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कीटनाशक

अंगूर की खेती को कीड़ों से बचाने के लिए बाजार में आ गया है कीटनाशक

अंगूर की खेती को कीड़ों से बचाने के लिए बाजार में आ गया है कीटनाशक

खेती के साथ परेशानियां भी चलती रहती है। आजकल फसलों में कीटों का प्रकोप आम हो गया है, जिसके कारण किसान बुरी तरह प्रभावित होते हैं। कीटों के आक्रमण के कारण किसानों की फसलें चौपट हो जाती हैं। जिसके कारण उन्हें भारी नुकसान झेलना पड़ता है। इसको देखते हुए किसान आजकल ऐसी फसलें विकसित करने में लगे हैं, जिनमें कीटों का हमला न हो। कृषि वैज्ञानिक भरपूर कोशिश कर रहे हैं, कि नए प्रकार से विकसित की गई फसलों में कवक, फंगल, अन्य बैक्टीरिया, वायरस हमला न कर पाएं और फसल इन प्रकोपों से सुरक्षित रहे।
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इसके अलावा आजकल कृषि वैज्ञानिक कीटों से निपटने के लिए ऐसे कीटनाशकों का निर्माण कर रहे हैं जिनके प्रयोग से फसल में कीटों का पूरी तरह से सफाया हो जाए। इसी को देखते हुए अब एक ऐसे कवकनाशी को विकसित किया गया है जो अंगूर को एक खास बीमारी से बचाव के लिए बेहद उपयोगी है। फसल पर इसका प्रयोग करने से यह कवकनाशी कीड़ों का पूरी तरह से सफाया कर देगा।

अंगूर की खेती में होता है इस रोग का प्रकोप

अंगूर की खेती किसानों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि इसमें किसान को ज्यादा मेहनत करनी होती है। साथ ही कीटों का प्रकोप बहुत जल्दी होता है। अंगूरों में आमतौर पर 'डाउनी मिल्ड्यू' नामक बीमारी हो जाती है, जिसकी वजह से अंगूर की बेल बुरी तरह से प्रभावित होती है। यह एक फफूंद रोग है, जिसके कारण अंगूर के उत्पादन में भारी कमी आती है। जिसको देखते हुए देश के कृषि वैज्ञानिक बहुत दिनों से इस रोग का उपाय खोजने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन अब जाकर उन्हें सफलता हाथ लगी है। कृषि वैज्ञानिकों ने इस कवकनाशी को स्टनर नाम दिया है। इसे इंसेक्टिसाइड्स (इंडिया) लिमिटेड (आईआईएल) ने विकसित किया है। यह कवकनाशी अंगूर में होने वाली डाउनी मिल्ड्यू बीमारी को पूरी तरह से खत्म कर देगा। भारत में महाराष्ट्र के साथ-साथ अन्य राज्यों में भी अंगूर की खेती बहुतायत में होती है। इस कवानाशी के बाजार में आ जाने से किसानों को कवक के प्रकोप से राहत मिलेगी।

अंगूर की खेती के लिए पहली बार विकसित हुई है ऐसी दवा

इंसेक्टिसाइड्स (इंडिया) लिमिटेड के अधिकारियों और कृषि वैज्ञानिकों का कहना है, कि अंगूर में लगने वाले कीड़ों के प्रकोप से निपटने के लिए देश में पहली बार किसी कीटनाशक का निर्माण किया गया है। अंगूर किसान सालों से इस तरह की दवाई की प्रतीक्षा कर रहे थे, जो अंगूर में लगने वाले इस रोग को जड़ से खत्म कर सके। निश्चित तौर पर किसानों के लिए यह दवाई उत्पादन बढ़ाने में कारगर होगी। अगर अंगूर के उत्पादन की बात करें तो इसका उत्पादन महाराष्ट्र में मुख्यतः नासिक, बारामती, सांगली, नारायणगांव, सोलापुर और सतारा जिलों में जमकर होता है। इसके अलावा अंगूर कि खेती देश के अन्य राज्यों में भी होती है। जहां के अंगूर किसान इस दवाई से लाभान्वित हो सकेंगे और अपनी फसल को कीटों से सुरक्षित कर सकेंगे।
आम के बागों से अत्यधिक लाभ लेने के लिए फूल (मंजर ) प्रबंधन अत्यावश्यक, जाने क्या करना है एवं क्या नही करना है ?

आम के बागों से अत्यधिक लाभ लेने के लिए फूल (मंजर ) प्रबंधन अत्यावश्यक, जाने क्या करना है एवं क्या नही करना है ?

उत्तर भारत खासकर बिहार एवम् उत्तर प्रदेश में आम में मंजर, फरवरी के द्वितीय सप्ताह में आना प्रारम्भ कर देता है, यह आम की विभिन्न प्रजातियों तथा उस समय के तापक्रम द्वारा निर्धारित होता है। आम (मैंगीफेरा इंडिका) भारत में सबसे महत्वपूर्ण उष्णकटिबंधीय फल है। भारतवर्ष में आम उत्तर प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश एवं बिहार में प्रमुखता से इसकी खेती होती है। भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के वर्ष 2020-21 के संख्यिकी के अनुसार भारतवर्ष में 2316.81 हजार हेक्टेयर में आम की खेती होती है, जिससे 20385.99 हजार टन उत्पादन प्राप्त होता है। आम की राष्ट्रीय उत्पादकता 8.80 टन प्रति हेक्टेयर है। बिहार में 160.24 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में इसकी खेती होती है जिससे 1549.97 हजार टन उत्पादन प्राप्त होता है। बिहार में आम की उत्पादकता 9.67 टन प्रति हे. है जो राष्ट्रीय उत्पादकता से थोड़ी ज्यादा है।

आम की उत्पादकता को बढ़ाने के लिए आवश्यक है कि मंजर ने टिकोला लगने के बाद बाग का वैज्ञानिक ढंग से प्रबंधन कैसे किया जाय जानना आवश्यक है ? आम में फूल आना एक महत्वपूर्ण चरण है,क्योंकि यह सीधे फल की पैदावार को प्रभावित करता है । आम में फूल आना विविधता और पर्यावरणीय परिस्थितियों पर अत्यधिक निर्भर है। इस प्रकार, आम के फूल आने की अवस्था के दौरान अपनाई गई उचित प्रबंधन रणनीतियाँ फल उत्पादन को सीधे प्रभावित करती हैं।

आम के फूल का आना

आम के पेड़ आमतौर पर 5-8 वर्षों के विकास के बाद परिपक्व होने पर फूलना शुरू करते हैं , इसके पहले आए फूलों को तोड़ देना चाहिए । उत्तर भारत में आम पर फूल आने का मौसम आम तौर पर मध्य फरवरी से शुरू होता है। आम के फूल की शुरुआत के लिए तेज धूप के साथ दिन के समय 20-25 डिग्री सेल्सियस और रात के दौरान 10-15 डिग्री सेल्सियस की आवश्यकता होती है। हालाँकि, फूल लगने के समय के आधार पर, फल का विकास मई- जून तक शुरू होता है। फूल आने की अवधि के दौरान उच्च आर्द्रता, पाला या बारिश फूलों के निर्माण को प्रभावित करती है। फूल आने के दौरान बादल वाला मौसम आम के हॉपर और पाउडरी मिल्डीव एवं एंथरेक्नोज बीमारियों के फैलने में सहायक होता है, जिससे आम की वृद्धि और फूल आने में बाधा आती है।

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आम में फूल आने से फल उत्पादन पर क्या प्रभाव पड़ता है?

आम के फूल छोटे, पीले या गुलाबी लाल रंग के आम की प्रजातियों के अनुसार , गुच्छों में गुच्छित होते हैं, जो शाखाओं से नीचे लटकते हैं। वे उभयलिंगी फूल होते हैं लेकिन परागणकों द्वारा क्रॉस-परागण अधिकतम फल सेट में योगदान देता है। आम परागणकों में मधुमक्खियाँ, ततैया, पतंगे, तितलियाँ, मक्खियाँ, भृंग और चींटियाँ शामिल हैं। उत्पादित फूलों की संख्या और फूल आने की अवस्था की अवधि सीधे फलों की उपज को प्रभावित करती है। हालाँकि, फूल आना कई कारकों से प्रभावित होता है जैसे तापमान, आर्द्रता, सूरज की रोशनी, कीट और बीमारी का प्रकोप और पानी और पोषक तत्वों की उपलब्धता। ये कारक फूल आने के समय और तीव्रता को प्रभावित करते हैं। यदि फूल आने की अवस्था के दौरान उपरोक्त कारक इष्टतम नहीं हैं, तो इसके परिणामस्वरूप कम या छोटे फल लगेंगे। उत्पादित सभी फूलों पर फल नहीं लगेंगे। फल के पूरी तरह से सेट होने और विकसित होने के लिए उचित परागण आवश्यक है। पर्याप्त परागण के बाद भी, मौसम की स्थिति और कीट संक्रमण जैसे कई कारकों के कारण फूलों और फलों के बड़े पैमाने पर गिरने के कारण केवल कुछ अनुपात में ही फूल बनते हैं। इससे अंततः फलों की उपज और गुणवत्ता प्रभावित होती है। फूल आने का समय, अवधि और तीव्रता आम के पेड़ों में फल उत्पादन को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करती है।

