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गेंदा

बागवानी: मौसमी आधार पर फूलों की खेती से जुड़ी अहम जानकारी

बागवानी: मौसमी आधार पर फूलों की खेती से जुड़ी अहम जानकारी

आजकल भाग-दौड़ भरी जिंदगी में लोग अपने बाग बगीचों में अलग अलग तरह के फूलों को उगाकर मानसिक सुकून हांसिल कर सकते हैं। आज हम आपको मौसमिक आधार पर कुछ विशेष फूलों की जानकारी प्रदान करेंगे। 

आप इन पौधों को गमलों, बरामदों, टोकरियों और खिड़कियों में बड़ी ही आसानी से उगा सकते हैं। सालाना या मौसमी फूल वाले पौधे उन्हें कहा जाता है, जो अपना जीवन चक्र एक वर्षा या एक मौसम में पूर्ण कर लेते हैं ।

फूलों के पौध तैयार करने की विधि

मौसमी फूलों के पौधे अलग अलग तरह से तैयार किये जाते हैं। दरअसल, कुछ फूलों के पौधों को पहले पौधशाला में तैयार करने के पश्चात क्यारियों में लगायें। 

इसके उपरांत विभिन्न प्रकार की प्रजातियों के बीज सीधे क्यारियों में लगा दिये जाते हैं। इनके बीज काफी छोटे होते हैं। इनकी सही तरीके से बेहतर देखभाल करके पौध को तैयार कर लिया जाता है।

मृदा चयन एवं तैयारी 

किसान भाई इस तरह की जमीन का चुनाव करें, जिसमें पर्याप्त मात्रा में जीवांश हों, सिंचाई और जल निकासी की अच्छी सुविधाएं उपलब्ध हों। फूलों की खेती के लिये रेतीली दोमट मृदा सबसे उपयुक्त मानी जाती है। 

जमीन को तकरीबन 30 सेमी की गहराई तक खोदें, गोबर की खाद, उर्वरक, आकार के अनुरूप मिश्रित करें। (1000 वर्ग मीटर क्षेत्र में 25-30 क्विंटल गोबर की खाद) वर्षा ऋतु में पौधशाला की देखभाल अन्य मौसमों की अपेक्षा में ज्यादा करें।

बीज की बुवाई और रोपाई

क्यारियों को आकार के मुताबिक एकसार करके 5 सेमी के फासले पर गहरी पंक्तियाँ निर्मित करके उनमें 1 सेमी की दूरी पर बीज रोपण करें। 

बीज बुवाई के दौरान इस बात का विशेष ख्याल रखें कि बीज एक सेमी से ज्यादा गहरा ना हो पाए। इसके बाद में इसको हल्की परत से ढकें। सुबह शाम हजारे से पानी दें। जब पौध तकरीबन 15 सेमी ऊँची हो जाए तब रोपाई करें।

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क्यारियों में रोपाई एक निश्चित दूरी पर ही करें। सबसे आगे बौने पौधे 30 सेमी तक ऊँचाई वाले 15-30 सेमी दूरी पर, मध्यम ऊँचाई 30 से 75 सेमी वाले पौधे, 35 सेमी से 45 सेमी तथा लंबे 75 सेमी से ज्यादा ऊँचाई रखने वाले पौधे 45 सेमी से 50 सेमी के फासले पर रोपाई करें।

फूलों की देखरेख से जुड़े बिंदु 

सिंचाई: वर्षा ऋतु में सिंचाई की अधिक जरूरत नहीं पड़ती है। अगर काफी वक्त तक वर्षा ना हो तो उस स्थिति में जरूरत के अनुरूप सिंचाई करें। शरद ऋतु में 7-10 दिन एवं ग्रीष्म ऋतु में 4-5 दिन के समयांतराल पर सिंचाई करें।

खरपतवार नियंत्रण: खरपतवार जमीन से नमी और पोषक तत्व ग्रहण करते रहते हैं, जिसके चलते पौधों के विकास तथा बढ़ोतरी दोनों पर प्रतिकूल असर पड़ता है। अर्थात उनकी रोकथाम के लिए खुरपी की मदद से घास-फूस निकालते रहें।

खाद एवं उर्वरक: पोषक तत्वों की उचित मात्रा, भूमि, जलवायु और पौधों की प्रजाति पर निर्भर करता है। आम तौर पर यूरिया- 100 किलोग्राम, सिंगल सुपरफॉस्फेट 200 किलो ग्राम एवं म्यूरेट ऑफ पोटाश 75 किलोग्राम का मिश्रण बनाकर 10 किलोग्राम प्रति 1000 वर्ग मीटर की दर से जमीन में मिला दें। उर्वरक देने के दौरान ख्याल रखें कि जमीन में पर्याप्त नमी हो।

तरल खाद: मौसमी फूलों की सही और बेहतर बढ़वार फूलों के बेहतरीन उत्पादन के लिये तरल खाद अत्यंत उपयोगी मानी गयी है। गोबर की खाद और पानी का मिश्रण उसमें थोड़ी मात्रा में नाइट्रोजन वाला उर्वरक मिलाकर देने से फायदा होता है ।

जलवायु एवं मौसमिक आधार पर फूलों का विभाजन 

वर्षा कालीन मौसमी फूल

इन पौधों के बीजों की अप्रैल-मई में पौधशाला में बोवाई करें और जून-जुलाई में इसकी पौध को क्यारियों या गमलों में लगायें। मुख्य रूप से डहेलिया, वॉलसम, जीनिया, वरबीना आदि के पौध रोपित करें ।

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शरद कालीन मौसमी फूल 

  1. इन पौधों के बीजों को अगस्त-सितम्बर माह में पौधशाला में बोयें एवं अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में गमलों या क्यारियों के अंतर्गत रोपाई करें। इन पर फूल लगना करीब फरवरी-मार्च में शुरू होते हैं। प्रमुख रूप से स्वीट सुल्तान, वार्षिक गुलदाउदी, क्लार्किया, कारनेशन, लूपिन, स्टाक, पिटुनिया, फ्लॉक्स, वरवीना, पैंजी, एस्टर और कार्नफ्लावर आदि के पौधे लगायें ।

ग्रीष्म कालीन मौसमी फूल 

इन पौधों के बीज जनवरी में बोयें तथा फरवरी में लगायें इन पर अप्रैल से जून तक फूल रहते हैं। मुख्य रूप से जीनिया, कोचिया, ग्रोमफ्रीना, एस्टर, गैलार्डिया, वार्षिक गुलदाउदी लगायें।

बीज इकठ्ठा करना 

बीज के लिए फल चुनते समय फूल का आकार, फूल का रंग, फूल की सेहत अच्छी ही चुननी चाहिये। जब फूल पक कर मुरझा जायें तब उसे सावधानी से काट कर धूप में सुखा लें फिर सावधानी से मलकर उनके बीज निकाल लें और फिर उन्हें शीशे के बर्तन या पॉलीथिन की थैली में बंद कर लें।

मौसमी फूलों के प्रमुख पौधे इस प्रकार हैं 

बाड़ के लिये पौधे: गुलदाउदी, गेंदा।

गमले में लगाने हेतु: गेंदा, कार्नेशन, वरवीना, जीनिया, पैंजी आदि ।

पट्टी, सड़क या रास्ते पर लगाने हेतु: पिटुनिया, डहेलिया, केंडी टफ्ट आदि ।

सुगंध के लिये पौधे: स्वीट पी, स्वीट सुल्तान, पिटुनिया, स्टॉक, वरबीना, बॉल फ्लॉक्स ।

क्यारियों में लगाने हेतु: एस्टर, वरवीना, फ्लॉस्क, सालविया, पैंजी, स्वीट विलयम, जीनिया।

शैल उद्यानों में लगाने हेतु: अजरेटम, लाइनेरिया, वरबीना, डाइमार्फोतिका, स्वीट एलाइसम आदि ।

लटकाने वाली टोकरियों में लगाने हेतु: स्वीट, लाइसम, वरवीना, पिटुनिया, नस्टरशियम, पोर्तुलाका, टोरोन्सिया। 

