों के डंठलों के पास धीरे-धीरे सड़ने लगता है। 

इसकी रोकथाम के लिए ब्लू कॉपर के 3 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में मिलाकर घोल का छिड़काव तुरन्त करें और उसके 15 दिन बाद दुबारा छिड़काव करने लाभ मिलता है। 

यदि इसके बाद भी लाभ न मिले तो एक बार फिर छिड़काव कर देना चाहिये।

कटहल के फल की तुड़ाई कब और कैसे करें

कटहल का फल साधारण तौर पर फल लगने के 100 से 120 दिन के बाद तोड़ने के लायक हो जाता है। 

फिर भी जब इसका डंठल तथा डंठल से लगी पत्तियों का रंग बदल जाये यानी हरा से हल्का भूरा या पीला हो जाये और फल के कांटों का नुकीलापन कम हो जाये तब किसी तेज धार वाले चाकू से दस सेंटीमीटर डंठल के साथ तोड़ लेना चाहिये। 

यदि फल काफी ऊंचाई से तोड़ रहे हैं तो उसे रस्सी के सहारे नीचे उतारना चाहिये वरना जमीन पर गिर जाने से फल खराब हो सकता है।

पैदावार

कटहल के बीज से बोई गई खेती में फसल 7 से 8 वर्ष में फल आने लगते हैं और कलम से लगाई गई खेती में 5 से 6 साल में फल आने लगते हैं। 

यदि अच्छी तरह से देखभाल की जाये तो एक वृक्ष से 4 से 5 क्विंटल कटहल आसानी से पाया जा सकता है। यदि एक हेक्टेयर में 150 से 200 पौधे लगाये गये हैं तो इससे प्रतिवर्ष 3 से 4 लाख रुपये तक की आमदनी हो सकती है। 

दूसरे वर्ष इसकी फसल में कोई लागत नही लगती है और फसल इससे अधिक होती है।

वैज्ञानिकों द्वारा खोजी गई कटहल की इस नई किस्म से किसानों को होगा लाभ

वैज्ञानिकों द्वारा खोजी गई कटहल की इस नई किस्म से किसानों को होगा लाभ

आईआईएचआर-बेंगलुरु के वैज्ञानिकों को यह कटहल हाल ही में बेंगलुरु के ही बाहरी क्षेत्रों के एक किसान नागराज के खेत में ही मिला। ये फसल अपने असाधारण स्वाद एवं पोषण मूल्यों के लिए जाना जाता है। भारत में किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए यहां के कृषि वैज्ञानिक दिन-रात कड़ा परिश्रम करते हैं। दरअसल, भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहां की अधिकांश आबादी आज भी खेती किसानी पर निर्भर रहती है। इसके चलते सरकार भी इस फिराक में रहती है, कि किसानों को किसी भी स्थिति में इतनी सहायता पहुंचाई जा सके, जिससे कि उनकी रोजी रोटी सहजता से चलती रहे। यही वजह है, कि वैज्ञानिकों ने अब एक नए किस्म के कटहल की खोज की है, आइए आज हम आपको इसके लाभ बताते हैं। बतादें कि कृषि वैज्ञानिकों की वजह से ही आज खेती किसानी काफी विकासित हुई है।

वैज्ञानिकों को मिला कटहल कैसा दिखता है

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई यह नई कटहल भी किसी सामान्य कटहल की तरह खाने वाला कटहल ही है। परंतु, ये नया कटहल व्यावसायिक प्रसंस्करण के लिए अत्यंत ज्यादा अनुकूल है। इस नए कटहल को सिद्दू और शंकरा कहा जाता है। इसे मिलाकर अब तक वैज्ञानिकों ने कटहल की तीन किस्मों की खोज कर ली है। ये तीनों किस्में भारत के अंदर पाई जाती हैं। सबसे मुख्य बात यह है, कि अब तक व्यावसायिक तौर पर केवल दो किस्मों का ही उत्पादन होता था। परंतु, नई किस्म मिलने के उपरांत अब तीन किस्मों की पैदावार की जा सकेगी। ये भी पढ़े: कटहल की खेती की सम्पूर्ण जानकारी (Jackfruit Farming Information In Hindi)

वैज्ञानिकों को यह नए किस्म का कटहल कहाँ मिला है

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि आईआईएचआर-बेंगलुरु के वैज्ञानिकों को ये कटहल हाल ही में बेंगलुरु के ही बाहरी इलाके के एक किसान नागराज के खेत में मिला। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह फसल अपने असाधारण स्वाद के साथ-साथ पोषण मूल्यों के लिए भी जानी जाती है। इस नई किस्म के साथ सबसे उत्तम बात यह है, कि इसकी पैदावार अन्य किस्मों से कहीं अधिक होती है। ये भी पढ़े: कटहल के फल गिरने से रोकथाम सबसे विशेष बात यह है, कि इस नए किस्म की एक कटहल का वजन तकरीबन 25 से 32 किलोग्राम तक होता है। अर्थात यदि आप कटहल की खेती कर के उससे मुनाफा कमाना चाहते हैं, तो ये नई किस्म आपके लिए सर्वाधिक अनुकूल है। वैज्ञानिकों का कहना है, कि वह किसान नागराज के साथ एक समझौता कर रहे हैं। साथ ही, कटहल की इस नवीन किस्म को और बढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। यदि सब कुछ अच्छा रहा तो कुछ वर्षों में ही यह नया कटहल पूरे भारत में लगने लगेगा और प्रति वर्ष किसानों को मोटा मुनाफा प्रदान करेगा।
पोषक तत्वों से भरपूर कटहल की खेती आपकी किस्मत चमका सकती है