आम के फूलों का प्रबंधन

1. कर्षण क्रियाएं

फल की तुड़ाई के बाद आम के पेड़ों की ठीक से कटाई - छंटाई करने से अच्छे एवं स्वस्थ फूल आते हैं। कटाई - छंटाई की कमी से आम की छतरी (Canopy) घनी हो जाती है, जिससे प्रकाश पेड़ के आंतरिक भागों में प्रवेश नहीं कर पाता है और इस प्रकार फूल और उपज कम हो जाती है। टहनियों के शीर्षों की छंटाई करने से फूल आने शुरू होते हैं। छंटाई का सबसे अच्छा समय फल तुडाई के बाद होता है, आमतौर पर जून से अगस्त के दौरान। टिप प्रूनिंग, जो अंतिम इंटरनोड से 10 सेमी ऊपर की जाती है, फूल आने में सुधार करती है। गर्डलिंग आम में फलों की कलियों के निर्माण को प्रेरित करने के लिए उपयोग की जाने वाली एक विधि है। इसमें आम के पेड़ के तने से छाल की पट्टी को हटाना शामिल है। यह फ्लोएम के माध्यम से मेटाबोलाइट्स के नीचे की ओर स्थानांतरण को अवरुद्ध करके करधनी के ऊपर के हिस्सों में पत्तेदार कार्बोहाइड्रेट और पौधों के हार्मोन को बढ़ाकर फूल, फल सेट और फल के आकार को बढ़ाता है। पुष्पक्रम निकलने के समय घेरा बनाने से फलों का जमाव बढ़ जाता है। गर्डलिंग की गहराई का ध्यान रखना चाहिए। अत्यधिक घेरेबंदी की गहराई पेड़ को नुकसान पहुंचा सकती है। यह कार्य विशेषज्ञ की देखरेख या ट्रेनिंग के बाद ही करना चाहिए।

2. पादप वृद्धि नियामक (पीजीआर)

पादप वृद्धि नियामक (पीजीआर) का उपयोग पौधों की वृद्धि और विकास को नियंत्रित करने वाली शारीरिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करके फूलों को नियंत्रित करने और पैदावार बढ़ाने के लिए किया जाता है।एनएए फूल आने, कलियों के झड़ने और फलों को पकने से रोकने में भी मदद करते हैं। वे फलों का आकार बढ़ाने, फलों की गुणवत्ता और उपज बढ़ाने और सुधारने में मदद करते हैं। प्लेनोफिक्स @ 1 मी.ली. दवा प्रति 3 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव फूल के निकलने से ठीक पूर्व एवं दूसरा छिड़काव फल के मटर के बराबर होने पर करना चाहिए ,यह छिड़काव टिकोलो (आम के छोटे फल) को गिरने से रोकने के लिए आवश्यक है।लेकिन यहा यह बता देना आवश्यक है की आम के पेड़ के ऊपर शुरुआत मे जीतने फल लगते है उसका मात्र 5 प्रतिशत से कम फल ही अंततः पेड़ पर रहता है , यह पेड़ की आंतरिक शक्ति द्वारा निर्धारित होता है । कहने का तात्पर्य यह है की फलों का झड़ना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है इसे लेकर बहुत घबराने की आवश्यकता नहीं है । पौधों की वृद्धि और विकास पर नकारात्मक प्रभावों से बचने के लिए पीजीआर का सावधानीपूर्वक प्रबंधन किया जाना चाहिए, जैसे अत्यधिक शाखाएं, फलों का आकार कम होना, या फूल आने में देरी। उपयोग से पहले खुराक और आवेदन के समय की जांच करें।

3. पोषक तत्व प्रबंधन

आम के पेड़ों में फूल आने के लिए पोषक तत्व प्रबंधन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। नाइट्रोजन पौधों की वृद्धि और विकास के लिए आवश्यक है। हालाँकि, अत्यधिक नाइट्रोजन फूल आने के बजाय वानस्पतिक विकास को बढ़ावा देकर आम के फूल आने में देरी करती है। इससे फास्फोरस(पी) और पोटाश (के) जैसे अन्य पोषक तत्वों में भी असंतुलन हो सकता है जो फूल आने के लिए महत्वपूर्ण हैं। नाइट्रोजन के अधिक उपयोग से वानस्पतिक वृद्धि के कारण कीट संक्रमण की संभावना बढ़ जाती है। फूलों के प्रबंधन के लिए नत्रजन (एन) की इष्टतम मात्रा का उपयोग किया जाना चाहिए। फास्फोरस आम के पेड़ों में फूल लगने और फल लगने के लिए आवश्यक है। फूल आने को बढ़ावा देने के लिए फूल आने से पहले की अवस्था में फॉस्फोरस उर्वरक का प्रयोग करें। पर्याप्त पोटेशियम का स्तर आम के पेड़ों में फूलों को बढ़ा सकता है और फूलों और फलों की संख्या में वृद्धि करता है। पोटेशियम फल तक पोषक तत्वों और पानी के परिवहन में मदद करता है, जो इसके विकास और आकार के लिए आवश्यक है। यह पौधों में नमी के तनाव, गर्मी, पाले और बीमारी के प्रति प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी मदद करता है। सूक्ष्म पोषक तत्वों के प्रयोग से फूल आने, फलों की गुणवत्ता में सुधार और फलों का गिरना नियंत्रित करके बेहतर परिणाम मिलते हैं।

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4. कीट एवं रोग प्रबंधन

फूल और फल बनने के दौरान, कीट और बीमारी के संक्रमण की संभावना अधिक होती है, जिससे फूल और समय से पहले फल झड़ने का खतरा होता है। मैंगो हॉपर, फ्लावर गॉल मिज, मीली बग और लीफ वेबर आम के फूलों पर हमला करने वाले प्रमुख कीट हैं। मैंगो पाउडरी मिल्ड्यू, मैंगो मैलफॉर्मेशन और एन्थ्रेक्नोज ऐसे रोग हैं जो आम के फूलों को प्रभावित करते हैं जिससे फलों का विकास कम हो जाता है। फलों की पैदावार बढ़ाने के लिए आम के फूलों में कीटों और बीमारियों के लक्षण और प्रबंधन की जाँच करें - आम के फूलों में रोग और कीट प्रबंधन करना चाहिए।

विगत 4 – 5 वर्ष से बिहार में मीली बग (गुजिया) की समस्या साल दर साल बढ़ते जा रही है। इस कीट के प्रबंधन के लिए आवश्यक है कि दिसम्बर- जनवरी में बाग के आस पास सफाई करके मिट्टी में क्लोरपायरीफास 1.5 डी. धूल @ 250 ग्राम प्रति पेड का बुरकाव कर देना चाहिए तथा मीली बग (गुजिया)  कीट पेड़ पर न चढ सकें इसके लिए एल्काथीन की 45 सेमी की पट्टी आम के मुख्य तने के चारों तरफ सुतली से बांध देना चाहिए। ऐसा करने से यह कीट पेड़ पर नही चढ़ सकेगा । यदि आप ने पूर्व में ऐसा नही किया है एवं गुजिया कीट पेड पर चढ गया हो तो ऐसी अवस्था में डाएमेथोएट 30 ई.सी. या क्विनाल्फोस 25 ई.सी.@ 1.5 मीली दवा प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। जिन आम के बागों का प्रबंधन ठीक से नही होता है वहां पर हापर या भुनगा कीट बहुत सख्या में हो जाते है अतः आवश्यक है कि सूर्य का प्रकाश बाग में जमीन तक पहुचे जहां पर बाग घना होता है वहां भी इन कीटों की सख्या ज्यादा होती है।

पेड़ पर जब मंजर आते है तो ये मंजर इन कीटों के लिए बहुत ही अच्छे खाद्य पदार्थ होते है,जिनकी वजह से इन कीटों की संख्या में भारी वृद्धि हो जाती है।इन कीटों की उपस्थिति का दूसरी पहचान यह है कि जब हम बाग के पास जाते है तो झुंड के झुंड  कीड़े पास आते है। यदि इन कीटों को प्रबंन्धित न किया जाय तो ये मंजर से रस चूस लेते है तथा मंजर झड़ जाता है । जब प्रति बौर 10-12 भुनगा दिखाई दे तब हमें इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल.@1मीली दवा प्रति 2 लीटर पानी में घोल कर छिडकाव करना चाहिए । यह छिड़काव फूल खिलने से पूर्व करना चाहिए अन्यथा बाग में आने वाले मधुमक्खी के किड़े प्रभावित होते है जिससे परागण कम होता है तथा उपज प्रभावित होती है ।