गेंदा है औषधीय गुणों से भरपूर जाने सम्पूर्ण जानकारी

गेंदा है औषधीय गुणों से भरपूर जाने सम्पूर्ण जानकारी

गेंदे का फूल सुगंध के साथ साथ बहुत सी बीमारियों में भी फायदेमंद होता है। आज के इस आर्टिकल में हम बात करेंगे गेंदे के औषिधीय गुणों के बारे में। 

गेंदा बहुत सी बीमारियों में सहायक होता है इसीलिए इसका उपयोग आयुर्वेद में भी किया जाता है। गेंदे के फूल में मिनरल्स, विटामिन बी, विटामिन ए और एंटीऑक्सीडेंट भी पाए जाते है जो बहुत सी बीमारियों से लड़ने में सहायक होते है। 

भारत जैसे राज्य में गेंदे के फूल का बहुत बड़ा महत्व है इसका उपयोग धार्मिक कार्यों के अलावा शादी वगेरा में भी बड़े स्तर पर किये जाते है। आपको जानकार हैरानी होगी गेंदे का फूल बहुत से बीमारियों से लड़ने में भी सहायक है।  

इसके बहुत से औषधीय गुण है जो शरीर के अंदर बहुत सी बीमारियों से लड़ने में सहायक होता है। इसके अलावा गेंदे के फूल का उपयोग मुर्गियों के भोजन के लिए भी किया जाता है, इससे मुर्गी के अंडे की गुणवत्ता में वृद्धि होती है और अंडा आकर्षक भी बनता है। 

गेंदा के फूल से मिलने वाले औषिधीय  गुण 

गेंदा के फूल से मिलने वाले औषधीय गुण बहुत है, जो शरीर के अंदर बहुत सी बीमारियों से लड़ने में सहायक होते है आइये बात करते है गेंदे के फूल से मिलने वाले औषधीय गुणों के बारे में। 

  1. गेंदे की हरी पत्तियों को तोड़कर यदि उसका रस कान में डाला जाए तो कान के दर्द में राहत मिलती है। गेंदे का रस कान में होने वाले दर्द के लिए काफी उपयोगी है। 
  2. गेंदे की पत्तियां रोगाणु रोधी का भी काम करती है। यदि गेंदे की पत्तियों का रस निचोड़ कर खुजली, दिनाय या फोड़ा पर लगाए जाए तो इससे ठीक हो जाता है। 
  3. अपरस की बीमारी( यानी शरीर पर लाल चिकत्ते पड जाना ) में यह रस काफी लाभदायक होता है। 
  4. अंदरूनी चोट या मोच आने पर भी गेंदे की पत्तियों का रस निकाल कर मालिस करने पर यह काफी असरदार होता है। 
  5. यदि गेंदे की पत्तियों का रस निकालकर कटी हुए जगहों या फिर जिस जगह से रक्त बह रहा हो वहा पर लगाने से रक्त को रोका जा सकता है। 
  6. गेंदे के फूल से आरक को निकाल कर पीने से खून साफ़ होता है। 
  7. खूनी बबासीर के लिए इसे काफी उपयोगी माना जाता है। ताजे फूलों का रस निकाल कर पीने से खूनी बबासीर में आराम मिलता है। 

गेंदा की खेती के लिए कैसी भूमि होनी चाहिए ?

गेंदा की खेती के लिए उचित जल निकास वाली भूमि बेहतर मानी जाती है। गेंदे की खेती के लिए मटियार, दोमट और बलुआर मिट्टी को उचित माना जाता है। 

गेंदा की खेती के लिए भूमि की तैयारी 

भूमि की कम से कम 3 से 4 बार जुताई करें, जुताई करने के बाद खेत में पाटा लगाए और भूमि को समतल बना ले। मिट्टी भुरभुरी होने पर खेत में क्यारियां बना दे। 

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गेंदा की व्यावसायिक किस्में कौन सी है ?

  1. अफ्रीकन गेंदा: गेंदे की इस किस्म के पौधे शाखाओ से 1 मीटर तक ऊँचे रहते है। इस किस्म के फूल गोलाकार, पीले और नारंगी रंग में बहुगुणी पंखुड़ियों वाले होते है। इस किस्म में कुछ पौधों की ऊंचाई 20 सेंटीमीटर भी होती है। इसके अलावा इस किस्म के बड़े फूलों का व्यास 7 से 8 सेंटीमीटर होता है। व्यवसाय के दृष्टिकोण से उगाये जाने वाले गेंदे के फूल प्रभेद-पूसा ऑरेंज, अफ़्रीकी येलो और पूसा वसंतु है। 
  2. फ्रांसीसी गेंदा: इस किस्म के पौधों की ऊंचाई 25 से 30 सेंटीमीटर तक होती है। गेंदे की इस किस्म में बहुत फूल आते है, पूरा पौधा फूलों से ढका हुआ होता है। इस प्रजाति की कुछ उन्नत किस्में है: कपिड येलो, बटन स्कोच, बोलेरो और  रेड ब्रोकेट। 

खाद और उर्वरक का उपयोग 

गेंदे के खेत में जुताई से पहले 200 क्विंटल खाद डाले। खाद डालने के बाद खेत की अच्छे से जुताई करें ताकि खाद अच्छे से मिट्टी में मिल जाए। 

उसके बाद खेत में  120 किलो नत्रजन, 80 किलो फॉस्फोरस, 70 किलो पोटाश खेत में प्रति एकड़ के हिसाब से डालें। इसके बाद आखिरी बार जुताई करते वक्त फॉस्फोरस और पोटाश की मात्रा को खेत में डाल दे।  इसके बाद नत्रजन की आधी मात्रा को पौधों की रुपाई के बाद 30 या 40 दिन के अंदर उपयोग करें। 

गेंदा के फूल की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

गेंदा के फूल की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

खेती-किसानी का जब जिक्र आता है। हमें गांव में बसने वाला उस असली किसान का चेहरा सामने नजर आता है। जो ओस-पाला, सर्दी, प्रचण्ड धूप, अखण्ड बरसात की परवाह किये बिना 24 घंटे सातों दिन अपने खून-पसीने से अपने खेतों को सींच कर अपनी फसल तैयार करता है। 

उसकी इस त्याग तपस्या का क्या फल मिलता है? शायद ही कोई जानता होगा। किसान का दर्द केवल किसान ही जान सकता है। इस हाड़ तोड़ मेहनत के बदले में किसान को केवल दो जून की रोटी ही नसीब हो पाती है। 

इसके अलावा किसान को किसी तरह के काम-काज की जरूरत होती है तो उसे कर्ज ही लेना पड़ता है। एक बार कर्ज  के जाल में फंसने वाला किसान पीढ़ियों तक इससे बाहर नहीं निकल पाता है।

किसान की भूमिका

  • देश की अर्थव्यवस्था में किसान बहुत बड़ी भूमिका होती है। वह भी भारत जैसे कृषि प्रधान देश में तो किसान अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। रीढ़ पूरे शरीर का भार उठाती है, उसे मजबूत करना चाहिये। क्या भारत में इस रीढ़ (किसान की) की पर्याप्त देखभाल हो रही है, शायद नहीं।
  • इसका ताजा उदाहरण हम कोविड-19 यानी कोरोना महामारी का ले सकते हैं। इस महामारी में जब सारे लोग अपनी जान बचाकर अपने-अपने घरों में छिप गये लेकिन किसान के जीवन में और कड़े दिन आ गये।
  • कोरोना की परवाह किये बिना अपने खेतों में दोगुनी मेहनत करनी पड़ी ताकि देश के लोगों की जान बचाई जा सके। लेकिन इस दुखियारे किसान की किसी ने भी सुधि नहीं ली।
  • कोरोना योद्धाओं में डॉक्टरों, नर्स, पैरामेडिकल स्टाफ, पुलिस कर्मी, सुरक्षा बल के कर्मचारियों, सफाई कर्मियों, मीडिया कर्मियों एवं समाजसेवियों का नाम लिया जाता है और उन्हें कोराना योद्धा की उपाधि देकर उनका गुणगान किया जाता है लेकिन जब सारे कल-कारखाने बंद हो गये थे तब जिस किसान ने देश की अर्थव्यवस्था को संभाले रखा, उस किसान को किसी ने एक बार भी कोरोना योद्धा, अन्नदाता या ग्राम देवता तक कह कर नहीं पुकारा।
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किसानों की दशा खुद किसान को ही सुधारनी होगी। इसके लिए अपने पैरों को और मजबूत करना होगा। इस काम के लिए किसान को देश की अर्थव्यवस्था के साथ ही अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करना होगा। 