पोषक तत्वों से भरपूर कटहल की खेती आपकी किस्मत चमका सकती है

कटहल की खेती कर कृषक भाई बेहतरीन मुनाफा हांसिल कर सकते हैं। किसान भाई महज एक हेक्टेयर खेत में ही 150 कटहल के पौधे रोप सकते हैं। आलू-प्याज की खेती कर के बोर हो चुके कृषक भाइयों के लिए यह फायदेमंद समाचार है। जो किसान कृषि क्षेत्र में कुछ अलग करना चाहते हैं। वह जैकफ्रूट मतलब की कटहल की खेती कर शानदार मुनाफा पा सकते हैं। कटहल का उपयोग सब्जी एवं फल दोनों ही रूप में किया जाता है। बहुत से घरों में तो इसका अचार भी डाला जाता है, जो कि सेवन में काफी स्वादिष्ठ होता है। कटहल बाजार में भी काफी मांग में रहने वाली सब्जियों में शुमार है।

कटहल के अंदर भरपूर मात्रा में मिनरल पाए जाते है

कटहल में विटामिन एवं मिनरल काफी भरपूर मात्रा होते हैं। इसमें विटामिन सी, विटामिन बी 6, नियासिन की भांति बहुत सारे विटामिन मिलते हैं। इसके साथ-साथ कटहल में फास्फोरस, कैल्शियम, सोडियम, आयरन, पोटैशियम और जिंक जैसे मिनरल्स भी मौजूद होते हैं। कटहल को सदाबहार फसल के नाम से भी जाना जाता है। आपकी जानकारी के लिए बतादें कि इसकी खेती किसी भी मौसम में की जा सकती है। केरल, कर्नाटक, यूपी, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल के अतिरिक्त भी बहुत से अन्य राज्यों में कटहल की खेती की जाती है। दोमट मृदा को कटहल की खेती के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है, कि कटहल के खेत में जल निकासी की बेहतरीन व्यवस्था होनी आवश्यक है।

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कृषक भाइयों के लिए खेत की बेहतर जुताई आवश्यक

कृषक भाई कटहल की खेती करने से पूर्व खेत की बेहतरीन ढ़ंग से जुताई कर लें। बतादें कि खाद के तौर पर खेत में गोबर डालें। अब एक समान फासले पर गड्ढे खोदकर कटहल के पौधे लगा दें। दरअसल, 15 दिन हो जाने के उपरांत कृषक भाई खेत की सिंचाई करें। किसान खाद के रूप में वर्मी कंपोस्ट एवं नीम की खली का भी उपयोग कर सकते हैं।

एक हेक्टेयर में कितने पौधे लगाए जाते हैं

अगर आप अपने बाग में बीज समेत कटहल की खेती कर रहे हैं, तो 6 साल में फल आने चालू हो जाएंगे। उधर गूटी तरीके से खेती करने पर काफी कम वक्त में ही कटहल के बाग में फल आ जाते हैं। एक हेक्टेयर में कटहल के लगभग 140 से लेकर 150 तक पौधे रोपे जाते हैं। कृषक भाई एक हेक्टेयर भूमि में ही कटहल की खेती कर लाखों रुपये की आमदनी कर सकते हैं।
बिहार के आशीष कुमार अपने गांव में काली हल्दी की खेती कर मध्य प्रदेश तक सप्लाई कर रहे हैं।

बिहार के आशीष कुमार अपने गांव में काली हल्दी की खेती कर मध्य प्रदेश तक सप्लाई कर रहे हैं।

किसान आशीष कुमार का कहना है, कि उन्होंने एक लेख में पढ़ा था कि बिहार में काली हल्दी विलुप्त हो चुकी है। अब कोई काली हल्दी की खेती नहीं करता है। ऐसे में मैंने काली हल्दी की खेती करना चालू किया। जैसा कि हम जानते हैं, कि हल्दी एक औषधीय मसाला होता है। इसका इस्तेमाल खाना निर्मित करने के साथ-साथ आयुर्वेदिक औषधियाँ तैयार करने के लिए किया जाता है। हल्दी के बिना हम स्वादिष्ट दाल एवं सब्जी की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। अधिकांश लोगों का मानना है, कि हल्दी का रंग केवल पीला ही हो होता है। परंतु, इस प्रकार की कोई बात नहीं है, आज भी भारत में किसान काली हल्दी का उत्पादन कर रहे हैं। आज हम आपको एक ऐसे ही किसान के विषय में बताएंगे, जिन्होंने काली हल्दी की खेती चालू कर लोगों के समक्ष मिसाल प्रस्तुत की है। वर्तमान में अन्य दूसरे किसान भी उनसे काली हल्दी की खेती करने का प्रशिक्षण ले रहे हैं।

आशीष अपने गांव में लगभग 3 वर्ष से काली हल्दी की खेती कर रहे हैं

एनबीटी की एक खबर के अनुसार, काली हल्दी की खेती करने वाले किसान का नाम आशीष कुमार सिंह है। आशीष कुमार बिहार राज्य के गया जनपद के अंतर्गत आने वाले टिकारी गांव के निवासी हैं। आशीष कुमार अपने निज गांव में 3 साल से काली हल्दी की खेती कर रहे हैं। आशीष कुमार सिंह का कहना है, कि उनको कृषि से जुड़े लेख एवं खबरें पढ़ने का अत्यधिक शौक है। एक दिन उन्होंने अखबार में काली हल्दी के विषय में एक लेख पढ़ा था। इसके पश्चात आशीष ने काली हल्दी की खेती करने की योजना बनाई है। मुख्य बात यह है, कि आशीष विलुप्त होने की स्थिति पर पहुंच चुकी विभिन्न फसलों की खेती कर रहे हैं। यह भी पढ़ें: जानिए नीली हल्दी की खेती से कितना मुनाफा कमाया जा सकता है