पाउडरी मिल्डयू/ खर्रा रोग के प्रबंधन के लिए आवश्यक है कि मंजर आने के पूर्व घुलनशील गंधक @ 2 ग्राम / लीटर पानी मे घोलकर छिड़काव करना चाहिए। जब पूरी तरह से फल लग जाय तब इस रोग के प्रबंधन के लिए हेक्साकोनाजोल @ 1 मिली लीटर प्रति लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करना चाहिए। जब तापक्रम 35 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा हो जाता है तब इस रोग की उग्रता में कमी अपने आप आने लगती है।

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गुम्मा व्याधि से ग्रस्त बौर को काट कर हटा देना चाहिए। बाग में यदि तना छेदक कीट या पत्ती काटने वाले धुन की समस्या हो तो क्विनालफोस 25 ई.सी. @ 2 मीली दवा / लीटर पानी मे घोलकर छिड़काव करना चाहिए। लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है की फूल खिलने के ठीक पहले से लेकर जब फूल खिले हो उस अवस्था मे कभी भी किसी भी रसायन, खासकर कीटनाशकों का छिडकाव नहीं करना चाहिए, अन्यथा परागण बुरी तरह प्रभावित होता है एवं फूल के कोमल हिस्से घावग्रस्त होने की संभावना रहती है । 

5. परागण

आम के फूल में एक ही फूल में नर और मादा दोनों प्रजनन अंग होते हैं। हालाँकि, आम के फूल अपेक्षाकृत छोटे होते हैं और बड़ी मात्रा में पराग का उत्पादन नहीं करते हैं। इसलिए, फूलों के बीच पराग स्थानांतरित करने के लिए वे मक्खियों, ततैया और अन्य कीड़ों जैसे परागणकों पर बहुत अधिक निर्भर होते हैं। परागण के बिना, आम के फूल फल नहीं दे सकते हैं, या फल छोटा या बेडौल हो सकता है। पर-परागण से आम की पैदावार बढ़ती है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि पूर्ण ब्लूम(पूर्ण रूप से जब फूल खिले होते है) चरण के दौरान कीटनाशकों और कवकनाशी का छिड़काव नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि इस समय कीटों द्वारा परागण प्रभावित होगा जिससे उपज कम हो जाएगी। आम के बाग से अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए आम के बाग में मधुमक्खी की कालोनी बक्से रखना अच्छा रहेगा,इससे परागण अच्छा होता है तथा फल अधिक मात्रा में लगता है।

6. मौसम की स्थिति

फूल आने के दौरान अनुकूलतम मौसम की स्थिति से सफल फल लगने की दर और पैदावार में वृद्धि होती है। उदाहरण के लिए, अत्यधिक हवा की गति के कारण फूल और फल बड़े पैमाने पर गिर जाते हैं। इस प्रकार, विंडब्रेक या शेल्टरबेल्ट लगाकर आम के बागों को हवा से सुरक्षा प्रदान करना आवश्यक है।

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7. जल प्रबंधन

आम के पेड़ों को विशेष रूप से बढ़ते मौसम के दौरान पर्याप्त मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। अपर्याप्त या अत्यधिक पानी देने से फल की उपज और गुणवत्ता कम हो सकती है। उचित जल प्रबंधन बीमारियों और कीटों को रोकने में भी मदद करता है, जो नम वातावरण में पनपते हैं। गर्म और शुष्क जलवायु में, सिंचाई आर्द्रता के स्तर को बढ़ाने और तापमान में उतार-चढ़ाव को कम करने में मदद कर सकती है, जिससे आम की वृद्धि के लिए अधिक अनुकूल वातावरण मिलता है। अत्यधिक सिंचाई से मिट्टी का तापमान कम हो सकता है, जिसके परिणामस्वरूप पौधों की वृद्धि और विकास कम हो जाता है। दूसरी ओर, अपर्याप्त पानी देने से मिट्टी का तापमान बढ़ सकता है, पौधों की जड़ों को नुकसान पहुँच सकता है और पैदावार कम हो सकती है। इस प्रकार, स्वस्थ पौधों की वृद्धि और फल उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी जल प्रबंधन आवश्यक है। फूल निकलने के 2 से 3 महीने पहले से लेकर फल के मटर के बराबर होने के मध्य सिंचाई नही करना चाहिए ।कुछ बागवान आम में फूल लगने एवं खिलने के समय सिंचाई करते है इससे फूल झड़ जाते है । इसलिए सलाह दी जाती है सिंचाई तब तक न करें जब तक फल मटर के बराबर न हो जाय।

सारांश

अधिक पैदावार के लिए आम के फूलों के प्रबंधन में पौधों की वृद्धि को अनुकूलित करने, कीटों और बीमारियों का प्रबंधन करने और फूलों के विकास और परागण के लिए इष्टतम पर्यावरणीय परिस्थितियों को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से रणनीतियों का संयोजन शामिल है। इन प्रबंधन प्रथाओं का पालन करने से फूलों और फलों के उत्पादन में वृद्धि हो सकती है, जिससे उच्च पैदावार और फलों की गुणवत्ता में सुधार होगा।


Dr AK Singh
डॉ एसके सिंह प्रोफेसर (प्लांट पैथोलॉजी) एवं विभागाध्यक्ष,
पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी,
प्रधान अन्वेषक, अखिल भारतीय फल अनुसंधान परियोजना,डॉ राजेंद्र प्रसाद सेंट्रल एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, पूसा-848 125, समस्तीपुर,बिहार
Send feedback sksraupusa@gmail.com/sksingh@rpcau.ac.in
केंद्र सरकार ने इस खरपतवार नाशी केमिकल के आयात पर लगाया बैन

केंद्र सरकार ने इस खरपतवार नाशी केमिकल के आयात पर लगाया बैन

भारत सरकार की तरफ से कम कीमत वाले 'ग्लूफोसिनेट टेक्निकल' के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है। भारत भर में यह निर्णय 25 जनवरी, 2024 से ही लागू कर दिया गया है। बतादें, कि 'ग्लूफोसिनेट टेक्निकल' का उपयोग खेतों में खरपतवार को हटाने के मकसद से किया जाता है। यहां जानें ग्लूफोसिनेट टेक्निकल पर रोक लगाने के पीछे की वजह के बारे में। 

भारत के कृषक अपने खेत की फसल से शानदार उत्पादन हांसिल करने के लिए विभिन्न प्रकार के केमिकल/रासायनिक खादों/ Chemical Fertilizers का उपयोग करते हैं, जिससे फसल की उपज तो काफी अच्छी होती है। परंतु, इसके उपयोग से खेत को बेहद ज्यादा हानि पहुंचती है। इसके साथ-साथ केमिकल से निर्मित की गई फसल के फल भी खाने में स्वादिष्ट नहीं लगते हैं। कृषकों के द्वारा पौधों का शानदार विकास और बेहतरीन उत्पादन के लिए 'ग्लूफोसिनेट टेक्निकल' का उपयोग किया जाता है। वर्तमान में भारत सरकार ने ग्लूफोसिनेट टेक्निकल नाम के इस रसायन पर प्रतिबंध लगा दिया है। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि सरकार ने हाल ही में सस्ते मूल्य पर मिलने वाले खरपतवारनाशक ग्लूफोसिनेट टेक्निकल के आयात पर रोक लगा दी है। आंकलन यह है, कि सरकार ने यह फैसला घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से किया है।

ग्लूफोसिनेट टेक्निकल का इस्तेमाल किस के लिए किया जाता है 

किसान ग्लूफोसिनेट टेक्निकल का उपयोग खेतों से हानिकारक खरपतवार को नष्ट करने या हटाने के लिए करते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ किसान इसका इस्तेमाल पौधों के शानदार विकास में भी करते हैं। ताकि फसल से ज्यादा से ज्यादा मात्रा में उत्पादन हांसिल कर वह इससे काफी शानदार कमाई कर सकें। 

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ग्लूफोसिनेट टेक्निकल केमिकल का आयात प्रतिबंधित 

ग्लूफोसिनेट टेक्निकल केमिकल पर प्रतिबंध का आदेश 25 जनवरी, 2024 से ही देश भर में लागू कर दिया गया है। ग्लूफोसिनेट टेक्निकल केमिकल पर प्रतिबंध को लेकर विदेश व्यापार महानिदेशालय का कहना है, कि ग्लूफोसिनेट टेक्निकल के आयात पर प्रतिबंध मुक्त से निषेध श्रेणी में किया गया है।

उन्होंने यह भी कहा है, कि यदि इस पर लागत, बीमा, माल ढुलाई मूल्य 1,289 रुपये प्रति किलोग्राम से ज्यादा होता है, तो ग्लूफोसिनेट टेक्निकल का आयात पूर्व की भांति ही रहेगा। परंतु, इसकी कीमत काफी कम होने की वजह से इसके आयात को भारत में प्रतिबंधित किया गया है। 

कीटनाशक दवाएं महंगी, मजबूरी में वाशिंग पाउडर छिड़काव कर रहे किसान

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फोटो परिचय : गांव हसनपुर में उड़द की फसल पर छिड़काव करता किसान

कीटनाशक दवाएं महंगी, मजबूरी में वाशिंग पाउडर छिड़काव कर रहे किसान- मूंग और उड़द की फसल को नुकसान पहुंचा रहे कीट-पतंगे