इसके लिए किसान को परम्परागत खेती की जगह आधुनिक व उन्नत खेती तथा आर्थिक स्थिति मजबूत करने में सहायक लीक से हटकर वे फसले लेनी होंगी जो कम समय और कम लागत में अधिक से अधिक आमदनी दे सकतीं हों। 

इस तरह की फसलों में गेंदा के फूल की खेती भी उनमें से एक है। तो आइये जानते हैं गेंदा के फूल की खेती की सम्पूर्ण जानकारी।

गेंदा का फूल का महत्व

फूल की खेती

भारतीय समाज में गेंदा के फूल का बहुत अधिक महत्व है। भारतीय समाज में होने वाले प्रत्येक सामाजिक व धार्मिक कार्यों में गेंदे के फूल की बहुत अधिक मांग होती है। 

प्रत्येक साल में दो बार नवरात्र, दीवाली, दशहरा, बसंत पंचमी, होली, गणेश चतुर्थी, शिवरात्रि सहित अनेक छोटे-मोटे धार्मिक आयोजन होते ही रहते हैं। 

इसके अलावा प्रत्येक भारतीय घर में और व्यावासायिक संस्थानों में प्रतिदिन पूजा-अर्चना होती है जिसमें गेंदा के ताजे फूलों का इस्तेमाल किया जाता है। 

इसके अलावा सामाजिक कार्यों जन्म दिन की पार्टी हो, शादी, व्याह हो, मुंडन व यज्ञोपवीत कार्यक्रम हो, शादी की सालगिरह हो, व्यवसायिक संस्थानों के स्थापना दिवस हो, नये संस्थान का उदघाटन हो, कोई प्रतियोगिता हो । 

इन सभी कार्यक्रमों मुख्य द्वार, मंडप, स्टेज आदि की साज-सजावट के साथ माल्यार्पण, पुष्पहार व पुष्पार्पण आदि में गेंदे के फूल का इस्तेमाल बहुतायत में किया जाता है।

किस्में और पैदावार के स्थान

गेंदे के फूल के आकार और रंग के आधार पर मुख्य दो किस्में होतीं हैं। एक अफ्रीकी गेंदा होता है और दूसरा फ्रेंच गेंदा होता है। फ्रेंच गेंदे की किस्म का पौधा अफ्रीकी गेंदे के आकार से छोटा होता है। इसके अलावा भारत में पैदा होने वाली गेंदे की किस्में इस प्रकार हैं:- 

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  1. पूसा बसंती गेंदा
  2. फ्रेंच मैरीगोल्ड
  3. अफ्रीकन मैरीगोल्ड
  4. पूसा नारंगी गेंदा
  5. अलास्का
  6. एप्रिकॉट
  7. बरपीस मिराक्ल
  8. बरपीस हनाइट
  9. क्रेकर जैक
  10. क्राउन आफ गोल्ड
  11. कूपिड़
  12. डबलून
  13. गोल्डन ऐज
  14. गोल्डन क्लाइमेक्स
  15. गोल्डन जुबली
  16. गोल्डन मेमोयमम
  17. गोल्डन येलो
  18. ओरेंज जुबली
  19. येलो क्लाइमेक्स
  20. रिवर साइड
इन प्रमुख किस्मों के अलावा अन्य कई किस्में भी हैं, जिनकी खेती जलवायु और मिट्टी के अनुसार अलग-अलग स्थानों पर की जाती है। 

अफ्रीकन गेंदे की हाइब्रिड किस्में: शोबोट, इन्का येलो, इन्का गोल्ड, इन्का ओरेंज, अपोलो, फर्स्ट लेडी, गोल्ड लेडी, ग्रे लेडी, आदि फ्रेन्च गेंदे की हाइब्रिड किस्में: (डबल) बोलेरो, जिप्सी डवार्फ डबल, लेमन ड्राप, बरसीप गोल्ड, बोनिटा, बरसीप रेड एण्ड गोल्ड, हारमनी, रेड वोकेड आदि। (सिंगल) टेट्रा रफल्ड रेड, सन्नी,नॉटी मेरियटा आदि।

गेंदे की खेती के लिए मिट्टी व जलवायु

फूल की खेती

वैसे तो गेंदा विभिन्न प्रकार की मिट्टी में पैदा किया जा सकता है लेकिन इसके लिए बलुई दोमट मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है।जल जमाव वाली मिट्टी इसके लिए अच्छी नहीं होती है। 

तेजाबी व खारी मिट्टी भी इसके लिये अनुकूल नहीं होती है। गेंदे की खेती के लिए शीतोष्ण और सम शीतोष्ण जलवायु सबसे अच्छी होती है। इसके अलावा भारत की प्रत्येक जलवायु में गेंदे की खेती होती है। पाला गेंदे का दुश्मन है। इससे बचाना जरूरी होता है।

खेती की अवधि

गेंदे की खेती बहुत कम समय में होती है। तीन से चार माह में इसकी पूरी खेती होती है। साल भर में गेंदे की खेती तीन बार की जा सकती है। 

गेंदे की खेती के लिए 15 से 30 डिग्री तापमान सबसे उपयुक्त होता है। 35 डिग्री से अधिक तापमान गेंदे की खेती के लिए नुकसानदायक होता है।

खेत की तैयारी

मिट्टी की जुताई अच्छी तरीके से की जानी चाहिये। जब तक खेत की मिट्टी भुरभुरी न हो जाये तब तक उसकी जुताई की जानी चाहिये। आखिरी जुताई के समय रूड़ी की खास व गोबर की खाद को मिलाया जाना चाहिये।

बिजाई का समय

गेंदे की फसल साल में तीन बार ली जाती है। प्रत्येक फसल के लिए बीज बुवाई और पौधरोपाई का अलग-अलग समय निर्धारित होता है।  साल में गर्मी की फसल के लिए जनवरी-फरवरी के बीच बीज बुवाई का समय होता है। 

इसके जब पौध तैयार हो जाती है जिसे फरवरी-मार्च में पौधे की रोपाई की जाती है। इसके बाद वर्षा ऋतु की फसल के लिए मध्य जून में बीजों की बुवाई की जाती है। इससे तैयार पौधों की रोपाई जुलाई मध्य में की जाती है। 

इस तरह से सर्दी की फसल के लिए सितम्बर में बीज की बुवाई होती है और मध्य अक्टूबर में पौधों की रोपाई होती है।

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पौधों की रोपाई की मुख्य बातें

अच्छी तरह से तैयार क्यारियों के अच्छे पौधों को छांट कर पोपाई करनी चाहिये। पौधों की रोपाई शाम के समय ही की जानी चाहिये। पौधों की जड़ों को अच्छी तरह से मिट्टी से ढक दिया जाना चाहिये। साथ ही पानी का छिड़काव करना चाहिये।   फूल की खेती

पौधों से पौधों की दूरी

अफ्रीकन नस्ल के पौधे काफी घने और बड़े होते हैं। इसलिये इनकी पौधे से पौधे की दूरी 15 गुणा 10 इंच की रखी जानी चाहिये।फ्रेंच पौधों की दूरी कम भी रखी जा सकती है। इस किस्म के पौधों की पौधों से दूरी 8 गुणा 8 या 8 गुणा 6 इंच रखी जानी चाहिये।