काली हल्दी से आयुर्वेदिक औषधियां निर्मित की जाती हैं

आशीष कुमार ने बताया कि उन्होंने लेख में पढ़ा था कि बिहार में काली हल्दी बिल्कुल खो चुकी है। अब इसकी खेती कोई नहीं करता है। ऐसे में मैंने इसकी खेती करना चालू कर दिया। उनके द्वारा उत्पादित हल्दी की सप्लाई सर्वाधिक मध्य प्रदेश में होती है। उनके अनुसार मध्य प्रदेश में बहुत सारे किसान उनसे जुड़े हुए हैं। आशीष काली हल्दी की मांग आते ही आपूर्ति कर देते हैं। दरअसल, मध्य प्रदेश में आदिवासी समुदाय के लोग अपना कोई भी शुभ कार्य आरंभ करने से पूर्व काली हल्दी का इस्तेमाल करते हैं। इसके अतिरिक्त इससे विभिन्न आयुर्वेदिक औषधियाँ भी तैयार की जाती हैं।

काली हल्दी की बुवाई हेतु कितना बीज उपयोग होता है

आशीष डेढ़ कट्ठे भूमि में काली हल्दी का उत्पादन कर रहे हैं। इससे उनको लगभग डेढ़ क्विंटल काली हल्दी की पैदावार मिलती है। बतादें, कि डेढ़ कट्ठे भूमि में काली हल्दी की बुवाई करने हेतु 10 किलो बीज की आवश्यकता होती है। उनका कहना है, कि काली हल्दी की खेती आप गमले में भी चालू कर सकते हैं। काली हल्दी की खेती में जल की काफी कम आवश्यकता है। अशीष कुमार सिंह से प्रेरणा लेकर दर्जनों की संख्या में किसानों ने काली हल्दी की खेती शुरू कर दी है। वह काली हल्दी के बीज 300 रुपये किलो के हिसाब से बेचते हैं। काली हल्दी में कुरकुमीन पीली हल्दी की तुलना में ज्यादा पाई जाती है। कृषि वैज्ञानिक देवेंद्र मंडल का कहना है, कि काली हल्दी का ओषधि के तौर पर सेवन करने से विभिन्न प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं। वर्तमान में बाजार के अंदर एक किलो काली हल्दी की कीमत 1000 से 5000 रुपये के मध्य है।
पीली हल्दी की जगह काली हल्दी की खेती कर किसान कम लागत में अधिक आय कर रहा है

पीली हल्दी की जगह काली हल्दी की खेती कर किसान कम लागत में अधिक आय कर रहा है

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि काली हल्दी की खेती करने पर पानी की खपत कम होती है। यदि आप एक एकड़ में काली हल्दी की खेती करते हैं, तो आपको 50 से 60 क्विंटल तक पैदावार मिलेगा। 

साथ ही, एक एकड़ से 10 से 12 क्विंटल तक सूखी हल्दी का उत्पादन होगा। ऐसे में काली हल्दी की खेती करने पर काफी अच्छी खासी आमदनी होती है। लोगों का मानना है, कि हल्दी केवल पीले रंग की ही होती है। 

परंतु, इस तरह की कोई बात नहीं है। दरअसल, हल्दी काले रंग की भी होती है। विशेष बात यह है, कि काली हल्दी का भाव भी पीली हल्दी की तुलना में ज्यादा होता है। इसका इस्तेमाल आयुर्वेदिक औषधियां बनाने में किया जाता है। 

इसमें पीली हल्दी की तुलना में विटामिन्स और मिनिरल्स भी ज्यादा पाए जाते हैं। यही कारण है, कि अब बिहार में एक किसान ने इसकी खेती भी चालू कर दी है। इससे किसान की काफी मोटी आमदनी हो रही है।

काली हल्दी की खेती करने वाला किसान कमलेश

जानकारी के अनुसार, काली हल्दी की खेती करने वाले किसान का नाम कमलेश चौबे है। वे पूर्वी चम्पारण के नरकटियागंज प्रखंड स्थित मुशहरवा गांव के मूल निवासी हैं। 

उन्होंने अभी एक कट्ठे भूमि पर काली हल्दी की खेती चालू की है। उन्होंंने एक कट्ठे जमीन में 25 किलो काली हल्दी की बुवाई की थी, जिससे लगभग डेढ़ क्विंटल हल्दी का उत्पादन हुआ है। इससे उन्हें काफी अच्छी आमदनी हो रही है। 

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किसान हल्दी विक्रय से कितना कमा सकते हैं

विशेष बात यह है, कि कमलेश ने काली हल्दी का उत्पादन करने के लिए नागालैंड से इसके बीज इंपोर्ट किए थे। बतादें, कि एक किलो बीज 500 रुपये में आए थे। ऐसी स्थिति में 25 किलो बीज खरीदने के लिए उन्हें साढ़े 12 हजार रुपये का खर्चा करना पड़ा। 

वर्तमान में बाजार के अंदर काली हल्दी की कीमत 500 से 5000 रुपये किलो के मध्य है। यदि कमलेश 1000 रुपये किलो भी काली हल्दी बेचते हैं, तो 150 किलो हल्दी विक्रय के उपरांत उन्हें डेढ़ लाख रुपये की आमदनी होगी।

काली हल्दी में कितने तत्व विघमान होते हैं

कृषि वैज्ञानिक अभिक पात्रा के अनुसार काली हल्दी सेहत के लिए बेहद फायदेमंद होती है। इससे बहुत सारी औषधीय दवाइयां निर्मित की जाती हैं। पीली हल्दी की अपेक्षा में इसकी कीमत बहुत गुना अधिक होती है। 

वर्तमान में उत्तराखंड के किसान भी इसकी बड़े पैमाने पर खेती कर रहे हैं। काली हल्दी में एंथोसायनिन ज्यादा मात्रा में विघमान होता है। इस वजह से यह गहरे बैंगनी रंग की दिखती है। 