नौहझील। बढ़ती महंगाई का असर अब कीटनाशक दवाओं पर भी दिखाई देने लगा है। कीटनाशक दवाओं पर म्हंगैबक चलते किसान वाशिंग पाउडर का घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करने को मजबूर हैं। इन दिनों मूंग और उड़द की फसल लहलहा रही है। लेकिन
कीट-पतंगे फसल को बर्बाद कर रहे हैं। कीड़े और गिडार फसल को खा रहीं हैं। कीटनाशक दवाओं मूल्यों पर अचानक हुई वृद्धि से किसान परेशान हैं। मजबूरन किसान कीटनाशक की जगह पानी में वाशिंग पाउडर का घोल बनाकर मूंग व उड़द की फसल पर छिड़काव कर रहे हैं।

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गांव हसनपुर निवासी किसान ललित चौधरी व दीपू फौजदार बताते हैं कि उन्होंने अपने खेत में मूंग कि उड़द की फसल बो रखी है। फसल को कीड़े व गिडार कहा रहे हैं। कीटनाशक दवाओं के रेट अचानक बढ जाने के कारण पानी में वाशिंग पाउडर का घोल बनाकर छिड़काव कर रहे हैं। हालांकि इसका असर कम ही दिखाई दे रहा है।

क्या कहते हैं दुकानदार

- विकास कीटनाशक भंडार कोलाहर के दुकानदार मनोज चौधरी ने बताया कि रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते कीटनाशक दवाओं के रेट महंगे हुए हैं। बीते दो महीने में कीटनाशक दवाओं के रेट दोगुने तक हो गए हैं। "मौसम काफी गर्म है ऐसे में फसल पर वाशिंग पाउडर के घोल का छिड़काव फसलों के लिए हानिकारक हो सकता है। किसानों को कोराजिन व मार्शल लिक्विड का छिड़काव करना चाहिए। जो सस्ता व कारगर साबित होगा।" - एसडीओ कृषि, सुबोध कुमार सिंह

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इन गांवों के किसान हैं प्रभावित

- हसनपुर, ईखू, मसंदगढ़ी, पालखेड़ा, रायकरनगढ़ी, भूरेखा, मरहला, नावली, सामंतागढ़ी सहित कई गांवों के किसानों की फसल कीट-पतंगों से प्रभावित हो रहीं हैं।

तीन महीने पहले की कीमत :

- एक्सल की मीरा 71 100 ML की कीमत 60 रुपए थी, जो अब 130 रुपए है। - नागार्जुना 65 रुपए कीमत थी जो अब 125 रुपए हो गई है एक एकड़ में 60 एमएल कोराजिन दवा का छिड़काव होता है। जिसकी कीमत 850 रुपए है। ------ लोकेन्द्र नरवार
धान की रोपाई

धान की रोपाई

दोस्तों आज हम बात करेंगे, धान की रोपाई की यदि आप एक किसान भाई हैं और आपको धान की रोपाई की पूरी जानकारी सही तरह से मालूम नहीं है, तो आप की फसल खराब हो सकती है। इसलिए आप धान की रोपाई की सभी प्रकार की आवश्यक बातें को जानने के लिए हमारे इस पोस्ट के अंत तक बने रहें: 

धान की रोपाई करने का तरीका (Paddy transplanting method):

धान की रोपाई करने से पहले खेत को अच्छी तरह से दो से तीन बार गहरी जुताई की आवश्यकता होती है। किसान भाई धान की रोपाई करने के लिए एक हफ्ते पहले ही खेत की अच्छी तरह से सिंचाई कर लेते हैं। रोपाई करने के लिए हैरो की आवश्यकता पड़ती है यह जुताई लगभग दो से तीन बार हैरो द्वारा की जाती है। जुताई करने के बाद खेत को अच्छी तरह से पानी से भर दिया जाता है। खेतों में पडलर और टिलर की सहायता से जुताई की जाती है। जताई करने के बाद खेतों में पाटा लगाकर मिट्टी को अच्छी तरह से समतल बना दिया जाता है।

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तर वत्तर सीधी बिजाई धान : भूजल-पर्यावरण संरक्षण व खेती लागत बचत का वरदान (Direct paddy plantation)

धान की रोपाई करते समय खाद का उपयोग:

धान की फसल किसानों के लिए बहुत ही उपयोगी होती है। इस फसल से किसान को काफी मुनाफा होता है। धान की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए आखिरी जुताई में किसान लगभग 100 से लेकर150 कुंटल पर हेक्टर गोबर की सड़ी खाद का इस्तेमाल कर खेतों में डालते हैं। खाद डालने के साथ ही साथ लगभग उर्वरक 120 किलोग्राम वही नत्रजन 60 किलोग्राम तथा फास्फोरस 60 किलोग्राम पोटाश तत्वों का इस्तेमाल करते हैं। इन खादो का इस्तेमाल करने से धान की अच्छी फसल का उत्पादन होता है। 

धान की फसल में पहली खाद कब डालें:

कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि सूर्य प्रकाश की कमी हो जाने से फसलें काफी नाजुक और कमजोर हो जाती है।ऐसी स्थिति में आप को समय रहते ही यूरिया खाद का इस्तेमाल करना चाहिए।15 से 20 दिन के अंदर पौधों को सूर्य प्रकाश ना मिले तो यूरिया खाद का इस्तेमाल करें। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार इस तरीके को अपनाने से फसल खराब नहीं होने पाती और धान की फसल की अच्छी पैदावार होती है।

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धान की अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए खाद डालने के इस तरीके को अपनाना आवश्यक होता है। 

धान की रोपाई करने के बाद, खाद कितने दिनों में डाले :

किसानों के अनुसार धान की रोपाई करने के बाद यदि ऐसा लगता है। कि धान की फसल में खाद डालने की आवश्यकता है की नही तभी फसलों में खाद डालें। धान की रोपाई में लगभग 35 दिनों के बाद खाद डालते हैं। परंतु बिना कृषि वैज्ञानिकों की सलाह अनुसार धान की फसल में खाद ना डालें।

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धान की फसल में नमक का इस्तेमाल:

धान खरीफ की सबसे प्रमुख फसल मानी जाती है। अल्पवर्षा के मौसम में लगभग 15 दिनों के लिए फसलों को सुरक्षित रखने के लिए नमक का छिड़काव करना उपयोगी होता है। नमक के छिड़काव से फसल बारिश से पूरी तरह सुरक्षित रहती है। नमक छिड़काव से भूमि में नमी बनी रहती है। इस प्रक्रिया को अपनाने से भूमि की उर्वरक क्षमता में भी कोई कठिनाई या फर्क नहीं पड़ता है। इसीलिए नमक का छिड़काव करना धान की फसल के लिए उपयोगी होता है। 

धान की फसल में कीटनाशक का उपयोग:

कभी-कभी ऐसा होता है, कि धान की फसल में फुदका रोग लगने की संभावना बन जाती है। यह स्थिति फसलों में पानी भर जाने के कारण पनपती है। मान लीजिए अगर फसलों में फुदका रोग लग गया हो तो, फसलों की सुरक्षा करने के लिए कीटनाशक क्लोरोपाइरीफास Chlopyrriphos कि लगभग 1 मिलीलीटर मात्रा को पूरे खेतों में अच्छी तरह से छिड़काव कर दे। 

धान की प्रमुख किस्में:

धान की प्रमुख किस्में कुछ इस प्रकार है: धान की किस्में सिंचित दशा, जो सिंचित क्षेत्रों मे जल्दी पकने वाली किस्में कही जाती है। धान की दूसरी किस्म पूसा जो लगभग 169 दिनों में पक जाती है। धान की कुछ लोकप्रिय किस्म पूसा बासमती 1718, पूसा बासमती 1728, कावेरी 468, पूसा बासमती 1692, पूसा PB1886, पूसा-1509 आदि है। धान की नरेंद्र किस्म जो 80 दिनों का समय लेती है। पंत धान 12 तथा मालवीय धान-3022, उसके बाद नरेन्द्र धान-2065, धीमी पकने वाली पंत धान 10, पंत धान-4, और सरजू-52, नरेन्द्र-359, नरेन्द्र-2064, नरेन्द्र धान-2064, पूसा-44, पीएनआर लगभग प्राप्त की गई जानकारियों के अनुसार 381 प्रमुख किस्में मौजूद है।

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धान की अधिक पैदावार प्राप्त करने के लिए निम्न बातों पर ध्यान दे:

  • कुछ परिस्थितियां में जैसे, क्षेत्रीय जलवायु तथा मिट्टी का चयन, सिंचाई का साधन होना, जलभराव की समस्या, बुवाई कैसे करें, रोपाई की व्यवस्था आदि समस्याओं से बचने के लिए पहले ही प्रबंध बनाएं। धान की रोपाई करते समय हमेशा अच्छी बीज प्रजाति का चयन करें।
  • हमेशा धान की रोपाई करते समय शुद्ध प्रमाणित एवं शोधित बीज ही बोयें। ताकि फसल खेतों में पूरी तरह से उत्पादन हो सके।
  • खेतों में खाद डालते समय अच्छी तरह से मृदा परीक्षण हो जाने के बाद ही संतुलित उर्वरकों को हरी खाद एवं जैविक खाद में मिलाकर खेतों में रोपण करें। खाद की उचित मात्रा तथा समय पर खादो को खेतों में डालना उपयोगी होता है।
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  • सही समय पर बुवाई तथा सिंचाई करना आवश्यक होता है।
  • धान के पौधों की संख्या सुनिश्चित इकाइयों पर को जानी चाहिए।
  • कीट रोग एवं खरपतवार नियंत्रण बनाए रखने के लिए समय-समय पर कृषि विशेषज्ञों के अनुसार रासायनिक खादों का इस्तेमाल करते रहना चाहिए। जिस से पूर्ण रुप से फसलों की सुरक्षा हो सके।
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शुद्ध एवं प्रमाणित बीज का इस्तेमाल:

यदि आप शुद्ध एवं प्रमाणित बीज का इस्तेमाल करते हैं तो धान की उत्पाद क्षमता अधिक हो जाती है। कृषक इन उन्नत बीजों का इस्तेमाल अपने अगले उत्पाद के लिए भी कर सकते हैं। तथा तीसरे प्रमाणित बीज लेकर बुवाई कर सकते हैं। इस प्रकार शुद्ध एवं प्रमाणित बीजों का इस्तेमाल करना उपयोगी होता है।

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दोस्तों हम उम्मीद करते हैं हमारा यह आर्टिकल धान की रोपाई आपको पसंद आया होगा। हमारे इस आर्टिकल में धान की रोपाई से जुड़ी सभी प्रकार की आवश्यक बातें मजबूत हैं। जो आपके काम बहुत काम आ सकती है यदि आप हमारी दी हुई जानकारियों से संतुष्ट हैं। तो हमारे इस आर्टिकल को ज्यादा से ज्यादा सोशल मीडिया तथा अपने दोस्तों के साथ शेयर करें। धन्यवाद।

गौमूत्र से बना ब्रम्हास्त्र और जीवामृत बढ़ा रहा फसल पैदावार

गौमूत्र से बना ब्रम्हास्त्र और जीवामृत बढ़ा रहा फसल पैदावार

छत्तीसगढ़ पहला राज्य जहां गौमूत्र से बन रहा कीटनाशक

इस न्यूज की हेडलाइन पढ़कर लोगों को अटपटा जरूर लगेगा, पर यह खबर किसानों के लिए बड़ी काम की है। जहां गौमूत्र का बड़ा धार्मिक महत्व माना जाता है और गांवों में आज भी लोग इसका सेवन करते हैं, उनका कहना है कि गौमूत्र पीने से कई बीमारियों से बच पाते हैं। वहीं, गौमूत्र अब किसानों के खेतों में कीटनाशक के रूप में, उनकी जमीन की सेहत सुधारकर फसल उत्पादन का बढ़ाने में उनकी काफी मदद करेगा। जैसा कि हम पहले ही बता चुके हैं कि आधुनिकता के युग में खान-पान सही नहीं होने और फसलों में बेतहासा
जहरीले कीटनाशक के प्रयोग से हमारा अन्न जहरीला होता जा रहा है। वैज्ञानिकों ने भी सिद्ध कर दिया है कि जहरीले कीटनाशक के प्रयोग से लोगों के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है और आयु घटती जा रही है। लोगों की इस तकलीफ को किसानों ने भी समझा और अब वे भी धीरे-धीरे जैविक खाद के उपयोग को बढ़ावा दे रहे हैं। इससे वे अपनी आमदनी तो बढ़ा ही रहे हैं, साथ-साथ देश के लोगों और भूमि की सेहत भी सुधार रहे हैं। इसी के तहत लोगों की सेहत का ख्याल रखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने किसान हित में एक बड़ा कदम उठाया है और पशुपालकों से गौमूत्र खरीदने की योजना शुरू की है, जिससे कीटनाशक बनाया जा रहा है। इसका उत्पादन भी सरकार द्वारा शुरू कर दिया गया है।

चार रुपए लीटर में गौमूत्र की खरीदी

पहले राज्य सरकार ने किसानों को जैविक खेती के प्रति प्रोत्साहित किया, जिसके सुखद परिणाम भी सामने आने लगे हैं, इसके बाद पशुपालकों से गौमूत्र खरीदकर उनको एक अतिरिक्त आय भी दे दी। राज्य सरकार पशुपालक किसानों से चार रुपए लीटर में गौमूत्र खरीद रही है। राज्य के लाखों किसान इस योजना का फायदा उठाकर गौमूत्र बेचने भी लगे हैं।


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हरेली पर मुख्यमंत्री ने गौमूत्र खरीद कर की थी शुरूआत

हरेली पर्व पर 28 जुलाई से गोधन न्याय योजना के तहत गोमूत्र की खरीदी शुरू की गई है। मुताबिक छत्तीसगढ़ गौ-मूत्र खरीदी करने वाला देश का पहला राज्य है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री निवास कार्यालय में हरेली (हरियाली अमावस्या) पर्व के अवसर पर गोमूत्र खरीदा और वे पहले ग्राहक बने। वहीं मुख्यमंत्री ने खुद भी गौमूत्र विक्रय किया था।

अन्य राज्य भी अपना रहे

छत्तीसगढ़ देश का पहला राज्य है, जो पशुपालक ग्रामीणों से चार रुपए लीटर में गोमूत्र खरीद रहा है। गोधन न्याय योजना के बहुआयामी परिणामों को देखते हुए देश के अनेक राज्य इसे अपनाने लगे हैं। इस योजना के तहत, अमीर हो या गरीब, सभी को लाभ मिल रहा है।


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गौमूत्र से बने ब्रम्हास्त्र व जीवामृत का किसान करे उपयोग

अब आते हैं गौमूत्र से बने कीटनाशक की बात पर। विदित हो कि किसान अब जैविक खेती को अपना रहे हैं। ऐसे में गौमूत्र से बने ब्रम्हास्त्र व जीवामृत का उपयोग किसान अपने क्षेत्र में करने लगे हैं। राज्य की महत्वकांक्षी सुराजी गांव योजना के अंतर्गत, गोधन न्याय योजना के तहत अकलतरा विकासखण्ड के तिलई गौठान एवं नवागढ़ विकासखण्ड के खोखरा गौठान में गौमूत्र खरीदी कर, गोठान समिति द्वारा जीवामृत (ग्रोथ प्रमोटर) एवं ब्रम्हास्त्र (जैविक कीट नियंत्रक) का उत्पादन किया जा रहा है।


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गौठानों में सैकड़ों लीटर गौमूत्र की खरीदी की जा चुकी है। जिसमें निर्मित जैविक उत्पाद का उपयोग जिले के कृषक कृषि अधिकारियों के मार्गदर्शन में अपने खेतों में कर रहे हैं। इससे कृषि में जहरीले रसायनों के उपयोग के विकल्प के रूप में गौमूत्र के वैज्ञानिक उपयोग को बढ़ावा मिलेगा, रसायनिक खाद तथा रसायनिक कीटनाशक के प्रयोग से होने वाले हानिकारक प्रभाव में कमी आयेगी, पर्यावरण प्रदूषण रोकने में सहायक होगा तथा कृषि में लगने वाली लागत में कमी आएगी।

50 रुपए लीटर ब्रम्हास्त्र और जीवामृत (वृद्धि वर्धक) का मूल्य 40 रुपए लीटर

गौमूत्र से बनाए गए कीट नियंत्रक ब्रम्हास्त्र का विक्रय मूल्य 50 रूपये लीटर तथा जीवामृत (वृद्धि वर्धक) का विक्रय 40 रूपये लीटर है। इस प्रकार गौमूत्र से बने जैविक उत्पादों के दीर्घकालिन लाभ को देखते हुए जिले के कृषक बंधुओं को इसके उपयोग की सलाह कृषि विभाग द्वारा दी जा रही है।
जैविक खाद का करें उपयोग और बढ़ाएं फसल की पैदावार, यहां के किसान ले रहे भरपूर लाभ