सिंचाई

गेंदे की फसल 55 से 60 दिन में तैयार हो जाती है और यह फसल एक महीने तक लगातार देती रहती है। कुल मिलाकर तीन महीने में यह फसल पूर्ण हो जाती है। इसके लिए गर्मियों में सप्ताह में दो बार और सर्दियों में 10 दिन में सिंचाई की जानी चाहिये।

पौधों की कटाई छंटाई

गेंदे के पौधों की बढ़वार रोकने के लिए जब पौधा बाढ़ पा आये तो उसकी पिचिंग यानी ऊपर से छंटाई कर देनी चाहिये। ताकि पौधा घना तैयार हो उससे फूल अधिक आयेंगे।

उर्वरक प्रबंधन व खरपतवार नियंत्रण

गेंदे की खेती के लिए एक हेक्टेयर में 15 से 20 टन गोबर की खाद, 600 किलोग्राम यूरिया, 1000 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट और 200 किलोग्राम पोटाश की डाली जानी चाहिये। 

खाद का प्रयोग खेत को तैयार करते समय किया जाना चाहिये। उस समय गोबर की खाद, फास्फेट और पोटाश तो पूरे का पूरा मिलाना चाहिये लेकिन यूरिया का एक तिहाई हिस्सा मिलाना चाहिये। 

आखिरी जुताई से पहले ही यह पूरी खाद मिट्टी में मिलाना चाहिये। बची हुई यूरिया का पानी देने के समय इस्तेमाल किया जाना चाहिये। 

खरपतवार नियंत्रण के लिए मजदूरों से कम से कम दो बार निराई करानी चाहिये। उसके अलावा एनिबेन, प्रोपेक्लोर और डिफेनमिड का इस्तेमाल किया जाना लाभप्रद होता है।

बीमारियां व कीट नियंत्रण

गेंदे के पौधे को रेड स्पाइटर माइट नाम का कीड़ा बहुत अधिक नुकसान पहुंचाता है। इसके नियंत्रण के लिए मैलाथियान या मेटासिस्टॉक्स का पानी में घोल कर छिड़काव करें। 

चेपा कीड़ा भी खुद तो नुकसान पहुंचाता ही है और साथ में रोग भी फैलाता है। इसके नियंत्रण के लिए डाईमैथेएट (रोगोर) या मैटासिस्टॉक्स का छिड़काव करें। एक बार में कीट नियंत्रण में न आयें तो दस दिन बाद दोबारा छिड़काव करायें। 

आर्द्र गलन नामक गेंदे के पौधों में बीमारी लगती है। इसकी रोकथाम के लिए कैप्टान या बाविस्टिन के घोल का छिड़काव करें। धब्बा व झुलसा रोग से बढ़वार रुक जाती है। 

इसके नियंत्रण के लिए डायथेन एम के घोल का छिड़काव प्रत्येक पखवाड़े में करें। पाउडरी मिल्डयू नामक बीमारी से पौध मरने लगता है। इसकी रोकथाम घुलने वाली सल्फैक्स का या कैराथेन 40 ईसी का छिड़काव करायें।

फूलों की तुड़ाई व पैकिंग आदि

फूलों की तुड़ाई ठण्डे मौसम में यानी सुबह अथवा शाम को सिंचाई के बाद तोड़ें। इनकी पैकिंग करके मार्केट में भेजें । अफ्रीकन गेंदे से प्रति हेक्टेयर 20-22 टन तथा फ्रेंच पौधे से 10 से 12 टन फूल मिलता है।

फूलों की खेती से कमा सकते हैं लाखों में

फूलों की खेती से कमा सकते हैं लाखों में

भारत में फूलों की खेती एक लंबे समय से होती आ रही है, लेकिन आर्थिक रूप से लाभदायक एक व्यवसाय के रूप में फूलों का उत्पादन पिछले कुछ सालों से ही शुरू हुआ है. 

समकालिक फूल जैसे गुलाब, कमल ग्लैडियोलस, रजनीगंधा, कार्नेशन आदि के बढ़ते उत्पादन के कारण गुलदस्ते और उपहारों के स्वरूप देने में इनका उपयोग काफ़ी बढ़ गया है. 

फूलों को सजावट और औषधि के लिए उपयोग में लाया जाता है. घरों और कार्यालयों को सजाने में भी इनका उपयोग होता है. 

मध्यम वर्ग के जीवनस्तर में सुधार और आर्थिक संपन्नता के कारण बाज़ार के विकास में फूलों का महत्त्वपूर्ण योगदान है. लाभ के लिए फूल व्यवसाय उत्तम है. 

किसान यदि एक हेक्टेयर गेंदे का फूल लगाते हैं तो वे वार्षिक आमदनी 1 से 2 लाख तक प्राप्त कर सकते हैं. इतने ही क्षेत्र में गुलाब की खेती करते हैं तो दोगुनी तथा गुलदाउदी की फसल से 7 लाख रुपए आसानी से कमा सकते हैं. भारत में गेंदा, गुलाब, गुलदाउदी आदि फूलों के उत्पादन के लिए जलवायु अनुकूल है.

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जहाँ इत्र, अगरबत्ती, गुलाल, तेल बनाने के लिए सुगंध के लिए फूलों का इस्तेमाल किया जाता है, वहीं कई फूल ऐसे हैं जिन का औषधि उपयोग भी किया जाता है. कुल मिलाकर देखें तो अगर किसान फूलों की खेती करते हैं तो वे कभी घाटे में नहीं रहते.

भारत में फूलों की खेती

भारत में फूलों की खेती की ओर किसान अग्रसर हो रहे हैं, लेकिन फूलों की खेती करने के पहले कुछ बातें ऐसे हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी हो जाता है. 

यह ध्यान देना आवश्यक है की सुगंधित फूल किस तरह की जलवायु में ज्यादा पैदावार दे सकता है. फिलवक्त भारत में गुलाब, गेंदा, जरबेरा, रजनीगंधा, चमेली, ग्लेडियोलस, गुलदाउदी और एस्टर बेली जैसे फूलों की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. ध्यान रखने वाली बात यह है कि फूलों की खेती के दौरान सिंचाई की व्यवस्था दुरुस्त होनी चाहिए.

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बुआई के समय दें किन बातों पर दें ध्यान

फूलों की बुवाई के दौरान कुछ बातों पर ध्यान देना आवश्यक होता है. सबसे पहले की खेतों में खरपतवार ना हो पाए. ऐसा होने से फूलों के खेती पर बुरा असर पड़ता है. 

खेत तैयार करते समय पूरी तरह खर-पतवार को हटा दें. समय-समय पर फूल की खेती की सिंचाई की व्यवस्था जरूरी होती है. वहीं खेतों में जल निकासी की व्यवस्था भी सही होनी चाहिए. 

ताकि अगर फूलों में पानी ज्यादा हो जाये तो खेत से पानी को निकला जा सके. ज्यादा पानी से भी पौधों के ख़राब होने का दर होता है.

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फूलो की बिक्री के लिये बाज़ार

फूलों को लेकर किसान को बाजार खोजने की मेहनत नहीं करनी पड़ती है, क्योंकि फूलों की आवश्यकता सबसे ज्यादा मंदिरों में होती है. इसके कारण फूल खेतों से ही हाथों हाथ बिक जाते हैं. 

इसके अलावा इत्र, अगरबत्ती, गुलाल और दवा बनाने वाली कंपनियां भी फूलों के खरीदार होती है. फूल व्यवसाई भी खेतों से ही फूल खरीद लेते हैं, और बड़े बड़े शहरों में भेजते हैं.