साथ ही, काली हल्दी में एंटी अस्थमा, एंटीऑक्सिडेंट, एंटीफंगल, एंटी- कॉन्वेलसेंट, एनाल्जेसिक, एंटीबैक्टीरियल और एंटी-अल्सर जैसे विशेष गुण मौजूद होते हैं।

गर्मियों में हल्दी की खेती कर किसान शानदार उत्पादन उठा सकते हैं

गर्मियों में हल्दी की खेती कर किसान शानदार उत्पादन उठा सकते हैं

रबी की फसलों की कटाई का समय आ गया है। अब कुछ दिनों के बाद हल्दी उत्पादक किसान हल्दी की खेती के लिए बुवाई शुरू करेंगे। संपूर्ण भारत के करीब हर घर में सामान्यतः हल्दी का उपयोग किया जाता है। यह एक काफी ज्यादा महत्वपूर्ण मामला है। भारत के अंदर इसकी खेती भी बड़े पैमाने पर की जाती है। 

बहुत सारे राज्यों में इसका उत्पादन किया जाता है। हल्दी की खेती करने के दौरान किसान भाइयों को कुछ विशेष बातों का खास ध्यान रखना होता है। ताकि उनको हल्दी उत्पादन से तगड़ा मुनाफा प्राप्त हो एवं उन्हें बेहतरीन उपज हांसिल हो सके।

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि हल्दी की खेती के लिए रेतीली दोमट मृदा या मटियार दोमट मृदा काफी अच्छी होती है। हल्दी की बिजाई का समय भिन्न-भिन्न किस्मों के आधार पर 15 मई से लेकर 30 जून के मध्य होता है। 

वहीं, हल्दी की बुवाई के लिए कतार से कतार का फासला 30-40 सेमी और पौध से पौध की दूरी 20 सेमी रखनी चाहिए। हल्दी की बुवाई के लिए 6 क्विंटल प्रति एकड़ बीज की आवश्यकता होती है।

हल्दी की फसल कितने समय में तैयार होती है ?

हल्दी की खेती के लिए खेत में जल निकासी की बेहतरीन व्यवस्था होनी चाहिए। हल्दी की फसल 8 से 10 माह के अंदर तैयार हो जाती है। सामन्यतः फसल की कटाई जनवरी से मार्च के दौरान की जाती है। फसल के परिपक्व होने पर पत्तियां सूख जाती हैं और हल्के भूरे से पीले रंग में बदल जाती हैं। 

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हल्दी की खेती काफी सुगमता से की जा सकती है और इसे छाया में भी आसानी से उगाया जा सकता है। किसानों को इसकी खेती करते समय नियमित तौर पर निराई-गुड़ाई करनी चाहिए, जिससे खरपतवारों की वृद्धि रुकती है और फसल को पोषक तत्वों की प्राप्ति होती है। 

हल्दी की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु  

दरअसल, हल्दी गर्म एवं उमस भरी जलवायु में बेहतरीन ढंग से उगती है। इसके लिए 20 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त होता है। हल्दी के लिए अच्छी जल निकासी वाली, दोमट अथवा बलुई दोमट मृदा अच्छी होती है। 

मिट्टी का पीएच 6.5 से 8.5 के मध्य होना चाहिए। हल्दी की अच्छी पैदावार के लिए खाद का उचित इस्तेमाल करना आवश्यक है। गोबर की खाद, नीम की खली और यूरिया का इस्तेमाल काफी लाभदायक होता है। कटाई की बात की जाए तो हल्दी की फसल 9-10 माह के अंदर पककर तैयार हो जाती है। कटाई होने के बाद इसे धूप में सुखाया जाता है। 

हल्दी को तैयार होने में कितना समय लगता है ? 

हल्दी की बुवाई जून-जुलाई महीने के दौरान की जाती है। बुवाई के लिए स्वस्थ और रोग मुक्त कंदों का चुनाव करना बेहद आवश्यक है। सिंचाई की बात की जाए तो इसे नियमित तौर पर सिंचाई की जरूरत होती है। 

किसान भाइयों को इसकी खेती करने के दौरान नियमित रूप से निराई-गुड़ाई करनी चाहिए, जिससे खरपतवारों का खतरा समाप्त एवं फसल को पोषक तत्वों की प्राप्ति होती है। फसल कटाई की बात की जाए तो हल्दी की फसल 9-10 महीने के अंदर पककर तैयार हो जाती है।

हल्दी की बेहतरीन किस्में इस प्रकार हैं ?

समयावधि के आधार पर इसकी किस्मों को तीन भागों में विभाजित की गई हैं 

  1. शीघ्र काल में तैयार होने वाली ‘कस्तुरी’ वर्ग की किस्में - रसोई में उपयोगी, 7 महीने में फसल तैयार, शानदार उपज। जैसे-कस्तुरी पसुंतु।
  2. मध्यम समय में तैयार होने वाली केसरी वर्ग की किस्में - 8 महीने में तैयार, अच्छी उपज, अच्छे गुणों वाले कंद। जैसे-केसरी, अम्रुथापानी, कोठापेटा।
  3. दीर्घ काल में तैयार होने वाली किस्में - 9 महीने में तैयार, सबसे अधिक उपज, गुणों में सर्वेश्रेष्ठ। जैसे दुग्गीराला, तेकुरपेट, मिदकुर, अरमुर। व्यवसायिक स्तर पर दुग्गीराला व तेकुपेट की खेती इनकी उच्च गुणवत्ता की वजह से की जाती है। इसके अतिरिक्त सुगंधम, सुदर्शना, रशिम, मेघा हल्दी-1, मीठापुर और राजेन्द्र सोनिया हल्दी की अन्य किस्में है। 

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जैविक ढंग से खेती करना सर्वोत्तम विकल्प है 