जैविक खाद का करें उपयोग और बढ़ाएं फसल की पैदावार, यहां के किसान ले रहे भरपूर लाभ

किसानों ने माना खेत की मिट्टी हो रही मुलायम, बुआई और रोपाई में कम लग रही मेहनत

रायपुर। भारत सहित पूरे विश्व में जब भी खेती-किसानी की बात आती है, तो उसके साथ खाद का उपयोग भी एक बड़ी चुनौती या यूं कहें कि हर साल एक समस्या के रूप में उभरकर सामने आती है। वहीं फसल की बुआई से पहले किसानों को खाद की चिंता सताने लगती है। हर साल खाद की कालाबाजारी के भी मामले देशभर में सामने आते रहते हैं। दूसरी ओर किसान भी यह आरोप लगाते हैं कि उन्हें खाद की उचित मात्रा में आपूर्ति नहीं की जाती, जिस कारण सोसायटियों में हमेशा खाद की किल्लत बनी रहती है। ऐसे में हर साल एक बड़ा रकबा खाद की कमी से कम पैदावार कर पाता है। वहीं अब इस समस्या को दूर करने के लिए कई राज्य जैविक खाद को अपनाने लगे हैं। ऐसे में
छत्तीसगढ़ के किसान जैविक खाद का भरपूर फायदा उठा रहे हैं और फसल की पैदावार बढ़ा कर अपने को और स्वाबलंबी बना रहे हैं। वहीं छत्तीसगढ़ सरकार ने भी माना है कि जैविक खाद का उपयोग करने से खेत की मिट्टी मुलायम हो रही है। इस खरीफ सीजन में खेत की जुताई और धान की रोपाई में किसानों को काफी आसानी हुई है।

छत्तीसगढ़ मेें जैविक खाद लेना अनिवार्य किया

जहां एक ओर कीटनाशक के प्रयोग से फसल जहरीली हो रही है और भूमि की उर्वरा शक्ति भी कमजोर हो रही है, ऐसे में छत्तसीगढ़ सरकार जैविक खाद का उपयोग करने किसानों को प्रोत्साहित कर रही है। सरकार का मानना है जैविक खाद के प्रयोग से जहां जमीन की उर्वरा शक्ति तो बढ़ेगी ही, दूसरी ओर रासायनिक खाद का उपयोग कम होने से इसकी कालाबाजारी कम होगी और हर साल किसानों को होने वाली खाद की किल्लत से किसानों को छुटकारा मिल जाएगा। इसी के तहत छत्तीसगढ़ सरकार ने किसानों को जैविक खाद लेना अनिवार्य कर दिया है।


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जैविक खाद के फायदे

छत्तीसगढ़ के कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि जैविक खाद का उपयोग हर मामले में किसानों के लिए लाभदायक साबित होगा। इससे किसानों को घंटों सोसायटियों में खाद के लाइन लगाने से जहां छुटकारा मिलेगा और जमीन की उर्वरा शक्ति भी बढ़ाने में मदद मिलेगी। वहीं जैविक खाद के उपयोग कें कई फायदे भी हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे मिट्टी की भौतिक व रसायनिक स्थिति में सुधार होता है व उर्वरक क्षमता बढ़ती है। वहीं रासायनिक खाद के उपयोग से मिट्टी में जो सूक्ष्म जीव होते हैं उनकी संख्या दिन प्रतिदिन कम होती जा रही है, जिस कारण हर साल किसानों को फसल का नुकसान होता है। जैविक खाद के उपयोग से उन सूक्ष्म जीवों की गतिविधि में वृद्धि होती है और वे फसल की पैदावार बढ़ाने में काफी अहम भूमिका निभा सकते हैं। वहीें जैविक खाद का उपयोग मिट्टी की संरचना में सुधार करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका अपना सकती है, जिससे पौधे की जड़ों का फैलाव अच्छा होता है। वहीं इसके उपयोग से मृदा अपरदन कम होता है। मिट्टी में तापमान व नमी बनी रहती है।

जैविक खाद के उपयोग से मुलायम हो रही मिट्टी



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वहीं वर्तमान में खरीफ फसल की बुआई के समय छत्तीसगढ़ के किसानों ने भी माना है कि जैविक खाद का उपयोग करने से उनकी जमीन कह मिट्टी मुलायम हुई है। इस कारण इस साल उन्हें जुताई और रोपाई करने में काफी मदद मिली। फसल लगाने में हर बार उन्हें जो महनत करनी पड़ती थी वह इस बार काफी कम हुई, जिससे उनके समय और पैसे दोनों की बचत हुई है।

गौठानों में बनाई जा रही कंपोस्ट खाद

छत्तीसगढ़ में धान की खेती व्यापक रुप से की जाती है। यही कारण है कि इसे धान का कटोरा कहा जाता है। जब खेती व्यापक होगी तो खाद की जरूरत ज्यादा होगी। ऐसे में छत्तीसगढ़ में जैविक खाद की आपूर्ति करने में गौठान एक महत्वपूर्ण भूका निभा रहे हैं।


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छत्तीसगढ़ सरकार ने गांव-गांव में पशुओं का रखने के लिए गौठान बनाने योजना शुरू की थी, जिसके तहत प्रदेश के लाखों पशुओं को एक ठिकाना मिला। वहीं दूसरी गौठानों में अजीविका के कई कार्य भी शुरु किए गए, जिसमें कंपोस्ट खाद निर्माण में इन गौठानों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और किसानों को खाद की किल्लत से राहत पहुंचाई।

ऐसे में बनाई जाती है जैविक खाद

जैविक खाद बनाना काफी आसान है। यही कारण है कि आज किसान जैविक खाद खेत या अपने घर पर ही तैयार कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ में गौठानों में इस खाद को तैयार किया जाता है। इसको बनाने के लिए सरकार ने हर गौठान में एक टैंक बनवाया है। इसमें गोबर डालकर इसमें गोमूत्र मिलाया जाता है। इसके साथ ही इसमें सब्जियों का उपयोग भी कर सकते हैं। कही-कही इसमें गुड़ का उपयोग भी किया जा राह है। इसके बाद इसमें पिसी हुई दालों व लकड़ी का बुरादा डाल दें। आखिर में इस मिश्रण को मिट्टी में साना जाता है।


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यह जरूरी है कि खाद बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पदार्थों की मात्रा सही हो। जैविक खाद बनाने के लिए 10 किलो गोबर,10 लीटर गोमूत्र, एक किलो गुड, एक किलो चोकर एक किलो मिट्टी का मिश्रण तैयार करें। इन पांच तत्वों को अच्छी से मिला लें। मिश्रण में करीब दो लीटर पानी डाल दें। अब इसे 20 से २५ दिन तक ढंक कर रखें। अच्छी खाद पाने के लिए इस घोल को प्रतिदिन एक बार अवश्य मिलाएं। 20 से २५ दिन बाद ये खाद बन कर तैयार हो जाएगी। यह खाद सूक्ष्म जीवाणु से भरपूर रहेगी खेत की मिट्टी की सेहत के लिये अच्छी रहेगी।
खुशखबरी:किसानों को मिलेगी घर बैठे कीटनाशक दवाएं नहीं काटने पड़ेंगे दुकानों के चक्कर

खुशखबरी:किसानों को मिलेगी घर बैठे कीटनाशक दवाएं नहीं काटने पड़ेंगे दुकानों के चक्कर

नवीन नियमानुसार कीटनाशक अब एमाज़ॉन (Amazon.com) व फ्लिपकार्ट (Flipkart.com) जैसी ई-कॉमर्स (E-commerce) कंपनियों के माध्यम से बेचने की स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है। इन कंपनियों द्वारा कानूनी लाइसेंस व नियमों के अनुसार कीटनाशक बेचे जा सकते हैं। दरअसल किसानों को अच्छे कीटनाशक लेने हेतु विभिन्न दुकानों पर समय व ऊर्जा बर्बाद करके जाना होता था। परंतु फिलहाल ऐसे कार्यों के लिए कहीं जाना नहीं पड़ेगा सब कुछ घर बैठे उपलब्ध होगा। आज किसान फ्लिपकार्ट व एमाज़ॉन जैसी ई-कॉमर्स साइट्स के जरिये भी कीटनाशक उपलब्ध कर सकते हैं। केंद्र सरकार द्वारा ऐसे ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म्स को कीटनाशक बेचने हेतु स्वीकृति दे दी है। दरअसल, कीटनाशक को बेचने के आरंभ से पूर्व इन कंपनियों द्वारा कानूनी प्रक्रिया संपन्न करनी बहुत आवश्यक है, कानूनी लाइसेंस के बाद ही किसानों को कीटनाशकों की होम डिलीवरी की जाएगी।


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केवल कानूनी लाइसेंस प्राप्त कंपनियां ही बेच पाएंगी कीटनाशक

देश में ऑनलाइन खरीददारी हेतु जानीमानी कंपनियां फ्लिपकार्ट (Flipkart.com) व एमाज़ॉन (Amazon.com) को कीटनाशक बेचने हेतु कानूनी तौर पर स्वीकृति प्राप्त हो गयी है। नए नियमों के अनुसार, इन कंपनियों द्वारा कीटनाशक बेचने पर प्रतिबंध लगाया है। सरकार से लाइसेंस लेना जरुरी है, जिसके बाद कुछ नियमों को पालन करते हुए ये कंपनियां कीटनाशक बेच सकती हैं, दरअसल, लाइसेंस को सत्यापित करवाने की जिम्मेदारी स्वयं ई-कॉमर्स (E-commerce) कंपनियों की ही है। केंद्र सरकार की इस पहल से किसानों को प्रत्यक्ष रूप से लाभ मिलेगा।