फूल की खेती में खर्च

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार फूलों की खेती में ज्यादा खर्च भी नहीं आता है. एक हेक्टेयर में अगर फूल की खेती की जाए तो आमतौर पर 20000 रूपया से 25000 रूपया का खर्च आता है, 

जिसमें बीज की खरीदारी, बुवाई का खर्च, उर्वरक का मूल्य, खेत की जुताई और सिंचाई वगैरह का खर्च भी शामिल है, फूलों की कटाई के बाद इसे बड़ी आसानी से बाजार में बेचकर शुद्ध लाभ के रूप में लाखों का मुनाफा लिया जा सकता है

धान की खड़ी फसलों में न करें दवा का छिड़काव, ऊपरी पत्तियां पीली हो तो करें जिंक सल्फेट का स्प्रे

धान की खड़ी फसलों में न करें दवा का छिड़काव, ऊपरी पत्तियां पीली हो तो करें जिंक सल्फेट का स्प्रे

वर्तमान में खरीफ फसल की बुआई हो चुकी है और फसल लहलाने भी लगी है। ऐसे में किसान अब फसल को सहेजने में लगे हुए हैं। किसान उन्हें कीट और अन्य बीमारियों से बचाने के लिये कई जतन कर रहे हैं। ऐसे में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR) ने किसानों के लिए मौसम आधारित कृषि सलाह जारी की है।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की मौसम आधारित कृषि सलाह

वर्षा के पूर्वानुमान को ध्यान में रखते हुए सभी किसानों को सलाह है की किसी प्रकार का छिड़काव ना करें और खड़ी फसलों व सब्जी नर्सरियों में उचित प्रबंधन रखे।

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दलहनी फसलों व सब्जी नर्सरियों में जल निकास की उचित व्यवस्था करें।

धान की फसल में यदि पौधों का रंग पीला पड़ रहा हो और पौधे की ऊपरी पत्तियां पीली और नीचे की हरी हो, तो इसके लिए जिंक सल्फेट (हेप्टा हाइडेट्र 21 प्रतिशत) 6 किग्रा/हैक्टेयर की दर से 300 लीटर पानी में घोल बनाकर स्प्रे करें। इस मौसम में धान की वृद्धि होती इसलिए फसल में कीटों की निगरानी करें। तना छेदक कीट की निगरानी के लिए फिरोमोन प्रपंच -3-4 /एकड़ लगाए।
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इस मौसम में किसान गाजर की (उन्नत किस्म - पूसा वृष्टि) बुवाई मेड़ों पर कर सकते हैं। बीज दर 0-6.0 कि.ग्रा. प्रति एकड़। बुवाई से पूर्व बीज को केप्टान - 2.0 ग्रा. प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचार करें और खेत में देसी खाद और फास्फोरस उर्वरक अवश्य डालें। जिन किसानों की टमाटर, हरी मिर्च, बैंगन व अगेती फूलगोभी की पौध तैयार है,

वे मौसम को देखते हुए रोपाई मेड़ों पर (ऊथली क्यारियों) पर करें और जल निकास का उचित प्रबन्ध रखें।

इस मौसम में किसान ग्वार (पूसा नव बहार, दुर्गा बहार), मूली (पूसा चेतकी), लोबिया (पूसा कोमल), भिंडी (पूसा ए-4), सेम (पूसा सेम 2, पूसा सेम 3), पालक (पूसा भारती), चौलाई (पूसा लाल चौलाई, पूसा किरण) आदि फसलों की बुवाई के लिए खेत तैयार हो तो बुवाई ऊंची मेंड़ों पर कर सकते हैं। बीज किसी प्रमाणित स्रोत से ही खरीदें। जल निकास का उचित प्रबन्ध रखें। किसान वर्षाकालीन प्याज की पौध की रोपाई इस समय कर सकते हैं। जल निकास का उचित प्रबन्ध रखें। इस मौसम में किसान स्वीट कोर्न (माधुरी, विन ऑरेंज) और बेबी कोर्न (एच एम-4) की बुवाई कर सकते हैं।
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जल निकास का उचित प्रबन्ध रखें। कद्दूवर्गीय और दूसरी सब्जियों में मधुमक्खियों का बडा योगदान है क्योंकि, वे परागण में सहायता करती है इसलिए जितना संभव हो मधुमक्खियों के पालन को बढ़ावा दें। कीड़ों और बीमारियों की निरंतर निगरानी करते रहें, कृषि विज्ञान केन्द्र से सम्पर्क रखें व सही जानकारी लेने के बाद ही दवाईयों का प्रयोग करें। किसान प्रकाश प्रपंश (Light Trap) का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके लिए एक प्लास्टिक के टब या किसी बड़े बरतन में पानी और थोडा कीटनाशक दवाई मिलाकर एक बल्ब जलाकर रात में खेत के बीच में रखे दें। प्रकाश से कीट आकर्षित होकर उसी घोल पर गिरकर मर जाएंगे। इस प्रपंश से अनेक प्रकार के हानिकारक कीटों मर जाते हैं। गेंदा के फूलों की (पूसा नारंगी) पौध छायादार जगह पर तैयार करें और जल निकास का उचित प्रबन्ध रखें। फलों (आम, नीबू और अमरुद) के नऐ बाग लगाने के लिए अच्छी गुणवत्ता के पौधों का प्रबन्ध करके इनकी रोपाई जल्द करें।
बैंकिंग से कृषि स्टार्टअप की राह चला बिहार का यह किसान : एक सफल केस स्टडी

बैंकिंग से कृषि स्टार्टअप की राह चला बिहार का यह किसान : एक सफल केस स्टडी

कठिन मेहनत से हासिल बैंकिंग की नौकरी छोड़, कृषि में स्टार्टअप की राह पर चला बिहार का यह किसान

आजादी के बाद भारत की आर्थिक वृद्धि और जीडीपी में कृषि का योगदान निरंतर कम होता जा रहा है। हालांकि,
हरित क्रांति की सफलता के बाद एक समय आयात पर निर्भर रहने वाली भारतीय कृषि इतनी सफल तो हो पायी, कि देश के लोगों की मांग पूरी करने के अलावा कुछ स्तर पर निर्यात में भी हिस्सेदारी बंटा पाई। 2011 की जनगणना के अनुसार, 78 मिलियन प्रवासी मजदूर कृषि क्षेत्रों में सक्रिय रहने के अलावा, अतिरिक्त आय के लिए प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भी काम करते हैं और इसी वजह से कृषि से होने वाली उत्पादकता में निरंतर कमी देखने को मिली है। बिहार के औरंगाबाद जिले के बरौली गांव में रहने वाले एक किसान की कहानी कुछ ऐसे ही शुरू हुई थी, जब उन्होंने कृषि और किसानी में सफल हुए कई विदेशी और भारतीय किसानों की केस स्टडी (case study) के बारे में पढ़ा। मैनेजमेंट प्रोफेशनल के रूप में काम करते हुए ही 2011 में बिहार के अभिषेक कुमार ने अच्छी सैलरी देने वाली जॉब को छोड़ने का निर्णय लिया और आज अभिषेक कुमार के खेतों में तुलसी (Tulsi), हल्दी (Turmeric), गिलोय (giloy) तथा मोरिंगा (Drumstick) और गेंदा (मेरीगोल्ड, Marygold) जैसी, आयुर्वेदिक औषधियों में इस्तेमाल होने वाले पौधों की खेती की जाती है। अभिषेक को परिवारिक जमीन के रूप में 20 एकड़ का क्षेत्र मिला था, जिनमें से 15 एकड़ के क्षेत्र में वह इसी तरह कम समय में तैयार होने वाली आयुर्वेदिक औषधियों का उत्पादन कर बड़ी मार्केटिंग कंपनियों से जुड़ते हुए अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं।