विशेषज्ञों की मानें तो हल्दी की खेती के लिए जैविक विधि का इस्तेमाल करना बेहद आवश्यक है। इसकी फसल को मिश्रित खेती के रूप में भी उगाया जा सकता है। हल्दी की उन्नत किस्मों की खेती करके किसान भाई अधिक उपज हांसिल कर सकते हैं। 

Rajasthan ka krishi budget: किसानों के लिए बहुत कुछ है राजस्थान के कृषि बजट में

Rajasthan ka krishi budget: किसानों के लिए बहुत कुछ है राजस्थान के कृषि बजट में

13 महीनों तक चले किसान आंदोलन ने यह साबित किया कि अब सरकारों को उनकी तरफ ध्यान देना होगा अन्यथा सरकारें चल नहीं पाएंगी। उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों में चल रहे चुनावों के मद्देनजर ही, डैमेज कंट्रोल करने के वास्ते प्रधानमंत्री को तीनों कृषि कानून वापस लेने पड़े। यह वापसी इसलिए हुई क्योंकि देश भर के किसान एकजुट हो गए थे। किसानों की एकता का ही यह परिणाम था कि कानून वापस हुए और अब किसान अपने घरों पर हैं। लेकिन, इसके दूरगामी परिणाम को आपने देखा क्या। इसका दूरगामी परिणाम है, 23 फरवरी को राजस्थान में पेश किया गया कृषि बजट। जी हां, जब से राजस्थान बना है, तब से लेकर अब तक ऐसा कभी नहीं हुआ था कि बजट के बाद कोई कृषि बजट पेश किया गया हो। वह भी अलग से। पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था। राजस्थान में जो कृषि बजट पेश किया गया, वह किसानों के आंदोलन की ही परिणिति है, ऐसा मानना गलत नहीं होगा।

क्या है कृषि बजट में

अब बड़ा सवाल यह है कि इस किसान बजट में है क्या।

दरअसल, इस किसान बजट में कई व्यवस्थाएं दी गई हैं। इन व्यवस्थाओं को गौर से देखें तो समझ जाएंगे कि राजस्थान सरकार किसानों को लेकर कितनी चिंतित है। हां, सरकारी खजाने की अपनी एक सीमा होती है। कृषि ही सब कुछ नहीं होती पर कृषि को तवज्जो देकर सरकार ने एक सकारात्मक रुख का प्रदर्शन तो जरूर किया है। आइए समझें कि इस कृषि बजट में है क्या।

1. मुख्यमंत्री कृषक साथी का बजट बढ़ गया

दरअसल, 2021 में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उद्योग क्षेत्र में चलाई जाने वाली योजना को कृषि क्षेत्र में, थोड़े परिवर्तन के साथ लागू कर दिया। अर्थात, अगर आप किसान हैं और कृषि कार्य करते हुए आपके साथ कोई हादसा हो गया तो इस योजना के तहत आपको दो से 5 लाख रुपये तक की तात्कालिक सहायता मिलेगी। यह योजना कई क्लाउजेज की व्याख्या करती है। जैसे, यदि आपकी एक अंगुली कट जाए तो सरकार आपको 5000 रुपये देगी। दो कट जाए तो 10000 रुपये, तीन कट जाए तो 15000 रुपये और चार कट जाए तो 20000 रुपये का भुगतान करेगी सरकार। ऐसे ही अगर आपकी पांचों अंगुलियां कट जाती हैं तो सरकार आपको 25000 रुपये देगी। इस योजना के लिए बीते साल के बजट में 2000 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई थी। अब इसका दायरा बढ़ाने की गरज से सरकार ने इस योजना के लिए 5000 करोड़ रुपये की धनराशि स्वीकृत की है। धनराशि बढ़ाने को किसानों ने बेहद बढ़िया माना है।

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2. मुख्यमंत्री जैविक कृषि मिशन

कृषि बजट में सरकार ने घोषणा की है कि इसी सत्र से मुख्यमंत्री जैविक खेती मिशन शुरू कर दिया जाएगा। इसके तहत सरकार उन किसानों को ज्यादा लाभ देगी, जो शुद्ध रूप से जैविक केती के लिए तैयार होंगे। इस योजना के तहत, सरकार उन्हें आर्थिक पैकेज तो देगी ही, जरूरत पड़ी तो उनकी फसलों को भी खरीद लेगी। इसके लिए पहले 600 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है। अगले बजट में इस धनराशि को बढ़ाया भी जा सकता है।

3. बीज उत्पादन एवं विपणन तंत्र की घोषणा

इस कृषि बजट में सरकार ने एक ऐसा तंत्र विकसित करने की घोषणा की, जिसके तहत सभी किसानों तक सरकारी योजनाएं पहुंच सकें। खास कर बीज और कृषि के अन्य अवयवों को सरकार एक साथ किसानों तक पहुंचाना चाहती है। सरकार का जोर इस बात पर ज्यादा है कि राज्य के कम से कम दो लाख छोटे किसानों तक मूंग, मोठ और उड़द के प्रमाणित बीजों के मिनी किट्स मुफ्त में उपलब्ध कराए जाएं। इन चीजों के लिए ही बीज उत्पादन एवं विपणन तंत्र की घोषणा की गई है। सरकार एक सिस्टम बनाना चाह रही है जिससे समय पर और सिस्टमेटिक रुप में किसानों तक कृषि संबंधित चीजों की डिलीवरी हो सके। इस किस्म का सिस्टम छत्तीसगढ़ में पहले से चल रहा है।

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4. राजस्थान भूमि उर्वरकता मिशन की घोषणा