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किसानों को उचित व बेहतरीन कीटनाशक खरीदने हेतु ना ज्यादा पैसा खर्च करने की आवश्यकता है और ना ही दुकानों का बिना बात भ्रमण करने की कोई जरुरत है। शीघ्र ही आगामी दिनों में इन कंपनियों के एप्स डाउनलोड करके आवश्यकतानुसार कीटनाशक का ऑनलाइन ऑर्डर देकर होम डिलीवरी से मंगवा सकेंगे। अनुमान है, कि फ्लिपकार्ट व एमाज़ॉन जैसी वेबसाइटों पर कीटनाशक उचित मूल्य पर मिल सकेंगे, जिससे कीटनाशकों के विपणन को लेकर कंपनियों में भी प्रतिस्पर्धा बढ़ जाएगी। इसकी सहायता से कीटनाशक की उत्पादक कंपनियों को भी नवीन बाजार प्राप्त होगा। हल के दिनों में जलवायु परिवर्तन से फसलों पर काफी दुष्प्रभाव पड़ रहा है। दिनों दिन हो रहे मौसमिक बदलाव से फसलें चौपट होती जा रही हैं, तो वहीं कुछ क्षेत्रों में कीटों के आक्रमण ने भी फसलों को बेहद क्षति पहुँचाई है। विभिन्न क्षेत्रों में तो ये कीट फसल के तने से लेकर जड़ व पत्तियों को नष्ट कर पैदावार को प्रभावित कर रहे हैं। पिछले सीजन में सोयाबीन की फसल का भी यही हाल हुआ था।
किसानों की मदद के लिए खुल गए हैं खास खिदमत केंद्र

किसानों की मदद के लिए खुल गए हैं खास खिदमत केंद्र

समय-समय पर किसानों की मदद के लिए भारत में केंद्र और राज्य सरकार काम करती रही है। प्राकृतिक आपदा से फसलें खराब होना और खाद, बीज आदि की सही परख ना होना जैसे समस्या किसानों के सामने आती रहती है। हाल ही में जम्मू कश्मीर में किसानों के लिए खिदमत केंद्र का निर्माण किया गया है। यहां पर किसानों को सभी तरह की सुविधाएं एक ही जगह पर मिल जाएंगी।


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प्राकृतिक आपदाएं हमेशा ही किसानों के लिए एक समस्या बन कर सामने आई है। इस बार की फसल में भी किसानों को बाढ़, बारिश और सूखे के चलते खरीफ की फसल में काफी नुकसान हुआ है। एक ही सीजन में किसानों की लगभग पूरी फसल बर्बाद हो गई है। इस तरह से किसानों को लाखों का नुकसान हुआ है। ऐसे में किसानों के पास केंद्र या राज्य सरकार से मदद मांगने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचता है। किसानों ने गुहार लगाई और सरकार ने भी किसानों की मदद करने की पहल की है। केंद्र सरकार द्वारा एफपीओ (FPO) बनाए गए हैं, जो किसानों को आर्थिक मदद देने में काम आएंगे। इसके अलावा किसानों की मदद करने के लिए जम्मू और कश्मीर राज्य में भी कवायद शुरू की गई है। यहां पर किसानों के लिए खिदमत केंद्र बनाएं गए हैं।

2000 के करीब खिदमत सेंटर तैयार

जिला अधिकारियों को ये आदेश दिए गए हैं, कि जैसे ही किसान किसी समस्या को लेकर खिदमत केंद्र में आते हैं, तो जल्द से जल्द उसका निवारण किया जाना ज़रूरी है। यहां पर इस बात का खास ध्यान रखा गया है, कि किसानों को अपनी समस्या के हल के लिए ज्यादा समय इंतजार ना करना पड़े। ऐसे २००० सेंटर बन चुके हैं, जो किसानों की मदद कर रहे हैं।

किन समस्याओं का किया जाएगा निवारण

यहां किसानों को लोन संबंधी परेशानी, बीज संबंधी दिक्कत, आपदा में फसली नुकसान और अन्य तरह की दिक्कत होने पर लाभ किसानों को मिलेगा। यहां पर सरकार ने कोशिश की है, कि इन सभी समस्याओं का हल एक ही जगह निकाला जा सके। इसी के मकसद से किसान खिदमत केंद्रो की स्थापना की गई है। साथ ही जैसा कि नाम से जाहिर है, ये किसानों के हित में एक सम्मानजनक तरीका है। केंद्र सरकार की तरफ से भी देश में पीएम किसान समृद्धि केंद्र खोले गए हैं, यहां किसानों को अच्छी किस्म के बीज, खाद, उर्वरक, कीटनाशक, कृषि उपकरण और मिट्टी की जांच की सुविधा दी जा रही है। उत्तर प्रदेश में ऐसे 66 केंद्र कार्यरत हैं।
कीटनाशक दवाएं बेचने वाले विक्रेता सावधान हो जाएं नहीं तो बंद करनी पड़ सकती है दुकान

कीटनाशक दवाएं बेचने वाले विक्रेता सावधान हो जाएं नहीं तो बंद करनी पड़ सकती है दुकान

अगर आप अपने लिए दवाई लेने किसी भी मेडिकल स्टोर पर जाते हैं, तो वहां पर दवाई बेचने के लिए मेडिकल स्टोर के पास लाइसेंस होना बेहद जरूरी है। यह लाइसेंस फार्मेसी की डिग्री या डिप्लोमा के होने पर ही बनाया जा सकता है। अगर कोई भी स्टोर बिना लाइसेंस के दवाइयां बेच रहा है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जा सकती है। लेकिन ऐसा ही प्रावधान कीटनाशक दवाइयों के लिए नहीं है। लेकिन हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार इसके खिलाफ सख्त कदम उठा रही है। सख्ती का पालन न करने वाले कीटनाशक दुकान संचालकों के खिलाफ प्रदेश का एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट कार्यवाही करेगा।

उत्तर प्रदेश में कीटनाशक बेचने के लिए डिग्री, डिप्लोमा होना जरूरी

बहुत समय से उत्तर प्रदेश सरकार के बाद किसानों की शिकायतें आ रही थी, कि कीटनाशक दवाई बेचने वाले लोगों के पास उस दवाई के बारे में किसी भी तरह की जानकारी नहीं होती है। यह विक्रेता किसानों के किसी भी सवाल का जवाब नहीं दे पाते हैं और उन्हें कभी कभी इस तरह की दवाइयां दे दी जाती हैं। जो उनकी फसलों के अनुसार सही नहीं होती हैं। इस तरह से दी गई दवाइयां फसलों को लाभ पहुंचाने की बजाय बहुत ज्यादा नुकसान करवा देती हैं। इसी को लेकर अब प्रदेश सरकार की ओर से निर्देश जारी किए हैं, कि सभी कीटनाशक दुकान संचालकों के पास संबंधित डिग्री या डिप्लोमा होना अत्यंत आवश्यक है।


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31 दिसंबर है डिग्री जमा करवाने की अंतिम तारीख

उत्तर प्रदेश के औरैया एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट ने इस संबंध में जिले के सभी कीटनाशक दवा विक्रेताओं को निर्देश जारी किए हैं। अगर मीडिया रिपोर्ट की मानें तो ऐसा कहा जा रहा है, कि कीटनाशक दवाइयां बेचने के लिए केवल डिग्री या फिर डिप्लोमा धारी लोग ही नियुक्त किए जाएंगे। कोई भी विक्रेता जो कीटनाशक दवाइयां बेच रहा है, वह 31 दिसंबर तक अपनी यह डिग्री या डिप्लोमा जमा करवा सकता है। अगर 31 दिसंबर तक विक्रेता ने अपनी डिग्री या डिप्लोमा जमा नहीं करवायी तो उनके खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाएगी एवं साथ ही दुकान खोलने की अनुमति भी नहीं दी जाएगी।

ये डिग्री, डिप्लोमा है जरूरी

विक्रेताओं के पास किसी भी मान्यता प्राप्त यूनिवर्सिटी या संस्थान से कृषि विभाग, जैव रसायन, जैव प्रौद्योगिकी की स्नातक डिग्री हो। इसके अलावा कृषि बागवानी का 1 वर्षीय डिप्लोमा से भी दवा बेच सकते हैं। विभाग के स्तर से इस संबंध में दवा विक्रेताओं को 12 दिन का ट्रेनिंग दी जा रही है, संचालक ट्रेनिंग में दवाओं के बारे में जानकारी ले सकते हैं। इसके अलावा विक्रेता को दवाइयों के बारे में भी सभी जानकारी होने की जरूरत है। अगर उनके द्वारा किसी भी तरह की गलत दवाई बेची गई तो उनके खिलाफ शिकायत दर्ज की जा सकती है।
किसान परिवारों को बिना हानिकारक उर्वरक के खेती करना सिखाएगी यह सरकार, जाने क्या है प्लान

किसान परिवारों को बिना हानिकारक उर्वरक के खेती करना सिखाएगी यह सरकार, जाने क्या है प्लान