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अभिषेक ने बताया कि धान, गेहूं और मक्का से होने वाली बचत इन फसलों की तुलना में आधी भी नहीं होती है, लेकिन वैज्ञानिकों के द्वारा सुझाई गई आधुनिक विधियों और कृषि विभाग के द्वारा जारी की गई एडवाइजरी का सही तरीके से पालन कर, इंटरनेट की मदद से कई सफल किसानों तक पहुंच बनाकर, बेहतर कृषि उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कुछ ऐसे गुण सीखे, जो आज अभिषेक को अच्छा मुनाफा दे रहे हैं। बिहार में एक प्रॉफिटेबल कृषि मॉडल बनाने की सोच को लेकर काम कर रहे अभिषेक, खेत से होने वाली उत्पादकता पर ज्यादा ध्यान देते हैं। खुद अभिषेक ही बताते हैं कि एक कृषि परिवार से संबंध रखने के बावजूद भी खेती में कम आमदनी होने की वजह से, अपने परिवार को सहायता प्रदान करने और खुद का गुजारा करने के लिए वह पुणे में एक बैंक में कंसलटेंट के रूप में काम करने लगे थे। अभिषेक ने बताया कि जब उन्होंने सिक्योरिटी गार्ड और चपरासी जैसे पदों पर काम करते वाले लोगों को देखा और उनसे मुलाकात हुई, तो पता चला कि इन लोगों के गांव में बहुत ज्यादा जमीन खाली पड़ी है और खेती में मुनाफा ना होने की वजह से ही वह अपने परिवार को गांव में छोड़कर शहरों में मुश्किल भरी जिंदगी जी रहे हैं। इन्हीं घटनाओं से प्रेरणा लेते हुए अभिषेक ने अपनी नौकरी को छोड़ वापस गांव में ही रहते हुए कृषि में इनोवेशन (Innovation) करने की सोच के साथ एक नई शुरुआत करने की सोची। आज अभिषेक को उनके गांव में ही नहीं बल्कि पूरे जिले में एक अलग पहचान मिल चुकी है और बिहार के कई बड़े एनजीओ (NGOs) तथा किसान भाई समय-समय पर उनसे जाकर मिलते हैं और अभिषेक के कृषि मॉडल की तरह ही अपने खेत की जमीन की उर्वरता और उत्पादन बढ़ाने के लिए राय लेते है।


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जब अभिषेक ने अपनी खेती की शुरुआत की तभी उन्होंने मन बना लिया था कि वह केवल किताबी ज्ञान को किसानों को बताने की बजाय पहले उसे अपने खेत में अपना कर देखेंगे और यदि अच्छा मुनाफा होगा तभी दूसरे किसान भाइयों को भी नई तकनीकों को सलाह देंगे, उन्हीं प्रयोगों का अभिषेक को इतना फायदा हुआ कि वर्तमान में वह लगभग 95 से अधिक कृषि उत्पादन संगठनों (Farmers producer organisation) से जुड़े हुए है और इन संगठनों से जुड़े हुए लगभग 2 लाख से अधिक किसान भाइयों को साल 2011 से मार्केटिंग और खेती से जुड़ी समस्त जानकारियां उपलब्ध करवा रहे है। किसी भी शहरी परिवेश से वापस ग्रामीण क्षेत्र में आकर कृषि कार्यों की शुरुआत करने में अनेक प्रकार की समस्याएं होती है और ऐसी ही समस्या अभिषेक के सामने भी बिहार में एक अच्छा मुनाफा कमाने वाले किसान बनने की राह में अड़चन पैदा कर रही थी। हालांकि जब अभिषेक शहर से अपनी नौकरी छोड़ वापस गांव में आए, तो उन्हें कई लोगों के द्वारा विरोध झेलना पड़ा और उनके परिवार के सदस्यों के द्वारा इस विचार को पूरी तरीके से गलत ठहरा दिया गया, लेकिन जब अभिषेक ने अपने पिता को आधुनिक और समोच्च तरीके से होने वाली वैज्ञानिक विधियों की मदद से खेती करने की बात बताई, तो उनके परिवार ने भी हामी भरदी। वैज्ञानिक विधि का पालन करते हुए अभिषेक ने सबसे पहले अपने खेत में मिट्टी की जांच करवाई, जिससे उन्हें उनके खेत में पाई जाने वाली मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्वों के बारे में पता चला, कौन से पोषक तत्वों की कितनी मात्रा खेत में पहले से उपलब्ध है और किन पोषक तत्वों की खेत की मिट्टी में कमी है।


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अभिषेक ने अपने किसानी करियर में पहली शुरुआत सामान्य खेती से ही की थी, लेकिन जब उन्होंने बागवानी कृषि को अपनाया तो उनके द्वारा किए गए सभी प्रयास सफल हुए और पहली साल में ही 6 लाख रुपए से अधिक की कमाई हुई। अभिषेक बताते हैं कि 2011 से ही वह रोज सुबह एक घंटे साइबर कैफे में जाकर इंटरनेट और यूट्यूब की मदद से विदेशी और पूशा के वैज्ञानिकों के द्वारा बताई गई नई विधियों को अपने खेत में आजमाकर देखते थे। जरबेरा की फसल का उत्पादन करने वाले वह बिहार के पहले व्यक्ति थे। इसके लिए उन्होंने बेंगलुरु और पुणे में काम कर रही कृषि से जुड़ी कई बड़ी साइंटिफिक लाइब्रेरी में जाकर रिसर्च करने वाले लोगों से बात कर उच्च गुणवत्ता वाले बीजों (High yield variety seeds) को उगाया तो पहले ही उत्पादन के बाद अच्छा मुनाफा दिखाई दिया। आज उनके खेतों में एक चौथाई से ज्यादा हिस्सों पर इसी प्रकार के औषधियों में इस्तेमाल होने वाले पौधे उगाए जाते है। अभिषेक बताते हैं कि औषधीय पौधों (Medicine Plants) को एक बार लगाने के बाद कुछ समय तक बिना निराई गुड़ाई के भी रखा जा सकता है और उत्पादन में होने वाली लागत को कम किया जा सकता है, क्योंकि ऐसे प्लांट्स के पौधे और पत्तियां अधिक बारिश और तेज धूप तथा भयंकर ठंड में भी वृद्धि दर को बरकरार रख सकते हैं, जिससे उर्वरकों पर होने वाली लागत कम आती है। औषधीय पौधों में एक बार पानी देने के बाद वे आसानी से 20 से 25 दिन तक बिना पानी के रह सकते है। अभिषेक ने बताया कि मेडिसिन पौधों का सबसे बड़ा फायदा यह भी है कि इनमें आवारा पशु और जानवरों से होने वाले नुकसान पूरी तरीके से कम किए जा सकते है, क्योंकि नीलगाय जो कि बिहार के खेतों में सबसे ज्यादा क्रॉप डेमेज (Crop damage) करती है, वह इन पौधों को बिल्कुल भी नुकसान नहीं पहुंचाती।


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अफ्रीका और आसाम में काम कर रही चाय के बागान से जुड़ी कंपनियों के अनुसंधानकर्ताओं की मदद से अभिषेक ने बिहार में रहते हुए ही 'ग्रीन टी' का उत्पादन भी शुरू किया है। ग्रीन टी बनाने के लिए तुलसी, लेमन घास (Lemongrass) और मोरिंगा के पौधों की पत्तियों की आवश्यकता होती है, जिन्हें बारीक तरीके से काटकर एक सोलर ड्रायर विधि की मदद से अभिषेक के द्वारा ही स्थापित गांव की ही एक विपणन इकाई में मशीन की मदद से तैयार किया जाता है और कई बड़ी भारतीय और इंटरनेशनल मार्केटिंग कंपनियों को बेचा जाता है। बैंक में काम करने वाले एक कर्मचारी से लेकर खेती में सफलता प्राप्त करने वाले अभिषेक कई किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत बनने के बाद अब कृषि के क्षेत्र में एक नई स्टार्टअप की योजना बना रहे है, हालांकि पिछले कुछ समय से बेंगलुरु से संचालित हो रही एक एग्रीटेक स्टार्टअप (Agritech startup) के साथ वह पहले से ही बिजनेस डेवलपर के रूप में जुड़े हुए हैं।