इस कृषि बजट में सरकार ने राजस्थान भूमि उर्वरकता मिशन की घोषणा की। इस मिशन के तहत राजस्थान के किसान यह जान सकेंगे कि उनकी जो जमीन है, उसकी उर्वरक क्षमता क्या है। किस किस्म की खेती उन्हें कब और कैसे करनी चाहिए। अभी राजस्थान में सभी किसान परंपरागत खेती कर रहे हैं। इस मिशन के शुरू हो जाने के बाद माना जा रहा है कि खेती कार्य में विविधता आएगी। समय-समय पर जब मिट्टी की जांच होगी तो किसानों को यह एडवाइस भी दिया जाएगा कि इसकी उर्वरकता बढ़ाने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए।

5. दूध पर 5 रुपये प्रति लीटर अनुदान

राजस्थान सरकार ने अपने कृषि बजट में यह व्यवस्था की है कि जो भी किसान अपना दूध सहकारी दुग्ध उत्पादक संघों को देंगे, उन्हें 5 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से अनुदान भी मिलेगा। यह व्यवस्था इसलिए की गई है ताकि दूध सहकारी दुग्ध उत्पादक संघों के माध्यम से राजस्थान भर में बिके। 

6. कर्ज की व्यवस्था

इस कृषि बजट में घोषणा की गई है कि सरकार वर्ष 2022 में किसानों को फसली ऋण भी देगी। यह फसली ऋण 20000 करोड़ की लिमिट के भीतर होगी। ऐसे लाभार्थी किसानों की संख्या इस साल के लिए पांच लाख तय की गई है। इतना ही नहीं, जो लोग कृषि कार्य से प्रत्यक्ष रुप से नहीं जुड़े हैं, उन्हें भी कर्ज दिया जाएगा। इस साल ऐसे परिवारों की संख्या एक लाख तय की गई है। कर्ज कितना मिलेगा, यह तय नहीं है पर मिलेगा जरूर। कुल मिलाकर, यह किसानों के भीतर हौसला बुलंद करने वाला बजट है। इसे अगर अमली जामा पहना दिया जाए तो राजस्थान के किसानों की स्थिति बेहद सुदृढ़ हो सकती है। जिस भाव से बजट पेश किया गया है, वह बेहतर है। उसी भाव से इस पर अमल हो तो किसानों का सच में भला हो जाएगा।

गेहूं कटाई के बाद खेत की जुताई के लिए आधुनिक कृषि यंत्र

गेहूं कटाई के बाद खेत की जुताई के लिए आधुनिक कृषि यंत्र

आधुनिकता के चलते भारतीय कृषि क्षेत्र में बैलों की जगह कई प्रकार के कृषि यंत्रो और मशीनों ने ले ली है। उपकरण खेती के बहुत सारे बड़े से बड़े कार्यों को आसान बनाते हैं। 

साथ ही, लागत को भी कम करने का कार्य करते हैं। बुवाई से लगाकर कटाई तक के कार्यों को सुगम बनाने में कृषि यंत्र अपनी अहम भूमिका निभाते हैं। बुवाई के लिए खेत को तैयार करने के लिए किसान ट्रैक्टर द्वारा रोटावेटर या कल्टीवेटरका इस्तेमाल करते हैं। 

ये उपकरण मिट्टी की उपरी परत की हल्की जुताई करते हैं, जिससे बुवाई करना काफी सरल हो जाता है। आइए जानते हैं जुताई के लिए कुछ महत्वपूर्ण और लाभदायक कृषि यंत्रों के बारे में। 

मोल्ड बोर्ड हल 

मोल्ड बोर्ड हल को किसानों के बीच मिट्टी पलट हल के नाम से भी जाना व पहचाना जाता है। मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बनाये रखने के लिए जरूरी है कि इसे पलटा जाये। 

मिट्टी पलटने तथा खरपतवार को नीचे दबाने के लिए मोल्ड बोर्ड हल (Mould Board Plough) ज्यादा गहरी जुताई करते हैं। मिट्टी को भी पलटते हैं, जिससे सतह पर मौजूद खर-पतवार और अन्य फसल अवशेष बेहतर तरीके से दब जाते हैं। 

बतादें, कि 2 फाल वाले प्लाऊ को संचालित करने के लिए ट्रैक्टर की हॉर्स पावर 35 से 45 हॉर्स पॉवर होनी चाहिए। इस प्लाऊ की कार्य क्षमता 1.5 हेक्टेयर तक प्रति दिन होती है। 

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साथ ही, 3 फाल वाले प्लाऊ को चलाने के लिए ट्रैक्टर की हॉर्स पावर 40 से 50 एचपी होनी चाहिए। इस हल के साथ किसान 2 हेक्टेयर तक प्रति दिन कार्य कर सकते हैं। 

इस कृषि उपकरण का इस्तेमाल गर्मी के मौसम में खेत की गहरी जुताई के लिए, ढैचा/सनई आदि हरी खाद वाली फसल को मिट्टी में पलटकर मिलाने के लिए भी किया जाता है। 

डिस्क प्लाऊ

डिस्क प्लाऊ  (Disc Plough) भी एक मिट्टी पलटने वाला हल है और यह मोल्ड बोर्ड हल की अपेक्षा ज्यादा गहराई तक जुताई करने में सक्षम होता है। किसान इस यंत्र का इस्तेमाल भारी मृदा को पलटने के लिए करते हैं। इसमें आपको दो या तीन फाल देखने को मिल सकते हैं।

खेतों में ज्यादा खरपतवार और गहरे फसल अवशेष को काटने तथा पलटने में इस यंत्र का इस्तेमाल किया जाता है। ट्रैक्टर की क्षमता के अनुसार इस यंत्र से 40 से 50 सेंटीमीटर की गहराई तक जुताई की जा सकती है। इस कृषि यंत्र की कार्य क्षमता प्रतिदिन 1.5 से 2 हेक्टेयर है। 