आजकल हर कोई अपनी सेहत को लेकर बेहद जागरूक है और ऐसे में सभी लोग इस तरह की चीजें खाना चाहते हैं। जिसमें केमिकल या फिर किसी भी तरह के रासायनिक उर्वरक का इस्तेमाल ना किया गया हो। इन सब बातों का ही ध्यान रखते हुए हिमाचल प्रदेश में सरकार ने किसानों को केमिकल फ़र्टिलाइज़र (Chemical Fertilizer) और कीटनाशक आदि के बिना खेती करने की सलाह दी है। योजना के तहत प्रदेश सरकार किसानों को बिना कैमिकल उर्वरक और कीटनाशक खेती करना सीखा रही है। हिमाचल प्रदेश सरकार ने प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान योजना शुरू की है। जिसमें राज्य सरकार प्रदेश में कीटनाशक और केमिकल फर्टिलाइजर (Chemical Fertilizer) के प्रयोग को एकदम खत्म करने का बारे में सोच रही है। हाल ही में आई खबर में पता चला है, कि हिमाचल प्रदेश राज्य के कृषि सचिव राकेश कंवर ने इस पूरी योजना की समीक्षा की है। इस समीक्षा के अनुसार साल 2022-23 के लिए निर्धारित लक्ष्य का 83 प्रतिशत से अधिक लक्ष्य पूरा कर लिया गया है। बाकी के बचे हुए लक्ष्य को भी जल्दी ही पूरा करने की संभावना है।
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इस आर्टिकल में हम ये जाने की कोशिश करेंगे कि प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान योजना क्या है। हिमाचल की सरकार इसको ग्राउंड लेवल पर उतारने के लिए क्या काम कर रही है?

क्या है प्राकृतिक खेती खुशहाल योजना?

जैसा कि पहले ही बताया गया है, कि इस योजना का मुख्य उद्देश्य खेतों में केमिकल फर्टिलाइजर (Chemical Fertilizer) और कीटनाशकों के इस्तेमाल को खत्म करना है। इस योजना के तहत हिमाचल प्रदेश के 3226 में से 2934 पंचायतों के 72,193 किसान परिवारों को प्राकृतिक खेती के बारे में पूरी तरह से जानकारी देते हुए उन्हें प्रशिक्षण दिया जाएगा। किसानों को फर्टिलाइजर और कीटनाशक के उपयोग के नुकसान के बारे में पूरी जानकारी अच्छी तरह से दी जाएगी। साथ ही राज्य सरकार के आर्थिक रूप से भी मदद भी उपलब्ध कराएगी।
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राज्य के किसान परिवारों को लाया जाएगा एक साथ

हिमाचल प्रदेश की सरकार इस योजना के तहत लगभग 10 लाख किसान परिवारों को एक साथ लेकर आएगी और उन्हें इस योजना से जोड़ने का प्रयत्न करेगी। राज्य सरकार के अधिकारियों का कहना है, कि सरकार का प्रयास है, कि कोई भी किसान प्रदेश में केमिकल फर्टिलाइजर (Chemical Fertilizer) और कीटनाशक का प्रयोग न करें। केमिकल फर्टिलाइजर (Chemical Fertilizer) इस्तेमाल करने का नुकसान यह होता है, कि जमीन की उर्वरक क्षमता क्षीण होती है। राज्य सरकार योजना के तहत प्रदेश के हर किसान को जोड़ेगी। फिलहाल दस लाख किसानों का इससे जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है।

किसानों को क्या होगा योजना का फायदा

यह योजना पर्यावरण के लिए तो अच्छी है ही साथ ही है किसानों के लिए भी बेहद लाभकारी साबित होने वाली है। यह प्रदेश के किसानों को आत्मनिर्भर बनाने में मदद करेगी और आने वाले समय में उन्हें इस तरह की खेती से अच्छा खासा मुनाफा होने की भी संभावना है।
अब खेतों में कीटनाशक की जरूरत नहीं पड़ेगी, अपनाएं यह आधुनिक तरीका

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खेती-बाड़ी में कीट पतंगों को भगाने के लिए हमेशा से किसानों की तरफ से कीटनाशक या फिर केमिकल युक्त रसायनों का इस्तेमाल किया जाता रहा है। लेकिन आजकल लोग अपनी सेहत को लेकर बेहद जागरूक हो गए हैं और वह खाने-पीने में ऐसी चीजें इस्तेमाल करना चाहते हैं। जिन पर किसी भी तरह के केमिकल का इस्तेमाल ना किया गया हो। ऐसे में किसानों की समस्या थोड़ी बढ़ गई है। क्योंकि अगर वह किसी भी तरह के केमिकल का इस्तेमाल नहीं करते हैं। तो फसल को कीट पतंगों से नुकसान होने का खतरा रहता है। कभी-कभी पूरी की पूरी फसल भी बर्बाद हो जाती हैं। ऐसे में किसानों के सामने एक बहुत बड़ा सवाल है, कि किस तरह से फसल की इन कीटों से रक्षा की जाए। हाल ही में किसानों की समस्या का हल करने के लिए कई तरह के विकल्प दिए गए हैं। इन्हीं विकल्पों में से एक है लाइट ट्रैप जो फसल को बिना नुकसान पहुंचाए सारे कीटों को नष्ट कर देता है। ये कीटनाशकों का एक अच्छा विकल्प है, जिसे किसानों तक पहुंचाने के लिए सरकार कई योजनाएं और जागरूकता कार्यक्रम भी चलाती है। इसी कड़ी में हरियाणा सरकार भी किसानों को लाइट ट्रैप लगवाने के लिए प्रेरित कर रही है। लाइट ट्रैप का इस्तेमाल करने के लिए किसानों के खेत में सोलर LED लाइट लगवाए जाते हैं, जो सूरज की रोशनी से ही चार्ज हो जाते हैं। कृषि विभाग की ओर से किसानों को सोलर LED लाइट ट्रैप की खरीद पर 75 प्रतिशत अनुदान दिया जा रहा है।
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क्या है सोलर LED लाइट ट्रैप

आपको बता दें कि सोलर LED लाइट ट्रैप एक सौर ऊर्जा से चलने वाले उपकरण है। इस उपकरण में सबसे ऊपर सोलर प्लेट लगी होती है, जिसके नीचे लगी बैटरी को दिन के समय चार्ज किया जाता है। इस उपकरण में एक इलैक्ट्रिक रैकिट भी लगा होता है, जिसके ऊपर कई छोटे-छोटे बल्ब भी लगा दिए जाते हैं। ये बल्ब सौर ऊर्जा से चार्ज बैटरी से जलते हैं। इसकी रौशनी में रात के समय कीट आकर्षित होते हैं और इलैक्ट्रिक रैकिट की चपेट में आकर नष्ट हो जाते हैं। इस तरह फसल को भी नुकसान नहीं होता और बिना किसी छिड़काव के कीटों का नियंत्रण भी हो जाता है।
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सरकार की तरफ से मिल रही है सब्सिडी

सरकार की तरफ से सब्सिडी की बात की जाए तो किसानों को सोलर LED लाइट स्ट्रिप लगाने के लिए हरियाणा सरकार लगभग 75% तक की सब्सिडी दे रही है। हर एक एकड़ में एक सोलर पावर एलईडी लाइट ट्रैप लगाया जाता है और कोई भी किसान अधिकतम 10 एकड़ में लाइट ट्रैप लगा सकता है। साथ ही इस योजना के तहत सबसे अच्छी बात है, कि इस स्कीम के तहत लाभ उठाने के लिए आप आवेदन ऑनलाइन पोर्टल 'मेरी फसल मेरा ब्यौरा' पर ही दे सकते हैं। अधिक जानकारी के लिए अपने नजदीकी सीएससी सेंटर में जाकर भी आवेदन करवा सकते हैं।

सब्जी और नकदी फसलों को होता है कीटों से सबसे ज्यादा नुकसान

राज्य सरकार की जिला बागवानी अधिकारी डॉ. नेहा यादव से हुई बातचीत में उन्होंने बताया कि जैसे ही मौसम बदलने लगता है, तो सब्जियों और दूसरी नकदी फसलों को कीट पतंगों से होने वाला नुकसान बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। ऐसे में इन कीट पतंगों की रोकथाम ना की जाए तो यह पूरी की पूरी फसल को भी बर्बाद कर सकते हैं। ऐसे में किसान इन को मारने के लिए या फिर भगाने के लिए केमिकल युक्त हानिकारक रसायनों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन इनसे सबसे बड़ी समस्या जो सामने आती है, वह है कि इनका कुछ ना कुछ अंश सब्जियों या फलों पर रह जाता है। जो आगे चलकर इसको इस्तेमाल करने वाले लोगों की सेहत पर गलत असर करता है। साथ ही, बिना जानकारी के इस्तेमाल किए जाने पर यह रासायनिक कीटनाशक फसल को भी बर्बाद कर देते हैं। इन सभी कारणों के चलते ही हरियाणा सरकार कीटों के प्रकोप को रोकने के लिए सोलर एलइडी लाइट ट्रैप का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने की सलाह किसानों को दे रही है। अलग-अलग योजनाएं बनाकर उन्हें इसके इस्तेमाल के लिए प्रेरित किया जा रहा है।