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अभिषेक प्राथमिक कृषि सहकारी समितियां (PACs) में होने वाली विपणन की विधियों में भी कुछ सुधार की उम्मीद करते है, क्योंकि वह मानते है कि मंडियों में होने वाले बिचौलिए की जॉब को पूरी तरीके से खत्म कर देना ही किसानों के लिए फायदेमंद रहेगा। स्टार्टअप की राय पर अभिषेक का मानना है कि वह किसानों और कृषि उत्पादन संगठन (FPOs) के मध्य कम शुल्क पर काम करने वाले एक माध्यम के रूप में भूमिका निभाने वाली स्टार्टअप की शुरुआत करना चाहते है और उनकी कोशिश है कि किसानों को उगाई गई उपज की सरकार के द्वारा तय किए गए मिनिमम सपोर्ट प्राइस (Minimum Support Price -MSP) से कुछ ज्यादा ही राशि मिले। अपनी इस स्टार्टअप यात्रा के दौरान अभिषेक एम.एस.स्वामीनाथन समिति के द्वारा दिए गए सुझावों को मध्य नजर रखते हुए अपने स्तर पर भारतीय कृषि में कुछ बदलाव करने की सोच भी रखते है। बिहार कृषि विश्वविद्यालय, भागलपुर से अभिषेक को 2014 में सर्वश्रेष्ठ किसान पुरस्कार भी मिल चुका है। इसके अलावा भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के द्वारा दिया जाने वाला भारतीय कृषि रत्न पुरस्कार जीतने वाले अभिषेक प्राकृतिक खेती को ज्यादा प्राथमिकता देते है और हमेशा घर पर तैयार की हुई प्राकृतिक गोबर खाद से ही अधिक उत्पादन प्राप्त करने की कोशिश करते है। अभिषेक का मानना है कि भारतीय किसान जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग ( Zero budget natural farming) और समोच्च कृषि (Sustainable development) जुताई विधियों की मदद से आने वाले समय में उत्पादन बढ़ाने के साथ ही विदेशी मार्केट में भी अपनी पकड़ बना पाएंगे। आशा करते हैं कि Merikheti.com के द्वारा बिहार के अवॉर्ड विजेता किसान अभिषेक की कृषि क्षेत्र में प्राप्त सफलताओं और उनके नए विचारों से जुड़ी यह जानकारी आपको पसंद आई होगी और आने वाले समय में आप भी ऐसी ही भविष्यकारी नीतियों को अपनाकर एक सफल किसान बनने की राह पर जरूर अपना लक्ष्य प्राप्त करेंगे।
सेना में 18 साल नौकरी करने के बाद, गेंदे की खेती कर कमा रहे हैं लाखों

सेना में 18 साल नौकरी करने के बाद, गेंदे की खेती कर कमा रहे हैं लाखों

विगत कुछ दिनों में फूलों की खेती किसानों के बीच काफी लोकप्रिय हो रही हैं, जिसका मुख्य कारण कम लागत और बढ़िया मुनाफा है। पूरे भारत में गुलाब से लेकर सूरजमुखी और अन्य फूलों की खेती बड़े स्तर पर की जा रही है। किसान पारंपरिक खेती से फूलों की खेती की तरफ ज्यादा रुझान दिखा रहे हैं, जिसका मुख्य कारण कम लागत में अच्छा मुनाफा बताया जा रहा है। फूलों की खेती में जो सबसे ज्यादा लोकप्रिय हो रहा है, वह है गेंदा की खेती। किसानों का कहना है, कि गेंदे की खेती में काफी अच्छा मुनाफा है। किसान यह भी बता रहे हैं, कि गेंदे की खेती में लागत कम है और इसे करना भी अन्य फूलों की खेती से आसान है। आज इस लेख में गेंदे की खेती करने वाले उस पूर्व सैनिक की कहानी बताएंगे जो विगत कुछ दिनों से गेंदा की खेती के लिए काफी चर्चित हो रहे हैं।

कौन है गेंदा की खेती करने वाला चर्चित किसान

गेंदा की खेती कर चर्चित होने वाले किसान जमशेदपुर से लगभग 40 किलोमीटर दूर रहने वाला एक आदिवासी बताया जा रहा है। आपको यह जानकर बेहद हैरानी होगी कि यह किसान पूर्व में 18 साल तक सैनिक के तौर पर सेवाएँ दे चुके हैं। 18 साल सेना में सेवा देने के बाद एरिक मुंडा नामक व्यक्ति अब गेंदा की खेती कर काफी चर्चित हो रहे हैं।


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क्या कहते हैं एरिक मुंडा

गेंदा की खेती कर चर्चित होने वाले किसान एरिक मुंडा का कहना है, कि इसी खेती से वो अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा दे पा रहा है। वो कहते हैं, कि इसी खेती की कमाई की वजह से उनके बच्चों ने इंजीनियरिंग, बीकॉम(B.Com) की पढ़ाई की। गौरतलब है, कि उनके बच्चों ने पढ़ाई करने के बाद भी कहीं नौकरी करने की जगह उसी फूल की खेती करना उचित समझा और आज उनके सभी बच्चे उनके साथ फूल की खेती कर रहे हैं। एरिक मुंडा का कहना है, कि ये बच्चे उन किसानों के लिए मिसाल हैं, जो अभी भी नौकरी की तलाश में है या फिर बेरोजगार हैं।


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एरिक मुंडा 18 साल तक देश की सेवा करने के बाद जब वापस आए, तो वह दलमा के तराई वाले इलाकों में फूल की खेती करना शुरू किया। एरिक मुंडा के पुत्र अनीश मुंडा का कहना है, कि वह अपने पिता से प्रभावित होकर उन्हीं के साथ फूल की खेती शुरू कर दिए हैं। अनीश मुंडा यह भी कहते हैं, कि वह अपने पिता की तरह फूल की खेती में अपना भविष्य भी देख रहे हैं। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि आज का यह चर्चित किसान ने कभी मात्र चार एकड़ में गेंदे की खेती शुरू की थी और आज लाखों लाख मुनाफा कमा रहे हैं। एरिक मुंडा किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत है, जो आज भी नौकरी की तलाश कर रहे हैं या फिर बेरोजगार हैं।


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कई बीमारियों में गेंदे के रस का इस्तेमाल

गेंदे की बढ़ती मांग को देखते हुए भी किसान इसकी खेती की तरफ रुझान कर रहे हैं। आपको यह जानकर बेहद आश्चर्य होगा कि गेंदे के फूल के रस का इस्तेमाल बहुत सारी बीमारियों में किया जाता है। किसान यह भी बताते हैं, कि अगर आपके पास एक हेक्टेयर खेती योग्य जमीन है तो आप हर साल लगभग छः लाख की कमाई कर सकते हैं।
इस तरीके से किसान अब फूलों से कमा सकते हैं, अच्छा खासा मुनाफा

इस तरीके से किसान अब फूलों से कमा सकते हैं, अच्छा खासा मुनाफा

भारत में फूलों का अच्छा खासा बाजार मौजूद है। किसान के कुछ किसान फूलों की खेती करके अच्छा खासा लाभ कमाते हैं। साथ ही, कुछ किसान बिना फूलों का उत्पादन किये बेहतरीन आमदनी करते हैं। 

इस तरह के व्यापार से भी बेहतरीन मुनाफा लिया जा सकता है। भारत के किसान रबी, खरीफ, जायद सभी सीजनों में करोड़ों हेक्टेयर में फसलों का उत्पादन करते हैं। उसी से वह अपनी आजीविका को भी चलाते हैं। 

किसानों का ध्यान विशेषकर परंपरागत खेती की ओर ज्यादा होता है। हालाँकि, विशेषज्ञों के अनुसार किसान पारंपरिक खेती के अतिरिक्त फसलों का भी उत्पादन कर सकते हैं। 

वर्तमान में ऐसी ही खेती के संबंध में हम चर्चा करने वाले हैं। हम बात करेंगे फूलों की खेती के बारे में जिनका उपयोग शादी से लेकर घर, रेस्टोरेंट, दुकान, होटल, त्यौहारों समेत और भी भी बहुत से समारोह एवं संस्थानों को सजाने हेतु किया जाता है। 

फूलों की सजावट में प्रमुख भूमिका तो होती ही है, साथ ही अगर फूलों के व्यवसाय को बिना बुवाई के भी सही तरीके से कर पाएं तो खूब दाम कमा सकते हैं।