चिसेल प्लाऊ 

चिसेल हल (Chisel Plough) बिना सतह वाली मृदा को अस्त व्यस्त किये और सतह पर मौजूद फसल अवशेषों को यथावत रखते हुए बहुत गहरी चीरे लगाई जा सकती हैं। इस यंत्र के साथ 1 मीटर की गहराई तक जुताई कर सकते हैं। 

ऐसा करने से स्थाई तौर पर सतह के नीचे की जल निकासी सुनिश्चित की जा सकती है। मिट्टी पलट हलों के मुकाबले में चिजेल हल के इस्तेमाल से मिट्टी की सतह पर किसी तरह का कार्य नहीं किया जाता है, जिससे हवा या पानी की वजह मिट्टी के कटाव को रोका जा सकता है। 

लेजर लैंड लेवलर 

खेत की जुताई और सिंचाई करने से जमीन असमतल हो जाती है, जिससे मृदा के पोषक तत्व का असामान्य वितरण और सिंचाई जल में वृद्धि जैसी दिक्कतें खड़ी होने लग जाती हैं। 

समय-समय पर खेत के समतलीकरण की आवश्यकता को सटीक और कम में वक्त में पूरा करने के लिये लेजर लैंड लेवलर (Laser Land Leveler) का इस्तेमाल किया जाता है। इस मशीन में लेजर किरणों की सहायता से पीछे लगे बकेट को काबू करके जमीन को एकसार किया जा सकता है। 

दमदार ट्रैक्टर(Tractor) का दौर

दमदार ट्रैक्टर(Tractor) का दौर

देश में बढ़ते हुए मशीनीकरण के दौर में किसान भाइयों को खेती करना बहुत आसान हो चुका है, जिसमे ट्रैक्टर का अनवरत चला आ रहा अकथनीय योगदान रहा है। हम जब हमारे बचपन को याद करते हैं, तो अस्सी के दशक में बहुत कम ही किसानों के पास ट्रैक्टर हुआ करते थे और उस दौर में भी ट्रैक्टर के उपयोग की सीमा भी ज्यादा नहीं रहा करती थी।  उस समय किसान भाई खेती के लिए ज्यादातर पशुओं पर निर्भर रहते थे, जिससे खेती का कार्य अत्यंत कठिन हो जाता था।  एक तरफ जहां किसान पशु और प्रकृति पर निर्भर थे, वहीँ दूसरी तरफ समय और परिश्रम भी ज्यादा लगता था। पर बदलते दौर में धीरे धीरे इसमें सुधार आने लगा, जिसके परिणामस्वरूप आज के किसानों की जटिलता कम हो गयी और उनके समय की बचत एवं आर्थिक सुधार का दौर आ गया। जब हम किसानों की कठिनाईयों की बात करते हैं तो ट्रैक्टर की याद जरूर आती है। सर्व प्रथम ट्रैक्टर के विषय में उन्नीसवीं शताब्दी में जाना गया। मगर भारत में इसकी शुरुआत हरित क्रांति से ही हो गयी थी।  स्वतंत्रता के बाद जहाँ भारत में एक तरफ इसका इस्तेमाल तेज़ी से होने लगा और इसकी मांग बढ़ गयी वहीँ दूसरी तरफ १९५० से १९६० के बीच ही अपने देश में ट्रैक्टर निर्माण का कार्य भी शुरू हो चुका था। आधुनिक कृषि उपकरण में ट्रैक्टर का स्थान कोई अन्य नहीं ले सकता है। इसकी सहायता से कठिन से कठिन कार्य भी आसानी से हो सकता है। इसका उपयोग कृषि से सम्बंधित अन्य उपकरणों को चलाने व खींचने में भी किया जाता है। कृषि क्षेत्र में ट्रैक्टर का इस्तेमाल जोतने, बीज बोने, फसल लगाने और काटने जैसे कार्यों में होता आ रहा था, परन्तु अब लकड़ी चीरने, सामान ढोने, सब्जी बोने एवं निकालने आदि कार्यों में भी होने लगा है। अगर ट्रैक्टर के बनावट की बात करें तो इसमें इंजन और उसके साधन चेसिस और पावर ट्रान्समीटिंग सिस्टम मुख्य होते हैं।  सामान्यतः ट्रैक्टर के दो मुख्य प्रकार होते हैं।  जिसमे पहला प्रकार व्हिल्ड ट्रैक्टर का उपयोग किसानों द्वारा कृषि कार्यों में होता है और दूसरा प्रकार ट्रैक ट्रैक्टर का उपयोग औद्योगिक क्षेत्रों में एवं बाँध बनाने जैसे कार्यों में किया जाता है।

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भारत एक कृषि प्रधान देश है जिसके कारण कृषि से होने वाले आर्थिक फायदे और नुक्सान का हमारे देश में गहरा प्रभाव पड़ता है। आज के दौर में ट्रैक्टर कृषि क्षेत्र में महत्वपूर्ण भागीदार रहा है। इसके बगैर आज की कृषि भी संभव नहीं है।  किसानों की बढ़ती हुई मांग की आपूर्ति के लिए आज दुनिया भर में ३० प्रतिशत ट्रैक्टर का निर्माण सिर्फ भारत में ही होता है। आज़ादी से पहले रूस से भारत ट्रैक्टर का आयात करता था। परिणामस्वरूप यह बहुत महंगा हो जाता था, जिस वजह से सभी किसानों को यह आसानी से सुलभ नहीं था।  सिर्फ धनाढ्य लोगों के घरों में ही यह दिखता था। हरित क्रांति के बाद इस कहानी में एक नया मोड़ आया जिसमें भारत में निर्माण कार्य भी प्रारम्भ हो गया।  परन्तु इसमें बड़े बदलाव अस्सी के दशक में आया जिससे पैदावार में बढ़ोतरी हुई। धीरे धीरे सत्र  २००० तक आते आते भारत ने ट्रैक्टर उत्पादन में अमेरिका को भी पीछे छोड़ते हुए नए मुकाम को हासिल कर लिया। इतने सारे ट्रैक्टर निर्माताओं में, फार्मट्रैक 60 पिछले दशकों से भारतीय किसानों के सबसे प्रिय ट्रैक्टरों में से एक रहा है। फार्मट्रैक 60 विश्व स्तरीय गुणवत्ता और नवीनतम सुविधाओं के साथ स्पष्ट रूप से बड़े और शक्तिशाली ट्रैक्टर के मूल मूल्यों को परिभाषित करता है। फार्मट्रैक 60 पॉवरमैक्स का नवीनतम संस्करण, अब 55 एचपी और 16.9x28 टायर के साथ आता है। यह निश्चित रूप से 3514 सीसी इंजन और 254 एनएम टॉर्क के साथ तीन सिलेंडर इंजन श्रेणी में सबसे शक्तिशाली ट्रैक्टर है। और देश के सबसे प्यारे ट्रैक्टरों में से एक है। 20-स्पीड गियरबॉक्स प्रत्येक एप्लिकेशन पर 3 या अधिक गति प्रदान करता है जिससे 50% अधिक उत्पादकता मिलती है। इसमें 8+2 गियरबॉक्स का भी विकल्प है। फार्मट्रैक अपनी लिफ्ट की श्रेष्ठता के लिए जाना जाता है जिसे अब सबसे शक्तिशाली 2500 किलोग्राम भारी शुल्क लिफ्ट के साथ बढ़ाया गया है। ये सारे विकल्प इसे कल्टीवेटर, रोटावेटर, हल, प्लांटर जैसे अन्य उपकरणों के लिए बहुत उपयुक्त बनाते हैं। फार्मट्रैक 60 पॉवरमैक्स ट्रैक्टर भारतीय खेतों पर राज करता है और इसे कृषि के राजा के रूप में जाना जाता है। अपनी शक्ति के साथ, सुपर सीडर और रीपर के लिए सबसे उपयुक्त गति, और उन्नत सुविधाओं के साथ यह सबसे बड़े उन्नत उपकरणों को अत्यंत आसानी से चला सकता है। बड़े टायर और ईपीआई में कमी इसे ढुलाई और वाणिज्यिक अनुप्रयोगों में भी सर्वश्रेष्ठ बनाती है। यह ट्रैक्टर अपनी कम ईंधन की खपत और इंजन विश्वसनीयता के लिए जाना जाता है। साथ ही, कम सेवा लागत और सेवा केंद्रों की एक विस्तृत श्रृंखला इस ब्रांड को किसानों के बीच सबसे पसंदीदा ब्रांड बनाती है। फार्मट्रैक 60 पॉवरमैक्स ट्रैक्टर जो की भारत में निर्मित ब्रांड है, कम ईंधन या कहें जबरदस्त माइलेज वाला इंजन, कम रखरखाव लागत वाली विश्वसनीय इंजन और अन्य क्षमताओं से लैस होने की वजह से बिलकुल पैसा वसूल वाली खरीद है।
महाराष्ट्र में शुरू हुई कपास की खेती के लिए अनोखी मुहिम - दोगुनी होगी किसानों की आमदनी

महाराष्ट्र में शुरू हुई कपास की खेती के लिए अनोखी मुहिम - दोगुनी होगी किसानों की आमदनी

कपास की खेती से दोगुनी होगी किसानों की आमदनी - महाराष्ट्र में शुरू हुई कपास की खेती के लिए अनोखी मुहिम

मुम्बई। कपास की खेती किसानों के लिए सफेद सोना बन गई है। भले ही केन्द्र सरकार ने वित्तीय वर्ष 2022-23 के लिए कॉटन का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 6380 रु. तय किया है। जबकि महाराष्ट्र में किसानों को कॉटन का भाव 12000 रु. प्रति क्विंटल मिल रहा है। इसीलिए इस साल कपास की बुवाई पर किसान काफी जोर दे रहे हैं। कृषि विभाग भी चाहता है कि किसान ज्यादा से ज्यादा कपास की बुवाई करें, जिससे किसानों को फायदा मिले। और किसानों की आमदनी दोगुनी हो जाए। कृषि विभाग के अधिकारियों के मार्गदर्शन और किसानों की भागी से इस बार उत्पादन में वृद्धि होने की उम्मीद जताई जा रही है। महाराष्ट्र के कई गांवों में कपास की एक ही किस्म लगाने और उत्पादन में इजाफा करने का प्लान बनाया गया है।

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कपास का रकबा बढाने के लिए पहल

- 'एक-गांव, एक-पहल' के तहत महाराष्ट्र के 63 गांवों में 6 हजार 225 हेक्टेयर में एक साथ कपास की बुवाई की जाएगी। इसकी शुरुआत भी हो चुकी है। यहां कपास का रकबा साल दर साल बढ़ रहा है। इस अभियान का मकसद तभी पूरा होगा, जब किसानों को फसल का पूरा दाम मिले। ये भी देखें: कपास की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

ये ब्लॉक होंगे अभियान में शामिल

- 'एक गांव-एक किस्म' अभियान के तहत नगर तालुका में 9 गांव शामिल होंगे। इसमें 774 हेक्टेयर में कपास की खेती होगी। पथरडी तालुका में 13 गांवों को शामिल किया गया है। इनमें 1460 हेक्टेयर क्षेत्र शामिल होगा। शेवगांव तालुका के 8 गांवों में 1 हजार 200 हेक्टेयर एरिया शामिल किया जाएगा। इस पहल के जरिए रकबा तो बढ़ेगा ही साथ में उत्पादन में भी इजाफा होगा. जिससे किसानों की आय बढ़ेगी। ------ लोकेन्द्र नरवार