फूलों के व्यवसाय से अच्छी आय अर्जित कर सकते हैं

भारत के बाजार में फूलों का अच्छी खासी मांग है। फूलों का व्यापार को आरंभ करने के लिए 50 हजार से एक लाख रुपये का खर्च आता है। मुख्य बात यह है, कि फूलों के इस व्यवसाय को 1000 से 1500 वर्ग फीट में किया जा सकता है।

फूल कारोबार से जुड़े लोगों ने बताया है, कि कृषि की अपेक्षा फूलों के व्यवसाय से जुड़ रहे हैं। तो कम धनराशि की आवश्यकता पड़ती है। 

यदि इसके स्थान की बात की जाए तो 1000 से 1500 वर्ग फीट भूमि ही व्यवसाय करने हेतु काफी है। इसके अतिरिक्त फूलों को तरोताजा रखने हेतु एक फ्रिज की आवश्यकता होती है। 

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फूलों के व्यवसाय में कितने मानव संसाधन की आवश्यकता पड़ेगी

किसान यदि फूलों का व्यवसाय करने के बारे में सोच रहे हैं, तो उसके लिए कुछ मानव संसाधन की आवश्यकता भी होती है। क्योंकि फूलों की पैकिंग व ग्राहकों के घर तक पहुँचाने हेतु लोगों की आवश्यकता पड़ती है। 

फूल की खेती करने वाले किसानों से फूलों की खरीदारी करने के लिए भी सहकर्मियों की जरूरत अवश्य होगी। भिन्न-भिन्न समय पर भिन्न-भिन्न प्रकार के फूलों की आवश्यकता पड़ती है। 

इसलिए समस्त प्रकार के फूलों का प्रबंध व्यवसायी को स्वयं करना होगा। फूलों को काटने, बांधने एवं गुलदस्ता निर्मित करने के लिए भी कई उपकरणों की जरूरत पड़ेगी।

इस प्रकार बढ़ाएं फूलों का व्यवसाय

सामान्यतः हर घर में जन्मदिन, शादी, ब्याह जैसे अन्य समारोह होते रहते हैं। इसके अतिरिक्त प्रतिष्ठान हो अथवा घर लोग सुबह शाम पूजा अर्चना में फूलों का उपयोग करते हैं। 

अगर फूलों का कारोबार करते हैं, तो प्रतिष्ठान एवं ऐसे परिवारों से जुड़कर अपने कारोबार को बढ़ाएं। किसी प्रतिष्ठान, दुकान एवं घरों पर संपर्क करना अति आवश्यक है। 

उनको अवगत कराया जाए कि ऑनलाइन अथवा ऑनकॉल फूल भेजने की सुविधा भी दी जाती है। आप अपने फूलों के व्यापार को सोशल मीडिया जैसे कि व्हाटसएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम इत्यादि के माध्यम से भी बढ़ा सकते हैं। 

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सर्वाधिक मांग वाले फूल कौन से हैं

दरअसल, बाजार में सैंकड़ों प्रकार के फूल उपलब्ध हैं। परंतु, सामान्यतः समारोहों में रजनीगंधा, कार्नेशन, गुलाब, गेंदा, चंपा, चमेली, मोगरा, फूल, गुलाब, कमल, ग्लैडियोलस सहित अतिरिक्त फूलों की मांग ज्यादा होती है।

फूलों से आपको कितनी आमदनी हो सकती है

हालाँकि बाजार में समस्त प्रकार के फूल पाए जाते हैं, इनमें महंगे एवं सस्ते दोनों होते हैं। दरअसल, गुलाब और गेंदा के भाव में ही काफी अंतर देखने को मिल जाता है। कमल का फूल ज्यादा महंगा बिकता है। 

कमल से सस्ता गुलाब व गुलाब से सस्ता गेंदा होता है। जिस कीमत पर आप किसानों से फूल खरीदें, आपको उस कीमत से दोगुने या तिगुने भाव पर अपने फूलों को बेचना चाहिए। 

अगर आप किसी फूल को 2 रुपये में खरीदते हैं, तो उसको आप बाजार में 6 से 7 रुपये के भाव से बाजार में आसानी से बेच सकते हैं। किसी विशेष मौके पर फूल का भाव 10 से 20 रुपये तक पहुँच जाता है। 

गेंदे के फूल का भाव 50 से 70 रुपये प्रति किलो के हिसाब से प्राप्त हो जाता है। साथ ही, गुलाब का एक फूल 20 रुपये में बिक रहा है। 

वहीं मोगरा का फूल 1000 रुपये प्रति क्विंटल तक भाव प्राप्त हो रहा है। जूलियट गुलाब के गुलदस्ते का भाव तकरीबन 90 पाउंड मतलब की 9,134 रुपये के लगभग है।

इस राज्य में गेंदे की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए 70% प्रतिशत अनुदान

इस राज्य में गेंदे की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए 70% प्रतिशत अनुदान

बिहार सरकार की तरफ से किसानों के लिए कई सारी योजनाऐं चलाई जा रही हैं। सरकार गेंदे के फूलों की खेती करने के लिए अनुदान प्रदान कर रही है। सरकार की तरफ से कृषकों को इस फूल की खेती करने के लिए 70 फीसद तक का अनुदान भी दिया जा रहा है। गेंदे के फूल का उपयोग पूजा पाठ से लेकर सजावट के कार्यों में किया जाता है। ये फूल दिखने में काफी ज्यादा खूबसूरत होता है। इस फूल की खेती को प्रोत्साहन देने के लिए बिहार राज्य की सरकार कृषकों को अनुदान प्रदान कर रही है। बिहार सरकार ने गेंदे के फूलों की खेती को प्रोत्साहन देने के लिए एक नवीन योजना तैयार की है। इसके अंतर्गत गेंदे के फूलों की खेती के लिए सरकार की तरफ से 70 फीसद तक अनुदान दिया जा रहा है। गेंदे के फूलों की खेती काफी फायदेमंद है। इन फूलों की हर वक्त मांग बनी रहती है। इन फूलों को स्वागत समारोह, शादी-विवाह, धार्मिक अनुष्ठानों एवं सजावट में इस्तेमाल किया जाता है।

बिहार सरकार 70 प्रतिशत तक अनुदान प्रदान करेगी

बिहार सरकार का कहना है, कि किसानों को गेंदे के फूलों की खेती से ज्यादा धनराशि मिलेगी। इसके साथ ही इससे प्रदेश में लोगों को कार्य भी मिलेगा।किसान इस योजना के अंतर्गत एक एकड़ में गेंदे के फूलों की खेती करने के लिए 40,000 रुपये खर्च करेंगे। सरकार 28,000 रुपये अथवा 70 प्रतिशत खर्चा अनुदान के तौर पर प्रदान करेगी।

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बिहार में बढ़ेगा फूलों की खेती का रकबा

किसानों को इस योजना का फायदा प्राप्त करने के लिए संबंधित जनपद के उद्यान विभाग/कृषि विभाग में आवेदन करना पड़ेगा। कृषकों को आवेदन के साथ-साथ भूमि पट्टा, खाद, बीज और अन्य सामग्री की खरीद का दस्तावेज जमा करना होगा। सरकार का यह मानना है, कि बिहार में गेंदे के फूलों की खेती इस योजना से बढ़ेगी। इससे कृषकों की आमदनी में काफी बढ़ोतरी होगी और राज्य में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। 

ध्यान रखने योग्य बातें

गेंदे के फूलों की खेती के लिए दोमट मृदा सबसे उपयुक्त मानी जाती है। इसकी खेती के लिए 6-8 घंटे की धूप आवश्यक है। गेंदे के फूल की खेती करने के लिए प्रति एकड़ के अनुरूप लगभग 10 टन खाद की आवश्यकता होती है। साथ ही, गेंदे के फूलों की खेती के लिए प्रति एकड़ 100 किलोग्राम यूरिया, 50 किलोग्राम डीएपी एवं 50 किलोग्राम पोटाश की भी आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त गेंदे के फूल की खेती के लिए सिंचाई की उत्तम व्यवस्था भी होनी चाहिए।